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Friday, September 11, 2015

अब कठिन दिन आने वाले हैं


8 सितम्बर 2015
कहते हैं कि लोहे में जब जंग लग जाती है तो वह कमजोर हो जाता है, उसका लौहपना खत्म हो जाता है। आज यही हालत इस जमाने के भारत के लाैह पुरुष नरेंद्र मोदी का हो गया है। इसके कई सबूत हैं पर अभी हाल के ओ आर पी ओ के बारे में सरकार का फैसला सबसे ताजा उदाहरण है। इसमें शक नहीं कि 42 साल पुराना यह मामला इसीलिए अधर में लटका हुआ था कि एक तो अरबों रुपये का बोझ सरकारी खजाने पर बढ़ जाता और फिर फौज से छोटी उम्र में सेवा-निवृत्त होनेवाले लोग किसी न किसी काम पर लग जाते हैं। अब इस प्रश्न पर भी विचार होना चाहिए कि जवानों को 30-35 साल की उम्र में सेवा-निवृत्त क्यों किया जाए? क्या सेवा—निवृत्ति के बाद भी उनसे कोई काम लिया जा सकता है? इसके अलावा सरकार ने यह जो घोषणा की है, यह भी जल्दबाजी में की है, जैसे कि नगा-समझौते की हो गई थी। इससे यह भी संकेत मिलता है कि इस सरकार में सोच की तंगी है। विचार का टोटा है। या तो यह हड़बड़ी में कुछ भी घोषणा कर देती है या फिर यह प्रचार की इतनी भूखी है कि इसे किसी भी घोषणा की गहराई में जाने का धैर्य ही नहीं है। यह भी कहा जा सकता है कि वे किसी भारी दबाव को झेल नहीं सकते। यही कारण है कि आज मेरा भारत सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। आम जनता के लिए सुशासन का अर्थ है नागरिक सुविधाआें की उपलब्धता। लेकिन किसी को मालूम नहीं कि भारत के गांवों में बिजली कब कट जायेगी और डाक्टर बेवजह कितने टेस्ट लिख देगा। रेलवे टिकट लेने जाओ एक घंटा लाइन मे खड़े रहो फिर भी टिकट नहीं हम चुप हैं। रास्ते खराब हैं हम किसी तरह अपनी कार या बाइक निकाल कर चले जाते हैं, हम चुप है। आये दिन किसी न किसी उत्सव में शोर मचाया जाता है हम चुप हैं। स्कूलों में कितनी भी फीस हम भर रहे हैं लेकिन मास्टर से सवाल पूछने की हिम्मत नहीं की क्लास्सेज जरूरी है क्या। आज के बीस साल पहले क्लासेस का इतना जोर नहीं था कैसे अब्दुल कलाम जैसे लोग इतना महान बने, लेकिन हम चुप हैं। किसी भी ऑफिस में जाओ कोई सुनने वाला नहीं है। किसी की शिकायत करके कुछ नहीं होता है फिर भी हम चुप हैं। क्या हमने सब खुशी हासिल कर ली है .. क्या हमारे अच्छे दिन आ गये। लाखों लोग बिना पानी के किस तरह जी रहे हैं। आज समाचर पढ़ा गरीबी से तंग आकर पांच बच्चों की मा ने आत्महत्या कर ली फिर भी हम चुप हैं। ग्रामीण इलाकों में परिवार नियोजन अब क्यों नहीं समझाया जाता है.. गरीबी खत्म नहीं हो सकती लेकिन कम से कम खाने भर की इनकम तो होनी चाहिये। लेकिन हालात तो कुछ दूसरे दिखायी पड़ने लगे हैं। भारी आर्थिक समस्या का भय व्याप गया है। उस भय को दूर करने के लिये सरकार ने मंगलवार को देश के शीर्ष उद्योगपतियों के साथ विचार विमर्श किया। उधर कहा जा रहा है कि चीनी अर्थव्यवस्था की तंगहाली के बरक्स अमरीका अपने फेडरल रिजर्व के रेट में संशोधन करने वाला है। अगर ऐसा होता है तो दुनिया भर के आर्थिक क्षेत्र में हाहाकार मच जाने की भरपूर आशंका है। उधर , हाल में चीनी संकट का असर भारत पर नहीं होने का दावा रिजर्व बैंक के गवर्नर कर रहे हैं। उनका यह दावा कुछ हद तक सही है क्योंकि भारत से चीन का व्यापार उतना बड़ा नहीं है कि उसका बाजार भारतीय बाजारों को प्रभावित करे। अभी तक यह साफ नहीं है कि आंकड़े क्या कह रहे हैं क्योंकि इनका सामने आना अभी बाकी है। लेकिन चीन एक बड़ा देश है जो विश्व की अर्थव्यवस्था में काफी महत्वपूर्ण बन गया है। आज दुनिया के किसी भी हिस्से में कोई गड़बड़ होती है तो पूरी दुनिया पर उसका कुछ न कुछ असर पड़ता है। यह असर पहले वित्त बाजार पर पड़ता है और उसके बाद व्यापार पर। इसलिए इसे लेकर सबको चिंतित होना चाहिए। जो भी हो रहा है उसे चीन से जोड़ने को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए। विश्व अर्थव्यवस्था में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में चिंता की जानी चाहिए। इनमें यह भी शामिल है कि दरें कब सामान्य होती हैं - फेडरल रिजर्व यह करने वाला पहला बड़ा संस्थान हो सकता है। तो सवाल यह भी है कि ऐसा कब होगा। अभी इस सवाल का उत्तर मिला ही नहीं कि खबर आयी है कि फेडरल रिजर्व संशोधन करेगा। अमरीका में बेरोजगारी दर अप्रैल 2008 के बाद सबसे निचले स्तर पर है। फेडरल रिजर्व ने जुलाई 2006 के बाद से ब्याज दरों में बढ़ोतरी नहीं की है। जुलाई 2006 में इसमें एक चौथाई प्रतिशत की वृद्धि की गई थी और यह 5.25% थी। अमरीका में ब्याज दरें बढ़ने का मतलब है विदेशी संस्थागत निवेशकों का भारत और दूसरे उभरते देशों से पैसा निकालकर अपने देश ले जाना। लोकसभा चुनावों के दौरान अपने चुनाव प्रचार में मोदी ने कहा था कि रुपया तो ‘सीनियर सिटिजन’ हो गया है। लेकिन मोदी के अब तक कार्यकाल में डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 12 प्रतिशत टूट गया है और सुपर सीनियर सिटिजन बनने की ओर अग्रसर है। लेकिन जमीन अधिग्रहण बिल और गुड्स और सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) बिल जिस तरह से अधर में लटके हुए हैं, उससे निवेशकों के भरोसे को धक्का लगा है। ऐसे आम जनता में कुंठा का होना लाजिमी है और यही कुंठा राजनीतिक हेरफेर के लिए डायनामिक्स का काम करती है।

बिहार में वोटरों का विवेक कसौटी पर


7 सितम्बर 2015
बिहार की सियासत की एक भारी ट्रेजेडी है कि वहां से उठी कोई भी राजनीतिक धारा आगे बढ़ कर किसी राजनीतिक समुद्र में समाहित होने के बजाय पहले विभिन्न धाराओं में बंट जाती है और उनसे बने पठार अलग - अलग शक्ति केंद्रों में बदल कर प्रतिद्वंद्वीता बन जाते हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के उद्घोष के बाद कांग्रेस के खिलाफ बनी जनता पार्टी कुछ ही दिनों में खंड - खंड हो गयी। उसके बाद कई तरह के समुच्चय बने पर चल नहीं पाये। इस बार फिर एक महागठबंधन बना। भाजपा या नरेंद्र मोदी को बिहार में धूल चटाने की गरज से तैयार महागठबंधन ‘टेक ऑफ’ करने के पहले ही फुस्स हो गया। इस राजनीतिक घटना से किसी को आश्चर्य नहीं है। इनके पूर्व के राजनीतिक चरित्र के कारण ही इस महागठबंधन के गठन के साथ ही इसके राजनीतिक जीवनकाल को लेकर अटकलें भी लगनी शुरू हो गई थीं, क्योंकि ये सभी दल अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए एकजुट हुए थे। ऐसे में बिहार चुनाव में धर्मनिरपेक्ष मतों में बिखराव रोकने की कोशिश अब नाकाम होती दिख रही है। हर कोई जानता है कि बिहार में सपा और एनसीपी का कोई आधार नहीं है। उनके अलग होने से जदयू, राजद और कांग्रेस गठबंधन को बड़ी क्षति नहीं होने वाली है। किंतु इस बदली राजनीतिक स्थिति के बाद तय हो गया है कि ये दल धर्मनिरपेक्ष मतों में सेंधमारी जरूर करेंगे। भाजपा की कोशिश थी कि किसी तरह वह धर्मनिरपेक्ष मतों को बांट दे, उनमें बंटवारा कर दे और इस नये घटनाक्रम से वह अपने काम में सफल हो गयी। महा गठबंधन से निकले दलों का इरादा बिहार में चुनाव जीतने का नहीं है, बल्कि महागठबंधन को कमजोर करने का है। अब इन दोनों दलों के अलग से चुनाव लड़ने की स्थिति में यादव और मुस्लिम मतों के बंटने की पूरी संभावना है। अगर आप इसके पूर्व के राजनीतिक घटनाक्रमों को याद करें तो देखेंगे कि मुलायम सिंह यादव ने सांसद बर्खास्तगी के मसले पर विरोधी दलों का साथ देने के बजाय उनके विरोध में यह कहते हुए खड़े हो गये कि लोकतंत्र के लिए संसद चलना जरूरी है। उस समय उनके इस राजनीतिक ‘‘चरखा दांव’ को भाजपा के साथ उनकी बढ़ती निकटता के तौर पर देखा गया था। उसके पीछे छिपे राजनीतिक कारण कुछ भी हों। कांग्रेस ने शरद पवार पर भाजपा से सौदेबाजी का आरोप लगाया था। आज महागठबंधन से सपा के अलग होकर चुनाव लड़ने की कहानी के पीछे भी कुछ ऐसा ही कारण माना जा रहा है। इस घटना के पीछे सीबीआई का भय माना जा रहा है। चर्चा यहां तक है कि मुलायम और शरद पवार के पांव अपनों के चलते फंसे हैं कि उन्हें वैसा ही करना पड़ रहा है जो वे कभी चाहते भी नहीं। उनका रिमोट कहीं और है। अपमान और सीटों का मामला तो महज जनता को भरमाने का बहाना है। लालू यादव से समधियाने के रिश्ते से मुंह फेरना यूं ही नहीं है। यह जनता भी समझ रही है। कुछ भी हो पर ये दोनों नेता अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता की जमीन जरूर खोते जा रहे हैं। मुलायम सिंह के लिए यह पहला मौका नहीं है जब उन्होंने अपने फायदे के लिए अपनी राजनीतिक दोस्ती को ताक पर रख दिया है। 2002 के राष्ट्रपति चुनाव में वामदलों से बात किये बिना मुलायम ​सिंह ने अचानक अब्दुल कलाम का नाम प्रस्तावित कर दिया था। इसके बाद 2008 में परमाणु करार को लेकर मुलायम सिंह वामदलों का साथ छोड़कर कांग्रेस के साथ खड़े हो गए थे। इसी तरह 2012 में राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले वे ममता बनर्जी के प्रणव विरोधी रुख को देखते हुए पलट गए थे। इससे ममता पूरी तरह अलग-थलग पड़ गयी थीं। ताजा राजनीतिक घटनाक्रम तो और भी दिलचस्प है। भाजपा को यह मालूम है कि लालू, नीतीश और कांग्रेस के वोटबैंक को विभाजित किये बगैर बिहार में चुनावी फतह आसान नहीं है। इसीलिए उसने नीतीश के वोटबैंक को विभाजित करने के लिए जीतनराम मांझी को अपने साथ लिया, यादव वोटरों को तोड़ने के लिए पप्पू यादव को लालू से अलग किया। राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुनाथ झा सपा में शामिल हो गए हैं। अब सपा लालू से अलग हुए पप्पू यादव और एनसीपी के साथ मिलकर नया मोर्चा बनाकर चुनाव में उतरने वाली है। यह नयी चुनावी रणनीति कितनी सफल होगी यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा। किंतु अभी से ही बिहार में इसे ‘‘वोटकटवा’ के रूप में देखा जाने लगा है। ऐसे में बिहार के मतदाताओं का विवेक एक बार फिर कसौटी पर है।



ओआरओपी भ्रम भी कम नहीं है


6 सितम्बर 2015
वन रैंक, वन पेंशन (ओआरओपी) के लिए बीते करीब चार दशकों से जोर दे रहे पूर्व सैन्यकर्मियों ने शनिवार को उस वक्त आंशिक विजय हासिल की जब सरकार ने ऐलान किया कि वह इस योजना का कार्यान्वयन करेगी। दूसरी तरफ, पूर्व सैन्यकर्मियों ने इस फैसले को खारिज कर दिया और कहा कि उनका 84 दिनों से चला आ रहा आंदोलन जारी रहेगा। सरकार ने ओआरओपी के क्रियान्वयन का फैसला किया है जिसके तहत हर पांच साल पर पेंशन में संशोधन किया जायेगा, लेकिन इसके दायरे में वे सैन्यकर्मी नहीं आएंगे जिन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ले रखी है। पूर्व सैन्यकर्मी दो साल के अंतराल पर पेंशन की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। सरकार ओआरओपी के क्रियान्वयन के विवरण पर काम करने के लिए एक सदस्यीय न्यायिक समिति का गठन कर रही है जो इस ‘जटिल मुद्दे’ के कई पहलुओं की पड़ताल करने के बाद छह महीने में रिपोर्ट देगी। सरकार द्वारा विस्तृत ब्योरा दिये बगैर पूर्व सैनिकों की लंबित मांग को पूरा करने के लिए केवल 500 करोड़ रुपये के आवंटन पर पिछली सरकार पर निशाना साधने के बाद पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी ने ओआरओपी से जुड़ी जानकारियों पर सरकार पर कटाक्ष किये। एंटनी और एक अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल का कहना है कि , ‘ओआरओपी घोषणा बहुत बड़ी निराशा है क्योंकि पूर्व सैनिकों के लाभ के प्रावधानों को बहुत हल्का कर दिया गया है। यह उनके हितों के साथ धोखा है।’ विपक्ष पर वार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि , "जिन्होंने 40-42 साल तक काम नहीं किया, उन्हें बोलने का क्या हक है?फैशन चल पड़ा है कि जब सरकार कोई भी बड़ा काम करती है तो कुछ लोग उसका विरोध करते हैं। जिन्हें जनता ने रिजेक्ट कर दिया, वो लोग देश को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते।’’ हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी नेताओं ने ‘ऐतिहासिक’ फैसले का श्रेय लिया और कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के प्रचार के दौरान पूर्व सैनिकों से किया वादा पूरा किया। इसके तहत समान रैंक पर रिटायर हुए सभी सैनिकों और सैन्य अधिकारियों को समान पेंशन मिलेगी। उदाहरण के तौर पर 1996 में रिटायर हुए सैन्य अधिकारी को 2006 में उसी रैंक पर रिटायर हुए अधिकारी के बराबर पेंशन मिलेगी। सरकार का फ़ैसला जो मुख्य है वह है ओआरओपी का फायदा एक जुलाई 2014 से लागू किया जाएगा। ओ आरओपी साल 2013 के आधार पर निर्धारित की जाएगी। रक्षा मंत्री के मुताबिक वन रैंक वन पेंशन यानी ओआरओपी लागू करने से 9000-10,000 करोड़ रुपए ख़र्च होंगे। यह ख़र्च भविष्य में और भी बढ़ेगा।
पेंशन हर पांच साल में निर्धारित की जाएगी। पूर्व सैनिकों का कहना है कि वन रैंक वन पेंशन उनका अधिकार है। जो सैनिक स्वेच्छा से रिटायरमेंट (वीआरएस) लेते हैं उन्हें ओआरओपी नहीं मिलेगा। इनमें युद्ध में घायल होने के कारण रिटायर होने वाले सैनिक शामिल नहीं।
लेकिन रविवार को प्रधानमंत्री ने हरियाणा के फरीदाबाद में दिए एक भाषण में कहा कि वन रैंक वन पेंशन लागू करने में वीआरएस कोई मुद्दा नहीं है, पेंशन सभी को मिलेगी। इससे पहले पूर्व सैनिकों के नेता मेजर जनरल (रिटायर) सतबीर सिंह का कहना है, "सरकार ने एक ही मांग मानी है और छह मांगे नकार दी हैं। प्रदर्शन जारी रखने के सिवा और कोई विकल्प नहीं है।" बढ़ी हुई पेंशन चार अर्धवार्षिक किस्तों में अदा की जाएगी। सैनिकों की विधवाओं को बढ़ी हुई पेंशन एक किस्त में ही दी जाएगी। सरकार के मुताबिक सिर्फ एरियर देने पर ही 10-12 हजार करोड़ खर्च होंगे। रिटायर होने वाले कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखने के लिए एक सदस्य न्यायिक आयोग गठित किया जाएगा। ओआरओपी लागू होने से करीब 25 लाख पूर्व सैनिकों और सैनिकों की छह लाख विधवाओं को फायदा होगा। लेकिन इस फैसले को लेकर काफी विभ्रम है। हालांकि सरकार के पास अब इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था कि वह इसे किसी नतीजे पर पहुंचाए। वे सरकार में हैं। उन्हें तय करना चाहिए कि क्या सबसे अच्छा है और अपने नागरिकों को क्या देना देश के लिए मुमकिन है। फैसले से कई लोग नाखुश हैं पर हर वेतन आयोग की सिफारिशों पर भी बहुत से लोग नाखुश होते हैं। इसके बाद सरकार को मीडिया के माध्यम से जल्द से जल्द सैन्य समुदाय को पेंशन के नए नियमों के ब्योरे समझाने चाहिए। साफगोई से बातें न रखना सबसे खतरनाक तरीका है। और याद रखें, देश ने नरेंद्र मोदी को जबर्दस्त समर्थन इसलिए दिया, क्योंकि उन्होंने निर्णायक सरकार का वादा किया था।

Friday, September 4, 2015

बिहार चुनाव: जायज होती है हर बात सियासत में


 3 सितम्बर 2015
इन दिनों बिहार में चुनाव का माहौल इतना सरगर्म है कि बाहर से वहां पहुंचने वाला हर आदमी एकदम से ‘कन्फूजिया’ जा रहा है। जिससे मिलिये वह या तो मोदी भक्त निकलता है या नीतीश का पिछलग्गू। मोदी वाले कहते हैं कि ‘दे दे कर निहाल किये जा रहे हैं’, नीतीश के भक्त कहते हैं ‘देते कुछ नहीं , बस बोल बोल कर बेहाल किये जा रहे हैं।’समझ में नहीं आ रहा है वहां हो क्या रहा है। सीरियस कन्फ्यूजन है।
और ही होते हैं हालात सियासत में
जायज होती है हर बात सियासत में
मोदी दो दिन पहले बिहार के भागलपुर आये थे। उन्होने अपने भाषण में कहा कि बिहार के लोगों से ज्यादा समझदार कोई नहीं। दो दिन पहले वही कह कर आये थे कि वहां जंगल राज आने का खतरा है अगर नीतीश तख्त पर आ गये तो जंगल राज आयेगा ही। उधर नीतीश ने पटना में रैली में कहा, यह अब तक की सबसे बड़ी रैली है। अब कौन बड़ा है यह तो जानने का कोई तंत्र नहीं है। जो आंकड़े दोनों नेता पेश कर रहे हैं अगर उनका विश्लेषण करें तो वोट देने नहीं आई आई टी में पढ़ने चले जाइएगा।
जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये
भागलपुर में प्रधानमंत्री ने कहा कि गया में एक लाख 25 हजार करोड़ का पैकेज घोषित किया, 40 हजार करोड़ मिलाकर एक लाख 65 हजार का पैकेज दिया। वैसे प्रधानमंत्री ने ये ऐलान गया में नहीं आरा में किया था। रैली में कुछ का कुछ बोला जाता है।
बेबसी का इक समंदर दूर तक फैला हुआ
और कश्ती कागजी पतवार के साये में है
14वें वित्त आयोग ने बिहार को पांच साल में तीन लाख 76 हजार करोड़ देना तय किया है। मेरा (मोदी का ) एक लाख 65 हजार करोड़ का पैकेज अलग है। नीतीश कुमार का कहना है कि 2 लाख 76 हजार करोड़ का पैकेज तो कुछ नहीं है। दिल्ली से जो मिलेगा उसमें से भी कम दे रहे हैं। बाकी पैसा कहां जाएगा। एक लाख 8 हजार करोड़ कहां जाएगा। प्रधानमंत्री जी दनादन आंकड़े दे रहे हैं , अभी पैसे नहीं दिये पर जो नहीं दिये उसे भी गिन रहे हैं। वे मान रहे हैं कि दे दिये और उस रकम से नीतीश कुमार ने 1 लाख 8 हजार करोड़ उड़ा लिये। गड़बड़ या कन्फ्यूजन तब होता है जब मोदी पॉलिटिकल होते हैं तो नीतीश टेक्निकल हो जाते हैं। नीतीश का कहना है कि संघीय व्यवस्था में जो बिहार का हिस्सा तय है वो तो मिलेगा ही। तो वैसी परिस्थिति में इस बात का उल्लेख करना कि 5 साल में पौने चार लाख करोड़ हम देंगे और उसी में मोदी जी ने जोड़ लिया कि 2 लाख 70 हजार करोड़ तो दे दिया। अब बचे 1 लाख 8 हजार करोड़, वो कहां से आयेगा। यही नहीं, पिछले पखवाड़े खबर आयी कि बिहार के 21 जिले पिछड़े हैं और उनके लिए टैक्स में छूट की अधिसूचना जारी कर दी गयी है। उस सूची में पटना भी है। पटना के अलावा वैशाली, समस्तीपुर, मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार, मुजफ्फरपुर, अररिया, जहानाबाद, नालंदा और गया का भी नाम है। जिन 21 जिलों के नाम जारी हुए हैं उनमें से कई जिले पिछले सत्रह-अठारह साल से बैकवर्ड जिलों में ही हैं।
जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गाँव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में
यही नाम 1997 में जारी हुए 123 वैकवर्ड जिलों की सूची में भी हैं। गुजरात के कई जिले आज भी पिछड़े जिलों में आते हैं जो 1997 की सूची में थे। जैसे बनासकांठा और साबरकांठा। वैसे 26 जिलों के विकसित गुजरात के 11 जिले पिछड़े जिले में आते हैं। 1997 से ही टैक्स छूट के जरिये इन जिलों में राष्ट्रीय सम विकास योजना के तहत उद्योगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। लेकिन यह खबर ऐसे दी गयी कि लगा कि कोई नया फैसला हुआ है।
खुद को जख्मी कर रहे हैं गैर के धोखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बांकपन तक ले चलो
बिहार ही क्यों भारत सरकार के लघु एवं उद्योग मंत्रालय की साइट पर जाइये और देखिये वहां कई राज्यों के पिछड़े जिलों की सूची मिल जायेगी। उसमें आप पाएंगे कि आंध्र प्रदेश के 14 जिले, बिहार के 18 जिले , गुजरात के 11 जिले , कर्नाटक के 11, मध्यप्रदेश के 36 जिले औद्योगिक रूप से पिछड़े जिलों की सूची में शामिल हैं। तो फिर बिहार के लिए ऐसी घोषणा करने का मतलब क्या है ? अगर इन आंकड़ों पर चुनाव हुए तो जिस बिहारी को सबसे समझदार आदमी कह रहे हैं मोदी वह मतदाता के रूप में क्या साबित होगा यह आप समझ सकते हैं।
आँख पर पट्टी रहे और अक्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक्त का यूं मर्तबा आला रहे

एक हाई प्रोफाइल मर्डर मिस्ट्री


2 सितम्बर 2015
इन दिनों एक मर्डर मिस्ट्री सुर्खियों में है। इलेक्ट्रानिक और अंग्रेजी मीडया तो लगता है कि इसके प्रति दीवाना हो गया है। अटकलबाजियों का ऐसा दौर चल रहा है जिसे कहा जा सकता है कि ‘लव, वार और ब्रकिंग न्यूज में हर बात जायज है।’ पिछले एक हफ्ते से देश के हर मीडिया के लिये यह प्रमुखतम खबर बन गयी है। अपनी ही बेटी के कत्ल के इल्जाम में फंसी इंद्राणी की गुत्थी अब भी बेहद उलझी हुई है। सारे तार लंदन के पैसे की दुनिया से जुड़े हुए हैं। पीटर ब्रितानी पासपोर्ट वाले हैं। इंद्राणी और उसके पूर्व पति संजीव खन्ना से पैदा हुई विधि लंदन में ही रहती है और लंदन ही वह शहर है जहां पीटर और इंद्राणी उस दौर में वक्त काट रहे थे जब उनकी कंपनी की जांच चल रही थी। लंदन से एक बड़ा पैसा रूट होकर इंद्राणी की कंपनी में लगा और इसके बाद वह धीरे-धीरे गायब होता रहा। निवेशकों ने बड़े धोखे की बात कही थी। अब यह आपराधिक मामला अदालत में जाएगा, मुकदमा चलेगा और कौन जानता है कि कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद एक और किताब आ जाएगी कि फैसले में क्या खराबी है और कैसे जज ने गलती की है। क्योंकि अविरूक सेन की किताब ‘आरूषि’ ने यही चलन स्थापित कर दिया है। इसलिए अब बहस के बिंदु अपराध क्षेत्र में नहीं हैं। इनका संबंध हम से है। एक समाज, लोकतंत्र, वित्तीय दिग्गजों के कामकाज और हमारे समाचार माध्यमों की दशा से है। इससे एक परिवार में हुई त्रासदी, फिर वह चाहे कितनी ही जटिल और चकराने वाली क्यों न हो, लतीफे की तरह नज़र आने लगी और वह पारिवारिक मनोरंजन का विषय बन गई। यह मामला हमारे समाज के बारे में क्या बताता है? हम अपने टीवी पर ऐसी सस्ती चीजें देखना पसंद करते हैं, लेकिन इस पर नाक-भौं भी सिकोड़ते हैं और जो पत्रकार हमारे लिए ये लाते हैं उनका मजाक उड़ाते हैं। ‘ऑनर किलिंग’ भी हमें विचलित नहीं करते, क्योंकि यह तो गरीब, ज़ाहिल, गांव वाले अपने बच्चों के साथ करते हैं। लेकिन हमारे जैसे लोग? नहीं, नहीं। यही वजह है कि आरूषि के पालकों ने कभी अपनी बच्ची को नहीं मारा होगा, फिर अदालत चाहे जो कहे। केवल हरियाणा व पश्चिमी उत्तरप्रदेश के जाट ‘सम्मान’ के लिए अपनी बेटियों की हत्या करते हैं। और इंद्राणी ने ऐसा किया है तो शायद इसलिए कि वे आकर्षक, लालची, सत्ता की भूखी, छोटे शहर की ऐसी लड़की है, जिसकी महत्वाकांक्षाएं बहुत ज्यादा हैं। बेशक कुछ हकीकतें होतीं हैं और कुछ कहानियां थोड़े से रहस्य। वे रहस्य और कहानियां इतनी बार दोहरायी जातीं हैं कि हम उन्हें सच समझने की धारणा पाल लेते हैं। यही सच इंद्राणी मामले में है कि यह एक हाई सोसाइटी मर्डर केस है। इंद्राणी के इंद्रजाल में से हर पल नई कहानियां नुमाया हो रही हैं। हर कहानी रस में डूबी, हमारी हर ‘इंद्रिय’ को मदहोश कर देने वाली, दिल से दिमाग़ तक न जाने कितने तारों को झनझना देने वाली। और हमारी हर मांग की पूर्ति को अपना परम कर्तव्य समझने वाली टीवी की ख़बरिया दुनिया हमें बता रही है कि अब इंद्राणी ने सैंडविच खाया, अब उसने कुल्ला किया, क़त्ल के वक़्त शीना गर्भवती थी: सूत्र और उसके कुछ घंटे बाद- देखा, हमारी बात सही निकली, वह वाक़ई गर्भवती थी। बस यह नहीं बता रही कि सैंडविच ग्रिल्ड था या चिकन। बार-बार घूम फिरकर कत्ल का राज पैसे के लेन-देन पर ही आकर अटक रहा है। इंद्राणी ने सबसे पहले पैसे का लालच अपने पूर्व पति संजीव खन्ना को दिया। संजीव को इंद्राणी ने बीते कुछ वक्त में मोटा पैसा दिया था। इस लेन-देन के सबूत पुलिस के पास हैं। इंद्राणी ने पैसे से ही अपने ड्राइवर की वफादारी खरीदी। एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि वह चौथा शख्स कौन था, जिसे हत्या की पूरी हकीकत मालूम थी ? जाहिर सी बात है ड्राइवर और संजीव खन्ना तो हो नहीं सकते क्योंकि दोनों शामिल थे और दोनों को लगातार पैसा मिल रहा था। इंद्राणी का सवाल ही नहीं उठता। राहुल मुखर्जी तो अपनी जिंदगी में शीना की फाइल ही बंद कर चुका था। इस बात के भी पर्याप्त सबूत हैं कि उसने यह जानना बंद कर दिया था कि शीना कहां और कैसे गायब हो गई। तो फिर चौथा आदमी कौन था ? यह वही शख्स है जिसने पुलिस को पहली सूचना दी। कहीं लिव इन रिलेशनशिप वाला एस दास तो नहीं।पुलिस जिस केस की जांच अभी-अभी दिखा रही है दरअसल उस पर पिछले तीन महीने से काम हो रहा था। बहुत सारे सबूत गिरफ्तारियों से पहले ही जुटा लिए गए हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि उस चौथे आदमी का क्या फायदा हो सकता था इस राज को खोलने से ? क्या पूरा केस इसलिए खुला क्योंकि कहीं पैसे के लेन-देन का कोई एक बड़ा पेंच अटक गया था ? क्या इंद्राणी कुछ पैसा देने से इंकार कर रही थी जिसके चलते यह पूरी फाइल खोल दी गई ? पुलिस की कहानियां कहती हैं कि उसे किसी अंजान शख्स ने यह सारी जानकारी दी और वह केस को फॉलो करती चली गई। जब भी ऐसे मामले होते हैं तो मीडिया तथा हमारा समाज लगातार यही कहता है कि हाई सोसाइटी में ऐसा कैसे हुआ, ऐसा नहीं होना चाहिये। इस दशा में हमें यह समझना होगा कि जब किसी कमजोर क्षण में व्यक्ति अपराध करता है तो हर ऐसा व्यक्ति(अपराधी) समान होता है : डरा हुआ, लालची, कमजोर, मूर्ख, घटिया, जातिहीन और दोषी। अपराध की गंभीरता कम करने वाले कोई तथ्य नहीं होते।एच जी वेल्स ने लिखा है कि हर अपराध अंत में समाज के प्रति अपराध होता है।

Wednesday, September 2, 2015

हड़ताल की प्रासंगिकता



2 सितम्बर 2015

आज वामपंथी यूनियनों सहित देश की अन्य ट्रेड यूनियनों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल है। हालांकि , भारतीय मजदूर संघ ने इस हड़ताल से खुद को अलग कर लिया है। बीएमएस ने हड़ताल में शामिल नहीं होने की घोषणा करते हुए अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी इससे अलग रहने की अपील की है। आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के महासचिव गुरुदास दाससगुप्ता ने कहा कि विनिवेश और श्रम कानूनों में बदलाव का विरोध करेंगी यूनियनें। दासगुप्ता ने कहा कि ‘इस मुद्दे पर सभी यूनियनें एकमत हैं और वे एकजुट बनी रहेंगी।’ उन्होंने कहा कि यूनियनें विनिवेश कार्यक्रम और श्रम कानूनों में बदलाव का विरोध करेंगी, क्योंकि इससे श्रमिकों के हित प्रभावित होंगे। सीटू के महासचिव तपन सेन ने भी इसी तरह की राय जाहिर की। उन्होंने कहा कि श्रम कानूनों में सुधार ‘श्रमिकों पर गुलामी’ थोपने जैसा होगा। इसके पूर्व सरकार के साथ हुई बैठक में आल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर, आल इंडिया सेंट्रल काउंसिल आफ ट्रेड यूनियन्स, भारतीय मजदूर संघ, हिंद मजदूर सभा, हिंद मजदूर संघ, इंटक, लेबर प्रोग्रेसिव फेडरेशन, नेशनल फ्रंट आफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स, सेल्फ इंप्लायड वुमेन्स एसोसिएशन, ट्रेड यूनियन कोर्डिनेशन सेंटर और यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस के प्रतिनिधि भी शामिल थे। ट्रेड यूनियनों की ओर से सरकार को 12 सूत्रीय मांग पेश की गई जिसमें बढ़ती कीमत से बचाव, श्रम कानून प्रवर्तन, ठेका श्रम, न्यूनतम वेतन तथा सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी मांगें शामिल हैं। ट्रेड यूनियन नियमित कर्मचारियों के लिए उपलब्ध वेतन और सेवा शर्तों के समान अनुबंध पर काम कर रहे कर्मचारियों के लिए वेतन और सेवा शर्त की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी इस मांग को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है, ट्रेड यूनियनों की मांग है कि न्यूनतम वेतन को देश भर में 15,000 रु महीना किया जाए, जो फिलहाल अभी विभिन्न राज्यों में 5,000 से लेकर 9,000 रु तक है। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने कहा कि प्रधानमंत्री ने श्रम मुद्दों को सुलझाने के लिए जेटली की अध्यक्षता में अंतर-मंत्रालयी समिति गठित की है। ‘केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ औपचारिक और अनौपचारिक बैठकें हुई हैं। उन्होंने 12 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा।’

इस ट्रेड यूनियन हड़ताल में , जैसा कि सभी ट्रेड यूनियन हड़तालों में हुआ करता है , वामपंथी ट्रेड यूनियनों का वर्चस्व है। वर्तमान हालात और अर्थव्यवस्था में हड़ताल का रुख कुछ अजीब सा लगता है लेकिन इस व्यावहारिकता से वाम पंथ का कभी वास्ता नहीं रहा। बंगाल के उद्योगों का खात्मा का भी यही कारण था। वामपंथी विचार इन दिनों अव्यावहारिक हो चुके हैं या फिर उन्हें दूसरे दलों ने अपना लिया है। कम्पीटेटिव रेडिकलिज्म जैसा जुमला अब केवल वामपंथी नहीं रहा, दूसरे दल भी उसकी वकालत करने लगे हैं। नरेंद्र मोदी द्वारा इस्पात संयंत्रों को चलाये रखने के लिए उनमें निवेश का निर्णय तो वामपंथी विचार के अनुरूप है। एफ डी आई का वामपंथियों द्वारा विरोध किया जाना एक तरह से विदेशनीति है और इससे स्वदेशी जागरण मंच की नीतियों की महक आती है। वामपंथ इन दिनों अजीब संकट में है। इसके नेता एेसे बेवजह के आंदोलनों में जुड़े दिखते हैं जिनकी कोई व्यावहारिकता नहीं है। पिछले हफ्ते वामपंथी दलों की रैली इसी का उदाहरण थी। रैली में शामिल लोगों को और कुछ ना दिखा तो बेचारे पुलिस वालों पर लगे पत्थर फेंकने। वे इसकी व्यर्थता समझ नहीं पाये। वामपंथी दलों के बुढ़ाते नेता और जंग लगे अप्रयोजनीय संगठन ,जो इसके मंद पड़ने का मुख्य कारण है, आज भी उसी अवस्था में हैं। ये लोग आधुनिक समाज की अपेक्षाओं तथा अर्थव्यवस्था के दबावों के बारे में कुछ भी जानने की कोशिश ही नहीं कर रहे हैं। कहने को तो वामपंथी दलों तथा विचारधाराओं की ग्लोबल अपील है पर बमुश्किल यह आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप हो पा रही है। नतीजतन भारत में वामपंथी राजनीति पुरानी और बाधक बन गयी है। अमरीका या पूंजीवाद इनकी नजर में दुनिया की सभी समस्याओं की जड़ हैं पर चीन चाहे जो करे वह इनकी निगाह में सही है। इससे पता चलता है कि भारतीय वामपंथ कैसे अतीत के शिकंजों में जकड़ा हुआ है। बहुत कम उम्मीद है कि भारतीय वामपंथी दल देश के तकनीकी तरक्की करने की उम्मीद से भरे नौजवान वर्ग को आकर्षित करे। वामपंथी दलों को फिलहाल चाहिये कि वे किसी के साथ , मसलन कांग्रेस के साथ ही, जुड़ कर सियासत के व्यूह को भेदने का प्रयास करें। लेकिन वे अकेले ही लड़ने की जिद में हैं। इस हड़ताल से क्या नुकसान होगा इसका तो आकलन बाद में होगा पर यह समय भारत को जगाने का है और भारत बंद जैसे प्रयास अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हैं।

Tuesday, September 1, 2015

धर्म आधारित आंकड़े डरावने नहीं



27 अगस्त 2015

जनगणना के धर्म आधारित ताजा आंकड़ों के अनुसार 2001 से 2011 के बीच 10 साल की अवधि में मुस्लिम समुदाय की आबादी में 0.8 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और यह 13.8 करोड़ से 17.22 करोड़ हो गयी, वहीं हिंदू जनसंख्या में 0.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी और इस अवधि में यह 96.63 करोड़ हो गयी। जनगणना के आंकड़े एकत्रित करने के चार साल से अधिक समय बाद मंगलवार को धर्म आधारित आंकड़े जारी किये गये वहीं जाति आधारित जनगणना के आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं किये गये हैं। राजद, जदयू, सपा और द्रमुक तथा अन्य कुछ दल सरकार से जाति आधारित जनगणना जारी करने की मांग कर रहे हैं। जनसंख्या के सामाजिक आर्थिक स्तर पर आंकड़े तीन जुलाई को जारी किये गये थे। लेकिन अगर आंकड़ों को बारीकी से देखें तो दोनों सम्प्रदायों के जन्मदर या आबादी के बढ़ने की दर में गिरावट के लक्षण हैं। भारत में पिछले 10 सालों में हिंदुओं और मुसलमानों की आबादी बढ़ने की रफ़्तार में गिरावट आई है। ऐसा भारत में जनसंख्या में बढ़ोतरी की दर में आई कमी की वजह से हुआ है। हिंदू, मुस्लिम ही नहीं, ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन, इन सभी समुदायों की जनसंख्या वृद्धि की दर में गिरावट आई है। भारत में जनगणना हर दस साल में होती है। साल 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 16.76प्रतिशत रही जबकि 10 साल पहले हुई जनगणना में ये दर 19.92प्रतिशत पाई गई थी। जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ देश में हिंदुओं की आबादी 96.63 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 79.8 प्रतिशत है। वहीं मुसलमानों की आबादी 17.22 करोड़ है, जो कि जनसंख्या का 14.23 प्रतिशत होता है। ईसाइयों की आबादी 2.78 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 2.3प्रतिशत और सिखों की आबादी 2.08 करोड़ (2.16 प्रतिशत) और बौद्धों की आबादी 0.84 करोड़ (0.7 प्रतिशत) है। वहीं 29 लाख लोगों ने जनगणना में अपने धर्म का जिक्र नहीं किया। पिछले एक दशक में जनसंख्या 17.7 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। यानी, देश की कुल आबादी में जुड़ने वाले हिंदुओं की तादाद में 3.16 प्रतिशत की कमी आई है। मुसलमानों की जनसंख्या में वृद्धि की बात की जाए तो उसमें ज़्यादा बड़ी गिरावट देखी गई है। पिछली जनगणना के मुताबिक़ भारत में मुसलमानों की आबादी 29.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी जो अब गिरकर 24.6 प्रतिशत हो गई है। फिलहाल सरकार ने जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी नहीं किए हैं। राजद, जदयू और डीएमके सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं कि वह जातिगत जनगणना के आंकड़े भी सार्वजनिक करे। जनसंख्या के सामाजिक आर्थिक स्तर आधारित आंकड़े इस साल तीन जुलाई को जारी किए गए थे। आंकड़ों के मुताबिक़ 2011 में भारत की जनसंख्या 121.09 करोड़ थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आंकड़ों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ये नियमित जनगणना का आंकड़ा है। ऐसे आंकड़े तो समय-समय पर आते ही रहते हैं। इसमें कोई नई बात नहीं है, ऐसा तो होता ही रहता है। वहीं एनसीपी नेता तारिक अनवर इन आंकड़ों के जारी होने को बीजेपी की चाल करार देते हैं। अनवर ने कहा कि इसमें जरूर बीजेपी की कोई चाल होगी क्योंकि जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की गई थी। लेकिन केंद्र सरकार ने धर्म के आंकड़े जारी कर दिए। अब ये तो सबको मालूम है कि किस धर्म की कितनी संख्या है, लेकिन जब तक जातीय जनगणना के आंकड़े नहीं बताए जाएंगे तो इसका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। संघ विचारक राकेश सिन्हा ने आंकड़ों पर एक के बाद एक कई ट्वीट करते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय जनसंख्या बढ़ाओ की सोची समझी रणनीति से चल रहे हैं। क्या हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएंगे? क्या सचमुच ऐसा संभव है? अगर समाज वैज्ञानिक सिद्धातों को मानें तो कहा जा सकता है शिक्षा और सम्पन्नता का जनसंख्या वृद्धि से व्युत्क्रम आनुपातिक सम्बंध है। एन एफ एच एस के आंकड़े देखें तो पता चलेगा कि शिक्षा का स्तर बढ़ते ही प्रजनन दर काफी गिर जाती और यह रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से भी नीचे चला गया। रिप्लेसमेंट लेवल क्या है? एक महिला और एक पुरुष मिला कर दो हुए। इसलिए यदि वे दो बच्चे पैदा करते हैं तो उनकी मृत्यु के बाद बच्चे उनको आबादी में रिप्लेस कर देंगे। यानी अगर हर दंपति दो बच्चे ही पैदा करता है तो आबादी स्थिर रहेगी। लेकिन चूंकि प्राकृतिक रूप से जन्म दर में लड़कियों की संख्या लड़कों से कुछ कम होती है, इसलिए रिप्लेसमेंट लेवल के लिए प्रजनन दर 2.1 लिया जाता है। तो जब तक जनन दर 2.1 है, तब तक आबादी स्थिर रहेगी। इससे कम जनन दर होने पर आबादी घटने लगती है। यानी शिक्षा के बढ़ने के साथ जनन दर घटती जाती है। मुसलमानों में अशिक्षा और गरीबी की क्या स्थिति है, यह सच्चर कमिटी की रिपोर्ट से साफ हो जाता है। ऐसे में अगर मुसलमानों के पिछड़ेपन के कारणों को दूर करने की तरफ ध्यान दिया जाए तो यकीनन उनकी प्रजनन दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सरकार विकास की रोशनी को पिछड़े गलियारों तक जल्दी से जल्दी ले जाए, शिक्षा की सुविधा को बढ़ाए, परिवार नियोजन कार्यक्रमों के लिए जोरदार मुहिम छेड़े, घर-घर पहुंचे, लोगों को समझे और समझाए तो तस्वीर क्यों नहीं बदलेगी? आखिर पोलियो के खिलाफ अभियान सफल हुआ या नहीं! अतएव इन आंकड़ों से भय की आवश्यकता नहीं है।