यहां जो लिखा जा रहा है वह किसी टी वी सीरियल को देख कर या फेसबुक के संदेशों को पढ़कर या यह सोच कर कि देश क्या चाहता है या क्या सोचता है, यहां लिखा जा रहा है। यहां वही लिखा जा रहा है जो महसूस किया गया। सबसे पहली बात कि मेमन को बचाने वाली टोली चाहे जितनी भी ताकतवर हो वह देश के विचार से ताकत वर नहीं हो सकती। मेमन को माफ करने वाले बेशक माफ कर दें। लेकिन उन्हें याद रखना होगा कि मेमन की करतूतों से देश खून से नहा उठा था और उसे बचाने वालों की दलीलों से देश का खून खौल रहा है। विगत दो दिनाें में हावड़ा और कोलकाता के चार बार दौरे हुए। इन दो दिनों दोनों महानगरों में न कोई उपद्रवी भीड़ दिखी और ना समाज अल्पसंख्यक तथा बहुसंख्यक में विभाजित दिखा। सबसे ज्यादा चर्चा कलाम साहब की मौत से होने वाली कमी पर हुई, याकूब की फांसी पर चर्चा तो थी पर बहुत मुख्तसर। लेकिन मीडिया की चर्चा को देख- सुन कर लगता है कि ऊपर वाली बात गलत है। सारा देश याकूब के लिये चिंतित है। यहां चिंतित होने वालों से फकत एक सवाल है कि किसके लिए है इतनी चिंता, इतनी मशक्कत, इतनी बेचैनी ? उस आतंकी के लिए, जिसने अपने परिवार से रेकी करवाई थी कि बम वहां फटे, जहां स्कूल के बच्चों की बस गुजरती हो। सेंचुरी बाजार की अकेली साजिश को ही लें तो सुनते ही कांप जाएंगे कि वहां कई दिनों तक याकूब के आतंकियों ने यह पड़ताल की थी कि आरडीएक्स कहां भरें। ताकि ज्यादा से ज्यादा निर्दोष लोगों के टुकड़े-टुकड़े हो जाएं। मैनहोल में भरे थे विस्फोटक। अकेले वहीं कुल 113 बच्चे, महिलाएं और बीमार मारे गए थे। मैनहोल के ऊपर से बस के गुजरते ही फटे थे बम। उन चीखों-चीत्कारों को अनसुना कर, हम रात-रातभर कौन सी दया दिखा रहे हैं? 22 साल में हमें कुछ नहीं बताया गया। अब अचानक प्रक्रिया की खामियां गिनाई जा रही हैं। इस बीच एक सनसनीखेज खुलासा किया गया कि याकूब को गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि उसे लाया गया था। उससे पाकिस्तान के विरुद्ध सबूत मिल रहे थे। इसलिए वह सजा का पात्र नहीं हो सकता। तो किसे ऐसा हक दिया गया? किसने दिया? कौन ऐसा तय करने लगेगा कि सबूत दो तो 257 हत्याएं भी माफ? याकूब ने तो उसी धरती को तबाह करने का गुनाह किया था जिस पर वह पनपा था। उसके धमाकों ने महज ढाई सौ लोगों की जान ही नहीं ली थी बल्कि हजारों हंसते-खेलते परिवार तबाह कर दिए थे। उसने इससे भी बड़ा गुनाह यह किया कि अपने कुकृत्य को धर्म का रंग चढ़ा कर उसने गरीब नौजवानों को विस्फोटों को अंजाम देने के लिए भड़काया और खुद परिवार सहित दुबई होते हुए पाकिस्तान भाग गया। अफसोस, ऐसे कायर और हत्यारे की वकालत में बकायदा एक जमात खड़ी है जिसमें वे तमाम चेहरे शामिल हैं जिन्हें मीडिया की रोशनी में खुद को चमकाने की आदत पड़ी हुई है। याकूब को फांसी देना इतना संवेदनशील मुद्दा क्यों बन गया, इस समस्या पर बहुत सोच विचार करने की जरूरत है । हम मीडिया में कुछ हिन्दू राजनीतिज्ञों और धार्मिक नेताओं को आतंकवाद का इस्लाम से रिश्ता जोड़ते हुए देखते और सुनते हैं, लेकिन इस देश का आम नागरिक उनकी बातों में नहीं आता, क्योंकि सभी जानते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। वास्तव में किसी को न तो याकूब की चिन्ता है और न ही मुसलमानों की, सबको चिन्ता है मुस्लिम वोट बैंक की । मुस्लिम वोट बैंक के कारण ही ये नेता ऊटपटांग हरकतें कर रहे हैं । ये चाहते हैं कि मुसलमान अपना भला- बुरा सोचने के बजाये इनके पीछे चलते रहें, जैसा कि अब तक होता आया है । एम.आई.एम के नेता औवेसी ने सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं की नींद उड़ा रखी है, उन्होंने अब तक मुस्लिम वोट बैंक के सहारे अपनी रोजी- रोटी चलाने वाले इन लोगों से इनका धन्धा छीन लेने की पूरी तैयारी कर ली है, इसी कारण ये लोग औवेसी के बढ़ते प्रभाव से घबराये हुए हैं। औवेशी ने अपने कट्टरवादी और भड़काऊ भाषणों के सहारे इनके वोटबैंक में सेंध लगानी शुरू कर दी है । कट्टरवाद के बारे में एक सत्य यह भी है कि ये कभी एकतरफा नहीं होता । कट्टरवाद की प्रतिक्रिया कट्टरवाद ही होती है । अगर मुस्लिम कट्टरवाद बढ़ता है तो इसके जवाब में हिन्दू कट्टरवाद भी बढ़ेगा । हो सकता है कि फांसी पर तर्क कुछ सही हों लेकिन इस जगह वे तर्क बेवजह हैं , क्योकि उन तर्कों पर ध्यान देने का मतलब है कि एक मौन आबादी को नजरअंदाज करना। राजनीतिज्ञों के तर्क चाहे जो हों लेकिन इस देश की अधिकांश जनता जो चाहती है वही हुआ। अंग्रेजी मीडिया की अदालत में पहुंच ने पूरी संस्था को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है और मजे की बात है कि वे सवाल कुदरती न्याय के दर्शन पर नहीं बल्कि बौद्धिक लफ्फाजी पर आधारित हैं।
Sunday, August 2, 2015
याकूब के पक्ष में लामबंदी क्यों?
याकूब के पक्ष में लामबंदी क्यों?
यहां जो लिखा जा रहा है वह किसी टी वी सीरियल को देख कर या फेसबुक के संदेशों को पढ़कर या यह सोच कर कि देश क्या चाहता है या क्या सोचता है, यहां लिखा जा रहा है। यहां वही लिखा जा रहा है जो महसूस किया गया। सबसे पहली बात कि मेमन को बचाने वाली टोली चाहे जितनी भी ताकतवर हो वह देश के विचार से ताकत वर नहीं हो सकती। मेमन को माफ करने वाले बेशक माफ कर दें। लेकिन उन्हें याद रखना होगा कि मेमन की करतूतों से देश खून से नहा उठा था और उसे बचाने वालों की दलीलों से देश का खून खौल रहा है। विगत दो दिनाें में हावड़ा और कोलकाता के चार बार दौरे हुए। इन दो दिनों दोनों महानगरों में न कोई उपद्रवी भीड़ दिखी और ना समाज अल्पसंख्यक तथा बहुसंख्यक में विभाजित दिखा। सबसे ज्यादा चर्चा कलाम साहब की मौत से होने वाली कमी पर हुई, याकूब की फांसी पर चर्चा तो थी पर बहुत मुख्तसर। लेकिन मीडिया की चर्चा को देख- सुन कर लगता है कि ऊपर वाली बात गलत है। सारा देश याकूब के लिये चिंतित है। यहां चिंतित होने वालों से फकत एक सवाल है कि किसके लिए है इतनी चिंता, इतनी मशक्कत, इतनी बेचैनी ? उस आतंकी के लिए, जिसने अपने परिवार से रेकी करवाई थी कि बम वहां फटे, जहां स्कूल के बच्चों की बस गुजरती हो। सेंचुरी बाजार की अकेली साजिश को ही लें तो सुनते ही कांप जाएंगे कि वहां कई दिनों तक याकूब के आतंकियों ने यह पड़ताल की थी कि आरडीएक्स कहां भरें। ताकि ज्यादा से ज्यादा निर्दोष लोगों के टुकड़े-टुकड़े हो जाएं। मैनहोल में भरे थे विस्फोटक। अकेले वहीं कुल 113 बच्चे, महिलाएं और बीमार मारे गए थे। मैनहोल के ऊपर से बस के गुजरते ही फटे थे बम। उन चीखों-चीत्कारों को अनसुना कर, हम रात-रातभर कौन सी दया दिखा रहे हैं? 22 साल में हमें कुछ नहीं बताया गया। अब अचानक प्रक्रिया की खामियां गिनाई जा रही हैं। इस बीच एक सनसनीखेज खुलासा किया गया कि याकूब को गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि उसे लाया गया था। उससे पाकिस्तान के विरुद्ध सबूत मिल रहे थे। इसलिए वह सजा का पात्र नहीं हो सकता। तो किसे ऐसा हक दिया गया? किसने दिया? कौन ऐसा तय करने लगेगा कि सबूत दो तो 257 हत्याएं भी माफ? याकूब ने तो उसी धरती को तबाह करने का गुनाह किया था जिस पर वह पनपा था। उसके धमाकों ने महज ढाई सौ लोगों की जान ही नहीं ली थी बल्कि हजारों हंसते-खेलते परिवार तबाह कर दिए थे। उसने इससे भी बड़ा गुनाह यह किया कि अपने कुकृत्य को धर्म का रंग चढ़ा कर उसने गरीब नौजवानों को विस्फोटों को अंजाम देने के लिए भड़काया और खुद परिवार सहित दुबई होते हुए पाकिस्तान भाग गया। अफसोस, ऐसे कायर और हत्यारे की वकालत में बकायदा एक जमात खड़ी है जिसमें वे तमाम चेहरे शामिल हैं जिन्हें मीडिया की रोशनी में खुद को चमकाने की आदत पड़ी हुई है। याकूब को फांसी देना इतना संवेदनशील मुद्दा क्यों बन गया, इस समस्या पर बहुत सोच विचार करने की जरूरत है । हम मीडिया में कुछ हिन्दू राजनीतिज्ञों और धार्मिक नेताओं को आतंकवाद का इस्लाम से रिश्ता जोड़ते हुए देखते और सुनते हैं, लेकिन इस देश का आम नागरिक उनकी बातों में नहीं आता, क्योंकि सभी जानते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। वास्तव में किसी को न तो याकूब की चिन्ता है और न ही मुसलमानों की, सबको चिन्ता है मुस्लिम वोट बैंक की । मुस्लिम वोट बैंक के कारण ही ये नेता ऊटपटांग हरकतें कर रहे हैं । ये चाहते हैं कि मुसलमान अपना भला- बुरा सोचने के बजाये इनके पीछे चलते रहें, जैसा कि अब तक होता आया है । एम.आई.एम के नेता औवेसी ने सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं की नींद उड़ा रखी है, उन्होंने अब तक मुस्लिम वोट बैंक के सहारे अपनी रोजी- रोटी चलाने वाले इन लोगों से इनका धन्धा छीन लेने की पूरी तैयारी कर ली है, इसी कारण ये लोग औवेसी के बढ़ते प्रभाव से घबराये हुए हैं। औवेशी ने अपने कट्टरवादी और भड़काऊ भाषणों के सहारे इनके वोटबैंक में सेंध लगानी शुरू कर दी है । कट्टरवाद के बारे में एक सत्य यह भी है कि ये कभी एकतरफा नहीं होता । कट्टरवाद की प्रतिक्रिया कट्टरवाद ही होती है । अगर मुस्लिम कट्टरवाद बढ़ता है तो इसके जवाब में हिन्दू कट्टरवाद भी बढ़ेगा । हो सकता है कि फांसी पर तर्क कुछ सही हों लेकिन इस जगह वे तर्क बेवजह हैं , क्योकि उन तर्कों पर ध्यान देने का मतलब है कि एक मौन आबादी को नजरअंदाज करना। राजनीतिज्ञों के तर्क चाहे जो हों लेकिन इस देश की अधिकांश जनता जो चाहती है वही हुआ। अंग्रेजी मीडिया की अदालत में पहुंच ने पूरी संस्था को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है और मजे की बात है कि वे सवाल कुदरती न्याय के दर्शन पर नहीं बल्कि बौद्धिक लफ्फाजी पर आधारित हैं।
यहां जो लिखा जा रहा है वह किसी टी वी सीरियल को देख कर या फेसबुक के संदेशों को पढ़कर या यह सोच कर कि देश क्या चाहता है या क्या सोचता है, यहां लिखा जा रहा है। यहां वही लिखा जा रहा है जो महसूस किया गया। सबसे पहली बात कि मेमन को बचाने वाली टोली चाहे जितनी भी ताकतवर हो वह देश के विचार से ताकत वर नहीं हो सकती। मेमन को माफ करने वाले बेशक माफ कर दें। लेकिन उन्हें याद रखना होगा कि मेमन की करतूतों से देश खून से नहा उठा था और उसे बचाने वालों की दलीलों से देश का खून खौल रहा है। विगत दो दिनाें में हावड़ा और कोलकाता के चार बार दौरे हुए। इन दो दिनों दोनों महानगरों में न कोई उपद्रवी भीड़ दिखी और ना समाज अल्पसंख्यक तथा बहुसंख्यक में विभाजित दिखा। सबसे ज्यादा चर्चा कलाम साहब की मौत से होने वाली कमी पर हुई, याकूब की फांसी पर चर्चा तो थी पर बहुत मुख्तसर। लेकिन मीडिया की चर्चा को देख- सुन कर लगता है कि ऊपर वाली बात गलत है। सारा देश याकूब के लिये चिंतित है। यहां चिंतित होने वालों से फकत एक सवाल है कि किसके लिए है इतनी चिंता, इतनी मशक्कत, इतनी बेचैनी ? उस आतंकी के लिए, जिसने अपने परिवार से रेकी करवाई थी कि बम वहां फटे, जहां स्कूल के बच्चों की बस गुजरती हो। सेंचुरी बाजार की अकेली साजिश को ही लें तो सुनते ही कांप जाएंगे कि वहां कई दिनों तक याकूब के आतंकियों ने यह पड़ताल की थी कि आरडीएक्स कहां भरें। ताकि ज्यादा से ज्यादा निर्दोष लोगों के टुकड़े-टुकड़े हो जाएं। मैनहोल में भरे थे विस्फोटक। अकेले वहीं कुल 113 बच्चे, महिलाएं और बीमार मारे गए थे। मैनहोल के ऊपर से बस के गुजरते ही फटे थे बम। उन चीखों-चीत्कारों को अनसुना कर, हम रात-रातभर कौन सी दया दिखा रहे हैं? 22 साल में हमें कुछ नहीं बताया गया। अब अचानक प्रक्रिया की खामियां गिनाई जा रही हैं। इस बीच एक सनसनीखेज खुलासा किया गया कि याकूब को गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि उसे लाया गया था। उससे पाकिस्तान के विरुद्ध सबूत मिल रहे थे। इसलिए वह सजा का पात्र नहीं हो सकता। तो किसे ऐसा हक दिया गया? किसने दिया? कौन ऐसा तय करने लगेगा कि सबूत दो तो 257 हत्याएं भी माफ? याकूब ने तो उसी धरती को तबाह करने का गुनाह किया था जिस पर वह पनपा था। उसके धमाकों ने महज ढाई सौ लोगों की जान ही नहीं ली थी बल्कि हजारों हंसते-खेलते परिवार तबाह कर दिए थे। उसने इससे भी बड़ा गुनाह यह किया कि अपने कुकृत्य को धर्म का रंग चढ़ा कर उसने गरीब नौजवानों को विस्फोटों को अंजाम देने के लिए भड़काया और खुद परिवार सहित दुबई होते हुए पाकिस्तान भाग गया। अफसोस, ऐसे कायर और हत्यारे की वकालत में बकायदा एक जमात खड़ी है जिसमें वे तमाम चेहरे शामिल हैं जिन्हें मीडिया की रोशनी में खुद को चमकाने की आदत पड़ी हुई है। याकूब को फांसी देना इतना संवेदनशील मुद्दा क्यों बन गया, इस समस्या पर बहुत सोच विचार करने की जरूरत है । हम मीडिया में कुछ हिन्दू राजनीतिज्ञों और धार्मिक नेताओं को आतंकवाद का इस्लाम से रिश्ता जोड़ते हुए देखते और सुनते हैं, लेकिन इस देश का आम नागरिक उनकी बातों में नहीं आता, क्योंकि सभी जानते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। वास्तव में किसी को न तो याकूब की चिन्ता है और न ही मुसलमानों की, सबको चिन्ता है मुस्लिम वोट बैंक की । मुस्लिम वोट बैंक के कारण ही ये नेता ऊटपटांग हरकतें कर रहे हैं । ये चाहते हैं कि मुसलमान अपना भला- बुरा सोचने के बजाये इनके पीछे चलते रहें, जैसा कि अब तक होता आया है । एम.आई.एम के नेता औवेसी ने सभी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं की नींद उड़ा रखी है, उन्होंने अब तक मुस्लिम वोट बैंक के सहारे अपनी रोजी- रोटी चलाने वाले इन लोगों से इनका धन्धा छीन लेने की पूरी तैयारी कर ली है, इसी कारण ये लोग औवेसी के बढ़ते प्रभाव से घबराये हुए हैं। औवेशी ने अपने कट्टरवादी और भड़काऊ भाषणों के सहारे इनके वोटबैंक में सेंध लगानी शुरू कर दी है । कट्टरवाद के बारे में एक सत्य यह भी है कि ये कभी एकतरफा नहीं होता । कट्टरवाद की प्रतिक्रिया कट्टरवाद ही होती है । अगर मुस्लिम कट्टरवाद बढ़ता है तो इसके जवाब में हिन्दू कट्टरवाद भी बढ़ेगा । हो सकता है कि फांसी पर तर्क कुछ सही हों लेकिन इस जगह वे तर्क बेवजह हैं , क्योकि उन तर्कों पर ध्यान देने का मतलब है कि एक मौन आबादी को नजरअंदाज करना। राजनीतिज्ञों के तर्क चाहे जो हों लेकिन इस देश की अधिकांश जनता जो चाहती है वही हुआ। अंग्रेजी मीडिया की अदालत में पहुंच ने पूरी संस्था को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है और मजे की बात है कि वे सवाल कुदरती न्याय के दर्शन पर नहीं बल्कि बौद्धिक लफ्फाजी पर आधारित हैं।
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जमीं खा गयी आसमां कैसे- कैसे
जमीं खा गयी आसमां कैसे- कैसे
ज़िन्दगी क्या है, अनासिर में ज़हूर-ए-तरतीब
मौत क्या है, इन्हीं अजज़ा का परीशां होना
आज (30 जुलाई 2015 ) पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम को सुपुर्द-ए - खाक कर दिया गया। उनके निधन पर देश भर में शोक की लहर दौड़ गयी। शोक इसलिये नहीं कि वे हमारे राष्ट्रपति थे कभी बल्कि इसलिये कि वे हमारे (राष्ट्र ) नायक हुआ करते थे। सोमवार की सुबह शिलांग जाने की खबर सुनी और शाम को उनके सिधार जाने का समाचार मिला। यकीन नहीं हुआ,
इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी
यूं मौत को सीने से लगाता नहीं कोई
लेकिन मौत तो मौत है। इस मौत पर कलाम साहब की एक बात याद आती है कि खुशहाल, संपन्न और शांतिप्रिय समाज के निर्माण के लिए आवश्यकता है युद्ध से मुक्ति की, उस युद्ध से जो हमारे अपने भीतर चलता है और उस युद्ध से भी जिसका सामना हम अपने अस्तित्व से बाहर करते हैं।
न रोटी की क़िल्लत न महलों के सपने,
हुए फिर भी सूदो-ज़ियां कैसे-कैसे।
तमिल कवि अवैयार ने अपनी एक कविता में कहा है कि
‘दुर्लभ है मानव प्राणी के रूप में जन्म लेना, उससे भी दुर्लभ है बिना किसी शारीरिक दोष के जन्म लेना; यदि ऐसा संभव हो भी जाए तो दुर्लभ है ज्ञान और शिक्षा से समृद्ध हो पाना; यदि कोई हासिल भी कर ले ज्ञान और शिक्षा तो दुर्लभ है मानव की सेवा हेतु स्वयं को प्रस्तुत कर पाना और स्वयं की उच्चतर अवस्था में मन लगाना। कोई यदि ऐसा निस्पृह दिव्य जीवन जी लेता है तो ऐसी दिव्य आत्मा के आगमन पर स्वागत में स्वर्ग-द्वार भी खुल जाता है।’ मानव ही ईश्वर की सबसे महत्वपूर्ण रचना है। खुशहाल, संपन्न और शांतिप्रिय समाज के निर्माण के लिए आवश्यकता है युद्ध से मुक्ति की, उस युद्ध से जो हमारे अपने भीतर चलता है और उस युद्ध से भी जिसका सामना हम अपने अस्तित्व से बाहर करते हैं। इन सबसे बढ़कर यह कि इंसान के दिल में औरों को कुछ देने और उन्हें समर्थ बनाने की ख्वाहिश हो। कलाम साहब ने अपनी पुस्तक ‘अदम्य साहस ’ में लिखा है कि ‘दूसरों को कुछ देने की नैतिकता स्वयं से ऐसे सवाल करने से विकसित होती है कि हमारी शिक्षा से दूसरों को किस तरह लाभ मिल सकता है। ऐसे प्रश्न जब उठने लगते हैं तो दिल में परोपकार की भावना बलवती होती है, अर्थात अपने साथ-साथ किस तरह औरों का भला तथा देश का विकास कर सकता हूं? नैतिक विकास को आत्मसात करने हेतु टीम के रूप में काम करने का भाव, निश्छल व्यवहार, सहयोगिता, ठीक ढंग से और ठीक काम करना, कड़ी मेहनत और अपनी निजता से बड़े किसी उद्देश्य जैसे मूल्यों पर जोर देना होता है, साथ ही हमारी अपनी सांस्कृतिक संरचना और मूल्य-पद्धति को दिमाग में रखना होता है। ’
लेकिन कलाम साहब ने जो नहीं लिखा वह है कि उनके खुद के भीतर का जज्बा तथा औरों को कुछ देने और उन्हें समर्थ बनाने की ख्वाहिश। दूसरों को कुछ देने की नैतिकता स्वयं से ऐसे सवाल करने से विकसित होती है कि हमारी शिक्षा से दूसरों को किस तरह लाभ मिल सकता है। उनकी शिक्षा की ही देन थी कि एक बार वे राजकोट में स्वामी नारायण मंदिर गये थे, वहां के प्रधान पुजारी के आमंत्रण पर। उनके साथ राजकोट के बिशप फादर रेवरेंड ग्रेगरी और वाईएस राजन भी थे। सबने भगवान स्वामीनारायण के दर्शन किये और तिलक लगाये। यह घटना हमारे देश में विभिन्न धर्मों के बीच संपर्क की शक्ति को दर्शाती है और एक अनुपम आध्यात्मिक अनुभूति से भर देती है। प्रत्येक धर्म के दो पक्ष होते हैं- धार्मिक उपदेश और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि। दया और प्रेम से प्रेरित आध्यात्मिक क्रियाकलाप को एक समन्वित लक्ष्य के बतौर परस्पर मिला दिया जाना चाहिए। इस धरती पर हर एक इंसान को सम्मान के साथ जीने और कुछ विशेष करने का हौसला रखने का हक है। यह स्पष्ट है कि इंसान की जिंदगी युद्धों से जुड़ी है। पिछली सदी के दौरान तीन तरह के युद्धों से हमारा सामना हुआ। सन1920 तक एक तरह का युद्ध, 1920 से 1990 तक दूसरी तरह का युद्ध और 1990 के बाद एक और तरह का युद्ध। इनमें से सबसे पहले वाले युद्ध आदमी लड़ते थे। दूसरी तरह का युद्ध मशीनी था। 1990 के बाद तीसरा दौर, भूमंडलीकरण की ओर अभिमुख आर्थिक युद्ध है। प्रौद्योगिकी वर्चस्व के इस दौर में प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण और उसे मुहैया कराने से इनकार आदि के द्वारा वर्चस्वशाली शक्तियां राष्ट्रों का वर्गीकरण ‘विकसित’, ‘विकासशील’ और ‘अविकसित’ के रूप में कर रही हैं। फलत: आज की दुनिया एक अलग तरह के युद्ध का सामना कर रही है । यह युद्ध धार्मिक टकरावों, वैचारिक मतभेदों और आर्थिक-व्यापारिक वर्चस्व का मिलाजुला एक संश्लिष्ट रूप है।
तवारीख़ है कुछ बयाबां नहीं है,
यहाँ दफ़्न हैं कारवां कैसे-कैसे ।
कलाम साहब को श्रद्धांजलि दे रहे लोगों से अपील है कि उनकी वह कविता याद करें जिसमें उन्होंने लिखा है
ओ मानवजाति,
तुम देते रहो, देते रहो;
जब तक कि
मानव-मात्र के सुख-दु:ख के साथ
एकाकार न हो जाओ।
तुम्हारे अंदर उत्पन्न होगा,
परम आनंद
कलाम का जाना एक इतिहास का जमीन में दफ्न हो जाना है। एक आसमान को जमीन का निगल जाना है।
ज़माने ने मारे जवां कैसे-कैसे ।
ज़मीं खा गई आसमां कैसे-कैसे ।।'
लेकिन तब भी हमारी उम्मीदें कायम हैं कि उन्होंने जो सिखाया वह सीख हमें राह दिखायेगी जरूर। बस अंत में यही कहेंगे
आज भी शायद कोई फूलों का तोहफा भेज दे,
तितलियां मंडरा रहीं हैं कांच के गुलदान पर ।
ज़िन्दगी क्या है, अनासिर में ज़हूर-ए-तरतीब
मौत क्या है, इन्हीं अजज़ा का परीशां होना
आज (30 जुलाई 2015 ) पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम को सुपुर्द-ए - खाक कर दिया गया। उनके निधन पर देश भर में शोक की लहर दौड़ गयी। शोक इसलिये नहीं कि वे हमारे राष्ट्रपति थे कभी बल्कि इसलिये कि वे हमारे (राष्ट्र ) नायक हुआ करते थे। सोमवार की सुबह शिलांग जाने की खबर सुनी और शाम को उनके सिधार जाने का समाचार मिला। यकीन नहीं हुआ,
इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी
यूं मौत को सीने से लगाता नहीं कोई
लेकिन मौत तो मौत है। इस मौत पर कलाम साहब की एक बात याद आती है कि खुशहाल, संपन्न और शांतिप्रिय समाज के निर्माण के लिए आवश्यकता है युद्ध से मुक्ति की, उस युद्ध से जो हमारे अपने भीतर चलता है और उस युद्ध से भी जिसका सामना हम अपने अस्तित्व से बाहर करते हैं।
न रोटी की क़िल्लत न महलों के सपने,
हुए फिर भी सूदो-ज़ियां कैसे-कैसे।
तमिल कवि अवैयार ने अपनी एक कविता में कहा है कि
‘दुर्लभ है मानव प्राणी के रूप में जन्म लेना, उससे भी दुर्लभ है बिना किसी शारीरिक दोष के जन्म लेना; यदि ऐसा संभव हो भी जाए तो दुर्लभ है ज्ञान और शिक्षा से समृद्ध हो पाना; यदि कोई हासिल भी कर ले ज्ञान और शिक्षा तो दुर्लभ है मानव की सेवा हेतु स्वयं को प्रस्तुत कर पाना और स्वयं की उच्चतर अवस्था में मन लगाना। कोई यदि ऐसा निस्पृह दिव्य जीवन जी लेता है तो ऐसी दिव्य आत्मा के आगमन पर स्वागत में स्वर्ग-द्वार भी खुल जाता है।’ मानव ही ईश्वर की सबसे महत्वपूर्ण रचना है। खुशहाल, संपन्न और शांतिप्रिय समाज के निर्माण के लिए आवश्यकता है युद्ध से मुक्ति की, उस युद्ध से जो हमारे अपने भीतर चलता है और उस युद्ध से भी जिसका सामना हम अपने अस्तित्व से बाहर करते हैं। इन सबसे बढ़कर यह कि इंसान के दिल में औरों को कुछ देने और उन्हें समर्थ बनाने की ख्वाहिश हो। कलाम साहब ने अपनी पुस्तक ‘अदम्य साहस ’ में लिखा है कि ‘दूसरों को कुछ देने की नैतिकता स्वयं से ऐसे सवाल करने से विकसित होती है कि हमारी शिक्षा से दूसरों को किस तरह लाभ मिल सकता है। ऐसे प्रश्न जब उठने लगते हैं तो दिल में परोपकार की भावना बलवती होती है, अर्थात अपने साथ-साथ किस तरह औरों का भला तथा देश का विकास कर सकता हूं? नैतिक विकास को आत्मसात करने हेतु टीम के रूप में काम करने का भाव, निश्छल व्यवहार, सहयोगिता, ठीक ढंग से और ठीक काम करना, कड़ी मेहनत और अपनी निजता से बड़े किसी उद्देश्य जैसे मूल्यों पर जोर देना होता है, साथ ही हमारी अपनी सांस्कृतिक संरचना और मूल्य-पद्धति को दिमाग में रखना होता है। ’
लेकिन कलाम साहब ने जो नहीं लिखा वह है कि उनके खुद के भीतर का जज्बा तथा औरों को कुछ देने और उन्हें समर्थ बनाने की ख्वाहिश। दूसरों को कुछ देने की नैतिकता स्वयं से ऐसे सवाल करने से विकसित होती है कि हमारी शिक्षा से दूसरों को किस तरह लाभ मिल सकता है। उनकी शिक्षा की ही देन थी कि एक बार वे राजकोट में स्वामी नारायण मंदिर गये थे, वहां के प्रधान पुजारी के आमंत्रण पर। उनके साथ राजकोट के बिशप फादर रेवरेंड ग्रेगरी और वाईएस राजन भी थे। सबने भगवान स्वामीनारायण के दर्शन किये और तिलक लगाये। यह घटना हमारे देश में विभिन्न धर्मों के बीच संपर्क की शक्ति को दर्शाती है और एक अनुपम आध्यात्मिक अनुभूति से भर देती है। प्रत्येक धर्म के दो पक्ष होते हैं- धार्मिक उपदेश और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि। दया और प्रेम से प्रेरित आध्यात्मिक क्रियाकलाप को एक समन्वित लक्ष्य के बतौर परस्पर मिला दिया जाना चाहिए। इस धरती पर हर एक इंसान को सम्मान के साथ जीने और कुछ विशेष करने का हौसला रखने का हक है। यह स्पष्ट है कि इंसान की जिंदगी युद्धों से जुड़ी है। पिछली सदी के दौरान तीन तरह के युद्धों से हमारा सामना हुआ। सन1920 तक एक तरह का युद्ध, 1920 से 1990 तक दूसरी तरह का युद्ध और 1990 के बाद एक और तरह का युद्ध। इनमें से सबसे पहले वाले युद्ध आदमी लड़ते थे। दूसरी तरह का युद्ध मशीनी था। 1990 के बाद तीसरा दौर, भूमंडलीकरण की ओर अभिमुख आर्थिक युद्ध है। प्रौद्योगिकी वर्चस्व के इस दौर में प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण और उसे मुहैया कराने से इनकार आदि के द्वारा वर्चस्वशाली शक्तियां राष्ट्रों का वर्गीकरण ‘विकसित’, ‘विकासशील’ और ‘अविकसित’ के रूप में कर रही हैं। फलत: आज की दुनिया एक अलग तरह के युद्ध का सामना कर रही है । यह युद्ध धार्मिक टकरावों, वैचारिक मतभेदों और आर्थिक-व्यापारिक वर्चस्व का मिलाजुला एक संश्लिष्ट रूप है।
तवारीख़ है कुछ बयाबां नहीं है,
यहाँ दफ़्न हैं कारवां कैसे-कैसे ।
कलाम साहब को श्रद्धांजलि दे रहे लोगों से अपील है कि उनकी वह कविता याद करें जिसमें उन्होंने लिखा है
ओ मानवजाति,
तुम देते रहो, देते रहो;
जब तक कि
मानव-मात्र के सुख-दु:ख के साथ
एकाकार न हो जाओ।
तुम्हारे अंदर उत्पन्न होगा,
परम आनंद
कलाम का जाना एक इतिहास का जमीन में दफ्न हो जाना है। एक आसमान को जमीन का निगल जाना है।
ज़माने ने मारे जवां कैसे-कैसे ।
ज़मीं खा गई आसमां कैसे-कैसे ।।'
लेकिन तब भी हमारी उम्मीदें कायम हैं कि उन्होंने जो सिखाया वह सीख हमें राह दिखायेगी जरूर। बस अंत में यही कहेंगे
आज भी शायद कोई फूलों का तोहफा भेज दे,
तितलियां मंडरा रहीं हैं कांच के गुलदान पर ।
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Wednesday, July 29, 2015
चेत जाना जरूरी है
पंजाब के गुरदासपुर में सोमवार को आतंकी हमला हुआ जिसका पंजाब पुलिस ने बड़ी दक्षता और साहस से मुकाबला किया। इसमें पुलिस के सात लोग शहीद हो गये और तीन आतंकी मारे गये। घटनास्थल पर चीन के बने बम पाये गये। वहां बरामद जी पी एस से पता चला कि हमलावर रविवार को ही पाकिस्तान से आये थे। पंजाब में विगत दो दशक में यह पहला हमला है और जम्मू- कश्मीर के बाहर इस तरह के मोर्चे बनाकर पहला फिदायीं हमला है। यहां यह बताना उचित होगा कि यह क्षेत्र जम्मू क्षेत्र के करीब है। इस हमले को लेकर कुछ ज्ञान गुमानी लोगों में दो बातें चल रही हैं। पहली कि यह खालिस्तान की मांग से जुड़ा है और दूसरा यह लाकूब मेमन की फांसी का बदला है। हालांकि इसकी समीक्षा करें तो दोनों जुमले भ्रामक हैं। यह हमला खालिस्तान की मांग से इसलिये जुड़ा नहीं है कि ‘खालिस्तान समर्थक आत्महंता नहीं हैं और इस हमले में जीवन के समाप्त हो जाने तक लड़ते रहने का संकल्प दिखता है। ’ रही बात याकूब मेमन की फांसी के बदले स्वरूप तो यह हमला गुरदासपुर में नहीं होता बल्कि महाराष्ट्र या दिल्ली में होता। यह हमला वहां इसलिये हुआ कि जम्मू- कश्मीर में सीमा पर कड़ी चौकसी होने के कारण फिदायीं आतंकी समूहों को नये मार्ग तलाशने पड़े। उनके पास जीपीएस का पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि वे इस क्षेत्र से अनजान थे। आतंकी अनजान क्षेत्रों में अक्सर अपना टार्गेट जी पी एस से ही खोजते हैं। आईबी ने इस महीने के शुरू में आर्मी स्टेशन्स पर हमले की चेतावनी दी थी। जिन स्टेशन्स को लेकर खासतौर पर चेतावनी दी गई थी उनमें 9 कोर (हिमाचल प्रदेश), 26 इन्फेंट्री डिविजन (जम्मू-कश्मीर) और 29 इन्फेंट्री डिविजन (पठानकोट) शामिल हैं। इन तीनों पर हमले की आशंका इसलिए है क्योंकि ये तीनों ही क्रॉस बॉर्डर आतंकवाद से निपटने में माहिर मानी जाती हैं। घारोट से घुसपैठ की आशंका को तो खास तौर पर आईबी अलर्ट में उल्लेख किया गया था। दीना नगर के करीब कठुआ पुलिस स्टेशन पर इसी साल मार्च में हमला हो चुका है लेकिन इसके बाद भी पंजाब के थानों की सुरक्षा कड़ी नहीं की गई।
जहां तक हमले का चरित्र है उसका अध्ययन करने पर पता चलता है कि यह लश्कर-ए तायबा और जैश-ए-मोहम्मद की कार्रवाई हो सकती है। इन संगठनों के आतंकियों ने इस बार हमले की जगह जम्मू से बदल कर पंजाब कर दी थी। भारी हथियारों और पूरे रसद पानी के साथ आए इन आतंकियों का निशाना इस राजमार्ग से होकर गुजरने वाले अमरनाथ यात्री बनने वाले थे। लेकिन कश्मीर के बलताल में बादल फटने के बाद अमरनाथ यात्रा को तात्कालिक रूप से रोक दिया गया था और यह राजमार्ग आस्थावानों की भीड़ से खाली था। इस ईश्वरीय संयोग ने तीर्थयात्रियों की जान तो बचा ली लेकिन इसकी कीमत देश के सात सपूतों को अपनी जान से चुकानी पड़ी। पठानकोट जम्मू हाईवे कोई ऐसा- वैसा राजमार्ग नहीं है। जम्मू- कश्मीर को भारत की मुख्यधारा से जोड़ने वाली यह इकलौती सड़क है और पाकिस्तान से लगी हमारी सीमा के लगभग समानांतर चलती है। कई जगहों पर सीमा से इसकी दूरी पांच किलोमीटर तक सिमट जाती है। इसलिए पाकिस्तान के आतंकियों के हमले के लिहाज से यह खास संवेदनशील इलाका है। इस साल आतंकियों ने कम से कम तीन बार इस राजमार्ग को निशाना बनाया है जिस पर हमें तत्काल चेतने की जरूरत है। इस राजमार्ग के किनारे सेना के दर्जनों कैंटोनमेंट हैं और अनेक रेलवे स्टेशन इससे जुड़े हैं। ऐसे हमले तड़के उस समय होते हैं जब दुनिया की अलसायी आंखें खुल रही होती हैं और व्यवस्था अमूमन सुस्त रहती है। ऐसी हालत में पाकिस्तान को कोसने से कुछ नहीं होने वाला। अपने बचाव की हर तैयारी हमें खुद रखनी होगी और हर ऐसी कायराना हरकत के मुंहतोड़ जवाब के लिए सतर्क रहना होगा। आतंक पर राजनीति की रोटियां सेंकने वालों पर भी तत्काल लगाम की जरूरत है। पिछले दिनों रूस के उफा शहर में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों में जैसी गर्मजोशी नजर आई थी, उसके लिए नवाज शरीफ का जबर्दस्त विरोध हुआ।
पाकिस्तान के कट्टरपंथी डरे हुए हैं कि कहीं दोनों मुल्कों के रिश्ते सुधरने न लगें। लगता है, यह हमला दोस्ती की किसी भी संभावना को कमजोर करने के लिए ही कराया गया है। खुद पाकिस्तान सरकार भी देश में अपने पांव टिकाए रखने के लिए भारत विरोधी बयानबाजी का सहारा लेती है। अगले महीने दोनों मुल्कों के नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर्स की मीटिंग होने वाली है। मीटिंग में पाकिस्तान 'बलूचिस्तान में भारत की भूमिका' का मुद्दा उठाएगा। एक बात तो तय है कि अभी की स्थितियों में पाकिस्तान पर भरोसा करना बेहद मु्श्किल है। फिर भी बातचीत का रास्ता बंद नहीं होना चाहिये। पाकिस्तान को यह अहसास करा देना जरूरी है कि भारत विरोधी आतंकवाद को पालना व्यर्थ है।
जहां तक हमले का चरित्र है उसका अध्ययन करने पर पता चलता है कि यह लश्कर-ए तायबा और जैश-ए-मोहम्मद की कार्रवाई हो सकती है। इन संगठनों के आतंकियों ने इस बार हमले की जगह जम्मू से बदल कर पंजाब कर दी थी। भारी हथियारों और पूरे रसद पानी के साथ आए इन आतंकियों का निशाना इस राजमार्ग से होकर गुजरने वाले अमरनाथ यात्री बनने वाले थे। लेकिन कश्मीर के बलताल में बादल फटने के बाद अमरनाथ यात्रा को तात्कालिक रूप से रोक दिया गया था और यह राजमार्ग आस्थावानों की भीड़ से खाली था। इस ईश्वरीय संयोग ने तीर्थयात्रियों की जान तो बचा ली लेकिन इसकी कीमत देश के सात सपूतों को अपनी जान से चुकानी पड़ी। पठानकोट जम्मू हाईवे कोई ऐसा- वैसा राजमार्ग नहीं है। जम्मू- कश्मीर को भारत की मुख्यधारा से जोड़ने वाली यह इकलौती सड़क है और पाकिस्तान से लगी हमारी सीमा के लगभग समानांतर चलती है। कई जगहों पर सीमा से इसकी दूरी पांच किलोमीटर तक सिमट जाती है। इसलिए पाकिस्तान के आतंकियों के हमले के लिहाज से यह खास संवेदनशील इलाका है। इस साल आतंकियों ने कम से कम तीन बार इस राजमार्ग को निशाना बनाया है जिस पर हमें तत्काल चेतने की जरूरत है। इस राजमार्ग के किनारे सेना के दर्जनों कैंटोनमेंट हैं और अनेक रेलवे स्टेशन इससे जुड़े हैं। ऐसे हमले तड़के उस समय होते हैं जब दुनिया की अलसायी आंखें खुल रही होती हैं और व्यवस्था अमूमन सुस्त रहती है। ऐसी हालत में पाकिस्तान को कोसने से कुछ नहीं होने वाला। अपने बचाव की हर तैयारी हमें खुद रखनी होगी और हर ऐसी कायराना हरकत के मुंहतोड़ जवाब के लिए सतर्क रहना होगा। आतंक पर राजनीति की रोटियां सेंकने वालों पर भी तत्काल लगाम की जरूरत है। पिछले दिनों रूस के उफा शहर में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों में जैसी गर्मजोशी नजर आई थी, उसके लिए नवाज शरीफ का जबर्दस्त विरोध हुआ।
पाकिस्तान के कट्टरपंथी डरे हुए हैं कि कहीं दोनों मुल्कों के रिश्ते सुधरने न लगें। लगता है, यह हमला दोस्ती की किसी भी संभावना को कमजोर करने के लिए ही कराया गया है। खुद पाकिस्तान सरकार भी देश में अपने पांव टिकाए रखने के लिए भारत विरोधी बयानबाजी का सहारा लेती है। अगले महीने दोनों मुल्कों के नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर्स की मीटिंग होने वाली है। मीटिंग में पाकिस्तान 'बलूचिस्तान में भारत की भूमिका' का मुद्दा उठाएगा। एक बात तो तय है कि अभी की स्थितियों में पाकिस्तान पर भरोसा करना बेहद मु्श्किल है। फिर भी बातचीत का रास्ता बंद नहीं होना चाहिये। पाकिस्तान को यह अहसास करा देना जरूरी है कि भारत विरोधी आतंकवाद को पालना व्यर्थ है।
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Sunday, July 26, 2015
पत्र पत्रिकाओं का साहित्य की भाषा को अवदान
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा 23-24 जुलाई 2015 को वाराणसी में आयोजित राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में ‘समाचार पत्र और साहित्य : बदलते आयाम ’ संगोष्ठी में ब्लागर हरिराम पाण्डेय द्वारा ‘पत्र पत्रिकाओं का साहित्य की भाषा को अवदान’ विषय पर दिया गया व्याख्यान।
पत्र पत्रिकाओं का साहित्य की भाषा को अवदान
- हरिराम पाण्डेय
सम्पादक सन्मार्ग, कोलकाता
यहां स्पष्ट कर दें कि मीडिया का सामान्य अभिप्राय समाचारपत्र, पत्रिकाओं, टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट आदि से लिया जाता है। ये आधुनिक मीडिया के चर्चित और प्रभावशाली रूप हैं, जो सूचनाओं के संग्रहण एवं संप्रेषण का दायित्व बाखूबी निभाते हैं। समाचार पत्र और पत्रिकाएं आज समाज के सभी वर्गों के बीच रुचि से पढ़े जाते हैं । यहां यह बहुत महत्वपूर्ण है कि पत्रकारिता की भाषा कोई वायवीय आ आकाशीय भाषा नहीं है न ही व विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की तरह अलग है । उसका संबंध तो सीधा जनता एवं उसके सरोकारों से है । पत्रकारिता की भाषा जीवन की भाषा से अलग नहीं है, वह जिंदगी के साथ हंसती, खेलती, बतियाती हुई चलने वाली भाषा है । समाचार पत्रों की भाषा न तो सर्वथा और शुद्ध साहित्यिक है न ही आम-फहम । वह दोनों के बीच की एक चीज है जो वस्तुतः लोकव्यवहार से प्रभावित होती है। डेनियल डेफो के अनुसार – ‘यदि कोई मुझसे पूछे कि भाषा का सर्वोत्तम रूप क्या हो, तो मैं कहूँगा कि वह भाषा, जिसे सामान्य वर्ग के भिन्न-भिन्न क्षमता वाले पांच सौ व्यक्ति (मूर्खों एवं पागलों को छोड़कर) अच्छी तरह समझ सकें।’ जहां तक ,साहित्य का शब्दार्थ है, सबका कल्याण, सः हितः, यानी ऐसी युक्ति ऐसा नियोजन, ऐसा माध्यम, ऐसी संप्रेरणा जिसके पीछे किसी एक वर्ग-जाति-धर्म-समाज-समूह-संप्रदाय-देश के बजाय समस्त विश्व-समाज के कल्याण की भावना सन्निहित हो। साहित्यकार के पास भरपूर कल्पनाशीलता और विश्वदृष्टि होती है। अपनी नैतिक चेतना से अभिप्रेत, कल्पनाशीलता के सहयोग से वह श्रेयस् के स्थायित्व एवं उसकी सार्वत्रिक व्याप्ति के लिए शब्दों तथा अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों द्वारा प्राणीमात्र के कल्याण का प्रयोजन रचता रहता है। संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण यानी ‘सर्व भूत हिते रतः’ की सद्कामना ही साहित्यकार का अभीष्ठ होती है। सृजन के आनंदोत्सव के दौरान वह न तो ‘राजपाट की वांछा रखता है, न स्वर्ग, न ही मोक्ष आदि की। वह सच्चे मन से कामना करता है कि प्राणिमात्र के दुःखों और व्याधियों का अंत हो। सभी सुखी हों, सभी निर्भीक होकर मुक्त विचरण करें।
समाचार पत्र जीवन के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यावसायिक, खेलकूद एवं चलचित्र आदि सभी पक्षों की प्रस्तुति करते हैं । इसलिए एक औसत भारतीय की समझ एवं परिवार के समस्त सदस्यों की रुचि के विषय एवं उनकी समझ में आने वाली भाषा का विचार यहाँ निरंतर चलता रहा है । भाषा के सवाल पर अखबार को सदैव अपने पाठकों की बौद्धिक क्षमता और अवधारणा शक्ति के अनुरूप बनने के प्रयास करना होता है । ऐसे अनेक कारणों से उसकी भाषा में व्यापकता, सर्वजन सुबोधता, प्रयोगधर्मिता और लचीलापन होता है, जो उसे एक विशिष्टता प्रदान करता है । भाषा शास्त्रियों ने इस तथ्य की ओर बराबर संकेत किया है कि प्रयोग क्षेत्रों के अनुसार भाषा एक विशिष्ट स्वरूप धारण कर लेती है । इसी प्रकार उसकी शब्दावली एवं भाषायिक समझ का विकास होता चला जाता है । पत्रकारिता की भाषा की यही स्थिति है । हालांकि पत्रकारिता के भाषायी स्वरूप एवं उसके जन सरोकारों को लेकर बराबर बहस चलती रही है पर वह आज तक किसी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंची है। साहित्य की भांति पत्र-पत्रिकाओं को भी समाज का दर्पण कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पत्र-पत्रिकाओं में प्रारंभ से ही साहित्य का एक निश्चित हस्तक्षेप रहा है। प्रारम्भिक दौर के प्राय: अनेक महत्वपूर्ण साहित्यकार या तो पत्र-पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं, या किसी न किसी रूप में पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे हैं। साहित्य की विकास यात्रा को समझने के लिए पत्र-पत्रिकाओं को महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। साहित्य में जहां प्राणिमात्र का अंत: और बाह्य जगत चित्रित होता है, वहीं पत्र-पत्रिकाओं में समाज एवं जीवन का प्रतिबिम्ब अंकित होता है। हिंदी समाज, भाषा और साहित्य की संरचना में पत्र-पत्रिकाओं ने महती भूमिका निभाई है। पत्र-पत्रिकाओं से नवजागरण का कार्य तो होता रहा, इसके साथ साहित्य और भाषा में संशोधन भी होता रहा। विदेशी साहित्य के संपर्क में आए हिन्दी के साहित्यकारों के लेखन पर इस साहित्य का प्रभाव स्वाभाविक रूप से पड़ रहा था। विदेशी साहित्य से प्राप्त ज्ञान को इन पत्र-पत्रिकाओं ने दूर-दूर तक पहुँचाने का कार्य किया, अनेक नवोदित रचनाकार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से ही जाने गए। पत्रिकाओं के माध्यम से सामान्य जन की समस्याओं को भी प्रभावकारी ढंग से जनमानस और शासन के सामने रखा जा सका। इससे समाज में व्यक्ति स्वातंत्र्य की चेतना पैदा हुई । हिंदी साहित्य को 1886-1900 ई. के बीच विशेष दिशा मिली और नवजागरण में तेजी आई। इस समय पत्र-पत्रिकाओं के लेखों और उनकी रचना प्रक्रिया में भी परिवर्तन हुआ, साथ ही साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन में भी वृद्धि हुई। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी पत्रकारिता को एक महत्वपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित किया । उन्होंने लेखों और पुस्तकों में व्याकरण और भाषा की अशुद्धियाँ दिखाकर लेखकों को सावधान किया, जिसके जरिये भाषा में एक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया। सरस्वती पत्रिका में जो लेख छपते थे, उनके विषय विविध होते थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित सरस्वती बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरण का विश्वकोष है। वे विविध विषयों के विद्वानों से हिंदी में लेख लिखवाकर छापते थे। द्विवेदी जी शास्त्र और सर्जना दोनों पर ध्यान देते थे। उन्होंने सरस्वती के माध्यम से साहित्यिक रचनाओं की अशुद्धियों को दूर करने का कार्य किया, जिससे हिंदी साहित्य को संशोधित, प्रचारित और प्रसारित होने का अवसर मिला। अनेक शास्त्रीय रूढिय़ां टूटीं, जिससे साहित्यिक उद्देश्य व्यापक हुआ। इस पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली में राष्ट्रभाषा और राजभाषा बनने की क्षमता प्राप्त हुई। पहली हिंदी कहानी भी सरस्वती पत्रिका में ही प्रकाशित हुई। पत्रिकाओं से भाषा और साहित्य का साथ-साथ विकास हुआ। पत्रिकाओं का मूल लक्षण भावों और विचारों का सटीक एवं व्यापक संप्रेषण है जो मानव हित में हो। पत्र-पत्रिकाओं ने साहित्य की विधाओं के विकास में सहयोग किया है। इनके प्रारंभ के बाद से ही कहानी, उपन्यास, जीवनी, आत्मकथा, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण, गद्यगीत, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, आलोचना, समालोचना, डायरी और निबंध आदि विधाओं को पल्लवित और पुष्पित करने में पत्रिकाएं सदैव अग्रणी रहीं हैं। साहित्य जीवन को प्रतिबिंबित करता है और इसके जरिये समाज का बौद्धिक विकास होता है। साहित्य और पत्रिकाओं का मुख्य लक्ष्य मानव समाज में एकता एवं पारस्परिकता की भावना स्थापित करना है । मानव के भावों विचारों की सरल अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन साहित्य है, जो अपनी विभिन्न विधाओं द्वारा रचनाकार की लेखनी से प्रकाशित होता है।
इसके लिए रचनाकार को उसकी रचनाओं के लिये कच्चा माल आपूर्ति करने की गरज से एक ओर समाचार पत्र और पत्रिकाएं जहां सरकार और सत्ता-केंद्रों यथा धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता आदि की योजनाओं, कार्यक्रमों तथा उपलब्धियों को जनता के बीच ले जाती है। उनकी विशेषताओं, कमजोरियों और खामियों पर समालोचनात्मक विमर्श करता है, वहीं वह जनता की इच्छा-आकांक्षाओं, सपनों, उसकी अंदरूनी हलचलों और विभ्रमों को भी उसके दूसरे वर्गों एवं विभिन्न सत्ता-केंद्रों तक पहुंचाने का कार्य करती है। संवादवहन की इस प्रक्रिया में तथ्यों एवं घटनाओं के प्रस्तुतीकरण की ईमानदारी और निस्पृहता ही उसकी व्यावसायिक नैतिकता को रेखांकित करती है। लोकतांत्रिक समाजों में जनता चूंकि अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से स्वयंशासित होती है, इसलिए उनमें मीडिया का दायित्व और भी बढ़ जाता है। इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब मीडिया की शक्ति एवं लोकमानस पर उसकी पकड़ को पहचानते हुए महान लोगों ने उसका उपयोग लोक-परिवर्तन के अहिंसक, प्रभावशाली और भरोसेमंद हथियार के रूप में किया है। यहीं साहित्य इस परिवर्तन को रेखांकित करते हुये कालजयी रचनाओं को जन्म देता है।
शब्द से भाषा का सृजन होता है। शब्द अपने आप अर्थ नहीं ग्रहण करते , वे सदा एक खास प्रकार के कॉन्सेप्ट से जड़े होती हैं। शब्दों के अर्थ सदा एक बिम्ब तैयार करते हैं और वही बिम्ब अर्थ बन कर हमारे मन में उभरते हैं। अगर शब्दों की बात करते हैं तों तो 70 के दशक के पहले तक उसका अर्थ एक रचनात्मक और सोद्देश्यपूर्ण क्रांतिकारी के रूप में उभरता था और अचानक वह आज के नौजवानों के बीच विध्वंसक अर्थ लेकर प्रगट होता है। यह नया अर्थ उसे मीडिया ने ही दिया। जैसे नवजागरण काल के पहले की खाक और खाकी नवजागरण काल में खाकी वर्दी के रोब और आदर्शों का बिम्ब था और अब जुल्म तथा भ्रष्टाचार का बिम्ब पैदा करता है। यहां कहने का अर्थ है कि साहित्यिक बिम्ब विधान के लिये शब्द बिम्बों की आपूर्ति समाचार पत्र और पत्रिकाएं ही करतीं हैं।
बेशक आप पत्र पत्रिकाओं की भाषा को चाहे जितना कोस लें लेकिन यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिये कि वस्तुत: पत्रपत्रिकाएं जितनी बड़ी जनसंख्या को छूती हैं, विशुद्ध साहित्य का उतनी बड़ी जनसंख्या तक पहुँचना असंभव है। समाज के जिस वर्णपट तक इसकी पहुंच होती है और जिस स्तर से इसका संवाद हाता है वहां साहित्य नहीं पहुंच सकता और उस वर्ग की अशाओं, सपनों एवं पीड़ा को चित्रित करने के लिये साहित्य को माटी के शब्द सदा पत्र पत्रिकाओं से ही लेने होते हैं। बस हमें याद रखना होगा कि मीडिया और साहित्य दोनों अन्योन्याश्रित हैं, उनके बीच अटूट-सी सहसंबद्धता है, उनके वर्तमान संबंध भले ही अस्पष्ट और दुविधामय नजर आते हों।
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उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा 23-24 जुलाई 2015 को वाराणसी में आयोजित राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में ‘समाचार पत्र और साहित्य : बदलते आयाम ’ संगोष्ठी में ब्लागर हरिराम पाण्डेय( ऊपर वाले चित्र में दायें से दूसरे), विख्यात कवि एवं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष डा. उदय प्रताप सिंह, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक एवं कवि डा. सुधाकर अदीब, तिब्ब्ती विश्वविद्यालय सारनाथ के कुलपति प्रो एल एन शास्त्री एवं अन्य।
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Sunday, June 21, 2015
Saturday, May 2, 2015
मतदाता बना अन्नदाता की खुदकुशी
भारत गांवों का देश है। यहां फौज के जवानों की अगर इज्जत है तो गांवों में अन्न उपजाने वाले किसानों की भी बराबर प्रतिष्ठा है। इसी कारण लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था‘जय जवान , जय किसान।’ यही नहीं जवानों और किसानों की तुलना करते हुये पेशे से सख्त पुलिस अफसर और दिल से बेहद कोमल कवि एवं गायक मृत्युंजय कुमार सिंह ने लिखा :
तोहsरो बलम कप्तान सुनs सजनी
हमsरो बलमुआ किसान, हो सजनी,
तोहsरो बलsमुआ के मथवा पs टोपिया
करेले ऊ खूनsवा के दान
तs हमsरो बलsमुआ के माथे रे पगड़िया
करे ले ऊ अनsवा के दान सुन सजनी
इस बेहद संवेदनशील गीत में जो सामाजिक सामंजस्य है वह अब खत्म होता जा रहा है या कहें खत्म हो गया। अब सियासत ने अन्नदाता को मतदाता बना दिया तथा मत ले कर उनसे अन्न छीनने के बाद उनके ऋण माफ कर स्वयं का जय-घोष करने वाले क्या अब कुछ मानवीय होंगे? किसान की आत्म हत्या हमारी संवेदना की मौत का दृश्य है । सूखे, फटे, उजड़े, खेतों के किसी अनजान कोने में वह मर जाने वाले उस किसान की पीड़ा से राष्ट्र अनजान ही रहता है। उसके खाली बर्तनों में अन्न नहीं है। कुचले डिब्बों में दाना नहीं, फटे कुर्ते में सिक्के नहीं। वह क्या करेगा। राजधानी के मध्य में बदलाव लाने का दावा करने वाली सरकार की सभा में एक किसान की खुदकुशी चाहे जितने कानूनी और सियासी पहलुओं के दरवाजे खोलती है लेकिन इसका सबसे बड़ा पक्ष है कि अब तक जिन किसानों को सरकारें इस्तेमाल करती रही हैं ये मौतें उनका पीछा करेंगी। किसानों की आमदनी के स्रोत राजनीतिज्ञों की बनायी नीतियों ने सोख लिया अब किसान विवश हैं। दिल्ली में जो आत्महत्या हुई है वह इसी विवशता का प्रतिबिम्ब है। वह प्रयास बना जीवन से मुंह मोड़ने का। वह प्रथम रहा जो हजारों किसानों को जिंदा जता गया कि जितने भी उन्हें इकट्ठे कर जोड़ने का जतन दिखा रहे हैं, वे उन्हें तोड़ने का तांडव कर रहे हैं। किसान जुड़ जाएंगे तो खेतों में पसीना बहाकर सोना निकालेंगे। रैलियों में क्यों जाएंगे? दिल्ली एक किसान मरता रहा और और मुख्यमंत्री भाषण देते रहे। गुरूवार को संसद में शोर मचा यानी मौत भी उनके लिये अवसर बन गयी है।
मृत्युंजय अपने धुन में गाते हैं
तोहsरो बलsमुआ के छाती पs के तsकमा में
चमsकेला देसवा के सान
तs हमsरो बलsमुआ के गेहूँआ के बलिया में
दमsकेला धरsती के जान सुनs सजनी
लेकिन सुनता कौन है। जिसे सुनना है वह तो मौके की तलाश में है। जिन देशवासियों ने रात को समाचार देखे-सुने, उन्हें भरोसा नहीं हुआ कि नेता, हर एक पार्टी के नेता, ‘किसान आत्महत्या क्यों करते हैं’ पर भयानक आरोप-प्रत्यारोप में लीन थे।
जंतर मंतर पर हजारों लोगों की भीड़ के सामने पेड़ से लटक कर खुदकुशी कर लेने वाले राजस्थान के किसान गजेंद्र सिंह की मौत अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गई है । ये सवाल एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं के रवैये को लेकर हैं, तो दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन और व्यवस्था संभाल रहे लोगों के साथ-साथ आसपास मौजूद अन्य लोग भी सवालों के घेरे में हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब गजेंद्र फांसी लगा रहे थे, तब किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश क्यों नहीं की? ऐसा कैसे हुआ कि हजारों लोगों की भीड़ के बीच पेड़ पर चढ़े एक शख्स ने खुदकुशी कर ली और करीब 15-20 मिनट तक किसी का उस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। कहते हैं कि, अपनों के मरने पर जानवर तक दुखी हो जाते हैं लेकिन ये दुखी नहीं हुये , कौन सी प्रजाति के जानवर हैं ये। जय-जवान, जय-किसान का देश हमेशा याद रखेगा। जिस राष्ट्र का किसान हताश, वहां हर तरक्की बिखरते परिवारों को रौंदकर होगी।
तोहsरो बलम कप्तान सुनs सजनी
हमsरो बलमुआ किसान, हो सजनी,
तोहsरो बलsमुआ के मथवा पs टोपिया
करेले ऊ खूनsवा के दान
तs हमsरो बलsमुआ के माथे रे पगड़िया
करे ले ऊ अनsवा के दान सुन सजनी
इस बेहद संवेदनशील गीत में जो सामाजिक सामंजस्य है वह अब खत्म होता जा रहा है या कहें खत्म हो गया। अब सियासत ने अन्नदाता को मतदाता बना दिया तथा मत ले कर उनसे अन्न छीनने के बाद उनके ऋण माफ कर स्वयं का जय-घोष करने वाले क्या अब कुछ मानवीय होंगे? किसान की आत्म हत्या हमारी संवेदना की मौत का दृश्य है । सूखे, फटे, उजड़े, खेतों के किसी अनजान कोने में वह मर जाने वाले उस किसान की पीड़ा से राष्ट्र अनजान ही रहता है। उसके खाली बर्तनों में अन्न नहीं है। कुचले डिब्बों में दाना नहीं, फटे कुर्ते में सिक्के नहीं। वह क्या करेगा। राजधानी के मध्य में बदलाव लाने का दावा करने वाली सरकार की सभा में एक किसान की खुदकुशी चाहे जितने कानूनी और सियासी पहलुओं के दरवाजे खोलती है लेकिन इसका सबसे बड़ा पक्ष है कि अब तक जिन किसानों को सरकारें इस्तेमाल करती रही हैं ये मौतें उनका पीछा करेंगी। किसानों की आमदनी के स्रोत राजनीतिज्ञों की बनायी नीतियों ने सोख लिया अब किसान विवश हैं। दिल्ली में जो आत्महत्या हुई है वह इसी विवशता का प्रतिबिम्ब है। वह प्रयास बना जीवन से मुंह मोड़ने का। वह प्रथम रहा जो हजारों किसानों को जिंदा जता गया कि जितने भी उन्हें इकट्ठे कर जोड़ने का जतन दिखा रहे हैं, वे उन्हें तोड़ने का तांडव कर रहे हैं। किसान जुड़ जाएंगे तो खेतों में पसीना बहाकर सोना निकालेंगे। रैलियों में क्यों जाएंगे? दिल्ली एक किसान मरता रहा और और मुख्यमंत्री भाषण देते रहे। गुरूवार को संसद में शोर मचा यानी मौत भी उनके लिये अवसर बन गयी है।
मृत्युंजय अपने धुन में गाते हैं
तोहsरो बलsमुआ के छाती पs के तsकमा में
चमsकेला देसवा के सान
तs हमsरो बलsमुआ के गेहूँआ के बलिया में
दमsकेला धरsती के जान सुनs सजनी
लेकिन सुनता कौन है। जिसे सुनना है वह तो मौके की तलाश में है। जिन देशवासियों ने रात को समाचार देखे-सुने, उन्हें भरोसा नहीं हुआ कि नेता, हर एक पार्टी के नेता, ‘किसान आत्महत्या क्यों करते हैं’ पर भयानक आरोप-प्रत्यारोप में लीन थे।
जंतर मंतर पर हजारों लोगों की भीड़ के सामने पेड़ से लटक कर खुदकुशी कर लेने वाले राजस्थान के किसान गजेंद्र सिंह की मौत अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गई है । ये सवाल एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं के रवैये को लेकर हैं, तो दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन और व्यवस्था संभाल रहे लोगों के साथ-साथ आसपास मौजूद अन्य लोग भी सवालों के घेरे में हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब गजेंद्र फांसी लगा रहे थे, तब किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश क्यों नहीं की? ऐसा कैसे हुआ कि हजारों लोगों की भीड़ के बीच पेड़ पर चढ़े एक शख्स ने खुदकुशी कर ली और करीब 15-20 मिनट तक किसी का उस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। कहते हैं कि, अपनों के मरने पर जानवर तक दुखी हो जाते हैं लेकिन ये दुखी नहीं हुये , कौन सी प्रजाति के जानवर हैं ये। जय-जवान, जय-किसान का देश हमेशा याद रखेगा। जिस राष्ट्र का किसान हताश, वहां हर तरक्की बिखरते परिवारों को रौंदकर होगी।
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