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Thursday, October 8, 2015

विकास का ये बहाना क्यों


8 अक्टूबर
महाभारत में यक्ष और युधिष्ठिर के बीच हुए संवाद में यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया कि दुनिया में सबसे मूल्यवान क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- समय। वस्तुतः समय ही किसी भी स्थिति घटना या विचार की सकारात्मकता और नकारात्मकता को तय करता है। कहा जा सकता है कि सकारात्मकता एक सापेक्ष अवधारणा है। वह दिक और काल के संदर्भ में ही व्याख्यायित होगा। यानी समय, परिस्थिति और स्थान के सदर्भ से काटकर अगर उसे देखेंगे तो वह एक लुजलुजा-सा पद बनकर रहा जाएगा। अब दादरी कांड को ही लें। यह एक साम्प्रदायिक उन्माद का उन्मेष था, ऐसा ही कुछ वाराणसी में भी हुआ। बेशक दोनो के कारण अलग- अलग थे , लेकिन चरित्र एक ही था। इन घटनाओं को भाजपा नेताओं ने यह कह कर नजर की ओट कर दिया कि यह सब सरकार के विकासात्मक कार्यो को छोटा बनाने की साजिश है। मोदी जी ने भी कहा कि ये सब से अलग मेरा लक्ष्य केवल विकास है। लेकिन यहां सवाल उठता है कि विकास और साम्प्रदायिकता की तुलना कितनी वाजिब है। क्या डिजीटल इंडिया के कारण आयी आधुनिकता देश की पारम्परिक संवेदनाओं और भावुक संवेगो की प्रतिगामी है। इस अवसर पर एक वाकया याद आता है। चरखे या स्वदेशी आंदोलन में विदेशी कपड़ों और सामान की होली जलाने को लेकर महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच हुई असहमति और वाद-विवाद को याद किया जा सकता है। (टैगोर इसे पश्चिम से दिल और दिमाग के स्तर पर अलगाव तथा आध्यात्मिक आत्मघात मानते थे। चरखे से बुनाई पर उन्होंने कहा कि जो लोग दूसरे काम के योग्य हैं, उनके द्वारा चरखे पर सूत कातने से क्या भला होगा।) इसमें रवींद्रनाथ का पक्ष सकारात्मक लग सकता है और गांधीजी की कार्रवाई नकारात्मक। तर्क के स्तर पर चाहे रवींद्रनाथ गलत नहीं थे, लेकिन बाद के इतिहास ने गांधीजी के आंदोलन को ज्यादा सही सिद्ध किया। सही से ज्यादा देश के लिए सार्थक भी। भारत वह नहीं है, जो हम सोचते हैं। यह हमारी सर्वाधिक विचित्र कल्पनाओं से भी परे है। एक शक्तिशाली और हिंदू राष्ट्र भाजपा का भारत है, जिस पर केंद्र से ताकतवर व ईमानदार नेता आसानी से शासन कर सकता है। जिस भारत में हम रहते हैं वह ठीक इसके उलट है। केंद्र जितना ही ताकतवर होता है, राज्य उतने ही बेकाबू होते जाते हैं। यदि आप इतिहास पर नजर डालें तो आपको हमेशा ऐसा ही होता दिखाई देगा। राष्ट्र के जटिल संघीय ढांचे और अत्यंत स्वतंत्र क्षेत्रीय दलों को ठीक से संभाल लेना ही भारत पर शासन करने की कुंजी है। केंद्र की ज्यादातर सरकारें अपने शुरुआती उत्साह में यह तथ्य भूल जाती हैं। जब तक उन्हें इस तथ्य का अहसास होता है, काफी देर हो चुकी होती है।मोदी सरकार के साथ दिक्कत यह है कि यह एक साथ कई चीजें करने की कोशिश कर रही है और यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें सफल हो रही है। यह राजनीतिक अनुभवहीनता का चिह्न है, नाकामी का नहीं। भारत पर शासन चलाना आसान नहीं है। हमारी समस्याओं को मात देना ऐसा ही है जैसे रक्त बीज राक्षस का नाश। उत्तर आधुनिकता के एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण चिंतक जाॅक देरिदा के कथन को समझें तो शायद नकारात्मकता तथा सकारात्मकता और समय के संबंध को समझने में ज्यादा सही दृष्टि मिल सकती है। जाॅक देरिदा का मानना है कि ‘चरम निराशा की अवस्था में भी किसी उम्मीद की आकांक्षा समय के साथ हमारे रिश्ते का एक अभिन्न अंग है। नाउम्मीदी, इसलिए है, क्योंकि हमें उम्मीद है कि कुछ अच्छा और सुंदर घटित होगा। मुझे लगता है कि सकारात्मकता से ज्यादा सार्थकता पर बल दिया जाना चाहिए। ’ इतिहास में इसका एक बड़ा दिलचस्प उदाहरणहै। स्वाधीनता संग्राम में भगत सिंह द्वारा संसद में बम फेका जाना ही नहीं महात्मा गांधी का करो या मरो जैसा आंदोलन भी अपने ध्वन्यार्थ में नकारात्मक है, लेकिन इतिहास इन दोनों ही घटनाओं की व्याख्या सकारात्मक रूप से ही करेगा। इसलिए कई बार लगता है कि सकारात्मकता और नकारात्मकता वस्तुतः ताकत के खेल के रूप में अपना अर्थ ग्रहण करते हैं। यह पद एक ऐसा औजार है, जिससे सत्ता हर घटना की व्याख्या को अपने पक्ष में मोड़ लेने की कोशिश करती है। यहां जो सबसे बड़ी गड़बड़ी है वह है कि नागरिकों को सत्ता यह मानने पर मजबूर करती​ है कि ‘साम्पदायिकता या फासीवाद या कम्युनिज्म विकास का प्रतिगामी है।’ 1930 के बाद के काल में तीन नेता फ्रैंकलिन रूजवेल्ट, हिटलर और स्टालिन ने अपने अपने देश में विकास के कीर्तिमान स्थापित किये। इसलिये यह कहना सही नहीं होगा कि ​विकास केवल लोकतंत्र में ही संभव है। किसी दलदल भरे तालाब के किनारे कंगन लेकर बैठने वाले शेर की कथा नहीं है लोकतंत्र, यह शेर और बकरे के एक साथ रहने और फलने फूलने की व्यवस्था है। सबसे बड़ी जरूरत है कि हमारे समय में, जो कुछ भी हाशिये पर धकेल दिए गए मनुष्य के पक्ष में है, वही सार्थक है और वही सही अर्थ में सकारात्मक है तथा विकास के लिये आदर्श स्थिति है।

Wednesday, October 7, 2015

आखिर हम चुप क्यों रह जाते हैं



 7 अक्टूबर
इन दिनों देश में एक अजीब किस्म का सामाजिक परिवर्तन हो रहा है। समाजशास्त्र में अभी तक इस परिवर्तन को परिभाषित नहीं किया जा सका है। वह परिवर्तन है, प्रतिक्रियावादी और रूढ़िवादी ताकतों का संयुक्त उभार, साथ ही सम्प्रदायवाद और जातिवाद का पृथक्करण। इसके लिये हम दो स्थितियों पर चर्चा करेंगे, पहला गुजरात में हार्दिक पटेल का आंदोलन और दूसरा दादरी कांड। 90 के दशक में देश में मंडल और बाबरी कांड हुए थे, इन्हें भी जातिवादी और धर्मवादी सियासत के चौखटों में फिट कर दिया गया था। लेकिन उस वक्त दोनों दो काल खंड में हुये थे तब भी दोनों को स्पष्ट कारणों और दलीलों के आधार पर अलग- अलग बांट दिया गया था और दोनों से अलग अलग तरीके से निपटने की कोशिशें हुई थीं। आज घटना बेशक एक ही कालखंड में हुई है पर इन्हें भौगोलिक आधार पर पृथक मानने की सियासत हो रही है , जबकि दोनों एक ही​ स्थिति की उपज हैं, वह है समाज को रूढ़िवादी सांचे में ढालने के एजेंडे को कामयाब करने का प्रयास। दोनों घटनाओं का प्रतिफल देखें तो आसानी से कह सकते हैं कि हिंसा, भीड़ का हिंसक कृत्य है। राजनीतिज्ञों को छोड़ दें, आप खुद से पूछें कि आप हैं कौन? आपकी अलग पहचान क्या है? क्या आप वो भीड़ हैं जो किसी अकेले को निशाना बना कर मारती है। या सामाजिक सुविधाओं के लिए निर्मित ढांचों को जला डालती है। क्योंकि , भीड़ में आप खुद को ताकतवर महसूस करते हैं, जो अकेले में नहीं महसूस करते। आपके अंदर के जानवर को छूट मिल जाती है नफरत व क्रूरता का नंगा नाच नाचने के लिए। मन के किसी कोने में कोई छोटी सी आवाज आपको बताती है कि जो आप कर रहे हैं गलत है लेकिन भीड़ कुछ और कह रही है और इस भीड़ से अलग आप में हिम्मत नहीं है। आप शायद उन लोगों में से हैं जो आते- जाते सड़क पर किसी आवारा कुत्ते को लात मार कर संतुष्टि से मुस्करा लेते होंगे। आप सिर्फ और सिर्फ डर से बमुश्किल इंसान होने का ढोंग रचा रहे हैं। ध्यान दें कि , इस बार के आंदोलन में पटेल समुदाय की युवा पीढ़ी के लोग ज्यादा शामिल हैं। वे कहते हैं, "इन्हें शिक्षा तो मिलती है नौकरियां नहीं। सरकारी नौकरियां तो हैं ही नहीं। ये गुस्सा इनके मन में चला आ रहा था।" ये हालात तो आज से पहले भी थे पर इस तरह के गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं दिखी। गुजरात में जाति प्रथा पहले से मौजूद है। "गुजरात में जाति प्रथा का हाल ये है कि अब भी 116 जगहों पर दलितों को प्रोटेक्शन मिला हुआ है।" ये आंदोलन वही चला रहे हैं जो सांप्रदायिक भी हैं। "आदिवासी विरोधी, महिला विरोधी, दलित विरोधी और अल्पसंख्यक विरोधी होना गुजरात के मध्यम वर्ग के बहुसंख्यकों का सोच है। जब 1985 का आंदोलन शुरू हुआ तो ये आरक्षण विरोधी था लेकिन बाद में अल्पसंख्यक विरोधी हो गया।"गुजरात में आम धारणा ये है कि राज्य सरकार ने हार्दिक पटेल की रैली का पर्दे के पीछे से पूरा साथ दिया। रैली की इजाजत दी गई जबकि यह जाहिर है गया था कि हिंसा भड़क सकती है। रैली के लिए दिए गए सरकारी मैदान का किराया नहीं लिया गया। ऐसा ही कुछ दादरी में हुआ। मंत्री ने प्रतिक्रिया जाहिर की , भीड़ का बचाव किया। यही नहीं एक तरफ सरकार बूचड़खाने खोलने के लिए लाइसेंस देती है और दूसरी तरफ इसी नाम पर लोग काट दिये जाते हैं। लेकिन क्यों, आम आदमी क्यों चुप रह जाता है? पता नहीं भीड़ के कारनामे को आप सही मानते हैं या गलत क्योंकि आप कुछ कहते नहीं तो किसी को पता नहीं। आप भी निश्चिंत हैं क्योंकि हर चीज का जवाब होगा आपके पास कि हमने तो कुछ कहा तक नहीं। यही तो बात है, कहा तक नहीं। सही मान रहे हैं तो भी डर, गलत मान रहे हैं तो भी डर। एक कदम आगे तो भी डर, एक कदम पीछे तो भी डर। ध्यान रखिएगा कहीं डर से ही किसी दिन जान ना चली जाए, वो जान जिसे इतना सहेज रहे हैं।

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध

Tuesday, October 6, 2015

बिहार: अब जंग लड़नी है तुझे



6 सितम्बर

बिहार में चुनाव के पहले जब चर्चे चल रहे थे यही समझा गया था कि बिहार अब बदल चुका है और वहां अब वह सब नहीं होगा जो होता आया है और जिसके लिए बिहार अबतक बदनाम होता रहा है। लेकिन अभी जो देखने- सुनने को मिल रहा है उससे तो लग रहा है कि बिहार की राजनीति एक अजीब किस्म की हो गयी है। राजनीति शास्त्र में या समाजशास्त्र में ऐसा उदाहरण अभी तक देखने को नहीं मिला है। जैसा कि महसूस हो रहा उससे लगता है कि बिहार में चुनाव चाहे मोदी जीतें या नीतीश लेकिन हारेगी बिहार की जनता ही। इतना जरूर है की नेताओं के साथ साथ जनता का जातीय , धार्मिक तथा क्षेत्रीय अहम भी जीत जाता है और यही जीता हुआ अहम पूरे 5 साल तक अपने सेवक(नेता पढ़ें) के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता रहता है । 70 साल बीत जाने के बाद भी लोग नही समझ पाये की सत्ता पाने के बाद न कोई दलित रहता है और न ही हिन्दू या मुसलमान। सब उस गिरोह मे शामिल हो जाते हैं जहां दिन रात उस उपाय पर चिंतन होता रहता है की इस कुर्सी को अगली बार के लिये बरकरार कैसे रखा जाय।

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख

घर अंधेरा देख, तू आकाश के तारे न देख।

गौर करें बिहार इस समय सार्थक सवालों के गलियारों से गुजर रहा है। ये प्रश्न उठ रहे हैं कि संघ- भाजपा वाले लालू राज को जंगल राज और लालू अपने राज को मंडल राज बता रहे हैं। सच्चाई क्या है? क्या सच वह है, जो लालू बोल रहे हैं या सच वह है, जो संघ-भाजपा वाले बोल रहे हैं। संघ-भाजपा वाले दावा कर रहे हैं कि वे जंगल राज खत्म करेंगे। लालू गुजरात दंगे का हवाला दे रहे हैं। संघ को ब्राह्मण की संस्था बता रहे हैं। इसी बीच दादरी की घटना देश के सामने आई। देश के सामने यह सच्चाई आई कि मंदिर से पुजारी ने अफवाह उड़ाई। इसके बाद मारपीट हुई। जान गयी। केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा उनके बचाव में उतरे और इस संपूर्ण सुनियोजित सांप्रदायिक हिंसा को महज एक हादसा बता दिया। लालू के समर्थक इस पूरे घटना-क्रम को ‘नफरत-राज’ के रूप में देख रहे हैं और लोगों को दिखा रहे हैं। बिहार के मतदाता सोच रहे हैं कि सच कौन बोल रहा है। सच्चाई क्या है ? क्या बिहार के चुनाव की लड़ाई हो गई है - ‘जंगल राज’ बनाम ‘नफरत राज।’ भाजपा के नेता ढोल पीट रहे हैं कि वे ही जंगल राज खत्म करेंगे। क्या नफरत के रास्ते जंगल राज खत्म होगा ?

मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है

सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है

अब यह सवाल उठता है कि एक तरफ नफरत जात के नाम पर है, तो दूसरी तरफ धर्म के नाम पर। जो भी जीते वह यही सोचने में मशगूल रहेगा कि अगली बार कैसे कायम रहेंगे। लिहाजा , सब चाहते हैं की जनता को 2 रुपया किलो खाद्यान्न , कंबल ,साड़ी ,सायकिल देकर अकर्मण्य बनाये रखा जाय।

हुकूमत मुंह-भराई के हुनर से खूब वाकिफ है

ये हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है

आप सोचिये ना कि एक नेता विधायक का चुनाव लड़ने के लिए करोड़ रुपये से ज्यादा क्यों खर्च कर रहा है। जबकि सब जानते हैं कि रुपये ना पेड़ पर फलते हैं और ना मुफ्त में मिलते हैं। कुछ तो कारण होगा , कुछ तो मिलता होगा इस खर्चे के बाद जो उस करोड़ रुपये से ज्यादा होगा। एक बार मंदिर निर्माण के नाम पर यहां हिंसा भड़की थी। महागठबंधन के लोग कहते हैं कि इस बार एक नेता अपने पुत्र के भविष्य निर्माण के लिए ऐसा करवा रहे हैं। बिहार के लोग सहमे हैं। अफवाहें जोर-शोर से उड़ रही हैं। सद्भाव बिगाड़ने की साजिश चल रही है।

तवायफ की तरह अपने गलत कामों के चेहरे पर

हुकूमत मंदिरों-मस्जिद का पर्दा डाल देती है

कुछ सिद्धांत ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत दूर तक खींचना उनकी भावना के प्रतिकूल चला जाता है। भाजपा नेतृत्व की यह घोषणा कि बिहार में उसकी सरकार बनी तो मुख्यमंत्री अगड़ी जाति का नहीं, बल्कि पिछड़ी जाति का होगा, कुछ ऐसी ही है। यह दुश्मन के हथियार से ही दुश्मन को मात देने की कोशिश है। इससे साबित होता है कि अवसरवाद के रास्ते पर हमारी पार्टियां कितनी दूर तक जा सकती हैं। जाति एक ऐतिहासिक सच्चाई है। लेकिन यह मान लेना कि किसी खास राज्य का विकास कोई पिछड़ा नेता ही कर सकता है, एक ऐसा अंधविश्वास है जिसने भारतीय राजनीति को बहुत नुकसान पहुंचाया है। बिहार की जनता लगातार 70 साल से हार रही है , अतएव बिहार के लोगों को बिना किसी के हार-जीत का ध्यान दिये मतदान करना चाहिये । हो सकता है इस बार जीत जाय !

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,

कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।

इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं



5 सितम्बर

देश में दादरी कांड इन दिनों छाये हुआ है। सभी सियासी रंग और जमात के लाेग अपनी गोटियां बिछा रहे हैं। कोई कह रहा है कि खानपान को लेकर बंदिशें हो रहीं हैं और कोई खनपान की पवित्रता के नाम पर खून खराबे को हवा दे रहा है और कोई सेकुलर भारत का रोना रो रहा है। पूरी कवायद को दखें तो ये नेता दादरी कांड में मरे हुए लोगों की लाशों पर वोटों की फसल उगाने में लगे हैं। यह भी एक विडंबना है कि उधर वे फेसबुक के अमरीका स्थित ऑफिस में लिखते हैं -‘अहिंसा परमो धर्मः’ और इधर उनके भक्त एक बूढ़े को बेवकूफाना अफवाह के चलते पीट-पीट कर मार देते हैं! वाह क्या गजब का तालमेल है भगवान और भक्तों के बीच!! परसाई जी का एक लेख था ‘’ आवारा भीड़ के खतरे’उसमें उन्होंने लिखा था कि ‘दिशाहीन और हताश युवकों की भीड़ दिग्भ्रमित होती है, जिसका प्रयोग खतरनाक विचारधारावाले महत्वाकांक्षी लोग कर सकते हैं।’ आज यही भीड़ लगातार बढ़ रही है। राष्ट्रवाद के नाम पर इन्हें दिग्भ्रमित किया जा रहा है। परसाई ने सही कहा था कि भारत सिर्फ ढाई विचारधाराओं वाला देश है, कांग्रेस की गांधीवादी विचारधारा, कम्युनिस्ट विचारधारा और आधी सोशलिस्ट विचारधारा। आज इसी ढाई विचारों के सोच पर ‘औना-पौना’ छद्म राष्ट्रवाद हावी हो गया है। यह कांग्रेस की बहुत बड़ी हार है कि जिसने इतने साल शासन में होने के बावजूद गांधी और नेहरू के विचारों को पोषित नहीं किया। यह तो भला हो अन्य पश्चिमी विचारकों का जिन्होंने गांधीवाद को जिंदा रखा। हमारे देश की विडम्बना है कि दादरी कांड हो या कोई और, मीडिया में कुल मिलाकर हत्या की कहानी कुछ इस तरह से पेश होती है कि अपराधी का ‘‘निश्चय’ होने की जगह ‘अपराध’ का ‘मैनेजमेंट’ होने लगता है। यह अपराध शास्त्र की​ एक नयी व्याख्या सामने आ रही है। हम आजकल इसी का अभ्यास देख रहे हैं। दादरी की कहानी इसी तरह बन रही है। कलबुर्गी की हत्या हो, पंसारे की या दाभोलकर की हत्या या कि ऐसी और हत्याएं, वे सब मीडिया पर देर-सबेर खबर बनी हैं और पहले उन्होंने अपराधी की ओर उंगली उठाई है। लेकिन ऐसी हर हत्या एक-दो दिन खबर बनी रही है। हर हत्या की आलोचना हुई है और आलोचकों ने हत्यारों को पकड़ने, सजा देने की गुहार की है । उन्होंने कहा कि जनतंत्र का वध करने वाली शक्तियां बढ़ रही हैं, अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा बढ़ रहा है इत्यादि । लेकिन जितना समय इस आलोचनात्मकता को मिला है उतना ही समय हत्या के पक्षकारों को दिया गया है। वे भी उन हत्यारों को डिफेंड करने सामने आते रहे हैं। ऐसे पक्षकार गजब के प्रतिभाशाली और कुतर्की होते हैं: अपराधी पकड़े तक नहीं गए होते लेकिन उन कथितों का बचाव पहले किया जाने लगता है। वे ऐसे अंतर्यामी हो जाते हैं कि जिन ‘‘अनामों’ पर शक किया जा रहा है, उन्हीं ‘‘अनामों’ को वे डिफेंड करने लगते हैं कि वे बेकसूर हैं और उनके खिलाफ राजनीति हो रही है। ऐसी बातों से ऐसा लगने लगता है कि जिसकी हत्या की गई है शायद वही अपराधी है! तर्क के आगे कुतर्क भारी होने लगता है। अपराधी को संदेह का लाभ मिलने लगता है। मसलन ,राजद अध्यक्ष और पूर्व मुख्यंमत्री लालू प्रसाद यादव ने भाजपा पर साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि आरक्षण और सामाजिक न्याय की धारा की गोलबंदी से डरी भाजपा और मीडिया का एक वर्ग खानपान जैसे मुद्दों के पीछे मुंह छिपा रहा है। यादव ने अपने ट्वीट के जरिए शनिवार को एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा पर करारा प्रहार किया और कहा, ‘‘मोदीजी, रहन सहन, खान पान और आस्था के बिन्दुओं पर फसाद करने की राजनीति बंद करो। इसके तुरंत बाद अपने दूसरे ट्वीट में राजद सुप्रीमो ने लिखा,‘‘मीडिया का एक वर्ग भाजपा से मिलकर दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के मुद्दों से ध्यान भटकाने की चेष्टा कर रहा है। जब तक ऐसे मामलों में आम जनता धर्म से ऊपर उठकर नहीं सोचेगी, तब तक ये रुकने वाला नहीं है । यह घटना बता रही है कि हमारे समाज में धार्मिक कट्टरता बढ़ती जा रही है और आप अन्य घटनाओं को भी देखेंगे तो जातीय कट्टरता भी बढ़ रही है । ऐसी हरकतों से पूरे देश की पूरे विश्व में बदनामी हो रही है । ऐसी बदनामी की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती है, शायद इसका अन्दाजा इन घटनाओं में शामिल लोगो को नहीं होता । हैरानी की बात है कि कुछ शक्तिशाली देश आसमान से बम गिराकर शांति लाना चाहते हैं और आतंकवादियों के नाम पर निर्दोष नागरिकों को अपना शिकार बना रहे हैं । धार्मिक कट्टरता की कितनी भारी कीमत ये देश चुका रहे हैं इसका अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता ।

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,

हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं ।

हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष देश है और रहना भी चाहिये, क्योंकि वर्तमान में सिर्फ धर्मनिरपेक्ष देश ही कायम रह सकते हैं और धर्म के आधार पर बनने वाले देशों का हाल तो पाकिस्तान,सीरिया,इराक और अफगानिस्तान जैसा ही होता है । हमें हर प्रकार से किसी भी धर्म की धार्मिक कट्टरता को रोकना है, क्योंकि इसी में देश का हित है। हम फिक्रमंद हैं कि तिरंगे पर दस्तखत किए गए, लेकिन किसी का राष्ट्रवाद दादरी में गलत शुबहे के चलते एक निरीह वृद्ध की हत्या और बेटे की पिटाई पर जागता नहीं ? वाह फिर भी हम देशभक्त हैं। संविधान कहता है हम धर्म निरपेक्ष राष्ट्र हैं। पर, हमारी राजनीति स्वयं ही संविधान की विरोधी है। धर्म निरपेक्षता की सरकारी और राजनैतिक व्याख्या क्या है आम आदमी को नहीं पता किन्तु आम आदमी जो समझता है वह है कि भारत में जन्मे प्रत्येक व्यक्ति का एक ही धर्म है और वह यह है कि वह भारतीय है। एक बात समझ लें कि -‘मैं श्रेष्ठ हूं’ यह आत्मविश्वास होता है लेकिन ‘मैं ही श्रेष्ठ हूं, यह अहंकार होता है।’ आज के हालात देख कर तो यही लगता है ,

चीड़-वन में आंधियों की बात मत कर,

इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं ।

Saturday, October 3, 2015

बिहार में भाजपा का विजन ?


 3 अक्टूबर
बिहार में चुनाव की गहमा गहमी शुरू हो चुकी है। प्रचार में माहिर भाजपा ने एक अक्टूबर को विजन डॉक्यूमेंट जारी किया। इसमें लम्बे- चौड़े वायदे किये गये हैं। यह कुछ ऐसा लग रहा है कि कहा जा रहा हो कि ‘रोटी नहीं मिलती है तो यार केक खाओ ना।’इसमें मुफ्त में स्कूटी, लैपटॉप, टीवी और कपड़े देने का वादा किया गया है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे विकास पत्र बताया। इसमें 'मेक इन बिहार' और 'डिजिटल बिहार’ का नारा भी दिया गया है। इसमें हिंदुत्व पर भी काफी जोर दिया गया है। विजन डॉक्यूमेंट में ‘गो-पालन निदेशालय’ की स्थापना से लेकर धर्मांतरण रोकने के लिए प्रभावी कानून बनाने का वादा किया गया है। चूंकि हमारे देश में घोषणापत्र का ब्रांड पिट चुका है। लिहाजा पिछले कुछ चुनावों से घोषणापत्र को विजन डाक्यूमेंट जैसे भारी भरकम नाम से दोबारा लॉन्‍च किया जा रहा है। विजन डाक्यूमेंट में घोषणापत्र जैसी वचनबद्धता नहीं होती है। रूपरेखा के नाम पर चमकदार वादे को ही सजाया जाता है जो पहले घोषणापत्र में होता था। बीजेपी के विजन डाक्यूमेंट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर है। विजन डाक्यूमेंट में बीजेपी ने एक लाख पैंसठ हजार करोड़ के पैकेज को दो चार लाइन में ही निपटा दिया है। पैकेज का विस्तार से कोई ब्यौरा नहीं है। भाजपा ने अपने पैकेज को विश्वसनीयता प्रदान करने का एक बड़ा मौक़ा गंवा दिया है। विजन डाक्यूमेंट पढ़ कर पता नहीं चलता कि एक लाख पैंसठ हजार करोड़ में से सब खर्च होगा या उसमें किए गए वादों के लिए अलग से बजट बनेगा।दृष्टि पत्र के नाम से हर दल यही प्रयास रहता है कि मीडिया में कुछ ऐसे बिन्दु ज्यादा लोकप्रिय हो जाएं जिनसे वोट खींचा जा सके। जैसे स्कूटी, लैपटॉप और साड़ी-धोती देना। विजन डाक्यूमेंट में लिखा हुआ है कि हर दलित महादलित टोले में एक रंगीन टीवी दिया जाएगा लेकिन मीडिया ने चलाया कि हर दलित और महादलित को रंगीन टीवी मिलेगा। बीजेपी को बताना चाहिए कि बिहार में ऐसे टोलों की संख्या कितनी है और कितने टीवी सेट लगेंगे। छोटा टीवी मिलेगा कि बड़ा। लगता है टेलीविजन देने के लिए विजन डाक्यूमेंट बनाया गया है। बीजेपी ने विज़न डाक्यूमेंट में कहा है कि पहली बार बिहार में किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हुए हैं। गैर सरकारी दावों के अनुसार गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में लाखों की संख्या में किसानों ने आत्महत्या की है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े देखिये तो 2014 में बिहार में एक भी किसान आत्महत्या का जिक्र नहीं है। बीजेपी ने अपने विज़न डाक्यूमेंट में कहा है कि खेती के लिए अलग से बजट पेश होगा। समय पर ऋण वापस करने वालों को शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर खेती के लिए कर्ज दिया जाएगा। हर किसान को हेल्थ कार्ड दिया जाएगा। केंद्र में सोलह महीने के बाद भी लोकपाल का पता नहीं लेकिन बिहार के विजन डाक्यूमेंट में बीजेपी ने लोकपाल जैसी किसी संस्था की बात तो की है मगर हैरानी हुई कि लोकपाल शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है। विजन डाक्यूमेंट में कहा गया है कि- भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी की स्थापना करेंगे। इसकी एक यूनिट का गठन हर जिले में होगा। नए सतर्कता कोर्ट की स्थापना करेंगे ताकि भ्रष्टाचार के मामलों का निपटारा हो सके। रंगे हाथ रिश्वत पकड़े जाने पर समय सीमा के तहत दंडित किया जाएगा। बिहार विशेष न्यायालय एक्ट जिसके तहत भ्रष्टाचारियों की संपत्ति ज़ब्त की जाती है उसे प्रभावी बनाया जाएगा। भ्रष्टाचार के नियंत्रण के लिए टोल फ्री नंबर की शुरुआत होगी। क्या भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी लोकपाल है या कोई अन्य संस्था है। बिहार में लोकायुक्त है। बीजेपी और नीतीश दोनों ने अपने विजन डाक्यूमेंट में नए उद्यमियों के लिए 500 करोड़ के वेंचर फंड की बात कही है। दोनों के एजुकेशन लोन में कुछ तीन परसेंट का चक्कर है। विजन डाक्यूमेंट में हिन्दी का जिक्र नहीं है लेकिन बीजेपी अंग्रेजी और संस्कृत के अलावा फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश और अरबी सिखाने का वादा कर रही है। जिन मदरसों में अरबी सिखाई जाती है उन्हीं को लेकर कितना राजनीतिक बवाल खड़ा किया जाता है लेकिन यह अच्छा है बीजेपी ने अरबी को महत्व दिया। इन सब भाषाओं के लिए बिहार में शिक्षक कहां से आएंगे? अंग्रेजी का मुद्दा इस चुनाव में बिहार की आकांक्षा की जीत है। शायद सबको पता है कि एक आम बिहारी अंग्रजी की कितनी अहमियत समझता है। वो हिन्दी समर्थन के नाम पर राजनीतिक ढोंग की असलियत जानता है। आप विजन डाक्यूमेंट जरूर पढ़ें और इसी आधार पर अपना मत बनाएं। जरूरी है अपना मत बनाना ताकि विजन डाक्यूमेंट पर गंभीरता से बहस हो सके और राजनीतिक दलों पर सीरियस होने का दबाव बढ़ें।

Friday, October 2, 2015

प्रसंगहीन नहीं हैं गांधी


गांधी पर किसी कवि ने लिखा है कि,

बिजली बन के थी शमशीर चली

पर आप आप ही मुकर गयी

कहते हैं, गांधी के सीने में जाकर

तलवार स्वंय ही टूट गयी

हां, इतिहास गवाह है कि बुद्ध के बाद इस दुनिया में दो ऐसे लोग पैदा हुये थे जिन्हें कोई आदमी खारिज नहीं कर सकता। बेशक उनके विचारों को मानें या ना मानें। वे दो इंसान थे- गांधी और मार्क्स। यहां बहात केवल गांधी की है। वर्तमान समय में गांधी के संदर्भ में दो तरह के मत हैं, एक गांधी को व्यर्थ कहने वाले और दूसरे गांधी का व्यवसाय करने वाले। गांधी को आदर्श मानने वालों का अभाव हो चुका है अपने देश में। जबकि , अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गांधी की स्वीकार्यता और प्रासंगिता तेजी से बढ़ रही है। पिछले वर्ष विख्यात टाइम पत्रिका ने गांधी के नमक सत्याग्रह को दुनिया का अबतक का सबसे प्रभावशाली आंदोलन कहा था। गत वर्ष अमरीका में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफ्रीकी महाद्वीप के 50 देशों के युवा नेताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि आज के बदलते परिवेश में युवाओं को गांधी जी से प्रेरणा लेने की जरूरत है। एक ताकतवर देश के राष्ट्रपति द्वारा हिंसा भरे माहौल में महात्मा गांधी की प्रासंगिकता का उल्लेख किया जाना निश्चय ही गांधी की विश्वव्यापी स्वीकार्यता को ध्वनित करता है। पिछले वर्ष विज्ञान भवन में राष्ट्रमंडल देशों के लोकसभा अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के एक सम्मेलन में जांबिया की नेशनल असेंबली के अध्यक्ष असुमा के. म्वानामवाम्बवा ने न केवल गांधी के सिद्धांतों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी, बल्कि यहां तक कहा था कि भारत के साथ हम भी महात्मा गांधी की विरासत में साझीदार हैं। यह उन भारतीयों के लिए एक सबक है, जो गांधी के आदर्शो और मूल्यों पर प्रहार करने से बाज नहीं आते। वैश्विक स्तर पर गांधीवादी मूल्यों की बढ़ रही प्रासंगिकता और उनकी अहिंसा की अवधारणा की विश्वव्यापी स्वीकार्यता उन लोगों के लिए एक सबक है, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि में जाकर गांधी को अनर्गल आक्षेपों व तर्कहीन तथ्यों के सहारे दोषी ठहराते देखे जाते हैं। उन लोगों को भी विचार करने की आवश्यकता है, जो भारतीय समाज के निमार्ण में गांधी की भूमिका को शंका की दृष्टि से देखते हैं। हां, उन लोगों को संबल जरूर मिला होगा, जो इस बात को लेकर आशंकित हो उठे थे कि वर्तमान भारत में गांधी की प्रासंगिकता और उनकी आदर्शवादिता कमजोर पड़ती जा रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता से सिद्ध हो गया है कि अभी गांधी और उनके विचारों से देश के लोग दूर नहीं हुए हैं। संतोष की बात यह है कि गांधी विरोध से कई गुना अधिक वेग से गांधी के दर्शन और विचार महाद्वीपों को लाघंते जा रहे हैं। क्या अमरीका और क्या अफ्रीका, शायद ही कोई ऐसा देश हो, जो आज गांधी के अहिंसा संबंधी विचारों को अपना हथियार न बनाना चाह रहा हो। हिंसा भरे वैश्विक माहौल में गांधी के विचारों की ग्राह्यता बढ़ती ही जा रही है। जिन अंग्रेजों ने विश्व के हर कोने में यूनियन जैक लहराया था और भारत में गांधी की अहिंसा को चुनौती दी थी, आज वे भी गांधी के अहिंसा संबंधी विचार व आचरण अपनाने की बात कर रहे हैं। इस तथ्य पर ध्यान दें कि गांधी मानते थे कि ‘मनुष्य इसलिए मनुष्य है कि उसमें विवेक है पर उसका विवेक कोरा तर्क वाला नहीं है। मनुष्य की अपनी अंतर्ध्वनि भी है, अंतरात्मा भी है जो सबमें है। जो साझी भी है और सबकी अलग-अलग भी। इसलिए बिना अंधानुकरण किए खुद अपने ढंग से सोचना जरूरी हो जाता है।मनुष्य की स्वायत्ताता और स्वतंत्रता एकांगी नहीं होती।’ आज हमें चुनने की स्वतंत्रता है। एक समय था जब परंपरागत समाज हमें पूर्वनिश्चित दायित्व में बांधता था और दूसरे की आशाओं-अपेक्षाओं के अनुरूप बनने के लिए कहता था, पर आज का आधुनिक मन इन सबमें नियंत्रण की बू देखता है और इसलिए उसे छोड़ने लगा, नकारने लगा। पर स्वतंत्रता मिली क्या? आज एक नया और भयानक दबाव है। वह दबाव है बाजार के बढ़ते वर्चस्व का जो हमारे काम-धाम, ज्ञान-विज्ञान, नाते-रिश्ते और जीवनशैली यानी सब कुछ तय करने लगा है। वह झूठी दिलासा जरूर दिलाता है कि तुरत-फुरत सब मिल जाएगा और अबाध सुख की गारंटी ऊपर से है। नियंत्रण के उपाय, औजार आज और तेज और नुकीले हो गए हैं। इस सबके बावजूद दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जब-तब गांधी के सामाजिक-राजनीतिक योगदान पर बेवजह वितंडा खड़ा किया जाता है। उनकी सहृदयता और मानवतावादी दृष्टिकोण को अपनाने के बजाय उनपर सियासत की जाती है। हालिया वर्षो में गांधी के राजनीतिक-सामाजिक योगदान को लेकर जिस गति से क्रिया-प्रतिक्रिया तेज हुई है, उससे तो यही लगता है कि हम गांधी की विरासत के सच्चे वारिस हैं भी या नहीं। राजनीतिक जमात और छद्म समाजसेवियों के लिए गांधी एक बेजोड़ ब्रांड बन चुके हैं और उनके नाम पर जमकर राजनीतिक लाभ लिया जा रहा है। देखा जा रहा है कि सत्ता प्राप्ति की छटपटाहट में कुछ राजनीतिक दलों ने तो उनके विचारों का मानो कॉपीराइट करा रखा है। वे यह सिद्ध करने की कोशिश करते रहते हैं कि गांधी और उनकी विचारधारा पर सिर्फ उन्हीं का एकाधिकार है। लेकिन सुखद बात यह है कि गांधी के स्वार्थी समर्थक और विरोधी दोनों ही अपने-अपने मतलब के लिहाज के बावजूद किसी न किसी रूप में उन्हें प्रासंगिक बनाए ही हुए हैं। गांधी की विचारधारा और उनके मूल्यों में आस्था न जताने वाले लोगों की बातें तो समझ में आती हैं, लेकिन गांधीवादी मूल्यों को सर्वाधिक क्षति उन लोगों द्वारा पहुंचाई जा रही है, जो उनके कथित अनुयायी बने हुए हैं। इन स्वार्थी किस्म के राजनीतिक अनुयायिओं ने अपने को गांधी का असली वारिस मान लिया है। लेकिन उन्हें गांधी के अंतिम पांत के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा नहीं दिखाई दे रही है ,ऐसे में गांधी सोचने को मजबूर करते हैं कि हम अपने स्वभाव को फिर से पहचानें, शायद कोई रास्ता निकल आए। यही बात गांधी को आज भी प्रसंगहीन नहीं होने दे रही है।

Thursday, October 1, 2015

कल और आज से पता चलेगा आनेवाला कल

1 अक्टूबर
मोदी सरकार की इस अवधि की उम्र एक चौथाई पार हो चुकी है। सरकार के अगुवा नरेंद्र मोदी ढेर सारे सुधारों का वादा कर के सत्ता में आये। उन्होंने सीना तान कर कहा कि जो सुधार कांग्रेस नहीं वह वे करेंगे। यहां सवाल उठता है कि क्या 15 महीनों के अपने शासन काल में उन्होंने ऐसा कुछ किया? बेशक कांगेस ने बहुत थोड़े से वायदे किये थे और बहुत थोड़ा किया। पर भाजपा ने तो कुछ नहीं किया। मसलन कांग्रेस ने ढांचागत सुधार किया, निजीकरण के गति दी। पर इसने ऐसा कुछ नहीं किया। कांग्रेस के पास तो अतीत की बाध्यताएं और वाद का बोझ था पर भाजपा के कंधे पर तो ऐसा कुछ नहीं था। लेकिन भाजप का शोर घनघोर था पर किया क्या इसने?1947 के बाद गांधी चाहते थे कि कांग्रेस को भंग कर दिया जाय। क्योंकि इसका उद्देश्य देश को आजाद कराना था जो पूरा हो गया। हां एक बात थी कि गांधी उस दौर के कांग्रेस के सर्वमान्य नेता थे। जिसने उनका विरोध किया वह ठीक से काम नहीं कर सका। लेकिन आजादी के बाद कांग्रेस कायम रही और इसने उसके आदर्शों के साथ दगा किया। कांग्रेस इंदिरा गांधी की पार्टी बन गयी- कांग्रेस (आई)। नेहरू ने लोकतंत्र के पहिये में छेद कर दिया। सारे ढांचे, अवस्थापनाएं और संस्थाएं सरकार के तहत ले आये। इस्पात बनाने वाले कारखाने का प्रमुख आई ए एस अफसर बन गये। लिहाजा बदइंतजामी बढ़ती गयी। खामियाजा भुगतना पड़ा नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को। जीप घोटाले से लेकर कोल घोटाले तक में कांग्रेसी शामिल पाये गये। कश्मीर पर जनमत संग्रह के अव्यवहारिक वादे ने पड़ोस में स्थई मुश्किल खड़ी कर दी। चीन से रिश्ते के गलत आकलन ने देश को जंग की आग में झोंक दिया। लेकिन इन सबके बावजूद नेहरू को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिये कि वे विविधता में एकता को कायम रख देश को अखंडित बनाये रखा। 1947 के तुरत बाद देश की अर्थ व्यवस्था कृषि आधारित थी। हिंदू विकास दर , जो लगभग 3 प्रतिशत थी, उसे बढ़ाना था ताकि रोजगार के अवसर बढ़ें और खुशहाली आये। लेकिन प्रधानमंत्री बदलते गये और कमोबेश हालात भी थोड़े बहुत बदले। अब तक के काल के सबसे ज्यादा उम्मीद जगाने वाले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काे राष्ट्र ने इस उम्मीद से स्वीकार किया कि वे तेज और खुशनुमा बदलाव लायेंगे। उनसे उम्मीद की गयी कि वे अटल बिहारी वाजपेयी के आर्थिक दर्शन को मूर्तिमान करेंगे। वाजपेयी का आर्थिक दर्शन था कि स्पष्ट बाजारोन्मुखी व्यवस्था, सक्रिय मंत्रालय , शासकीय जवाबदेही, न्यायिक सुधार, अर्थ व्यवस्था में अघो्रशत धन की बाढ़ पर लगाम , श्रमिक कानून सुधार, उद्योगों के लिये जमीन की सरलता से उपलब्धता, अफसरशाही में गति, इंस्पेक्टर राज का खात्मा और सरकारी कोष में घोटाला को राका जाना इत्यादि।अपने शासन की इस अवधि मोदी जी वह कुछ नहीं कर सके जिसका वाजपेयी और खुद इन्होंने वादा किया था।इसके अलावा यह कांग्रेस के काम के ढर्रे को बदल पाने में भी अक्षम दिखायी पड़ती है। 15महीने बाद भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने को लेकर सरकार उम्मीदें ही जाहिर कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि इन उम्मीदों से आगे क्या हुआ? इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से आर्थिक माहौल बदला है। देशी-विदेशी निवेशकों में फीलगुड की वापसी हुई है। नतीजा यह कि शेयर बाजार ने ऊँची छलांग लगाई है। यही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम और दूसरे जिंसों की कीमतों में भारी गिरावट के कारण थोक मुद्रास्फीति की दर में गिरावट आई है। जैसाकि आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि यह नई सरकार की नीतियों और पहलकदमियों से ज्यादा उसके 'अच्छे सितारों' का कमाल है। लेकिन 'बुरे सितारे' भी आसपास ही हैं और अगर सरकार सतर्क नहीं रही तो वे भारतीय अर्थव्यवस्था को कभी भी अपने चपेट में ले सकते हैं। इस चेतावनी में दम है क्योंकि गुलाबी आर्थिक अखबारों में सरकार की 'धीमी रफ़्तार' से भारतीय उद्योग जगत (इंडिया इंक) में 'निराश बढ़ने' की खबरें छपने लगी हैं। यह नकारात्मक वृद्धि दर इसलिए चौंकानेवाली है क्योंकि अक्टूबर का महीना त्योहारों और खरीददारी का होता है। बात सिर्फ आंकड़ों की नहीं है। कुछ दिनों पहले एक उपभोक्ता सामान बनाने वाली एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के शोरूम में उसके मालिक को अपने किसी परिचित से यह कहते सुना कि मार्केट बहुत खराब है। लगता है शोरूम बंद करना पड़ेगा। कुछ ऐसे ही हालात शॉपिंग माल्स में हैं जिसके मैनेजर यह शिकायत करते मिल जाएंगे कि लोग घूमने तो आ रहे हैं लेकिन खरीददारों की तादाद कम है।

ऐसे में, अब क्या रास्ता बचा है? वित्त मंत्रालय की समीक्षा में इसका संकेत था लेकिन दिलचस्प बात यह है कि वह प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के आर्थिक दर्शन और सोच से उलट है। समीक्षा में यह वकालत की गई है कि एनडीए सरकार को अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सार्वजनिक यानी सरकारी निवेश में बढ़ोत्तरी करनी चाहिए और इसके लिए राजकोषीय घाटे के बढ़ने की चिंता कुछ समय के लिए छोड़ देनी चाहिए।इस हालात को नए और बड़े निवेश के बगैर खत्म नहीं जा सकता है। इसे मोदी सरकार भी समझती है लेकिन वह 'मिनिमम गवर्नमेंट' की नव उदारवादी सोचवाली है जो मानती है कि अर्थव्यवस्था में राज्य की सीधी भूमिका नहीं होनी चाहिए और उसे केवल निजी क्षेत्र के लिए उपयुक्त माहौल बनाने पर ध्यान देना चाहिए। इससे अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढती जा रही हैं और 'अच्छे दिन' उम्मीदों के भरोसे हैं। मोदी सरकार को सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिक सेवाओं में भी भारी सार्वजनिक निवेश की पहल करनी चाहिए। इससे निजी क्षेत्र को भी सहारा और नए निवेश की प्रेरणा मिलेगी क्योंकि सार्वजनिक निवेश से औद्योगिक वस्तुओं की मांग बढ़ेगी। इससे ही अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन लौटेंगे और लोगों को भी अच्छे दिन का अहसास होगा।लेकिन सवाल यह है कि मोदी सरकार बाजारवादी नव उदारवादी अर्थनीति के व्यामोह से बाहर निकलने का साहस दिखा पाएगी?