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Saturday, October 17, 2015

लाल और हरे में मत बांटो


17 अक्टूबर
जिस दिन नवरात्र का आरंभ हुआ था एक मित्र उपवास पर थे। दूसरे ने उपवास की आध्यात्मिकता और तार्किकता पर सवाल उठाया और बात धर्म के कर्मकांड पर आ गयी। धर्म का मखौल उड़ाया जाने लगा। यह उद्धरण इसलिये यहां दिया जा रहा है कि हाल में मांस भक्षण और धर्म को लेकर प्रचंड बहस शुरू हो गयी है। बेशक इसे लेकर हिंदू दो दलों में विभक्त हो गये हैं। पर किसी को यह कहते नहीं सुना गया है कि और भी मजहब हैं जिनमें खानपान की पाबंदियां हैं। मसलन , मुस्लिमों में , यहूदियों व अन्य जातियों में इत्यादि। फिर एक बार ‘यह तो सिर्फ उन बातों में से एक है।’ नियमों और रीतियों वाला हिंदू एकमात्र धर्म नहीं है। इसलिए ऐसे व्यवहार में कोई तार्किक खामी ढूंढ़ने का कोई अर्थ नहीं है। वे मौजूद हैं और चूंकि करोड़ों लोग उनका पालन करते हैं, तो ऐसा लगता है कि इनसे उनकी जिंदगी में कुछ सकारात्मक मूल्य जुड़ते हैं। कुछ देश धर्म आधारित व्यवस्था वाले होते हैं। इन देशों में धर्म कानून का आधार होता है। सही या गलत, तार्किक या अतार्किक उस व्यवस्था के तहत लोगों को उन नियमों का पालन करना पड़ता है। अगर आपने पालन नहीं किया तो सजा मिल सकती है। इसमें व्यक्तिगत आजादी का कोई मूल्य नहीं है। यह सुनकर भारत के लोगों को , खासकर जो लोग 1947 के बाद पैदा हुए हैं थोड़ा झटका लग सकता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने बहुत आगे की सोची और उन्होंने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की व्यवस्था दी। जबकि इसके पहले देश में मुस्लिम आइडेंटिटी को लेकर खूनी बंटवारा हो चुका था। हमारे संविधान में कई प्रावधान हैं, जो सारे धर्म को संरक्षण देते हैं और समानता के आधार पर उनसे व्यवहार करते हैं। आप देखेंगे तो इसके पीछे एक जायज कारण भी था और वह आज भी है। यह ठीक है कि गोवंश की रक्षा और संवर्द्धन की बात संविधान में कही गई है और अनेक राज्यों में गोहत्या पर प्रतिबंध लगा हुआ है। यदि गोहत्या अपराध है तो जिस पर भी उसका शक हो, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। यह अक्षम्य है कि गोप्रेमी कानून अपने हाथ में ले लें और किसी भी मनुष्य की हत्या कर दें? क्या पशु और मनुष्य में कोई अंतर नहीं है? गाय को माता का दर्जा इसीलिए दिया गया है कि वह एक अत्यंत उपयोगी पशु है, गोहत्या अपराध है, लेकिन मांस-भक्षण (अखाद्य) नहीं। आखाद्य मांस खाने की अफवाह के आधार पर किसी मनुष्य की हत्या कर देना कौन-सा धर्म है? यह धर्म नहीं, अधर्म है। यह न्याय नहीं, अन्याय है। क्या कानून के डंडे से आप (अखाद्य) मांस-भक्षण छुड़ा सकते हैं?

नफरतों का असर देखो,

जानवरों का बंटवारा हो गया,

गाय हिन्दू हो गयी ;

और बकरा मुसलमान हो गया।

गांधीजी ने भी कभी यही सवाल किया था? कोई आदमी क्या खाए और क्या पिए, इन सवालों पर खुली बहस होनी चाहिए न कि अपनी धार्मिक और सांप्रदायिक मान्यताएं एक-दूसरे पर थोपने की कोशिश होनी चाहिए। किसी भी तरह के मांस खाने को ही आजकल विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र हानिकारक मानने लगा है। पर्यावरण और आर्थिक दृष्टि से भी वह उपादेय नहीं है।

ये पेड़ ये पत्ते ये शाखें भी परेशान हो जाएं..

अगर परिंदे भी हिन्दू और मुस्लमान हो जाएं

इस दृष्टि से किसी भी जानवर के मांस में क्या फर्क है? सब ही अखाद्य हैं। ये प्रश्न ऐसे हैं, जिन पर तंग नजरिये और धार्मिक उन्माद का चश्मा चढ़ाकर देखने से किसी भी देश या समाज का भला नहीं हो सकता। अफसोस है कि पहले से बिगड़े हुए इस मुद्दे को हमारे नेताओं और साहित्यकारों ने और भी अधिक पेचीदा बना दिया है।

सूखे मेवे भी ये देख कर हैरान हो गए..

न जाने कब नारियल हिन्दू और

खजूर मुसलमान हो गए..

इखलाक की हत्या के मुद्दे को हमारे नेताओं-साहित्यकारों ने ऐसा रूप दे दिया है, जिससे विदेशों में भारत की छवि विकृत हो रही है। विदेशी टीवी चैनल-अखबार जिस तरह से प्रश्न उठा रहे हैं उनसे लगता है कि वर्तमान सरकार ने सारे देश को सांप्रदायिकता की भट्ठी में झोंक दिया है। देश में तानाशाही का माहौल बन गया है। उन्हें समझाना पड़ रहा है कि कुछ सिरफिरों के कुकर्म के कारण आप भारत के बारे में गलत राय मत बनाइए।

भारत पूरी तरह से सहिष्णु है, बहुलतावादी है और अपनी उदारवादी सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ है। किसी नेता या सरकार की आज ऐसी हैसियत नहीं है कि वो भारत के लोकतंत्र और सांप्रदायिक सद्भाव के माहौल को पामाल कर सके।

अंदाज जमाने को खलता है

कि मेरा चिराग हवा के खिलाफ

क्यों जलता है..

मैं अमन पसंद हूं ,

मेरे शहर में दंगा रहने दो...

लाल और हरे में मत बांटो ,

मेरी छत पर तिरंगा रहने दो..

Friday, October 16, 2015

क्या रहस्य पर से परदा हटेगा?


16 अक्टूबर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिजनों को भरोसा दिया है कि अगले साल 23 जनवरी से नेताजी से जुड़ी फाइलें सामने लाई जाएंगी। पीएम ने ट्वीट कर इस बारे में खुद जानकारी दी है। 23 जनवरी को ही नेताजी का जन्मदिन होता है। करीब 130 फाइलें केंद्र सरकार और पीएमओ के पास पिछले 70 साल से मौजूद हैं। इन फाइलों को सीक्रेट बताकर केंद्र की अब तक किसी भी सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया। मोदी जी ने इस संदर्भ में ट्वीट किया कि ‘इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने की जरूरत नहीं है। जो देश अपना इतिहास भूल जाते हैं, उनमें इतिहास बनाने की ताकत भी खत्म हो जाती है। नेताजी से जुड़ी फाइलें डिक्लासिफाइड करने का प्रॉसेस 23 जनवरी, 2016 से शुरू होगा। उस दिन सुभाष बाबू का जन्मदिन है। हम दूसरे देशों से भी नेताजी से जुड़ी फाइलें डिक्लासिफाई करने को कहेंगे। इसकी शुरुआत रूस से दिसंबर में होगी(पीएम दिसंबर में रूस के दौरे पर जाने वाले हैं)।’ अब भी 130 फाइलें केंद्र सरकार के पास हैं जो क्लासिफाइड हैं , और 37 सीक्रेट फाइलें पीएमओ में हैं। नेताजी के परिजन और विशेषज्ञों का एक समूह बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने पहुंचा था। 51 लोगों के इस समूह में नेताजी के परिवार से जुड़े 36 लोग, बाकी विशेषज्ञ थे। नेताजी पर शोध करने वाले लेखक अनुज धर और सुरक्षा विशेषज्ञ अवकाश प्राप्त जनरल जी.डी. बख्शी भी इस ग्रुप में शामिल हैं।
इस ग्रुप ने पीएम से नेताजी से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक की जाने की मांग की थी। पिछले 70 साल में किसी भी सरकार ने नेताजी से जुड़ीं फाइलें पब्लिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी। सरकारें यही कहती रही हैं कि इन फाइलों में बेहद सेंसेटिव इन्फॉर्मेशन हैं। अगर इन फाइलों को सार्वजनिक किया जाता है तो भारत के कुछ देशों से रिश्ते खराब हो सकते हैं। लेकिन किसी भी सरकार ने यह नहीं बताया कि रिश्ते आखिर क्यों खराब होंगे। उन फइलों में क्या है? विशेषज्ञों का मानना है कि 1945 के बाद नेताजी चीन में थे पर किसी भी सरकार ने इस लिंक की जांच कराने का प्रयास नहीं किया। जब तक सारी जानकारी एक साथ रखकर इसकी जांच नहीं की जाएगी तब तक नेताजी से जुड़ा सच सामने नहीं आएगा। फाइलों को गोपनीयता के दायरे से हटा कर सार्वजनिक करने के साथ ही मोदी जी ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को भी निशाने पर ले लिया है। कांग्रेस के लिए यह लज्जाजनक स्थिति है कि पार्टी के प्रतिद्वंद्वी उस व्यक्ति के जीवन और मृत्यु के तथ्यों को उजागर कर रहे हैं जो कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष थे। जो फाइलें केंद्र सरकार के पास थीं उन्हें अबतक सार्वजनिक न करने और उस नेता के जीवन के राज को गोपनीय रखने की कोई विश्वसनीय वजह भाजपा के पास भी नहीं है। इसके पूर्व जब बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फाइलों को सार्वजनिक किया था तब संसदीय मामलों के मंत्री वेंकैया नायडू ने कहा था , 'पश्चिम बंगाल सरकार ने नेताजी से जुड़ी कुछ गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक किया है। यह अच्छा है। केंद्र सरकार इस तरह का कोई भी फैसला करने से पहले इसका अध्ययन करने की जरूरत को समझती है क्योंकि इसका असर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, दूसरे देशों, पड़ोसी देशों के साथ हमारे संबंधों पर पड़ता है।' उन्होंने आगे कहा, 'मैं निजी तौर पर यह महसूस करता हूं कि देश के लोगों का यह अधिकार है कि वे नेताजी के मसले की हकीकत को जानें। सरकार भी इसके बारे में सोचेगी और यह फैसला करेगी कि कब और कैसे इसे किया जा सकता है।' गोपनीय पत्रों को सार्वजनिक करना हमेशा से मौजूदा राजनीति के ऐतिहासिक प्रमाणीकरण का एक स्त्रोत रहा है। अब अगर विकिलीक्स विवाद को ही लें तो इससे संप्रभु राष्ट्रों के रिश्तों में जटिलताएं बढ़ीं। इसी तरह 1990 के दशक की शुरुआत में मित्रोखिन पेपर्स जारी होने से भारत के कुछ प्रमुख वाम नेताओं और नौकरशाहों की विश्वसनीयता पर अविश्वास बढ़ा। इन खुलासे से सरकार भी सकते में आ गई। उस वक्त लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में विपक्ष ने जांच की मांग की। इस तरह के खुलासे ने उन दिनों की राजनीति को एक आकार देने में अपना योगदान किया। नेताजी की रहस्यमयी गुमशुदगी से जुड़े तमाम किस्से और कहानियां हैं, कई दावे हैं। 70 साल बाद ही सही पश्चिम बंगाल सरकार ने ये बात सार्वजनिक कर दी कि 1945 में नेताजी की मौत नहीं हुई लेकिन 1945 के बाद नेताजी कहां गए, कहां रहे, ये राज आज भी कायम है। क्या यह उन फाइलों में दफन है जो लुटियन जोन में कड़ी सुरक्षा के बीच धूल फांक रही हैं और अब मोदी जी उन्हें सार्वजनिक करने जा रहे हैं।

Thursday, October 15, 2015

स्याही को तेजाब ना बनने दें



15अक्टूबर 2015

शिव सेना ने मुम्बई में सुधीन्द्र कुलकर्णी के मुंह पर स्याही और रंग फेंक कर दुनिया को यह बता रंग और स्याही का और उपयोग हो सकता है साथ ही वह स्याही तथा रंग खुद ब खुद तेजाब की शक्ल अख्तियार कर सकती है और समाज चेहरे को बदरंग भी कर सकती है। आगे बढ़ने से पहले यहां यह बता देना जरूरी है कि आज के संचार प्रमुख जमाने में समाज में जब कोई घटना प्रभाव डालती है तो वह एक तरह से साइकी के पैराडाइम शिफ्ट की तरह हाेता है।एकदम वही साहेच होती है जो उस घटना का कारण बनी थी। आप में से बहुतों को याद होगा कि सन 2011 में पाकिस्तान के पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर को फकत इसलिये मौत के घट उतार दिया गया था कि वे पाकिस्तान के ईशनिंदा (पैगंबर मोहमम्द आलोचना) के तत्कालीन कानून से इत्तफाक नहीं रखते थे। सलमान तासीर अपने ही मजहब में मौजूद कमजोरियों के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में मार दिए गए। वे मुसलमान थे, पाकिस्तानी थी, ऊंचे ओहदे पर विराजमान थे, लेकिन धर्म के उन्माद ने उनकी जान ले ली।इस घटना ने पाकिस्तानियों के साथ बाकी दुनिया को भी सकते में डाल दिया था।तब शायद ही किसी को गुमान हुआ कि ये ऐसे घटनाएं भारत में भी घटने लग जाएंगी। अब भारत में देखें , सुधींद्र कुलकर्णी पर शिवसेना वालों ने इसलिए स्याही फेंक दी क्योंकि वे पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शिद महमूद कसूरी की किताब के लॉन्च के प्रमुख आयोजक थे। कुलकर्णी बीजेपी के लौहपुरुष अडवाणी के मीडिया सलाहकार रहे हैं। जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तब अडवाणी का नाम भारत के विराट हिंदुओं में लिखा जाएगा। उनका नाम शायद बाला साहब ठाकरे जैसे विराट हिंदू से तो ऊपर ही होगा। कुलकर्णी हिंदू हैं, भारतीय भी हैं। अडवाणी जैसे विराट हिंदू के सलाहकार भी रहे हैं, लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें बख्शा नहीं गया। कुलकर्णी के मुंह पर स्याही फेंककर शिवसेना ने खुद को ज्यादा हिंदू और ज़्यादा भारतीय साबित कर दिया। ठीक वैसे ही जैसे सलमान तासीर के हत्यारों ने उनकी हत्या करके खुद को बड़ा मुसलमान साबित किया था। महाराष्ट्र तक को ही अपनी ‘कर्मभूमि’ बनाए रखने वाली पार्टी शिवसेना का विरोध हो सकता है जायज हो लेकिन, उनका यह काम घोर निंदनीय है। विरोध का अपना तरीका होता है। वह शांतिपूर्ण भी हो सकता था, लेकिन किसी का मानमर्दन, अस्वीकार है। शिवसेना ने कुछ ही दिन पहले पाकिस्तानी गज़ल गायक गुलाम अली का कार्यक्रम रद्द करने पर मजबूर कर दिया था। महाराष्ट्र की सरकार तब भी नाकाम साबित हुई थी और आज भी नाकाम रही। सरकार में शिवसेना की भी भागीदारी है और कार्यक्रम को मंजूरी मिलने के बाद पार्टी का ऐसा रुख सिर्फ यही दिखा रहा है कि पार्टी बीजेपी से अपना स्वार्थ साधने में लगी है। विधानसभा चुनाव में बीजेपी से मिली हार के बाद शिवसेना इस प्रकार की हरकत कर रही है जिससे बीजेपी की सरकार को असमंजस की स्थिति का सामना करना पड़े। यही नहीं, केंद्र में पीएम नरेंद्र मोदी पर आजकल शिवसेना खूब हमले कर रही है। यह वही पीएम मोदी हैं जिन्हें पार्टी सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे काफी पसंद किया करते थे और पार्टी ने हमेशा जिनका साथ दिया। ऐसे तमाम मौके आए हैं जब शिवसेना, राज्य और खास तौर पर मुंबई में अपने को सरकार से ऊपर की हस्ती साबित करने का प्रयास करती रही है।आज वह वाकया बताना भी प्रासंगिक हो जाता है जब भारत और पाकिस्तान के बीच मैच के लिए बीसीसीआई के अधिकारियों को शिवसेना सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे से मुलाकात कर मैच कराने की अनुमति मांगनी पड़ी थी। कहा जाता है कि उनसे अनुमति मिलने के बाद यह मैच हो पाया था। तब भी यह देश और राज्य सरकार के लिए शर्मिंदगी का विषय था और आज भी है। सवाल तो तब यही मेरे ज़हन में उठा कि यदि मैच गलत था तो क्यों इजाजत दी। फिर बीसीसीआई वाले क्यों इजाजत लेने गए थे। क्या ठाकरे साहब सरकार थे। कुलकर्णी ने भी यही गलती की कि वे 'इजाजत' लेने गए थे और इजाजत नहीं मिली। वे बता रहे हैं कि कार्यक्रम के एक दिन पहले वह उनसे मिलने गए थे और चर्चा की थी। कुलकर्णी जी तो पहले ही जानते हैं कि शिवसेना का विरोध का तरीका क्या रहता है। हम पहले से ही कलबुर्गी, पनसारे और दाभोलकर को खो चुके हैं, अगर ऐसी ही गतिविधि जारी रही तो कल ये लोग हमारे बच्चों के स्कूलों पर भी हमला करने लगेंगे। ऐसी स्थिति में यह कहा जा सकता है कि यदि सरकार की इच्छाशक्ति होती तो यह देश को शर्मसार करने वाली वारदात नहीं हो पाती। लेकिन राज्य की देवेंद्र फड़णवीस सरकार भले ही घटना के बाद लम्बी बातें करे लेकिन जमीन पर वह नाकाम ही साबित हुई है। दूसरी बात कि ऐसी बातों को समाज कभी बर्दाश्त ना करे। अगर आप इसी तरह बर्दाश्त करते रहे तो आपको पता भी नहीं चलगा कि स्याही कब तेजाब बन गई।

Tuesday, October 13, 2015

आरक्षण : बेशक चीजें बदली हैं


13 अक्टूबर
राजनीति में इन दिनों पब्लिक स्पेस कंट्रोल करने की कोशिश चल रही है। इसका एक और उदाहरण है आरक्षण पर संघ के प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण के सम्बन्ध में बयान। मोहन भागवत ने कुछ दिन पहले देश की आरक्षण व्यवस्था पर बहस करने की जरूरत के बारे में बयान दिया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की आरक्षण पर टिप्पणी को अलबत्ता इससे नहीं जोड़ना चाहिए, क्योंकि संघ ने बार-बार दोहराया है कि वह राजनीतिक नहीं, एक सांस्कृतिक संगठन है। हालांकि कम ही लोग मानते हैं कि संघ एक सांस्कृतिक संगठन है। ऐसे कितने सांस्कृतिक संगठन हैं, जो सरकार के साथ तीन दिवसीय विचार मंथन सत्र आयोजित करें, जिसमें लगभग सभी मंत्रियों और खुद प्रधानमंत्री की मौजूदगी हो, और ये तमाम लोग बताएं कि उन्होंने क्या किया है और आगे क्या करने वाले हैं?हमारे देश में कई ऐसे मामले हैं, जिन पर कोई व्यक्ति तीखा बयान देने से बचता है, जैसे विभिन्न सांस्कृतिक प्रथाओं पर कोई सवाल नहीं उठाता। उसी तरह मंडल के दौर के बाद आरक्षण की नीति पर कोई सवाल नहीं खड़े करता।आरक्षण नीति को लेकर संघ परिवार को शुरुआत से ही आपत्ति रही है, लेकिन भाजपा के लिए आधिकारिक रूप से ऐसा कह पाना उतना ही मुश्किल है। मोहन भागवत ने पब्लिक स्पेस ने जो भी कहा वह ‘‘पालिटीकली करेक्ट’ था क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनका बोला क्योंकि वह जानता था कि उसका एक-एक शब्द एक बड़े समुदाय के लिये बोला जा रहा है।उन्हें मालूम है कि भारत में जाति आधारित आरक्षण एक ऐसा विवादित मुद्दा है, जिसपर ध्यान देने की जरूरत है । आमतौर पर यह मुद्दा लोगों के मन में सुषुप्तावस्था में रहता है, लेकिन इसे फिर भड़काने में ज्यादा देर नहीं लगती। गुजरात में पटेल समुदाय का हाल का प्रदर्शन इसका उदाहरण है। इस मुद्दे ने इतने लोगों को प्रदर्शन के लिए आकर्षित किया और राज्य सरकार को भयातुर हो कर इंटरनेट सेवाओं और एसएमएस पर रोक लगानी पड़ी। यह मुद्दा लोगों के दिल में बना हुआ है। आरएसएस के साथ भाजपा का रिश्ता और बिहार के आगामी चुनाव का मतलब यह था कि मोहन भागवत के बयान से भाजपा के खिलाफ दलित वोट लामबंद हो सकते हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि भाजपा या किसी अन्य दल से कोई भी संघ प्रमुख के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हुआ। हालांकि, हमें देशहित को दीर्घावधि में देखना चाहिए। आरक्षण नीति का उद्देश्य होना चाहिये निष्पक्ष व अधिक समानता आधारित समाज का निर्माण। आरक्षण एक शॉर्ट कट है। यह समानता आधारित समाज के निर्माण का कामचलाऊ, कृत्रिम, लेकिन थोड़ा तेज तरीका है। यह अवसर निर्मित नहीं करती। यह सिर्फ किसी योग्य व्यक्ति से अवसर लेकर किसी और को सौंप देती है, विशुद्ध रूप से जन्म के आधार पर। ऐसा करके यह समाज को विभाजित करती है, यह साधारणता निर्मित करती है और प्रतिभा को हतोत्साहित करती है। निश्चित ही ऐतिहासिक रूप से और भारत के कुछ हिस्सों में अब भी पिछड़े वर्ग के लोगों को अवसरों से वंचित किया गया। उनके साथ भेदभाव हुआ। जातिगत आरक्षण के विरोध में बीजेपी और संघ हमेशा से रहा है । बीजेपी तो आर्थिक आधार पर आरक्षण के वकालत करते हुए इसे अपने घोषणापत्र तक में शामिल कर चुकी है । जब 1990 में मंडल कमीशन लागू हुआ था तब उसका विरोध करने में बीजेपी और संघ सबसे आगे रहे थे । कहीं ऐसा तो नहीं कि देश भर में आरक्षण के विरोध में माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है? दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनामिक्स के प्रोफेरस अश्विनी देशपांडे और यूनीवर्सिटी ऑफ मिशिगन के प्रोफेसर थोमस विस्कोप्फ के वर्ल्ड डेवलपमेंट जर्नल में हाल ही में प्रकाशित शोध में ये साबित हुआ है कि सकारात्मक प्रयास यानि आरक्षण से योग्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ता । दरअसल आरक्षण ये साबित करता है कि हजारों सालों से मुख्यधारा से अलग रखे गए समुदाय को यदि मौका मिले तो वो भी आगे बढ़ते सकते हैं। अवसरों की उपलब्धता से काबिलियत में बढ़ोतरी होती है ना कि कमी । 1980 से 2002 के बीच भारतीय रेलवे पर किए गए शोध में सामने आया कि आरक्षण के वजह से नौकरी करने वाले कई लोग सामान्य वर्ग के लोगों से अधिक कुशलता से काम करते हैं। लेकिन इन दिनों आरक्षण के खिलाफ दूसरी जातियों में बढ़ रहे विरोध को भुनाने की कोशिश की जा रही है? अनुसूचित जाति-जनजाति संबंधी एक आयोग के अध्ययन में उजागर हुआ कि अनुसूचित जाति के प्रत्याशी (जिसमें एससी व ओबीसी शामिल नहीं है) प्रथम श्रेणी की सरकारी नौकरियों (कुलीन वर्ग की नौकरियाें) में 1965 में एक फीसदी होते थे। 1995 के आते-आते प्रथम श्रेणी की सरकारी नौकरियों में उनका हिस्सा बढ़कर 10 फीसदी हो गया। 2015 में यह और भी बढ़ गया होगा। निष्पक्ष समाज निर्मित करने के उद्देश्य से बनाई इस आरक्षण नीति ने कुछ हद तक अपने लक्ष्य तो हासिल किया ही होगा । बेशक, चीजें बदली हैं।


हिंसा या उत्तेजना तो ऊपरी चेहरा है


12 अक्टूबर
आपने गौर किया होगा कि बिहार जैसे प्रदेश में जहां विकास और कई अन्य मसले सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं वहां खाने- पीने के मसले को राजनीतिक दलों ने इतना खास बना दिया है कि अन्य सब गौण हो गये हैं। देखने में तो यह चुनावों के समय अक्सर बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण के लिए ही घिनौने खेल की तरह लग रहा है पर इसके पीछे एक बड़ी साजिश का गुमान होता है। मुंबई में भी खान- पान के मसले के सबसे वीभत्स रूप दिखे। पहले उसे बंद किया गया, फिर उस पर ‘बैन’ के बावजूद सबके आगे पकाकर खाकर दिखाया गया। यह सब भीड़ भरी सड़कों जैसे पब्लिक स्पेस में किया गया। लेकिन वहां हिंसा नहीं हुई। इसका कारण यह था कि बंद के दोनों तरफ हिंदुत्ववादी थे। बैन लगाने वाले अगर हिंदुत्ववादी थे तो बैन को तोड़ने वाले भी। जिस कंपटीटिव पालिटिक्स ने पर्यूषण पर्व पर अचानक बैन का ऐलान किया उसको जान-बूझकर तोड़ने के लिए एक रिहाइशी सोसाइटी के ऐन सामने शिवसेना ने खाने-खिलाने का आयोजन किया, दिन भर किया। यहां न दंगा हुआ, न आग भड़की, न हिंसा हुई। हां, खानपान की निजता की हानि हुई !पब्लिक स्पेस में पहले भी होटल रहे होंगे और दुकानें रही होंगी। बैन में वे बंद रहीं लेकिन शिवसेना ने उनकी कमी न महसूस होने दी। आप कुछ भी कहें, खाना जब तक निजी टेबिल पर है या होटल में है या ठेले पर है तब तक वह वीभत्स नहीं है, लेकिन अगर कोई खाते हुए खाने पर भाषण दे तो वह कुछ अजीब-सा लगता है। जिस देश में, उसके शहरों की गलियों में भूखे लोग सड़कों पर रहते हों, वहां चिकेन पका कर दिखा-दिखाकर खाना-खिलाना वीभत्स ही लगता है। वह चिकेन होने के कारण वीभत्स नहीं होता बल्कि अति प्रदर्शन के कारण वीभत्स नजर आता है, क्योंकि वह खाए-अघाए लोगों का राजनीतिक नर्तन भर होता है और वह जरूरतमंद के पेट के लिए नहीं होता। यह वीभत्स का नंगा नाच था जो राजनीति कर रही थी जिसे चैनल दिखा रहे थे और राजनीति अपने वीभत्स संस्करणों को डिफेंड कर रही थी। ऐसे में क्या अब यह तय करना कठिन है कि सभ्यता के द्रुत विकास वाली इस 21 वीं सदी में मनुष्य के तौर पर हम सभ्य ज्यादा हुए हैं या असभ्य, संवेदनशील बने हैं या संवेदनाहीन हुए हैं, उदार और दयालु बने हैं या हिंसक और बर्बर? हमारे अंदर मानवीय रिश्तों के प्रति आस्था गहरी हुई है या इन रिश्तों को कदम-कदम पर क्षत-विक्षत करते चलने की आक्रामकता? हम सामाजिक शांति और सद्भाव की कामनाओं से संचालित हो रहे हैं या फिर पारस्परिक घृणा, विद्वेष और शत्रुता की भावना से? आखिर एक मनुष्य के तौर पर हम कहां पहुंचे हैं?अगर भारतीय समाज की बात करें तो कौन-सा समूह ऐसा है जो सुरक्षित भविष्य के प्रति हमारे अंदर थोड़ी-सी भी उम्मीद जगाता हो? बिहार के चुनाव का दृश्य देखें नमूने के तौर पर , वहां सभ्य तार्किक संवाद नहीं, डरावने कुतर्क और गालियां हैं। एक-दूसरे को समझने की समझदारी नहीं, सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप हैं, आक्षेप और प्रत्याक्षेप हैं, बेहूदे अनर्गल प्रलाप हैं और भड़काऊ भाषाई व्यवहार हैं। पुलिस और प्रशासन जैसी व्यवस्थाओं को जैसे सांप ने सूंघ लिया है। कानून और व्यवस्था की दीवारों में गहरी दरारें नजर आ रही हैं और भविष्य की संभावनाओं की छाती में बड़े-बड़े छेद। हमें जैसे दौरा पड़ गया है कि न हम स्वयं शांति से रहेंगे और न अपने पड़ोसी को शांति से रहने देंगे। जो भी विचार, भावनाएं या संकल्प नफरत जगाते हों उन्हें हम सीने में सहेज लेते हैं और जो दूसरों से प्यार करना, शांति से रहना और परस्पर सहयोग करना सिखाते हैं उनके लिए हम अपने दिल-दिमाग के दरवाजे बंद कर लेते हैं। आज भारतीय समाज गाय के लिए ठीक उसी तरह से लड़ रहा है जैसे 90 के दशक में राम के लिए लड़ा रहा था। ना हम राम के काम आए और ना अब राम (अयोध्या वाले) हमारे किसी काम के रह गए हैं। और इसलिए हुआ क्योंकि ये सत्ता की दौड़ है। दरअसल , गाय तो एक बहाना है। असल मकसद है पब्लिक स्पेस को कंट्रोल करना। यानी जनक्षेत्र को नए तरीके से परिभाषित करना और लंबे समय तक उसे उत्तेजित क्षेत्र बनाए रखकर कंट्रोल करने का अभ्यास किया जा रहा है। हिंसा या दंगा तो ऊपरी चेहरा है। असल बात जनक्षेत्र को नए सिरे से बनाने, बताने और कंट्रोल करने की है।

Saturday, October 10, 2015

विकास के लिये ‘बाबूगीरी’ में सुधार जरूरी





















10अक्टूबर
विख्यात इतिहासकार एवं समाजशास्त्री प्रो. बी बी मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘ब्यूरोक्रेसी इन इंडिया’ में कहा है कि ‘भारतीय ब्यूरोक्रेसी की सबसे बड़ी विपदा है कि उसका प्रमुख राजनीतिज्ञ (पॉलिटिकल एग्जेक्यूटिव) होता है और इसलिये वह अपने तौर पर कुछ नहीं करता इसलिये सारे काम- काज रुके रहते हैं। कोई भी सत्ता , चूंकि वोट आधारित होती है इसलिये वह ब्यूरोक्रेसी से ज्यादा छेड़ छाड़ नहीं करती। क्योंकि कानून के शासन (रूल ऑफ लॉ) से वोट बैंक पर प्रभाव पड़ता है।’ देश में अबतक यही होता आया है। कोई भी सरकार हो ब्यूरोक्रेसी अपनी चाल चलती है। लेकिन इसबार जब नरेंद्र मोद नयी सरकार के मुखिया हुए तो उन्होंने ब्यूरोक्रेसी का ढर्रा बदलने का वादा किया था लेकिन कुछ नहीं हो सका। थोड़े- बहुत दिखावटी सुधार जरूर हुए पर वे कामकाजी नहीं बन सके। भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के मजबूत तंतुओं से बने अफसरशाही के पोशिदा फंदों में उदारीकरण का पहिया फंस गया। अतएव नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रियों को न केवल सरकार चलानी है बल्कि सुशासन के लिए अफसरशाही की बुनियाद में सुधार करना होगा। चाणक्य के अनुसार ‘सुशासन का सीधा अर्थ आम जनता को अपने काम- काज में सहूलियत और सुरक्षा है।’ तजुर्बात बताते हैं कि अफसरशाही में सुधार कोई अफसर नहीं ला सकता क्योंकि यह अपने पॉलिटिकल बॉस को जवाबदेह है इसलिये इसमें सुधार और इसका पुनर्गठन केवल राजनीतिक डंडे से ही हो सकता है। परंतु मोदी सरकार ने भी अपनी योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए अफसरशाही का ही सहारा लिया और यही कारण है कि सरकार तेजी से व्यर्थ साबित होती जा रही है। अब भी हमारे देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव जैसी समस्याएं समाधान की स्थिति से बहुत दूर दिखाई देती हैं। न तो नौकरशाही ने इस पर कभी ईमानदारी से सोचने की जहमत उठाई और न राजनेताओं ने ही। आखिर क्या वजह है कि एक तरफ तो महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग अपनी सम्पत्ति की घोषणा करने से ही डर रहे हैं और दूसरी तरफ आम जनता दिन-प्रतिदिन गरीब होती जा रही है? इन सभी मसलों पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है। चुनाव के बाद अधिकतर राजनेता भी इसी मूड में आ जाते हैं। असंतुलित विकास भी इसका ही नतीजा है। सरकारी कर्मचारी अहंकारी, भ्रष्ट तथा अनुत्तरदायी हैं। वे काम करें या न करें, उनकी पदोन्नति होती रहती है तो समस्या का हल कैसे निकलेगा ? अफसरशाही को समाप्त करना तो संभव ही नहीं है। आज भी ब्यूरोक्रेसी औपनिवेशिक शासन काल की तरह ही सोचती और व्यवहार करती है। वह अब भी अपने को शासक मानती है। न तो उसके पास काम करने की इच्छाशक्ति है न ही कोई दृष्टि। ऊपर से राजनीतिक अवमूल्यन ने उसे भ्रष्ट और निकम्मा बना दिया है तो विकास में बाधा आएगी ही। आज इसी का नतीजा है कि प्रशासन और आम जनता में दूरी बनी हुई है। राजनीतिक नेतृत्व अपने हित के लिए ब्यूरोक्रेसी का इस्तेमाल करता है या नेता अपने मातहत अफसरों को अपने भ्रष्टाचार में शामिल करते हैं।
सच्चाई यह है कि जिस तरह राजनीतिक नेतृत्व ऊंचे पदों पर बैठे ब्यूरोक्रेसी का अपने लिए इस्तेमाल करता है, उसी तरह ब्यूरोक्रेसी भी अपने लाभ के लिए राजनीतिक संरक्षण हासिल करती है। इस दावे में संदेह की ज्यादा गुंजाइश इसलिए नहीं है, क्योंकि अगर ब्यूरोक्रेसी पूरी तरह ईमानदार होती तो वह नेताओं के स्वार्थ में खुद भी संलिप्त न होती और उसके तटस्थ विरोध के रहते देश में भ्रष्टाचार का वह माहौल नहीं बनता, जो आज दिखाई देता है।
इस बात की सत्यता कई बार साबित हुई है और इससे संबंधित तथ्य समय-समय पर हुए कई सर्वेक्षणों में उजागर भी हुए हैं। हांगकांग की पॉलिटिकल ऐंड इकॉनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी ने एशिया की बारह बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की अफसरशाही को लेकर जो सर्वेक्षण किया था, उसके नतीजे में भारतीय ब्यूरोक्रेसी को सबसे अधिक निकम्मा बताया गया है। उसमें यहां तक कहा गया था कि भारतीय अफसर विकास में सबसे बड़े बाधक हैं। ऐसा कहने वाला यह एकमात्र सर्वे नहीं था। कुछ ही वर्ष पहले वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम ने उनचास देशों के अफसरों के कामकाज का जो सर्वेक्षण किया था उसमें भारतीय ब्यूरोक्रेसी को सबसे निचला यानी चौवालीसवां स्थान मिला था। देश और जनता की दुर्दशा की एक बड़ी वजह अफसरशाही है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। भारत के लोगों में खुशहाली तब तक नहीं आएगी, जब तक राजनीतिक बॉस प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान नहीं देते।

Friday, October 9, 2015

झूठा है ये आश्वासन



9 अक्टूबर

सरकार विदेशों में जमा कालेधन की घोषणा करने वालों को लोभ दे रही है और धमका भी रही है। लेकिन अबतक क्या मिला। फकत 4147 करोड़ रुपये वह भी 638 घोषणाओं में। यानी मोटे तौर पर 6 करोड़ रुपये प्रति घोषणा। इससे सरकार को 30 प्रतिशत टैक्स मिलेगा। यह बहुत छोटी रकम है, चुनाव के दौरान किये गये दावों के मुकाबले। चुनाव के दौरान तो कहा गया था कि विदेशों में इतना काला धन जमा है कि हर आदमी के खाते में 15 लाख रुपये आ जाएंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बहुत कम रकम हाथ आयी। यह सब देख कर लगता है कि मोदी एंड कम्पनी ने जनता को केवल सब्जबाग दिखाया था। वैसे , कहीं जेटली का कोरा वादा तो नहीं, आयकर छूट की सीमा बढ़ाने की बात?

राजनीति में जनता को तरह-तरह के सब्जबाग दिखाने का काम तो हरेक पार्टी करती है। बीजेपी भले ही नयी तरह की राजनीति करने का दावा करे लेकिन उससे भी ये अपेक्षा करना नादानी ही होगी कि वो जनता को नहीं बरगलाएगी। अब वित्त मंत्री अरुण जेटली का ये बयान भी बरगलाने वाला ही लग रहा है कि सरकार आयकर छूट की सीमा को बढ़ाने पर गम्भीरता से विचार कर रही है। अपने फेसबुक पोस्ट में जेटली ने जिस रास्ते जाने का इशारा किया है, वो ख़बर झूठी, खुशी लायक ही लग रही है, ठीक वैसी ही जैसे चुनाव के पहले हर खाते में 15 लाख लाने का वादा किया गया था। वित्त मंत्रालय के अफ़सरों का कहना है कि सरकार की टैक्स से होने वाली आमदनी का हाल अच्छा नहीं है। जेटली की ओर से उनके अफसरों ने देश को बताया कि चालू वित्त वर्ष में कर-संग्रह करीब 7 प्र​तिशत कम रहने वाला है। व्यवहार में ये ज्यादा ही होगा। क्योंकि अफसरों की ये जानी-पहचानी अदा है कि वो उपलब्धि को थोड़ा बढ़ाकर और कमजोरियों को थोड़ा घटाकर बताते हैं। सरकार का कहना है कि बजट अनुमान के लिहाज से सरकार 14.5 लाख करोड़ रुपये का टैक्स जमा नहीं कर पाएगी। ये सात प्रतिशत घटा तो 13.5 लाख करोड़ रुपये के आसपास थम जाएगा। यहां एक सवाल उठता है कि बेवजह ऐसे कानून बनाये ही क्यों जा रहे हैं? सरकार का अनुमान है कि वित्तीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद का 3.9 प्रतिशत तक रहेगा। राजस्व और खर्च के बीच के फर्क को वित्तीय घाटा कहते हैं। इसे तीन प्रतिशत तक लाने का इरादा था। वित्तीय घाटे की भरपायी सरकार कर्ज से करती है। रिजर्व बैंक ने जीडीपी की विकास दर 7.4 प्रतिशत रहने की उम्मीद जतायी है। जबकि वित्त मंत्री का लक्ष्य 8.5 प्रतिशत का था। यानी अर्थव्यवस्था उतने अच्छे संकेत नहीं दे रही है, जिसका भरोसा फरवरी में वित्त मंत्री ने बजट पेश करते वक्त जताया था। एक ओर अर्थव्यवस्था की ये दशा है और दूसरी ओर बिहार चुनाव में माहौल को खुशगवार बनाने के लिए वित्तमंत्री ने ये बयान दिया है कि सरकार आयकर छूट की सीमा को बढ़ाने पर गम्भीरता से विचार कर रही है। वित्तीय ढांचे पर गौर करें तो लगेगा कि आयकर छूट की सीमा बढ़ाने की बात झूठ है। बीजेपी के दो चहेते - बाबा रामदेव और सुब्रह्मण्यम स्वामी तो ये नुस्ख़ा भी देश को बेच चुके हैं कि आयकर को पूरी तरह से ही खत्म कर देना चाहिए। लेकिन न जाने क्यों, इतने बड़े ‘वित्तीय सुधार’ पर सरकार ने अपना मुंह सिल रखा है? मोदी जी, वैसे तो बहुत वाचाल हैं, लेकिन गूढ़ विषयों पर ‘मन की बात’ मन में ही रखते हैं। वो भला क्यों देश को ये बताने के लफ़ड़े में पड़ें कि योजना आयोग के बाद अब आयकर की अन्त्येष्टि की बारी आ गयी। उन्हें बोलना भी होगा तो लाल क़िले के प्राचीर से बोलेंगे, संसद में बोलेंगे, बिहार में चुनाव सभाओं में बोलेंगे या विदेश में भारतवंशियों के बीच बोलेंगे। वहां पर बोलना भी तो भारत में सीधा प्रसारित होता है। पता नहीं क्यों, मोदी जी ऐसे विषयों पर बोलने की अपेक्षा रखते हैं, जो उन्हें पसन्द नहीं हैं। उन्हें ये बताने में गर्व होता है कि कितने करोड़ लोगों के बैंक खाते खुल गये, 95 लाख शौचालय बन गये (कहां-कहां, ये सिर्फ सरकार जानती है या उसका सांख्यिकी मंत्रालय), हजारों करोड़ रुपये की एलपीजी सब्सिडी का पैसा सरकारी खजाने में बचने लगा, क्योंकि उन्होंने ‘परित्याग’ का जो उपदेश दिया था उसे आज्ञाकारी देश ने अंगीकार कर लिया। मोदी जी से यदि सवाल कर लिया तो मोदी भक्त भड़क जाएंगे। कहेंगे - कांग्रेस का दलाल है, भ्रष्ट है, बेईमान है, एजेंट है, राष्ट्रद्रोही है, नकारात्मक सोच फ़ैलाने वाला ग़द्दार प्रेस्टीच्यूट है। उस पर साम्प्रदायिक और तुष्टिवादी होने का ठप्पा भी पलक झपकते लगा दिया जाएगा। ख़ैर… लोकतंत्र में ये सहज है। समाज ने तो सीता को भी कब बख्शा था, जो किसी और के साथ मुरव्वत करेगा!