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Thursday, August 13, 2015

जनता की सकारात्मक धारणा जरूरी

भारत में दरअसल चुनाव जीतने के लिए सरकार द्वारा किये गये कामकाज जरूरी हैं लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि अगली अवधि के लिए जनता उस पार्टी के बारे में क्या सोचती है। उसकी धारणा क्या है? पिछले चुनाव में कांग्रेस की पराजय और भाजपा की भारी विजय के पीछे यही धारणा सक्रिय थी। अपने सारे प्रयासों के बावजूद कांग्रेस आम जन को यह यकीन नहीं दिला सकी कि वह उनके दु:ख- सुख के बारे में सोचती है जबकि भाजपा ऐसा करने में कामयाब रही। इसी परिप्रेक्ष्य में अगर बिहार का चुनाव देखें तो यहां भी धारणा ही विकसित होती दिख रही है और पक्ष तथा प्रतिपक्ष दोनों ही धारणाओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। जैसे लालू-नीतीश के ‘‘बेमेल’ गठबंधन, लालू राज के जंगल राज का शोर और इस दोस्ती को नीतीश के सुशासन के लाभों पर पानी फेरने वाला बताना भाजपा की बहुत सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। दूसरी तरफ , नीतीश अब भी सुशासन और विकास की बात को प्राथमिकता देते लग रहे हैं, जबकि लालू जनगणना के जातिवार आंकड़ों के मुद्दे से लेकर मंडल-कमंडल की लड़ाई वापस लाने के लिए प्रयास करते दिख रहे हैं। अपनी पहली यात्रा के दौरान मोदी ने राष्ट्रीय जनता दल के नए नामकरण और नीतीश के डीएनए का मसला छेड़कर कुछ मनचाहा नतीजा हासिल किया और एक बार में बिहार का चुनावी परिदृश्य गरमा गया। लालू तो बौखलाए ही, नीतीश ने डीएनए वाले मसले को एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा और बिहारियों के अपमान से जोड़कर सियासी लाभ लेने की कोशिश की। अब भी यह कोशिश जारी है और मोदी को पचास लाख बिहारियों के डीएनए नमूने भेजने का अभियान चल रहा है। मोदी की यात्रा के कुछ घंटों के अंतराल में ही लालू और नीतीश ने प्रेस के माध्यम से लगभग हर बात का जवाब उसी लहजे में दिया। अगर प्रधानमंत्री ने लालू-नीतीश गठबंधन का लक्ष्य जंगल राज पार्ट-2 बताया, तो लालू ने इसे मंडल-2 की तैयारी बताया। अपने जेल के अनुभव से अधिक शोर अमित शाह के जेल जाने का मचाया। बिहार चुनाव लालू और नीतीश के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है, तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव में मोदी के हाथों बुरी तरह धुन दिए जाने के बाद सबसे पहले नीतीश ने ही मोदी की काट के लिए नई रणनीति अपनाई और लालू की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। भले ही लोकसभा चुनाव में लालू की पार्टी का प्रदर्शन नीतीश के जदयू से बेहतर था, पर उनकी राजनीतिक मुश्किल चारा कांड में सजा पाने से बढ़ चुकी थी। सो, उन्होंने भी लपककर नीतीश का हाथ थाम लिया। बिहार में सिर्फ जोड़-तोड़, जुमलेबाजी या तीखे तेवर की बयानबाजी ही नहीं हो रही है। कई बार से मोदी को अपनी सेवाएं देने वाले प्रशांत किशोर इस बार नीतीश के सारथी बने हुए हैं और दरवाजे-दरवाजे तक उनका संदेश पहुंचाने का काम चल रहा है। विजन दस्तावेज के बाद अब रिपोर्ट कार्ड पहुंचाने की बारी है। बीजेपी सोच सकती है कि माहौल उसके अनुकूल है। प्रधानमंत्री की रैलियों में भीड़ दिख रही है, यानी उनकी लोकप्रियता काफी हद तक कायम है। दूसरे, बिहार बीजेपी के नेता विधान परिषद चुनाव परिणाम को विधानसभा की पूर्व पीठिका मान रहे हैं। परिषद चुनाव से जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस गठबंधन को निस्संदेह धक्का लगा है और बीजेपी का उत्साह बढ़ा है। तीसरे, बीजेपी के साथ जीतनराम मांझी के आने से दलित मतों के ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ी है। चौथे, नीतीश के दस साल के शासन से असंतोष पैदा हुआ है और उनके द्वारा 2010 के चुनाव पूर्व बनाए गए सामाजिक समीकरण भी टूटे हैं। पांचवे, जिन लालू प्रसाद यादव के कुशासन के विरुद्ध नीतीश ने 1994 से संघर्ष किया, उनके साथ गठबंधन को राज्य का बहुमत स्वीकार कर लेगा, इस पर संदेह है। बीजेपी के पक्ष में वह आक्रामकता गायब है जो लोकसभा चुनाव के पहले थी। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने 160 परिवर्तन रथ रवाना किए जो सभी विधानसभा क्षेत्रों में मोदी सरकार की उपलब्धियां और नीतीश की विफलताएं दिखा रहे हैं। नीतीश ने उसके पहले ही 400 ट्रकों की रवानगी की योजना बना ली, जो पूरी तरह हाइटेक हैं। इसमें आक्रमण और जवाब दोनों है। द्वार-द्वार दस्तक कार्यक्रम के संबंध में दावा है कि नीतीश की देखादेखी जेडीयू के लोग भी करोड़ लोगों तक पहुंचें। जन भागीदारी अभियान, बढ़ चला बिहार, ब्रेकफास्ट विद सीएम, बिहार विकास संवाद, जिज्ञासा, गौरव गोष्ठी, इन सारे कार्यक्रमों को देख लीजिए तो लोकसभा चुनाव के पूर्व मोदी के चुनाव अभियानों की छाया दिखाई देगी। नीतीश के प्रयास अच्छे हैं पर इसके बावजूद उन्हें राज्य की जनता को आश्वस्त करना होगा कि जंगल राज - 2 की वापसी नहीं होगी और बिहार विकसित होगा। फिलहाल तो गीता वाली स्थिति है जिसमें संजय कहते हैं
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥

Wednesday, August 12, 2015

बिहार में मोदी की जुमलेबाजी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को बिहार के गया में चुनाव प्रचार के लिये गये थे। जैसी कि उनकी​ शैली है वे विपक्षी पर मारक प्रहार करते हैं, उसी तरह से उन्होंने अपने विपक्षी नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव पर प्रहार किया। प्रहार की उनकी शैली बड़ी ही नाटकीय होती है। अगर महान मनोशास्त्री कांट की भाषा में कहें तो मोदी ‘पॉलिटिकल थियेट्रिक्स’ के विशेषज्ञ हैं। वे साधारण से जुमले में असाधारण सी बात कह जाते हैं आैर वह बात अपेक्षित प्रहार करती है। रविवार के ही जुमलों को देखें। उन्होंने दो बातें कहीं। पहली जंगलराज पार्ट 2 के पुनरागमन की और दूसरे बिहार की किस्मत पलट देने की। ये दोनों बिहार में ऐसे पॉलिटिकल थिपयेट्रिक्स के उदाहरण हैं जिसका वहां के जनमानस पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। वैसे अगर ध्यान से देखें तो समस्त भारतीय राजनीति ही एक नाटक है। कहते ही हैं कि ‘द ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल थियेटर।’यह आरंभ से ही भारत की राजनीति में होता रहा है। गांधी, जो अफ्रीका से टाई कोट पहन कर आये थे, भारत आकर संन्यासी का वेश धर लिये और उसकी नाटकीय अपील से उन्होंने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये। यही हाल राजा मांडा के नाम से विख्यात विश्वनाथ प्रताप सिंह का था। विप्र सिंह ने मंत्रिमंडल छोड़कर बोफोर्स घोटाले का पर्दाफाश करने की घोषणा से देश का दिल जीत लिया। फिर अचानक वो राजा वाली वेशभूषा त्याग धोती में दिखने लगे। कुछ तस्वीरों में तो ऐसे बन बैठे, मानो महात्मा गांधी की सादगी अपना ली हो। सब नाटकीय परिवर्तन थे। थिएट्रिक्स की नई-नई कलाएं सामने आ रही थीं। वे किसी की भी मोटरसाइकल पर पीछे बैठ जाते। लोग दंग रह जाते। प्रधानमंत्री बनते ही बदल गए। अनूठी अभिनय क्षमता। बड़े-बड़े अंगरखे आ गए। राजा जैसी शेरवानी, कोट, टोपी। समूचा गांधी रूप, रूप ही रह गया। बाद में मंडल की आग धधकाकर देश में घृणा की पीढ़ी तैयार करने का आधार बने, वो अलग। मतलब, हमारे देश में राजनीति में कामयाबी के लिये मुखौटे औरचोट करते जुमले जरूरी हैं। जब जुमले की बात चली तो भाजपा के चाल, चरित्र, चेहरा वाला जुमला याद होगा सबको। उससे भी अधिक याद आता है - नरेन्द्र मोदी का मुखौटा। गुजरात चुनाव से चर्चित वह मुखौटा मोदी-मास्क बनकर विख्यात हुआ। शायद ही कोई दूसरा नेता ऐसा होगा जिसका मास्क उसके ख़ुद के चेहरे से इतना मिलता जुलता हो, जितना नरेन्द्र मोदी का है। नाट्यकला, सभी कलाओं में श्रेष्ठ मानी गई है, चूूंकि इसमें आपको चुनने या पसंद करने या कि खारिज करने वाले ठीक सामने ही होते हैं। नाटक, मात्र मनोरंजन नहीं है। नाटक, गहन अर्थपूर्ण होते हैं। राजनीति, नाटकीय तो है। किन्तु नाटक नहीं है। अब रविवार के गया में मोदी को भाषण की जुमलेबाजी और नाटकीयता को देखें। प्रधानमंत्री ने एक पखवाड़े के भीतर बिहार में अपनी दूसरी जनसभा में कहा कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार बनने पर पांच साल के भीतर राज्य से ‘बीमारू’ का ठप्पा हट जायेगा हालांकि उन्होंने बहुप्रतीक्षित आर्थिक पैकेज संबंधी वादे के बारे में कुछ भी ऐलान नहीं किया। उन्होंने गया में गांधी मैदान में आयोजित ‘परिवर्तन रैली’ में लोगों से अपील की कि वे ‘अहंकार में डूबी सरकार’ को हटाएं। अपने संबोधन में ‘जंगल राज’ शब्द का कई बार जिक्र किया और कहा कि बिहार की जनता ‘जंगलराज पार्ट 2’ को आने की अनुमति नहीं दे। प्रधानमंत्री ने कहा कि आपने 25 साल तक राज्य पर शासन करने वालों के अहंकार, उत्पीड़न और धोखाधड़ी को झेला है। क्या आप पांच साल और इन्हीं लोगों को शासन करने का मौका देंगे। यह विकासहीनता का दंश झेल रहे बिहार वासियों की साइक पर सीधा प्रहार था। मोदी जिस ढंग से कह रहे थे वह सत्ता की एक खास किस्म की कीमियागीरी या यों कहें ‘अलकेमी’ है। इसमें दिखता वही है जो नेता चाहता है। मेकियावेली का कथन था कि ‘सत्ता के शीर्ष पर बैठ कर परिवर्तन या नयी व्यवस्था की शुरुआत करने के मुकाबले कुछ भी करना कठिन नहीं है । ’ प्रधानमंत्री​ ने अपने भाषण मे बिहारवासियों को यह उम्मीद दिलाने का प्रयास किया है कि वे वहां की दिशा और दशा में बदलाव लाकर अपनी सरकार के रवैये और कारगुजारी को वहां के लोगों के प्रति ज्यादा दोस्ताना और अर्थपूर्ण बनाएंगे। आपमें से बहुतों को याद होगा कि 14 अगस्त 1947 की रात को ठीक 12 बजे जब 15 अगस्त की दस्तक के साथ आजाद भारत का निर्माण हुआ था, उस अवसर पर नेहरू जी ने अपने भाषण में ट्रिस्ट विद डेस्टनी (नियति से पूर्व-नियोजित भेंट) नामक कालजयी पंक्ति का उल्लेख किया था। नरेंद्र मोदी ने बिहार में एक नई‘ ट्रिस्ट विद डेस्टनी’ शुरू करने का संकेत दिया है। लेकिन देश के अन्य भागों में मोदी की कारगुजारियों और सत्ता के परफॉरमेंस को देखते हुए क्या नहीं लगता कि राजनीति को नाटक बनने से रोकना असंभव है। किन्तु रोकना ही होगा। वरना कल नायक ही खलनायक बन जाएंगे। वैसे भी बिहार चुनाव को जितना कांटे का माना जा रहा है, छोटी से छोटी गलती नतीजों पर बड़ा फर्क डाल सकती है। ऐसे में दोनों पक्ष कोई कसर छोड़ना नहीं चाहेंगे। लेकिन बाजी को अपने हक में करने के फेर में नेताओं की तरफ से बयानबाजी में जैसी गिरावट देखी जा रही है और जिस तरह असंसदीय भाषा का इस्तेमाल हो रहा है उससे बचा जाना चाहिए।

इंसान को इंसान समझने की जरूरत है


संसद में हंगामा बरपा हो रहा है। काम- काज नहीं हो रहा है। देश की गरीब जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा उस संसद के चलाने में खर्च होता है। एक आंकड़े के मुताबिक संसद को चलाने में प्रति मिनट 2.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। कामकाज नहीं होता है तब भी देश चल रहा है। अब आप सोच सकते हैं कि देश को चलाने के नाम पर कितनी बड़ी रकम खर्च होती है और तब भी संसद नहीं चलती।
उधर जम्हूरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है।
आपने सोचा है कभी कि हमारे लोकतंत्र का कोई नेता गरीब क्यों नहीं होता। यही नहीं, भोपाल गैस कांड से लेकर सोमवार की सुबह देवघर के भगदड़ में मरने या घायल होने वालों में आज तक एक नेता नहीं मिला। इस हुजूम में जिसे संसद कहते हैं क्या कभी सुना है आपने कि जिस देश में दुनिया भर में सबसे ज्यादा कुपोषण के शिकार लोग रहते हों, उस देश में की संसद में कुपोषण से मरने वाले बच्चोंपर कार्य स्थगन की नोटिस दी हो और उसपर चर्चा हुई हो? हो? कभी गंदगी और कूड़े कर्कट के जहरीले पानी में उगायी जाने वाली सब्जियों के बाजार में बिकने और उसके कारण होने वाले भयानक रोगों से जनता को बचाने के लिए सदन की गांधी मूर्ति पर किसी ने सत्याग्रह और प्रदर्शन किया? नहीं न। क्योंकि ये नेता उस वर्ग के नहीं होते जो हावड़ा पुल के नीचे से या गांव मुहल्ले के फुटपाथों पर बिकने वाली स​​ब्जियों को खरीदने जाते हैं तथा मोल- भाव करते हैं।
दरअसल,हमारे देश में इंसान इंसान से अलग हो रहा है। अब शहरों में जाति से ज्यादा वर्गभेद होता है। सड़क पर चलते हुए कार वाले साइकिल या पैदल वालों को इंसान समझने को राजी नहीं हैं। गरीब-अमीर का फर्क बड़ा हो रहा है। गाड़ी से चार लोगों को रौंदने के बाद बड़ी तादात में लोगों का सलमान खान के समर्थन में आना ये बताता है कि हम गरीबों की मौत को शायद इंसानी मौत मानने को तैयार नहीं हैं। समानता के अधिकार का हर रोज मजाक उड़ा है, और यह सब पाप किया है देश की बहुमत प्राप्त सरकारों ने। चाहे कोई इसे माने या न माने यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश की राजनीतिक व्यवस्था में बहुमत का मतलब निरंकुशता होकर रह गया है। बहुमत के जोर पर केंद्र और राज्यों में सत्ता के संस्थान देश की संपदा और संसाधनों का दोहन वर्ग विशेष के लिए करते आ रहे हैं।
बहुमत की निरंकुशता ने लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को वोट बैंक की राजनीति का पर्याय बना दिया है। देश का बड़ा हिस्सा आज भी कल्याण की बाट जोह रहा है, लेकिन उसके हिस्से में आज भी उपेक्षा , तिरस्कार और ग्लानि ही है। किसान और मजदूर आज भी अपने हक से वंचित हैं। आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में जो कानून किसान और मजदूरों के न्यूनतम हितों की रक्षा के लिए बनाए गए थे उन्हें भी बहुमत की निरंकुशता के जोर पर बदला जा रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य पहले सेवाएं हुआ करती थीं, लेकिन बहुमत की सरकारों ने उन्हें भी धंधा बना दिया। आज हिंदुस्तान में औसत मध्यवर्ग के नागरिक की महीने भर की कमाई शिक्षा और स्वास्थ्य के दुकानदार लूट लेते हैं।
ये बन्दे-मातरम् का गीत गाते हैं सुबह उठकर
मगर बाज़ार में चीज़ों का दुगुना दाम कर देंगे
पिछले 6 दशकों में रोटी, कपड़ा और मकान का मूलभूत सपना देखते-देखते न जाने कितनी आंखे पथरा गई हैं। अवसाद से भरे इन तमाम वाकयों से बहुमत वाली किसी सरकार ने कोई सरोकार नहीं दिखाया है। बहुमत के जोर पर बनने वाले कानूनों का मकसद लोगों को राहत पहुंचाना नहीं अपनी बात मनवाना हो गया है।
जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे
कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे
मिडिल क्लास, अपर मिडिल क्लास और विचारवान लोगों को देश और देश भक्ति एक गाली की तरह लगती है। हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों में बौद्धिकता हाशिए पर पड़ी है।
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
हमने बीते साठ सालों में खासी तरक्की की है लेकिन अब इंसान को इंसान समझने की जरूरत है। अगर हम ये नहीं समझ सके तो हमारी पैसे वाली तरक्की समाज के उस ताने-बाने को खत्म कर सकती है जिसके केंद्र में इंसानियत और भेदभाव मिटाने का संकल्प है।
तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है

Saturday, August 8, 2015

क्या यह टास्क नामुमकिन है













उधमपुर में हुए आतंकी हमले में मुहम्मद नावेद उर्फ उस्मान तो पकड़ा गया, मगर कहां है जावेद, कहां है रहमान उर्फ अकरम और कहां है खुर्रम। ये आतंकी खुफिया एजेंसियों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। फरार चल रहे ये आतंकी और हमलों को अंजाम दे सकते हैं। इनके बाद लश्कर-ए-तायबा के सीनियर आतंकी भी बड़े हमलों को अंजाम दे सकते हैं। पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई सांप्रदायिक दंगे भी करवा सकती है। खुफिया सूत्रों की रिपोर्ट और नावेद के बयान से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में और आतंकी हमले हो सकते हैं। दरअसल, गुरदासपुर में मिली सफलता और उधमपुर में हुए आतंकी हमले के बाद आईएसआई के हौसले बुलंद हो गए हैं। नावेद पूछताछ में बार बार अपना बयान बदलकर एजेंसी को गुमराह कर रहा है। हालांकि जांच एजेंसी अब तक की पूछताछ के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि आईएसआई लश्कर को हथियार से लेकर वित्तीय मदद तो दे ही रहा है, आतंकियों को प्रशिक्षण दिलाने में भी मदद कर रहा है। पिछले वर्षों से हममें से सबने आतंकी हमलों, आतंवादियों की क्रूरताओं और उनकी ट्रेनिंग के बारे में अनगिनत खबरें सुनी होंगी। हर बार, आतंकियों की क्रूरता और उसके पीछे की जेहनियत में इंजेक्ट की गई नफरत महसूस की है। आखिर कुछ तो खास होता है इनमें। ये ब्रेनवॉश तो किए जाते हैं, लेकिन कैसे कच्चे घड़े की तरह फिर संवार दिए जाते हैं एक नई शक्ल में। और शायद, पहले से कहीं ज्यादा मजबूत। कसाब से लेकर नावेद तक...एक बात महसूस की है आपने? ये आतंकी गढ़े जाते हैं। वह भी बेहद करीने से। मैं सोचता हूं कि ये लड़के होते तो हम-आप जैसे ही हैं न। आते भी हैं सब एक से। बस, फर्क इतना है कि इन्हें कुछ भयावह करने के लिए तैयार कर दिया जाता है। न इन्हें डर रहता है, न मोह और न ही चिंता। कैसा गजब कमिटमेंट रहता होगा इनमें, किस हद तक जुनून और कितना डेडिकेशन। ये पागलपन की हद तक अपने काम को लेकर जुनूनी होते हैं। नावेद तो खुल्लम खुल्ला कह रहा है कि ‘उसे हिंदुओं को मारने में मजा आता है।’ लेकिन शायद वह यह नही जानता कि हिंदुओं को न जाने क्यों मरने में आनंद आता है। हजारों साल से हिन्दू कभी नादिर शाह , कभी चंगेज खान , कभी औरंगजेब के हाथों मरता ही तो रहा है , जब कभी किसी राणा प्रताप , पृथ्वी राज ने विरोध किया तो जयचंद मान सिंह सरीखे लोग हिन्दुओं की इस परंपरा के रक्षार्थ किसी को जान से मरवा दिया तो किसी को जंगल में भेजकर घास की रोटी खाने के लिए मजबूर कर दिया। पाकिस्तान हमें हर तरह से परेशान कर रहा है जब कि इजराइल भी ऐसे ही प्रवृत्ति के देशों से घिरा हुआ है लेकिन किसी में हिम्मत नहीं जो उसकी सीमा में घुसकर दहशत फैला दे या किसी नागरिक की हत्या कर दे। आश्चर्य है कि वहां भी भारत की तरह लोकतंत्र है , वहां भी अमीर गरीब हैं , वहा भी तमाम जाति और धर्म के लोग हैं। एक छोटा देश म्यांमार भी ऐसी घटनाओं से मुक्ति पा चुका है। लेकिन एक भारत है जो पिछले 70 साल से इस दंश को झेल रहा है, आज तक इतना भी खौफ नहीं पैदा कर पाया कि पाकिस्तान उसे बड़ा और शक्तिशाली देश मानना तो दूर अपने समकक्ष ही मान ले ! इसके कारण को समझना बड़ा मुश्किल नही है। इसका जो सबसे साधारण कारण है वह है हम अपनी शिनाख्त के लिए लड़ना नहीं जानते। हम अपनी ताकत का इजाफा क्यों नहीं करते? आतंकियों जैसे कमिटमेंट वाले युवक हम क्यों नहीं गढ़ सकते? क्या हम ऐसे नौजवान नहीं गढ़ सकते जिनके लिए कुछ नायाब करना ही मिशन हो। ऐसे नौजवान तैयार कीजिए, जो बेहद प्रोफेशनल तरीके से इन आतंकियों को एक भी जान न लेने दें। जिसे न डर हो, न मोह। जिनका मिशन ही हो रक्षा। लेकिन, इसमें आपको आतंकियों जितनी ही ईमानदारी दिखानी होगी साहब। इसके बाद आप मजबूत 'राष्ट्र' बना पाने में कामयाब होंगे। । कुछ अच्छा करना ही है तो आतंकियों के से जुनून की तरह जुनून पैदा करें। किसी घर को जलने-उजड़ने से रोकिए। लड़िए, मगर गरीबों के हक की लड़ाई। उसी जुनून, कमिटमेंट और डेडिकेशन से। क्या मोदी, डोभाल और राजनाथ के लिए यह टास्क नामुमकिन है?



Thursday, August 6, 2015

लोकतंत्र बचाओ अभियान चलाने की जरूरत

लोकतंत्र बचाओ अभियान चलाने की जरूरत
देश की सबसे बड़ी पंचायत , संसद , इन दिनों बेचैन है। जो हो रहा है उसे सांसद के माननीय लोकतंत्र पर काला धब्बा बता रहे हैं। लेकिन आप गौर करें तो लोकतंत्र और काला धब्बा दो ऐसे शब्द हैं जिनसे आप उलझ जाएंगे। सबसे पहली बात कि लोकतंत्र का स्वाभाविक विकास अपने देश में नहीं हुआ। यह अंग्रेजों की विरासत है। आयात की हुई चीजों का जो हश्र होता है, सो लोकतंत्र का हो रहा है। यह हमारे मानस में न कभी था, न रहा और न इसे विकसित कराने की कोई पहल हुई। हमारा आदर्श कभी लिच्छवी गणतंत्र नहीं रहा, बल्कि रामराज्य रहा है, जो लोकतांत्रिक नहीं है। रामराज्य माने राजतंत्र और राजा राम मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान यानी राजा सर्वोपरि। हमने रामराज्य को प्रचारित किया। लिच्छवी गणतंत्र यहां के जनमानस में वो स्थान नहीं बना सका, जो स्थान रामराज्य ने बनाया। रघुकुल रीति है। जनता सर्वोपरि नहीं है। जनता सर्वोपरि यूरोप में है, भारत में नहीं।
1649 में इंलैंड में वहां के अन्यायी और अत्याचारी राजा चार्ल्स प्रथम को वहां की पार्लियामेंट ने फांसी दे दी। संसदीय लोकतंत्र की पहली हवा यहीं से चली, इसी से इसे मदर ऑफ पार्लियामेंट कहा जाता है। 1688 में इंलैंड की क्रांति के बाद वहां लोकतंत्र का दरवाजा खुला। संसदीय लोकतंत्र की शुरुआत यहीं से मानी जाती है। 1776 में अमरीकी स्वाधीनता संग्राम और डिक्लेयरेशन ऑफ द राइट्स ऑफ मैन, लाइफ, लिबर्टी और पर्स्यूट ऑफ हैपीनस की अवधारणा का उदय हुआ। सन् 1889 में फ्रांस की क्रांति हुई। लिबर्टी, ईक्वलिटी और फ्रटर्निटी (स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व) के विचार उत्पन्न हुए। दूसरा शब्द है काला धब्बा। लोकतंत्र का काला धब्बा किसे कहते हैं और यह कब और कैसे लगता है। क्या आप यह मानते हैं कि हमारा लोकतंत्र एक सफेद बोर्ड की तरह है। जिस पर कभी कभार काला धब्बा पड़ जाता है। आप कैसे तय करते हैं कि आपातकाल वाला काला धब्बा बड़ा है या बाबरी मस्जिद के ध्वंस वाला काला धब्बा। 2008 में लोकसभा के पटल पर नोटों की गड्डी रखने से पड़ा काला धब्बा बड़ा है या 1984 के दंगे वाला काला धब्बा। भ्रष्टाचार, जातिवाद और धनबल की राजनीति से लगने वाले काले धब्बे को मिला लें तो लोकतंत्र का पूरा बोर्ड ही ब्लैक लगने लगता है। इस बार कांग्रेस कह रही है कि सुषमा स्वराज पहले इस्तीफा दें फिर सदन चलेगा। आम लोग तब भी दु:खी थे, जब बीजेपी विपक्ष में रहते हुए सदन नहीं चलने देती थी और अब भी दु:खी है' जब कांग्रेस सदन चलने नहीं दे रही है। 2012 में कोयला खदानों के मामले को लेकर 19 दिन का मॉनसून सत्र सिर्फ 25 घंटे चला था। 2009 से 2014 के बीच 900 घंटे बर्बाद हुए थे। तब राहुल गांधी और कांग्रेस के सांसदों ने संसद परिसर में लगी गांधी की मूर्ति के सामने प्रदर्शन किया था। आज कांग्रेस उग्र हो गई है। राहुल गांधी ने कहा कि हमे संसद के बाहर फेंक दें, हमारे लिए पूरा देश पड़ा है, लेकिन इस्तीफे की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। निलंबन के कारण कई विपक्षी दल कांग्रेस के साथ हो गए हैं। इस्तीफे की मांग से किनारा करने वाली समाजवादी पार्टी के सांसद मुलायम सिंह यादव ने स्पीकर से निलंबन वापस लेने की गुजारिश की और बाहर आकर कांग्रेस का साथ भी दिया। काला धब्बा हमारी राजनीति के अलोकतांत्रिक होने का प्रतीक माना जाता है। लोकसभा से कांग्रेस के 25 सांसदों को निलंबित किया गया तो इसे लोकतंत्र की हत्या से लेकर काला धब्बा तक कहा गया। मॉनसून सत्र में संसद के दोनों सदन हर दिन एक ही मुद्दे पर स्थगित होते जा रहे हैं। सदन में कांग्रेस के अलावा भी कई दल अपनी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे हैं, वेल तक जा रहे हैं और बैनर भी दिखा रहे हैं। बाद में खबर आई कि मुलायम सिंह यादव बीच का रास्ता निकालने का प्रयास करने लगे। इसी सत्र में कांग्रेस के सांसद अधीर रंजन चौधरी को एक दिन के लिए निलंबित किया गया था। जब वे स्पीकर की मेज तक जा पहुंचे तब सरकार इनके खिलाफ कार्रवाई ले आई, जिस पर मतदान होते होते रह गया। 25 सांसदों के निलंबन के लिए सरकार प्रस्ताव लेकर नहीं आई थी। मंगलवार को बीजेपी संसदीय दल की बैठक में कांग्रेस की रणनीति के ख़िलाफ प्रस्ताव पास किया गया। सीपीएम के राज्यसभा सांसद सीताराम येचुरी ने कहा है कि इस मामले में स्पीकर ने भेदभाव किया है। सरकार संसद का मखौल उड़ा रही है। स्पीकर महाजन ने कहा है कि 25 सांसदों का निलंबन भलाई के लिए किया गया है। जब पूछा गया कि बीजेपी भी तो विपक्ष में रहते हुए यही रणनीति अपनाती थी तो स्पीकर ने कहा कि सही है कि पिछली संसद में बीजेपी ने किया, लेकिन उससे पहले कांग्रेस ने किया था। ऐसा इसलिए हो रहा है कि सभी राजनीतिक दलों का एक ही काम रह गया है, चुनाव लड़ना और जीतना। किसी के पास सामाजिक कार्यक्रम नहीं है। संपूर्ण देश में सामाजिक कार्यक्रमों के जरिये एक जागरूकता अभियान चलाया जाए कि राजनीति में निचले तबके के राजनीतिक कार्यकर्ता कैसे नेता, मंत्री बने और सत्ता में आए। इस पर बिना किसी आग्रह-दुराग्रह और पूर्वग्रह के हर दल के लोगों को विचार-विमर्श करना चाहिए कि राजनीति में पैसे वालों का जोर-खत्म हो और जमीन से जुड़े, धन-संसाधनों के अभाव वाले सच्चे-ईमानदार राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए सत्ता के द्वार कैसे खुलें। हमारा लोकतंत्र कैसे बचे? देश में लोकतंत्र बचाओ अभियान चलाने की जरूरत है।

Monday, August 3, 2015

आर्गेनिक खेती से सुधरेगी कृषि

आर्गेनिक खेती से सुधरेगी कृषि
आज के बदलते परिवेश में हर क्षेत्र में नयी क्रान्ति का संचार हो रहा है। भारतीय कृषकों ने उन्नत तकनीक अपनाकर तथा अपने कठिन परिश्रम से खाद्यान उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति की है। किन्तु अधिक उपज लेने तथा फसलों को पादप व्याधियों से, खर- पतवारों से तथा कीटों से बचाने के लिए अन्धा-धुन्ध रासायनिक खादों तथा कृषि रसायनों के प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति घटती जा रही है और मृदा प्रदूषण बढ़ता जा रहा है साथ में भूमि में उपस्थित लाभदायक जीवों की संख्या घटती जा रही है जिसकी वजह से भूमि में टिकाऊ खेती अधिक समय तक नहीं की जा सकती है। अतः वैज्ञानिक भूमि के क्षरण को रोकने, भूमि को प्रदूषण से बचाने तथा भूमि में लाभदायक जीवों की संख्या बढ़ाकर खेतों को टिकाऊ कृषि लायक बनाने हेतु जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। खर्च कम करने में, मिट्टी का प्राकृतिक उपजाऊपन सुधारने के साथ-साथ बेहतर गुणवत्ता के उत्पादन में यह बहुत उपयोगी है। हाल ही में भारत सरकार ने उत्तर-पूर्व क्षेत्र को आर्गेनिक खेती का एक मुख्य केंद्र बनाने की योजना सामने रखी है। इससे पहले सिक्किम में तो पूरी तरह आर्गेनिक खेती अपनाने का महवपूर्ण निर्णय लिया गया। कुछ स्थानों पर आर्गेनिक खेती के प्रसार को अब आदर्श ग्राम योजना से भी जोड़ा जा रहा है। इसके अतिरिक्त देश के अनेक क्षेत्रों में आर्गेनिक खेती के सफल प्रयोगों के परिणाम सामने आ रहे हैं। आर्गेनिक खेती के महत्व को नए सिरे से पहचानने का एक बड़ा कारण यह है कि पांच दशकों तक रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं पर तेजी से बढ़ती निर्भरता के दुष्परिणाम अब बहुत स्पष्ट हो चुके हैं। यही वजह है कि बहुत से किसानों को जब अनुकूल अवसर मिलते हैं तो वे कई स्तरों पर आर्गेनिक खेती को आजमाना चाहते हैं। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़े अब यह स्पष्ट बता रहे हैं कि लगभग 50 वर्ष पहले केमिकल फर्टिलाइजर व पैस्टीसाइड के तेजी से बढ़ते उपयोग पर आधारित जिस कृषि नीति का बहुप्रचार किया गया था, उससे वास्तव में उत्पादकता में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। बारहवीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज में हरित क्रांति से पहले के 15 वर्षो और बाद के 12 वर्षो में उत्पादकता वृद्धि के विस्तृत आंकड़े दिए गए हैं। यदि फसल की मात्रा न देखकर उत्पादन मूल्य में वृद्धि के इन आंकड़ों को देखा जाए तो भी हरित क्रांति के पहले 15 वर्षों में अनाज, दलहन, तिलहन, कपास आदि मुख्य फसलों में पलड़ा भारी रहा, जबकि सब्जी व फल के उत्पादन मूल्य की वृद्धि बाद के 12 वर्षो में अधिक हुई। दूसरी ओर जहां तक खर्च का सवाल है तो पहले 15 वर्षो की अपेक्षा बाद के 12 वर्षो में रासायनिक खाद की खपत लगभग छह गुना बढ़ गई व कीटनाशक में वृद्धि इससे भी कहीं अधिक थी। ये सरकारी आंकड़े अब इस वैज्ञानिक सच्चाई की पुष्टि करते हैं कि रासायनिक खाद व कीटनाशक के अधिक उपयोग से भूमि के प्राकृतिक उपजाऊपन में कई तरह से गिरावट आती है। आसपास के पर्यावरण पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ता है जो आगे चलकर उत्पादकता में और गिरावट का कारण बनता है। भूजल पर भी उसका बहुत प्रतिकूल असर पड़ता है। इन गंभीर समस्याओं के बावजूद चूंकि सरकारी कृषि तंत्र ने अपनी पूरी ताकत हरित क्रांति के प्रसार में लगा दी थी, अत: इस तकनीक का प्रसार तेजी से होता रहा जिससे एक बड़े क्षेत्र में बहुमूल्य जैव-विविधता वाले परंपरागत बीज पूरी तरह लुप्त हो गए। इन परंपरागत बीजों से जुड़ा हुआ ज्ञान बुजुर्ग शताब्दियों से नई पीढ़ी को देते आए थे, वह ज्ञान भी तेजी से लुप्त होने लगा। कई शताब्दियों से व कुछ क्षेत्रों में तो हजारों वर्षो से जो परंपरागत ज्ञान व बीज एकत्र हुए थे वे महज 50 वर्षो में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। हमें विकास के ऐसे माडल को आधार बनाना चाहिए जिसमें आगे बढ़ने के लिए गांव व खेती-किसानी को छोड़ना मजबूरी न हो। गांवों व कस्बों की अर्थव्यस्थाओं में ही विविधता भरे अनेक रोजगारों का सृजन किया जा सकता है।

गांवों की आजीविका विविधता भरी होगी, तो प्रतिकूल मौसम का सामना करने की ग्रामीण समुदाय की क्षमता अपने आप बढ़ जाएगी। इसके साथ कृषि के तौर-तरीके भी ऐसे अपनाने चाहिए जिससे प्रतिकूल मौसम से भी अधिक क्षति न हो व किसानों को कर्जग्रस्त न बनना पड़े। विशेष तौर पर जरूरी है कि किसान सस्ती व आत्मनिर्भर तकनीकें अपनाएं जिससे उन्हें बाजार से ज्यादा खरीद न करनी पड़े। खर्च कम से कम होगा तो कर्ज भी नहीं लेना पड़ेगा। विविधता भरी मिश्रित खेती बेहतर पोषण व स्वास्थ्य के लिए, खर्च कम रखते हुए आय बढ़ाने के लिए तथा प्रतिकूल मौसम का सामना करने के लिए बेहतर मानी गई है। किसानों को अपनी उपज की बेहतर कीमत मिलनी चाहिए। प्याज, आलू जैसी फसलों के भंडारण के लिए नि:शुल्क गोदामों की गांव में व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए। कृषि अनुसंधान व विस्तार कार्यों में जरूरी सुधार कर छोटे किसानों के हितों व पर्यावरण की रक्षा के अनुकूल कार्य को बढ़ावा देना चाहिए।

बिहार : विकास के बाद भी पिछड़ा


बिहार : विकास के बाद भी पिछड़ा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि राजनीति के कारण विकास प्रक्रिया बाधित नहीं होनी चाहिए। विगत शनिवार को पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने इस बात पर दु:ख जताया कि सियासत के कारण बिहार का विकास ढंग से नहीं हो सका। मोदी जी यह कहते हुए खुद भी राजनीति ही कर रहे थे। कौन नहीं जानता कि बतौर प्रधानमंत्री उनकी पहली बिहार यात्रा राज्य में जल्द ही होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए समर्पित थी। अगर उन्हें सचमुच बिहार के विकास की चिंता होती तो उस स्पेशल पैकेज की घोषणा वे महीनों पहले कर चुके होते, जिसका जिक्र वे पिछले आम चुनाव के लिए जारी चुनाव प्रचार अभियान में अक्सर किया करते थे। बिहार पर इस समय देश की निगाहें हैं। हर दूसरा आदमी जानना चाहता है कि बिहार में चुनाव के दौरान और बाद में क्या होगा। वहां किस पार्टी की हवा है। लेकिन बिहार में खास कर पटना में ऐसा नहीं दिख रहा है। न जाने क्यों लोगों में वह सियासी गर्मजोशी और उत्तेजना नहीं दिखाई दे रही, जो कभी इस शहर की पहचान हुआ करती थी। महानगरीय तटस्थता और उदासीनता अब शायद यहां भी अपनी जड़ें जमाने लगी हैं। इसका एक कारण शहर के चरित्र का बदलना भी है। पटना का सामाजिक-आर्थिक जीवन पिछले दो दशकों में बड़ी तेजी से बदला है। आर्थिक विकास की​ बात कहें तो पटना में दो तरह के विकास दिखते हैं, एक है निजी नर्सिंग होम और दूसरा है कोचिंग संस्थान। चूंकि, बिहार की अर्थ व्यवस्था दूसरे शहरों या देशों में काम करने वाले श्रमिकों या यों कहें कि ट्रांजिशनल सर्विस सेक्टर पर निर्भर है। इसलिये यहां के लोगों के पास खर्च करने के लिये पैसा पर्याप्त है। पटना के किसी डॉक्टर का विजटिंग कार्ड देखिए। पता चलेगा, एक डॉक्टर पांच से दस निजी अस्पतालों का कंसल्टेंट है। दूसरी तरफ पटना में एम्स जैसा संस्थान खुल चुका है। इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान के अलावा पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (पीएमसीएच) जैसे सरकारी अस्पताल हैं, जिनमें हर समय भारी भीड़ लगी रहती है। इस स्थिति का लाभ उठाने के लिएं वहां निजी एम्बुलेंस सेवा की बाढ़ आ गयी है। अस्पतालों , दवा दुकानों और एम्बुलेंस के अलावा दूसरा धंधा है कोचिंग संस्थानों का। यह धंधा भी यहां खूब फल-फूल रहा है। गली-गली में कोचिंग इंस्टिट्यूट खुले हैं जो मेडिकल, इंजिनियरिंग और दूसरी प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करवाते हैं। कई तो कोटा (राजस्थान) स्थित कोचिंग संस्थानों में ऐडमिशन के लिए कोचिंग करवाते हैं। आगे बढ़ने और तरक्की की चाह में वहां के लोगों का एक बड़ा तबका अपने बच्चे की कोचिंग पर पैसे खर्च कर रहा है, जो पहले नहीं करना चाहता था। पटना के कोचिंग संस्थानों में पढ़ रहे लड़के दूसरे राज्यों में पढ़ने जाएंगे। लेकिन पढ़कर लौटने के बाद अपने राज्य में कोई रोजगार उन्हें शायद ही मिल पाएगा। बिहार की यह नई तस्वीर विकास के असंतुलन को दर्शाती है। निस्संदेह, नीतीश राज में राज्य की हालत बदली है। कानून और व्यवस्था की स्थिति सुधरी है। उद्योग-धंधे के लिए जिस इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है, उसका अब भी अभाव है। सबसे बड़ी मुश्किल बिजली की है। बड़े उद्योग लगते हैं तो उससे कई छोटे-मोटे धंधे पनपते हैं। कुछ नई सेवाओं की जरूरत पड़ती है। बिहार में ऐसा नहीं हो पा रहा। ऐसे में जो बुनियादी जरूरत की चीजें हैं, उनमें ही थोड़ा बहुत निवेश हो पा रहा है। स्वास्थ्य और शिक्षा वैसे ही क्षेत्र हैं। थोड़ा या ज्यादा बदलाव के बावजूद अगर नहीं बदला तो जाति का समीकरण। बिहार में अहम राजनीतिक मुद्दों की बात की जाए तो जातिवाद बहुत ही हावी है। हर पार्टी एक खास जाति को साथ लेकर चलती है और ज्यादातर मामलों में उसी जाति को सहयोग देती नजर आती है। ऐसा यहां एक पार्टी नहीं बल्कि सभी पार्टियां करती हैं। लालू जहां यादवों के हितों को महत्व देते हैं तो नीतिश कुर्मी-कोयरी को प्राथमिकता देते नजर आते हैं, रामविलास जी की प्राथमिकताएं स्वाभाविक तौर पर स्वजाति पासवानों के लिए है, कुछ जातियां जैसे भूमिहार, कायस्थ, ब्राह्मण इत्यादि और वैश्य भारतीय जनता पार्टी की प्रायरिटी लिस्ट में हैं। उपरोक्त उदाहरणों का तात्पर्य ये है कि बिहार के संदर्भ में हरेक राजनीतिक दल या महत्वपूर्ण राजनेता अपने राजनीतिक हितों को पोषित करने के लिए जातिगत खेमों पर आश्रित दिखता है। ऐसे में समाज का एक अहम वर्ग यानी आम जनता सुविधाओं से वंचित नजर आता है। वोट- बैंक की खातिर हर क्षेत्र से टिकट देते समय हरेक पार्टी जाति का अहम ध्यान रखती है। बिहार का बदला सामाजिक-आर्थिक यथार्थ अगले चुनाव या आगे की राजनीति को कितना प्रभावित कर पाएगा, कहना कठिन है। लोग बदल गए हैं, धंधा बदल गया है लेकिन सियासत में मुहावरा अब भी जात-पांत वाला ही चल रहा है।