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Thursday, February 7, 2019

बाल अपराध को रोकना जरूरी 

बाल अपराध को रोकना जरूरी 

केंद्र एक बार फिर अपराध का केंद्र बन गया। दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष 11 खून और 22 बलात्कार सहित 92 घृणित अपराध हुए । 2011 से अब तक दिल्ली में 15,536 बलात्कार की घटनाएं हुईं। 2015 से लगातार इन घटनाओं में वृद्धि हो रही है। यहां तक कि निर्भया कांड के बाद भी दिल्ली में 2018 तक 12,258 बलात्कार की घटनाएं हुईं। हालांकि अपराधिक घटनाओं की लगातार गणना के बाद यह पता चलता है कि 2018 में 2017 के मुकाबले कम बलात्कार हुए हैं या कहें महिलाओं के प्रति कम अपराध हुए हैं। राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो (एन सी ई आर बी) के आंकड़े बताते हैं के देश के 19 महानगरों में दिल्ली महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक शहर है। 20 लाख से ज्यादा आबादी वाले नगरों में आलोच्य अवधि में महिलाओं के प्रति कुल 4,935 अपराध हुए। जिनमें सबसे ज्यादा 1996 बलात्कार की घटनाएं दिल्ली में हुईं। 712 बलात्कार की घटनाएं मुंबई में  और पुणे में 354 घटनाएं हुईं। 
     इसके कई कारण हैं। जिनमें बाहर से आकर बसने वालों की बढ़ती संख्या ,पड़ोसी राज्यों से अपराधियों की उन तक पहुंच इत्यादि कुछ कारण है जिन से अपराध बढ़ रहे हैं। लेकिन एक ऐसा अपराध भी  भी है जिस पर सोचा जाना जरूरी है। वह है बाल अपराध में वृद्धि खासकर बलात्कार जैसे अपराधों में किशोरों का जुड़ा होना। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 19 महानगरों में 6,645 ऐसे अपराध हुए जिसमें किशोर शामिल हैं। इन अपराधों में दिल्ली सर्वोच्च है,जहां 2016 में 2,368 बलात्कार की घटनाएं हुयीं। 2014 में सूरत में सबसे ज्यादा यह घटनाएं हुई लेकिन बाद में इसमें बहुत तेजी से कमी आई लेकिन दिल्ली में 2014 से 16 के बीच घटनाएं बढ़ती रहीं। दिल्ली में 2016 में 2,368 मामलों में 3,610 किशोरों को गिरफ्तार किया गया । 19 महानगरों में बलात्कार की 281 घटनाएं हुई जिनमें 324 किशोरों को गिरफ्तार किया गया। यह संख्या अन्य बड़े अपराधों की तुलना में ज्यादा है। इनमें 2% अपराधी 16 से 18 वर्ष की उम्र के हैं। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में जिन किशोरों गिरफ्तार किया गया उनमें 41% बच्चे प्राइमरी तक शिक्षा पाए थे और अपने मां बाप के साथ रहते थे।
       हमारे  समाज में पुरानी विचारधारा है कि जो लोग या कहे जो बच्चे मां बाप के साथ नहीं रहते हैं और गरीब  पृष्ठभूमि के हैं वे आपराधिक घटनाओं से जल्दी जुड़ जाते हैं। लेकिन जो आंकड़े बताते हैं वह बहुत कटु सत्य की ओर इशारा करते हैं। जो बच्चे पकड़े गए उनमें 93.7% ऐसे थे जो अपने मां बाप या अभिभावकों के साथ रहते थे जबकि बेघर बार के बच्चे महज 6.3% थे । अब सवाल उठता है कि आखिर वह कौन से कारण हैं जिन्होंने इन बच्चों को अपराधी बनाया। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारण था कि बच्चों को संचार तकनीक ,मीडिया ,इंटरनेट और दूसरों से ऑनलाइन बातचीत की सुविधाएं उपलब्ध हैं। कई मामलों में पाया गया है कि ऐसे बच्चों के मां-बाप दोनों अच्छे जीवन यापन  के लिए कमर तोड़ मेहनत करते हैं और  बच्चे अकेले रहते हैं । कोई उन पर ध्यान देने वाला नहीं रहता है ना ही उन्हें सही दिशा बताने वाला रहता है यह अकेलापन उन बच्चों को घृणित अपराधों की ओर आकर्षित करता है। शुरू शुरू में यह तो  थ्रिल या रोमांच की तरह लगता है । इसके अलावा सोशल मीडिया की अबाध पहुंच और बच्चों की जरूरतों के प्रति अभिभावकों की लापरवाही इन बच्चों के अपराधी बनाने के प्रमुख कारणों में से एक है। ऐसे में हमारे समाज और बुनियादी संस्थाओं को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। यह तो सत्य है अब हमारे देश की बहुत ही प्रतियोगिता पूर्ण हो गई है और बच्चों को नैतिक मूल्यों तथा नैतिकता के बारे में शिक्षा देने की ओर कम ही ध्यान दिया जाता है।  यही कारण है कि बच्चों में जीवन के प्रति चिंता और दया की भावना नहीं बन पाती। बच्चों में सामाजिकता कम होती जाती है। दोस्तों और परिवार का दबाव घटता जाता है तथा इन बच्चों के लिए व्यक्तिगत जोखिम नाम की कोई चीज नहीं होती है। इस इस कारण बच्चों में अपराध प्रवृति बढ़ती जाती है। परिवारों को जीवन और समाज के प्रति सकारात्मक नजरिया रखना चाहिए बच्चों के मां-बाप और उनके बड़े  भाई-बहनों को बच्चों को सकारात्मक मूल्यों, नियमों और मानदंडों की ओर प्रवृत्त करना चाहिए।  बच्चे के लिए  परिवार  रोल मॉडल और  आचरण का  मॉडल होता है । सरकार को चाहिए, जो गरीब परिवार हैं उन्हें मदद करे ताकि वे अपने आर्थिक हालात को सुधार सकें। अभिभावकों को भी चाहिए वह बच्चों को कानून की इज्जत करना सिखाए और यह बताएं कि सार्वजनिक सुरक्षा के लिए जो कानून बनाए गए हैं उनको भंग करने से क्या क्या हो सकता है। दूसरी तरफ जो लोग बच्चों को देखभाल में लगे हैं या कहिए उनके माता-पिता उनमें प्रगतिशील विचारों का अभाव रहता है। वे  लड़कियों को निर्भीक जैसे कार्यक्रमों शामिल नहीं करते। इन कार्यक्रमों में लड़कियों को व्यक्तिगत हमले से बचाव करना इत्यादि सिखाया जाता है। वक्त आ गया है कि समाज को यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी और इस बात पर कड़ी नजर रखनी पड़ेगी कि हमारे समाज के बच्चे अपराधी ना बनें।  माता-पिताओं को भी इस बात के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे अपने बच्चों में महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना पैदा करें।  बच्चों को स्कूल स्तर पर महिलाओं के प्रति सम्मान की बात सिखाई जानी चाहिए।

Wednesday, February 6, 2019

गरीबों को ही क्यों मोहरा बनाते हैं यह राजनीतिज्ञ

गरीबों को ही क्यों मोहरा बनाते हैं यह राजनीतिज्ञ

सभी राजनीतिक दलों द्वारा तरह-तरह की आर्थिक घोषणाओं से यह स्पष्ट हो गया कि कोई भी जीते या हारे अर्थव्यवस्था खस्ताहाल होने वाली है। इसका मतलब यह नहीं है कि अर्थव्यवस्था डूब जाएगी और आशा रहित हो जाएगी। राजनीतिज्ञों की अर्थव्यवस्था को दिवालिया करने की लाख कोशिशों के बावजूद संभवत ऐसा नहीं होगा।  राजनीतिक वर्ग और सरकारी मशीनरी ऐसा नहीं होने देगी। लेकिन अर्थव्यवस्था  एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी है जहां चलते रहने का इसका स्वभाविक आवेश धीमा हो गया है। कोई भी जो ऐसा सपना देखता है कि भारत बहुत तेजी से विकसित होगा उसका सपना साकार नहीं हो सकता। नरेंद्र मोदी 2014 में जब लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार थे तो उन्होंने वादा किया था कि वह लोगों की उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर , कई तरह के विकास और सुधार लाकर भारत की जनता को जड़ता से मुक्त कराएंगे । लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे पूरा नहीं किया और वे भगवा समाजवाद में लग गए। यह नहीं कहा जा सकता है कि मोदी जी ने कोई बहुत बड़ा कदम नहीं उठाया। उन्होंने कई बड़े सुधार किए जैसे जीएसटी, दिवालिया कानून इत्यादि कई महत्वपूर्ण सुधार थे। कुछ श्रमिक और अन्य सुधार भी किए गए। सरकार संस्थानिक उलझन में उलझी रही और उसमें इतना उलझ गई कि विकास रुक गया।  महत्वाकांक्षी "मेक इन इंडिया" कार्यक्रम बहुत बड़ा विचार था। लेकिन कोई क्यों "मेक इन इंडिया" चाहेगा जब यहां इतनी बड़ी दिक्कत है। अगर किसी को मुश्किलात का सामना करना हो तो वह कारखाना लगाए। भारत में बनाने से ज्यादा सरल और सस्ता चीन से आयात कर लेना है। उस व्यापारी से पूछिए जो सरकारी वसूली का शिकार हो चुका है वह बताएगा कुछ नहीं बदला। अभी भी उन्हें धमकाया जा रहा है और उन्हें "देना" पड़ रहा है चाहे वह जितना भी कानून का पालन करे। व्यापार के जो कानून बने हैं वह तो इतने जटिल हैं कि उनका पालन करना  एक तरह से असंभव है। अगर किसी तरह से हो  जाता है तब भी मुक्ति नहीं मिलती। व्यापारियों के साथ अपराधियों की तरह बर्ताव किया जाता है। हर राजनीतिज्ञ ,हर अफसर यहां तक इंस्पेक्टर भी कुछ निचोड़ लेना चाहता है । लेकिन कोई भी उनके साथ जुड़ना या उनके साथ खड़ा होना नहीं चाहता।
        भारत में अगर किसी को भारत रत्न दिया जाना चाहिए तो वह हमारे उद्यमी हैं क्योंकि वे हर कठिनाइयों के बीच अड़े हैं । मोदी सरकार ऐसा कुछ नहीं कर पाई जिससे व्यापारी या समाज का उत्पादक वर्ग कुछ प्राप्त करे सके। सरकार के लिए रुपया बनाने वाले और रोजगार देने वाले यह लोग एक तरह से सोने के अंडे देने वाली मुर्गियां है या अगर उसे हिंदुत्व का बाना पहनाना है तो कामधेनु है जो जब चाहो दूध दे देती है। एक छोटा सा सच जो यह सारे राजनीतिज्ञ अनदेखा कर देते हैं वह है की रोजगार के अवसर पैदा करने के उनके वादे को अगर कोई पूरा कर सकता है तो वह देश का व्यावसाई वर्ग है उसे कुछ सुविधाएं दी जाएं। अब अगर सरकार उन पर अंकुश लगाए गी या उनको नहीं छोड़ेगी तो मतदाताओं को रिझाने के जो तरीके बचते हैं उनमें आरक्षण और मनरेगा जैसे उपाय हैं। सच तो यह है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम  को बेकार बना देने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे ही कांग्रेस के आर्थिक ढांचे का  प्रतीक मानते हैं।
         मोदी सरकार की आर्थिक विफलता की एक और निशानी है कि वह अब रोजगार के अवसर उत्पन्न करने और किसानों तथा मजदूरों की  समृद्धि के बल पर नहीं बल्कि जाति तथा सांप्रदायिक मसलों पर मतदाताओं को एकजुट कर रही है। पार्टी समग्र विकास की बात करती है  आर्थिक विकास 7% से ज्यादा होने की बात करती है लेकिन शायद ही कोई है जो इस पर यकीन करता हो। इस अवधि में सबसे ज्यादा किसानों को तकलीफ हुई है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। रोजगार के अवसर लगभग शून्य हो गए हैं। स्पष्ट है कि वह पुराना जुमला नहीं चलेगा। अबतक जितनी सरकारें आई हैं वह लगभग बार-बार एक ही बात करती आई है और बदलने की उम्मीद दिलाती आई हैं। लेकिन, सोचिए  ऐसा करने के लिए वायदे नहीं काम करने पड़ेंगे । किसानों से वादा किया जाता है कि उनके कर्ज माफ कर दिए जाएंगे । उन्हें रोजगार दिए जाएंगे या आमदनी की गारंटी दी जाएगी, लेकिन  अवसर पैदा करने के विचार तो उन्होंने नहीं बताया।  दुख तो यह है कि केवल एनडीए सरकार ने नहीं यूपीए भी यही करती आई है । आज देश "भक्तों" के शिकंजे में है और यह एक नेता को सही ठहराने के लिए तरह-तरह की दिमागी मशक्कत करते आ रहे हैं। इसलिए अगले चुनाव में चाहे जो जीते भारत उसी अनुत्तरदायित्व पूर्ण आर्थिक नीतियों के फंदे में फंसा रहेगा।
        यह  एक ऐसे मुल्क में होगा जो सभ्यता के नजरिए से या संस्कृति के दृष्टिकोण से महान था और यहां धन को लक्ष्मी कह कर पूजा जाता था । उस देश में यह सब चल रहा है । गरीबों के नाम पर जो नीतियां बन रही हैं वह गरीबी को और बढ़ा रही हैं । नरेंद्र मोदी ने 2014 में चुनाव इसलिए जीता कि उन्होंने देश के लोगों की उत्पादन क्षमता को बेलगाम कर देने का वादा किया। 5 साल के बाद वह ऐसा कुछ नहीं कर सकेंगे और बस वही करेंगे जो कांग्रेस ने अब तक किया । अब उनके प्रतिद्वंदी चांद ला देने का वादा कर रहे हैं लेकिन इसके लिए रुपए कहां से आएंगे? इसके लिए एक ही तरीका बचा है कि सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को मार दिया जाए या कामधेनु को ही समाप्त कर दिया जाए। अब जून में चाहे जो होगा लेकिन जनता को आर्थिक फंदे में फंसने के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

Tuesday, February 5, 2019

मोदी जी के खिलाफ  प्रियंका के खड़े होने की अटकलें

मोदी जी के खिलाफ  प्रियंका के खड़े होने की अटकलें

प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार दिया गया है और इसके बाद से ही अटकलों का बाजार गर्म है कि वह मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़ेंगी। वाराणसी शुरू से ही पूर्वांचल की राजनीति का केंद्र रहा है। यहां की राजनीति का असर न केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश बल्कि बिहार के भी कई लोकसभा सीटों पर पड़ता है। इसी वजह से 2014 में मोदी जी ने अपनी राजनीति का केंद्र बनारस को बनाया और वहीं से चुनाव लड़ने का फैसला किया।   पूर्वी उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 40 सीटें हैं और 2014 में अधिकांश सीटों पर भाजपा का कब्जा हो गया था। क्योंकि, उस समय नरेंद्र मोदी की लहर चल रही थी और उस लहर में बनारस से उठा नारा "हर-हर मोदी घर-घर  मोदी" का असर उस क्षेत्र में सभी सीटों पर पड़ा। भाजपा ने इसीलिए मोदी को वहां से खड़ा  करने का फैसला किया था।
      अब इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए अटकलें लगाई जा रही हैं कि कांग्रेस प्रियंका को बनारस से खड़ा करेगी। कहा जाता है कि बनारस में कांग्रेस के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने प्रियंका गांधी से इसी सीट से चुनाव लड़ने का अनुरोध किया है । बात तो यह भी चल रही है कि बनारस के कुछ प्रबुद्ध मुस्लिम नेता और बुद्धिजीवी भी इसी अनुरोध को लेकर प्रियंका गांधी से जल्दी ही मिलने वाले हैं।  यद्यपि कांग्रेस हाईकमान ने ऐसा कोई बयान जारी नहीं किया है और ना ही इस बारे में कुछ कहा है कि प्रियंका गांधी कहां से लड़ेंगी।  कांग्रेस के गलियारों में जो फुसफुसाहट है उससे यही लगता है कि इसकी तैयारी जोर शोर से चल रही है और प्रियंका गांधी को खड़ा किया जा सकता है। अब सवाल उठता है कि अगर प्रियंका गांधी सचमुच वाराणसी से चुनाव लड़ती हैं तो इसका राजनीतिक अर्थ क्या होगा? इसका समूचे चुनावी परिदृश्य पर क्या असर पड़ेगा? कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और उनका मनोबल बढ़ेगा। इससे पार्टी को अच्छा फायदा मिलेगा। यूपी और बिहार दोनों प्रांतों में 2014 के बाद से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की संख्या तेजी से घट रही है। नतीजा यह हुआ है कि पार्टी का ढांचा ही चरमरा गया है। जो लोग पार्टी में हैं वह भी अनमने से हैं ।   वे कार्यकर्ता तो अब जीतने की उम्मीद ही खो बैठे हैं।  ऐसी स्थिति में  अगर पार्टी चुनाव जीत जाती है तो उनका मनोबल बढ़ेगा।   प्रियंका गांधी का मोदी के खिलाफ खड़े होने की खबर से ही कार्यकर्ताओं में जोश भर जाएगा। इसका दूसरा असर यह होगा कि देशभर में  नरेंद्र मोदी बनाम प्रियंका गांधी  की नैरेटिव बनेगी और यह देश भर में चर्चा का विषय बन जाएगा।  इससे वह विमर्श दब जाएगा जो राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी का चल रहा है ।  जनता में यह संदेश जाएगा कि नरेंद्र मोदी के सामने कांग्रेस के लिए राहुल गांधी ही नहीं प्रियंका भी एक मजबूत विकल्प है। यह भी हो सकता है कि प्रियंका गांधी के वाराणसी से खड़े होने पर सपा और बसपा गठबंधन यहां से अपना उम्मीदवार ना खड़ा करें । क्योंकि इस गठबंधन ने राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से और रायबरेली से सोनिया गांधी के विरुद्ध उम्मीदवार नहीं उतारने का ऐलान कर दिया है। अगर वाराणसी से यह गठबंधन अपना उम्मीदवार नहीं उतारता है और प्रियंका खड़ी होती है तो नरेंद्र मोदी के लिए रास्ता बहुत सरल नहीं रहेगा। यह एक तरह से मनोवैज्ञानिक मुकाबला भी होगा। नरेंद्र मोदी ने कहीं यदि कोई ऐसा वैसा बयान प्रियंका के खिलाफ दे दिया तो यह एक मसला बन जाएगा। चुनाव अभियान के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ऐसे बयान देते हैं जिसमें कुछ न कुछ गलती की गुंजाइश रहती है।  उसके आधार पर प्रियंका गांधी एक नया ईशु खड़ा कर सकती हैं।
     कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह मुकाबला दिलचस्प होगा और इसका प्रभाव समग्र राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा।

Monday, February 4, 2019

मोदी और राहुल मुकद्दर किसके हाथ में

मोदी और राहुल मुकद्दर किसके हाथ में

चुनाव के मोर्चे लगभग बंध गए हैं लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके विरोधियों के बीच कोई मध्य स्थल है और है तो किस जगह है? आज क्या यह संभव है कि बिना अपमानित हुए कोई भाजपा को वोट दे या बिना राष्ट्र विरोधी का तमगा पाए कोई कांग्रेस को मतदान करे। जैसे-जैसे चुनाव करीब आते जा रहे हैं देश में ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है। नौजवानों में एक प्रश्न तेजी से घूम रहा है कि क्या भारतीय राजनीति   दूसरी तरफ घूम गई है जिधर उदारवादी और परंपरावादी समुदाय रहता है । ऐसा सोचकर हम एक बहुत बड़े परिप्रेक्ष्य को नजरअंदाज कर रहे हैं। आज के नौजवान खुद को मध्यमार्गी मानते हैं । इनमें वो लोग भी शामिल हैं जो 2014 में भाजपा को एक मौका देना चाहते थे। लेकिन जब ऐसा हुआ यानी मौका दे दिया गया तो एक समुदाय या कहें कि दूसरे छोर पर जो लोग थे उन्हें संप्रदायवादी, संघी या भक्त करार दे दिया गया। यद्यपि, उन्होंने तो समस्याओं के समाधान की उम्मीद में ऐसा किया था। नौजवानों का यह समुदाय पूर्ण रूप  अधिनायकवादी  विमर्श से नियंत्रित नहीं हो सकता, ना उसे दक्षिणपंथी अराजकता पसंद है और ना ही आजादी के  नकाब में वामपंथी शोर शराबा।  दक्षिणपंथी विचारधारा व्यक्तिगत आजादी पर अंकुश लगा देती है जबकि वामपंथी विचारधारा इतना प्रोत्साहित करती है कि इससे कुछ हो ही नहीं सकता। नौजवान समुदाय मध्य मार्गी या मध्य पंथी विचारधारा का हिमायती बनता जा रहा है। यानी थोड़ा थोड़ा दोनों तरफ की विचारधाराएं ।
      वैचारिक समूहों से मोहभंग भी एक कारण है जो नौजवानों को दोनों तरफ से विमुख कर रहा है और वे मध्यपंथ को वामपंथी और दक्षिणपंथी धारा के बीच एक प्रभावशाली विंदु मानते हैं । राजनीति विज्ञानी  डेविड एडलर के अनुसार शहरी नौजवान दयावश मध्य मार्ग में आ रहे हैं। अब तक पढ़े लिखे शहरी नौजवानों का भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है यह थोड़ा आश्चर्यजनक होगा यही पढ़े लिखे नौजवान खुद को देश पर होने वाले आधातों को रोकने के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। यह मध्य मार्ग उन  नौजवानों को बहुत ज्यादा प्रभावित कर रहा है। खास करके ऐसे लड़के जो ताजातरीन मतदाता बने हैं और इंटरनेट के संपर्क में हैं। क्योंकि इस माध्यम से ज्यादा नौजवान एक दूसरे से या एक बहुत बड़े समुदाय से संपर्क में रहते हैं। ऐसे कई हैं जिनके यूट्यूब पर लाखों दर्शक हैं। किसी खास आदर्श के प्रति सब एकमत नहीं हो सकते और इसीलिए सबको वामपंथी और दक्षिणपंथी में वर्गीकृत भी नहीं किया जा सकता।  आर्थिक तौर पर देखें तो भाजपा और कांग्रेस दोनों समान हैं। दोनों बड़े व्यवसायियों के पक्षधर हैं नेहरू ने समाजवाद को बढ़ावा दिया और यह इंदिरा गांधी के जमाने में खूब फला फूला। भाजपा के कुछ बड़े नेता शुरू में इंदिरा की प्रशंसा करते थे और वे राव की भी प्रशंसा करते थे कि उन्होंने मुक्त बाजार भारत में राह दी। जबकि इन दिनों भाजपा इन नेताओं की तीव्र विरोधी हैं । आज दोनों दल दरबारी पूंजीवाद के समर्थक दिखाई पड़ रहे हैं।
       2014 के लोकसभा चुनाव के बाद एक सर्वे में पाया गया 30 करोड़ रजिस्टर्ड मतदाताओं के लगभग एक तिहाई मतदाताओं , जिनकी उम्र 18 से 35 वर्ष के बीच थी, ने भाजपा को वोट डाला। आज मोदी जी या के भाजपा का बहुसंख्यक वाद लोगों पर बहुत प्रभाव नहीं डाल पा रहा है। सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज- लोकनीति द्वारा जनवरी 2018 में  किए गए एक सर्वे में पाया गया है कि भाजपा की लोकप्रियता नौजवानों में घटी है। 5 साल पहले जब नौजवानों में एकमात्र आवाज थी भाजपा। अब 2019 में यह नौजवान भ्रमित हैं। वे खासतौर पर विचारधारा को लेकर भ्रमित हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मानते हैं कि भाजपा दोबारा सत्ता में आएगी लेकिन शायद उन की सीटें कम हो जाएंगी।
      नौजवानों में ऐसा नहीं कि सभी मामलों में विरोध है लेकिन कुछ मामलों में वह एकमत हैं।  उनका मानना है कि नोटबंदी बहुत असफल रही लेकिन जीएसटी एक महत्वपूर्ण कदम है, शुरू में थोड़ी दिक्कत हो रही है। सब कुछ देखते हुए ऐसा लग रहा है कि जो लोग मोदी के समर्थक हैं वह मध्य पंथी या मध्य वादी हो जाएंगे, वामपंथियों के साथ भी कुछ ऐसा ही होगा, क्योंकि वामपंथ से भी नौजवानों का मोहभंग हो रहा है। कुल मिलाकर या देखा जा सकता है कि इस बार मध्य पंथी जमात ही सरकार का मुकद्दर तय करेगी।

सी बी आई बनाम कोलकाता पुलिस की रस्साकशी में भिड़े मोदी - ममता 

सी बी आई बनाम कोलकाता पुलिस की रस्साकशी में भिड़े मोदी - ममता 

हरिराम पाण्डेय
कोलकाता की सड़कों पर व्याप्त राजनीतिक और संवैधानिक संकट में उस समय नया मोड़ आ गया जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए मंगलवार की तारीख मुकर्रर कर दी और गृह  मंत्रालय ने इस घटना में आईपीएस  अफसरों की भूमिका के बारे में रिपोर्ट मांगी है। अफसरों पर आरोप है कि उन्होंने नियम को भंग किया है और जांच कार्य बाधा पहुंचाई है ।
रविवार की शाम सीबीआई की टीम जब कोलकाता पुलिस के कमिश्नर राजीव कुमार निवास में प्रवेश करना चाहती थी उस समय पुलिस के एक दल ने उसे रोक दिया बाद में कुछ सीबीआई अफसरों को   थाने ले जाया गया ।
इन सब घटनाओं के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मेट्रो चैनल में धरने पर बैठ गईं। उनका यह मानना है कि यह राज्य के  संवैधानिक अधिकार का हनन है। उधर संभावित आशंकाओं का बहाना बनाकर सीबीआई के कोलकाता कार्यालय के समक्ष सीआरपीएफ की टुकड़ी तैनात कर दी गई है। दूसरी तरफ दिल्ली में राज्यसभा में इस मामले को लेकर भारी शोर शराबा हुआ और कार्रवाई स्थगित करनी पड़ी।
         सीबीआई की टीम राज्य में कुछ साल पहले हुए चिटफंड घोटाले की जांच कर रही थी ।  उसने कई बार नेताओं तथा अफसरों से पूछताछ भी की है। इस बार उसे पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करनी थी।  इस घोटाले की जांच के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) के प्रमुख राजीव कुमार ही थे। पश्चिम बंगाल सरकार ने स्पष्ट कहा है कि "सीबीआई की टीम बिना किसी वारंट के पुलिस कमिश्नर के आवास पर गई थी और वह एक गुप्त कार्रवाई का हिस्सा था।" यद्यपि सीबीआई की टीम ने इस आरोप का खंडन किया है और कहा है कि उनके पास जरूरी दस्तावेज थे। सीबीआई की टीम ने यह भी कहा है कि पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार दस्तावेजों को और सबूतों को मिटाने में लगे थे। यद्यपि सीबीआई की टीम ऐसा किस आधार पर कह रही है इसके बारे में कहीं कोई जिक्र नहीं है । सीबीआई का दावा सुनने में बड़ा अजीब लग रहा है उसे कैसे मालूम हुआ कि पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार सबूतों को मिटाने में लगे हैं। जब सीबीआई खुद कह रही है या राजीव कुमार उपलब्ध नहीं है तो वह किस आधार पर या किस सूचना पर राजीव कुमार के आवास पर गई थी? सन्मार्ग को विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि सीबीआई की एक टीम वहां दो दिन पहले से निगरानी कर रही थी और उचित समय जानकर उसके अफसरों ने वहां घेरा डाला। अगर सीबीआई की बात तार्किक रूप से सही है तो वहां सीबीआई के कम से कम 40 कर्मचारियों की क्या जरूरत थी? एक बड़े अफसर से खुली पूछताछ के लिए इतना बड़ा हंगामा करने की क्या जरूरत थी? इससे साफ जाहिर होता है इसके पीछे इरादा सही नहीं था और इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि दो फरवरी को दिल्ली में सत्ता के गलियारों में यह चर्चा चल रही थी कि कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को गिरफ्तार किया जा सकता है। इस कार्रवाई का मौका भी बड़ा अजीब ढूंढा गया। सीबीआई के अंतरिम निदेशक नागेश्वर राव जाने वाले थे और नए निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला प्रभार लेने वाले थे। बीच की अवधि में यह कार्रवाई की गई। इससे स्पष्ट होता है कि इसका इरादा जांच नहीं कुछ और ही था।
       पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार में तीखी प्रतिद्वंद्विता  चल रही है और यह प्रतिद्वंद्विता तृणमूल कांग्रेस तथा भाजपा के बीच राजनीतिक रस्साकशी के कारण है। भाजपा चाहती है कि किसी भी तरह आने वाले लोकसभा चुनाव में उसे ज्यादा सीट मिले उधर ममता जी का इरादा है कि विपक्षी दलों को एकजुट कर कर भाजपा को सत्ता से हटा दिया जाए। दरअसल यह एक तरह से  पावर पॉलिटिक्स है। दोनों तरफ सत्ता का जोर है। फर्क यही है कि केंद्र सरकार खुद को ज्यादा ताकतवर  और राज्य सरकार को कमजोर समझती है । लेकिन रविवार  की घटना के बाद बाजी पलटती  नजर आ रही है। क्योंकि सारे विपक्षी दलों ने ममता जी  का समर्थन किया है। यहां तक कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी ममता बनर्जी के समर्थन की घोषणा की है। ममता बनर्जी ने कहा है की "वह देश और संविधान की रक्षा के लिए यह विरोध प्रदर्शन कर रही हैं।" उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल प्रधानमंत्री के इशारे पर सीबीआई को निर्देश दे रहे हैं।
       मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने मंगलवार को सुनवाई की तारीख मुकर्रर की है। हालांकि सीबीआई ने कहीं भी ममता बनर्जी का नाम नहीं लिया है बल्कि कहा है कि पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार शारदा चिटफंड घोटाले की जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को निर्देश दिया कि वह सारे सबूतों के साथ उपस्थित हो। अदालत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पुलिस कमिश्नर सबूतों को बर्बाद कर रहे हैं।
      समस्त घटनाक्रम में सबसे प्रमुख इसकी टाइमिंग है एक तरफ  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह राज्य में  मीटिंग करते चल रहे हैं और विस्फोटक भाषण दे रहे हैं दूसरी तरफ चुनाव के कुछ पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निकटवर्ती अफसरों को लांछित कर इसका राजनीतिक लाभ उठाना मुख्य उद्देश्य प्रतीत होता है। वरना इतने वर्षो से लंबित यह जांच कुछ महीने और रुक सकती थी और आगे भी ऐसी ही संभावना है।

Sunday, February 3, 2019

यह खर्च आएगा कहां से ?

यह खर्च आएगा कहां से ?

अंतरिम बजट का स्पष्ट उद्देश्य चुनावी है और वह भी भारतीय जनता पार्टी की चुनावी संभावनाओं को मजबूत बनाना है। यही कारण है कि इस बजट में जिसे अंतरिम कहा जा रहा है सबके लिए कुछ न कुछ है। चाहे वह छोटा किसान हो या असंगठित मजदूर या फिर वेतन भोगी लोग हों और सबसे नीचे चरवाहे तथा गायों (गोपालकों) के लिए भी कुछ न कुछ है। 
      जहां तक आयकर में छूट की बात है तो सरकार ने घोषणा की है कि 5 लाख रुपये तक आयकर की छूट की सीमा बढ़ा दी गई है। सुनने वालों को ऐसा लगा कि यह बहुत बड़ा तोहफा है और इसी तरह प्रचारित भी किया गया । सत्ता पक्ष द्वारा मेज थपथपाने से पूरी बात ठीक से सुनाई नहीं पड़ सकी। लेकिन तथ्य तो यह है कि छूट की सीमा सभी करदाताओं के लिए नहीं है। वित्त विधेयक को ध्यान से पढ़ने पर और वित्त मंत्री के भाषण को गौर से सुनने पर पता चला कि पियूष गोयल ने कितनी सफाई से महफिल लूट ली। पीयूष गोयल ने ऐलान किया कि वित्त वर्ष 2019- 20 के लिए आयकर की मौजूदा दरें कायम रखी जाएंगी साथ ही जिन करदाताओं की कर योग्य आय सालाना 5लाख रूपये तक है उन्हें टैक्स में पूरी छूट मिलेगी। वित्त मंत्री ने यह कहा कि इस कदम से लगभग तीन करोड़ मध्यवर्गीय करदाताओं को लाभ मिलेगा। बात साफ है कि यह लाभ सभी करदाताओं के लिए नहीं है । आयकर विशेषज्ञों के मुताबिक आयकर की धारा 87 ए के अनुसार अगर किसी की कर योग्य आय साढ़े तीन लाख रुपयों से कम है उसे अधिकतम ढाई हजार रुपए तक टैक्स में छूट मिलेगी। सरकार ने कर योग्य आय किसी सीमा को बढ़ाकर 5 लाख कर दिया है। जिसका मतलब है कि कर में अधिकतम छूट  12500 रुपए तक की मिल सकेगी। गौर करें टैक्स का यह लाभ सिर्फ उसी करदाता को मिलेगा जिसकी कर योग्य आय 5लाख रुपये से कम है। यहां यह बात बारीकी से समझ लेना जरूरी है कि जिनकी आय 5लाख रूपए से कम है वही इसके लाभ को हासिल कर सकेंगे। जैसे ही 5 लाख रुपये से आय सीमा बढ़ेगी तो उस कर उसे मौजूदा स्लैब के मुताबिक ही टैक्स देना होगा। उसमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। इसमें जो वरिष्ठ नागरिक हैं उन्हें कोई लाभ नहीं मिलेगा। क्योंकि वह पहले से ही इतना लाभ पा रहे हैं। अलबत्ता वेतन भोगी वर्ग को स्टैंडर्ड डिडक्शन का लाभ मिला । उसकी सीमा 40 हज़ार रुपए से बढ़ाकर 50 हजार कर दी गई। यानी अब हर वेतन भोगी को सालाना 500 रुपये टैक्स की बचत होगी। इसके अलावा बैंकों या डाकघरों में फिक्स डिपॉजिट करने वाले को ब्याज पर टीडीएस की मौजूदा सीमा 10 हजार  रुपए को बढ़ाकर 40 हजार कर दिया गया है इससे छोटे जमा कर्ताओं को लाभ मिलेगा । यकीनन मोदी सरकार द्वारा बजट में ज्यादा फायदा मध्यम वर्ग के उन लोगों को पहुंचाने की कोशिश की गई है जो कम आय वर्ग में आते हैं। उनकी जेब में साल भर में साढे बारह हजार रुपये अतिरिक्त आ जायेंगे ,यानी औसतन एक हजार रुपये से कुछ ज्यादा लाभ हर महीने मिलेगा।
   इन सारी सुविधाओं का एक असर होगा कि लोगों के पास खर्च करने के लिए कुछ न कुछ पैसा आ जाएगा और उपभोक्ता वृत्ति बढ़ जाएगी। एक आंकड़े के अनुसार यह सकल घरेलू उत्पाद के 1.5% हो सकता है और इससे महंगाई बढ़ने की आशंका है। इस तरह से ज्यादा मौद्रिक घाटा भी हो सकता है। क्योंकि सरकार को इन खर्चों को पूरे करने के लिए ज्यादा पैसे लेने लाने होंगे या कहे कर्ज लेने होंगे और इससे ब्याज की दर बढ़ जाएगी। उदाहरण के लिए देखें, छोटे किसानों के लिए 75 हजार करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है जो उन्हें देने में खर्च किया जाएगा। यह एक आवर्ती या कहें रेकरिंग खर्चा है।  अगर कोई सरकार भविष्य में इसे खत्म करती है एक तरह यह उसके लिए आत्मघाती हो जाएगा।  लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न है कि यह राशि आएगी कहां से? इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है।
       यह चिंता का विषय है । क्योंकि 2019के वित्तीय वर्ष में सरकार  लगातार दूसरी बार मौद्रिक घाटी का लक्ष्य नहीं पूरा कर सकी। वर्तमान मोदी सरकार के  घाटा संशोधित अनुमान सकल घरेलू उत्पाद के 3.4% है। यह अगले साल भी कायम रहेगा। सरकार ने बताया है कि उसका सकल राजस्व 14.3% बढ़ेगा। यह वर्तमान वर्ष के 20% राजस्व अनुमान से कम है। यह आय प्रत्यक्ष कर और जीएसटी से बढ़ने की उम्मीद से की जाती है। जहां तक केंद्र द्वारा जीएसटी वसूली की बात है तो उसमें 21% वृद्धि हो सकती है। यह  वर्तमान वित्त वर्ष में 21% कम होने के बाद की स्थिति है।  ज्ञातव्य है कि कई वस्तुओं पर जीएसटी की दर घटा दी गई है। है दूसरी बात है कि यह बताया गया है कि आयकर 17.2% बढ़ेगा और कॉरपोरेट टैक्स 13.3% बढ़ेगा। इसके अलावा वित्त मंत्री ने विनिवेश के माध्यम से 90 हजार करोड़ प्राप्त होने की उम्मीद जताई  है। साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक का लाभांश भी 20 हजार करोड़ प्राप्त होने की आशा है। यह समर्थ मौद्रिकआकलन नहीं है इसमें कई कमियां दिखाई पड़ रही हैं। लेकिन तय है कि सरकार के कर्ज़ लेने से बाजार पर प्रभाव पड़ेगा।  वर्तमान वित्त वर्ष के लिए बाजार से 4. 47 लाख करोड़ लेने पड़ सकते हैं । यह राशि लगभग उतना ही है इतनी पिछले वर्ष थी। यह सब कुछ संदिग्ध राजस्व अनुमानों पर निर्भर है । कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मौद्रिक समेकन को लोकप्रियता की वेदी पर कुर्बानी दे दी गई। इसका असर ब्याज दर पर पड़ेगा। यह समझना जरूरी है कि बजट में देश के विकास की दर बढ़ाने और कमाई बढ़ाने की बातें की गई है लेकिन उनकी संभाव्यता पर कोई बात नहीं की गई है। अगले हफ्ते से सरकार या कहें हर राजनीतिक पार्टी चुनाव कार्यों में जुट जाएगी। लेकिन आशंका यह है कि यह बजट शायद मोदी जी को चुनावी लाभ ना दिला सके।

Friday, February 1, 2019

अंतरिम बजट में मध्य वर्ग को राहत

अंतरिम बजट में मध्य वर्ग को राहत

मोदी सरकार के कार्यकारी वित्त मंत्री ने संसद में सरकार का छठा बजट पेश किया। यह अंतरिम बजट था। वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने इस बजट में आम लोगों से लेकर मजदूरों का ध्यान रखा है और महंगाई पर अंकुश लगाने की कोशिश की है।   वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसके पहले 5 बजट पेश किए थे। वित्त मंत्री गोयल ने अपने भाषण में कहा कि "यह अंतरिम बजट नहीं है बल्कि देश की विकास यात्रा का माध्यम है। देश में आ रहे सकारात्मक बदलाव का श्रेय हमारे देशवासियों को है । " वित्त मंत्री ने कहा कि इनकम टैक्स में रियायत की घोषणा करते हुए  कहा कि अब 5 लाख तक की आमदनी वाला मध्यवर्ग अपना टैक्स बचा सकता है। वित्त मंत्री ने कहा कि   होम लोन ,राष्ट्रीय पेंशन योजना स्वास्थ्य बीमा भविष्य निधि आदि योजनाओं में निवेश करने वालों को साढे छह लाख तक की आमदनी पर टैक्स नहीं लगेगा। सरकार के अनुमान के मुताबिक 2019- 20 में वित्तीय घाटा जीडीपी के 3% रहने का अनुमान है। उन्होंने कहा  अगले 5 साल में भारत की अर्थव्यवस्था 5 अरब डालर की होगी जिसे हम अगले 8 साल में बढ़ाकर 8 अरब डॉलर करने को इच्छुक हैं । वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार की देश के लिए हितकारी नीतियों के चलते टैक्स देने वाले की संख्या में 80% तक वृद्धि हुई है। वित्त मंत्री ने सैनिकों के लिए लंबित एक रैंक एक पेंशन की योजना लागू कर दी है । वित्त मंत्री ने  आंकड़े देते हुए कहा कि देश में 27 किलोमीटर हाईवे रोजाना बनाए जा रहे हैं। सरकार ने राहुल गांधी की ऋण माफी योजना के जवाब में किसानों को हर महीने ₹500 दिए जाने की घोषणा की है । इससे 12 करोड़ छोटे किसानों को लाभ होने की संभावना है। यही नहीं, जो किसान मछली पालन और पशुपालन में लगे हैं उन किसानों को ब्याज में 2% की छूट मिलेगी।  21000 रुपए से कम वेतन वाले मजदूरों को 7हजार रुपए का बोनस दिया जाएगा। मजदूरों के पेंशन में भी वृद्धि कर दी गयी है । मजदूरों को कम से कम एक हज़ार रुपये और ज्यादा से  ज्यादा तीन हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन दिए जाने की घोषणा की गई है। सरकार ने आयुष्मान भारत को दुनिया का सबसे बड़ा स्वास्थ्य कार्यक्रम बताते हुए कहा कि  इससे भारी संख्या में गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों का इलाज में पैसा बचा है और यह राशि तीन हजार करोड़ करोड़ के बराबर है । यही नहीं जन औषधि केंद्र में सस्ती दवाई भी उपलब्ध कराई गई है।
    आमदनी सहायता मोदी सरकार का किसानों को खुश करने का सबसे बड़ा और आखिरी दांव है। आने वाले चुनाव को ध्यान में रखकर सरकार ने यह चाल चली है। विशेषज्ञों के मुताबिक हाल में छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश और राजस्थान में भाजपा की हार का मुख्य कारण किसानों का गुस्सा था और इसीलिए सरकार ने किसानों को साधने के लिए यह चाल चली है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना को मंजूरी के तहत 2 हेक्टेयर तक जमीन वाले  किसानों को हर साल ₹6000 मिलेंगे यह पैसे किसानों के खाते में सीधे भेजे जाएंगे। यह रकम तीन किस्तों में जाएगी। इससे देश के 12 करोड़ किसानों के परिवारों को लाभ मिलेगा। यह योजना 1 दिसंबर 2018 से पूरे देश में लागू होगी।
       मोदी सरकार के अंतरिम बजट का बाजार पर बड़ा सकारात्मक असर हुआ है। बजट के आते ही सेंसेक्स साढे 400 पॉइंट ऊपर चला गया और निफ्टी 10,900 के पार चला गया। अभी बजट पेश ही हो रहा था कि इंटरटेनमेंट सेक्टर के शेयरों में भी उछाल आ गया तथा ऑटो के शेयर भी चढ़ गए। लेकिन इस बजट को समझना और उसके भीतर निहित संभावनाओं जानना भी जरूरी है ।ऊपर से देखने में तो बजट  आगे बढ़ने का तंत्र दिखाई पड़ रहा है और योजना का औजार लेकिन जब थोड़ी  गंभीरता से देखेंगे तो कुछ और ही बात नजर आएगी। अब से 12 महीने पीछे चलें। पिछले साल भी किसानों के लिए ढेर सारी कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा गई थी।  जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य ,किसानों को ऋण में वृद्धि, मत्स्य पालन और पशुपालन इत्यादि में सुविधा और इस तरह से कई योजनाओं की घोषणा हुई थी। बड़े क्षेत्रों को तो छोड़ ही दिया गया जिसमें निजी व्यापार भी शामिल था । उस समय जितनी घोषणाएं की गई थी उन पर तो कुछ हुआ नहीं या बहुत कम हुआ ।  उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि इस पर भी बहुत कुछ नहीं होगा। इसका कारण यह है कि बहुत जल्दी चुनाव होने वाले हैं और उसके बाद नई सरकार आएगी। तब पूर्ण बजट पेश होगा और उसमें क्या होगा भगवान ही जाने। कांग्रेस ने इस बजट की तीखी आलोचना करते हुए कहा है कि "थोथा चना बाजे घना।" वैसे कुल मिलाकर बजट जनोन्मुखी  है और उम्मीद करनी चाहिए यह बजट लोगों का भला कर सकेगा।