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Tuesday, January 8, 2019

सवर्णों को 10% आरक्षण 

सवर्णों को 10% आरक्षण 

नरेंद्र मोदी सरकार ने सवर्णों के लिए 10% आरक्षण देने का फैसला किया है । यह आरक्षण उन लोगों को मिलेगा जिनकी आय 8 लाख रुपए सालाना से कम है या जिनके पास 5 एकड़ से कम जमीन है । इस संबंध में संविधान संशोधन विधेयक कैबिनेट ने सोमवार को एक बैठक में पारित कर दिया। मंगलवार को इसे लोकसभा में रखा गया जहां लंबी बहस के बाद यह बहुत ज्यादा वोटों से पारित हो गया। अब सवाल उठता है कि  क्या यह फैसला लागू हो पाएगा? यह तो वक्त ही बताएगा। इस पूरे फैसले में शुरू से ही गड़बड़ नजर आ रही है। क्योंकि, अक्सर कैबिनेट की बैठक बुधवार को होती है लेकिन इसे सोमवार को बुला लिया गया था और मंगलवार को संसद का आखरी दिन था। इस फैसले को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करना जरूरी है और चूंकि  लोकसभा में सत्तारूढ़ दल का बहुमत है इसलिए यह संविधान संशोधन विधेयक भारी मतों से पारित हो गया। बुधवार को   राज्य सभा में रखा जाएगा  वहां क्या होगा यह तो वक्त बताएगा  लेकिन  इसी उद्देश्य के लिए  राज्य सभा की बैठक  एक दिन बढ़ाई गई है । कुछ लोगों का कहना है  कि इसे सुप्रीम कोर्ट में  चुनौती दी जा सकती है। क्योंकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 50% से ज्यादा आरक्षण नहीं होना चाहिए।  लेकिन  संभवत ऐसा नहीं हो पाएगा क्योंकि संविधान संशोधन के बाद सुप्रीम कोर्ट के लिए इसमें बहुत ज्यादा  कुछ नहीं है, वह सिर्फ इसकी समीक्षा कर सकती है। 
         थोड़ी देर के लिए यह कहा जा सकता है कि सरकार के इस फैसले से विपक्षी दलों की हवा खिसक गई है। लेकिन  इसका गंभीरता से अध्ययन किया जाए तो ऐसा लगेगा कि इससे पिछड़ी जातियां भाजपा से नाराज हो  जाएंगी। यह फैसला लोकसभा चुनाव को नजर में रखकर किया गया है । देखिए आगे क्या होता है। एक बड़े सरकारी अधिकारी के अनुसार पार्टी को उम्मीद है कि वह विपक्षी दलों को इस हथियार से पछाड़ देगी। यह संशोधन अनुसूचित जाति - जनजाति कानून में पिछले वर्ष किए गए संशोधन से पार्टी को जो आघात लगा था उसे संभवत दूर करने का प्रयास भी इसे कहा जा सकता है। अतीत में भी एक इसी तरह के प्रयास ने  राजनीति की दिशा बदल दी थी । 1990 का बीपी सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार किया जाना बहुतों को याद होगा। लेकिन शायद मोदी सरकार की बात इस 10% से नहीं बनेगी। सवर्ण आरक्षण का यह फैसला सवर्णों को मनाने की गरज से भी किया गया है। समरसता खिचड़ी से लेकर और कई अन्य प्रयास सब फेल हो गए। अब भाजपा चाहती है कि सवर्णों के मूल जनाधार को
पकड़े रहा जाए । साथ ही, मराठा, जाट, गुर्जर आरक्षण की मांग को भी इसमें जोड़ लिया जाएगा । 
         नरेंद्र मोदी सरकार का यह फैसला राजनीतिक प्रहसन  और मानवद्वेषी  नीति का ताजा उदाहरण है। इन दिनों भारत दो तरह की  हकीकत से मुकाबिल है। इस प्रस्ताव में इस मामले में इमानदारी का एक तत्व है। यह स्वीकार करता है कि यह सरकार हर मोर्चे पर बुरी तरह नाकाम हो गई है। सबसे बड़ी हकीकत यही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था नौकरियों का सृजन नहीं कर पा रही है। काम धंधा चौपट हो गया है।  हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसे लोगों को प्रशिक्षित नहीं कर पा रही है जो अर्थव्यवस्था में भागीदार बन सकें। इस नाकामी के संदर्भ में पढ़े-लिखे सवालों को भरमाने  के लिए रिजर्वेशन का रास्ता अपनाया गया है। वे काम धंधे नहीं मुहैया करा सकते इसलिए सवर्णों में पढ़े लिखे लोग जो हैं उसे यह झुनझुना थमा दिया जा रहा है । यह मामला तब है जब सरकारी नौकरियों का भारी अभाव है। अर्थव्यवस्था को तेज गति देने का वह जुमला खत्म हो गया। अब हम फिर उसी गरीबी के पुराने दिनों में लौट आए हैं । भारत को आरक्षण का एक प्रभावशाली तरीका अपनाना चाहिए और सकारात्मक कदम उठाना चाहिए खासकर के दलितों के मामले में। लेकिन मंडल के बाद हमारी आरक्षण नीति एक तरह से बहुलतावादी राजनीति का उदाहरण बन गई है । यहां सियासत और सत्ता की जरूरतों के आधार पर सारी बातें और सारी नीतियां तय होती हैं। इस पहल का  शिकार दलित ही होते हैं । हर समुदाय अपने को पीड़ित पाता है। आरक्षण का उद्देश्य सही रूप में हाशिए पर बैठे लोगों तक पहुंचता ही नहीं है। आर्थिक रूप से वंचित लोगों की जरूरतों को आरक्षण के माध्यम से पूरा करने का विचार निरर्थक है। ऐसी सामाजिक हालत में एक नई व्यवस्था लागू होने जा रही है। लेकिन इस व्यवस्था को लागू किए जाने का वक्त और इसमें जो शर्तें रखी गई है दोनों से निराशा झलकती है। पिछले आरक्षण की तरह इसमें भी पूरा विचार-विमर्श नहीं किया जा सका। हमारे देश में गैर बराबरी की लड़ाई अभी चल ही रही थी । उसे समाप्त नहीं किया जा सका था। सामाजिक और शैक्षणिक शर्तों पर नौकरियां देने की बात थी आर्थिक शर्तों पर ऐसा कुछ नहीं था । यह नया प्रबंध है । यह गैर बराबरी को बढ़ावा देगा। गैर बराबरी को बनाए रखने की मंशा इसके पीछे स्पष्ट दिखाई पड़ रही है।
          सभी नकारात्मक पहलुओं के बावजूद इसमें एक सकारात्मक पहलू भी है। वह कि इससे आरक्षण का दर्द समाप्त हो जाएगा। ऐतिहासिक रूप से आरक्षण जातियों से जुड़ा हुआ था और सवर्ण समुदाय के लोग आरक्षण से नौकरियों में आए लोगों को अयोग्य  समझते थे और अक्सर उनकी खिल्ली उड़ाई जाती थी। अब जबकि इसमें सवर्णों को भी शामिल कर लिया गया है तो आरक्षण का वह दर्द समाप्त हो गया। अब सवाल आरक्षण को लेकर दलितों - पिछड़ों की हंसी नहीं उड़ा सकते ।  लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के और भी कई तरीके थे।

Monday, January 7, 2019

अनिश्चितता में झूलता भारत का मुकद्दर

अनिश्चितता में झूलता भारत का मुकद्दर


इस साल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। इस चुनाव में 134 करोड़ लोगों का मुकद्दर लगभग 95 करोड़ वोटर तय करेंगे। वे तय करेंगे कि हमारा देश जिस दक्षिणावर्ती दिशा में जा रहा है उधर ही जाएगा या थोड़ा पीछे लौटकर पहले की तरह मध्य मार्ग पर स्थिर हो जाएगा। वैसे विचारधारा कोई बहुत महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन इन दिनों जो भारत के विविधतापूर्ण समाज को हिंदुत्व की रस्सी में बांधने का प्रयास चल रहा है वह प्रयास कहां तक सफल होगा यह भी इस बार चुनाव में तय हो जाएगा। पूरी दुनिया में वैश्विकवाद ,उदारवाद तथा संसदीय लोकतंत्र के खिलाफ एक लहर उठ रही है। कई देशों में यह लहर कामयाब भी हुई है। इस चुनाव से यह भी तय होगा यह लहर भारत में कहां तक असर पैदा कर रही है। भारतीय राष्ट्रीयता इस बार अपने इतिहास के सबसे बड़े चुनाव में उदारवादी ताकतों और लंपट सियासी ताकतों के बीच के टकराव में संतुलन की तलाश करेगी। यह चुनाव तय करेगा कि हमारे देश में गठबंधन की राजनीति को बढ़ावा मिलेगा या बहुमत की राजनीति को। यही नहीं एक ताकतवर विपक्ष फिर से सामने खड़ा होगा या फिर वही निर्बल विपक्ष रहेगा। देखना यह है कि हमारे नेता प्रचार और जुमलेबाजी से बाज आते हैं या नहीं और हमारी राजनीतिक बहस वास्तविकता के मुद्दों पर टिकती है या नहीं यह इस वर्ष एक बहुत बड़ा सवाल है।   नौजवान भारत अपने लिए भविष्य की ओर देख रहा है दूसरी तरफ दकियानूसी जुमलेबाजी है। नेता इस हुनर में बहुत ही माहिर है कि प्रचार के जोर पर सपनों के द्वार पर मतदाताओं को उलझा कर भ्रमित कर दें।  यही कारण है कि हमारे नेता भारी प्रचार युद्ध चलाते हैं। 2014 में तो  डिजिटल प्रचार का दौर भी आरंभ गया। इस वर्ष यह और भी जोरदार होगा। भ्रामक सूचनाएं और गलत जानकारियों के आधार पर देश की जनता को भरमाने की कोशिश होगी । साथ ही जाति और धर्म के आधार पर विचारों को विभाजित कर ध्रुवीकरण का प्रयास भी होगा। इस वर्ष मतदाताओं को लुभाने के नए-नए फार्मूले सामने आएंगे। गवर्नेंस की चर्चा होगी लेकिन यह एक वहम है जो बहुत जल्दी स्पष्ट नहीं होता । धीरे-धीरे इसका स्वरूप निखरता तब तक देर हो चुकी रहती है।
        ताजा दौर में बेरोजगारी सबसे बड़ा मसला है। मतदाता किसी भी सरकार की ओर इसे ही दूर करने की उम्मीद से देख रहे हैं।  उन्हें लुभाने के लिए मिथ्या प्रचार का हथकंडा अपनाया जाएगा। पिछले साल मई में लोकनीति सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के सर्वे के अनुसार हमारे देश के उत्तरी भाग के मतदाता नौकरियों को लेकर बेहद चिंतित थे। इस क्षेत्र के लगभग 37% मतदाताओं के लिए यह सबसे बड़ी समस्या है। दक्षिण भारत में इसका असर थोड़ा कम है। यहां 16% ही लोग इसे सबसे बड़ी समस्या मानते हैं।  यह बता देना जरूरी है कि 2014 में भाजपा नीत गठबंधन को उत्तर  क्षेत्र की 151 में से 131 सीटें मिली थी। इस बार बेरोजगारी की समस्या इन सीटों की बलि ले सकती है। यही नहीं किसानों में भी भारी गुस्सा है । बेरोजगारी को लेकर कई क्षेत्रों में व्यापक आंदोलन हुए। अलग-अलग समुदाय के लोग अलग-अलग आरक्षण की मांग लेकर आंदोलन से जुड़े। क्योंकि आंदोलनकारी कृषि से भी जुड़े थे इसलिए यह आंदोलन कृषि और बेरोजगारी का संबंधित आंदोलन था।  कुछ विश्लेषकों का मानना है की बेरोजगारी चुनाव का मसला नहीं बनेगी।  आंकड़े बताते हैं कि विगत 4 वर्षों से नौकरी का खोजना एक बहुत बड़ी समस्या है। फिर भी कुछ लोग भाजपा को वोट देने को तैयार हैं। अलबत्ता  बड़ी संख्या में लोग यह मानने लगे हैं कि भाजपा समस्याओं को सुलझा नहीं पा रही हैं और बिल्कुल बेकार हो गई है। दिलचस्प बात यह है कि इस सर्वे में पाया गया है कि 15% लोगों का मत है कि कांग्रेस ही इस समस्या को सुलझा सकती है । हालांकि बीजेपी को चाहने वाले  अभी भी आगे हैं। 2014 के चुनाव के दौरान भाजपा का सबसे बड़ा मुद्दा देश में महंगाई और भ्रष्टाचार था। इस बार कांग्रेस बेरोजगारी को लेकर तानाबाना बुन रही है।  यह कितना असरदार हो सकता है यह तो भविष्य ही बताएगा। देखने वाली बात यह है कि जिन राज्यों में कांग्रेस ने प्रचार किया वहां बेरोजगारी को लेकर लंबे - लंबे वादे किए हैं । जैसे पंजाब में हर परिवार से एक नौजवान को नौकरी का वादा ,बेरोजगारी भत्ता इत्यादि। लेकिन 2014 के बाद संभवत मतदाता सजग हो गया है। हालात ऐसे दिख रहे हैं कि कांग्रेस को अपनी बात पर भरोसा दिलाने के लिए उसे मतदाताओं के समक्ष ठोस योजना लेकर आना होगा ,वरना उसके वायदों का भी कोई असर नहीं होगा । सबसे बड़ी समस्या तब आएगी जब किसी भी पार्टी को बहुमत ना मिले या बहुत कम का अंतर हो। उस समय संसदीय लोकतंत्र का माखौल उड़ता हुआ सा दिखेगा।

Sunday, January 6, 2019

पिछले दरवाजे से नोटबंदी

पिछले दरवाजे से नोटबंदी

सरकार ने 2000 के नोट छापने बंद कर दिए हैं और अब इसे धीरे धीरे चलन से बाहर किया जा रहा है। नोट छापने बंद किए जाने का मतलब यह  नहीं कि नोट बंद कर दिए गए।  पुराने नोट चलते रहेंगे लेकिन अब नए नहीं आएंगे। सरकार ने कहा है कि बड़े मूल्य  के इन नोटों का उपयोग काला धन इकट्ठा करने और नोट जमा करने तथा काले धन को सफेद करने के लिए किया जा रहा है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक ने इस तरह की कोई सूचना खुल्लम-खुल्ला नहीं जारी की है । लेकिन सत्ता के गलियारों में यह खबर चल रही है। नोटबंदी के बाद 2000 के नोट  चालू किए गए थे ।नोटबंदी के दौरान हजार रुपये के नोट और ₹500 के नोट बंद कर दिए गए थे। नोटबंदी भी काले धन को खत्म करने के लिए की गई थी। उस समय नगदी की भयानक किल्लत हुई थी और इसके बाद सरकार ने ₹2000 के नोट जारी किए । नोटबंदी के बाद मार्च 2018 में 18.03 लाख करोड़ रुपयों के नोट जारी किए गए थे जिनमें 37% 2000 के नोट थे और 43% 500 के नोट थे। बाकी कम मूल्य के नोट  थे। मोदी सरकार ने जब ₹1000 के बदले ₹2000 के नोट जारी किए थे तो उनकी तीखी आलोचना की गई थी कि उन्होंने इतने बड़े मूल्य के नोट जारी किए हैं, इससे काले धन को और बढ़ावा मिलेगा और नोट बंदी का उद्देश्य धरा का धरा रह जाएगा। यह भय लगता है सच हो गया । क्योंकि पिछले  अप्रैल में देश के कई शहरों में बड़े नोटों की भारी कमी हो गई थी। सरकार को संदेह है कि चुनाव के पहले लोग रुपए जमा कर रहे हैं। यही नहीं नीरव मोदी के घोटाले के बाद लोग डर गए हैं। आयकर विभाग ने भी इस अवधि में बहुत बड़ी संख्या में 2000 के नोट ज़ब्त करने की सूचना दी थी। 2000 के नोट जारी करने के सरकार के फैसले की आलोचना करने वालों में कई बैंकर और अर्थशास्त्री भी शामिल थे। 2000 के नोट को चलन से बाहर करने की प्रक्रिया तो बहुत पहले से शुरू हो गई थी। रिजर्व बैंक की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है की 2017 - 18 में 7.8 करोड़ नोट जारी गए थे और इसके बाद 2018 में इसकी संख्या बढ़कर 336.3 करोड़ हो गई थी। 2016- 17 में 2000 के 328.5 करोड़ के  नोट थे मार्च 2018 से 2000 के नोटों का चलन धीरे धीरे कम होने लगा। उल्टे ₹500 के नोट ज्यादा छपने लगे। 2017 -18 मई 588.2 करोड़ ₹500 के नोट थे।
      जब नोटबंदी की गई थी तब भी दुनिया के सभी अर्थशास्त्रियों ने इसे बिल्कुल नाकाम बताया था।  पिछले 2 वर्षों में नोट बंदी का असर अभी भी हमारे समाज और बाजार पर कायम है। एक तरफ जहां इससे विकास को आघात लगा वहीं जनता को भी भारी तकलीफ हुई। समाजशास्त्रियों के अनुसार गरीब तबकों में आतंक और चिंता जैसी मनोवैज्ञानिक व्याधियां भी पैदा होती देखी गईं।
         यहां यहां प्रश्न उठता है कि जब काला धन बंद करने की गरज से नोट बंदी की गई थी और 2000 के नए नोट छापे गए थे  तो उस समय यह  नहीं सोचा जा सका कि इस कदम से फिर से काले धन को बढ़ावा मिलेगा। यही नहीं इससे अर्थव्यवस्था पर भी एक नया बोझ पड़ेगा। इससे सरकार की अदूरदर्शिता स्पष्ट झलकती है। विगत 8 दिसंबर को वित्त राज्य मंत्री पी राधाकृष्णन ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में कहा था कि ₹500 के नोट छापने में 4968. 84 करोड़ रुपए खर्च हुए थे और 1695.7 करोड़ ₹500 के नोट छापे गए थे। जबकि 2000 के 365.4 करोड़ नोट छापे गए हैं और इनमें 1293.6 करोड़ रुपए खर्च हुए । यानी जिन नोटों को बंद करने का फैसला किया गया है उन नोटों  को छापने में देश का 1293.6 करोड रुपया खर्च हो चुका है।  यह रुपए यूं ही बर्बाद हो हो जाएंगे । इस राशि में एक आईआईटी ,एक आई आई एम तथा  एक इसरो जैसी संस्था स्थापित हो सकती थी। इस राशि से 20हजार एकड़ जमीन की सिंचाई हो सकती थी और लगभग 200 छोटे बांधों की मरम्मत हो सकती थी।  इतनी बड़ी रकम यूं ही रद्दी की टोकरी में चली जाएगी। जनता को सोचना यह है कि हमारा देश इस विलासिता को स्वीकार कर सकता है।

Friday, January 4, 2019

2019 की सबसे बड़ी चुनौती

2019 की सबसे बड़ी चुनौती

देश के इतिहास में एक बहुत मशहूर भाषण का शीर्षक है "ट्राईस्ट विद डेस्टिनी" यानी मुकद्दर से वास्ता। वह रात जिस रात यह भाषण दिया गया था भारतीय इतिहास की अत्यंत परिवर्तनकारी रात थी। उस रात की सुबह भारत ने आजादी का पहला सूरज देखा। ठीक इसी तरह, यह वर्ष भारतीय राजनीति और समाज के इतिहास में संभवत सबसे ज्यादा परिवर्तनकारी वर्ष होने वाला है। इस वर्ष हमारे देश में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। एक जमाने में जब नरेंद्र मोदी भारतीय संसदीय चुनाव में उतरे थे तो वह उनके लिए बहुत ही सरल था। लेकिन  इस वर्ष भी चुनाव होने वाले हैं। यह बड़ा ही जोर आजमाइश वाला है। विधानसभा चुनाव में जिस तरह परिणाम आए हैं उससे तो  खतरा बढ़ गया लगता है। अगर हम प्रधानमंत्री द्वारा किए गए विभिन्न उदघाटनों को देखें तो पता चलेगा कि मोदी जी 2018 के शुरू से ही चुनाव के मूड में आ गए हैं। मोदी जी ने सुरंगे, पुल, विशाल मूर्तियां, हवाई अड्डे ,कारखाने, अस्पताल, अध- बनी सड़कें, दिल्ली मेट्रो का एक खंड जैसे कई परियोजनाओं का उद्घाटन किया और जहां तक उम्मीद है 2019 का यह महीना चुनावी प्रलोभनों की बरसात का महीना होगा। भाजपा ने 2014 में व्यवस्था विरोध के हथियार का इस्तेमाल किया था और इस समय तक उसने इस हथियार पर लगातार धार दिया है। यहां तक कि पुराने नेताओं के विचारों को स्वीकार करने वालों तक को नहीं बख्शा गया है। कोई अगर महात्मा गांधी की बात करता है तो उसे बंटवारे के लिए जिम्मेदार नेता कह कर गांधी का पिछलग्गू  कह दिया जाता है। देश में  सारी  गड़बड़ियों के लिए जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार बताया जाता है ।  यह दूसरी बात है कि मोदी जी की जो सबसे बड़ी खूबी है वह है उनके बात करने का ढंग।  यह नोट बंदी से लेकर कई अवसरों पर देखा जा चुका है।  अब उसमें थोड़ी कमी आ रही है।  सरकार क्या करती है  यह प्रश्न चारो तरफ पूछा जा रहा है। मोदी जी किसानों को आश्वस्त नहीं कर पाए,  सरकार की योजनाएं किसानों को दुख से मुक्त कराने में सफल नहीं हो सकीं।  ना ही वे रोजगार के अवसर नौजवानों को मुहैया करा सके जैसा कि उन्होंने 2014 में वादा किया था। अब मोदी जी के सामने जो सबसे बड़ी कठिनाई है वह है कि वे जनता के बीच जाकर क्या कहेंगे? उन्हें एक नई बात निकालनी पड़ेगी ,नई उम्मीदों को जगाने वाले कुछ तथ्य तैयार करने पड़ेंगे ताकि लोग उन  पर भरोसा कर सकें। शायद ऐसा होता हुआ नजर नहीं आ रहा है । जनता की राय विभाजित है। वही "आधे भरे गिलास " वाली कहावत का भाव व्याप्त हो रहा है। लोगों के मन में बात आ रही है कि मोदी सरकार नाकामयाब हो गई, भारत को आधुनिक तथा संपन्न राष्ट्र बनाने में असफल हो गई। उल्टे जाति वंश और गोत्र के आधार पर ध्रुवीकरण आरंभ हो गया। बड़ी बड़ी बातें काम का विकल्प बन गयी।
         केवल भारत में ही ऐसा है यह बात नहीं है। यह अनिश्चितता वैश्विक फिनोमिना बनती जा रही है। इस वर्ष अमरीका- चीन में व्यापारिक युद्ध में हो सकता है। शांति के लिए 1 मार्च अंतिम तारीख तय की गई है। अब सवाल है कि क्या दोनों इसे पूरा कर पाएंगे। क्योंकि जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान जब चीन और अमरीका के नेता मिले थे तभी यह तारीख तय की गई थी। लेकिन इससे तो ऐसा लगता है कि चीन ने वाणिज्य रियायत के लिए थोड़ा समय ले  लिया है। इसके अलावा अमरीका- चीन संबंध सुधार की संभावना नजर नहीं आती। चीन की विकसित होती अर्थव्यवस्था ने अमरीका को यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि वह इसका प्रबल प्रतिद्वंदी है।  चीन का लक्ष्य प्रथम श्रेणी के देश अमरीका को उसके दर्जे से हटाना है। जहां तक अर्थव्यवस्था की बात है चीन दुनिया का सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा लेकिन अमरीका आने वाले दिनों में भी सर्वोच्च सैन्य शक्ति वाला राष्ट्र बना रहेगा।  अमरीका की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी है। उसे चीन से तीन गुना ज्यादा सुरक्षा में व्यय करना पड़ता है। यही नहीं ट्रंप के राष्ट्रपतित्व  में कई और स्थितियों पर से पर्दा हट रहा है। कुछ लोगों का मानना है की ट्रंप मनमानी कर रहे हैं और जिन नीतियों को वह मानते हैं उसे ही आगे बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं । इन सब के बावजूद कुछ ऐसा नहीं दिख रहा है जिसे कहा जा सकता है कि रिपब्लिकन पार्टी ट्रंप से हाथ धोने को तैयार है। बशर्ते पार्टी अपनी प्रवृत्ति ना बदले तो यह तय है कि हम 2019 में लगभग वही देखेंगे जो देखते आए हैं।
         एक और महत्वपूर्ण घटना घटने वाली है। इस वर्ष 2019 के मार्च में इंग्लैंड यूरोपियन यूनियन से अलग हो जाएगा। वहां इतना राजनीतिक घालमेल चल रहा है लेकिन अर्थव्यवस्था ठीक-ठाक चलेगी। इंग्लैंड दुनिया की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति है और हो सकता है वह  इस दशक में जर्मनी को पछाड़कर यूरोप की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाए। ब्रेक्जिट  एक दिशा में ब्रिटिश विकल्पों को बंद कर सकता है लेकिन उसके लिए कई नए अवसर प्रदान कर देगा। खास करके अमरीका और चीन के संदर्भ में। कुल मिलाकर राजनीतिक वातावरण में अजीब सी आशंकाएं उमड़ रही हैं। राजनीतिक थकान सी दिख रही है चारों तरफ।
     भाजपा ने देश के भगवाकरण की कोशिश की और नतीजा यह हुआ की इसके खिलाफ कई राजनीतिक दल खड़े हो गए। लेकिन जो लोग धर्मनिरपेक्ष गठबंधन की बात करते हैं वह भी गलत हैं। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति नाकामयाब होती दिख रही है और उसी के फलस्वरूप प्रतियोगिता पूर्ण हिंदुत्व को बढ़ावा मिल रहा है। नरेंद्र मोदी ने भाजपा ने नया स्वरूप गढ़ने का प्रयास किया और इस कोशिश में पार्टी के मूलभूत सिद्धांतों को चुनौती दे दी। कांग्रेस की तरह हाईकमान की तानाशाही इस कैडर आधारित पार्टी पर नहीं चलती है। नतीजा यह हुआ कि पार्टी और संघ में तनाव हो गया। आज जो ताजा राजनीतिक स्थिति है उसमें भारत मोदी और राहुल के बगैर भी चल सकता है। भारत को इस समय नई दृष्टि की आवश्यकता है लेकिन वह विकल्प कहीं दिख नहीं रहा है। 2019 में भारत की यही सबसे बड़ी चुनौती होगी।

Thursday, January 3, 2019

शायद इस वर्ष बदल जाए दुनिया

शायद इस वर्ष बदल जाए दुनिया

इस वर्ष लोकतंत्र की प्रक्रिया दुनिया के  328 करोड़ लोगों को प्रभावित करेगी। इनकी  40% आबादी यानी 134 करोड़ लोग तो केवल भारत में हैं। विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों, विभिन्न विचारों और आस्थाओं के समर्थक इन चुनावों में भाग लेंगे और राजनीतिक परिवर्तन के जरिए उनके जीवन पर प्रभाव पड़ेगा। आज जो जिंदगी है शायद वह कल नहीं रहेगी। उनके जीवन के और जीने के  दोनों के रंग- ढंग बदल जाएंगे। अफगानिस्तान से लेकर ऑस्ट्रिया , थाईलैंड और उरुग्वे तक लगभग 62 देशों में इस बार चुनाव होने वाले हैं और इन देशों के मतदाता अपने मुकद्दर को तय करने वाले नेताओं को चुनेंगे। इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर इलेक्ट्रोल सिस्टम के आंकड़ों के अनुसार दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी में नए नेता का चुनाव होगा। इससे कई मसलों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं जैसे विदेशी मामले , सुरक्षा सौदे ,घरेलू गठबंधन और स्थानीय नीति निर्माण। इससे संभवत दुनिया में बहुत बड़ी अनिश्चितता  तक आ सकती है।
        इन चुनावों से क्या होगा इनके सम्पूर्ण उत्तर तो अगले वर्ष ही मिलेंगे लेकिन इनमें सबसे ज्यादा प्रभावित भारत होने वाला है। क्योंकि, भारत में इस वर्ष अप्रैल में चुनाव होंगे और यूरोपियन यूनियन मई में यूरोपीय संसद का चुनाव करेगा। यूरोपियन यूनियन का यह चुनाव पश्चिमी दुनिया को एक नई सोच की दिशा प्रदान करेगा साथ ही उस सोच को अमल में लाने के अवसर भी मुहैया कराएगा। यह दोनों चुनाव ऐसे होंगे जिस पर दुनिया में सबसे ज्यादा निगाह होगी और साथ ही 185 करोड़ लोगों के जीवन को प्रभावित करेंगे। क्योंकि इन चुनावों से इतनी बड़ी आबादी की की अपेक्षाओं स्वरूप प्राप्त होगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय संबंध हो के ताने बाने बनेंगे। लेकिन इनके अलावा कई और बड़े चुनाव हैं ,जैसे थाईलैंड ,नाइजीरिया जहां  25.5 करोड़ लोग फरवरी में इंडोनेशिया और अफगानिस्तान की लगभग 30 करोड़ आबादी अप्रैल में फिलिपिंस और दक्षिण अफ्रीका की सवा 16 करोड़ आबादी मई में जापान के सवा करोड़ लोग जुलाई में, कनाडा और अर्जेंटीना की  810 लाख आबादी अक्टूबर में ,पोलैंड और ऑस्ट्रेलिया की 630 लाख जनता नवंबर में और रोमानिया के 190 लाख मतदाता दिसंबर में अपने मताधिकारों  का उपयोग करेंगे । वे लोग जो दुनिया की व्यवस्था में परिवर्तन पर नजर रखते हैं उन्हें इन 15 चुनावों पर बहुत नजदीक से नजर रखनी पड़ेगी। फिनलैंड के 550 लाख मतदाता अप्रैल में , स्लोवाकिया के 540 लाख वोटर मई में, नीदरलैंड्स, बेल्जियम और लिथुआनिया के   130 करोड़ 50 लाख मतदाता मई में, लाटविया के 190 लाख जून में, बोलिविया- हैती और ग्रीस के लगभग 33 करोड़ मतदाता अक्टूबर में, क्रोशिया तथा ट्यूनीशिया के 1 करोड़ 57 लाख लोग दिसंबर में वोट डालेंगे। इनमें सबसे कम मतदाता कोकोस द्वीप में है जिसकी आबादी भाजपा से 96 है और उनकी शायर काउंसिल मैं ऑकलैंड और मोनसेरेट तावलू नौरू और जिब्राल्टर में मार्च, जुलाई तथा दिसंबर में चुनाव होंगे । राजनीतिक पार्टियां जनादेश के लिए संघर्ष करेंगी और अपने घोषणा पत्रों की व्याख्या करती चलेंगी इसमें अधिकांश में देश की आर्थिक दशा- दिशा के बारे में चर्चा होगी ,लेकिन उम्मीद है कि आर्थिक उथल-पुथल  तथा वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव कायम रहेगा। हो सकता है यह स्थिति वैश्विक फाटकेबाजों को मुनाफा दिला जाए । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता  है कि 2019 के यह 62 निर्वाचन दुनिया के भू राजनीतिक और भू आर्थिक  सूचकांकों को प्रभावित करेंगे । इस बार की तरह अतीत में कभी भी परिवर्तनकारी निर्वाचन देखने को नहीं मिले हैं। यह एक तरह से राजनीतिक अर्थव्यवस्था की प्रयोगशाला बनेगी और इससे जो  परिणाम प्राप्त होंगे वह उन देशों की सीमाओं से बाहर भी आएंगे। यह वर्ष समाज विज्ञानियों  को अपनी नई अवधारणा गढ़ने तथा नई विश्व व्यवस्था के बारे में बताने में मदद करेगा। इन 62 देशों में इस वर्ष पसंद नापसंद की कई सतहें होंगी। दुनिया की नई परिभाषाएं तय होंगी और विश्व सही मायनों में उदारवाद व्यवस्था की ओर बढ़े सकता है। एक ऐसा विश्व तैयार होने की संभावना है जिसे उच्च वर्ग अपहृत नहीं कर सकता और इसमें ज्यादा आर्थिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक समावेशन होगा। देखना यह है कि क्या यह चुनाव दुनिया को ज्यादा रूढ़ीवादी और "हम पहले" या  "मैं केवल" जैसे भाव से मुक्त कराते हैं या नहीं। यह भी देखना है कि यह मिलजुल कर वैश्विक चुनौतियों का सामना करते हैं या नहीं करते हैं। या, फिर जैसा चल रहा है वैसा ही  चलेगा। इन सब के जवाब 2019 के मध्य तक मिलने लगेंगे लेकिन एक सामूहिक तथा ठोस उत्तर इस वर्ष के अंत तक ही प्राप्त हो पाएगा। हो सकता है यह दुनिया बदल जाय।

Wednesday, January 2, 2019

विचारधारा एक फंदा है

विचारधारा एक फंदा है

नए वर्ष का पहला हफ्ता शुरू हो चुका है इस बात को लेकर थोड़ा विभ्रम है कि जो आर्थिक सिद्धांत, राजनीतिक विचारधारा और सामाजिक सच्चाई है जिस पर निर्मित है उन पर हमले हो रहे हैं या उन पर संदेह हो रहा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से जिन सच्चाईयों को हम स्वीकार करते करते आए हैं उन पर थोड़ा शक होने लगा है। कम्यूजियम के पतन  के बाद हमने देखा कि पूंजीवाद विजयी हुआ।  जल्दी ही इस पर से भी भरोसा उठने लगा। वैश्वीकरण और मुक्त बाजार का सिद्धांत थोड़े ही समय के लिए सही दबने लगे। ब्रेक्जिट और डॉनल्ड ट्रंप इस बात के संकेत हैं कि कुछ लोग इसे नहीं चाहते। लेकिन वह अभी नहीं जानते कि वह क्या चाहते हैं और क्या नहीं । बर्लिन की दीवार के धराशाई हो जाने के बाद लोकतंत्र का उदय हुआ लेकिन लोकतंत्र पर भी पुतिन जैसे अधिनायकवादी लोगों का खतरा मंडराने लगा है।पुतिन जैसे लोगों ने अपने उत्थान के लिए लोकतंत्र का उपयोग किया लेकिन मुक्त समाज के बारे में  उनके विचार, उनकी विचारधारा तथा प्रतिबद्धतायें  दूसरी हैं। यहां तक कि जर्मनी, फ्रांस , ऑस्ट्रेलिया,  बेल्जियम  और नीदरलैंड्स में प्रवासी समर्थक पार्टियां पराजित होने लगी। अंदाजा यह लगाया जाता है इनके उदय से आतंकी हमले होंगे और अर्थ व्यवस्था लड़खड़ा जाएगी। चीन में आज की तरह कभी भी राष्ट्रवादी जनविरोधी और व्यवसायिक विचार वाली सरकार नहीं रही।
           इन मामलात को यहां पेश करने का उद्देश्य है कि लोकतंत्र और मुक्त व्यापार जैसे बेहतर उपाय पीछे जा रहे हैं और उनकी सफलता का पुराना  मिथक टूट रहा है। आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक संस्थान टूट रहे हैं और उनकी मरम्मत की जरूरत है। न पूंजीवाद विजयी हुआ न कम्युनिज्म ना लोकतंत्र और ना चुनौतीवाद । कोई भी लंबी अवधि तक सफल होता हुआ नहीं दिख रहा है। हर वाद को चाहे वह पूंजीवाद हो चाहे कम्युनिज्म हो या समाजवाद हो या उदारवाद हो सब एक समय के बाद बदलने लग जा रहे हैं और  इससे पता चलता है की इतिहास के आखिरी सिरे पर जाकर हम सभी तरह की विचारधाराओं को खत्म होता हुआ देखेंगे। कोई भी एक विचारधारा बहुत लंबी अवधि तक प्रासंगिक नहीं रह जाएगी। हमें दुनिया को एक नए चश्मे से देखना होगा। किसी भी विचारधारा की बहुत गंभीर सीमा होती है हम जो भी विचारधारा अपनाते हैं बाद में उसको छोड़ देते हैं जब उससे एक नए और अच्छे समाज का निर्माण नहीं हो पाता या उसका अच्छा परिणाम नहीं निकल पाता । विचारधारा कुछ छिपे हुए तर्कों को बढ़ावा देती है। मनोवैज्ञानिक शब्दावली मे कहें तो यह एक "प्रेरित अनुभूति" है ।छिपे हुए तर्क उसी प्रेरित अनुभूति के परिणाम हैं। इसके तहत हम जो मानते हैं उसी पर भरोसा करते हैं और उस भरोसे  को बनाए रखने के लिए तरह तरह के तर्क देते हैं और इससे एक ऐसा दार्शनिक विवाद उत्पन्न होता है जो हल ही नहीं हो पाता।  यह बहुलतावाद  और आजादी दोनों को खतरा पैदा करता है। विख्यात समाजशास्त्री जैरी टेलर के मुताबिक ऐसी किसी विचार धारा को नहीं स्वीकार किया जाए जो खुद   से चिपके रहने शर्त रखती हो या भक्ति के स्तर तक उसके अनुसरण की  अपेक्षा हो। सदा यह दिमाग में  रहना चाहिए कि हम जो जानते हैं  जरूरी नहीं है कि वह सही हो। सच सर्वदा बहुत जटिल होता है और जिस व्यवस्था को हम अपने को शासित करने के लिए चुनते हैं और समझते हैं कि इससे बहुतों का भला होगा वाह कभी भी संपूर्ण प्रतिफल नहीं दे सकती। हमें उसमें परिवर्तन के लिए हमेशा तैयार रहना होगा। उदाहरण के लिए लोकतंत्र को ही देखें । दुनिया भर में लोकतंत्र का मतलब लोग समझते हैं नए शासकों कुछ चुनने की आजादी। ऐसे लोग अस्तित्वमान व्यवस्था के बंधक भी तो हो सकते हैं। अगर हम लक्जमबर्ग और डेनमार्क जैसे छोटे लोकतंत्रों   को नजरअंदाज कर दें तो देखेंगे कि बड़े देशों में सुधार कार्यकर्ताओं के दल, सांस्कृतिक दबाव और कारपोरेट गिरोह ही  सत्ता का संचालन करते हैं। इसमें जरूरी नहीं है कि लोग कैसे वोट डालते हैं। भारत सहित कई और देशों में यह देखा जा रहा है। जहां तक भारत का सवाल है नरेंद्र मोदी बाजार सुधार  या आर्थिक परिवर्तन या रोजगार उत्पन्न करने की दिशा में कुछ नहीं कर पा रहे हैं। यहां समस्या यह नहीं है कि लोकतंत्र ठीक से काम नहीं करता है बल्कि यह तब तक नहीं ठीक से काम नहीं कर सकता जब तक इसे एकदम निचले स्तर तक सक्रिय न कर दिया जाए। भारत एक बहुत बड़ा देश है और वह दिल्ली या विभिन्न राज्यों की राजधानियों से शासित नहीं हो सकता। दुनिया में जितनी सफल अर्थ व्यवस्थाएं हैं वह केंद्र से शुरू तो होती हैं लेकिन छोटे छोटे शहरों तक उनका प्रभाव आ जाता है। दिल्ली अपनी आर्थिक ताकतों से मुंबई, बेंगलुरु ,कोलकाता की आजादी को पंगु बना देती है। लोकतंत्र को पूरी तरह सक्रिय होने के लिए जरूरी है कि उसे दूर्वामूल स्तर तक पहुंचाया जाए । 
       एक और उदाहरण है शासकीय और गैर शासकीय संस्थाओं की। जिहादी आतंकवाद के जमाने में यह एक नई हकीकत सामने आई है । गैर शासकीय संस्थाओं की बढ़ती ताकत, सोशल मीडिया का प्रसार और उच्चस्तरीय तकनीकी की उपलब्धियों ने गैर शासकीय संस्थाओं को ताकतवर बना दिया है। इसके चलते शासन को बेहद कठिनाई होती है। सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत ने यह प्रमाणित कर दिया है कि एक छोटा समुदाय भी पूरी शासन व्यवस्था के अंतर्गत निवास कर रहे जन समुदाय को प्रभावित कर सकता है। उनकी निजी जिंदगी में दखल दे सकता है। ऐसे में यह कहना बड़ा कठिन हो जाता है कहां शासन की निगरानी खत्म होगी और कहां से अशासकीय संस्थाओं की निगरानी आरंभ हो जाएगी। अगर आतंकवादी संस्थान हमारे डाटा सिस्टम में प्रवेश कर जाते हैं तो वह हमारे जीवन के लिए काफी मुश्किलें पैदा कर सकते हैं । कई देशों में सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के कारोबार एक दूसरे में मिल रहे हैं। जैसे पाकिस्तान। वह एक गुप्त युद्ध में संलग्न है और ऊपर से कुछ नहीं कह रहा है । इसलिए जरूरी है कि हम शासकीय और गैर शासकीय संस्थाओं के बारे में दोबारा सोचें।  कोई देश इसके बीच की सुनहरी राह नहीं निकाल सकता। यह तय करना मुश्किल है कि गैर शासकीय संस्थाओं या अपराधियों से जनता को बचाने के लिए सरकार को कितनी ताकत चाहिए । इसके अलावा और भी कई तथ्य हैं और सब इस बात को बताते हैं की विचारधारा बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। स्वीकृत मूल्य एक सीमा के बाहर बेकार हैं। हमें यह विचार त्यागना होगा कि सभी बात के लिए एक ही विचारधारा सटीक है। इसलिए चाहे आप वामपंथी हों या मध्य मार्गी या दक्षिणपंथी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । सारी विचारधाराएं एक फंदा हैं जिसमें हम फंस कर रह जाते हैं।

Tuesday, January 1, 2019

यह हमारे देश में क्या हो रहा है?

यह हमारे देश में क्या हो रहा है?

भारतीय सोचते हैं कि देश में जो हो रहा है उसके बारे में वह सब कुछ जानते हैं।  क्या सच में ऐसा है? हाल में फ्रांसीसी अनुसंधान संस्था इप्सोस के सर्वेक्षण के मुताबिक भारतीय  अपने देश  के बहुत से   तथ्य या तो जानते नहीं हैं या उन्हें इसके प्रति भयानक गलतफहमी  है।  गत 20 दिसंबर को जारी "पेरिल्स आफ परसेप्शन 2018" के सर्वे में पता चला है कि कई तथ्यों के बारे में भारतीय और उनकी समझ भ्रमित है। 37 देशों के इस सर्वेक्षण में भारतीयों का रैंक 12 है।जो एक नंबर में है वह पूरी तरह गलतफहमी में है। भारतीयों का इस तरह ना जानकार होना चिंता का विषय है। खासकर 2019 में होने वाले चुनाव के परिप्रेक्ष्य में यह तो और भी खतरनाक और चिंता का विषय है । अभी हाल में एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक शिक्षिका से यह पूछा गया उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का नाम क्या है तो उसने बताया नरेंद्र मोदी। अब आप सोच सकते हैं कि हमारी आम जनता में राजनीतिक चेतना कितनी है। कोलकाता के एक महिला पत्रकार से बातचीत के दौरान जब जयप्रकाश नारायण का जिक्र आया तो वह उस नाम से अनजान थीं। मिर्जा गालिब को उस महिला पत्रकार ने राजनीतिक नेता बताया। हमारी पढ़ी लिखी आबादी की चेतना का यह आलम है। यहां प्रश्न उठता है कि हमारे नौजवान किस आधार पर वोट देते हैं? क्या वह जानते हैं कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के कार्यालयों को क्या अधिकार हैं। क्या हम अपने देश का भविष्य ऐसे ही सुस्त दिमाग के लोगों द्वारा संचालित होने देंगे? एक शोध के मुताबिक हमारे नौजवान शहरी मतदाता "सूचना की लत " नामक मानसिक बीमारी से ग्रस्त हैं। गूगल और मोबाइल फोन आ जाने के कारण लगभग सभी लोगों को सूचना का अजीर्ण होता जा रहा है। जबकि उनके पास इसके लिए आवश्यक ज्ञान नहीं है। हमारे पास या कहें हमारे नौजवानों के पास इंडोनेशिया में बनी ताजा सड़क की तस्वीर ट्वीट से आती है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भक्तों  द्वारा बताया जाता है कि भारत के दूरदराज के गांव में ढांचागत विकास हो रहा है। जिन्हें "सूचना की लत" की बीमारी है वह इसे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। इसमें उनकी भक्ति का भाव भी दिखता है और वह उस सूचना को आगे फॉरवर्ड कर देते हैं।  इसी तरह सोशल मीडिया में यह गलत सूचना घूमने लगती है । कोई यह नहीं जानना चाहता कि वह दूरदराज का गांव कौन सा है?
         नाजानकारी की इस पृष्ठभूमि में हमारे नेताओं के कांईयापन को देखें ? जब पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम अपने परिष्कृत अंदाज में यह बताते हैं कि मौद्रिक घाटा शुरू हो रहा है या मौजूदा एफआरबीएम कानून की गलत व्याख्या की जा सकती है।  तकनीकी शब्दावली में हम मूल बात को समझ नहीं पाते।  हमारे नौजवान मतदाताओं को राजनीतिक रूप से जागरूक होना चाहिए और यह केवल उन्हीं राजनीतिज्ञों द्वारा किया जा सकता है जो सचमुच मतदाताओं से जुड़े हों और ऐसी सूचनाएं उनको दे जो आसानी से समझ में आ जाएं। 2014 में  इस देश में मोदी जी की लहर उठी थी। यह एक तरह से सूचनाओं की धुआंधार बमबारी के कारण उठी थी । सूचनाओं के  वशीभूत नौजवानों ने उसकी जांच जरूरी नहीं समझी और जब गुजरात मॉडल लोकप्रिय हो गया तो लोगों ने यह जानने की जरूरत ही नहीं समझी कि  यह प्रचार का एक तरीका है। लगातार सूचनाओं की बमबारी से विचार शक्ति और निर्णय शक्ति दोनों मंद पड़ने लगती है। नतीजा यह होता है कि जो कहा जा रहा है उसे हम स्वीकार कर लेते हैं। टेलिविजन पर दृश्य और ध्वनि के माध्यम से प्रचार का यही हथकंडा है। जब गुजरात मॉडल की बात चल रही थी तो हमारे नौजवानों ने यह नहीं जानना चाहा क्या सच   है? क्या गुजरात सचमुच क्योटो में बदल गया है या गुजरात किसी दूसरे कानून से शासित है? यह  चालाकी भरा मार्केटिंग का एक तरीका था जिसमें कोई आंकड़े नहीं दिए गए थे। अब सवाल उठता है कि हम हकीकत की इस गैर हाजिरी को कैसे रोकेंगे? हमें नए मतदाताओं कोई बताना होगा कि वह अपने प्रतिनिधियों से प्रश्न पूछें। जब एक प्रतिनिधि या राजनीतिज्ञ नौकरी का वादा करता है तो हम केवल प्रभावित ना हों बल्कि उससे यह पूछें कि कहां मिलेगी नौकरी ? क्या कोई अवसर तैयार हुआ है या फिर सड़क के किनारे पकौड़ा बेचने वाला सुझाव मिलेगा? अगर कोई राजनीतिज्ञ वादा करता है कि दिल्ली में एक नया और विशाल स्कूल खोला जाएगा तो कम से कम उससे यह तो पूछिए कि जन संकुल दिल्ली में इतनी जगह कहां मिलेगी? क्यों नहीं मौजूदा स्कूलों में और क्लास रूम बनाए जा रहे हैं? अगर कोई बड़ी मूर्ति बनाई जाती है तो कम से कम यह पूछना बनता है कि उसके रखरखाव में कितना खर्च लगेगा?  क्या उस खर्चे से विकास का दूसरा काम नहीं किया जा सकता है?
        यहां एक सवाल है कि गलत सूचनाएं फैलाने वाले क्यों कायम हैं? क्योंकि, उन्हें यह भरोसा है कि उनका धोखा और जो भी गलत सूचनाएं वे फैला रहे हैं से उनका कुछ बिगड़ेगा नहीं। अभी हाल में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने एक नकली वीडियो ट्वीट किया, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मध्यप्रदेश में किसानों को कर्ज माफी के वायदे से मुकर रहे हैं। यह अर्ध सत्य है। इस तरह की सूचनाएं चुनाव के ठीक पहले केवल मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए फैलाई जाती हैं। राजनीति कोई परमाणु विज्ञान नहीं है । जब कोई राजनीतिज्ञ पाखंड पूर्ण बातें करता है तो उसके और मतदाताओं के बीच की वार्ता बहुत जटिल हो जाती है। इससे बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि बुनियादी बात से जुड़े रहें और राजनीतिज्ञों को उनके वायदे के लिए जिम्मेदार ठहराएं।  चाहे वह वायदा रोजगार का हो ,अर्थव्यवस्था का हो भ्रष्टाचार नियंत्रण का हो या सामाजिक सुधार के बारे में हो तभी हमारा लोकतंत्र सच्चे मायनों में अस्तित्व में रहेगा।