CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Friday, September 4, 2015

बिहार चुनाव: जायज होती है हर बात सियासत में


 3 सितम्बर 2015
इन दिनों बिहार में चुनाव का माहौल इतना सरगर्म है कि बाहर से वहां पहुंचने वाला हर आदमी एकदम से ‘कन्फूजिया’ जा रहा है। जिससे मिलिये वह या तो मोदी भक्त निकलता है या नीतीश का पिछलग्गू। मोदी वाले कहते हैं कि ‘दे दे कर निहाल किये जा रहे हैं’, नीतीश के भक्त कहते हैं ‘देते कुछ नहीं , बस बोल बोल कर बेहाल किये जा रहे हैं।’समझ में नहीं आ रहा है वहां हो क्या रहा है। सीरियस कन्फ्यूजन है।
और ही होते हैं हालात सियासत में
जायज होती है हर बात सियासत में
मोदी दो दिन पहले बिहार के भागलपुर आये थे। उन्होने अपने भाषण में कहा कि बिहार के लोगों से ज्यादा समझदार कोई नहीं। दो दिन पहले वही कह कर आये थे कि वहां जंगल राज आने का खतरा है अगर नीतीश तख्त पर आ गये तो जंगल राज आयेगा ही। उधर नीतीश ने पटना में रैली में कहा, यह अब तक की सबसे बड़ी रैली है। अब कौन बड़ा है यह तो जानने का कोई तंत्र नहीं है। जो आंकड़े दोनों नेता पेश कर रहे हैं अगर उनका विश्लेषण करें तो वोट देने नहीं आई आई टी में पढ़ने चले जाइएगा।
जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये
भागलपुर में प्रधानमंत्री ने कहा कि गया में एक लाख 25 हजार करोड़ का पैकेज घोषित किया, 40 हजार करोड़ मिलाकर एक लाख 65 हजार का पैकेज दिया। वैसे प्रधानमंत्री ने ये ऐलान गया में नहीं आरा में किया था। रैली में कुछ का कुछ बोला जाता है।
बेबसी का इक समंदर दूर तक फैला हुआ
और कश्ती कागजी पतवार के साये में है
14वें वित्त आयोग ने बिहार को पांच साल में तीन लाख 76 हजार करोड़ देना तय किया है। मेरा (मोदी का ) एक लाख 65 हजार करोड़ का पैकेज अलग है। नीतीश कुमार का कहना है कि 2 लाख 76 हजार करोड़ का पैकेज तो कुछ नहीं है। दिल्ली से जो मिलेगा उसमें से भी कम दे रहे हैं। बाकी पैसा कहां जाएगा। एक लाख 8 हजार करोड़ कहां जाएगा। प्रधानमंत्री जी दनादन आंकड़े दे रहे हैं , अभी पैसे नहीं दिये पर जो नहीं दिये उसे भी गिन रहे हैं। वे मान रहे हैं कि दे दिये और उस रकम से नीतीश कुमार ने 1 लाख 8 हजार करोड़ उड़ा लिये। गड़बड़ या कन्फ्यूजन तब होता है जब मोदी पॉलिटिकल होते हैं तो नीतीश टेक्निकल हो जाते हैं। नीतीश का कहना है कि संघीय व्यवस्था में जो बिहार का हिस्सा तय है वो तो मिलेगा ही। तो वैसी परिस्थिति में इस बात का उल्लेख करना कि 5 साल में पौने चार लाख करोड़ हम देंगे और उसी में मोदी जी ने जोड़ लिया कि 2 लाख 70 हजार करोड़ तो दे दिया। अब बचे 1 लाख 8 हजार करोड़, वो कहां से आयेगा। यही नहीं, पिछले पखवाड़े खबर आयी कि बिहार के 21 जिले पिछड़े हैं और उनके लिए टैक्स में छूट की अधिसूचना जारी कर दी गयी है। उस सूची में पटना भी है। पटना के अलावा वैशाली, समस्तीपुर, मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार, मुजफ्फरपुर, अररिया, जहानाबाद, नालंदा और गया का भी नाम है। जिन 21 जिलों के नाम जारी हुए हैं उनमें से कई जिले पिछले सत्रह-अठारह साल से बैकवर्ड जिलों में ही हैं।
जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में
यही नाम 1997 में जारी हुए 123 वैकवर्ड जिलों की सूची में भी हैं। गुजरात के कई जिले आज भी पिछड़े जिलों में आते हैं जो 1997 की सूची में थे। जैसे बनासकांठा और साबरकांठा। वैसे 26 जिलों के विकसित गुजरात के 11 जिले पिछड़े जिले में आते हैं। 1997 से ही टैक्स छूट के जरिये इन जिलों में राष्ट्रीय सम विकास योजना के तहत उद्योगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। लेकिन यह खबर ऐसे दी गयी कि लगा कि कोई नया फैसला हुआ है।
खुद को जख्मी कर रहे हैं गैर के धोखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बांकपन तक ले चलो
बिहार ही क्यों भारत सरकार के लघु एवं उद्योग मंत्रालय की साइट पर जाइये और देखिये वहां कई राज्यों के पिछड़े जिलों की सूची मिल जायेगी। उसमें आप पाएंगे कि आंध्र प्रदेश के 14 जिले, बिहार के 18 जिले , गुजरात के 11 जिले , कर्नाटक के 11, मध्यप्रदेश के 36 जिले औद्योगिक रूप से पिछड़े जिलों की सूची में शामिल हैं। तो फिर बिहार के लिए ऐसी घोषणा करने का मतलब क्या है ? अगर इन आंकड़ों पर चुनाव हुए तो जिस बिहारी को सबसे समझदार आदमी कह रहे हैं मोदी वह मतदाता के रूप में क्या साबित होगा यह आप समझ सकते हैं।
आँख पर पट्टी रहे और अक्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक्त का यूं मर्तबा आला रहे

एक हाई प्रोफाइल मर्डर मिस्ट्री


2 सितम्बर 2015
इन दिनों एक मर्डर मिस्ट्री सुर्खियों में है। इलेक्ट्रानिक और अंग्रेजी मीडया तो लगता है कि इसके प्रति दीवाना हो गया है। अटकलबाजियों का ऐसा दौर चल रहा है जिसे कहा जा सकता है कि ‘लव, वार और ब्रकिंग न्यूज में हर बात जायज है।’ पिछले एक हफ्ते से देश के हर मीडिया के लिये यह प्रमुखतम खबर बन गयी है। अपनी ही बेटी के कत्ल के इल्जाम में फंसी इंद्राणी की गुत्थी अब भी बेहद उलझी हुई है। सारे तार लंदन के पैसे की दुनिया से जुड़े हुए हैं। पीटर ब्रितानी पासपोर्ट वाले हैं। इंद्राणी और उसके पूर्व पति संजीव खन्ना से पैदा हुई विधि लंदन में ही रहती है और लंदन ही वह शहर है जहां पीटर और इंद्राणी उस दौर में वक्त काट रहे थे जब उनकी कंपनी की जांच चल रही थी। लंदन से एक बड़ा पैसा रूट होकर इंद्राणी की कंपनी में लगा और इसके बाद वह धीरे-धीरे गायब होता रहा। निवेशकों ने बड़े धोखे की बात कही थी। अब यह आपराधिक मामला अदालत में जाएगा, मुकदमा चलेगा और कौन जानता है कि कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद एक और किताब आ जाएगी कि फैसले में क्या खराबी है और कैसे जज ने गलती की है। क्योंकि अविरूक सेन की किताब ‘आरूषि’ ने यही चलन स्थापित कर दिया है। इसलिए अब बहस के बिंदु अपराध क्षेत्र में नहीं हैं। इनका संबंध हम से है। एक समाज, लोकतंत्र, वित्तीय दिग्गजों के कामकाज और हमारे समाचार माध्यमों की दशा से है। इससे एक परिवार में हुई त्रासदी, फिर वह चाहे कितनी ही जटिल और चकराने वाली क्यों न हो, लतीफे की तरह नज़र आने लगी और वह पारिवारिक मनोरंजन का विषय बन गई। यह मामला हमारे समाज के बारे में क्या बताता है? हम अपने टीवी पर ऐसी सस्ती चीजें देखना पसंद करते हैं, लेकिन इस पर नाक-भौं भी सिकोड़ते हैं और जो पत्रकार हमारे लिए ये लाते हैं उनका मजाक उड़ाते हैं। ‘ऑनर किलिंग’ भी हमें विचलित नहीं करते, क्योंकि यह तो गरीब, ज़ाहिल, गांव वाले अपने बच्चों के साथ करते हैं। लेकिन हमारे जैसे लोग? नहीं, नहीं। यही वजह है कि आरूषि के पालकों ने कभी अपनी बच्ची को नहीं मारा होगा, फिर अदालत चाहे जो कहे। केवल हरियाणा व पश्चिमी उत्तरप्रदेश के जाट ‘सम्मान’ के लिए अपनी बेटियों की हत्या करते हैं। और इंद्राणी ने ऐसा किया है तो शायद इसलिए कि वे आकर्षक, लालची, सत्ता की भूखी, छोटे शहर की ऐसी लड़की है, जिसकी महत्वाकांक्षाएं बहुत ज्यादा हैं। बेशक कुछ हकीकतें होतीं हैं और कुछ कहानियां थोड़े से रहस्य। वे रहस्य और कहानियां इतनी बार दोहरायी जातीं हैं कि हम उन्हें सच समझने की धारणा पाल लेते हैं। यही सच इंद्राणी मामले में है कि यह एक हाई सोसाइटी मर्डर केस है। इंद्राणी के इंद्रजाल में से हर पल नई कहानियां नुमाया हो रही हैं। हर कहानी रस में डूबी, हमारी हर ‘इंद्रिय’ को मदहोश कर देने वाली, दिल से दिमाग़ तक न जाने कितने तारों को झनझना देने वाली। और हमारी हर मांग की पूर्ति को अपना परम कर्तव्य समझने वाली टीवी की ख़बरिया दुनिया हमें बता रही है कि अब इंद्राणी ने सैंडविच खाया, अब उसने कुल्ला किया, क़त्ल के वक़्त शीना गर्भवती थी: सूत्र और उसके कुछ घंटे बाद- देखा, हमारी बात सही निकली, वह वाक़ई गर्भवती थी। बस यह नहीं बता रही कि सैंडविच ग्रिल्ड था या चिकन। बार-बार घूम फिरकर कत्ल का राज पैसे के लेन-देन पर ही आकर अटक रहा है। इंद्राणी ने सबसे पहले पैसे का लालच अपने पूर्व पति संजीव खन्ना को दिया। संजीव को इंद्राणी ने बीते कुछ वक्त में मोटा पैसा दिया था। इस लेन-देन के सबूत पुलिस के पास हैं। इंद्राणी ने पैसे से ही अपने ड्राइवर की वफादारी खरीदी। एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि वह चौथा शख्स कौन था, जिसे हत्या की पूरी हकीकत मालूम थी ? जाहिर सी बात है ड्राइवर और संजीव खन्ना तो हो नहीं सकते क्योंकि दोनों शामिल थे और दोनों को लगातार पैसा मिल रहा था। इंद्राणी का सवाल ही नहीं उठता। राहुल मुखर्जी तो अपनी जिंदगी में शीना की फाइल ही बंद कर चुका था। इस बात के भी पर्याप्त सबूत हैं कि उसने यह जानना बंद कर दिया था कि शीना कहां और कैसे गायब हो गई। तो फिर चौथा आदमी कौन था ? यह वही शख्स है जिसने पुलिस को पहली सूचना दी। कहीं लिव इन रिलेशनशिप वाला एस दास तो नहीं।पुलिस जिस केस की जांच अभी-अभी दिखा रही है दरअसल उस पर पिछले तीन महीने से काम हो रहा था। बहुत सारे सबूत गिरफ्तारियों से पहले ही जुटा लिए गए हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि उस चौथे आदमी का क्या फायदा हो सकता था इस राज को खोलने से ? क्या पूरा केस इसलिए खुला क्योंकि कहीं पैसे के लेन-देन का कोई एक बड़ा पेंच अटक गया था ? क्या इंद्राणी कुछ पैसा देने से इंकार कर रही थी जिसके चलते यह पूरी फाइल खोल दी गई ? पुलिस की कहानियां कहती हैं कि उसे किसी अंजान शख्स ने यह सारी जानकारी दी और वह केस को फॉलो करती चली गई। जब भी ऐसे मामले होते हैं तो मीडिया तथा हमारा समाज लगातार यही कहता है कि हाई सोसाइटी में ऐसा कैसे हुआ, ऐसा नहीं होना चाहिये। इस दशा में हमें यह समझना होगा कि जब किसी कमजोर क्षण में व्यक्ति अपराध करता है तो हर ऐसा व्यक्ति(अपराधी) समान होता है : डरा हुआ, लालची, कमजोर, मूर्ख, घटिया, जातिहीन और दोषी। अपराध की गंभीरता कम करने वाले कोई तथ्य नहीं होते।एच जी वेल्स ने लिखा है कि हर अपराध अंत में समाज के प्रति अपराध होता है।

Wednesday, September 2, 2015

हड़ताल की प्रासंगिकता



2 सितम्बर 2015

आज वामपंथी यूनियनों सहित देश की अन्य ट्रेड यूनियनों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल है। हालांकि , भारतीय मजदूर संघ ने इस हड़ताल से खुद को अलग कर लिया है। बीएमएस ने हड़ताल में शामिल नहीं होने की घोषणा करते हुए अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी इससे अलग रहने की अपील की है। आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के महासचिव गुरुदास दाससगुप्ता ने कहा कि विनिवेश और श्रम कानूनों में बदलाव का विरोध करेंगी यूनियनें। दासगुप्ता ने कहा कि ‘इस मुद्दे पर सभी यूनियनें एकमत हैं और वे एकजुट बनी रहेंगी।’ उन्होंने कहा कि यूनियनें विनिवेश कार्यक्रम और श्रम कानूनों में बदलाव का विरोध करेंगी, क्योंकि इससे श्रमिकों के हित प्रभावित होंगे। सीटू के महासचिव तपन सेन ने भी इसी तरह की राय जाहिर की। उन्होंने कहा कि श्रम कानूनों में सुधार ‘श्रमिकों पर गुलामी’ थोपने जैसा होगा। इसके पूर्व सरकार के साथ हुई बैठक में आल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर, आल इंडिया सेंट्रल काउंसिल आफ ट्रेड यूनियन्स, भारतीय मजदूर संघ, हिंद मजदूर सभा, हिंद मजदूर संघ, इंटक, लेबर प्रोग्रेसिव फेडरेशन, नेशनल फ्रंट आफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स, सेल्फ इंप्लायड वुमेन्स एसोसिएशन, ट्रेड यूनियन कोर्डिनेशन सेंटर और यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस के प्रतिनिधि भी शामिल थे। ट्रेड यूनियनों की ओर से सरकार को 12 सूत्रीय मांग पेश की गई जिसमें बढ़ती कीमत से बचाव, श्रम कानून प्रवर्तन, ठेका श्रम, न्यूनतम वेतन तथा सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी मांगें शामिल हैं। ट्रेड यूनियन नियमित कर्मचारियों के लिए उपलब्ध वेतन और सेवा शर्तों के समान अनुबंध पर काम कर रहे कर्मचारियों के लिए वेतन और सेवा शर्त की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी इस मांग को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है, ट्रेड यूनियनों की मांग है कि न्यूनतम वेतन को देश भर में 15,000 रु महीना किया जाए, जो फिलहाल अभी विभिन्न राज्यों में 5,000 से लेकर 9,000 रु तक है। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने कहा कि प्रधानमंत्री ने श्रम मुद्दों को सुलझाने के लिए जेटली की अध्यक्षता में अंतर-मंत्रालयी समिति गठित की है। ‘केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ औपचारिक और अनौपचारिक बैठकें हुई हैं। उन्होंने 12 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा।’

इस ट्रेड यूनियन हड़ताल में , जैसा कि सभी ट्रेड यूनियन हड़तालों में हुआ करता है , वामपंथी ट्रेड यूनियनों का वर्चस्व है। वर्तमान हालात और अर्थव्यवस्था में हड़ताल का रुख कुछ अजीब सा लगता है लेकिन इस व्यावहारिकता से वाम पंथ का कभी वास्ता नहीं रहा। बंगाल के उद्योगों का खात्मा का भी यही कारण था। वामपंथी विचार इन दिनों अव्यावहारिक हो चुके हैं या फिर उन्हें दूसरे दलों ने अपना लिया है। कम्पीटेटिव रेडिकलिज्म जैसा जुमला अब केवल वामपंथी नहीं रहा, दूसरे दल भी उसकी वकालत करने लगे हैं। नरेंद्र मोदी द्वारा इस्पात संयंत्रों को चलाये रखने के लिए उनमें निवेश का निर्णय तो वामपंथी विचार के अनुरूप है। एफ डी आई का वामपंथियों द्वारा विरोध किया जाना एक तरह से विदेशनीति है और इससे स्वदेशी जागरण मंच की नीतियों की महक आती है। वामपंथ इन दिनों अजीब संकट में है। इसके नेता एेसे बेवजह के आंदोलनों में जुड़े दिखते हैं जिनकी कोई व्यावहारिकता नहीं है। पिछले हफ्ते वामपंथी दलों की रैली इसी का उदाहरण थी। रैली में शामिल लोगों को और कुछ ना दिखा तो बेचारे पुलिस वालों पर लगे पत्थर फेंकने। वे इसकी व्यर्थता समझ नहीं पाये। वामपंथी दलों के बुढ़ाते नेता और जंग लगे अप्रयोजनीय संगठन ,जो इसके मंद पड़ने का मुख्य कारण है, आज भी उसी अवस्था में हैं। ये लोग आधुनिक समाज की अपेक्षाओं तथा अर्थव्यवस्था के दबावों के बारे में कुछ भी जानने की कोशिश ही नहीं कर रहे हैं। कहने को तो वामपंथी दलों तथा विचारधाराओं की ग्लोबल अपील है पर बमुश्किल यह आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप हो पा रही है। नतीजतन भारत में वामपंथी राजनीति पुरानी और बाधक बन गयी है। अमरीका या पूंजीवाद इनकी नजर में दुनिया की सभी समस्याओं की जड़ हैं पर चीन चाहे जो करे वह इनकी निगाह में सही है। इससे पता चलता है कि भारतीय वामपंथ कैसे अतीत के शिकंजों में जकड़ा हुआ है। बहुत कम उम्मीद है कि भारतीय वामपंथी दल देश के तकनीकी तरक्की करने की उम्मीद से भरे नौजवान वर्ग को आकर्षित करे। वामपंथी दलों को फिलहाल चाहिये कि वे किसी के साथ , मसलन कांग्रेस के साथ ही, जुड़ कर सियासत के व्यूह को भेदने का प्रयास करें। लेकिन वे अकेले ही लड़ने की जिद में हैं। इस हड़ताल से क्या नुकसान होगा इसका तो आकलन बाद में होगा पर यह समय भारत को जगाने का है और भारत बंद जैसे प्रयास अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हैं।

Tuesday, September 1, 2015

धर्म आधारित आंकड़े डरावने नहीं



27 अगस्त 2015

जनगणना के धर्म आधारित ताजा आंकड़ों के अनुसार 2001 से 2011 के बीच 10 साल की अवधि में मुस्लिम समुदाय की आबादी में 0.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और यह 13.8 करोड़ से 17.22 करोड़ हो गयी, वहीं हिंदू जनसंख्या में 0.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी और इस अवधि में यह 96.63 करोड़ हो गयी। जनगणना के आंकड़े एकत्रित करने के चार साल से अधिक समय बाद मंगलवार को धर्म आधारित आंकड़े जारी किये गये वहीं जाति आधारित जनगणना के आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं किये गये हैं। राजद, जदयू, सपा और द्रमुक तथा अन्य कुछ दल सरकार से जाति आधारित जनगणना जारी करने की मांग कर रहे हैं। जनसंख्या के सामाजिक आर्थिक स्तर पर आंकड़े तीन जुलाई को जारी किये गये थे। लेकिन अगर आंकड़ों को बारीकी से देखें तो दोनों सम्प्रदायों के जन्मदर या आबादी के बढ़ने की दर में गिरावट के लक्षण हैं। भारत में पिछले 10 सालों में हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी बढ़ने की रफ़्तार में गिरावट आई है। ऐसा भारत में जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर में आई कमी की वजह से हुआ है। हिंदू, मुस्लिम ही नहीं, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन, इन सभी समुदायों की जनसंख्या वृद्धि की दर में गिरावट आई है। भारत में जनगणना हर दस साल में होती है। साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 16.76प्रतिशत रही जबकि 10 साल पहले हुई जनगणना में ये दर 19.92प्रतिशत पाई गई थी। जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ देश में हिंदुओं की आबादी 96.63 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 79.8 प्रतिशत है। वहीं मुसलमानों की आबादी 17.22 करोड़ है, जो कि जनसंख्या का 14.23 प्रतिशत होता है। ईसाइयों की आबादी 2.78 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 2.3प्रतिशत और सिखों की आबादी 2.08 करोड़ (2.16 प्रतिशत) और बौद्धों की आबादी 0.84 करोड़ (0.7 प्रतिशत) है। वहीं 29 लाख लोगों ने जनगणना में अपने धर्म का जिक्र नहीं किया। पिछले एक दशक में जनसंख्या 17.7 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। यानी, देश की कुल आबादी में जुड़ने वाले हिंदुओं की तादाद में 3.16 प्रतिशत की कमी आई है। मुसलमानों की जनसंख्या में वृद्धि की बात की जाए तो उसमें ज़्यादा बड़ी गिरावट देखी गई है। पिछली जनगणना के मुताबिक़ भारत में मुसलमानों की आबादी 29.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी जो अब गिरकर 24.6 प्रतिशत हो गई है। फिलहाल सरकार ने जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी नहीं किए हैं। राजद, जदयू और डीएमके सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं कि वह जातिगत जनगणना के आंकड़े भी सार्वजनिक करे। जनसंख्या के सामाजिक आर्थिक स्तर आधारित आंकड़े इस साल तीन जुलाई को जारी किए गए थे। आंकड़ों के मुताबिक़ 2011 में भारत की जनसंख्या 121.09 करोड़ थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आंकड़ों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ये नियमित जनगणना का आंकड़ा है। ऐसे आंकड़े तो समय-समय पर आते ही रहते हैं। इसमें कोई नई बात नहीं है, ऐसा तो होता ही रहता है। वहीं एनसीपी नेता तारिक अनवर इन आंकड़ों के जारी होने को बीजेपी की चाल करार देते हैं। अनवर ने कहा कि इसमें जरूर बीजेपी की कोई चाल होगी क्योंकि जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की गई थी। लेकिन केंद्र सरकार ने धर्म के आंकड़े जारी कर दिए। अब ये तो सबको मालूम है कि किस धर्म की कितनी संख्या है, लेकिन जब तक जातीय जनगणना के आंकड़े नहीं बताए जाएंगे तो इसका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। संघ विचारक राकेश सिन्हा ने आंकड़ों पर एक के बाद एक कई ट्वीट करते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय जनसंख्या बढ़ाओ की सोची समझी रणनीति से चल रहे हैं। क्या हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे? क्या सचमुच ऐसा संभव है? अगर समाज वैज्ञानिक सिद्धातों को मानें तो कहा जा सकता है शिक्षा और सम्पन्नता का जनसंख्या वृद्धि से व्युत्क्रम आनुपातिक सम्बंध है। एन एफ एच एस के आंकड़े देखें तो पता चलेगा कि शिक्षा का स्तर बढ़ते ही प्रजनन दर काफी गिर जाती और यह रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से भी नीचे चला गया। रिप्लेसमेंट लेवल क्या है? एक महिला और एक पुरुष मिला कर दो हुए। इसलिए यदि वे दो बच्चे पैदा करते हैं तो उनकी मृत्यु के बाद बच्चे उनको आबादी में रिप्लेस कर देंगे। यानी अगर हर दंपति दो बच्चे ही पैदा करता है तो आबादी स्थिर रहेगी। लेकिन चूंकि प्राकृतिक रूप से जन्म दर में लड़कियों की संख्या लड़कों से कुछ कम होती है, इसलिए रिप्लेसमेंट लेवल के लिए प्रजनन दर 2.1 लिया जाता है। तो जब तक जनन दर 2.1 है, तब तक आबादी स्थिर रहेगी। इससे कम जनन दर होने पर आबादी घटने लगती है। यानी शिक्षा के बढ़ने के साथ जनन दर घटती जाती है। मुसलमानों में अशिक्षा और गरीबी की क्या स्थिति है, यह सच्चर कमिटी की रिपोर्ट से साफ हो जाता है। ऐसे में अगर मुसलमानों के पिछड़ेपन के कारणों को दूर करने की तरफ ध्यान दिया जाए तो यकीनन उनकी प्रजनन दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सरकार विकास की रोशनी को पिछड़े गलियारों तक जल्दी से जल्दी ले जाए, शिक्षा की सुविधा को बढ़ाए, परिवार नियोजन कार्यक्रमों के लिए जोरदार मुहिम छेड़े, घर-घर पहुंचे, लोगों को समझे और समझाए तो तस्वीर क्यों नहीं बदलेगी? आखिर पोलियो के खिलाफ अभियान सफल हुआ या नहीं! अतएव इन आंकड़ों से भय की आवश्यकता नहीं है।

मोदी के गुजरात में आरक्षण की आग



26 अगस्त 2015

आजकल जब भी वाट्सएप पर नजर जाती है, हार्दिक पटेल का संदेश ही छाया रहता है। कुछ ही दिनों में 22 साल के हार्दिक ने गुजरात के पटेल समुदाय में अपनी अलग पहचान बनाई है। पिछले चार साल से हार्दिक पटेल अपने समुदाय के लिए काम कर रहे हैं। हार्दिक पटेल की गिरफ्तारी के बाद भड़की हिंसक घटनाओं के बीच गुजरात के कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया है। इस बीच सरकार ने हिंसक समर्थकों को काबू करने के लिए हार्दिक पटेल को रिहा कर दिया है,हालांकि हार्दिक ने आंदोलन जारी रखते हुए गुजरात बंद बुलाया है। वहीं दूसरी ओर अहमदाबाद में हुई हिंसक घटनाओं के बाद नौ थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा दिया गया है और शहर में 13 साल बाद सेना को बुलाया गया है। सरकार ने अफवाह फैलने से रोकने के लिए इंटरनेट सेवा भी बाधित कर दी। आरक्षण को लेकर जारी आंदोलन मंगलवार रात को हिंसक हो गया। पुलिस द्वारा अपने नेता हार्दिक पटेल को हिरासत में लिए जाने से गुस्साए समर्थकों ने अहमदाबाद, जूनागढ़, सूरत, वलसाड, राजकोट और मेहसाणा समेत कई शहरों में वाहनों में तोड़फोड़ और आगजनी की। आरक्षण समर्थकों ने राज्य के गृह राज्यमंत्री रजनीकांत पटेल के आवास पर पथराव किया और आगजनी की। अहमदाबाद, सूरत और मेहसाणा में उग्र हिंसक वारदातों के चलते कर्फ्यू लगा दिया गया। उग्र समर्थकों ने पुलिस वाहनों को कई जगह फूंक दिया। हार्दिक पटेल के आंदोलन को बिहार के सीएम नीतीश कुमार का सपोर्ट मिला है। माना जा रहा है कि नीतीश ने मोदी के विरोध के चलते इस आंदोलन के समर्थन में अपना बयान दिया है। इस समय बिहार में विधानसभा चुनाव की गहमागहमी तेज हो गई है और इस चुनाव को नीतीश बनाम मोदी के तौर पर देखा जा रहा है। गुजरात की कुल आबादी 6 करोड़ 27 लाख है। इसमें पटेल-पाटीदार लोगों की तादाद 20 प्रतिशत है। ये लोग खुद को ओबीसी कैटेगरी में शामिल कराना चाहते हैं, ताकि कॉलेजों और नौकरियों में काेटा मिल सके। आेबीसी में 146 कम्युनिटी पहले से लिस्टेड है। पटेल-पाटीदार समुदाय खुद को 146वीं कम्युनिटी के रूप में ओबीसी की लिस्ट में शामिल कराना चाहती है। राज्य के 120 भाजपा विधायकों में से 40 इसी कम्युनिटी से आते हैं। गुजरात में पटेल समुदाय को बीजेपी का मेन वोट बैंक माना जाता है। अनुभव बताते हैं कि राजनीतिक दल वोट बैंक के दबाव में तुरंत आत्मसमर्पण कर देते हैं। ताकतवर और संपन्न जातियों को आरक्षण देना आरक्षण के सिद्धांत का मजाक उड़ाना है लेकिन राजनीतिक दल इस पर स्पष्ट रुख अपनाने से बचते हैं। कई बार तो ऐसी जातियों को खुश करने के लिए सरकारें आरक्षण दे भी देती हैं। गुजरात सरकार हार्दिक की मांग को लेकर कितनी गंभीर है, यह अभी तक पता नहीं चला पाया है, लेकिन हार्दिक के खिलाफ कई संगठनों ने अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी हैं। गुजरात का ओबीसी समुदाय अपनी एक महा-रथयात्रा 1 सितम्बर को शुरू करने जा रहा है। रणवीर देसाई की अगुवाई में 'आरक्षण सुरक्षा संगठन रथयात्रा' पूरे गुजरात में निकलेगी। रणवीर देसाई ने बताया की यह रथयात्रा गुजरात की 248 तहसीलों, 162 नगर पालिकाओं, 8 महा नगरपालिकाओं में पहुंचेगी। यह यात्रा 26 जनवरी 2016 तक चलेगी। रणवीर देसाई का कहना है कि अगर सरकार पटेल समुदाय के लिए कुछ करना चाहती है तो करे, लेकिन ओबीसी के लिए जो 27 प्रतिशत आरक्षण है, उसमें इस समुदाय को शामिल न न करे। अगर सरकार 27 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण देती है तो इस पर विचार किया जा सकता है। रणवीर देसाई ने यह भी सवाल उठाया है कि जब सरदार पटेल खुद आरक्षण के विरोध में थे तो यह लोग अब आरक्षण क्यों मांग रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि आर्थिक मापदंड को लेकर सरकार कुछ करना चाहती है तो सभी जातियों के लिए करे। इस आंदोलन से ओबीसी जातियों और पटेलों में तनाव पैदा होगा। ओबीसी जातियां क्यों चाहेंगी कि उनके आरक्षण में पटेल समुदाय की भी हिस्सेदारी हो। अगर 12 प्रतिशत पटेल ओबीसी में आ जाएंगे तो मुक़ाबला और बढ़ जाएगा। इस लड़ाई में कौन जीतेगा और कौन हारेगा, यह तो मालूम नहीं, लेकिन ऐसी लड़ाई गुजरात की राजनीति में भूचाल जरूर लाएगी। इस तरह पटेल आरक्षण की मांग ने गुजरात भाजपा के लिए नया सिरदर्द पैदा कर दिया है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि ताकतवर जातियां भी आरक्षण को मुक्ति का रास्ता मानती हैं।

पाक की ‘परमाणु भभकी’

पाक की ‘परमाणु भभकी’

24 सितम्बर 2015

भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) की बैठक रद्द होने के बाद भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में कटुता बढ़ गई है। पाकिस्तानी एनएसए सरताज अजीज ने भारत को धमकाया है। उन्होंने कहा है, ''मोदी सरकार ऐसे बर्ताव कर रही है जैसे कि वह क्षेत्रीय महाशक्ति हो। लेकिन हम खुद परमाणु क्षमता वाले देश हैं। हम जानते हैं कि खुद की हिफाजत कैसे करनी है।'' अजीज ने कहा कि पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने में भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के शामिल होने के सबूत हमारे पास हैं। पाकिस्तानी अखबार द डॉन की सोमवार की खबर के मुताबिक, अजीज ने भारत पर पाकिस्तान के खिलाफ प्रौपेगेंडा करने का आरोप लगाया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सलाहकार अजीज ने कहा, ''हमें सबूत देने के बदले पाकिस्तान के खिलाफ प्रौपेगेंडा करना भारतीयों का काम हो गया है।'' अजीज ने कहा कि भले ही एनएसए स्तर की मीटिंग नहीं हुई लेकिन बाकी मीटिंग्स होंगी। उन्होंने कहा, ''रेंजर्स और बीएसएफ के बीच मीटिंग होगी। डीजीएमओ भी मिलेंगे ताकि तनाव कम करने को लेकर कोई मैकेनिज्म बनाया जा सके। पाकिस्तानी रेंजर्स-बीएसएफ के बीच बातचीत 6 सितंबर को होनी है। डायरेक्टर्स जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन (डीजीएमओ) भी जहां चाहेंगे मिल सकेंगे।'' आंकड़ों के मुताबिक तीन साल पहले पाकिस्तान के पास भारत से 10 न्यूक्लियर बम ज्यादा थे। बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट ने मार्च में जारी अपनी एक रिपोर्ट में बताया था किन देशों के पास कितने न्यूक्लियर बम हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के पास 110 न्यूक्लियर बम हैं, जबकि भारत के पास 100 बम हैं। हालांकि, ये आंकड़े 2012 की स्थिति के मुताबिक बताए गए थे। तीन साल में हालात कितने बदले हैं, इस बारे में कोई आंकड़ा नहीं है। एनएसए मीटिंग होती तो भारत पर पाकिस्तान उन्हीं आरोपों को दोहराने वाला था जो 2012 में लगा चुका है। जानकारी के मुताबिक, 'बलूचिस्तान में टेरर बढ़ाने के लिए राजस्थान में कैंप', 'लाहौर में लश्कर-ए-तायबा के नेतृत्व को मदद', 'सिंध में मोहाजिर कौमी मूवमेंट को आर्थिक सहायता ' और 'कश्मीर घाटी में जनसंख्या के अनुपात में बदलाव की कोशिश' जैसे आरोप लगाए जाने वाले थे। इस्लामाबाद में 2012 में हुई होम सेक्रेटरी लेवल मीटिंग में भी पाकिस्तान ने भारत पर आरोप लगाते हुए तीन डोजियर सौंपे थे। उस वक्त यह भी आरोप लगाया गया था कि भारत समझौता एक्सप्रेस बम धमाकों के आरोपियों को बचा रहा है। सोमवार को अजीज ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगले महीने अमरीका के न्यूयॉर्क में जब दोनों देशों के नेता (नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ) मौजूद होंगे तो वह बातचीत की पहल नहीं करेगा। अजीज ने कहा कि यह भारत पर है कि वह बातचीत की पहल करे। भारत और पाकिस्तान के बीच नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजर्स (एनएसए) की मीटिंग रद्द होने से पड़ोसी देश को ज्यादा फिक्र है। पाकिस्तानी विशेषज्ञों का मानना है कि इस गतिरोध की वजह से दोनों देशों को नुकसान होगा, लेकिन पाकिस्तान पर इसका असर ज्यादा पड़ेगा। उनका मानना है कि दोनों देशों के बीच बातचीत न होना क्षेत्रीय शांति के लिए भी अच्छी बात नहीं है। अमरीकी प्रेसिडेंट ओबामा की भारत यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच कुछ दूरियां कम करने की कोशिश हुई थी, जिसका नतीजा निकला दोनों प्रधानमंत्रियों की ऊफा में मुलाकात। लेकिन सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत रद्द होने के बाद एक बार फिर दोनों देश वहीं पहुंच गए हैं, जहां से शुरुआत हुई थी। जब रूस के उफा में दोनों देशों के बीच यह सहमति बन गई थी कि आतंकवाद और सीमा पर शांति के मुद्दे पर बातचीत होगी तो कश्मीर और हुर्रियत का मुद्दा उठना बिल्कुल गैरजरूरी था। दरअसल पाकिस्तान शुरू से बातचीत से पीछे हटने के लिए बहाने ढूंढ़ रहा था। पाकिस्तान की सेना बिल्कुल नहीं चाहती है कि शांति बहाल हो।

भारत और पाकिस्तान के बीच गतिरोध को लेकर पाकिस्तान पर अमरीका और यूरोपियन यूनियन का दबाव बढ़ेगा। भारत पर भी दबाव होगा, लेकिन पाकिस्तान की तुलना में काफी कम। पाकिस्तान पर ज्यादा दबाव इसलिए होगा क्योंकि वह अमरीका से भारी पैमाने पर फौजी साज-ओ-सामान और आर्थिक मदद हासिल करता है, लेकिन भारत के साथ ऐसा नहीं है। अगर अमरीका सैन्य और आर्थिक सहायता पर रोक लगा दे तो पाकिस्तान की स्थिति खराब होनी शुरू हो जाएगी। अमरीका ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए, जिससे उनकी स्थिति काफी खराब हो गई। लेकिन ईरान से ज्यादा मजूबत मामला पाकिस्तान का है। पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने की बात अमरीका खुद मान चुका है। ऐसे में पाकिस्तान पर भारी दबाव है। पाकिस्तान की सरकार मुश्किल हालात में है और उन पर बाहरी के साथ-साथ आंतरिक दबाव काफी ज्यादा है। इसी के कारण पाक ऐसी हरकतें कर रहा है। क्योंकि पाकिस्तान को पूरा भरोसा है कि भारत आर्थिक वृद्धि और विकास पर इतना केंद्रित है कि वह युद्ध का जोखिम नहीं लेगा। वह भारत के बर्दाश्त करने की सीमा का सावधानी से आकलन कर अपनी चालें चल रहा है। ऐसे सोच के कारण वह जम्मू-कश्मीर कार्ड खेलने का दुस्साहस कर रहा है, जबकि वह खुद घरेलू आतंकवाद के कारण हिंसा से खदबदा रहा है। उसे लगा कि जम्मू-कश्मीर उसकी पहुंच से बाहर होता जा रहा है, इसलिए वह ज्यादा दुस्साहस में लग गया। जहां तक परमाणु क्षमता का सवाल है वह कृत्रिम संरक्षण है, जिसे पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व अपना तुरुप का इक्का समझती है।

वार्ता तो होनी ही नहीं थी


23सितम्बर 2015

भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक जिस तल्खी के साथ रद्द हुई है, उससे अब जल्द दोनों देशों के बीच बातचीत की संभावना नहीं दिखती। पाकिस्तान ने यह कहकर बैठक रद्द कर दी कि वह भारत की शर्तों पर बातचीत नहीं करेगा। भारत इस बातचीत को 'आंतकवाद पर ही केंद्रित' रखना चाहता था और इसके एजेंडे में कश्मीर मुद्दे को शामिल करने को वो तैयार नहीं था। पाकिस्तान सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि उसने सुषमा स्वराज की बताई शर्तों का 'गहराई से अध्ययन' किया और इसके बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि भारतीय विदेशमंत्री की ओर से रखी गई दोनों शर्तों के आधार पर दोनों देशों की प्रस्तावित एनएसए वार्ता होती है, तो इससे कोई मकसद पूरा नहीं होगा। पाकिस्तान के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा, पाकिस्तान का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने शनिवार को भारत का रुख साफ कर दिया। उन्होंने साफ शब्दों में पाकिस्तान से कहा कि आप इन दो मुद्दों पर मानेंगे तो बातचीत होगी, वर्ना नहीं होगी। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने रूस के उफा में बातचीत को जारी रखने पर सहमति जताई थी, लेकिन वो कोशिश बहुत जल्द रुकती दिख रही है। दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होना जरूरी है। जाहिर है, रिश्ते सामान्य होने के लिए सबसे पहले चरमपंथ पर रोक ज़रूरी है। सुषमा स्वराज और सरताज अजीज ने शनिवार को जो बातें मीडिया के सामने कहीं, उन्हें बंद कमरे में दोनों देशों के बीच साझा किया जाता तो बेहतर होता। इससे इतना जरूर हुआ कि भारत और पाकिस्तान की जनता को भी पता चल गया कि दोनों देशों के बीच किन मुद्दों पर मतभेद हैं। लेकिन जिस तरह से दोनों देशों ने लकीरें खींची हैं, उसके बाद आगे कैसे बातचीत होगी ये बहुत बड़ी समस्या होगी। कुछ विश्लेषक यह मानते हैं कि पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने भारत के खिलाफ तैयार किए गए एक डॉसियर के खुलासे की धमकी दी थी लेकिन सच तो यह था कि अगर वह भारत आए होते तो शर्मिंदगी के साथ हैरान रह जाते। पड़ोसी देश की जमीन से चल रहे आतंकी संगठनों और साल 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के मास्टरमाइंड दाऊद इब्राहिम को जारी पाकिस्तानी मदद की डिटेल के साथ भारत सरताज अजीज का सामना करने के लिए तैयार था। पाकिस्तान द्वारा उड़ाई गयी हवा में यह सही नहीं है कि बलूचिस्तान में जारी संकट में भारत की कथित भागीदारी है। पाकिस्तान का कहना है कि उसी सबूत से शर्मिंदगी के डर से भारत ने वार्ता रद्द की।
भारत के पास जो सबूत हैं उससे और आतंकियों को मदद और दाऊद को मिल रही पाकिस्तानी मेजबानी के पुख्ता प्रमाणों से अजीज इनकार नहीं कर सकते थे। भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान में दाऊद के पते-ठिकानों का पूरा डिटेल तैयार कर लिया था। अजीब विडम्बना है कि रोज युद्धविराम को ठेंगा दिखाकर भारतीय सीमा पर गोलाबारी करने वाला देश मासूम सा चेहरा बना मीडिया के सामने 'डोजियर' लहरा रहा है और अवाम अवाक् सी देख रही है। अपनी धरती पर आतंकवादियों को प्रशिक्षित कर हिंदुस्तान की सार्वभौमता, सद्भावना और भाईचारे पर चोट करने वाला यह देश 'हुर्रियत' के नेताओं से मिलने को इतना बेताब क्यों है? मुंह में अल्लाह ताला, बगल में मोर्टार, ए के 47, नाम पाकिस्तान, इरादे हमेशा नापाक! हाफिज सईद हो या दाऊद इब्राहिम, इन्हीं की सरजमीं पर पनाह ली.... लादेन हो या लखवी … इन्ही के आंगन में पले बढ़े! इनसे उम्मीद करेंगे कि ये आतंकवाद को खत्म करने में मदद करेंगे? हमसे बातें करने आएंगे। दरअसल वहां बात चीत का कोई माहौल ही नहीं है। पाक में भारत से बात करने का माहौल केवल एक सूरत में ही बन सकता है जब वहां पर सक्रिय आतंकी तत्व खुद पाक के लिए एक बड़ा खतरा बन जाएं और उसकी सेना को बड़े पैमाने पर खुली चुनौती देने की स्थिति में आ जाएं। आज जिस तरह से पाक में आईएस के कुछ लोगों के सक्रिय होने की ख़बरें सामने आ रही हैं तो यह भी संभव है कि आने वाले समय में आईएस जैसे संगठन का पाक के चरमपंथियों पर पूरा प्रभाव हो जाये और वे अपनी खिलाफत को पाक में भी लाने का प्रयास करें ? वह ऐसी स्थिति होगी जब पाक के सामने करो या मरो की स्थिति आ जाएगी। आज यदि आईएस को सीरिया और इराक के साथ अन्य देशों में भी सफलता मिल रही है तो उसके पीछे केवल इन देशों की सेनाओं में फैला हुआ भ्रम ही है कि वे किस तरफ रहकर सही कर पाएंगें और इस दुविधा में ही सेना की लड़ने की जुझारू शक्ति पर भी बुरा असर पड़ता है जिसका असर पिछले दो दशकों में इराकी सेना की हालत देख कर ही लगाया जा सकता है। क्या कोई यह कह सकता है कि यह वही सेना है जिसने कुवैत पर कब्ज़ा कर अमरीका की नाक में दम कर दिया था ? तब इराकी सेना सद्दाम हुसैन जैसे नेता के कब्जे में थी और पूरी तरह से सक्षम भी थी। कहीं पाक भी उस तरह की परिस्थिति में फंसकर ही अपने लिए बड़ी समस्या तो नहीं पैदा करने वाला है क्योंकि ऐसी परिस्थिति में आज नहीं तो कल उसकी सेना का मनोबल विभाजित होना ही है जिससे ही पाक के भविष्य के बारे में कुछ कहा जा सकेगा, फिलहाल तो वह सेना और आतंकियों के दबाव में काम करते हुए पाक का लोकतान्त्रिक नेतृत्व अपने लिए समस्याओं का अम्बार लगाने में ही लगा हुआ है।