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Sunday, December 4, 2016

बंगाल में फौज की तैनाती खौफ की सियासत है

बंगाल में फौज की तैनाती खौफ की सियासत है, सी एम विरोध सराहनीय

हरिराम पाण्डेय

कोलकाता : बंगाल के कई जिलों में सेना की तैनाती पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गंभीर राष जाहिर किया है और एक तरह से यह एक बड़ा मुद्दा बन गया है। यहां तक राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी को भी इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। मुख्यमंत्री की आपत्ति पर सेना ने कहा है कि यह एक नियमित कार्यक्रम है जिसे हर दो साल पर अपनाया जाता है। ममता जी ने ट्वीट करके कहा है कि बंगाल के जलपाईगुड़ी, अलीपुर दुआर, दार्जिलिंग , बैरकपुर , उत्तर 24 परगना, हावड़ा , हुगली , कोलकाता , मुर्शिदाबाद ,बर्दवान में  फौज तैनात की गयी थी, इसके अलावा नवान्न के सामने भी फौज खड़ी गयी थी। पुलिस का कहना है कि जामबनी और खड़गपुर में भी तैनाती थी/ इससे लगता था कि तख्ता पलट जैसी स्थिति आ गयी है। पश्चिम बंगाल पुलिस ने भी अपने आधिकारिक ट्वीट में कहा था कि तैनाती की इजाजत नहीं ली गयी थी। इसके अलावा मुख्यमंत्री ने बताया कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पंचायत की आय का ब्यौरा भी मांगा था। 

इधर बंगाल एरिया के जनरल आफिसर कमांडिंग इन चीफ मेजर जनरल सुनील कुमार यादव का कहना है कि पुलों पर से वाहनों के गुजरने का लेखा जोखा और पुलों के भार वह की क्षमता के आकलन के लिये ऐसा किया गया था ताकि आपात काल में उस भार के फौजी वाहनों को वहां से सरलता से गुजारा जा सके। 

मेजर जनरल यादव के इस कथन पर कई सवाल उठते हैं। पहला कि पुलों की भार वहन क्षमता का आधिकारिक विवरण तो पुल बनाने वाली संस्था हुगली रिवर ब्रिज कारपोरेशन (एच आर बी सी) बड़ी आसानी से दे देती और सेना के इंजनियरों को अपने वाहनो की भार क्षमता से उसका आकलन सरल हो जाता। दूसराह प्रश्न है कि गाड़ियों के गुजरने संख्या का आकलन। क्या जनरल साहब बता सकते हैं कि इसका सबसे प्रमाणिक आंकड़ा तो टॉल टैक्स की रसीद है उसे क्यों नहीं मांगा गया कि मामूली पढ़े लिखे फौजियों को वहां तैनात कर दिया गया गुजरने वाले वाहनों की गिनती के लिये। अगर यह भी सही है तो नवान्न के सामने क्या कर रही थी फौज? 

जनरल साहब क्या रायफल से निकली गोली की रफ्तार मापने के लिये उसके साथ किसी सैनिक को दौड़ाते हैं क्या? या , कारगिल की ऊंचाई को कुछ सैनिक फीता लेकर मापते हैं क्या? इन दलीलों को सुनकर ही लगता है कि कुछ छिपाया जा रहा है। राज्यपाल महोदय महामहिम केसरीनाथ त्रिपाठॅ ने शनिवार को कहा कि सेना को नीचा नहीं दिखाया जाय। इन सारी बातों से लगता है कि कोई निहित स्वार्थ है जिसे छिपाया जा रहा है। सेना सत्ता का बिम्ब है और उसकी उपस्थिति का अर्थ है कि आम लोगों में दहशत का भाव पैदा करना तथा अगर इस पर कोई उंगली उठाता है तो इसे आलोचना से परे रखने की अपील कर लोगों की बोलती बंद कर देना। कश्मीर से लेकर कोलकाता तक फौज का इस्तेमाल दहशत का बोझिल वातावरण तैयार करना है। एक सवाल यह भी है कि प्राकृतिक आपदा में राहत कार्य के अलावा सेना को जब भी नागरिक आबादी के बीच लाया गया है तो उसका उद्देश्य खौफ पैदा करने के सिव क्या रहा है? चाहे वह असम हो, या कश्मीर हो या कोलकाता। भय या खौफ कपट योजना का सबसे बड़ा हथियार है। इस हथियार की ताकत से  आम लोगों से कुछ भी करवाया जा सकता है। चारो तरफ फौज जरूर कोई खतरा है। फौज की आलोचना नहीं करने की सलाह और प्रेशर ग्रुप के जरिये एक मनोवैज्ञानिक धारणा तैयार कर विरोध को मार डालने की साजिश है। अंग्रेजों ने देशद्रोह कानून (सिडेशन लॉ) इसी लिये बनाया। क्योंकि आजादी की लड़ाई में लोग देश के लिये लड़ रहे थे और उन्हें देशद्रोही बता कर फांसी चढ़ा देने से दहशत कायम हो जाती थी और विरोध दब जाता था। ममता जी ने नोटबंदी पर केंद्र का जमकर विरोध किया और उनकी जनता उनका साथ दे रही थी तो बिना बल प्रयोग किये इस समर्थन को मार देने की यह साजिश थी। आपातकाल में भी यही हुआ था और आतंकित करके जनता की आवाज को दबा दिया गया था। सत्ता पहले कुछ संस्थाओं को प्रचार के बल पर अति पवित्र बनाती है और उसी का प्रयोग कर जनता को भयभीत करती है। मोदी जी के शासन में गौर करें कि पहले कालेधन का आतंक शुऱु हुआ और फिर  गो रक्षकों के गुडा दलों ने पहले गाय के बहाने लोगों में भय का सृजन किया और उसके बाद नोटबंदी और अब फौज। सबमें एक बात सामान्य है कि विरोध वर्जित है। इंसानी दिमाग अपनी हिफाजत और बचाव के लिये बचपन से ही ट्रेंड होता है इसी लिये वह सदा  भय को भांपता रहता है, यह एक स्वत:शोध (ह्यूरिस्टीक) प्रणाली है और  भय की आशंका से ही दिमाग खुदबखुद ‘सर्वाइवल मोड’  में आ जाता है। सेना की वर्दी, उसके बारे में बनायी गयीं कहानियां, जनता से जानबूझ कर बनायी गयी उसकी दूरी  और उसे आलोचना से परे बना कर सत्ता ने उसे रहस्यमय बना दिया। जिसतरह अंधेरे में भूत का खौफ। भूत भगाने और भूत चढ़ाने के धंधे की तरह अब फौज के जरिये आम जनता को डराया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रेरक या कहें ‘गुरू’  दामोदर विनायक सावरकर और विख्यात इतालवी अधिनायकवादी मेजिनी में बहुत समानता थी। मेजिनी ने धर्म और अध्यातम को मिलाकर एक खास दिशा में इटली को हांकना शुरू किया था और वहां एक ऐसा धार्मिक कट्टरवाद पनप गया था जिसमें सत्ता से जुड़ी संस्थाएं आलोचना से परे हो गयीं थीं। मोदी राज में, गौर करें , कुछ ऐसा ही हो रहा है।

Friday, December 2, 2016

व्यंग्य : भाईसाहब " सोनम गुप्ता बेवफा है" सचमुच!

व्यंग्य: भाई साहब ‘सोनम गुप्ता बेवफा है’ सचमुच !

28 नवम्बर, सोमवार का दिन। कोलकाता के हजारों लोगों को एक बनाकर प्रदर्शन करने की क्या पड़ गयी और क्यों पड़ गयी यह एक अहम(क) सवाल है। बेकार की नोटबंदी घटना को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की क्या जरूरत पड़ी? सोंचता हूं कि नारे  और प्रदर्शन कोलकाता की मुख्य पहचान है। दुनिया के हर कोने में इसकी इस पहचान की चर्चा है और खास कर इंगलैंड में , जहां के ‘गौरांग महाप्रभु ’ हमारे आका होते थे। जाब चर्नाक से लेकर माउंटबेटन तक जहां की कथाएं सुना कर हमें वैसे ही आतंकित करते थे जैसे गरुड़ पुराण नरक की कथाओं से आतंकित करते हैं। भारत में अगर मार खाने वाला अल्पसंख्यक और हमलावर बहुसंख्यक हो तो यह तुरन्त राजनीतिक मुद्दा बन जाता है। यही नहीं जिस किसी घटना से लोग जुड़े होते हैं वह भी एक राजनीतिक घटना बन जाती है। जैसे खुले में शौच करने जैसी घटना को ही लें। यह उंकड़ू ​चिंतन का एक रहस्यमय आसन है , यारों ने इसे भी एक राजनीतिक मुद्दा बना दिया। नोटबंदी के बाद बैंकों के सामने नोट बदलने के लिये कतार में खड़े लोगों और लुगाइयों में कुछ साइड देखकर लघुशंका का दीर्घ समाधान का सुख लेते हैं , अब यारों ने वहां पुलस खड़ी कर दिये। कुछ लोगों ने इसे भी राजनीतिक मुद्दा बना दिया। राजनीतिक मुद्दे क्या होते हैं  एक भारतीय को यह बात समझाने की आवश्यकता नहीं होती। हां तो नोटबंदी की बात चल रही थी तो इसी में एक तोता छाप पंडित जी ने सड़क  के किनारे लगी अपनी दुकान पर जमा नोटपरिवर्तनकारी धर्मावलम्बियों को समझाते हुये कहा कि भैय्ये यह हमारे आपके लिये तो सेक्रिट था पर मोदी जी ने अपने चेलों को इसका संकेत बहुत पहले दे दिया था कि कबसे नोट बंद किये जा रहे हैं और वे जल्दी बदलवा लें।.... और यही कारण है कि नेता लोग इससे चिंतित नहीं हैं। राजनीति तो उनकी रोटी है इसलिये थोड़ी तो राजनीति करेंगे। एक नोटपरिवर्तनकामी ने अपनी कामेच्छा त्याग कर पूछा कैसे कह लहे हैं पंडित जी कि नेताओं को मोदी जी ने साफ बता दिया था, मैं तो आपके ललाट में सीधा दिवालिया योग देख रहा हूं इसलिये आप नहीं समझ पाये वह संकेत। उस कवि को सुना है या नहीं आपने कि ‘भरे भुवन में करत है नैनन ही सौं बात।’ अब आप नैनन की बतिया ना समझे तो दोष उस भुवन भामिनी का नहीं है भक्त। वह भी अपनी जिद पर अड़ गया क्योंकि वह मोदी जी का समर्थक था और वहां खड़ा नोटबंदी की हिमायत कर अपनी राजनीति चटका रहा था। ऐसे मोदी भक्त नोटपरिवर्तन विरोदियों से मारपीट तक कर देते हैं। हां तो वे जनाब अड़ कगये पंडित जी के सामने कि वे बतायें कि मोदी जी ने कहां और क्या संकेत दिये। पुंडित जी तोते के सामने दाना डाला और अपनी हथेली पर सुर्ती। नेता जी नौजवान थे बिगड़ गये पहले हमें बताइये उसके बाद सुर्ती खाइयेगा। पंडित जी ने बड़े आराम से कहा, भक्त यह सुर्ती नहीं है यह सु रति है और नोटपरिवर्तनकामी लोगों के लिये यह रति अत्यंत सहज है। वे अपनी बात पर अड़े थे। वे मामले को सियासी रंग देना चाहते थे। घस फूल और कमल के बीच की सियासत। पंडित जी ने सु रति का आनंद लेकर कहा कि सुनो भक्त , तुम्हें मालूम है न कि इस नोटबंदी के ष्टड़यंत्र का कूटनाम यानी कोडवर्ड था ‘सोनम गुप्ता बेवफा है।’ हां तो था न। यह तो सुरक्षा के लिहाज से किया गया था।  नहीं भाई बीच में बोलते क्यों हो, चुपचाप सुनो भक्त। अब हमारी झ्यातिष विद्या में अंकशास्त्र भी एक विद्या है। अंकशास्त्र के मुताबिक सोनम का मूलांक है 8 -   SONAM - 19+15+14+1+13 = (1+1+1+1+1) (9+5+ 4+3)= 5+ (21)= 5+3= 8  , गुप्ता का मूलांक है 11 - GUPTA = 7+21+16+20+1 = (7+2+1+2+1) (1+6+0)= 13+7=4+7 = 11, बेवफा का मूलांक है 20- BEWAFA - 2+5+23+1+6+1= 20 और है का मूलांक है 16 ,HAI= 8+1+8 =विषम 1 को हटा दें तो हो जायेगा 8+0 +8 यानी 16। कुल मिला कर बनता है 8.11.2016 यानी नोटबंदी की तारिख। अब भक्त सोनम गुप्ता की बेफई देखो कि तुम्हारे हाथ क्या आनी थी दिमाग तक में नहीं आयी। भक्त तुम्हारे ललाट पर कालसर्पयोग कुंडली मारे बैठा है इसलिये तुम नहीं समझ पाये और जिनका वृहस्पति सशक्त हैं वे भांप लिये और बिहार में दनादन जमीन खरीद लिये। ... और तुम यहां सड़क पर खड़े मोटर वाहनों के चरणों से उड़ा डीजल मिश्रित रजकण  का भक्षण कर रहे हो। अब भक्त रजकण की भी गरिमा है कि ‘छुअत शिला भई नारि सुहाई और भक्त तुमको अबतक अकल नहीं आयी।’ इधर 21 रुपये का स्थान अपनी जेब से परिवर्तित करो और नोटपरिवर्तन का तमाशा देखो। जय हो तोताराम।

नयी अवस्था का सृजन! यकीनन

नयी अवस्था का सृजन ! यकीनन

वित्तमंत्री अरूण जेटली ने सही कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी के साथ देश में एक नयी सामान्य अवस्था का सृजन किया है। बेशक ऐसा ही हुआ है।  अब देखें कि मौद्रिक नीतियां गढ़ने का काम अब भारतीय रिजर्व बैंक करता आया है और अब प्रधानमंत्री जी कर रहे हैं। वे बड़े से बड़ा निर्णय एकतरफा करते हैं, किसी के मशविरे को सुनते नहीं हैं। लोगों पर बैंकों से अपना रुपया निकालने पर पाबंदी तो लग गयी पर उन्हें इसके लिये तैयार होने का समय तक नहीं दिया गया। नतीजा हुआ बैंकों और ए टी एम के सामने ‘पीड़ित नर- नारि ’  की अंतहीन कतारें दिखने लगीं, कई लोग नोट प्राप्त होने से पहले मृत्यु को प्राप्त हो गये। लेकिन इससे विचलित हुये बिना सरकार कह रही है कि नयी सामान्य अवस्था है। हकीकत तो यह है कि इस ढाई साल की मोदी सरकार की शासनावधि में कई नवीन समान्य अवस्थाओं का सृजन हुआ। पहले साल में सरकार ने शतदिवस की अवधि पार की फिर साल भर निकाले उसके बाद साल लांघ् गयी और ढाई साल हो गये। इस अवधि में सरकार एक विरोधाभास से निकल दूसरे विरोधाभास में प्रवेश करती रही। आरंभिक काल में  ‘लव जिहाद’ से किल कर ‘घर वापसी ’ में गयी वहां से चली तो ‘बीप बैन ’ से ‘दादरी’ तक आयी और फिर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से नोटबंदी तक पहुंची। इनमें से हर के बाद थोड़ा बहुत उबाल आता है जिसका स्वरूप  नये विवाद के बाद बदल जाता है। बच क्या जाती है - ‘एक नयी अवस्था- न्यू नॉर्मल।’ यह नयी अवस्था जिसे हमारे सांसद कहते हैं कि लोग इसे स्वीकार कर लेंगे। इस नवीन अवस्था को खुद प्रधानमंत्री जी अपने भाषणों और चुप्पी से प्रोमोट कर रहे हैं। यह नयी अवस्था जो गाय के नाम पर हुड़दगी भीड़ पैदा करती है, हम क्या खायें या ना खायें इस बात में सरकार हस्तक्षेप करती है यह एक ऐसी नयी अवस्था है जिसमें सरकार आपको अपने पैसों कजिरूरी खर्चों के लिये निकालने से रोकदेती है। जरा हम पीछे लघ्टें आर इस सरकार के उन गौरवशाली दिनों को याद करें। गिरीराज सिंह तो याद होंगे, ये मंत्री महोदय सभी विरोधी विचार वालों को पाकिस्तान भेजने को तैयार रहते थे।वे पहली बार सुर्खियों 2014 में तब छाये जब उनहोंने मोदी जी की इालोचना करने वालों को पाकिस्तान भेजने की तजबीज कर रहे थे। ये सरकार में बने रहे और उनके साथ जुट गयीं ‘रामजादों से हराम जादों’ शोहरत वाली साध्वी निरंजन ज्योति।  क्या यह इस देश के लोगों के लिये नयी अवस्था नहीं है कि इस तरह की सोच और जुबान के  लोग हमारे माननीय सांसद और मंत्री महोदय हैं। जब मंत्रियों का जिक्र आया तो एक मंत्री महोदय है महेश शर्मा जो इन लोगों से वरिष्ठ है और उन्हें दादरी में अखलाक के हत्यारों से हमदर्दी जताने में किंचित पापशंका नहीं हुई। इस घटना के साल बर बाद भीड़ ने एक कथित हत्यारे को पीट पीट कर मार डाला था और महेश शर्मा वहां शोक जाहिर करने गये थ तथा उनके साथ थे संजीव बलियान जो 2013 के  मुजफ्फरनगर कांड में अभियुक्त हैं। उन्होंने हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं की उल्टे कहा कि जिसने बीप खाया है उसे सजा मिलनी चाहिये। प्रधानमंत्री ने जरूर इस हत्या की निंदा की। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई गाय के नाम पर किसी को मार डाले और गाय के नाम पर हुकूमत- ए-वक्त उसकी तरफदारी करे और नफरत फैलाने वाले बाषण पर उनसे कुछ ना कहे। सचमुच यह एक नयी अवस्था है। जुलाई 2016 में मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ था और उसमें राम चंद्र कठेरिया को मंत्रिपद से हटा दिया गया था। लेकिन उनकी पार्टी ने उनपर कार्रवाई नहीं की। कठेरिया ने हिंदुओं से अपील की थी कि वे मुसलमानों के खिलफ फैसलाकुन जंग छेड़ें। इस सूची में एक ही नाम नहीं है योगी आदित्यनाथ , संगीत सोम , हुकुम सिंह और सुरेश राणा जैसे लोग भी शामिल हैं। आदित्यनाथ तो घर वापसी आंदोलन के अगुआ लोगों में से एक हैं। सिंह , सोम और राणा तो मुजफ्फरनगर दंगों के समय हिंसा भड़काने वाले भषणों के लिये जाने जाते हैं। हुकुम सिंह तो कई बार दादरी गये और अखलाक के हत्यारों से सहानुभूति जता के आये। और भी ऐसी कई मिसालें हैं जिसे इस सरकार और सरकार की पार्टी ने पिछले ढाई वर्षों में बनायीं हैं। अगर इन्हें सरकार की कालयात्रा के मील के पतथर मान लिये जायें तो उन्होंने कई ऐसी नयी अवस्थाओं का सृजन किया है जो हमारे संविधान के लिये खतरा बन सकता है। ऐसा नहीं कि इसके पहले भारत में क्षतिकारी सरकारें नहीं रहीं हैं। हमारे देश ने तो इमरजेंसी के नाम पर संविधान का स्थगन तक देखा है। यह सरकार भी उसके ही आसपास खड़ी नजर आ रही है। सबसे बड़ा खतरा ये नयी अवस्थाएं हैं। स्मरण रहे कि विधिआधारित समाज के लिये इस चलन को खत्म करना जरूरी है। 

Thursday, December 1, 2016

व्यंग्य ः इंडिया है कि कुछ मानता ही नहीं

व्यंग्य ः ‘इंडिया कुछ मानता ही नहीं
इंडिया दैट काल्ड भारत में नोट बंदी के बाद सबसे ज्यादा हालत पाकिस्तान की अर्थ व्यवस्था की हुई। वहां के आतंकियों ने अपने रेट बढ़ा दिये और वहां की समाजव्यवस्था और सियासत में डगमगाहट आ गयी। जनरल मियां राहिल शरीफ ने भी बिना कुछ कहे घर का रुख अपना लिया कि चलो आंख फूटी पीर गयी अब बाजवा का बाजा बजेगा। उधर पाकिस्तान में लोगों से वसूली और नाहर्को टेररिज्म के आय में भी गिरावट आ गयी क्योंकि वह जो मुम्बई वाला भाई है उसके सारे छोकरे तो नोटबंदी के बाद नोट बदलने के लिये र्बैकों के सामने आ गये और जाली नोट का धंदा ही चैपट हो गया। इन सब हालात से ऊब कर मिया नवाज शरीफ एक रात  भारत आ गय(क्षमा करेंगे वे भारत भूमि पर नहीं लस्टमानंद के सपने में आये थे।) अब लस्टमानंद से जब मुलाकात हुई तो बात भी हुई। लस्टमानंद ने उनसे पूच कि मियां पी ओ के में सर्जिकल स्ट्राइक भूल गये क्या कि इधर कोलकाता में मटर गश्ती कर रहे हो।शरीफ ने मुस्कुराते हुये कहा कि मसला ए व्ला है पा ओ के ना कि सर्जिकल स्ट्राइक। इंडिया झूठ बोलता है थ्और अपने मुल्की भाइयों को बरगलाता है। अब तुम्हीं सोचो कि वह बार बार कहता है कि पी ओ के इंडिया का हिस्सा है तो ऐसे में वह हमला पाक पर कैसे हुआ। भाई मियां यह तो तुमने अपनी ही फौज से अपने इलाके में हमले कर अपने हीलोगों को मारा और बेवजह पाकिस्तान की हवा उड़ा रहे हो।यह तो इंडिया का अंदरूनी मसला है इसमें मैं क्या बताऊं। वैसे मेरी समझ संे यह मोदी साहब के दिमाग में कुछ गड़बड़ी जरूर हो गयी जिससे वे इस तरह की बहकी बहकी बातां कर रहे हैं। माशाल्लाह केजरीवाल साहब एक जहीन इंसान हैं उनहोंने सही कहा था कि कोई हमला वमला नहीं हुआ लेकिन उन्हें कोई सिरीयसली नहीं लेता। यही नही यू एन भी नहीं मानता कि हमला हुआ है। अब आप ही कहो कि आपकी सरकार कह रही है कि इस हमले में पाकिस्तान के 40 लोग मारे गये। कैसा झूठ है। अरे बाब हमने जांच करायी थी जो मरे थे वे मलेरिया और डेंगू से मरे थे। अहमक हैं मच्छरदानी नहीं लगाते थे। ... और यह नेशनल कांफ्रेंस के बुढ़ऊ मुस्तफा कमाल मियां तो सठिया गये हैं बेकार बकते यहते हैं , इज्जत संभालनी नहीं आती। मोदी साहब बोलते हैं कि पाकिस्तान अपने आतंकियों को रोके। अरे बबा, अब कैसे रोके? उन्हें फौज की हिफाजत में दे रखा है अब इससे ज्यादा क्या करेंगे। लेकिन मोदी साहब है कि अपनी बक बक से बाज नहीं आते और मीडिया वाले तो निरे अहमक हैं, बेमतलब की बात करके अपना और अपने मुल्क का वक्त खोटा करते हैं। अब देखों ना कहते फिर रहे हैं कि सार्क कांफ्रेस नहीं होने से पाकिस्तान की साख गिरी है। अरे बाबा हमने कभी इतनी ऊंची साख बनायी ही नहीं कि जब तब गिर जाय। ऐसी चीज बनायी ही क्यों जाय जो जब तब गिर जाय। अब मोदी साहब कोशिश में लगे हैं कि पाकिस्तान में सार्क नहीं हुआ और सर्जिकल स्टृइक हुआ अब वे इसी बहाने अमरीका को पट्टी पढ़ा रहे हैं कि वह पाक को अलग थलग कर दे। जब पाकिस्तान में ओसाता मिला तब तो अमरीका अलग थलग नहीं कर सका तो अब क्या करेगा। मोदी साहहब यह भूल जते हैं कि इंडिया में अमरीकी हथियार फकत यहां की सरकार ही खरीदती है  लेकिन हमारे मुल्क में सरकार के अलावा कई लोग खरीदते हैं। अब एक ग्राहक के लिये अमरीका कई खरीदरों को तंग नहीं करेगा। अब मोदी साहब यह भी कहते फिर रहे हैं ा कहो प्रचार कर रहे हैं कि पाकिस्तान की बुनियाद तीन खंभों पर है वे हैं सेना, राजनेता और आमलोग। लेकिन यह गलत है पाकिस्तान की बुनियाद मुकममल चार खंभों पर टिकी है और चौथा खंभा हैं आतंकवादी। यह लफ्ज सुनते ही नींद खुल गयी। सामने बीवी खड़ी थी हाथ में पोलीथीन का थैला लिये , बोल रही थी सुबह सुबह क्या सपना देख रहे थे कि इतना बड़बड़ा रहे थे। मैने कहा, मोहतरमा आपके भाई साहब सपने में मिले थे।

मानवीयता से दूर है नोट बंदी का निर्णय

मानवीयता से दूर है नोटबंदी का निर्णय 

अब से इक्कीस दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक रात देश के नाम यह संदेश दिया कि रात 12 बजे से हजार और पांच सौ के नोट रद्द कर दिये जायेंगे और वे कागज के टुकड़े में बदल जायेंगे। तबसे इस कारण होने वाली कठिनाइयों के बारे में लगभग कई कोणों तथा दृष्टिकोणों से बहुत बातें कहीं गयीं। इन बातों को दोदीभक्तों की टीम नेखारिज कर दिया लेकि साथ ही साथ सरकार ने इस फैसले में बार बार संशोधन किया । यही नहीं रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी कई सर्कुलर जारी कर संशोधन किया। इस मामले सबसे मार्मिक टिप्पणी विख्यात अर्थ शास्त्री अमर्प्य सेन की थी। अमर्त्य सेन कहा था कि ‘‘इस फैसले में ना मानवीयता है और ना व्यवहारिकता। इसमें लाभ कम और परेशानियां ज्यादा हैं।’’ कई अन्य अर्थशा​िस्त्रयों ने भी कहा है कि सरकार ने मच्छर मारने के लिये तोप चला दिया। इस मामले सबसे ताजा प्रस्ताव सरकार की ओर आयकर कानून में संशोधन के सम्बंध में आया है। वह भी उतना सही नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसका विरोध करते हुये कहा कि ‘‘यह कालाधन रखने वालों को बचाने की कोशिश है। ’’ इधर सरकार के बार के फैसलों को देखें तो यह साफ जाहिर हो जाता है कि नोटबंदी का फैसला अपनी मौज में लिया गया है, इसपर ज्यादा सोचा विचारा नहीं गया। लोग अभी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि जो रुपया बषैंक में गया वह बंद हो गया, क्योंकि एक सीमा के उपर निकालना वर्जित है। अभी लोगों का ध्यान इधर नहीं है , क्योंकि सब ताजा कठिनायी से उबरने में लगे हैं। जिस दिन इससे निजात मिलेगी उसके बाद से लोग इसे महसूस करना शुरू करेंगे। तब मोदी जी के समर्थकों को अहसास होगा कि क्या हुआ। सोमवार वित्तमंत्री ने आयकर संशोदान का प्रस्ताव किया। यह नया कानून अघोषित आय यानी काले दान के साथ नया बर्ताव करता महसूस होता है। क्योंकि इसमें जो सबसे महतवपूर्ण दो पहलू हैं वे यह हैं कि काले धन का पता स्वैच्छिक घोषणा से चल है या आयकर विभाग की जांच से। स्वैच्छिक घोषणा करने वालों को केवल 50 प्रतिशत टैक्स देना होगा और बाकी के 50 प्रतिशत रकम का आधा किसी बिना व्याज वाली योजना में चार वर्ष के लिये चला जायेगा। इस मामले में यह नहीं पूछा जायेगा कि यह धन कहां से आया। दूसरा जो पहलू है वह आयकर की तफ्तीश के दौरान पाया गया धन। इसपर 85 प्रतिशत तक टैक्स देका पड़ सकता है। अब गौर करें कि कालेधन को निकालने और स्वैच्छिक घोषणा की बात है वह है कि इसमें स्रोत नहीं पूच जायेगा। अब अगर आपने र्बैक को लूट कर वह दौलत खड़ी है तब आपसे इस मामले कैफियत नहीं पूछी जायेगी। सरकार ने कहा है कि एक खास अवधि तक ही यह छूट मिलेगी और उसके बाद 90 प्रतिशत तक टैक्स लगेगा। वित्तमंत्रालय ने यह संकेत दिया कि ढाई लाख रुपयों तक की जमा की जांच नहीं होगी पर यह साफ नहीं है कि यह छूट अभी जारी है अथवा नहीं। यह भी साफ नहीं है कि आय कर विभाग कितनी रकम तक जांच नहीं करेगा। वह 2.5 लाख से नीचे की रकम की जांच भी कर सकता है। बेशक इससे पता चलता है कि सरकार कालेदान को बाहर करने तें सचेष्ट हैऔर उससे प्राप्त धन को देश के विकास में लगाना भी चाहती है। लेकिन इससे कुछ सवाल भी सामने आते हैं। एक तरह से सरकार ने यह मान लिया कि प्रशासन कानून को मनवाने में विफल रहा है साथ ही ब्लैक मनी बनाने और बढ़ाने की प्रक्रिया में मददगार रही है। ब कालाधन इतना बड़ा आकार ले चुका है कि उसे रोकना संभ्टाव नहीं है ऐसे में टैक्स कानून में सुधार जरूरी था न कि कानून में नये प्रवधान जोड़ना। यही नहीं , इतनी तेजी से हो रही घोषणाओं और संशोधनों से लगता है कि सरकार ने अपनी मर्जी से किया, इसमें चिंतन और तैयारी नहीं थी। इस फैसले से समाज की साइकी में एक विशेष परिवर्तन दिख रहा है वह कि समाज का हर फर्द एक खास किस्म की अनिश्चयता और बेचैनी में है कि कब क्या फैसला आ जाय। यही नहीं बेईमानों के भीतर एक उम्मीद पनप रही र्है कि टैक्स और चोरी की जाय, सरकार इस तरह की छूट और देगी। इससे संकेत मिल रहे हैं कि ये योजनाएं उतनी सफल नहीं होंगी जितनी प्रचारित की जा रहीं हैं।  इससे एक मौन क्रांति सुगबुगाती दिख रही है। एक बार सोचें कि देश में एक आदमी को अपनी मर्जी से इस तरह के फैसले लेने की आजादी है जिससे आबादी के हर पांचवें आदमी का जीवन कष्टमय हो जाय और इसी आदमी के हाथ में परमाणु बम का बटन भी है। ऐसा भी महसूस हो रहा है कि मोदी जी में स्थाई तौर पर महिमावान होनी की अदम्य ललक है और इसकी पूर्ति के लिये वे हो सकता है भविष्य में आपातकाल की घोषणा कर दें। क्योंकि मोदी जी के कदमों से साफ समझा जा सकता है कि वे ज्यादा से ज्यादा दमनकारी उपाय की तरफ बढ़ रहे हैं और लोगों को सुरक्षात्मक उपायों को अपनाने से वंचित कर रहे हैं। एक लोकतांत्रिक देश धीरे धीरे ‘पुलिस राज ’ में बदलता जा रहा है।