महंगाई के मसले पर संसद में विपक्ष के हंगामें को एकदम नकारा साबित करने के लिये कांग्रेस ने बेशक मीडिया को मैनेज कर लिया। पर एक बात तो सच है कि महंगाई से आम जनता पिस रही है। जिस तरह यह सरकार बेलगाम होकर जनता पर एक के बाद एक बोझ डालती जा रही है और सोच रही है कि उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता, उसे कोई चुनौती मिल ही नहीं सकती, उसके लिए यह एक अच्छा संदेश है। इस बारे में तो कोई विवाद ही नहीं हो सकता कि साधारण गरीब जनता और कई तरह से तो पिस ही रही है, महँगाई भी उसकी जान निकाल रही है और अभी एक साल पहले ही चुनाव जीतकर आयी इस सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं है। इसकी रणनीति यह है कि फिलहाल कोई चुनाव चूँकि एकदम नजदीक नहीं है, इसलिए जनता का जितना भी तेल निकाला जा सकता है, निकाला जाना चाहिए। बाद में जरूरत पड़ी तो ताकत की कोई सस्ती-सी, देसी किस्म की, हाट-बाजार में मिलने वाली गोली भी दे देंगे तो जनता खुश हो जाएगी। वैसे भी जनता का क्या है? वह हमसे बचकर जाएगी कहां? तो यह सरकार काफी मुगालते में है कि इस तरह भी यह पांच साल तक चल जाएगी। फिर अगली बार राहुल गांधी रूपी तुरूप का पत्ता तो है ही। उसे सामने कर देंगे तो फिर से जीत जाएंगे। इस तरह कांग्रेस का अखंड साम्राज्य चलता रहेगा।
बहरहाल, यह सरकार जो कर रही है और जिस ढंग से कर रही है, उसके लिए अकेले वही जिम्मेदार नहीं है। सबसे पहले तो महंगाई न बढ़े, इसके खिलाफ उन राज्य सरकारों ने - जिनकी पार्टियों ने संसद में हंगामा किया हुआ है - अपने स्तर पर क्या किया है, इसका भी लेखा-जोखा इस वक्त लिया जाना चाहिए। और ऐसा किया जाए तो पता चलेगा कि इन सरकारों ने भी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के सिवाय कुछ नहीं किया है। फिर यह एक जाना-माना रहस्य है कि कांग्रेस-भाजपा और इन जैसी तमाम पार्टियां चुनाव के समय बड़े पूंजीपतियों द्वारा उपकृत की जाती हैं और चुनाव जीतने के शुरू के सालों में ही तत्काल उनका कर्ज ये 100 गुने या 1000 गुने ब्याज के साथ चुकाती हैं। इनसे आम आदमी पर महंगाई का बोझ लगातार बढ़ता चला जाता है। कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व में जब भी सरकारें आयी हैं, यह ट्रेंड बराबर देखने को मिला है। यह स्थिति आने का एक और कारण लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा का खत्म होते चले जाना है। साधारण जनता को जिससे राहत पहुंचे, मजबूती मिले, वह सब करना तो सरकार का बोझ बढ़ाना माना जाता है, अर्थव्यवस्था को कमजोर करना है और पानी में पैसा फेंकना माना जाता है। इस बात को राजनीतिक, अर्थशास्त्री और मीडिया सब लगभग एक मत से मानते हैं और कहते हैं लेकिन अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के नाम पर हजारों-करोड़ों रुपये जब प्रोत्साहन पैकेज के तौर पर दिए जाते हैं, तब सब चुप रहते हैं। तब सरकार के अनुशासित सिपाही की तरह अर्थशास्त्री और मीडिया (खासकर अँगरेजी) काम करते हैं लेकिन अनिवार्य तथा मुफ्त शिक्षा या रोजगार गारंटी योजना के लिए जब धन देने की बात आती है तो मीडिया के मुंह से भी आजकल बद्दुआएं निकलती हैं कि इन मरदूदों पर यह कीमती पैसा क्यों बर्बाद किया जा रहा है? ये तो हमेशा से गरीब थे और कुछ भी दे दो इन्हें, ये तो फिर भी ऐसे ही रहने वाले हैं। यह स्थिति आने का एक और कारण यह है कि राजनीतिक नेतृत्व तथा आम जनता के बीच, इस कदर दूरियां पैदा हो चुकी हैं कि सरकार में बैठे तमाम लोगों को जनता के कष्टों का अनुमान लगना तक बंद हो चुका है। जिन सांसदों, मंत्रियों की घोषित संपत्ति करोड़ों में है, उन्हें क्या पता कि महंगाई होती क्या बला है या बेरोजगार होने का मतलब क्या होता है या रोजगार गारंटी योजना में दिनभर हाड़ तोड़ मेहनत के बाद भी जब सौ रुपए तक नहीं मिलते हैं या इस योजना में जब भयानक भ्रष्टाचार होता है या अस्पतालों और दफ्तरों में लोगों के साथ जो निर्मम व्यवहार होता है या पुलिस जिस तरह गरीबों के साथ व्यवहार करती है तो इसका अर्थ वाकई लोगों के लिए क्या होता है?
इसलिए सवाल केंद्र में मौजूदा सरकार का ही नहीं है। वह शत-प्रतिशत दोषी है मगर अन्य राज्य सरकारों का हाल भी क्या बेहतर है? ऐसी सरकार की महँगाई के मुद्दे पर संवेदनशीलता कितनी असली है? क्या बुद्धदेव भट्टाचार्य ने जमीनी हालत को समझा होता और वे आर्थिक उदारीकरण की जय करने में इतना वक्त बर्बाद न करते तो नक्सलवाद उनके राज्य में इतना बढ़ पाता? जनता से वामपंथी दलों का अलगाव क्या इतना बढ़ता? आज का यह पूरा संगठित राजनीतिक परिदृश्य आम जनता के प्रति संवेदनहीन है। राजनीतिक पक्ष के हों या विपक्ष के, उन्हें जनता से कोई लगाव नहीं है। वे जनता के नाम पर खेल खा रहे हैं। इसलिये संसद में होने वाला यह नाटक बंद होना चाहिये। 
Thursday, July 29, 2010
संसद में नाटक बंद हो
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Tuesday, July 27, 2010
बेशर्म वे और बेबस हम
संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के महंगाई पर काम रोको प्रस्ताव के रद्द होते ही मान्यवर सांसदों ने पिछले दिनों आसमान सिर पर उठा लिया और माहौल इतना उग्र हो गया कि संसद की कार्यवाही रोक देनी पड़ी। विपक्ष अड़ा हुआ था कि महंगाई के मुद्दे पर स्थगन प्रस्ताव के अलावा किसी भी सूरत में वह चर्चा नहीं होगी और सरकार इसे मानने को तैयार नहीं थी। यह जानते हुए भी कि इस हंगामे की भेंट भी गरीबी, महंगाई की मारी जनता की गाढ़ी कमाई ही चढ़ेगी।
आंकड़े बताते हैं कि संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर 40,000 रुपये से भी ज्यादा यानी एक घंटे में 24 लाख रुपये और एक दिन में 1.9 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। जरा पिछली लोकसभा से जुड़े इन आंकड़ों पर गौर करें। 2008 में लोकसभा की बैठक मात्र 46 दिन हुई। इतिहास में सबसे कम। लोकसभा की कार्यवाही चलाने में सरकार के 440 करोड़ रुपये खर्च हुए। लोकसभा की एक तो बैठक कम हुई और हुई भी तो काम की इतनी हड़बड़ी रही कि 17 मिनट में आठ विधेयक पारित कर दिए गए। बिना किसी बहस के। राज्यसभा ने भी जल्दबाजी दिखाई और 20 मिनट में तीन विधेयक निपटा दिए गए। जनता के 56 नुमाइंदे तो ऐसे निकले, जिन्होंने पांच साल के पूरे कार्यकाल में संसद में एक सवाल पूछने की भी जहमत नहीं उठायी। 67 सांसद ऐसे थे, जिन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में 10 या इससे भी कम सवाल पूछे। इस पर भी पैसे लेकर सवाल पूछने का मामला सामने आ गया और दस सांसदों को बर्खास्तगी झेलनी पड़ी। आप जनता का एक पैसा भी पाने लायक नहीं हैं। लगातार लोकसभा की कार्यवाही बाधित करने वाले सांसदों पर गुस्सा कर तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने यह टिप्पणी की थी।
ताजा बात करें तो इस साल बजट सत्र में ही नेताओं ने संसद की कार्यवाही बाधित कर जनता के 25 करोड़ रुपये पानी में बहा दिए। सत्र के दौरान सदन के 95 घंटे हंगामे की भेंट चढ़ गए। सत्र की समाप्ति के बाद लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने बताया, 'लगातार बाधा की वजह से संसद की कार्यवाही नहीं चल पाना बड़ी चिंता की बात है। इस सत्र में हंगामे और स्थगन की वजह से लोकसभा के 69 घंटे 51 मिनट बर्बाद हुए। बैठक देर तक संचालित कर 19 घंटे 38 मिनट की ही क्षतिपूर्ति की जा सकी। सत्र के दौरान राज्यसभा के 95 घंटे बर्बाद हुए।
खास बात यह है कि नेता यह सब जनता और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर करते हैं। संविधान की धारा 19 (2) के तहत तमाम नागरिकों के अभिव्यक्ति के अधिकार को मूल अधिकार का दर्जा दिया गया है, पर इसमें यह भी कहा गया है कि अभिव्यक्ति संविधान के दायरे में होनी चाहिए। नेता अक्सर इसकी अनदेखी करते हैं। संसद में अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संरक्षित किया गया है। सांसद-विधायक हंगामा करके ही जनता के पैसे में आग नहीं लगाते हैं, वे उनके पैसे खर्च करने में भी ज्यादा दिमाग नहीं लगाते, ताकि पैसे का अधिकतम सदुपयोग हो सके। संसद में बजट से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए दिए जाने वाले समय का औसत वर्ष 1952 से 1979 के बीच 23 फीसदी था। 1980 के बाद के वर्षों में यह औसत 10 प्रतिशत पर पहुंच गया है। 2004 में तो वित्त विधेयक बिना चर्चा के पास हो गया। 1993-94 में प्रति सांसद सरकारी खर्च 1.58 लाख रुपये बैठता था। दस साल में ही यह आंकड़ा 55.34 लाख पर पहुंच गया यानी 3,400 फीसदी का इजाफा ! इसी अवधि में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 500 प्रतिशत और सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह में करीब 900 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। पिछले पांच सालों में भी सांसदों पर सरकार का खर्च बढ़ा ही है और अब तो सांसद अपनी तनख्वाह 80 हजार रुपये प्रति महीना करवाने वाले हैं। यह हाल तब है जब सदन में उनका काम लगातार घट रहा है। 1980 में सदन का सत्र औसतन 143 दिन चलता था, जो 2001 में 90 दिन पर आ गया था। और हमारी बेबसी देखिये कि हम चुपचाप इसे देखते सुनते रहते हैं। इन हुड़दंगियों को वापस बुलाने का हक हमें है नहीं और चुनाव के दौरान रोकने में निर्बल हैं हम। वे महाशय भी सब जानते हैं और हमारी बेबसी पर ठहाके लगाते हैं।
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Thursday, July 22, 2010
इन्हें शर्म क्यों नहीं आती?
बिहार विधानमंडल में बुधवार को विपक्षी सदस्यों द्वारा विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी के ऊपर चप्पल फेंकी गयी। वहीं, विधान परिषद में सभापति ताराकांत झा का माइक उखाड़कर उनकी ओर फेंका गया।
विधानसभा में मंगलवार को भी जूतमपैजार हुई थी और हमारे माननीय विपक्षी सदस्य धरने पर बैठ गये थे। बुधवार को जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई तो बिहार के विभिन्न विभागों में हुए 11412.54 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं के मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के इस्तीफे की मांग को दोहराते हुए विपक्ष ने सदन में सरकार विरोधी नारेबाजी शुरू कर दी।
इस बीच, बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष शकुनी चौधरी ने अपनी कुछ बात रखनी चाही जिसका सदन में मौजूद उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने विरोध किया। अध्यक्ष से कहा कि चौधरी जी के कुछ कहे जाने के पूर्व सदन में व्यवस्था बहाल की जाए।
इस दौरान प्रदेश के जल संसाधन मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने सदन में अमर्यादित आचरण के लिए 16 विपक्षी विधायकों को सदन से निलंबित किये जाने का एक प्रस्ताव लाया, जिसे सदन ने ध्वनिमत से पारित कर दिया।
बिहार विधानसभा में दूसरे दिन भी जो अशोभनीय और हिंसक दृश्य देखने को मिले, उन्हें देखकर हर बिहारवासी शर्मिंदा है। नागरिकों का अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों से विश्वास उठ जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। इन मान्यवरों ने सारी मर्यादाएं और लक्ष्मण रेखाएं पार कर ली हैं और इन्हें एक क्षण को भी जनता का प्रतिनिधित्व करने का हक नहीं होना चाहिए। यह कहने में हिचक नहीं होती कि ये विधायक या जनप्रतिनिधि नहीं पेशेवर गुंडे हैं। गुरुवार के अखबारों में गमले तोड़ती एक महिला सदस्य की जो तस्वीर देखने को मिली उससे तो लगता है कि अगर 30 प्रतिशत महिला आरक्षण हुआ तो सदन कबाड़ी बाजार में बदल जायेगा। हैरत की बात यह है कि गमले तोडऩे वाली माननीय सदस्या विधान परिषद की है और झगड़ा विधान सभा में हुआ था। अब उन्होंने यह रुख कैसे अख्तियार किया यह तो वे ही बता पायेंगी। जो बात शांति से हो सकती है और होती है, उसे ये बाहुबल से करना चाहते हैं। फिर ऐसे लोगों की जगह सदन में नहीं सड़क पर बल्कि जंगल में होनी चाहिए। क्या संसदीय लोकतंत्र में मुद्दे उठाने का यही अभद्र तरीका रह गया है ? मुद्दे के पक्ष या विपक्ष में जाने का अभी वक्त नहीं है। अभी खेल को खेल की तरह खेलने का समय है। विधानसभा अध्यक्ष को इन माननीयों ने आपसी सहमति से चुना है, क्या उस पर चप्पलें और जूते फेंके जाएंगे? क्या कुर्सियां और मेज सदन में उठाकर एक दूसरे पर मारे जाएंगे? माइक उखाड़े जाएंगे और कागज फाड़े जाएंगे? ये लोग शब्दों, तर्कों और तथ्यों के बजाय जूते और चप्पलों से अपनी बात मनवाना चाहते हैं। इन लोगों को अपने किए का जरा भी पश्चाताप नहीं, जबकि इनके नेता इन घटनाओं की निंदा तो करते हैं, मगर इन्हें रोकने की नैतिकता रत्ती भर नहीं दिखाते। ऐसा नहीं हो सकता कि इन नेताओं का अपने विधायकों पर नियंत्रण न हो। इसके विपरीत साफ लग रहा है कि सदन को सड़क बनाने का काम वे खुद पर्दे के पीछे से संचालित कर रहे हैं। हमारे देश ने लोकतंत्र तो पश्चिमी देशों से ले लिया, लेकिन हमारे प्रतिनिधियों ने अपने को लोकतांत्रिक गुणों, मर्यादाओं और स्वाभाव से जरा भी नहीं बांधा। देश में कौन सा ऐसा राजनीतिक दल है जिसमें आंतरिक लोकतंत्र है? जिसके दिल में लोकतंत्र नहीं, उसके दल में लोकतंत्र कहाँ से आएगा ? इसलिए हम एक बार नहीं, हजार बार इस तरह की घटनाओं को सदन में घटता हुआ देख रहे हैं, बल्कि अब तो लगता है कि खुदा न ख्वास्ता इनके हाथ में पिस्तौल हो तो उसे भी आजमा कर देखने में ये संकोच न करें। हमारे मतदाता इतने असहाय हैं कि जब-जब वे अपने वोट की ताकत से बदलाव लाने की कोशिश करते हैं, तब-तब उन्हें पता चलता है कि नये और पुराने चेहरों में कोई फर्क नहीं है। मतदाताओं को शर्म आ जाती है मगर प्रतिनिधियों को जरा भी शर्म नहीं आती।
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Wednesday, July 14, 2010
भारत में गरीबी

यूएनडीपी ह्यूमन डिवेलपमेंट रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सबसे अधिक गरीब रहते हैं। देश में कुल गरीबों की संख्या 42 करोड़ है, जो 26 अफ्रीकी देशों के गरीबों से एक करोड़ ज्यादा है। यूएनडीपी की ह्यूमन डिवेलपमेंट रिपोर्ट के ताजा संस्करण में कहा गया है कि भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और राजस्थान में गरीबों की बाढ़ है। यहां पर गरीबी निरंतर बढ़ती जा रही है। इसके चलते गरीबों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। एक तरफ जहां देश में अरबपति और करोड़पति बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गरीबों की संख्या भी बढ़ रही है।
यूएनडीपी की नजर में गरीब का मतलब है वह परिवार जिसे हर रोज एक डॉलर से कम आमदनी पर गुजारा करना पड़ता है। आज के हिसाब से जिस परिवार की आमदनी 45 रुपये या उससे कम है, लेकिन कैसी विडम्बना है कि देश के एक वर्ग में हजारों करोड़ की बातें आम हैं। लाखों करोड़ के सौदे होते हैं। करोड़ों रुपए के एडवांस इनकम टेक्स भरे जा रहे है, लेकिन बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा और राजस्थान में भूख पांव पसार रही है। किसी को परवाह नहीं है कि इस जगमगाते हुए इंडिया में एक भारत भी बसता है जिसमें सरकारी आंकड़ों के हिसाब से ही 42 करोड़ से ज्यादा ऐसे लोग हैं जो गरीबी की रेखा के नीचे रहने पर अभिशप्त है।
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रिन्यान्वयन मंत्रालय के आंकड़े और तथाकथित सर्वेक्षण इस रेखा को निर्धारित करते हैं। उसके अनुसार गरीबी की रेखा की परिभाषा कुछ इस तरह है। ग्रामीण इलाकों में जिन्हें 2400 कैलोरी और शहरी इलाकों में 2100 कैलोरी का भोजन या जो भी खाद्य-अखाद्य पदार्थ मिल जाते हैं, वे गरीब नहीं रहते। एक दिन में 2400 कैलोरी का मतलब है छह रोटी, सब्जी और एक कटोरी दाल, दो वक्त में। आप कल्पना कीजिए कि अगर आप भद्र लोग दिखने के लिए डाइटिंग नहीं कर रहे हैं तो आप कितनी कैलोरी खाते हैं। एक आम आदमी को स्वस्थ और कर्मठ रहने के लिए रोज कम से कम चार हजार कैलोरी की जरूरत है। मगर सन 1970 में यानी आज से चालीस साल पहले बनाया गया परिभाषा का यह आंकड़ा आज भी चल रहा है और इसी के हिसाब से 42 करोड़ लोग भारत में गरीब हैं। सन 1970 के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में ये एक महीने के लिए 2400 कैलोरी 62 रुपए में और शहरी इलाकों में 71 रुपयों में खरीदी जा सकती है। मुद्रास्फीति के साथ 2000 तक यह आंकड़ा ग्रामीण इलाकों में 328 रुपए और शहरी इलाकों में 454 रुपए पहुंच गया थे। सन 2004 तक 5.5 प्रतिशत मुद्रास्फीति हो चुकी थी और यह आंकड़ा 454 और 540 रुपए मासिक तक पहुंच गया था। हम क्या बात कर रहे हैं?
हम यानी हमारी सरकार यह कह रही है कि अगर आपकी मासिक आमदनी 540 रुपए है और आप शहर में रहते हैं तो आपको गरीब नहीं माना जाएगा। मान लीजिए आप 600 रुपए कमाते हैं और 540 रुपए खाने पर खर्च कर देते हैं तो आप गरीब कैसे हुए?
रोजगार गारंटी योजना का बहुत डंका पीटा जाता है। लाखों करोड़ रुपए का बजट है। इस बजट का बहुत बड़ा हिस्सा पहले अधिकारी खाते थे और अब अधिकारियों की कायरता की वजह से माओवादी खा जाते हैं। लेकिन इस परम कल्याणकारी योजना में गरीबी की सीमा रेखा के नीचे रहने वाले लोगों के लिए साल में सौ दिन का अनिवार्य रोजगार लगभग सत्तर रुपए रोज के हिसाब से सुनिश्चित किया गया है। अगर ईमानदारी से यह रोजगार और मजदूरी मजदूरों तक पहुंचे - और हम काल्पनिक स्थिति की बात कर रहे हैं- तो भी एक व्यक्ति को पूरे साल में सात हजार रुपए की आमदनी पूरा दिन मजदूरी करने के बाद मिलेगी। वातानुकूलित भवनों में जो गरीबी विशेषज्ञ बैठे हैं, उन्हें चुनौती है कि सात हजार रुपए में एक सप्ताह का अपना खर्चा चला कर बता दे। इतना तो उनके ड्राइवर का वेतन होता है। इससे कई गुना ज्यादा बिजली का बिल होता है। इससे कई सौ गुना गरीबी के नाम पर उनके हवाई सर्वेक्षणों पर खर्च किया जाता है। कालाहांडी या छतरपुर के गांवों में जा कर देखिए जहां एक उबले हुए आलू के सहारे पूरा परिवार आधा पेट चावल खाता है और हम कैलोरी की गिनती कर के उन्हें गरीब मानने से इनकार कर देते हैं। यह पाखंड हैं, आपराधिक और नारकीय पाखंड हैं।
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हमारे शहर पर खतरे बढ़ रहे हैं

हरिराम पांडेय
कोलकाता नगरनिगम के चेयरमैन सच्चिदानंद बनर्जी ने माना है कि यदि झमाझम बारिश हो तो यह शहर डूब जायेगा। यही नहीं दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली नगरनिगम को इसलिये डांटा है कि सड़कें इतनी खस्ता हाल हैं कि आने वाली बरसात में केवल पानी ही पानी रहेगा। कुछ साल पहले मुम्बई में बाढ़ की खबर सबने पढ़ी देखी या सुनी होगी जरूर। प्राकृतिक आपदा हो तो अलग बात है। अभी दो दिन पहले कोलकाता पुलिस ने चेताया कि शहर पर आतंकी हमला हो सकता है। पिछले दिनों अखबारों की सुर्खियों में था कि कामन वेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली आतंकियों का निशाना बन सकती है।
कितने खतरे गिनाएं जाएं, पिछले पांच तारीख को बंद के दौरान पूरा शहर असहाय सा पड़ा रहा। ऐसा कभी भी हो सकता है और कोई भी इस तरह की कोशिश कर सकता है।
यानी आप किसी भी शहर में हैं बेशक खतरे में हैं और किसी भी रूप में कहर कभी भी बरपा हो सकता है। शहरों में रहना खतरनाक लगने लगा है। पहले देहातों में 50 तरह के खतरे थे- कुदरत से भी और बुरे लोगों से भी। देहात का आदमी किसी-न-किसी बात से डरा हुआ रहता था। इस डर के खिलाफ जो आंदोलन शुरू हुआ उसी को हम सभ्यता कहते हैं। पहले जिंदगी को असुरक्षित बनाने वाली चीजों को कमजोर किया गया और इस कोशिश में शहरी जिंदगी का जन्म हुआ। शहरी जिंदगी जीने का एक नया अंदाज है। शहर एक खोज है, जो हमें रोजमर्रा के डरों से मुक्ति दिलाता है। यही कारण है कि हजारों बरसों से इंसान का सफर एक ही दिशा में जारी है - गांवों से शहरों की ओर।
कोई भी बड़ा शहर सत्ता का सिंहासन होता है। बाहर का इलाका उसे खुद से अलग समझता है और इसलिए टारगेट की तरह देखने लगता है। यह पहले नहीं होता था। ऐसा कोई शहर दुनिया में नहीं हो सकता, जो अपने लायक हर चीज खुद पैदा करता हो। दरअसल वह जितना बड़ा होता है, उतना ही बाहर के इलाकों पर निर्भर होने लगता है, लेकिन अब हाल यह है कि जितना वह निर्भर हो रहा है, उतना उसके घेरे जाने और मारे जाने के चांस बढ़ रहे हैं। शहर होना शहर का सबसे बड़ा पाप हो गया है। पिछले बरसों से बड़े शहरों में सेल्फ गवर्नमेंट का चलन शुरू हो गया। बाद में सिटी स्टेट का भी विचार प्रस्तुत हुआ। विचार यह था कि बड़े शहरों की खास जरूरतों के हिसाब से उन्हें अलग यूनिट माना जाना चाहिए। यह आइडिया आकर्षक था, लेकिन शहरों की बिगड़ती स्थिति और वहां लगातार बढ़ रहे खतरों को देख कर लगता है कि कोई भी सिस्टम ठीक नहीं है।
आप कहेंगे कि यहां बेकार इन खतरों को तूल दिया जा रहा है। लेकिन इतना तो सभी मानेंगे कि देश भर में विकास का पैसा भ्रष्टाचार की जमीन में खाद पानी का काम कर रहा है इसलिये विकास नहीं हो पा रहा है और इसका सबसे अधिक शिकार बड़े शहर ही हो रहे हैं। जायज-नाजायज हकों के लिए बेचैनी हर दिन बढ़ रही है। उसी रफ्तार से हिंसक तरीकों का इस्तेमाल भी, जिसे रोकने की कोई दिलचस्पी सरकारों की तरफ से नजर नहीं आती। लोकतंत्र में संख्याबल ने ब्लैकमेलिंग की शक्ल ले ली है और इसके सबसे आसान तरीके वही हैं, जो शहरी जिंदगी को तकलीफ पहुंचाते हैं। इसलिये शहर चाहे हमारा हो या आपका या किसी और का वहां खतरे बढ़ रहे हैं। ... और बाशिंदे असहाय। इसलिये यात्रा की दिशा बदलनी होगी- शहरों से गांवों की ओर।
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Tuesday, July 13, 2010
विदेश सचिव और दलाई लामा की मुलाकात
हरिराम पांडेय
भारत की विदेश सचिव निरुपमा राव ने शनिवार (१०-७-२०१०) को परम पावन दलाई लामा से उनके आवास में जाकर मुलाकात की। परम पावन दलाई लामा हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहते हैं। यहीं इनकी सरकार का मुख्यालय भी है। धर्मशाला में ही उनके मंत्रिमंडल के सदस्य भी रहते हैं। जिस समय निरुपमा राव ने परम पावन से मुलाकात की उस समय उनके प्रधानमंत्री सामधोंग रिनपोछे भी उपस्थित थे उनके अलावा परम पावन के सलाहकार भी साथ थे । अतएव यह मुलाकात गोपनीय नहीं थी। जैसा कि अखबारों में कहा गया है कि इस दौरान भारत में रह रहे तिब्बतियों के कल्याण और दलाई लामा की सुरक्षा पर चर्चा हुई। हिमाचल प्रदेश सरकार के प्रवक्ता ने भी 9 जुलाई को रिपोर्टरों को बताया था कि 10 और 11 जुलाई को विदेश सचिव धर्मशाला आयेंगी पर उन्होंने यह नहीं कहा था कि वे परम पावन दलाई लामा से मिलेंगी भी। वैसे अपने देश में यह रिवाज रहा है कि जो भी विदेश सचिव होगा वह परम पावन दलाई लामा से मुलाकात करेगा। निरुपमा राव ने जब इस पद पर कार्य भार संभाला तब से दो तीन बार वहां जाने की योजना बनायी गयी और हर बार किसी न किसी कारण से मुल्तवी हो गयी। आखिरी बार वे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के प्रधानमंत्री के विशेष दूत के रूप में 3 जुलाई को बीजिंग जाने से पहले जाना चाहती थीं पर नहीं जा सकीं। यहां यह इसलिये बताया जा रहा है कि यह मुलाकात असामान्य नहीं थी और ना ही गोपनीय, लेकिन तब भी कूटनीतिक हलकों में अटकलों का बाजार गरम है क्योंकि गिलगित- बाल्टिस्तान इलाके में सड़क बनाने में चीन पाकिस्तान की मदद कर रहा है। इस सड़क से भारतीय सुरक्षा को भारी खतरा है। भारत की इसी चिंता से चीन की सरकार को अवगत कराने के लिये शिवशंकर मेनन प्रधानमंत्री का विशेष संदेश लेकर बीजिंग गये थे। हालांकि बीजिंग ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। अब यह समझा जा रहा है कि इसी मसले को लेकर निरुपमा राव ने परम पावन दलाई लामा से भेंट की है।
गिलगित बाल्टिस्तान दरअसल कश्मीर का ही हिस्सा है और 1948 से पाकिस्तान ने उस पर कब्जा किया हुआ है। चीनी इलाके से गुजरने वाले काराकोरम हाईवे के निर्माण में पाकिस्तान की चीन ने मदद की थी और उसी के आभारस्वरूप पाकिस्तान ने गिलगित - बाल्टिस्तान का कुछ हिस्सा 1960 में चीन को दे दिया। अब भी काराकोरम हाई वे की मरम्मत में चीन पाकिस्तान को मदद दे रहा है। अब जब भारत ने इसपर एतराज जताया तो चीन नें यह कहकर टाल दिया कि इससे पाकिस्तान- सिंकियांग में तिजारत में मदद मिलेगी, लेकिन भारत के लिये यह गंभीर खतरे का बायस है। इसके माध्यम से पाकिस्तान जम्मू कश्मीर में आनन फानन में फौजी हथियार और रसद ला सकता है। यही नहीं फौजी हमले के दौरान बड़ी तेजी से चीन अपनी सेना सिकियांग में भेज सकता है। यह भी भारत के खिलाफ पाकिस्तान की मदद हुई। यही नहीं इससे लद्दाख और करगिल में सेना की संख्या में वृद्धि से मामला और जटिल हो जायेगा। यहां यह भी ध्यान देने लायक तथ्य है कि चीन लद्दाख में अर्से से अपना कब्जा चाहता है।
हालांकि विदेश सचिव का परम पावन दलाई लामा से मुलाकात में ऐसा कुछ भी नहीं था पर भारत सरकार को चाहिये कि वह अपनी जायज चिंता को हर मंच पर पूरी ताकत से उठाये। हमारे नीति निर्माताओं को भी चाहिये कि वे इस बात पर विचार करें कि चीन की इस कार्रवाई का कैसे मुकाबला किया जाय। इसमें दलाई लामा से मुलाकातों में वृद्धि और म्यूनिख में 'उइगर कांग्रेस में शिरकत भी एक तरीका हो सकता है।
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Friday, July 9, 2010
तेल मूल्य नियंत्रणहीन करना उचित नहीं
हरिराम पांडेय
अजीब विडम्बना है। कांग्रेस की गठबंधन की सरकार ने तेल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का फैसला जिस मनहूस दिन (26 जून) को लिया उस दिन आपातकाल की 35 वीं वर्षगांठ थी। आपातकाल के वे काले दिन अपने आपमें जितने दुःखदायी थे उससे कहीं ज्यादा तेल की कीमतों पर से सरकारी लगाम हटाने पर होंगे। अगर आप तेल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने और उसकी घोषणा करने के सरकारी परिक्रम को यदि आप समग्र रूप से देखें तो ठीक वैसा ही लगेगा जैसा इमरजेंसी के दिनों में कुछ नेताओं ने फरेब किया था।
आपातकाल के उन मूर्खतापूर्ण दिनों में सरकार को सेंसरशिप की जरूरत महसूस हुई थी। हाल के ज्यादा परिष्कृत समय में चौकस होकर उठाए गए कदम ज्यादा फायदेमंद साबित होते हैं। इसी दिन के अखबार में मौसम विभाग के हवाले से यह खबर भी थी कि इस बार मानसून की बहुत अच्छी बारिश के आसार हैं और 1 जुलाई तक मौसम तरबतर हो जाएगा और सितंबर तक सामान्य से ज्यादा बारिश होगी। मौसम विभाग के हवाले से एक और खबर आती है कि क्षमा करें, हमारे पूर्वानुमानों में चूक हो गई थी। मानसून कमजोर पड़ गया है। उत्तरी भारत के खेतिहर इलाकों की पट्टी, जो बिहार तक चली गई है, अब भी रेगिस्तान की तरह खुश्क थी। यदि 4 जुलाई तक मानसून नहीं आया तो फसलों को नुकसान होना शुरू हो जाएगा। जहां तक खबरों का सवाल है देश के कई हिस्सों में आज बाढ़ आयी हुई है और पानी भी सब जगह है। सवाल यह नहीं है कि मौसम विभाग से चूक हुई। सवाल है कि 25 जून को मौसम विभाग ने जान-बूझ कर झूठ बोला या उससे झूठ बोलवाया गया। क्योंकि 26 जून को जब तेल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त किया जायेगा और उनकी कीमतों उछाल आयेगा तो सरकार के मंत्री, अफसर मीडिया में यह कह सकें कि बारिश होने से अच्छी फसल होगी और उससे तेल की कीमतों में वृद्धि के प्रभाव का आघात बेअसर हो जायेगा।
यही नहीं सरकार द्वारा तेलों के मूल्य को नियंत्रण मुक्त करने के फैसले से सरकारी तेल कम्पनियों के मुकाबले निजी क्षेत्र की कम्पनियों को ज्यादा लाभ होगा। सरकार ने यह निर्णय करने के पहले यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि तेल कम्पनियां भारी घाटे में हैं। लेकिन इन कम्पनियों ने कभी शिकायत नहीं की कि वे घाटे में चल रहीं हैं, उन्होंने हरदम कहा कि 'अंडर रिकवरी है। लेकिन यह नहीं बताया कि कहां यह अंडर रिकवरी है। अतएव पेट्रोल की कीमतें नियंत्रण मुक्त किया जाना उचित नहीं था। यह नौ सरकारी तेल कम्पनियों को लाभ पहुंचाने के इरादे से नहीं किया गया बल्कि निजी तेल कम्पनियों को लाभ कमाने के लिये मैदान खाली करने की गरज से किया गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में इजाफे के बावजूद भारतीय कम्पनियों ने टैक्स चुकाने बाद भी लाभ कमाया। यानी 25 जून तक कम्पनियां मुनाफे में चल रहीं थी फिर अचानक वह कौन सी आर्थिक जरूरत आ पड़ी कि 26 जून को तेल की कीमतों को नियंत्रणमुक्त करना पड़ गया। तेल कम्पनियों ने इस साल 805 करोड़ रुपये टैक्स चुकाने के बाद 2228.28 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। अब सरकार की इस उदारता के मायने आप खुद समझ लें।
Posted by pandeyhariram at 5:28 AM 0 comments