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Wednesday, October 28, 2015

स्थायी समाधान खोजने की जरूरत



27 अक्टूबर2015

देश में हाल की तीन घटनाओं को अगर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इनका यूनिवर्सल असर दिखायी पड़ेगा। पहली घटना दादरी कांड की है, दूसरी लेखक- समाज सुधारक की हत्या के विरोध में देश के लेखकों द्वारा अकादमी अवार्ड का लौटाया जाना और फिर पंजाब में पवित्र ग्रंथ के अपमान को लेकर फसाद। विख्यात पत्रिका टाइम्स की मानें तो लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाये जाने का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरा प्रभाव पड़ा है और भारतीय लोकतंत्र की साख को आघात का खतरा दिखायी पड़ने लगा है। पीएमओ के स्तर से यदि साहित्य अकादमी पुरूस्कार धनराशि समेत लौटने वाले उर्दू के मशहूर शायर मुनव्वर राणा को बातचीत के लिए बुलाया जाता है तो इसके यही संकेत हैं कि पीएम खुद अंतरराष्ट्रीय दबाव महसूस कर रहे हैं। पीएम के इस कदम से जहां पूरी दुनिया में भारत के खुले लोकतंत्र होने की पुष्टि होगी वहीं संघ से जुड़े संगठनों को भी अपनी इस तरह की विघटनकारी नीति पर चलने से बचने को बाध्य होना पड़ सकता है। दादरी कांड और दक्षिण भारत में लगातार संघ की मानसिकता का विरोध करने वाले भाजपा नेता और अन्य संगठनों के लोगों द्वारा जिस तरह से लगातार लेखकों, साहित्यकारों को अपने निशाने पर ले लिया गया है उसके बाद से मोदी सरकार के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीएम के चुप रहने का मुद्दा भी उठने लगा है। सरकार में आने के बाद से ही जिस तरह से मोदी ने खुद केवल एकतरफ़ा संपर्क करने के मार्ग पर चलना शुरू किया है उससे भी उनकी लोकतंत्र में आस्था और देश के सामने लगातार समस्याएं खड़ी करने वाले विवादों पर अपने निर्देश देने की प्रतिबद्धता भी कठघरे में दिखाई देने लगती है। इस परिस्थिति में मोदी सरकार की लगातार कट्टरपंथी तत्वों के कारनामों पर चुप रहने या उन्हें राज्यों का मामला बताने से भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस बात का भरोसा नहीं होता है कि सरकार वास्तव में इन मुद्दों पर गंभीर भी है? मोदी सरकार को अब यह दबाव कुछ इतना महसूस होने लगा है कि वह मीडिया के ज़रिये यह सन्देश देना चाहती है कि उसे भी इन कट्टरपंथियों की बातें रास नहीं आ रही हैं। बिहार चुनावों के मद्देनजर जिस तरह से गोहत्या मामले को सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाने और उसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश शुरू की गयी थी वह पूरी तरफ से फ्लॉप होने के बाद सरकार को यह समझ में आया कि इस तरह के मुद्दे के अंतरराष्ट्रीय दुष्परिणाम अधिक होते हैं। आज जब अंतरराष्ट्रीय मंचों से भारत सरकार से ये सवाल पूछे जाने लगे हैं तो भाजपा को समझ में आने लगा है कि इस तरह इन तत्वों को खुलेआम छोड़ना मोदी का हर कथित सफल विदेश दौरे के परिणामों को शून्य की तरफ ही ले जाने का काम करेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि स्थानीय कारणों के चलते किसी भी सामान्य सी घटना के भारत की संभावनाओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को समझते हुए अब मोदी सरकार भी उस डैमेज कंट्रोल में लग चुकी है जिससे उसके देशवासियों को दिखाए जाने वाले बड़े- बड़े सपनों के टूटने के संभावित खतरों पर चर्चा करना भी शामिल है। केंद्र सरकार और भाजपा जिस तरह से अभी तक इस तरह की किसी भी साम्प्रदायिक उन्माद की घटनाओं के चलते उस पर चुप रह जाने की नीति अपनाया करती थीं अब सरकार में होने के कारण उनके लिए इस रास्ते पर चलना मुश्किल हो गया है और उनकी कथनी व करनी का अंतर भी महसूस होने पर ही विदेशों से ही मोदी सरकार ने एक नीति के तहत ही बयानबाज़ी शुरू कर दी है। इसी क्रम में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के एक व्याख्यान के बाद पत्रकारों के सम्मेलन में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दादरी जैसी घटनाओं को देश की छवि बिगाड़ने वाला बताया है। जिस तरह से भाजपा और खुद मोदी बेहद दबाव महसूस कर रहे हैं अब उन्हें देश चलाने के लिए देश के ताने बाने के बने रहने की आवश्यकता का अहसास भी हो रहा होगा क्योंकि अभी तक इस तरह के मामलों पर केवल केंद्र सरकार को ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाब देना पड़ता है और शायद पहली बार यह स्थिति सामने आई है जिसमें भाजपा और मोदी को अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो रहा है। यह देश के लिए बहुत अच्छा है कि कम से कम इस घटना के बाद खुद देश चला रहे नेताओं और पीएम को इस बात की आंच महसूस होने लगी है। भाजपा का जन्म ही संघ की राजनीतिक शाखा के रूप में ही हुआ है तो वह और उसके नेता हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के उस सपने के लिए कुछ न कुछ करते ही रहते हैं जिसके लिए संघ ने काम करना शुरू किया था और जो आज भी संघ का प्रमुख एजेंडा हुआ करता है। देश के सामाजिक ताने- बाने के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ करने के साथ ही देश की प्रगति के सपने को उतनी तेजी से पूरा नहीं किया जा सकता है जिसकी आज देश में क्षमता है और जिस स्तर तक पीएम मोदी उसे पहुंचाना चाहते हैं। भाजपा की तरफ से जिस तरह की कुछ सुगबुगाहट शुरू हुई है तो उसे क्या स्थायी माना जाये या फिर उसे भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के द्वारा पड़ने वाले संभावित दबाव में मोदी सरकार की एक कोशिश ही मानी जाये? भारत के बहुलतावादी समाज में राजनेताओं के अनावश्यक दखल के चलते जिस तरह से रोज नयी समस्याएं उत्पन्न होती हैं आज उनका स्थायी समाधान खोजने की जरूरत है, वर्ना आने वाला कल बड़ा दुखदायी हो सकता है।


‘मन की बात’ में जन नहीं है




26 अक्टूबर 2015

रविवार को प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ की 13 वीं किस्त खत्म हुई। दो दिन पहले दशहरा गुजरा था और शनिवार को मुहर्रम। देश की जनता को पूरी उम्मीद थी कि मोदी जी देश के समक्ष जो मौजूदा समस्याएं हैं उनपर इस बार जरूर बोलेंगे , लेकिन वे वन डे क्रिकेट मैच से चल कर अंगदान और धनतेरस पर सोने के सिक्के से होते हुए गुजरे और बता गये कि दिवाली के दूसरे दिन लंदन यात्रा पर जा रहे हैं। उन्होंने कुछ सुझावों का भी उल्लेख किया, कुछ लोगों के खतों की कुछ पंक्तियां भी उद्धृत कीं। अगर समाजशास्त्र की भाषा में कहें तो यह सारा प्रयास एक मेस्मेरिक कोशिश थी , देश को जला रहीं समस्याओं के प्रति लोगों की नजरों को बांध देने की। मन की बात के लिए पीएम ने लोगों से सुझाव मांगे थे। उल्‍लेखनीय है कि बिहार के राजनीतिक महागठबंधन ने चुनाव आयोग से बिहार चुनाव तक पीएम के मन की बात कार्यक्रम पर रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन चुनाव आयोग ने कुछ शर्तों के साथ मन की बात कार्यक्रम को मंज़ूरी दे दी है। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने रविवार सुबह ट्वीट करके आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री सामाजिक सौहार्द बिगड़ने, हरियाणा में दलित बच्चों की मौत, दादरी कांड और महंगाई जैसे मुद्दों पर एक भी शब्द नहीं कहे। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री यह कहते रहे हैं कि 'मन की बात' कार्यक्रम उनके लिए लोगों से जुड़ने का मौका है। ‘मन की बात’ अब तक एकतरफा संवाद रहा है। सवाल यह है कि अब वह दोतरफा संवाद वाकई बन पाएगा कि नहीं? अब तक की ‘मन की बातें’ एक ओर से आतीं दूसरी ओर सुनी जाती रही हैं। वे एक ऐसी निर्मित बन चली हैं, जो प्रधानमंत्री से जनता तक पहुंचती हैं। जनता से प्रधानमंत्री तक सीधी पहुंचती नहीं दिखतीं। एक ‘टेलर्ड’ बातचीत लगती हैं। प्रधानमंत्री ने खुद कहा है, पहले भी और रविवार को भी , कि उनके पास सुझाव की हजारों चिट़ियां आती हैं, मेल आते हैं , टेलीफोन आते हैं। क्या पीएम सीना ठोंक कर कह सकते हैं कि उनमें शिकायतें नहीं होतीं। जिस तरह का अपना समाज है, वह ऐसा ‘‘प्रार्थना समाज’ नहीं है, जो सिर्फ सुझाव देता रहेगा और अपनी शिकायत न करेगा, न लिखेगा। अपना समाज तो पहले से ही शिकायती समाज रहा है। यकीन न हो तो सारे संदेशों को प्रकट कर दीजिए, हम सबको मालूम हो जाएगा कि हमारा समाज कितना सुझाववादी है और कितना शिकायतवादी। प्रधानमंत्री जी अपने ‘मन की बात ’ में उन शिकायतों की बात क्यों नहीं करते। वे घृणा फैलाने वालों, असहिष्णु वातावरण बनाने वाले तत्वों की निंदा क्यों नहीं करते ? यह सच है कि हर बात पर मोदी नहीं बोल सकते, लेकिन ऐसा भी नहीं कि उनको इन बातों का पता न हो और उनका मन इनसे विचलित न होता हो। अगर किसी के पास मन है तो ऐसी घटनाओं से विचलित अवश्य होगा। दर्द, करुणा, संवेदना और हमदर्दी ही तो वे भाव हैं, जो ऐसी घटनाएं देखकर पैदा होते हैं। उम्मीद थी कि इस बार की ‘मन की बात’ में माेदी जी की समझ और संवेदना अब तक की उनकी बातों का अतिक्रमण करेगी और रेडियो दोतरफा संवाद का जरिया बन जायेगा। क्योंकि इसमें जनता की बात सत्ता तक पहुंची और सत्ता ने उसपर ‘रिएक्ट’ किया है। यह परिकल्पना विख्यात विशेषज्ञ मार्शल मैक्लूहाम के सिद्धांत से उलट है, जिसमें सोचा जाता है कि जब वक्ता बोला करता है तो श्रोता सिर्फ सुना करता है यानी वक्ता का काम बोलना है, श्रोता का काम सुनना। कभी-कभी जब श्रोता बोलता है तो माध्यम के दूसरी ओर से बोलने वाले को भी सुनना पड़ता है। बढ़ती असहिष्णुता की खबरें समाज की ओर से सत्ता की ओर पहुंचने वाले वे संदेश हैं, जो निजी तौर नहीं लिखे गए, न लिखवाए गए हैं। वे अब समाज में व्याप्त हैं और सत्ता तक सीधे पहुंच रहे हैं। मीडिया में दादरी कांड और फरीदाबाद कांड की खबरों और उठी बहसों ने मोदी के लिए यह सवाल पैदा कर दिया है कि वे समाज की इस व्याकुलता और व्यथा को कितना समझते हैं? पीड़ित समाज के आंसू कितना पोंछते हैं। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। इस बाबत सीधे कुछ न कह कर प्रकारांतर से इन बातों के बारे में कुछ कह सकते थे। वे व्यंजना में कुछ कह सकते थे एक प्रकार के ‘शाश्वत सत्य’ कह कर काम चला सकते थे। एक प्रकार के ‘लीगलिस्टिक वचन’ कह सकते थे। उनसे जनता की ऐसी अपेक्षा नाजायज नहीं थी और नहीं रहेगी। वे देश के प्रधानमंत्री हैं। इसीलिए समाज के एक बड़े हिस्से में उनसे अपेक्षा बढ़ी है कि पीएम कम से कम इस बार दोटूक तरीके से अपनी बात कहेंगे। प्रधानमंत्री ने महंगाई और असहिष्णुता से आक्रांत जनता की आर्त पुकार सुनकर इन घटनाओं से कनेक्ट कर अपनी बात नहीं कही और यह ‘मन की बात’ फकत एकालाप बन कर रह गयी है।


Saturday, October 24, 2015

रावण का प्रश्न


24 अक्टूबर 2015
गुरुवार को यहां साल्ट लेक में रावण दहन का आयोजन हुआ था। जलता हुआ रावण बड़ा अजीब लग रहा था। आतिशबाजियां मानो उसकी चीख हों और उसका मानव ध्वनि रूपांतरण किया जाय तो ऐसा सुनने को मिलेगा जैसे , जलता हुआ रावण सामने खड़े लोगों से पूछ रहा हो कि , भाई तुम लोगों में राम कितने हैं? सचमुच यह एक विकट सवाल है। रावण ज्ञानी था, पंडित था, महादेव सिद्ध था, समृद्ध इतना कि पूरी लंका सोने की बनवा डाली थी , फिर भी मारा गया राम के हाथों। गौर करें ​कि राम ने लक्ष्मण से कहा था कि वे रावण के पैर छूकर आशिष लें और ज्ञान की याचना करें। आखिर क्यों? दरअसल , रावण की जो 10 बुराइयां थीं उनका अंत हो चुका था, वे बुराइयां आज भी हम सभी में हैं और राम में भी थीं पर वे उस पर विजय पाकर राम बने और रावण उनका गुलाम होकर रावण बना तो ये आप तय करें कि आप रावण हैं या राम। दशहरा का बहुत गहरा अर्थ है जो उसके नाम में छुपा हुआ है दश और हरा यानी दशहरा मतलब दशों अवगुणों को हरने वाला। वे दस अवगुण कौन से हैं जिनके हारने या जीतने की बात यहां हो रही है। हर इंसान में 10 प्रकार की बुराइयां होती हैं जो मुख्यत: हैं काम, लोभ, मोह, माया, अहंकार, क्रोध, पर स्त्री चिंतन, वासना, घमंड और अधर्म। रावण में ये सब बुराइयां थीं जिनके वशीभूत होकर वह परमात्मा से दूर हो गया था। अपने आप को भगवान समझने लगा था और लोगों पर अत्याचार करने लगा था। देश- काल और परिस्थित के अनुसार बुराइयां और रावण के रूप भी बदलते गए हैं, आज के समय में रावण जात पात ,आतंकवाद,देशों की आपसी लड़ाइयां, दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, भ्रष्टाचार, नशाखोरी, बलात्कार, ईर्ष्या, लालच इन रूपों में पैर पसार रहा है, यदि सही में रावण का अंत इस दुनिया से करना है तो रावण रूपी इन बुराइयों का अंत करना जरूरी है तभी असली रावण का अंत संभव है। रावण का एक ही दोष था और वह बहुत बड़ा था कि उसमें अहंकार बहुत था, इसलिए वह सत्य-असत्य और विवेक-अविवेक में फर्क नहीं कर पाता था। इस योग्यता के लिए व्यक्ति को उदार होना चाहिए। जब तक हम दूसरे का पक्ष देखेंगे नहीं तब तक यह कैसे पता चलेगा कि दूसरा भी सही हो सकता है। यह योग्यता अहंकार होने पर पैदा नहीं हो पाती। रावण भौतिक शक्ति व संपदा का प्रतीक है और संदेश यही है कि भौतिक शक्ति हमेशा आध्यात्मिक शक्ति से पराजित होती है। श्रीराम के इतने सद्गुणों के बाद भी उन्हें लेकर कुछ विवाद हैं। जैसे सीताजी को लेकर उनका व्यवहार या बालि वध का प्रसंग , लेकिन इनमें सत्य का अंश ही होता है। समय के साथ किंवदंतियां जुड़ती जाती हैं। हमारे पास तो प्रमाण हैं कि श्रीराम ने सीताजी का कभी त्याग नहीं किया था। उस काल के अादर्श व मर्यादाओं को आज के संदर्भ में देखेंगे तो वे वैसे ही नहीं दिखाई देंगे। श्रीराम, सीताजी के लिए जितना रोए हैं, वह नारीवादी विचारकों के लिए विचारणीय है कि उनका प्रायश्चित उनकी गलती से बहुत ज्यादा बड़ा है। सबसे समग्र चरित्र तो हनुमान का है। भारत में जितने संप्रदाय हैं शैव हों, शाक्त हों, सभी में उन्हें स्थान है। इतनी स्वीकार्यता और किसी देवता को नहीं मिली है। वर्तमान के वे सबसे प्रासंगिक देवता हैं। काम में समर्पण ही विजय दिलाती है। यह वही संदेश देते हैं। निष्ठा भी उनका गुण है। जिसे स्वीकार किया है उसके प्रति निष्ठा। श्रीराम के अयोध्या से निर्वासन से लेकर रावण पर विजय तक की यात्रा देखें तो हमें आचरण के कुछ नियम और व्यक्तित्व के कुछ गुण नजर आते हैं, जो बताते हैं कि इन पर चलकर हम बुराई पर जीत हासिल कर सकते हैं। ये ऐसी बातें हैं, जिन्हें बार-बार रेखांकित करने की जरूरत है, क्योंकि यह बाहर के बजाय भीतर की लड़ाई ज्यादा है। जैसे अयोध्या छोड़कर वनवास पर जाने में श्रीराम का जो गुण नजर आता है वह है साहसपूर्वक दु:ख सहन करने का निश्चय। समाज से बुराई की शक्तियां खत्म करनी हैं तो श्रीराम की तरह हमें कष्ट झेलने के लिए तैयार होना पड़ेगा। यह संघर्ष लंबा है। मौजूदा वक्त में हम हर काम में शॉर्टकट खोजने लगते हैं। इस प्रवृत्ति से गलतियां हो जाती हैं। देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति में हमें इसका उदाहरण मिलता है। पर्याप्त संघर्ष के बाद एक तीसरा विकल्प सामने था, लेकिन शॉर्टकट में उलझकर वह आंदोलन भटक गया। शॉर्टकट जो अपनाएगा, समय उसे कट करके शॉर्ट कर देगा।

Friday, October 23, 2015

राष्ट्रपति के भाषण से मिलते संकेत


22अक्टूबर 2015
दशहरे के अवसर पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का भाषण बहुतों ने सुना होगा। उन्होंने देश की जनता से सहिष्णुता की अपील की। भाषण सुन कर कुछ ऐसा लगा कि राष्ट्रपति देश की ताजा हालात से बहुत क्षुब्ध हैं। पीड़ादायक तो यह है कि राष्ट्रपति को एक पखवाड़े की भीतर दूसरी बार ऐसी बात कहनी पड़ी है। तो क्या सचमुच देश के वर्तमान हालात हमें किसी अंधेरे में ले जा रहे हैं। खबरों की मानें तो रामलीलाओं और गरबा में भाग लेने के लिये दूसरे सम्प्रदाय के लोगों का प्रवेश वर्जित हो गया है। एक अजीब किस्म की असहिष्णुता की काली छाया चारो ओर फैल रही है। सोचने की बात है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। मंगलवार को जब राष्ट्रपति का भाषण चल रहा था और कोलकाता में दुर्गापूजा की धूम थी उसी बीच सन्मार्ग ने कुछ पढ़े लिखे नौजवानों से दादरी की घटना, कश्मीर की घटना , और कई इस तरह की घटनाओं के बारे में बातें की। दुखद यह है कि नौजवानों में इसके लिये कोई व्यथा नहीं थी। नौजवानों ने साथ में सेल्फी लेने की पेशकश तो की पर किसी ने यह नहीं कहा कि इस तरह के हिंसक विचार गलत हैं और इन्हें त्यागना चाहिये। जब 2014 में लोकसभा चुनाव का प्रचार चल रहा था तो एक सवाल उठा था कि नरेंद्र मोदी, उनकी पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ फासिस्ट हैं या नहीं। ‘थर्ड रीक’ यानी हिटलर की शासन व्यवस्था में देश के बदल जाने भय के बीच यदि हम उसी संदर्भ में आज के शासन की सियासी सक्रियता को विश्लेषित करें तो हैरत में पड़ जायेंगे। हमारे देश के आस पास दो अमीर और विकसित मुल्क हैं - चीन और जापान। राष्ट्रीयता और सामाजिक आंदोलनों के संदर्भ में दोनों हमारे समकक्ष हैं पर वहां राष्ट्रीयता, स्थानिकता और असहिष्णुता सुनने में नहीं आती। दरअसल , सामाजिक विपर्यय के दो आधार स्तम्भ होते हैं पहला, पोलिटिकल ईलीट वर्ग जो सत्ता में बने रहने के लिये इतिहास और उसके बिम्बों की अपने मनोनुकूल व्याख्या करता है। समाज शास्त्र की भाषा में इसे ‘राजनीतिक मिथकनिर्माण’ कहते हैं। इस क्रम में इतिहास की अलग व्याख्या होती है, बच्चों की किताबें दुबारा लिखीं जाती हैं। इससे एक मत का निर्माण होने लगता है जो दूसरे लोगों के पब्लिक स्पेस को तय करने लगता है। इस मत के अलावा कुछ और भी मत हो सकता है, इसकी जगह नहीं छोड़ी जाती है। ऐसे अनगढ़ कार्य अंतत: पब्लिक स्पेस को बहुमत का स्पेस बना देते हैं। इसमें असली मकसद जनक्षेत्र को नए तरीके से परिभाषित करना और लंबे समय तक उसे उत्तेजित क्षेत्र बनाए रखकर कंट्रोल करने का अभ्यास करना है। इसके बाद जो बहुमत तैयार होता है वह नये किस्म के राष्ट्रवाद को बनाता है। इस राष्ट्रवाद में विरोध को ताकत से दबाया जाता है और विरोधियों के अस्तित्व एवं साख पर सवाल खड़े कर दिये जाते हैं। इससे एक खतरनाक दौर का सृजन हो है।इस दौर में सियासतदां नफरत के औजार का इस्तेमाल कर, खौफ की जमीन पर अपना सियासी क़ारोबार चलाते हैं। ऐसे राष्ट्रपति का भाषण देश को संभालने की अपील की तरह है। और अब तो ये आलम है कि हथियारों की, षडयंत्रों की छोड़िये, यहां स्थापित राजनीति में ऐसे बहुतेरे हैं जो अपनी जुबान की तलवार से ही इंसान और इंसानियत दोनों का कत्ल कर रहे हैं। जिन कंधों पर देश को सुरक्षित महसूस करवाने की जिम्मेदारी दी जाती है वो नफरत के कारोबारी बन जाते हैं। भले लोगों की मुश्किल ये भी है कि अब चुप रहना ठीक है या जिम्मेदार आवाजों को और मुखर होना होगा? डर ये कि आप उन्हें उनके नापाक इरादों में कामयाब न कर दें।ये सब वाकई शर्मनाक है। इस असहिष्णुता की राजनीति की भेंट चढ़ता हमारा अमन और चैन एक बार अगर खो गया तो उसे वापस पाना फिर नामुमकिन होगा। इस देश की जनता इस नफरत की राजनीति के मुंह पर अपनी एकता और प्यार-विश्वास से करारा तमाचा मार सकती है। बहुसंख्यक वर्ग, अल्पसंख्यक के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझे। अगर कहीं इस राजनीति ने उनके दिल में कोई शंका पैदा की है, तो ये पूरे देश का फर्ज है कि अपनेपन और भरोसे से शंका को दूर करे।

Wednesday, October 21, 2015

भारत में आदमी उम्मीद खाकर जी लेता है


21 अक्टूबर 2015
आज अष्टमी है। महाअष्टमी। बाजार में उत्सव के माहौल पर महंगाई की काली छाया साफ दिख रही है। दालें महंगी हो गयी हैं, इतनी महंगी कि आम आदमी उनकी कीमत पूछने से डरने लगा है। हम सोच भी नहीं सकते थे कि गरीबों के लिए प्रोटीन का सबसे बड़ा जरिया दाल एक दिन 200 रुपये किलो बिकेगी, प्याज का इतिहास हम देख ही चुके हैं। प्याज ने सरकारों की छवियों को बिगाड़ने में अपनी भूमिका निभाई है, इसलिए उसकी लगातार 'वक्री चाल' को हमने अब अपनी नियति मान लिया, लेकिन अब दाल...। दाल की महंगाई के संदर्भ में तमाम विश्लेषण आ चुके हैं। उसके उत्पादन से लेकर भंडारण तक की कहानियां और चुनावी राज्यों में आयातित दाल को चुनावी दंगल बचाने के लिए भेज दिए जाने की ख़बरें भी हम हर वाजिब एंगल से छाप चुके हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर आम लोगों की जरूरत की चीजों पर ही सबसे बड़ा सुनियोजित हमला क्यों हो रहा है...?
अभी दो दिन पहले एक आंकड़े में कहा गया है कि देश की 40 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, 9.3 करोड़ लोग झुग्गी झोपड़ी में रहते हैं, 12.8 करोड़ को साफ पानी नहीं मिलता, 70 लाख बच्चे शिक्षा से कोसों दूर हैं। यही नहीं, जो रिक्शा चलाता है, ऑटो चलाता है, ड्राइवरी करता है, दुकान में काम करता है या घरेलू काम करता है, वो बहुत कमाता है तो पांच-सात हजार रुपया महीना कमाता है। चार लोगों का आदर्श परिवार भी हो तो घर का किराया देने के बाद उसके पास खाने की चीजें खरीदने के लिए कितना पैसा बचता होगा मोदीजी? और फिर उसे बच्चों की पढ़ाई के लिए, कपड़ों के लिए और गाहे-बगाहे होने वाली बीमारी के लिए भी तो पैसा चाहिए? ऐसे में कबीर दास याद आते हैं - ‘कबिरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर।’ लेकिन आज कबीर किसकी खैर मनाएंगे। ऐसे में हमें डिजिटल, स्मार्ट और वैश्विक परिदृश्य में तरक्की करते भारत का चेहरा लाचार नजर आता है, जिसकी प्राथमिकता में सब कुछ है, सिवाय दाल- रोटी और प्याज के। क्या यह हर साल की कहानी नहीं बन रही कि एक वक्त के बाद प्याज की कीमतें हमारे बस के बाहर की हो जाएंगी, क्या हमारे नीतिनियंता आम लोगों की जरूरत की चीजों का सही लेखा-जोखा, उत्पाद, मांग और आपूर्ति के आंकड़े नहीं रख सकते, या ऐसी परिस्थितियों में एक त्वरित योजना बनाकर राहत नहीं दे सकते। क्या हमें देश पर संकट केवल इसी रूप में दिखाई देता है कि पड़ोसी राज्य हमारी सीमाओं पर हमला कर देते हैं, लेकिन बाजार की निर्मम ताकतें जब इस रूप में लोगों का खून कर देती हैं कि वह बहते हुए दिखाई भी नहीं देता, तब क्या हमें उसका दर्द महसूस होता है। शायद नहीं, इसलिए हर साल हम कुछ खास खाद्य पदार्थों, सब्जियों, अनाजों के महंगा होते जाने को चुपचाप देखते हैं और निर्लज्ज भाव से बयान जारी कर देते हैं कि अब तो नई फसल आने पर ही कीमतें नियंत्रण में आएंगी। यही मोदी जी थे जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान हर भाषण में लोगों से पूछा था - ‘क्या महंगाई घटी, क्यों नहीं घटी।’ आज मोदी जी के सामने यही सवाल है कि महंगाई क्यों नहीं घटी? भयंकर परिस्थतियां हैं हमारे समाज की। एक ओर अनाज पैदा करने में लिये कर्ज से लदे लोग साल-दर-साल मरते जाते हैं, दूसरी ओर कुछ लोग अनाज नहीं मिल पाने के कारण हुए भयंकर अभाव में मर जाते हैं। क्या आपको यह सूचना चौंकाती नहीं कि जिस दौर में प्याज 60 रुपये किलो बिक रहा है, ठीक उसी समय में मंडी से प्याज बेचकर घर लौटा किसान इसलिए जहर पीकर जान दे देता है, क्योंकि उसे मंडी में सही दाम नहीं मिले, और उतने पैसों से वह कर्ज चुकाने के काबिल नहीं है। बार-बार की घटनाओं और परिस्थितियों से यह लगता है कि कालाबाजारी जैसे शब्द शब्दकोश से गायब नहीं हुए हैं, बल्कि वे नए-नए पर्यायों के साथ हमारे सामने हाजिर हो रहे हैं, बाजार को अपने मनमुताबिक चलाने वाले उनके नए अर्थ और रचनाएं गढ़ रहे हैं। यह शक अब भरोसे में तब्दील होता जा रहा है। जैसे-जैसे दाल और उस जैसी चीजें और महंगी होंगी, यह वैसे-वैसे और बढ़ता जाएगा। क्या इस समय की यह एक त्रासदी नहीं है कि किसान और किसानी के सवाल हमारे विमर्श से गायब हैं, जो सीधे तौर पर ऐसी वस्तुओं के उत्पादन से जुड़े हैं। क्यों इस बाजार में किसान खुद अपने उत्पाद की कीमत तय नहीं करता, उसकी क्या मजबूरियां हैं या बनाई गई हैं। सरकार ने दाल के आयात की योजना बनायी है और कीमतों को काबू में करने का आश्वासन दिया है। उम्मीद कर सकते हैं, 'अच्छे दिनों' में कुछ अच्छा जरूर होगा, क्योंकि यह तो अब साबित हो ही गया है कि भारत में आदमी दाल- रोटी से ज्यादा उम्मीद खाकर जी लेता है।

Tuesday, October 20, 2015

जीते चाहे कोई, यकीनन बिहार हारेगा



20 अक्टूबर
बिहार के चुनाव के परिणामों काे लेकर अटकलें तेज हो गयी हैं और वातावरण नकारात्मक रूप में गरमा रहा है। इस ‘लोकतांत्रिक’ जश्न के दौरान खूब धूम-धड़ाका हो रहा है। एक से एक निराले पटाखे फोड़े जा रहे हैं। सबसे शानदार है – गाय पटाखा। इसके बाद बारी आयी और ‘ऊटपटांग बयान’ पटाख़ा की। सोशल मीडिया पर झूठ, बकवास और सिरफिरे बयान कुलांचे भर रहे हैं। इनकी सुनामी आयी हुई है। ‘चामत्कारिक’ पटाखों की आवाज और रोशनी, दोनों ही बेजोड़ हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में मतदान के दो चरणों के बाद स्वाभाविक ही है कि सत्ता के दोनों प्रमुख दावेदार गठबंधन अपनी-अपनी जीत के दावे करें, लेकिन सच यही है कि जीत लोकतंत्र की हो रही है और हार बिहार रहा है। अक्सर विवादित और संदेहास्पद रहे चुनाव सर्वेक्षणों के अलावा तटस्थ राजनीतिक प्रेक्षक कोई स्पष्ट भविष्यवाणी करने से परहेज ही कर रहे हैं। इसका एक कारण यह भी है कि अभी तक जातीय आधार पर विभाजित रही बिहार की राजनीति के मद्देनजर कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधनों में समीकरण के लिहाज से कड़ी टक्कर नजर आ रही है। जाहिर है, चुनाव हो रहे हैं तो हार-जीत भी होगी ही, लेकिन उसका फैसला मतगणना वाले दिन ही हो पायेगा। मोदी जी, साक्षी महाराज और उनके साथी बिहार में विकास को चाहे जितना कोसें और कम करके आंकें लेकिन वहां विकास हुआ है। एक गंभीर सामाजिक विकास। भले ही बिहार के शहरों की सूरत ना बदली हो पर समाज में बदलाव आया है। आप कहेंगे पटना एक ठहराव का एहसास कराता है, मायूस करता है। यहां के लोगों में गांव कस्बों का बोध और संस्कार ही ज्यादा दिखता है। जो पटना में रहता है वो सिर्फ पटना में नहीं रहता, उसका एक पांव और एक मन गांव में रहता है। इसलिए आपको दिल्लीवाला या कलकत्तावाला की तरह कोई पूरी तरह से पटनावाला नहीं मिलेगा। एक शहरी होने के लिए जरूरी है कि उसका अतीत से संबंध कमज़ोर हो, वो भविष्यवादी हो। बिहार एक ग्रामीण राज्य है इसलिए उसके शहरों का कस्बाई चरित्र होगा ही लेकिन बदलते बिहार की आकांक्षाएं अब बेहतर और किसी बड़े शहर की तलाश में बेचैन हैं। राजनीतिज्ञों का एक तबका जातिवाद के खिलाफ लेक्चर देता है लेकिन सवर्णों के जातिवाद को विकास का सहारा लेकर प्रगतिशील घोषित करते चलता है। आप इस तबके को विकास पर खूब बातें करते देखेंगे और यही तबका गरीब मरीजों के साथ क्या कर रहा है बताने की जरूरत नहीं है। अकारण नहीं है कि बिहार चुनाव में अस्पतालों को लेकर कोई बात नहीं कर रहा है। बिहार के छात्रों के राजनीतिक प्रशिक्षण में एक घोर कमी है। वे विकास के सवाल को अपनी निष्ठा वाले दल के हिसाब से देखते हैं। शिक्षा चिकित्सा या कुपोषण जैसे मसलों पर कौन बहस के लिए तैयार था? हर चुनाव को कौन बनेगा मुख्यमंत्री, किस्सा कुर्सी का या सत्ता का राजतिलक टाइप के कार्यक्रमों तक सीमित कर दिया जा रहा है। बुनियादी मुद्दों की बात कोई नहीं कर रहा। चुनाव आते ही एनजीओ या तटस्थ नागरिक संगठन सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन सुनता कौन है। बिहार का चुनाव उसकी पहचान पर हमले का मौका बन जाता है। यहां के संसाधनों पर नियंत्रण रखने वाला तबक़ा भी भीतर से हमलावर हो जाता है जबकि शिक्षा और चिकित्सा की हालत उसी ने बुरी की है। दो सौ रुपया किलो दाल है और मंचों पर दाल मुद्दा नहीं है। जनता का बड़ा हिस्सा भी इसी तरह से प्रशिक्षित कर दिया गया है कि कौन जीतेगा। कौन प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनेगा? लेकिन विकास की बात कोई नहीं कर रहा है। और अगर बात हो रही है तो केवल जंगल राज की, कुशासन की। जबकि बिहार में भारी विकास हुआ है। गली-गली में साइकिल-सवार लड़कियों को देख लगता है कि काफी कुछ बदला है। हमारी राजनीति शायद लड़कियों के बदलाव को बदलाव नहीं मानती, मगर आप किसी भी सड़क पर झुंड में या अकेले साइकिल चलाती लड़कियों को देख गदगद हो सकते हैं। साइकिल ने लड़कियों की जिन्दगी बदल दी है और लड़कियों ने साइकिल से समाज बदल दिया है। साइकिल चलाती ये लड़कियां बिहार के विकास की ब्रांड अम्बेसडर हैं। लड़कियों के दिलो-दिमाग से लड़कों का भय निकल गया है। सड़क पर छेड़खानी नहीं दिखती है। साइकिल छिनने की घटना सुनने को नहीं मिलती। बिहार की सड़कों पर यह जो नया समन्वय बना है, वह किसी क्रांति से कम नहीं। यकीनन यह क्रांति पिछले शासन में ही आयी है। ऐसे में, अब सोचिए नेता को मुद्दा कौन दे रहा है? मुद्दा, केवल मुद्दा नहीं एक आइडिया भर हो कर रह गया है। इस आइडिया से लोगों के दिलोदिमाग को प्रभावित कर चुनाव में वोट की शक्ल में बदलने की कोशिश हो रही है। चुनाव का नतीजा क्या होगा यह तो बाद में पता चलेगा , लेकिन जो कोशिशें चल रहीं हैं उससे यकीनन बिहार हारेगा।




पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं



19 अक्टूबर

सुप्रीम कोर्ट ने एन जे ए सी को अवैधानिक करार देकर एक नयी बहस छेड़ दी है। कहा जा रहा है कि ऐसा करने से अदालतों में जजों का अभाव कायम रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के पक्ष और विपक्ष में ढेर सारी दलीलें सामने आ रही हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि आई ए एस , आई पी एस इत्यादि के तर्ज पर जजों का भी एक कैडर बनाने पर सोचना जरूरी है। जबकि कुछ लोगों का मानना है कि इससे राजनीतिक हस्तक्षेप को बल मिलेगा। इस बहसों क़े अलग आम भारतीय केवल यह जानता है कि जज कौन बने, यह जज ही सबसे अच्छा समझते हैं। सरकार को न्यायपालिका से दूर ही रहना चाहिए। पर, देश के साधारण नागरिकों को इससे कोई मतलब नहीं है कि जजों को कौन बनायेगा। वह तो न्यायपालिका में गहरी आस्था रखता है। लोकतंत्र के तीनों संवैधानिक स्तंभों में से उसे आज भी सर्वोच्च भरोसा न्यायालय पर ही है कि न्यायालय उसे सही, वाजिब अधिकार दिलाएंगे। वह अदालत की ओर आशा से देखता है। वह सरकारों से त्रस्त है। विधायिका की उपयोगिता से अनजान है। केंद्र सरकार ने जजों के कोलेजियम सिस्टम के स्थान पर नयी व्यवस्था को अपनाने के लिए जिस तरह से यह मामला कोर्ट के हाथों से निकाल कर उसमें राजनेताओं के दखल की पृष्ठभूमि तैयार की थी उसके चलते ही न्यायिक सक्रियता के कारण समस्याएं झेल रहे लगभग सभी राजनीतिक दलों ने उसका भरपूर समर्थन किया था और वह कानून भी बन गया था पर अब वह पूरी प्रक्रिया ही निरस्त हो चुकी है और उससे बचने के लिए अब सरकार के पास सीमित विकल्प ही बचे हुए हैं। इस पूरी व्यवस्था को सुधारने के सरकार के प्रयास को सुप्रीम कोर्ट ने बहुत बड़ा झटका दे दिया है। यह सही है कि देश में पिछले दशकों में हर क्षेत्र में राजनेताओं का अनावश्यक दखल बढ़ता ही जा रहा है उससे निपटने के लिए ही कोर्ट ने संभवतः सरकारों की अपने पसंद के जजों की नियुक्ति से रोकने के लिए इस तरह का निर्णय भी सुनाया है। क्या देश को लम्बे समय तक काम करने वाले किसी ऐसे तंत्र की आवश्यकता नहीं है जो निरापद रूप से काम भी कर सके और सुप्रीम कोर्ट ,हाई कोर्ट के साथ ही जिला स्तर की अदालतों के लिए भी जजों की उपलब्धता सुनिश्चित कर सके ? किन्तु दुर्भाग्य है।
सिर्फ शायर देखता है कहकहों की अस्लियत
हर किसी के पास तो ऐसी नजर होगी नहीं
यही न्यायपालिका उस साधारण नागरिक के साथ दृढ़तापूर्वक तो दूर, सहानुभूतिपूर्वक भी कहां खड़ी है? बड़ा दुर्भाग्य तो यह भी है कि साधारण नागरिक के लिए सहानुभूति की बात ही क्यों आए? क्योंकि जजों के चयन में भूमिका निभाने को तत्पर सरकार व संसद-विधानसभाओं में बैठे जनप्रतिनिधि आम आदमी को न्याय नहीं दिला पाते। मेरठ से मुजफ्फरनगर तक शिकार हुए निर्दोष लोग आज अदालतों में केस नंबर बनकर रह गए हैं। जरा सोचिये, कितने छात्रों ने अपनी युवावस्था के बेहतरीन पल, पढ़ाई में लगा दिये। दो वर्ष में ही देश की चार शीर्ष परीक्षाओं में या तो भारी घोटाले हुए हैं, या पर्चे लीक या फर्जी प्रवेश या घूस लेकर अवैध काम। दुनिया की सबसे बड़ी गैस त्रासदी - जिसमें 20 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गयी थी और इस घटना के 25 वर्ष बाद इसके अपराधियों को दो साल की सजा सुनाई, हमारी अदालत ने!
बूंद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है
ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं
वर्तमान में किसी भी व्यवस्था को एकदम से सुधारने के स्थान पर उसके लिए सही मंच बनाकर प्रयास करने की आवश्यकता भी है। नया सिस्टम किस तरह से काम करने वाला है यह देखना भी आवश्यक है क्योंकि जब तक नए सिस्टम की कमियों को भी खुले तौर पर सुधारने के लिए न्यायपालिका और सरकार सामंजस्य नहीं कर पाएंगी तब तक इस तरह की रस्साकशी चलती रहेगी। नया तंत्र जब तक पूरी तरह से काम करना शुरू नहीं करता है तब तक कम से कम इसी व्यवस्था को चलाते हुए जजों की संख्या को बढ़ाने के बारे में सोचा जाना चाहिए। व्यवस्था में इस तरह का बड़ा परिवर्तन लोगों पर भारी न पड़े इस बात का भी ध्यान रखने की आवश्यकता भी है क्योंकि आज जितनी संख्या में मुकदमें अदालतों के सामने हैं उन्हें जजों की कमी के साथ नहीं निपटाया जा सकता है। जो आधा करोड़ केस अदालतों में लंबित हैं - उस बारे में क्यों हंगामा खड़ा नहीं किया जाता? फिर लगा, हमारी न्यायपालिका कहीं न कहीं बंधी हुई है। पीड़ितों के लिए समूचे सिस्टम को झकझोरना आवश्यक है। न्यायपालिका स्वयं इसे सर्वाधिक प्रभावशाली तरह से कर सकती है। यदि जज ठान लेंगे - तो न्यायिक क्रांति होकर रहेगी। पर सवाल है कि ऐसा होगा क्या?
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुजर होगी नहीं