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Thursday, September 7, 2017

आओ शपथ लें

आओ शपथ लें
पत्रकार गौरी लंकेश का मारा जाना भारत में पत्रकारों कि ह्त्या की  कड़ी में एक और नाम जुड़ने के सिवा शायद ही कुछ हो सके. यह काण्ड भी राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की फाइलों में दर्ज हो जाएगा , थोड़े दिन थोड़ी सरगर्मी रहेगी और फिर सब शांत हो जाएगा. एन सी आर बी के आंकड़े बताते हैं कि विगत दो वर्षों में इस देश में पत्रकारों पर 142 घातक हमले हुए हैं जिनमें 2014 में 114 तथा 2015 में 28 घटनाएं घटी हैं.  पत्रकारों पर इन जानलेवा हमलों के सिलसिले में हमारे महान राष्ट्र की पुलिस ने महज 73 लोगों को गिरफ्तार किया है.इन घटनाओं में सबसे ज्यादा वाकये उत्तर प्रदेश में हुए जहां  दो वर्षों 64 पत्रकारों कि हत्या की कोशिश की गई और इन सभी मामलों में (छि:) केवल 4 लोग पकडे गए. इसके बाद दूसरा नंबर है मद्धय प्रदेश का जहां 26 हमले हुए और इसके बाद बिहार जहां 22  हमले हुए. यह जानकर दुःख होगा  कि नारद और विदुर जैसे समाचार प्रवीण  लोगों की  इस धरती का दुनिया में प्रेस की  आज़ादी के मामले में 136 वां स्थान है जबकि एक साल पहले इसका 133 वां स्थान था. सिर्फ एक वर्ष में देश 3 सीढ़ी नीचे उतर गया. घर में अखबार अब किसी बुज़ुर्ग सा लगता है ज़रुरत किसी को नहीं , ज़रूरी फिर भी है लंकेश की  हत्या के संदर्भ में पत्रकारों की हत्या पर ही सोचें,  इनका दोष केवल इतना ही था कि इनहोंने सत्ता या सत्ता से जुड़े संगठन , समूह अथवा गिरोह की ओर अपनी कलम की नोक से इशारा किया था. इसी तरह  लंकेश का दोष इतना ही था कि वह अपनी कलम से दक्षिणपंथी भगवा ब्रांड की  मुखालफत करती थीं.चाहें वह गाय को लेकर हत्या हो या कलम को लेकर सबमें एक बात सामान दिखती है कि ऐसी घटनाओं के बाद कुछ जाने पहचाने लोग टी वी अथवा सोशल मीडिया में छा  जाते हैं जो लगातार यह कहते हैं कि मामले को सांप्रदायिक ना बनाएं. उनका यह कहना कैमरे के सामने होता है या अक्षरों की तरतीब में होता है जो एक आभासी दुनिया में वर्तमान में ऐसा करने वालों को शाबाशी देता है तथा भविष्य में ऐसा करने के लिए सन्देश देता है तथा विरोधियों को चेतावनी भी. अगर कोई यह खुल कर कहता है कि हिन्दू धर्म या कहें सनातन धर्म अथवा उसके धार्मिक प्रतीकों को किसी से कोई ख़तरा नहीं है. वह हज़ारों वर्षों से कायाम हैं तो अपने बूते पर, सियासी चमचों के बल पर नहीं तो उसे गालियां मिलतीं है। वे समझते नहीं कि यूनानो मिस्र रोमा सब मिट गए इस जहां से क्या बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी इन मोटरसाइकिल सवार हत्यारों कौन समझाए कि अगर हमारे यहाँ राम, शिव और विष्णु हैं तो चार्वाक मीमांसा भी है  , सांख्य दर्शन भी है. हमारे ऋषियों को इससे कोई समस्या नहीं थी. सनातन धर्म में असहमति तो स्वीकार्य है. दक्षिण पंथी हिंदुत्व के विरोधियों पर हमले करने वाले ये लोग गौरवशाली परम्परा के भारतीय नहीं हैं बल्कि मॉल में बिकने वाले प्लास्टिक के गुड्डे हैं और यही बिम्ब का रूप धारण कर हमारे समाज को चलाने का जिम्मा ले बैठे हैं. ऐसे में अगर एक पत्रकार खून से लथपथ पड़ा है तो यह बहुत जरूरी है कि हम अच्छी  पत्रकारिता के सिद्धांतों  के प्रति उस खून की  शपथ लें, क्योंकि यह एक साधारण हत्या नहीं है यह सबूत है कि हमारे राष्ट्र की आत्मा को चीर दिया गया है और ऐसी स्थिति में कलमकार चुप नहीं रह सकता है. कवियत्री कल्पना झा ने लिखा है हमें मजबूर ना करो वरना दुनिया की सारी कलमों की नोक तुम्हारी तरफ होंगी और तुम्हे चीर कर रख देंगीं.   मनोवैज्ञानिक तौर पर हमें कायर और डरपोक बनाने की यह  साज़िश है. मनोविज्ञानी बिल क्रोव्फार्ड ने एक बार कहा था कि “ सबसे अहम् चीजों को सबसे मामूली चीजों कि दया पर नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए. “ हत्यारा चाहें जो भी हो वह हत्यारा है और फ्रेडरिक फोरसिथ ने “ द डे ऑफ द जैकल ” में लिखा है कि “”हत्यारा चाहें जो भी हो वह दुनिया का अपराधी है और उसे पकड़ा जाना चाहिए यह सोचे बिना कि वह किस राजनीतिक दल से जुड़ा है.” लेकिन अफ़सोस यहाँ बात उल्टी  है , फोरसिथ की  बात यहाँ लागू नहीं होगी भाई साहब. तेरा आदर्श तेरे मूल्य सारे बिक गए बापू तेरा लोटा तेरा चश्मा तेरा घरबार बिकता है.   

Wednesday, September 6, 2017

फूटने वाला है मोदी का गुब्बारा

फूटने वाला है मोदी का गुब्बारा

देश में एक साथ लगभग तीन ऐसी घटनाएं हुई हैं जिससे /पाता चलने लगा है कि मोदी जी कि छवि धूमिल होने वाली है. अगर मोदी जी से मुल्क यह पूछे कि इस तरह से मंत्रिमंडल में फेर बदल क्यों? छोटा सा उत्तर होगा कि संघ में बेचैनी बढ़ रही थी. अभी हाल में संघ ने कहा था कि भा ज पा के प्रति मतदाता लम्बे अर्से तक मोहग्रस्त रहे , मोह कि यह स्थिति इतनी लम्बी थी जितनी किसी भी सरकार और मतदाताओं के बीच नहीं रही पर अब जनता का मोह भंग हो रहा है. तीन वर्षग तक मोदी जी के सियासी सितारे बुलंदी पर थे. भारतीय मध्यवर्ग मोदी भजन में लीन था. यहाँ तक कि डाक्टर-इन्जीनियर-पत्रकार तक झाल बजा रहे थे. प्रवासी भारतीय तो उनके प्रति समर्पित थे. विपक्षी नेता तो अपने भविष्य के भय से भाग – भाग कर भा ज पा में “ढुक” रहे थे. यहाँ तक कि एक जमाने में विपक्ष के सबसे बड़े कद्दावर नेता नीतीश कुमारे ने भी इसी डर भाजपा का दामन पकड़ लिया. मोदी जी ने जनता को बड़े बड़े वायदों का झुनझुना थमाकर और मीडिया कि माया से इतना बड़ा तिलिस्म पैदा किया कि वे  वायदे सच जैसे लगने लगे , बिल्क्कुल मृग मरीचिका की  भांति. जहां भी जाईये जब भी टी वी खोलिए मोदी जी दीखते थे एक नए कार्यक्रम यता एक नयी योजना की  घोषणा करते  या चल रहे कार्यक्रम में लोगों को शामिल होते हुए बताते. सर्वत्र मोदी, घर-घर मोदी . इस वर्ष केंद्र सरकार के विज्ञापन का खर्च  1,153 करोड़ रूपये था, यह रकम गत वर्ष से 200 करोड़ ज्यादा थी. जी हाँ , अमीरों और गरीबों में द्वेष पैदा कर , नोट बंदी के नाम से देश की  अर्थ व्यवस्था के साथ जुआ खेलकर केवल वायदों को हकीक़त सा  दिखाने के लिए उन्होंने देश नकी जनता के गाढ़े पसीने की कमाई से लिए गए टैक्स का साढ़े 11सौ करोड़ रुपयों से ज्यादा खर्च कर दिया. यही नहीं सोशल मीडिया में तो मोदी जी का प्रोपगैंडा करने वालों का मेला लगा रहता है. उनकी नीतोयों में खोट निकालने वालों को लानतें भेजी जाती हैं. इस चतुर्दिक प्रचार के तिलिस्मात ने आम आदमी के सोचने की  ताक़त को ख़त्म कर दिया. यही कारण है कि भा ज पा के मुकाबले के लिए तैयार किया जाने वाला कोई भी संयुक्त मंच कामयाब नहीं हो पाया. यह विश्वास बैठ गया है कि 2019 में फिउर यही आयेंगे , इसके कारण विरोधी न्प्रयास शिथिल हो गए.

      गरचे , क़द्देआदम से बड़ी तस्वीर हो जाए तो उसके साज – संभाल और संतुलम में भी कठिनाई हो जाती है. एक साथ तीन ऐसी घटनाएं घटीं कि मोदी जी कि छवि डगमगाने लगी. हालांकि यह डगमगाहट मामूली है लेकिन यह तो दिखने लगा कि तस्वीर कि चमक धूमिल हो रही है है, कहीं कुछ गड़बड़ है. पहली कि डोकलम से बिना शर्त वापसी, नोट बंदी के बाद 99% नोटों के बैंकों में वापस आ जाना और तीसरी घटना है सकल घरेलू उत्पाद ( जी डीपी ) में गिरावट. ज़रा सोचें चार दिनों के भीतर देश में डो ट्रेन दुर्घटनाएं जिसमें 20 यात्री मारे गए और 200 से ज्यादा घयल हो गए. आदित्यनाथ के घर गोरखपुर में एक अस्पताल में महज ओक्सिजन जैसी बुनियादी सुविधा के आभाव में 67 बच्चों कि मौत ने “ संघ परिवार ” के न्यू इंडिया कि हवा निकाल दी. सरकार कि तरफ से इन घटनाओं का लगातार और पूरी तरह खंडन यह बताता है कि सरकार को मालूम है कि पाँव तले  की  ज़मीन खिसक रही है.

  डोकलम से बिना शर्त वापस आने का स्पष्ट कूटनीतिक अर्थ है कि युद्ध तलने और सामान्य कूटनीतिक सम्बंधों को बहाल करने की चीन के पूर्व शर्त को भारत ने मान लिया. मोदी के कीर्तनीय अब कहते चल रहे हैं कि भारत ने बड़ी कामयाबी हासिल की है और चीन को कूटनीतिक झटका लगा है. जबकि कहना यह चाहिए था कि दोनों पक्षों ने “गुडसेन्स” से काम लिया. कीर्तन का शोर इतना बढ़ा कि चीन भी आजिज आ गया और बाध्य हो कर चीनी विदेश विभाग ने बयान जारी किया कि “ चीन की सीमा वाहिनी विवादित क्षेत्र में लगातार गश्त लगाती रहेगी .”  यही नहीं चीन ने यह भी कहा कि सभी पहलुओं पर यहाँ तक कि मौसम कि स्थिति परे विचार के बाद  विचार के बाद सीमा सड़क का काम जारी रहेगा. यहाँ मौसम शब्द पर गौर करी, इसका मतलब है कि इस वर्ष सड़क बनाने का काम शुरू नहीं होगा. यानी 8 महीनो तक रिश्ते ठीक रहेंगे. भारतीय जनता कूटनीतिक  मुहावरे नहीं समझती. इसका साफ़  अर्थ है कि हम वहां पिट गए और मामला कुछ समय बाद फिर उठेगा.

इसी तरह नोट बंदी के बाद 99% नोटों की  वापसी से सरकार नर्वस है. वह दलील पर दलील दे रही है तरह तरह के लक्ष्य बदल रही है. ख़बरों को मानें तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नोट बंदी के औचित्य को बताने के लिए 11 वीं बार बयान बदला है. वही हाल जीडीपी का है. सरकार इसकी गिरावट  का स्पष्ट कारण बता ही नहीं पा रही है. निष्कर्ष यह है कि अच्छे दिन वाले बयां बेकार हो गए. अब कोई चमत्कार ही दुबारा हवा बना सकता है वरना गुब्बारा फूटने वाला है.   

Tuesday, September 5, 2017

नदियों किनारे शहर बने हैं  

नदियों किनारे शहर बने हैं  

दुनिया के सारे बड़े शहर नदियों के किनारे बसे  हैं या किसी ना किसी जलस्रोत के किनारे बसे है ताकि शहर को पीने के पानी , परिवहन , स्वच्छता सहित अन्य सुविधाये हासिल हो सकें. हमारी शहरी पूर्वजों के लिए एक समय में जो वरदान था वह आज अभिशाप हो गया है या ऐसा कहें समस्या बन गयी है. शहरों में मामूली बारिश के बाद बाढ़ आ जा रही है. अभी हाल में मुंबई में बाढ़ आयी और कई बहुमंजिली इमारतें ध्वस्त हो गयीं, कई लोग मारे गए. पिछले शुक्रवार को लगभग आधे घंटे जैम कर बारिश हुई और शहर के कई अंचल में घुटनों तक पानी भर गया. लोग मुंबई की बाढ़ के सन्दर्भ में इसे देखने लगे. ऐसा लग्भ्गाग हर बड़े शहर में होता है. सवाल है क्यों? सीधा जवाब है कि अपने स्वार्थ के कारण शहर कि व्यवस्था में इंसानी हस्तक्षेप. भारतीय शहरों के तीनो डाइमेंशन – लम्बाई , चौड़ाई और ऊंचाई – बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं. हर दिन हज़ारों लोग बसने के लिए शहरों में आ जाते हैं और जो व्यबस्था है उसपर ब्दबाव बढ़ जाता है. अब जल निकासी स्वच्छता और सड़कों कि समुचित व्यवस्था के अभाव में थोड़ी बारिश में ब्वाध आ जाती है. यह हाल कव्वाल कोल्कताता का ही नहीं दुनिया के ल;अग्भाग सभी बड़े शहरों का है. कुछ साल पहले न्यूयार्क में बाढ़ आयी थी, बीजिंग और शंघाई में आयी थी. भारत में सन 2000 में हैदराबाद, 2005 और इसवर्ष पिछले हफ्ते  में मुंबई , 2007 में कोलकाता, 2014 में श्रीनगर और 2015 में चेन्नई की बाढ़ कि खबरें  सुर्खिया बनी थीं. शहरों की बाढ़  सारे शहरातियों को मुश्किल में डाल  देती है पर जो लोग निम्न मध्यवर्ग के हैं और जो शहर के निचले भाग में रहते हैं उनका जीवन कठिनाईयों से भर जाता है, क्योंकि रिहाईश कि सनुचित व्यवस्था नहीं होती , ढांचागत सुविधाओं का अभाव होता है, स्वास्थ्य सेवा, आपातकालीन सेवा और राहत एवं बचाव सुविधाओं का अभाव होता है.

शहरी बाढ़ अक्सर स्थान विशेष पर भारी बारिश के कारण  आती है जिसे वहाँ मौजूद इन्फ्रास्ट्रक्चर संभाल नहीं पाता. परिवहन सेवा ठप हो जाती है. संचार व्यवस्था भी गड़बड़ हो जाती है , ना बिजली मना पीने का पानी. अर्थव्यवस्था चरमराने लगती है. भारी बारिश के जटिल भगौलिक फिनोमिना होते हैं और इसका एक कारण नहीं बताया जा  सकता है. मसलन 2015 में चेन्नई में आये बाढ़ को अल नीनो नामक चक्रवात को कारण बताया जाता तो जबकि 2005 के मुंबई कि बाढ़ के चार कारण बताये जाते हैं , पहला कि बंगाल की खाड़ी के उत्तर पश्चिमी भाग में वायु का निम्न दबाव , अरबी मानसून का तेज होना , अरब सागर में तूफ़ान, उत्तर पश्चिम अरब सागर में भारी बारिश इत्यादि. मौसम में बदलाव भी इसका कारण नही. मौसम वैज्ञानिकों ने तो मंस्सोनी बरसात कि तीव्रता को लेकर कई बार चेतावनी दी है. राष्ट्र संघ कि पर्यावरण कि हाल की रिपोर्ट में कहा गया है की ग्लोबल वार्मिंग की  वजह से वर्षा के पैटर्न बदल गए हैं. ग्लोबल मौसम के बदलाव के फलस्वरूप भारी बारिश के सामने टिक नहीं पाने का मुख्य कारण शहरों  का योजनाहीन तरीके से विकास. एक तो ऐसे इलाकों में जल निकासी की अपर्याप्त व्यवस्था होती है है और जो राहती भी है वह खान पान , रहन सहन और जीवनशैली के कारण बिगड़ जाती है. दूसरे घर बनाने वाले लोभी बिल्डर नीची जमीन में भी इमारतें बना कर बेच दे रहे हैं इससे बाढ़ कि आशंकाएं बढ़ जा रही हैं. शहरी बाढ़ की रोकथाम के लिए अनेक ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है. जलनिकासी मार्ग ठीक प्रकार से चिह्नित होना चाहिए और शहर के प्राकृतिक जलनिकासी तंत्र में कोई अतिक्रमण नहीं होना चाहिए. उपेक्षा या गलत प्रबंधन के चलते बाढ़ क्षेत्र की जलनिकासी मार्ग बाधित हो चुकी है. इनको तुरंत दुरुस्त करना होगा. लगभग सभी शहरों पर जनसंख्या का दबाव ऐसा पड़ रहा है कि बाढ़ क्षेत्र में बस्तियां बसने लगी हैं. इन अतिक्रमण के खिलाफ मुहिम छेड़नी होगी. जो बड़ी संख्या में पुल,ओवरब्रिज समेत मेट्रो परियोजनाओं का निर्माण हो रहा है वह मौजूदा जलनिकासी मार्गों में किया जा रहा है. उचित इंजीनियरिंग डिजाइनों जैसे केंटिलीवर निर्माण आदि का सहारा लेकर ड्रेनेज सिस्टम की रक्षा की जा सकती है.जमीन सिर्फ मकान बनाने के लिए नहीं है,पानी के लिए भी है. ताल-तलैये और पोखर शहर के सोख्ते की तरह हैं. बाढ़ नियंत्रण के इन परंपरागत तरीके के प्रति उपेक्षा ने स्थिति को और गंभीर बनाया है. जलवायु परिवर्तन के चलते बेमौसम या मानसून के दौरान जब भारी बारिश होती है तो पानी के निकलने का कोई स्थान नहीं बचता है. लिहाजा बाढ़ और विनाश अवश्यंभावी हो जाते हैं. इन्हें फिर से पुनर्जीवन देकर शहरी बाढ़ का प्रभाव कम किया जा सकता है. इसके अलावा छिद्रदार फुटपाथ बनाए जाने चाहिए जिससे पानी सतह के नीचे की मिट्टी तक पहुंच जाता है.शहरों की  बाढ़ को केवल तब ही रोका जा सकता है जब स्थानीय स्तर  पर नीति ना बने. शहर विकास नीति के निर्माण के समय  मौसम परिवर्तन कि हकीक़त को ध्यान में रखा जाना चाहिए. फिलहाल हमारे शहरों कि हिफाज़त के लिए जिम्मेदार एजेंसियां तदर्थ तौर पर काम करतीं हैं. वे पहले से नहीं तैयार नहीं रहतीं है. इस तरह की जटिल चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए. सड़क, जलनिकासी, आवास जैसे मौसम से प्रभावित होने वाले सेक्टर को इसके लिए तैयार रहना चाहिए.   

Sunday, September 3, 2017

तीसरी बार मोदी जी ने किया फेरबदल

तीसरी बार मोदी जी ने किया फेरबदल

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार में लगभग 3 वर्षों में रविवार को तीसरी बार फेर बदल किया. उन्होंने मंत्री परिषद में 9 मंत्रियों को शामिल किये और चार मंत्रियों को प्रोन्नति दी. कैबिनेट रैंक में प्रोन्नत किये गए 4 मंत्री हैं सर्वश्री धर्मेन्द्र प्रधान, पियूष गोयल, मुख्तार अबास नकवी और निर्मला सीतारमण. निर्मला सीतारमण को तक्षा मंत्रालय सौंपा गया है. इंदिरा जी के बाद वे देश की पहली महिला रक्षा मंत्री हैं. पियूष गोयल को रेल मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया है. इसकी अटकलें पहले से लगाई जा रहीं थीं. लेकिन सुरेश प्रभु को रेल मंत्रालय से हटा कर बाहर नहीं किया गया बल्कि उन्हें वाणिज्य मंत्रालय सौंपा गया.  इसके पहले अटकलें थीं कि एन डी ए गठबंधन के दलों से कुछ लोग लिए जायेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं. जो नए मंत्री शामिल किये गए हैं उनमें अफसरशाही के 43 अवकाशप्राप्त लोग हैं , वे हैं – भारतीय विदेश सेवा के हरदीप सिंह पूरी, पूर्व आई ए एस अधिकारी अलफोंस कन्नान नाथन,पूर्व गृह सचिव आर के सिंह और पूर्व आई पी एस ऑफिसर सत्यपाल सिंह. इनके अलावा राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला , बक्सर के सांसद आश्विनी कुमार चौबे, टीकमगढ़ से संसद वीरेंदर कुमार, उत्तर कन्नड़ से संसद अनंत कुमार हेगड़े और जोधपुर से संसद गजेंदर सिंह शेखावत. इन्हें रविवार को राष्ट्रपति भवन में एक सादे समारोह में राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई. फेरबदल से पहले कलराज मिश्रा , बंडारू दत्तात्रेय, राजीव प्रताप रूडी, संजीव कुमार बालियाँ , फग्गन सिंह कुलस्ते, महेंद्र नाथ पाण्डेय ने इस्तीफा दे दिया था. इस फेर बदल के बाद मंत्रिमंडल में मंत्रियों की संख्या 73 से बढ़ कर 77 हो गयी. यहाँ दिलचस्प यह है कि “मिनिमम गवर्नमेंट , मक्सिमम गवार्नेंस ”  का नारा देने वाले नरेन्द्र मोदी जी के मंत्रिमंडल में 77 मंत्री हैं जो संविधान की धारा 72 के अनुसार सर्वोच्च संख्या 82 से मह्ज 5 कम हैं. सरकार मई 2014 में 46 मंत्रियों से शुरू हुई थी और अब यह 77 पहुँच गयी है.

इस फेरबदल का असर गठबंधन के दलों पर भी पडेगा, हालांकि जनता दल (यू) ने इसपर कोई टिपण्णी करने से इनकार कर दिया है हलाकि शिव सेना ने इस फेरबदल की आलोचना की है.

 इस फेर बदल से कई सन्देश जाते हैं मसलन निर्मला सीतारमण , पियूष गोयल , धरमेंदर प्रधान, मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नौजवान आगे आरहे हैं साथ ही अफसरशाही से लिए गए मंत्रियों से यह पता चलता है कि पेशेवर लोगों को शामिल किया जा रहा है. कुछ मंत्रियों को हटाये जाने से यह लग रहा है कि सरकार डीएव गाये काम पूरा करने वालों को ही पद देगी. साथ ही इससे यह भी महसूस हो रहा है कि सरकार की नज़र अगले लोक सभा चुनाव पर है. क्योंकि इस बार मंत्री मंडल में दो दो मंत्री उत्तर प्रदेश और बिहार से शामिल किये गए हैं. चुनाव की दृष्टि नसे ये दोनों राज्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि केवल इन्ही दोनों राज्यों से 120 सांसद आते हैं. यही नहीं मंत्रियों की प्रोन्नति से साफ़ जाहिर होता है कि जिन्होंने काम किया उन्हें तरक्की मिली.

परन्तु कई विश्लेषकों का मानना है कि इस फेरबदल का काम से कोई लेनादेना नहीं है या अगर है भी तो बहुत कम है. क्योंकि अभी तक कोई ऐसा आंकडा नहीं सामने आया है जिससे पता चले कि किसी विशेष मंत्रालय ने कोई विशेष काम किया है या कितना काम किया है. अगर ऐसा होता तो अर्थव्यवस्था की खस्ता हाली के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली को बाहर  का रास्ता दिखा दिया गया होता. सच कहें तो इस सरकार में आधे मंत्री तो नकारा हैं बस यह सारा कारोबार मोदी- शाह की जुगलबंदी का नतीजा है. साड़ी सत्ता और सारे अधिकार थो प्रधान मंत्री के हाथ में है और जन्नता मंत्रियों से काम चाहती है. सत्ता के गलियारों तो यह कहा जता है कि मोदी जी के हुक्म के बिना कोई जबान नहीं खोल सकता है. यह पूरा फेर बदल सत्तारूढ़ दल के इन्टरनल डायनामिक्स का नतीजा है. 2019 धीरे धीरे नज़दीक आता जा रहा है. नोट बंदी के गलत प्रभाव दिखने लगे है. सरकार ने  इस प्रभाव को समाप्त करने के निये यह कदम  उठाया है.   

Friday, September 1, 2017

विकास तो हुआ है पर असमानता भी बढ़ी है

विकास तो हुआ है पर असमानता भी बढ़ी है

भारत में विकास की तेज रफ़्तार किसी से छिपी नहीं है , देश विकसित हो रहा है. वैसे दोषदर्शियों की माने तो विकास के बदले हम अधोगति की और बढ़ रहे हैं. लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि आम जनता विकास का लाभ कम उठा पा रही है. अमीर और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब विपन्नता की और बढ़ रहे हैं या फिर एक जगह ही स्थिर हैं. आंकड़े बताते हैं की फिलहाल देश में १०१ ऐसे लोग हैं जिनकी दौलत अरबों डॉलर में है. 2 लाख 36 हज़ार लोग हैं जो जिनके पास करोडो डॉलर का कोष है. यहाँ कहने का अर्थ है की ये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अरबपति और करोड़ पति हैं . दूसरी तरफ करोडो ऐसे भी लोग हैं जिनको पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता, खुले में शौच करना होता है. बड़े शेरोन में अमीरों की अट्टालिकाएं हैं तो उसके समीप ही से कई किलोमीटर तक फैली झुग्गी- झोपड़ियां भी हैं. 9.4 ख़रब डॉलर की विशाल अर्थव्यवस्था वाले इस देश में सैकड़ों ऐसे क्षेत्र हैं जहां भुखमरी या भयानक गरीबी साफ़ दिखती है. हालाँकि आय और धन के मामले में असमानता अपरिहार्य है और दुनिया के हर देश में यह दिखता है, लेकिन विगत तीन दशकों से भारत में बढती असमानता स्पष्ट दिख रही है. अमीरों और अन्य लोगो में असमानता  बढती जा रही है. अमीरों ने देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था में अपना प्रभाव बढ़ा लिया है जबकि गरीब तेज गति से हाशिये पोअर पहुँचते जा रहे हैं और समाज तथा सरकार पर उनका प्रभाव शून्य की ओर बढ़ रहा है. दुनिया के सभी देशों में असमानता है पर उनके बीच की दूरी अलग अलग है. कई देशों ने ज़रूरी उपाय करके इस दूरी को और कम किया है. भारत में बेशक कोशिशें चल रहीं हैं पर कुछ  होता नहीं दिख रहा है अथवा हो रहा है तो बहुत मामूली तौर पर.

  भारत में जैसी असमानता है वह खतरनाक स्थिति की और बढती जा रही है. ऐसे हालात में म,अनुशय का अपना मूल्य और आत्म विश्वास घाट जाता है. अपराध बढ़ने लगते हैं , बीमारियाँ फैलने लगती है, पर्यावरण बिगड़ने लगता है साथ ही आतंकवादी विचारों को बढ़ावा मिलने लगता है. इससे यकीनन एक खुशहाल समाज तो नहीं बन पाता उलटे वह पथभ्रष्ट हो जाता है. डेवलपमेंट और फाइनांस पर जारी ऑक्सफैम की ताज़ा रपट ( जुलाई 17 ) में 152 देशों की एक सूची प्रकाशित की गयी है जिन मुल्कों ने अमीरी-गरीबी की बीच की दूरी मिटाने की सफल कोशिश की है  उसमें भारत का स्थान ऊपर से 132 वां है.

हालांकि एन डी ए सरकार ने वित्तीय समावेशन की नीति को बढ़ावा दे रही है ताकि असमानता कम हो पर इसमें भरी विवाद भी है. वस्तुतः सरकार विदेशों में भारत की एक ऐसी छवि पेश करने की कोशिश में जो तेज़ी से विकसित हो रही  अर्थ व्यवस्था है और यहाँ निवेश की बड़ी संभावनाएं हैं. यह भी सही है की गरीबी कुछ कम हुई है. पर अभी भी लगभग 25 करोड़ ऐसे लोग हैं जिनकी आय 2 डॉलर या 120 रूपए रोजाना से कम है. इससे सामाजिक विकास शून्य हो जाता है और गरीब के बच्चे गरीब रहने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं. कुछ अपवादों को छोड़ कर अधिकाँश नौजवानों के पास अवसर कम हें. इससे उनकी प्रतिभा और कौशल का सदुपयोग नहीं हो सकता और वे कुंठित हों जाते हैं. ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार जिन देशों में इस असमानता को दूर करने में कामयाबी मिली है उन्होंने सार्वजनिक सेवा , प्रगतिशील टैक्स प्रणाली और श्रमिक अधिकार जैसे कदम उठाये हैं. भारत में ऐसा नहीं हो पा रहा है. यहाँ श्रमिक अधिकार के मामले में बहुत पिछड़ापन है खास कर महिलाओं के मामले में. श्रमिक अधिका के सम्बन्ध भारत अभी बहुत पीछे है. दूसरी बात कि अधिकाँश श्रमिक खेती या अनौपचारिक क्षेत्र में लगे हैं. दक्षिण एशिया जिन देशों ने असमानता को घटाया है उनमें नेपाल का नाम पहला है, मालदीव दूसरा और भारत तीसरे नंबर पर है. जबकि पूरी दुनिया में स्वीडेन का स्थान पहला है.

असमानता की माप का जो तरीका है उसे पाल्मा रेश्यो कहते हैं और विश्लेषकों के अनुसार यह सबसे वैज्ञानिक तरिका है. इसमें देश के सरवोच्च आय वाले 10 प्रतिशत लोगों का आंकड़ा लिया जाता है और 40  प्रतिशत सर्वनिम्न लोगों का. इनके बीच की असमानता का विश्लेषण कर उसे दूर करने के उपाय खोजे जाते हैं. ऐसी बात नहीं है की हमारी सरकार प्रयास नहीं कर रही पर कामयाबी कम मिल रही है. मसलन सर्कार जी डी पी का 3.1 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय कर रही है पर प्राथमिक शिक्षा की क्वालिटी एक समस्या है. यही हाल स्वास्थ्य का है. इस क्षेत्र में जी डी पी का 1.3 प्रतिशत व्यय होता है पर गरीब अस्पताल तक नहीं पहुँच पाते. विकास और असमानता  को  दूर करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.