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Monday, September 14, 2015

हिंदी है तो हिंदुस्तान है


आज हिन्दी दिवस है। इस अवसर पर जरा कल्पना करें एक चुटकुले की, जिसमें कहा जाय कि 'अड़सठ साल से एक आजाद देश जिसकी कथित तौर पर राष्ट्रभाषा हिन्दी है, उस देश में बड़ा अफसर बनने के लिए सबसे बड़ी योग्यता अंग्रेजी ज्ञान है।’ यह हिंदी दिवस सरकारी तौर पर हिंदी को राजभाषा (राष्ट्रभाषा नहीं) के रूप में स्वीकार करने की सांविधानिक तिथि है। अक्सर यह पूछा जाता है कि हिंदी अगर राजभाषा है तो राष्ट्रभाषा क्या है ?
यह प्रश्न मूलभूत रूप में दार्शनिक है पर उस पर सियासत का पानी चढ़ा हुआ है। अतएव इसके आनुषंगिक विश्लेषण से पूर्व इसके छोटे से समन्वित सांस्कृतिक,ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण पर गौर करें। कैसी हास्यास्पद स्थिति है, आप सोच सकते हैं। जिस दिन लार्ड मैकाले का सपना पूरा होगा और गांधी जी का सपना ध्वस्त हो जाएगा, उस दिन देश सम्पूर्ण तौर पर केवल 'इंडिया’ रह जाएगा। हो सकता है, समय ज्यादा लग जाए, लेकिन अगर भारतवर्ष को एक स्वाधीन राष्ट्र बनना है, तो इन दो सपनों के बीच कभी न कभी टक्कर का होना निश्चित है। अब आप सवाल पूछ सकते हैं कि इस सपने का निहितार्थ क्या है? इसकी चर्चा क्यों? यह एक संस्कृति का स्वप्न है। इस स्वप्न का निर्धारण बहुत हद तक उसकी स्मृतियां करती हैं। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि किसी शब्द में यदि संस्कृति का संकेत है तो स्मृति में उसकी छाया भी। इसलिये कोई भी भाषा, जब तक वह है, कभी मरती नहीं है। यदि हमारे अतीत का सब कुछ मर- मिट जाय तब भी भाषा बची रहती है। जिसके द्वारा एक समाज के सदस्य आपस में संवाद कर पाते हैं। वर्तमान में रहते हुए भी अवचेतन रूप में वे अतीत से जुड़े रहते हैं। इस अर्थ में भाषा का दोहरा चरित्र होता है। वह सम्प्रेषण का माध्यम होने के साथ- साथ संस्कृति का वाहक भी होती है।
भारत के संदर्भ में इस सत्य को केवल दो दार्शनिक - भाषाविदों ने समझा, वे थे हीगल और मैक्समूलर। हीगल ने जहां एक तरफ भारतीय सभ्यता के स्वर्ण युग को दबे खंडहर की संज्ञा देकर वर्तमान को खारिज कर दिया था, वहीं मैक्समूलर ने भारत को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने वाली भाषा संस्कृत को समाप्त करने की साजिश की। मैक्समूलर की कोशिशें कारगर हो जातीं लेकिन 19वीं सदी के ही आखिरी दौर में लुप्त होती सांस्कृतिक अस्मिता ने राष्ट्रीय चेतना को प्रस्फुटित कर दिया। उन्होंने संस्कृत से उद्भूत हिंदी को संवाद का माध्यम के रूप में गढ़ दिया और हिंदुस्तान को जागृत कर दिया। संस्कृत के भीतर जातीय स्मृतियों की एक ऐसी विपुल सम्पदा सुरक्षित थी, जो एक संजीवनी शक्ति की धारा की तरह अतीत से बहकर वर्तमान की चेतना को आप्लावित करती थी। राष्ट्रीयता के बीज इसी चेतना में निहित थे। मैकॉले ने भी इसकी चेतावनी दी थी। जिस वैचारिक स्वराज की बात के सी भट्टाचार्य ने उठायी थी, उसका गहरा सम्बंध एक जाति की भाषाई अस्मिता से था। जिसे हम संस्कृति का सत्य कहते हैं, वह कुछ नहीं, शब्दों में अंतर्निहित अर्थों की संयोजित व्यवस्था है। जिसे हम यथार्थ कहते हैं, वह इन्हीं अर्थों की खिड़की, देखा गया बाह्य जगत है। भाषा के सवाल को लेकर मैकाले भी स्वप्नदर्शी थे, लेकिन उद्देश्य था, अंग्रेजी भाषा के माध्यम से गुलाम बनाना। गांधी जी स्वप्नद्रष्टा थे स्वाधीनता के और इसीलिए उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया। पूरे विश्व में एक भी ऐसा राष्ट्र नहीं है, जहां विदेशी भाषा को शासन की भाषा बताया गया हो, सिवाय भारतवर्ष के। हजारों वर्षों की सांस्कृतिक भाषिक परंपरावाला भारतवर्ष आज भी भाषा में गुलाम है और आगे इससे भी बड़े पैमाने पर गुलाम बनना है। यह कोई सामान्य परिदृष्टि नहीं है। अंग्रेजी का सबसे अधिक वर्चस्व देश के हिंदी भाषी प्रदेशों में है।
भाषा में गुलामी के कारण पूरे देश में कोई राष्ट्रीय तेजस्विता नहीं है और देश के सारे चिंतक और विचारक विदेशी भाषा में शासन के प्रति मौन हैं। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा के सवालों को जैसे एक गहरे कोहरे में ढंक दिया गया है और हिंदी के लगभग सारे मूर्धन्य विद्वान और विचारक सन्नाटा बढ़ाने में लगे हुए हैं। राष्ट्रभाषा के सवाल पर राष्ट्रव्यापी बहस के कपाट जैसे सदा-सदा के लिए बंद कर दिए गये हैं। कहीं से भी कोई आशा की किरण फूटती दिखायी नहीं पड़ती।
इतने के बावजूद भारतीय अंग्रेजी का कद्र क्या है। प्रेमचंद और तुलसी को छोड़िये हिन्दी के दूसरे दर्जे के लेखकों की श्रेणी में भारतीय अंग्रेजी लेखकों को खड़ा कर सकते हैं तो नाम गिनाएं। कैसी विडम्बना है कि बचपन से 6 वर्षों तक ‘सी ए टी कैट’ और ‘आर ए टी रैट रटता’ हुआ बच्चा अपने जीवन के 26-27 साल अंग्रेजी के ग्रामर, स्पेलिंग और प्रोननसिएशन सीखने में लगा देता है और तब भी अशुद्ध उच्चारण और शब्द प्रयोग करता है। भारत के जितने अंग्रेजीदां हैं उनमें से एक प्रतिशत भी ऐसे नहीं हैं जो उसी भाषा में सोचते हों और सीना ठोंक कर कह सकें कि वे उसी स्तर की अंग्रेजी जानते हैं जिस स्तर की हिन्दी एक अच्छी हिन्दी पढ़ा भारतीय जानता है। भारतीय राष्ट्रीय चेतना यदि आरंभ से ही आत्मकेंद्रित संकीर्णता से मुक्त रही तो इसका कारण यह था कि वह आरोपित नहीं की गयी थी। इसके संस्कार पहले से ही सांस्कृतिक परम्परा में मौजूद थे। भारत की विभिन्न बोलियों और भाषाओं में भिन्नता होने के बावजूद एकसूत्रता के तत्व मौजूद थे, जिसके रहते भारत के राष्ट्रीय एकीकरण में कभी भी बाधा नहीं उपस्थित हुई। उनका घर एक ही था, खिड़कियां कई थीं। हिंदी में इन खिड़कियों के अंतर्संबंधों को परखने तथा कायम रखने की क्षमता है। इसीलिये हिंदी हिंदुस्तान की अस्मिता है। हिंदी है तो हिंदुस्तान रहेगा। इसके बगैर एक विखंडित संस्कृति के सिवा कुछ नहीं बचेगा।

Saturday, September 12, 2015

वादे और हकीकत

वादे और हकीकत
इसी हफ्ते प्रधानमंत्री जी ने देश के शीर्ष उद्योगपतियों और बैंकरों की एक मीटिंग बुलाई थी। मंच कुछ ऐसा सजा था मानों बहुत गंभीर वातावरण है। गांभीर्य कुछ इतना गुरु था कि उससे नाटकीयता का गुमान हो रहा था। लेकिन नाटक और अर्थ शास्त्र दोनों अलग अलग होते हैं और स्वभावत: प्रतिगामी होते हैं। नाटक में दिखावा, बनावट कुछ ऐसे होते हैं कि उनसे स्वाभाविकता का बोध होता है। जबकि अर्थ शास्त्र अपनी तासीर में हकीकी फितरत का होता है। हां तो प्रधानमंत्री जी ने मंगलवार को जो बैठक बलाई उसमें उन्होंने अपना तयशुदा भाषण दिया , जो लोकसभा चुनाव वाले हृदयहारी और सम्मोहक भाषण की तरह था। जवाब में भारत के शीर्ष उद्योगपतियों ने भी अच्छी- अच्छी बातें कहीं। वातावरण बेहद खुशगवार था और चेहरे खिले हुये थे , ऐसा महसूस हो रहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था एकदम चुस्त और खुशहाल है। थोड़ा- बहुत यहां- वहां झोल- झाल है उसे सुधार लिया जायेगा। सबलोग आत्ममुग्ध और आत्मतुष्ट थे। अब यह कैसे बताया जाय कि आत्मतुष्टता अर्थव्यवस्था का दुश्मन होती है। क्योंकि इसके चलते कठोर फैसले नहीं लिये जा सकते। नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान अपने तिलिस्मी भाषण में देश की जनता को यह विश्वास दिलाया था कि वे देश की अर्थव्यवस्था की बुनावट और बनावट को सही कर देंगे। उन्होंने कई सुनहरे वादे किये थे। लेकिन सत्ता में आने के 15 महीनों के भीतर सारे वादे सत्ता की ताप से भाप बन कर उड़ गये। जितना कहा था कुछ नहीं हुआ। अब श्री नरेंद्र मोदी उद्योगपतियों और बड़े व्यवसाइयों के ‘दुलरुआ’ नहीं रहे। शायद इसी ‘पहली सी मुहब्बत’ के लिए इस बैठक का आयोजन किया गया था। अर्थ व्यवस्था की सूरत को संवारने के लिए बेहद कठोर फैसले करने होते हैं। इन्हीं कठोर फैसलों में से एक है स​ब्सिडी को घटाया जाना। देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरआत से उद्योगपति इसका सुझाव दे रहे हैं। स​ब्सिडी से मौद्रिक घाटा बढ़ता है और उससे महंगाई को हवा लगती है। जबसे मोदी जी सत्ता में आये तब से उन्होंने इस दिशा में नग्ण्य कार्य किया है। अब ऐसी स्थिति में अगर वे कहते हैं कि स​ब्सिडी घटाई गयी है तो यह आत्म प्रवंचना ही होगी। जो कुछ घटा है वह तेल की दर में वै​श्विक गिरावट के फलस्वरूप हुआ है। दूसरे क्षेत्र में स​ब्सिडी न घटायी गयी है और ना खत्म की गयी है। स​ब्सिडी राज अभी भी कायम है। दूसरे सुधार लागू नहीं किये जा सके क्योंकि संसद चल ही नहीं पायी। संसद के नहीं चल पाने का कारण था एक मंत्री द्वारा पद के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के मामले में प्रधानमंत्री द्वारा कार्रवाई नहीं की जाने के कारण पैदा हुए हालात। भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी की दुंदुभी अब तूती की हास्यास्पद आवाज में बदल गयी है। मोदी जी से अपेक्षा यह थी कि उनकी सरकार चाल , चरित्र और उम्मीदों को पूरा किये जाने के मामले में पूर्ववर्ती यू पी ए सरकार से बेहतर होगी। लेकिन मोदी जी की सरकार यू पी ए सरकार का तीसरा अवतार है और इस अवतार की खूबी है कि यह बोलने में औऱ शब्दों के चयन में उससे बेहतर है। अब उद्योगपतियों के साथ विचार ​​विमर्श के दौरान मोदी ने अपने चिर- परिचित अंदाज में उनसे कहा कि जोखम उठाने की अपनी क्षमता का विकास करें और निवेश को बढ़ाएं। अब देखिये कि मोदी जी ने यह कहीं नहीं कहा कि निवेश को बढ़ाने के क्रम में आने वाली बाधाओं को दूर करने का वह आश्वासन देते हैं। अगर कोई उद्योगपति पूंजी लगाने का जोखिम उठाता है तो यकीनन वह उम्मीद करेगा कि सर्विस टैक्स में छूट मिले, ढांचे की सुविधाएं हासिल हों, लाइसेंस वगैरह की सहूलियत हो , परंतु प्रधानमंत्री जी ने इस बारे में कुछ नहीं कहा। मोदी हैरत जाहिर करते हैं कि एक तरफ विदेशी निवेश बढ़ रहा है तो दूसरी ओर भारतीय उद्योग जगत पूंजी निवेश में अनमना सा लग रहा है। इस ​​स्थिति से ऐसा लगता है कि भारतीय उद्योग जगत और मोदीजी के बीच कहीं ना कहीं संवाद हीनता की ​स्थिति है। दर असल मोदी जी को छोटे तथा मझोले उद्योगों से बात करनी चाहिये क्योंकि वे ही ज्यादातर निर्यातक और रोजगार परक हैं। परंतु वे ऐसा नहीं कर रहे हैं, इससे उनकी मंशा पर संदेह का होना लाजिमी है।

Friday, September 11, 2015

बिहार : सरल नहीं चुनावी गणित


10 सितम्बर 2015
आस्कर वाइल्ड ने कहा है कि‘सफलता एक विज्ञान है और यदि परिस्थितियां हैं तो परिणाम मिलेगा।’ देश की बदली- बदली सियासी फिजां में बिहार के चुनाव की तारिखें घोषित कर दी गयी हैं। पांच चरण के इस चुनाव में सब कुछ वही होगा जो अक्सर होता आया है। वैसे लम्ब चुनावी दौर हमेशा सम्पन्न दलों को लाभ पहुंचाता है। तारीखों की घोषणा के वक्त चुनाव आयोग ने खुद ईद, मोहर्रम, विजयादशमी, दिवाली और छठ पर्वों की चर्चा की और आश्वस्त किया कि सब कुछ ठीक गुजरेगा। राज्य की 243 सीटों के चुनाव को करीब तीन हफ्तों तक खींचने के पीछे आयोग का खास मकसद है। इस बार प्रत्येक पोलिंग स्टेशन पर केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती रहेगी। वोटरों को स्थानीय अराजक तत्वों की दहशत से मुक्त रखने की खास तैयारी है क्योंकि ऐसे मौकों पर लोकल प्रशासन या पुलिस अक्सर बेबस नजर आती है। बिहार के सर्वाधिक चर्चित महागठबंधन, जिसकी अगुवाई नीतीश व लालू कर रहे हैं। इस चुनाव में नीतीश और उनके साथी खुद को 100 और कांग्रेस को 40 सीटें दे रहे हैं। वे ऐसा क्यों कर रहे हैं यह समझ से परे है, जबकि 2010 के चुनाव में लालू फकत 22 सीट ही जीत सके थे उनका वोट भी 18% ही था, साथ ही, कांग्रेस भी सिर्फ 8% वोट के साथ 4सीट ही जीत पायी थी। इन 5 वर्षों मे दोनो ही पार्टियां हाशिये पर ही रही हैं और दोनों पार्टियों के पास कोई चमत्कारिक व्यक्तित्व का नेता भी नहीं है। उधर , मुस्लिम वोटर तीनों ही पार्टियों में बंटेंगे। जितना ज्यादा दलित वोट माझी के साथ शिफ्ट होगा उतना ज्यादा महागठबंधन को ही नुकसान होगा। 2010 में नीतीश और भाजपा साथ मिलकर चुनाव लड़े थे इसलिये अगड़ों का वोट भी नीतीश के साथ था मगर अलग होने के बाद नीतीश के साथ कितने हैं , यह देखना दिलचस्प रहेगा। त्योहारों के मौसम का विशेष फायदा यह मिलेगा कि देश के दूर-दराज इलाके में बसे करोड़ों बिहारी इस मौके पर अपने गांव घरों में मौजूद होंगे और वे उल्लास से अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग भी करना चाहेंगे। प्रवासी बिहारियों की मौजूदगी इस चुनाव के नतीजों में ठीक-ठाक उलटफेर की संभावना बनाएगी क्योंकि बाहर रोजी-रोटी कमाने की नियति इन्हें ऐसे अनुभवों से समृद्ध भी करती है जो परंपरावादी सोच को सफल चुनौती दे सके। बिहार को लेकर देश की सामान्य सोच हमेशा विरोधाभासों में दिखती है। बुद्धिमान लोगों का प्रांत कह कर इसकी तारीफ की जाती है तो छूटते ही ऐसी जगह भी बता दी जाती है जहां जात-पांत बिना कुछ नहीं चलता। यह चुनाव क्या इस विरोधाभास को मिटा पाएगा! मोदी जी ने बिहार के डी एन ए में दोष की बात कह कर जात पांत या बिहार की पुरानी मनोवृत्ति के कायम रहने का संकेत दिया है। जिन लोगों ने बायलॉजी पढ़ी है वे जानते हैं कि डी एन ए यानी ‘डीऑक्सीरीबो न्यूक्लिक एसिड’ , यह अनुवांशिक अच्छाइयां या बुराइयां आगे बढ़ाता है। यानी आसान है, चुनाव का भी डी एन ए होता होगा और उससे चुनाव की मोटे तौर पर रूप रेखा तय होती होगी। लेकिन मोटे तौर पर अगर किसी चुनाव का यही डी एन ए होता है तो बिहार के चुनाव का डी एन ए तो पूरा गड़बड़ा गया लगता है। अब देखिये ना, जो विपक्ष (लालू यादव) पिछले दस साल से सत्ता से बाहर है और उसे सबसे ज्यादा सत्ता की कमियां गिनानी चाहिए, वह मन मारकर सत्ता पक्ष की तारीफ़ कर रहा है। कैसी विडम्बना है कि राजद के हर नेता ने मन में नीतीश कुमार की सरकार की बखिया उधेड़ने के लिए न जाने कितने अलंकारों से सुसज्जित बयान तैयार रखे होंगे, लेकिन सब धरे के धरे रह गए। सियासत की मजबूरी है कि पार्टी प्रमुख लालू यादव ने चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार से हाथ मिला लिया। अब कार्यकर्ता से लेकर प्रवक्ता तक सब चाहें न चाहें, नीतीश जी की तारीफ में जुटे हैं। अब बिहार चुनाव के डी एन ए का एक दूसरा गड़बड़ाया पहलू भी देखिए। दस में से लगभग नौ साल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहे नीतीश कुमार यानी सत्ता पक्ष, अपना काम गिनाने की बजाए ये गिनाने में जुटा है कि प्रधानमंत्री जी ने देश की जनता को कैसे ठगा है और अब बिहार को कैसे ठगने की योजना बना रहे हैं। पर उनकी भी मजबूरी है। नीतीश जी के इन दस सालों की सत्ता में से लगभग आठ साल ऐसे थे जब बीजेपी उनकी सरकार का हिस्सा रही। ये पहला चुनाव है जहां विकास मुद्दा नहीं, क्‍योंकि विकास के पैमाने पर नीतीश और नरेंद्र मोदी दोनों खरे उतरते हैं। दोनों के राजनीतिक करियर में यही एक समानता है कि जब भी इन्हें मौका मिला, इन्होंने अपने नेतृत्व से विकास की एक ऐसी लकीर खींची, जिसके इनके विरोधी भी कायल रहे। तब सवाल है कि आखिर वह कौन सा मुद्दा है जिसने बिहार के चुनावी इतिहास में ऐसा व्‍यक्तिगत और हाई प्रोफाइल, हाई टेक प्रचार अभियान नहीं देखा। आखिर ये कौन सा ऐसा मुद्दा है कि नीतीश कुमार, लालू यादव और कांग्रेसी नेताओं के घर जाते हैं और अपने समर्थकों के तमाम विरोध के बावजूद उन्हें मनमानी सीट भी देते हैं। इसीलिए राजनीतिक रूप से जागरूक माने जाने वाले बिहार के वोटर को समझना होगा कि तकरीबन 61 प्रतिशत की साक्षरता वाले बिहार में, जहां 40 प्रतिशत आबादी तो सीधे-सीधे ये नहीं समझती कि डी एन ए होता क्या है और जो बाकी की 61 प्रतिशत आबादी है उसमें से भी डी एन ए के बारे में जानकारी रखने वालों का भी आंकड़ा बहुत बड़ा नहीं होगा, वहां डी एन ए चुनाव का मुद्दा क्यों बन रहा है या बनाया जा रहा है। चुनाव का डी एन ए भले गड़बड़ा रहा हो लेकिन अगर वोटिंग का डी एन ए नहीं गड़बड़ाए और विकास और सिर्फ़ विकास को देखकर हीं वोट पड़ें तो सब खुद ब खुद सुलझ जाएगा।


भारत-पाक: मामूली गलती भी ले डूबेगी


9 सितम्बर 2015
भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक का हाल ही में रद्द होना, दोनों देशों के बीच ' सांप - सीढ़ी की चाल ' का ही ताजा उदाहरण था। यह एटमी हथियारों से संपन्न दो पड़ोसी मुल्कों के बीच कूटनीतिक खींचतान को भी दिखाता है। हालांकि यह उन लोगों के लिए निराशाजनक हो सकता है जिन्हें इस बैठक से कोई उम्मीद थी, लेकिन आखिरी वक्त पर ऐसा होना आश्चर्यजनक भी नहीं था। बैठक का कार्यक्रम नई दिल्ली में तय करना थोड़ी अलग घटना थी और यह भारत के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की इच्छा का संकेत था। लेकिन इस बैठक का रद्द होना यह भी दिखाता है कि शरीफ पाकिस्तान के अकेले सर्वेसर्वा नहीं हैं। इस बैठक में कश्मीर के मुद्दे को शामिल करने के पाकिस्तान के अड़ियल रुख से साफ था कि जब भारत से जुड़ी कोई बात होती है तो हमेशा की तरह पाकिस्तानी सेना ही वहां फैसला लेती है। पाकिस्तान में यह आम धारणा है कि भाजपा के शासन में भारत खतरनाक़ रूप से आक्रामक हुआ है। बॉर्डर पर हर रोज़ होने वाली गोलाबारी को भी भारत द्वारा उकसावे की कार्रवाई के रूप में देखा जाता है। कई पाकिस्तानी तो यह भी मानते हैं कि भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ उनके सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान में राष्ट्रवादी विद्रोह को बढ़ावा दे रही है। वहीं भारतीय नजरिए की बात करें तो यहां लोगों को लगता है कि 1993 में मुंबई में हुए बम विस्फोट के लिए जिम्मेदार दाउद इब्राहिम को पाकिस्तान ने पनाह दे रखी है। वहीं 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले में सुनवाई भी बहुत धीमे चल रही है। इसके लिए जिम्मेदार कहा जाने वाला संगठन लश्कर-ए-तयबा के प्रमुख जकीउर रहमान लख़वी को जमानत पर छोड़ दिया गया है। इस तरह के आरोप-प्रत्यारोपों से भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी का माहौल और गहराता जा रहा है। जैसे-जैसे गुस्सा बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे शांति की उम्मीद कम होती जाएगी। भारत सरकार में शीर्ष पदों पर मौजूद लोगों के बयानों से लग रहा है कि भारत आक्रामक मूड में है। हमारे सेना-प्रमुख दलबीरसिंह सुहाग ने पिछले हफ्ते आशंका व्यक्त की थी कि पाकिस्तान के आतंकवादियों के कारण कोई छोटा-मोटा या बड़ा युद्ध कभी भी हो सकता है। उधर , पाकिस्तान के सेना-प्रमुख राहील शरीफ ने जवाबी गोला दाग दिया है। हालांकि राहील शरीफ ने भारत का नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा बिल्कुल साफ-साफ था। इसमें शक नहीं कि उन्होंने जो कहा, वह बिल्कुल सच है। उन्होंने कहा कि यदि दोनों देशों के बीच युद्ध होगा तो पाकिस्तान भारत का भयंकर नुकसान कर देगा। भारत किसी गलतफहमी में न रहे। पाकिस्तान उसके मुकाबले के लिए तैयार है। लेकिन राहील शरीफ को क्या पता नहीं है कि पाकिस्तान का भी उतना ही बल्कि भारत से कहीं ज्यादा नुकसान होगा। क्या युद्ध की स्थिति में भारत हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा। नुकसान तो दोनों का ही होगा। पिछले कुछ समय से ऐसा लग रहा है कि भारत कोई भी रियायत देने को तैयार नहीं है क्योंकि उसे लगता है कि पाकिस्तान समस्याओं से घिरा है जल्दी ही हार मान लेगा। दोनों ही तरफ से इस तरह के रवैये से लगता नहीं है कि वे आने वाले समय में दोस्ती नहीं तो सद्भाव से भी रहने को तैयार होंगे। दोनों देशों में ऐसे ताकतवर लोग हैं जो 'युद्ध नहीं, शांति नहीं' की मौजूदा स्थिति को बनाए रखना चाहते हैं। दोनों सरकारों की अपनी - अपनी मजबूरियां हैं। दोनों को अपनी-अपनी मूंछे अपनी जनता के सामने ऊंची रखनी हैं। इसीलिए, इस तरह के भड़काऊ बयान आते रहते हैं लेकिन दोनों देशों के प्रधानमंत्री क्या कर रहे हैं? कितनी बड़ी विडम्बना है, हम एक ‘फ्लाइंग किस’ भेजते हैं। बदले में वे मुस्कुराते हैं। सब ओर खुशियां छा जाती हैं। फिर वे डंक मारते हैं, अक्सर बहुत बुरी तरह से। वे आतंकवादी भेजते हैं, हमारे लोगों को मारते हैं और कश्मीर में उपद्रव खड़े कर देते हैं। हम नाराज हो जाते हैं। बातचीत बंद कर देते हैं। एक नया भारतीय नेता परिदृश्य पर आता है। इतिहास में पाकिस्तान को राह पर लाने वाले व्यक्ति के रूप में दर्ज होने का संकल्प लेकर। हमने फिर ‘फ्लाइंग किस’ भेजा। वे मुस्कराए। डंक मारा। फिर वही दोहराव।दोनों तरफ से बातों के वाण चलने लगते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि दोनों ही देशों का अहं, इतिहास और अंधराष्ट्रवाद उन्हें एक-दूसरे से बातचीत करने से रोकता है। अगर परिपक्वता और सौहार्द नहीं बन पाया तो डर है कि पाकिस्तान और भारत हमेशा ही दुश्मन रहेंगे। दोनों ही देशों के पास परमाणु हथियारों का जखीरा भी मौजूद है जिसके चलते अगर कोई गलतफहमी और गलत अनुमान लगा तो दोनों को ही नुकसान उठाना पड़ेगा।

अब कठिन दिन आने वाले हैं


8 सितम्बर 2015
कहते हैं कि लोहे में जब जंग लग जाती है तो वह कमजोर हो जाता है, उसका लौहपना खत्म हो जाता है। आज यही हालत इस जमाने के भारत के लाैह पुरुष नरेंद्र मोदी का हो गया है। इसके कई सबूत हैं पर अभी हाल के ओ आर पी ओ के बारे में सरकार का फैसला सबसे ताजा उदाहरण है। इसमें शक नहीं कि 42 साल पुराना यह मामला इसीलिए अधर में लटका हुआ था कि एक तो अरबों रुपये का बोझ सरकारी खजाने पर बढ़ जाता और फिर फौज से छोटी उम्र में सेवा-निवृत्त होनेवाले लोग किसी न किसी काम पर लग जाते हैं। अब इस प्रश्न पर भी विचार होना चाहिए कि जवानों को 30-35 साल की उम्र में सेवा-निवृत्त क्यों किया जाए? क्या सेवा—निवृत्ति के बाद भी उनसे कोई काम लिया जा सकता है? इसके अलावा सरकार ने यह जो घोषणा की है, यह भी जल्दबाजी में की है, जैसे कि नगा-समझौते की हो गई थी। इससे यह भी संकेत मिलता है कि इस सरकार में सोच की तंगी है। विचार का टोटा है। या तो यह हड़बड़ी में कुछ भी घोषणा कर देती है या फिर यह प्रचार की इतनी भूखी है कि इसे किसी भी घोषणा की गहराई में जाने का धैर्य ही नहीं है। यह भी कहा जा सकता है कि वे किसी भारी दबाव को झेल नहीं सकते। यही कारण है कि आज मेरा भारत सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। आम जनता के लिए सुशासन का अर्थ है नागरिक सुविधाआें की उपलब्धता। लेकिन किसी को मालूम नहीं कि भारत के गांवों में बिजली कब कट जायेगी और डाक्टर बेवजह कितने टेस्ट लिख देगा। रेलवे टिकट लेने जाओ एक घंटा लाइन मे खड़े रहो फिर भी टिकट नहीं हम चुप हैं। रास्ते खराब हैं हम किसी तरह अपनी कार या बाइक निकाल कर चले जाते हैं, हम चुप है। आये दिन किसी न किसी उत्सव में शोर मचाया जाता है हम चुप हैं। स्कूलों में कितनी भी फीस हम भर रहे हैं लेकिन मास्टर से सवाल पूछने की हिम्मत नहीं की क्लास्सेज जरूरी है क्या। आज के बीस साल पहले क्लासेस का इतना जोर नहीं था कैसे अब्दुल कलाम जैसे लोग इतना महान बने, लेकिन हम चुप हैं। किसी भी ऑफिस में जाओ कोई सुनने वाला नहीं है। किसी की शिकायत करके कुछ नहीं होता है फिर भी हम चुप हैं। क्या हमने सब खुशी हासिल कर ली है .. क्या हमारे अच्छे दिन आ गये। लाखों लोग बिना पानी के किस तरह जी रहे हैं। आज समाचर पढ़ा गरीबी से तंग आकर पांच बच्चों की मा ने आत्महत्या कर ली फिर भी हम चुप हैं। ग्रामीण इलाकों में परिवार नियोजन अब क्यों नहीं समझाया जाता है.. गरीबी खत्म नहीं हो सकती लेकिन कम से कम खाने भर की इनकम तो होनी चाहिये। लेकिन हालात तो कुछ दूसरे दिखायी पड़ने लगे हैं। भारी आर्थिक समस्या का भय व्याप गया है। उस भय को दूर करने के लिये सरकार ने मंगलवार को देश के शीर्ष उद्योगपतियों के साथ विचार विमर्श किया। उधर कहा जा रहा है कि चीनी अर्थव्यवस्था की तंगहाली के बरक्स अमरीका अपने फेडरल रिजर्व के रेट में संशोधन करने वाला है। अगर ऐसा होता है तो दुनिया भर के आर्थिक क्षेत्र में हाहाकार मच जाने की भरपूर आशंका है। उधर , हाल में चीनी संकट का असर भारत पर नहीं होने का दावा रिजर्व बैंक के गवर्नर कर रहे हैं। उनका यह दावा कुछ हद तक सही है क्योंकि भारत से चीन का व्यापार उतना बड़ा नहीं है कि उसका बाजार भारतीय बाजारों को प्रभावित करे। अभी तक यह साफ नहीं है कि आंकड़े क्या कह रहे हैं क्योंकि इनका सामने आना अभी बाकी है। लेकिन चीन एक बड़ा देश है जो विश्व की अर्थव्यवस्था में काफी महत्वपूर्ण बन गया है। आज दुनिया के किसी भी हिस्से में कोई गड़बड़ होती है तो पूरी दुनिया पर उसका कुछ न कुछ असर पड़ता है। यह असर पहले वित्त बाजार पर पड़ता है और उसके बाद व्यापार पर। इसलिए इसे लेकर सबको चिंतित होना चाहिए। जो भी हो रहा है उसे चीन से जोड़ने को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए। विश्व अर्थव्यवस्था में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में चिंता की जानी चाहिए। इनमें यह भी शामिल है कि दरें कब सामान्य होती हैं - फेडरल रिजर्व यह करने वाला पहला बड़ा संस्थान हो सकता है। तो सवाल यह भी है कि ऐसा कब होगा। अभी इस सवाल का उत्तर मिला ही नहीं कि खबर आयी है कि फेडरल रिजर्व संशोधन करेगा। अमरीका में बेरोजगारी दर अप्रैल 2008 के बाद सबसे निचले स्तर पर है। फेडरल रिजर्व ने जुलाई 2006 के बाद से ब्याज दरों में बढ़ोतरी नहीं की है। जुलाई 2006 में इसमें एक चौथाई प्रतिशत की वृद्धि की गई थी और यह 5.25% थी। अमरीका में ब्याज दरें बढ़ने का मतलब है विदेशी संस्थागत निवेशकों का भारत और दूसरे उभरते देशों से पैसा निकालकर अपने देश ले जाना। लोकसभा चुनावों के दौरान अपने चुनाव प्रचार में मोदी ने कहा था कि रुपया तो ‘सीनियर सिटिजन’ हो गया है। लेकिन मोदी के अब तक कार्यकाल में डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 12 प्रतिशत टूट गया है और सुपर सीनियर सिटिजन बनने की ओर अग्रसर है। लेकिन जमीन अधिग्रहण बिल और गुड्स और सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) बिल जिस तरह से अधर में लटके हुए हैं, उससे निवेशकों के भरोसे को धक्का लगा है। ऐसे आम जनता में कुंठा का होना लाजिमी है और यही कुंठा राजनीतिक हेरफेर के लिए डायनामिक्स का काम करती है।

बिहार में वोटरों का विवेक कसौटी पर


7 सितम्बर 2015
बिहार की सियासत की एक भारी ट्रेजेडी है कि वहां से उठी कोई भी राजनीतिक धारा आगे बढ़ कर किसी राजनीतिक समुद्र में समाहित होने के बजाय पहले विभिन्न धाराओं में बंट जाती है और उनसे बने पठार अलग - अलग शक्ति केंद्रों में बदल कर प्रतिद्वंद्वीता बन जाते हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के उद्घोष के बाद कांग्रेस के खिलाफ बनी जनता पार्टी कुछ ही दिनों में खंड - खंड हो गयी। उसके बाद कई तरह के समुच्चय बने पर चल नहीं पाये। इस बार फिर एक महागठबंधन बना। भाजपा या नरेंद्र मोदी को बिहार में धूल चटाने की गरज से तैयार महागठबंधन ‘टेक ऑफ’ करने के पहले ही फुस्स हो गया। इस राजनीतिक घटना से किसी को आश्चर्य नहीं है। इनके पूर्व के राजनीतिक चरित्र के कारण ही इस महागठबंधन के गठन के साथ ही इसके राजनीतिक जीवनकाल को लेकर अटकलें भी लगनी शुरू हो गई थीं, क्योंकि ये सभी दल अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए एकजुट हुए थे। ऐसे में बिहार चुनाव में धर्मनिरपेक्ष मतों में बिखराव रोकने की कोशिश अब नाकाम होती दिख रही है। हर कोई जानता है कि बिहार में सपा और एनसीपी का कोई आधार नहीं है। उनके अलग होने से जदयू, राजद और कांग्रेस गठबंधन को बड़ी क्षति नहीं होने वाली है। किंतु इस बदली राजनीतिक स्थिति के बाद तय हो गया है कि ये दल धर्मनिरपेक्ष मतों में सेंधमारी जरूर करेंगे। भाजपा की कोशिश थी कि किसी तरह वह धर्मनिरपेक्ष मतों को बांट दे, उनमें बंटवारा कर दे और इस नये घटनाक्रम से वह अपने काम में सफल हो गयी। महा गठबंधन से निकले दलों का इरादा बिहार में चुनाव जीतने का नहीं है, बल्कि महागठबंधन को कमजोर करने का है। अब इन दोनों दलों के अलग से चुनाव लड़ने की स्थिति में यादव और मुस्लिम मतों के बंटने की पूरी संभावना है। अगर आप इसके पूर्व के राजनीतिक घटनाक्रमों को याद करें तो देखेंगे कि मुलायम सिंह यादव ने सांसद बर्खास्तगी के मसले पर विरोधी दलों का साथ देने के बजाय उनके विरोध में यह कहते हुए खड़े हो गये कि लोकतंत्र के लिए संसद चलना जरूरी है। उस समय उनके इस राजनीतिक ‘‘चरखा दांव’ को भाजपा के साथ उनकी बढ़ती निकटता के तौर पर देखा गया था। उसके पीछे छिपे राजनीतिक कारण कुछ भी हों। कांग्रेस ने शरद पवार पर भाजपा से सौदेबाजी का आरोप लगाया था। आज महागठबंधन से सपा के अलग होकर चुनाव लड़ने की कहानी के पीछे भी कुछ ऐसा ही कारण माना जा रहा है। इस घटना के पीछे सीबीआई का भय माना जा रहा है। चर्चा यहां तक है कि मुलायम और शरद पवार के पांव अपनों के चलते फंसे हैं कि उन्हें वैसा ही करना पड़ रहा है जो वे कभी चाहते भी नहीं। उनका रिमोट कहीं और है। अपमान और सीटों का मामला तो महज जनता को भरमाने का बहाना है। लालू यादव से समधियाने के रिश्ते से मुंह फेरना यूं ही नहीं है। यह जनता भी समझ रही है। कुछ भी हो पर ये दोनों नेता अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता की जमीन जरूर खोते जा रहे हैं। मुलायम सिंह के लिए यह पहला मौका नहीं है जब उन्होंने अपने फायदे के लिए अपनी राजनीतिक दोस्ती को ताक पर रख दिया है। 2002 के राष्ट्रपति चुनाव में वामदलों से बात किये बिना मुलायम ​सिंह ने अचानक अब्दुल कलाम का नाम प्रस्तावित कर दिया था। इसके बाद 2008 में परमाणु करार को लेकर मुलायम सिंह वामदलों का साथ छोड़कर कांग्रेस के साथ खड़े हो गए थे। इसी तरह 2012 में राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले वे ममता बनर्जी के प्रणव विरोधी रुख को देखते हुए पलट गए थे। इससे ममता पूरी तरह अलग-थलग पड़ गयी थीं। ताजा राजनीतिक घटनाक्रम तो और भी दिलचस्प है। भाजपा को यह मालूम है कि लालू, नीतीश और कांग्रेस के वोटबैंक को विभाजित किये बगैर बिहार में चुनावी फतह आसान नहीं है। इसीलिए उसने नीतीश के वोटबैंक को विभाजित करने के लिए जीतनराम मांझी को अपने साथ लिया, यादव वोटरों को तोड़ने के लिए पप्पू यादव को लालू से अलग किया। राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुनाथ झा सपा में शामिल हो गए हैं। अब सपा लालू से अलग हुए पप्पू यादव और एनसीपी के साथ मिलकर नया मोर्चा बनाकर चुनाव में उतरने वाली है। यह नयी चुनावी रणनीति कितनी सफल होगी यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा। किंतु अभी से ही बिहार में इसे ‘‘वोटकटवा’ के रूप में देखा जाने लगा है। ऐसे में बिहार के मतदाताओं का विवेक एक बार फिर कसौटी पर है।



ओआरओपी भ्रम भी कम नहीं है


6 सितम्बर 2015
वन रैंक, वन पेंशन (ओआरओपी) के लिए बीते करीब चार दशकों से जोर दे रहे पूर्व सैन्यकर्मियों ने शनिवार को उस वक्त आंशिक विजय हासिल की जब सरकार ने ऐलान किया कि वह इस योजना का कार्यान्वयन करेगी। दूसरी तरफ, पूर्व सैन्यकर्मियों ने इस फैसले को खारिज कर दिया और कहा कि उनका 84 दिनों से चला आ रहा आंदोलन जारी रहेगा। सरकार ने ओआरओपी के क्रियान्वयन का फैसला किया है जिसके तहत हर पांच साल पर पेंशन में संशोधन किया जायेगा, लेकिन इसके दायरे में वे सैन्यकर्मी नहीं आएंगे जिन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ले रखी है। पूर्व सैन्यकर्मी दो साल के अंतराल पर पेंशन की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। सरकार ओआरओपी के क्रियान्वयन के विवरण पर काम करने के लिए एक सदस्यीय न्यायिक समिति का गठन कर रही है जो इस ‘जटिल मुद्दे’ के कई पहलुओं की पड़ताल करने के बाद छह महीने में रिपोर्ट देगी। सरकार द्वारा विस्तृत ब्योरा दिये बगैर पूर्व सैनिकों की लंबित मांग को पूरा करने के लिए केवल 500 करोड़ रुपये के आवंटन पर पिछली सरकार पर निशाना साधने के बाद पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी ने ओआरओपी से जुड़ी जानकारियों पर सरकार पर कटाक्ष किये। एंटनी और एक अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल का कहना है कि , ‘ओआरओपी घोषणा बहुत बड़ी निराशा है क्योंकि पूर्व सैनिकों के लाभ के प्रावधानों को बहुत हल्का कर दिया गया है। यह उनके हितों के साथ धोखा है।’ विपक्ष पर वार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि , "जिन्होंने 40-42 साल तक काम नहीं किया, उन्हें बोलने का क्या हक है?फैशन चल पड़ा है कि जब सरकार कोई भी बड़ा काम करती है तो कुछ लोग उसका विरोध करते हैं। जिन्हें जनता ने रिजेक्ट कर दिया, वो लोग देश को आगे बढ़ने नहीं देना चाहते।’’ हालांकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी नेताओं ने ‘ऐतिहासिक’ फैसले का श्रेय लिया और कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के प्रचार के दौरान पूर्व सैनिकों से किया वादा पूरा किया। इसके तहत समान रैंक पर रिटायर हुए सभी सैनिकों और सैन्य अधिकारियों को समान पेंशन मिलेगी। उदाहरण के तौर पर 1996 में रिटायर हुए सैन्य अधिकारी को 2006 में उसी रैंक पर रिटायर हुए अधिकारी के बराबर पेंशन मिलेगी। सरकार का फ़ैसला जो मुख्य है वह है ओआरओपी का फायदा एक जुलाई 2014 से लागू किया जाएगा। ओ आरओपी साल 2013 के आधार पर निर्धारित की जाएगी। रक्षा मंत्री के मुताबिक वन रैंक वन पेंशन यानी ओआरओपी लागू करने से 9000-10,000 करोड़ रुपए ख़र्च होंगे। यह ख़र्च भविष्य में और भी बढ़ेगा।
पेंशन हर पांच साल में निर्धारित की जाएगी। पूर्व सैनिकों का कहना है कि वन रैंक वन पेंशन उनका अधिकार है। जो सैनिक स्वेच्छा से रिटायरमेंट (वीआरएस) लेते हैं उन्हें ओआरओपी नहीं मिलेगा। इनमें युद्ध में घायल होने के कारण रिटायर होने वाले सैनिक शामिल नहीं।
लेकिन रविवार को प्रधानमंत्री ने हरियाणा के फरीदाबाद में दिए एक भाषण में कहा कि वन रैंक वन पेंशन लागू करने में वीआरएस कोई मुद्दा नहीं है, पेंशन सभी को मिलेगी। इससे पहले पूर्व सैनिकों के नेता मेजर जनरल (रिटायर) सतबीर सिंह का कहना है, "सरकार ने एक ही मांग मानी है और छह मांगे नकार दी हैं। प्रदर्शन जारी रखने के सिवा और कोई विकल्प नहीं है।" बढ़ी हुई पेंशन चार अर्धवार्षिक किस्तों में अदा की जाएगी। सैनिकों की विधवाओं को बढ़ी हुई पेंशन एक किस्त में ही दी जाएगी। सरकार के मुताबिक सिर्फ एरियर देने पर ही 10-12 हजार करोड़ खर्च होंगे। रिटायर होने वाले कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखने के लिए एक सदस्य न्यायिक आयोग गठित किया जाएगा। ओआरओपी लागू होने से करीब 25 लाख पूर्व सैनिकों और सैनिकों की छह लाख विधवाओं को फायदा होगा। लेकिन इस फैसले को लेकर काफी विभ्रम है। हालांकि सरकार के पास अब इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था कि वह इसे किसी नतीजे पर पहुंचाए। वे सरकार में हैं। उन्हें तय करना चाहिए कि क्या सबसे अच्छा है और अपने नागरिकों को क्या देना देश के लिए मुमकिन है। फैसले से कई लोग नाखुश हैं पर हर वेतन आयोग की सिफारिशों पर भी बहुत से लोग नाखुश होते हैं। इसके बाद सरकार को मीडिया के माध्यम से जल्द से जल्द सैन्य समुदाय को पेंशन के नए नियमों के ब्योरे समझाने चाहिए। साफगोई से बातें न रखना सबसे खतरनाक तरीका है। और याद रखें, देश ने नरेंद्र मोदी को जबर्दस्त समर्थन इसलिए दिया, क्योंकि उन्होंने निर्णायक सरकार का वादा किया था।