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Sunday, May 6, 2018

गुरुदेव को जो डर था वह सच निकला  

गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर की जयंती 7 मई पर विशेष लेख

 

गुरुदेव को जो डर था वह सच निकला

 

हरिराम  पाण्डेय  
आज गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर की जयंती है । कोलकाता और गुरुदेव के बीच वही संबंध है जो शरीर और आत्मा के बीच होता है । गुरुदेव अपने समय  के दार्शनिक कवि  तो थे ही  साथ ही  युगदृष्टा भी थे। उन्होंने अब से 101 साल पहले1917 में राष्ट्रवाद पर इसी शीर्षक से एक किताब लिखी थी। उस पुस्तक में उन्होंने  व्यक्त किया था  कि राष्ट्रवाद से कई खतरे हैं । गुरुदेव ने राष्ट्रवाद की यूरोपीय व्याख्या को पूरी तरह खारिज कर दिया था । वर्तमान  भारतीय राष्ट्रवाद अतीत  के यूरोपीय साम्राज्यवाद के दर्शन से प्रभावित है। वर्तमान का राष्ट्रवाद भारतीय जमीन का दर्शन नहीं है। भारत में अंग्रेजी सत्ता  महज साम्राज्यवादी शक्ति का ही प्रतीक  नहीं थी।  वह शक्ति की उन मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करती थी जो  एक ऐसी जीवन पद्धति में सन्निहित थीं जिसका सीधा संबंध  एक ऐसी विकसित औद्योगिक समाज व्यवस्था से था । इस व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य प्रकृति पर  विजय पाना था।  ऐसी स्थिति में संभवत: पहली बार गुरुदेव ने किसी यूरोपीय संस्था की परिभाषा  पर सोचना आरंभ किया।उन्होंने पश्चिम के राष्ट्र  की अवधारणा पर सवाल उठाया।  राष्ट्र की पश्चिमी व्याख्या है लोगों  का एक ऐसा आर्थिक और  राजनीतिक संघ जो एक यांत्रिक उद्देश्य के लिए संगठित है। समाज का इसमें  कोई स्थान  नहीं होता इसका अपना स्वयं का हित होता है। समाज मनुष्य की जैविक अभिव्यक्ति है और माननीय संबंधों का स्वाभाविक नियम । जिस के  पारस्परिक सहयोग से मनुष्य  विकास के विचार को विकसित कर सकता है। इसके राजनीतिक पहलू भी हैं लेकिन वह एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए हैं , आत्म संरक्षण के लिए हैं।  गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का स्पष्ट मानना था कि “ स्वाभाविक रूप से निर्मित समाज तथाकथित  कृत्रिम तौर पर निर्मित  राष्ट्रीयता से ज्यादा   मानवीय होता है।“   गुरुदेव रवीन्द्र नाथ वर्तमान काल के राष्ट्रवाद को दोषपूर्ण  मानते थे। उन्होंने लिखा  है “ राजनीति और  वाणिज्य का यह संगठन ,जिस का दूसरा नाम राष्ट्र है, अगर उच्च सामाजिक जीवन  के सौहार्द्र पर हावी हो जाएगा तो वह दिन मनुष्य के लिए सबसे बुरा दिन होगा।“  टैगोर ने  भारतीय राष्ट्रीयता के भाव को 1916 में समझ  लिया था जो आज 2018 और बदतर हो गया।  आज  सामाजिक दंड दिए जाने के बाद  विदारक दृश्य उत्पन्न हो जाता है। उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य का उदाहरण देते हुए कहा  कि यह संपूर्ण आबादी   का सामूहिक हित है और इस हित में कहीं भी मानवीय और आध्यात्मिक लाभ नहीं है।  उनका मानना था कि  “ राष्ट्रवाद बुराई की ऐसी  महामारी है जिसने वर्तमान समय की सम्पूर्ण  मानवता को  ग्रस लिया है  और नैतिक जिजीविषा  का भक्षण किया है।“  एशिया के इस कोने में एक गुलाम देश के  युगदृष्टा ने जब यह बात कही उस समय पहला विश्व युद्ध चल रहा था और दूसरे  के बादल मंडरा रहे थे। विश्व के समक्ष हिटलर और मुसोलिनी  के अति राष्ट्रवाद  की परिणति लगभग एक करोड़  लाशों पर विलाप कर रही थी । यही कारण था टैगोर ने राष्ट्रवाद को बुराई की महामारी कहा था।  गुरुदेव ने चेतावनी दी थी कि राष्ट्र खुद राष्ट्र का सबसे बड़ा दुश्मन होता  है क्योंकि इसके सारे  एहतियात इसके विरोध में होते हैं और दुनिया में कहीं भी  नए राष्ट्र का जन्म मानवता के लिए एक नवीन संकट के रूप में  उभरता है।

    टैगोर ने भारत का विभाजन नहीं देखा ना ही  1971 में बांग्लादेश  को बनते देखा पर उन्होंने इसके परिणामों को पहले ही देख लिया था और राष्ट्रवाद के बारे में  जो उनका भय था वह सच होता जा रहा है । उन्होंने 2018 के  राष्ट्र की हकीकत सौ बरस पहले ही बयान कर दिया था।  टैगोर का मानना था राष्ट्र दुनिया की अब तक की मानव निर्मित सबसे ज्यादा ताकतवर निश्चेतक औषधि है ।  इस औषधि के प्रभाव में मनुष्य वह सब करता है जो मनुष्यता के लिए खतरनाक है। वर्तमान भारत में गौरक्षकों और भारत माता की जय के स्वयंसेवकों पर  पूरी तरह लागू होता है।  टैगोर   ने 100 स साल पहले ही यह सब महसूस कर लिया था।

   टैगोर ने एक बुनियादी सवाल उठाया था कि “ क्या आधुनिक विश्व को राष्ट्रवाद चाहिए या मानववाद।“  सभ्यता के इतिहास में मनुष्यता ने कई चरण पार किए हैं। उसमें बर्बरता से लेकर सांस्कृतिक मूल्य तक के कई  चरण थे।   तारीख की निगाहों  ने वे दिन भी देखे हैं जब दुनिया के किसी कोने में किसी की भी कोई दौलत नहीं थी , सब कुछ  सार्वभौमिक  था और आज हम वह दिन भी देख रहे हैं कि  दुनिया की99% दौलत पर सिर्फ 1% लोगों का कब्जा है।  राष्ट्रवाद और    नस्ली शुद्धता के नाम पर  दो-  दो विश्व युद्ध हुए।  1947 में जब भारत के विभाजन हुआ और राष्ट्रीयता के नाम पर एक नया मुल्क बना तो लाखों लोग मारे गए और करोड़ों लोगों ने विपदा  भोगी।

   टैगोर ने अपनी पुस्तक “ नेशनलिज्म”  में विज्ञान के यूरोपीय मूल्य और आधुनिकता पर सवाल उठाया है , आधुनिकता के बारे में अपने विचार व्यक्त किए है।  आजकी सही आधुनिकता मन की आजादी  है पसंद की गुलामी नहीं।  यह विचार  और  क्रिया की आजादी है   ना  कि  अंग्रेजों  के इशारे पर  काम करने वाला कोई गुलाम। उनका मानना था भारत की मूल समस्या राजनीतिक नहीं सामाजिक है।   भारतीय समाज  के प्रति अंबेडकर के विचार उनसे बहुत मिलते हैं।  टैगोर ने राष्ट्रीय इतिहास के विचार को भी गलत बताया था और उनका मानना था इतिहास केवल मनुष्य का होता है।सभी  राष्ट्रीय इतिहास   समष्टिगत रूप  मैं एक अनुच्छेद होते हैं और हम भारत में   इससे पीड़ित होकर  भी संतुष्ट  हैं।  भारत के संदर्भ में भी उन्होंने  अंधराष्ट्रीयता  की तीखी आलोचना की है और कहा  है कि यह एक बहुत बड़ा संकट है। यह  एकमात्र ऐसी वस्तु है जो  भारत की सभी समस्याओं और दिक्कतों  के मूल में वर्षो से कायम है।

  टैगोर राजनीतिक राष्ट्र की अवधारणा को सही नहीं मानते। क्योंकि, उनका कहना है कि यह मानसिकता को  आजादी नहीं प्रदान करता और जब हमारा मानस ही आजाद नहीं है तो आजादी से क्या फायदा।  वर्तमान में ट्रंप के शासन में अमरीका  एरडोगन   के शासन में तुर्की  और भारत की सत्ता पर  नरेंद्र मोदी - यह सब के सब बुराई की महामारी से  पीड़ित हैं और लोगों को भी पीड़ित कर रहे हैं।  टैगोर ने चेतावनी दी इन देशों और दुनिया के लोग राष्ट्रीयता के नशे से  कब उबरेंगे यह नहीं बताया जा सकता। लेकिन अभी भी वक्त है  लोग नींद से जागें  और राष्ट्रीयता के ऊपर मानवता को तरजीह दें ।

 

हम इस चेतावनी को  भूलकर ऐसे रास्ते पर बढ़  रहे हैं जो  तकनीकी विकास  एक ऐसा पैटर्न है जिसे हम अपने जीवन पर आरोपित करना चाहते हैं ।   हमारे लिए यह  सभ्य प्रगतिशील और आधुनिक बनने का शॉर्टकट है।  हमने उस बुनियादी सत्य को नजरअंदाज कर दिया जो हमारी समाज व्यवस्था से जीवन की प्रेरणा प्राप्त कर पा रहा है।  यह तर्क निराधार है कि औद्योगिक क्रांति के बगैर हमारी गरीबी दूर नहीं हो सकती। सोचना यह  है कि क्या हमने कभी इस प्रगति को अपने देश में जातीय गति से जोड़कर देखा है या फिर प्रगति के इस मॉडल को पहली दुकान से खरीद लाए हैं।  भारत तो पहले भी गरीब था पर दरिद्र  नहीं था।  दरिद्रता और  विपन्नता  उसी ढांचे की देन है  जिसने हमें मानवता से काटकर   अलग  खांचे  में फिट कर दिया और उस का नाम राष्ट्र  रख दिया।  आखिर वक्त आ गया है जब हम  फिर से  मूल्यांकन  करें कि हमें जरूरी क्या है  राष्ट्रीयता या  मानवता।  

Friday, May 4, 2018

मीडिया की कसौटी होगा 2019 का चुनाव 

मीडिया की कसौटी होगा 2019 का चुनाव 

इन दिनों " फेक न्यूज " या नकली समाचार एक जुमला बन गया है। हाल में पत्रकार मार्क टुली और प्रंजय गुहा ठाकुरता के साथ एक मीडिया सेमिनार में लंम्बी वार्ता के दौरान इस पर बात उठी। प्रंजय ने साफ कहा कि ,समाचार नकली कैसे हो सकता है? अगर नकली है, तो यह खबर नहीं है। और क्यों कोई इसे "समाचार" जैसे पवित्र शब्द की संज्ञा से जोड़ने की मशक्कत करेगा। लेकिन,मार्क टुली ने नकली समाचार के वजूद का समर्थन करते हुये कहा कि , जहां तक नकली समाचार का ताल्लुक है यह संवाद प्रक्रिया का एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। संवाद सम्प्रेषण कुछ ऐसा हो कि इसे ग्रहण करने वाला उसके सही अर्थ को ना समझकर  उसके मिथ्या निहितार्थ को ही समझे। दरअसल , आज की दुनिया में, "नकली खबर" एक विरोधालंकार नहीं है, यह कठोर वास्तविकता है।  हम हर पल इसका सामना करते हैं। दुर्भाग्यवश, नकली  खबर अब नियंत्रणहीन हो चुकी है और खबर की एक नई शैली बन गयी  है। यह एक महादानव बन चुका है जो अपने बनाने वालों को ही खा जाता है। लेकिन मुख्यधारा और तथाकथित जिम्मेदार मीडिया में से कई लोग दानव शब्द से सहमत नहीं हैं उनकी दलील है कि "नकली खबर हमारी रचना नहीं है"। ये मीडिया आउटलेट ,राजनीतिज्ञों और उनके पाखंडी "भक्तों" की रचना है। गलत जानकारी के निर्माता के रूप में। अब बात है कि  "नकली खबर" की परिभाषा क्या है? कैम्ब्रिज डिक्शनरी के मुताबिक, नकली खबरों को "झूठी कहानियों के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो इंटरनेट पर फैलते हैं या अन्य मीडिया का उपयोग करते हैं, आमतौर पर राजनीतिक विचारों को प्रभावित करने या मजाक के रूप में" बनाया जाता है।लेकिन इसे गहराई से देखने से पता चलता है कि  राजनेता कुछ ऐसा कह रहे हैं जो सत्य नहीं है, मुख्यधारा की मीडिया ने कुछ ऐसा कहा जो वास्तव में गलत है और वह सामग्री जो हिंदुओं और मुसलमानों, दलितों और गैर दलितों  के बीच तनाव पैदा करती है। ये गलत है पर " स्वभाव  में बहुसंख्यक" हैं। इसकी पहुंच केवल पचास से साठ लोगों तक होती है, जो ज्यादातर शहरी हैं।

ग्रामीण भारत में दूरसंचार नेटवर्क के साथ इंटरनेट प्रवेश मामूली है। पश्चिमी दुनिया के विपरीत, भारत नकली खबरों के खतरे के मामले में देर से जागा । अकादमिक शोध के मामले में हम पीछे हैं।किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नकली समाचार और उसके व्यवस्थित और परिष्कृत विरूपण अभियान से निपटना हमेशा मुश्किल होता है।पिछले कुछ वर्षों में पाठकीयता में  बड़े बदलाव हुये हैं  और भारत में नौजवान ऑनलाइन समाचार का सबसे बड़ा उपभोक्ता हैं। 

    2017 में प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, अमरीका में, 9 3 प्रतिशत लोग ऑनलाइन समाचार पढ़ते हैं। यद्यपि भारत में अभी भी वफादार, रूढ़िवादी पाठकों की एक बड़ी संख्या है जो छपे  समाचार पत्रों पर निर्भर  हैं। युवा पीढ़ी के बीच प्रिंट से ऑनलाइन बदलाव तेजी से बढ़ रहा है।  समाचार मीडिया पर विश्वास में गिरावट लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, लेकिन ये तथ्य एक राष्ट्र के लिए सकारात्मक हैं क्योंकि कम से कम जानता है कि ट्रैक, व्यवस्थित रूप से अत्यधिक विकसित लोकतांत्रिक व्यवस्था में पैटर्न में बदलाव को रिकॉर्ड करते हैं। इसके अलावा, ये यंत्र भारत जैसे देश से कहीं बेहतर हैं, जो इनकार करने में रहती है। 2016 के अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के बाद, शोधकर्ताओं ने पाया कि स्वचालित बॉट्स ने गलत जानकारी प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग किया। लेकिन पश्चिमी दुनिया के विपरीत, भारत में - जो कृत्रिम बुद्धि (एआई) के नवजात चरण में है - जानबूझकर मानव प्रचार मशीनें अभी भी अधिक सक्रिय हैं। अब सवाल यह है कि भारतीय मुख्यधारा के मीडिया नकली खबरों का सामना क्यों कर रहे हैं? उत्तर सरल है: उचित परिश्रम और तथ्य-जांच की कमी। समाधान भी सरल है: पत्रकारिता में अंगूठे के मूल नियम का पालन करना - सटीकता। अक्सर प्रतिस्पर्धात्मक प्रतिद्वंद्विता में तत्काल प्रतिवाद और "ब्रेकिंग न्यूज" चक्र का अत्यधिक दबाव से ऐसा होता है। अगर हम इसका पालन करना चाहते हैं, तो हम अपने पेशे से अन्याय करेंगे। यह हमारे आत्म सम्मान और विश्वसनीयता को खत्म कर देगा। हम अंततः अपनी आजादी खो देंगे। भारत अपने सबसे बड़े राजनीतिक यज्ञ की ओर बढ़ रहा है - 2019 का आम चुनाव - यह भारतीय मीडिया के लिए नकली खबरों के संकट से निपटने के लिए एक कसौटी होगा। लेकि जब प्रधान मंत्री ट्रोल का पालन करते हैं, तो हम गंभीरता से सोचते हैं कि ट्रोल इतिहास के नए एजेंट हैं, वे वास्तविक जनता जनार्दन हैं - और नकली खबर लोगों की असली भावनाएं हैं। 2019 के लिए अच्छी तैयारी , काफी उत्तेजना है !  नकली समाचार इस उत्तेजना का असली प्रभाव है। 

      नकली खबर पूरी तरह से संवादात्मक है। विषय, रिसीवर, विश्वसनीयता के साथ इसे समाप्त करता है। उदाहरण के लिये  मुजफ्फरनगर दंगों को भड़काने कके लिए इस्तेमाल किए गए वीडियो को देखें। यह केवल दिखाता है कि हमारे दुश्मन कितने चालाक, खतरनाक हैं - वे कोई सबूत नहीं छोड़ते हैं! इसलिए हमें सच्चाई को प्रमुखता देनी है - हमें गोमांस देखना है जहां यह अस्तित्व में नहीं है। यह वीडियो में छिपे हुए संदेश को देखने के लिए देखने वाले का गंभीर कार्य है और दंगा की इच्छा से संबंधित नहीं है। दुश्मन वास्तविक सबूत नहीं छोड़ते हैं, इसलिए हमें उसे समझना है, जो वहां नहीं है। नकली खबर हमें बुद्धिमान और  चालाक बनाती है। यह मांग करती हैं कि हम चीजों को खोलें करें और देखें कि वे क्या हैं? लेकिन जो लोग इन खबरों को फैलाते हैं वे देखते हैं कि  वे क्या कर सकते थे। यह भाव हमें कट्टरपंथी बनाता है। हम आम जनसंख्या का हिस्सा नहीं रह जाते हैं। नकली खबर एक कारण प्रदान करती है - दिए गए संघर्ष के खिलाफ संघर्ष करने के लिए। यह एक छिपे हुए एजेंडा, एक साजिश, षड्यंत्र को उजागर करता है। भले ही आप साजिश नहीं देख पा रहे हैं, आप इसके खिलाफ बेहतर तैयारी कर सकते हैं। इसलिए हमें यह घोषित करना होगा कि नकली क्या है और क्या सच है। यह ऐतिहासिक समस्या है: कैसे एक साधारण व्यक्ति को किसी ऐसे व्यक्ति में बदलता है जो सच्चाई ना देख सके।

Thursday, May 3, 2018

गरीबी नहीं गरीबों को मिटाने में लगे हैं  

गरीबी नहीं गरीबों को मिटाने में लगे हैं

 

 साठ के दशक में महाकवि रामधारी सिंह दिनकर लिखा था

   

 मुख में   जीभ  शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं

 वसन  कहां? सूखी रोटी भी मिलती   दोनों शाम नहीं।

 

साठ के दशक की एक कविता हमें याद दिलाती है उस समय भी हमारे देश हैं गरीबों की भोजन का अभाव और भयानक गरीबी थी ।  इस अवधि के पार लगभग  सात दशक हो गए ।  हालात अभी भी नहीं सुधरे। रोटियों  के लिए आंदोलन हो रहे हैं।सरकारी आती है वादा करती हैं और चली जाती भुखमरी और गरीबी नहीं मिटती । बड़े-बड़े विद्वान मुख्य कारणों की तलाश  करते हैं और अपने-अपने विचार देते हैं सरकारें तरह - तरह के वादे करती है  चुनाव लड़ती है , जीतती है और  उसके बाद  सब कुछ भूल जाती है।  5 वर्ष निकल जाते हैं और दूसरे चुनाव की  तारीख आ जाती है।  नेता यह बताने में झुक जाते हैं उनके काल में भूख पर कितने बजे आएगी गरीबी गरीबी कितनी मिटी लेकिन सच में कुछ  नहीं हो पाता।  गरीब और गरीब होता जाता है अमीर और अमीर होता जाता है सरकार  फरेबी आंकड़े पेश करती है।

   

तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है

   मगर ये आंकड़े झूठे हैं ,दावा किताबी है

 

नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन से लेकर विख्यात  अर्थशास्त्री ज्यां देरेज  तक के शोध बताते हैं  कि भारत में  68.7 प्रतिशत लोग गरीब है या नहीं देश की  दो तिहाई  आबादी गरीब है राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण आंकड़ों के अनुसार जिन लोगों को 24  सौ  कैलोरी  आहार नहीं मिलता वह गरीब है आंकड़े बताते हैं 1973 में ऐसे लोगों की संख्या 72 प्रतिशत थी शहरी आबादी के 49.6 प्रतिशत लोग 21 सौ  कैलोरी नहीं खा पाते थे यानी मुझे इतना भी नहीं  मयस्सर था। उस समय से आज तक अनगिनत अर्थशास्त्रियों ने बकाया है गांव की गरीबी से ज्यादा शहर की गरीबी i है।  लेकिन 1910 के आंकड़े बताते हैं उस समय   गांवों में 90.5 प्रतिशत लोग गरीब   और शहरों मे  73 प्रतिशत।  इससे साफ पता चलता है कि उस समय से  अब तक कि सरकारें भुखमरी दूर नहीं कर सकी । सभी सरकारों ने इसे कम करने के लिए आंकड़ों का फरेब किया ।   नतीजा हुआ गरीबी बढ़ती गई और वर्तमान सरकार के  काल में या और ज्यादा बढ़ गई मोदी जी ने वादा किया था करो लोगों को रोजगार मिलेगा और यह वादा कुछ लाख रोजगार देकर  फिस्स हो गया । अर्थशास्त्री अभी तक नोटबंदी के नकारात्मक  प्रभावों का  विश्लेषण करने में जुटे हैं अभी भी यहीं बस चल रही है की करेंसी की कमी कितनी ज्यादा थी और ए टी एम् इतनी जल्दी कैसे सूने हो गये ।  मोदी जी का मेक इन इंडिया कार्यक्रम क्या  हुआ?   भारत में उत्पादन के लिए विदेशी पूंजी तभी आएगी जब यहां बाजार होगा लेकिन यहां की अधिकांश आबादी में खरीदने की क्षमता अगर है ही नहीं तो विदेशी पूंजी हाथियों आकर उत्पादन शुरू करेगी अगर बाजार के लिहाज से देखें भारत का बाजार बहुत छोटा है।  इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे, लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइल फोन इत्यादि को चीनी उत्पादन से मुकाबला करना पड़ेगा। विविधतापूर्ण  चीनी उत्पादन और बड़ी समस्या पैदा  कर रहे हैं।  यही कारण है कि  अमरीका ने चीनी आयात को कम करने के लिए उस पर तरह तरह के शुल्क लगा दिए। सही नहीं है और भी क्षेत्र  हैं जहां समस्याएं हैं,  जैसे मनरेगा। यह भी छोड़ रहा है और यह पाया गया है गाँवों  की गरीबी देखते हुए इसके लिए कोष  आवंटित किया गया है वह बहुत कम है। विशेषज्ञों के अनुसार 36 राज्यों में से 28 राज्यों में मजदूरों को न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जाता इससे गांव में गरीबी और दुख बढ़ता जा रहा है। सरकार के चुनावी वादों के बाद भी गरीब दुख में है और आगे भी देते रहेंगे। इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और मध्यवर्गीय लोगों शक्ति घटेगी इससे मध्यम वर्गीय  लोगों का स्तर गिर कर निम्नवर्गीय हो जाएगा यानी एक बहुत बड़ी आबादी निम्न वर्ग में बदलने वाली है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अच्छे दिन का वादा किया था ताल ठोक ठोक कर कहा था अच्छे दिन आएंगे ।अच्छे दिन आए नहीं और दूर-दूर तक दिखाई  पड  रहे हैं।

  कब्र - कब्र में अबोध बालक भूखी हड्डी रोती  है

 दूध - दूध की कदम- कदम पर सारी रात होती है

 

यह कितना क्रूर लगता है की सरकार गरीबों की संख्या घटाने के लिए गरीबी  की रेखा को नीचे करती जा रही है।  सोमवार को योजना आयोग द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं अब गरीबी की रेखा ₹25प्रतिदिन से घटकर 28 रुपए 65 पैसे प्रति दिन हो गई  है यानी  जो लोग  शहरों में  28 रुपए  65 पैसे  रोज खर्च करते हैं वह गरीब नहीं है ।गांव में यह सीमा 22 रूपए  42 पैसे प्रतिदिन  की गई है।  जरा  इमानदारी से अपने गिरेबान में झांक कर देखिए कि जो लोग शहरों में859  रुपए 60  पैसे  तथा गांव में672  रुपए 80 पैसे  मासिक  खर्च करते  हैं वह गरीब नहीं है। कितना क्रूर है यह आंकडा ?

 

रोटी  कितनी महंगी है यह वो औरत बताएगी

 जिस्म जिस्म गिरवी रख यह कीमत चुकाई है

 

विश्लेषकों का कहना है कि योजना आयोग द्वारा जारी आंकड़े भ्रामक हैं  और ऐसा लगता है इसका मकसद गरीबों की संख्या घटाना है,  ताकि कम से कम लोगों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देना पड़े। देश में महंगाई लगातार बढ़ती जा रही और ऐसे में खर्च को सीमा पर  रखकर गरीबी की रेखा क्या करना  जायज नहीं है और यह एक तरह से गरीबों के प्रति बर्बर मजाक है।

    

 

इसका असर हो सकता है अपराध में वृद्धि ,  आंदोलन और आतंकवाद के रूप में दिखाई पड़ने लगे।

 

 हटो व्योम के मेघ  पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं

 दूध दूध हे वत्स  तुम्हारा  दूध खोजने हम जाते हैं

 

Wednesday, May 2, 2018

सशक्त विपक्ष का आदर्श बेकार ?

सशक्त विपक्ष का आदर्श बेकार ?

भाजपा का  अभियान पूरी ताकत के साथ और निर्दयता के साथ विपक्ष को कुचलता हुआ2019 की तरफ पड़ता है । भारतीय मध्यवर्ग   आश्वस्त है कि भाजपा ही जीतेगी ।  हालांकि,  लोकतंत्र में यह विचार या स्वीकृति खतरों से खाली नहीं है । अति बहुमत बहुत कम है राजनीतिक प्रक्रिया को तीव्र करता है और उसमें रचनात्मकता का समावेश करता है। इसलिए एक संरचनात्मक विपक्ष की आवश्यकता है। लेकिन देश को देखते हुए और इसके राजनीतिक हालात को देखते हुए ऐसा लगता है कि विपक्ष शायद ही रह पाए। ताकतवर सत्ता में विचार प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता है।  अभी  जो हो रहा है उसे देखते हुए हैरत होती है कि  विपक्ष रहेगा कैसे ।  विपक्ष की गतिविधियों को देखकर लगता है सब कुछ ठीक है लेकिन जब शीर्ष पद के लिए बात आती है तो सब कुछ बिखर जाता है।  ऐसा महसूस होता है कि विपक्ष की एकता मायावती, ममता, नायडू , स्टालिन  और  येचुरी  के साथ बैठने  का एक अवसर है , जो बस उस बैठक तक ही सीमित रहता है।  उनके आचरण स्पष्ट रूप से  अबूझ होते हैं ।  इन बैठकों में अव्यवहारिक रणनीतियां सामने आती हैं और उन पर बहस होती है।  भारतीय लोकतंत्र  को यह स्वीकार नहीं है कि  किसी भी ऐसी राजव्यवस्था में विपक्ष उस व्यवस्था की धमनियों में बहने वाला लहू होता है जिसके बिना व्यवस्था चल ही नहीं सकती। बहुलतावाद के इस युग में विपक्ष  का अर्थ राष्ट्रविरोध की  और बढ़ता जा रहा है।  कुछ लोगों का एक पक्ष  बार-बार कहता  हैं कि  लोकतंत्र में विपक्ष की ऐतिहासिक और सेद्धांतिक आवश्यकता है जबकि दूसरा   पक्ष कहता  है के   दो दलीय  व्यवस्था लोकतंत्र में  ज्यादा व्यवहारिक है इसमें पराजित पक्ष विपक्ष की भूमिका निभाता है। लेकिन इस व्यवस्था  को ध्यान से देखें तो लगता है कि विपक्ष एक बहुदलीय या  विभिन्न परतों वाला  नाटक है।   असल में विपक्ष विभिन्न तरह के मतभेदों आकारों और  पंथों का एक तरह  से न्यासी होता है । विपक्ष  मतों की भिन्नता और  तर्कों की विभिन्नता को समायोजित कर एक वैकल्पिक समाज की रचना करता है तथा लोकतंत्र के डायनामिक्स को जारी रखता है। इस अर्थ में विपक्ष वर्तमान के भारी बहुमत वाले सत्ता पक्ष  से  प्रश्न पूछने की संभावनाओं को जागृत रखता है । विपक्ष प्रतिनिधित्व की नैतिकता को कायम  रखता है।

 आज जिस   विपक्ष की बात  उठ रही है वह है वित्त आयोग के गठन के बाद उत्तर और दक्षिण   के भेद  का परिणाम है ।  उत्तर- दक्षिण विपक्ष स्पष्ट और  दोहरे अर्थों  वाला है। यह  उनकी बात सुनकर ही पता लग जाता है।  नई स्थिति विपक्ष के लिए एक बहाना है। उसके लिए निर्देशन नहीं है। इस मामले में जो सबसे ज्यादा बात हो रही है वह है फेडरल व्यवस्था की , और वित्त की।  प्रश्न है कैसे सभी राज्य ज्यादा आजाद हों ?  ऐसा कि सभी राज्य एक बड़ा  फेडरल  विश्व बन जायें । यहां पसंद  के विपक्ष  या विपक्ष की पसंदगी की बात है जो भाजपा को हजम नहीं हो रही है।

 

सिविल सोसाइटी  एक ऐसी दुनिया है जो  कई  सतहों  में बंटी  हुई है और यह एक विपक्ष को अपेक्षित कच्चा माल मुहैया करा सकती है। अब यहाँ  प्रश्न अल्पसंख्यक विपक्ष  का नहीं है।  अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक विपक्ष असल में विभेद का एक नाटक है या कहें नाटक का एक  अंक है। भारत एक बहुत बड़ा और “ बहुत सारे हिस्सों में विभाजित”  अपने आप में एक दुनिया है।  विभाजन की सीमा रेखाएं भौगोलिक तथा काल्पनिक भी हैं। विपक्ष के लिए जरूरी है की  इतने टुकड़ों में तक्सीम समाज को और उनके रहन सहन  की आदतों को ढूंढ कर उनका एक नेटवर्क तैयार करे।   मतभेद एक बेहतरीन  बौद्धिक गतिविधि है।   पिछले एक दशक से मतभेद  की जो कल्पनाएं हैं या मतभेद में निहित  सृजन की जो संभावनाएं हैं  उन्हें एक साथ जोड़ना होगा।  कल्पना करें राजस्थान के आदिवासी ,नर्मदा बांध विरोधी आंदोलनकारी,  सूखे से राहत के लिए आंदोलन करने वाले किसान और बायोटेक्नोलॉजी को लागू करने के लिए जूझ रहे एनजीओ अगर कृषि सुधार के लिए एकजुट हो जाएं और यह विपक्ष के दृष्टिकोण के साथ चलें तो भविष्य में इसका भारी असर हो सकता है । एक विपक्ष का भविष्य बहुमतवाद के वर्तमान  के समक्ष नई संभावनाएं प्रस्तुत कर सकता है। 

 

विश्वविद्यालय सदा  से ज्ञान का केंद्र रहे हैं और  साथ ही आलोचना की कोशिश के तहत  सामाजिक आंदोलनों के सहाय्यक भी।  विपक्ष को इस बात को उठाना पड़ेगा।  एक नई बहस छोड़नी होगी विश्वविद्यालयों को सत्ता पक्ष अगर कब्जे में लेता है और उसकी स्वायत्तता समाप्त करता है तो वाह उसके विश्वविद्यालय होंगे या कहें कि उसके अस्तित्व पर भी असर डालेगा उसकी ज्ञान प्रणाली को चौपट कर देगा और समाज  की अर्थव्यवस्था  को भी असर पहुंचाएगा।  अगर सूक्ष्मता से देखा जाए विश्वविद्यालय विचारों  कि एक बहुलतावादी संस्थाएं  हैं जिसकी पसंद आमतौर पर विरोध में  निहित है।  भारत को विचारों के  विकल्पों और आविष्कार करने वाले  ख्यालों  की बहुत ज्यादा जरूरत है क्योंकि वह भाजपा के बड़े नेताओं के मध्यम  दर्जे के विचारों के आगे पराजित हो रहे हैं  आदर्शों  आदर्शों के रूप में विश्वविद्यालय  एक बहुलतावादी संस्थान  हैं लेकिन दुर्भाग्यवश  वे वामपंथी और दक्षिणपंथी आदर्शों में विभाजित  गए हैं । अगर एक विपक्ष सिर्फ राजनीतिक है  तो आगे चलकर अपर्याप्त हो जाएगा।  गांधीजी के अनुसार   विपक्ष केवल राजनीतिक है  तो  आगे चलकर उसकी  कल्पनायें  समाप्त हो जाएंगी । आज विपक्ष की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह खुद को  मिट जाने से बचाए।  गांधी ने कुछ संभावनाएं पेश की वाह राजनीति  की वर्तमान  आशा से परे पीड़ा  के प्रति संवेदनशीलता है । राजनीति  को जीवन शैली के रूप में रिचार्ज  करने और प्रयोगिक विचार करने की  है कि  उसे किस चीज की आवश्यकता है । अगर कोई विपक्ष मौलिक विचारों को नहीं समझता तो वह पार्टी राजनीति  के  सतहीपन में उलझ कर रह जाएगा  और  निर्वाचकीय गणित  की  डफली बजाता रहेगा। एक विपक्ष जिससे भारत का आदर्श और उससे जुड़े विचार अभिव्यक्त हो तो वह टिक सकता  है।  आज विपक्ष बिखरा हुआ है और उसने  भाजपा की विजय स्वीकार कर ली है । स्वीकृति के इस सवाल से उसे  आगे बढ़ना होगा।