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Friday, February 15, 2019

घिनौना हमला

घिनौना हमला

पुलवामा में गुरुवार को आतंकियों ने सीआरपीएफ जवानों से भरी एक बस पर कार बम से हमला कर 40 जवानों को मौत के घाट उतार दिया। पाकिस्तान के आतंकी समूह जैश ए मोहम्मद ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। भारत ने इस हमले की तीव्र निंदा करते हुए पाकिस्तान पर आरोप लगाया है और कहा है कि "वह आतंकवाद से जुड़े   लोगों तथा गिरोहों को समर्थन करना बंद करे।  अपनी जमीन से इन गिरोहों  को खत्म करे।" सरकार के साथ भारत के सभी राजनीतिक दलों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय  ने भी हमले की तीव्र निंदा की है। साथ ही देश भर में इस घटना पर आक्रोश है। शुक्रवार की सुबह कैबिनेट की बैठक हुई और घटना की समीक्षा की गयी। कैबिनेट में हुए फैसले और तदनुसार निर्देशों को के साथ घटना के बाद स्थिति का जायजा लेने गृह मंत्री कश्मीर पहुंच चुके हैं। इधर कैबिनेट की बैठक के बाद अरुण जेटली ने मीडिया को बताया कि पाकिस्तान को प्रदत " मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वापस ले लिया गया है। राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा है कि इस मामले में गुप्तचरी असफल रही है। सरकार ने इस मामले में कूटनीतिक रास्ता अपनाने का निर्णय किया है। नेशनल इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी ने भी जांच शुरू कर दी है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वह भारत द्वारा बनाई गई आतंकियों की सूची का अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में समर्थन करें। भारत ने यह भी कहा है कि दुनिया पाकिस्तान पर दबाव डाले कि वह अपनी धरती से आतंकियों को काम करने से रोके।
       अपराध शास्त्र के नजरिए से देखें तो आज के हमले की तैयारी गत 17 जनवरी को उस समय शुरू हो गई थी  जब कश्मीर के राजबाग क्षेत्र में आतंकियों ने ग्रेनेड फेंका था और इसमें कई पुलिस वाले घायल हो गए थे। जिम्मेदारी भी जैश ए मोहम्मद ने ही ली थी। इस घटना के बाद श्रीनगर में दो और हमले हुए।  10 फरवरी को श्रीनगर के लाल चौक पर सीआरपीएफ के जवानों पर ग्रेनेड फेंके गए।  इस घटना के चार दिन बाद पुलवामा वाली घटना हुई । यह कश्मीरियों द्वारा किया गया हमला नहीं था। कश्मीरी नौजवानों के हमले की विधि तथा उसके तरीके अलग होते हैं। ऐसे हमलों के लिए कई बार अभ्यास करने होते हैं। अफगानिस्तान में जैसे जैसे हालात बदल रहे हैं पाकिस्तान पागल आतंकियों को कश्मीर में झोंक रहा है। आने वाले दिनों में ऐसे और हमले हो सकते हैं । इसलिए अब समय आ गया  है जब हमें अपनी फौज की पूरी ताकत और सर्वोत्तम संसाधनों के साथ सक्रिय हो जाना चाहिए। वरना पुलवामा की तरह और घटनाएं हो सकती हैं।
        ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास दो ही विकल्प हैं। पहला कि यह सर्जिकल स्ट्राइक के नाम से मशहूर 2016 की तरह अधिकृत कश्मीर पर हमला करे या कूटनीति की राह अपनाए। सरकार ने कूटनीतिक राह अपनाने की बात की है। लेकिन इससे होगा क्या ?  भारत पाकिस्तान की रिश्ते को देखते हुए यह स्पष्ट है कि भारत पाकिस्तान पर ज्यादा दबाव नहीं डाल सकता। ज्यादा से ज्यादा भारत इस मामले को अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के सामने उठा सकता है। ट्रंप ने भी 2017 में आतंकियों को शरण देने के कारण पाकिस्तान को डांटा था और इसके बाद अमरीका ने पाकिस्तान को सैनिक सहायता देनी बंद कर दी थी।  पाकिस्तान को अमरीका ने पुनः मदद देनी शुरू कर दी है। अब हमारे पास सिर्फ चीन एक ऐसा मुल्क है जो पाकिस्तान को यह सब करने से रोक सकता है । लेकिन चीन ऐसा नहीं करेगा। यह याद होगा कि भारत ने राष्ट्र संघ में जैश ए मोहम्मद पर प्रतिबंध लगाने की बात उठाई थी और चीन ने उसका विरोध किया था। यहां तक की अप्रैल 2018 में मोदी और चीन के राष्ट्रपति की बैठक के बाद भी चीन ने अजहर मसूद के संगठन जैश ए मोहम्मद पर प्रतिबंध का विरोध किया था। अब नई दिल्ली अजहर मसूद पर प्रतिबंध की अपील कर सकती है । चीन को वीटो का अधिकार है और वह चेतावनी दे चुका है कि अगर अजहर मसूद पर प्रतिबंध के लिए राष्ट्र संघ में बात उठेगी तो वह वीटो भी तो लगा सकता है।  2018  के सितंबर में चीन के विदेश मंत्री वांग ई ने भारत के प्रयास का विरोध किया था जबकि अमेरिका फ्रांस और इंग्लैंड ने भारत का समर्थन किया था। वास्तविकता तो यह है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन को छोड़कर सभी देश अजहर को प्रतिबंधित करने के पक्ष में है । ऐसे में उम्मीद नहीं है कि चीन आगे भी कुछ सहयोग कर सकता है।  पूरी आशंका है कि पाकिस्तान जैश ए मोहम्मद को बढ़ावा देगा और भारत पर भविष्य में और हमले हो सकते हैं। चीन के मंत्री ने का सबूत मांगा था और कहा था अगर पक्के सबूत मिलें तो  इस्लामाबाद जरूर प्रतिबंध लगाएगा।  चीन के विदेश मंत्री ने राष्ट्र संघ में घोषणा की थी कि "उनका देश सभी तरह के आतंकवाद के विरुद्ध है। पाकिस्तान ने भी अफगानिस्तान में अलकायदा की मदद करने की काफी कीमत चुकाई है।"
       अब भारत के पास जो दूसरा विकल्प  है वह है सर्जिकल स्ट्राइक की तरह एक दूसरा हमला। लेकिन यह बड़ा कठिन है सीमा पार होने वाले हमले बहुत ही कठिन होते हैं सर्जिकल स्ट्राइक्स को बड़ी सावधानी से अंजाम दिया जाता है ।  अगर इसमें बड़ी संख्या में आतंकी मारे जाते भी जाते हैं तो इसका आतंकवाद के शमन पर असर नहीं  पड़ता है। क्योंकि पाकिस्तान यह कहता है इस तरह कोई हमला हुआ ही नहीं । इसके पहले भी जो सर्जिकल स्ट्राइक किया गया था उसका क्या लाभ हुआ। क्या पाकिस्तान को रोका जा सका? इस बार भी सरकार यदि वही फार्मूला अपनाती है तो प्रश्न उठता है कि क्या यह कारगर होगा ? क्या ऐसे कदमों से इस तरह से हमलों  को रोका जा सकता है?

Thursday, February 14, 2019

राफेल सौदा: सच शायद ही पता चले

राफेल सौदा: सच शायद ही पता चले

जैसे-जैसे  चुनाव के दिन  नजदीक आ रहे हैं राफेल युद्धक विमानों के सौदे को लेकर माहौल गर्म होता जा रहा है। इसी बीच बुधवार को राज्यसभा में लेखा महापरीक्षक एवं नियंत्रक की रिपोर्ट पेश की गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि एनडीए सरकार ने पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा किए गए सौदे से 2.86 प्रतिशत कम कीमत पर सौदा तय किया है । साथ ही इसमें  जरूरत के अनुसार  कई नए फीचर जोड़े गए हैं।  रिपोर्ट में कहा गया है कि फीचर जोड़े जाने के बावजूद पूरा सौदा    सस्ता पड़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले 126 विमानों के लिए सौदा किया गया था। इसके बाद भारतीय जरूरतों के अनुसार कुछ परिवर्तन परिवर्तन के करवा कर 36 विमानों का सौदा किया गया इसके बावजूद बड़ी रकम बचाई गई । रिपोर्ट में कहा गया है कि विमान चलाने के लिए जो सहायता उपकरण दिए गए हैं उस मानदंड पर भी एन डी ए का सौदा सस्ता है । यही नहीं हथियारों की पैकेज भी इस सौदे  में सस्ती है। वैसे अगर गंभीरता से देखें तो यह रिपोर्ट भी पूरी तरह विवाद मुक्त नहीं है।  इसमें कीमतों को तय करने को लेकर कई विवाद बिंदुओं को शामिल ही नहीं किया गया है और इसे रक्षा मंत्रालय की गोपनीयता के परदे में छुपा दिया गया है। दूसरी बात है कि लेखा महापरीक्षा राजीव महर्षि 2016 में केंद्रीय वित्त सचिव थे। उसी समय राफेल विमानों के संशोधित सौदे पर हस्ताक्षर हुए थे।  इन्हीं आधारों पर विपक्ष ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है ।  इस पर विवाद पहले से जारी है और कह सकते हैं इस रिपोर्ट को लेकर विवादों का एक नया दौर आरंभ हो गया है।
कुछ जानकार लोगों का कहना है की मोदी सरकार का सौदा यूपीए के दौरान हुए   सौदे से बेहतर शर्त पर नहीं था। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार के नए सौदे में 36 राफेल विमानों के पहले फेज में 18 विमानों की डिलीवरी करने की तारीख भी यूपीए सरकार के दौरान मिले प्रस्ताव से विलंब से थी। जितने मुंह उतनी बातें और उन बातों के बीच यह समझ पाना बड़ा कठिन है कि सच क्या है? सब के पास अपने अपने तर्क हैं ।भारत में हथियारों के सौदे हमेशा विवादास्पद होते हैं। अब से पहले वह बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा  सुर्खियों में रहा था । उस समय भी कीमतों को लेकर बहुत बात बढ़ी थी।  स्थिति तब और खराब हो गई थी जब स्वीडन के  प्रधानमंत्री ओलाफ़ पामे की 1986 में हत्या हो गई। प्रधानमंत्री पामे इस सौदे का समर्थन कर रहे थे । हत्यारा पकड़ा नहीं जा सका है। बोफोर्स की क्षमता को लेकर भारी विवाद हुआ था। बाद में कारगिल युद्ध के समय वही तोपें काम आईं।  इस  बार सुप्रीम कोर्ट पर उंगली उठी है। सीबीआई ने अभी तक   कोई जांच शुरू नहीं की है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सारा मामला बहस का मसला बना हुआ है । मीडिया में संसद की बहसों का हवाला दिया जाता है।  बहसों में अखबारों का हवाला दिया जाता है भाजपा के प्रवक्ता का हवाला दिया जाता है और इस पर बहस चलती रहती है।  प्रक्रिया गत तकनीकी शब्दों और विमान की तकनीकों की लंबी फेहरिस्त बहस को और उलझा देती है। मामला इतना कन्फ्यूजिंग हो गया है हर समय, हर बहस पर एक नई बात उभर आती है और उस पर विवाद खड़ा हो जाता है। शुरु में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने सारे तथ्य सार्वजनिक करने का वादा किया था बाद में फ्रांस के साथ गोपनीयता समझौता का हवाला देकर वह अपनी बात से मुकर गयीं। इसमें और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि हवा उड़ रही है कि  राफेल सौदे को कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं । कथित तौर पर सरकार  36 राफेल अनुबंध को भी घटाने की कोशिश में है लेकिन अभी तक यह प्रमाणित नहीं हो सका है।   जब तक मुकम्मल तौर पर यह पता नहीं चल जाता कि इससे  होने वाला लाभ किसको मिला है  या किसको मिल रहा है या मिलेगा तबतक  जितने भी आरोप लगाए जा रहे हैं वह सही नहीं कहे जा सकते। लाभार्थी की पक्की पहचान जब तक नहीं होगी तब तक घोटाले को प्रमाणित करना बहुत कठिन है।  बात बहुत बढ़ गई है और इसमें हकीकत को समझना बड़ा कठिन हो गया है। सब के पास अपने अपने तथ्य हैं लेकिन कहीं पक्के सबूत नहीं हैं। यह बहस में शामिल पक्षों की अयोग्यता कही जाएगी । भारत में हथियारों को लेकर अक्सर ऐसा होता रहा है शायद राफेल सौदे में भी कुछ ऐसा ही हो।

Wednesday, February 13, 2019

आना प्रियंका गांधी का

आना प्रियंका गांधी का

सोमवार को लखनऊ में प्रियंका गांधी का पहला रोड हुआ। एक तरह से यह उनकी औपचारिक राजनीतिक शुरुआत थी।औपचारिक इसलिए कि उत्तर प्रदेश का, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपे जाने के बाद वह पहली जनसभा थी। उसी दिन सवेरे उन्होंने टि्वटर भी ज्वाइन किया और शाम को उनके समर्थकों की गिनती लाख पहुंच गई । जबकि उन्होंने कुछ भी ट्वीट नहीं किया। सड़क पर और साइबरस्पेस में उनका आना लगभग एक साथ हुआ। सड़क पर जो प्रदर्शन हुए उसके आयोजकों और सोशल मीडिया में उनके प्रबंधकों में लगता बहुत अच्छी तालमेल है। खबरों को अगर मानें तो लखनऊ में दृश्य बड़ा ही खुशनुमा था ।  हवाई अड्डे से लेकर शहर तक लोगों की कतार लगी थी। इसके पहले विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी या अखिलेश यादव के रोड शो की इससे  तुलना करना उचित नहीं होगा। दोनों के समय और संदर्भ में फर्क है। प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या 2014 में यह ज्यादा था जब मोदी की लहर चल रही थी या 2017 में प्रियंका गांधी ने बेशक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रचार का नेतृत्व किया था तब इन अभियानों में जो हुजूम या जितने लोग एकत्र हुए थे उनकी संख्या से ज्यादा थी। इन सब की तुलना व्यर्थ है।  भीड़ हमेशा वोट में नहीं बदलती और जब तक वोट के परिणाम ना आ जाएं कोई भी तुलना उचित नहीं होगी । यह सही है कि डूबती हुई कांग्रेस में प्रियंका गांधी के प्रवेश ने नया जोश भर दिया। कांग्रेस समर्थक मीडिया में भारी उल्लास और उन्माद देखा गया। इनमें से कुछ लोग गुलाबी लिबास में "प्रियंका सेना" के सदस्यों से ज्यादा उत्साह में दिख रहे थे । यहां सवाल है कि इस तरह की उत्साह पूर्ण खबरें प्रियंका गांधी को या कांग्रेस को कितनी मदद कर सकती हैं । खास करके अभी जो स्थिति है उसमें इसका विश्लेषण दिलचस्प होगा।
       हालांकि राहुल गांधी मोदी जी के खिलाफ राफेल के गोले दाग रहे हैं । प्रियंका गांधी को फिलहाल इस मामले में  आरक्षित कुमुक की तरह रखा गया है।  उनका इस्तेमाल परमाणु बटन दबाने जैसा हो सकता है । यह तभी होगा जब परिवार की प्रधान सेनापति सोनिया गांधी आशीर्वाद का हाथ उठाएं। परंतु ऐसी स्थिति में सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित होना मुश्किल हो जाएगा। इसका असर अन्य क्षेत्रों के राजनीतिक मैदान पर भी पड़ेगा।   प्रियंका गांधी को उतारना एक तरह से किसी भी गठबंधन में कांग्रेस का प्रथम स्थान के दावे का संकेत है। यह कांग्रेस का स्पष्ट संकेत है कि हमारी अपील सभी विपक्षी दलों के मुकाबले सबसे ज्यादा है और इसका अर्थ है कि मोदी के खिलाफ कोई भी वोट कांग्रेस के पक्ष में होगा ।  विपक्षी दलों की तरफ से इसका क्या उत्तर मिलेगा या अभी कहना मुश्किल है। अभी जो हालात हैं उससे कांग्रेस को अपनी स्थिति और ताकत  बताने के लिए या अपनी स्थिति का दावा करने के लिए एकमात्र तरीका है कि लोकसभा चुनाव में उसे कितने वोट मिलेंगे या कितनी सीटें मिलेंगी।  उत्तर प्रदेश में खास करके उसे अपनी सीटें बढ़ानी होंगी। यह सब सपा और बसपा की कीमत पर होगा। कुछ लोग कह सकते हैं प्रियंका गांधी भाजपा के सवर्णों के वोट काट सकती हैं । सपा और बसपा के वोटो का कुछ नहीं बिगड़ेगा। ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि कोई जादुई ताकत ही प्रियंका गांधी को मायावती और अखिलेश पर भारी पड़ने देगी। चुनाव तो आते जाते रहते हैं लेकिन क्षेत्रीय नेताओं की रोजी-रोटी तो उनका राज्य ही है और वह अपनी थाली प्रियंका के आगे नहीं परोस देंगे। कांग्रेस एक और विकल्प अपना रही है वह है प्रियंका का अन्य राज्यों में भी उपयोग किया जाए।  इससे उत्तर प्रदेश पर जो उनका फोकस है वह कम हो जाएगा और फिर उनका प्रभाव भी घट जाएगा । क्योंकि वह चुनाव के पहले बहुत कम उत्तर प्रदेश में दिखाई पड़ेगी। दूसरी तरफ चंद्रबाबू नायडू और स्टालिन उनको शायद प्रभावशाली  नहीं होने देंगे यही हाल बंगाल में भी हो सकता है। इसमें सबसे बड़ा जोखिम  है कि इस दौड़ में कहीं राहुल गांधी न पिछड़ जाएं। लखनऊ की भीड़ देखकर संभवत प्रियंका गांधी वाराणसी भी जा सकती हैं। हो सकता है फिलहाल वे लहर का अंदाजा लगा रही हों क्योंकि उत्तर प्रदेश में जो संगठन है उसे देखते हुए या मोदी जैसे लोकप्रिय नेता के खिलाफ जनसमर्थन जुटाने के लिए पहले  तैयारी  जरूरी होती है। इसमें कोई शक नहीं है कि बनारस का रोड शो लखनऊ के मुकाबले ज्यादा कठिन होगा और बड़ा भी होना चाहिए। यद्यपि राजनीतिक पंडितों का कहना है कि बनारस में मोदी जी की लोकप्रियता थोड़ी घटी है, लेकिन 2014 और 17 दोनों के परिणाम बताते हैं कि ऐसा बहुत ज्यादा नहीं हुआ है अथवा यह कह सकते हैं कि हुआ ही नहीं है। ऐसे में अगर प्रियंका गांधी के मैंनेजरों की टीम कांग्रेस को स्थापित करना चाहती है तो कुछ करिश्मा जरूरी है। यह विश्लेषण और अंकगणित से नहीं हो सकता। देखना यह है कि आने वाले दिनों में उनका प्रचार क्या रंग लाता है। अगर वह अपनी दादी इंदिरा गांधी की भांति सारे डायनामिक्स को नियंत्रित करना जानती हैं या कर सकेंगी तो कुछ चमत्कार हो सकता है। ऐसा करने के लिए पार्टी के भीतर और पार्टी के बाहर दोनों जगह  संतुलन बनाए रखने की जरूरत है। 2019 का चुनाव प्रियंका गांधी के जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण होगा। लोग प्रियंका को देखकर संभवतः इंदिरा जी को याद कर सकते हैं।  जहां तक हकीकत का प्रश्न है प्रियंका से ज्यादा सोनिया जी ने इंदिरा जी से सीखा है कि कैसे राजनीति में वापस आया जा सकता है। मौजूदा समय कुछ गूढ़  संकेत दे रहा है । मोदी जी को कांग्रेस मुक्त भारत का   अपना विचार अभी थोड़े दिन के लिए स्थगित करना पड़ेगा।

Tuesday, February 12, 2019

उत्तर प्रदेश और कांग्रेस

उत्तर प्रदेश और कांग्रेस

देश में प्रधानमंत्री बनाने की सबसे बड़ी हैसियत रखने वाले प्रांत उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की बड़ी अजीब सियासत दिख रही है । एक तरफ तो वहां लखनऊ में प्रियंका गांधी की जनसभा में नारे लग रहे हैं "बदलाव की आंधी है प्रियंका गांधी है।" बताया जाता है कि वहां भारी भीड़ एकत्र हुई थी।  सब की नजर प्रियंका गांधी पर थी और सब की आंखों में प्रियंका गांधी ही थी । ऐसा लग रहा था कि सचमुच एक आंधी आ गई है ।लोकप्रियता का ज्वार लहरा रहा है। वहीं दूसरी तरफ राज्य में कांग्रेस का वोट बैंक सिकुड़ा हुआ है।  सबसे बड़ी बात है कि लखनऊ पूर्वी उत्तर प्रदेश नहीं पूरे उत्तर प्रदेश की राजधानी है और लखनऊ की रैली का  असर कहां तक पड़ेगा इसका आकलन अभी नहीं किया जाना  है । आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में  कांग्रेस का वोट बैंक एकदम सिकुड़ गया है और संगठन भी बहुत मजबूत नहीं है ।फिर भी, कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बदलते हालात को देख कर बहुत आशान्वित है। यहां तक कि कई बार तो यह कहा जा रहा है कि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपे  जाने के बाद मोदी भी भीतर से आतंकित हैं। कई लोग तो यह भी कहते सुने गए हैं कि प्रियंका वाराणसी से खड़ी होकर मोदी को चुनौती दे सकती हैं। यह सब फिलहाल हवाई किले की तरह है।  उत्तर प्रदेश में क्या सचमुच कांग्रेस की ऐसी स्थिति बनी हुई है। जरा उत्तर प्रदेश के नए राजनीतिक आचरण को ध्यान से देखें। विगत एक दशक से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए हालात बहुत तेजी से बिगड़े हैं। 2009 में कांग्रेस ने वहां 78 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे जिनमें केवल 21 सीटें ही  हासिल हुईं और उसे 18.2%  वोट मिल पाए थे । 2012 में विधानसभा चुनाव में 355 सीटों पर जोर आजमाने के बाद कहीं 28 सीटें मिली और केवल 11.6 प्रतिशत वोट ही मिले। 2014 में भी यही हालात थे । 67 सीटों पर लड़ने के बाद केवल 2 सीटें हासिल हुईं और वोट केवल 7.5%  प्रतिशत मिले। 2017 में उसे सपा से हाथ मिलाने पड़े और इस  साल हुए विधानसभा में चुनाव में उस के 114 उम्मीदवार मैदान में थे लेकिन उसे केवल 7 सीटें मिलीं और 6.25% वोट ही मिल पाए। सपा की साइकिल पर सवारी कोई लाभ नहीं दिला सकी। आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का वोट आधार समय के साथ सिकुड़ता गया है और आधार का यह संकुचन उसे बसपा तथा सपा के साथ गठबंधन के लिए बहुत भारी बाधा खड़ी कर रहा है। क्योंकि इसी आधार पर उसे सीट देने की बात कही गई थी। 2014 का ही आंकड़ा देखें।  उसे सपा और बसपा के क्रमशः 22.70 तथा 19. 60 प्रतिशत वोटों के मुकाबले केवल 7.5 प्रतिशत वोट मिले थे । यह अनुपात बताता है कि कांग्रेस के पास इतना बड़ा आधार नहीं है कि वह सपा और बसपा से गठबंधन के बाद ज्यादा सीटों पर दावा कर सके। इतना ही नहीं मायावती की महत्वाकांक्षा भी इस रास्ते में बाधक बनती है । अब जब  उसे गठबंधन में नहीं शामिल किया गया तो कांग्रेस ने अपने दम पर उत्तर प्रदेश की  सभी 80 सीटों पर  चुनाव लड़ने  की घोषणा कर दी।  यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि कांग्रेस के पास प्रियंका गांधी को सामने रखने के अलावा क्या तैयारी है? जरा पीछे लौटें। प्रियंका गांधी की घोषणा यानी उन्हें उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी जाने की घोषणा जिस ढंग से हुई वह कोई मंच नहीं था केवल एक प्रेस नोट के जरिए सबको बता दिया गया प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई है। ना कोई मंच बना था और ना ही उस मंच से घोषणा के समय   राहुल गांधी  और प्रियंका गांधी मौजूद थे।  जब यह घोषणा हुई  प्रियंका विदेश गई हुई थीं और राहुल अमेठी में थे । अगर उस मंच पर ये दोनों होते तो इस घोषणा का संदेश ही  दूसरा होता । अब जरा सोचिए केवल एक प्रेस नोट के जरिए रियासत में इतना बड़ा दांव खेला जा सकता है।
         अगर समाज के राजनीतिक आचरण का विश्लेषण करें तो यह पता चलेगा कि  वोट के  आधार और संगठन में सीधा संबंध है। संगठन बढ़ेगा , व्यापक होगा तो आधार भी बढ़ेगा अगर यह घटेगा तो आधार भी घटेगा। विगत दो  वर्षों से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन बिल्कुल कृषकाय  हो गया है। संगठन की ओर देखने की फुर्सत किसी को नहीं है।  जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं तरह-तरह की अटकलों का बाजार गर्म हो रहा है। जैसे उत्तर प्रदेश में दो महासचिव बनाए जाएंगे या प्रदेश को चार हिस्सों में विभाजित कर चार प्रभारी अध्यक्ष बनाए जाएंगे। कार्यकर्ता हतोत्साहित हैं और संगठन का पुनर्निर्माण नहीं हो रहा है, जिसके कारण कार्यकर्ताओं का उत्साह दिनों दिन घटता जा रहा है, उम्मीदें भी तेजी से समाप्त हो रही हैं।
         इन सब के बावजूद अभी भी कुछ उम्मीदें बाकी हैं। अब जैसे 2009 के चुनाव को ही देखें। उसमें कांग्रेस को 21 सीटें मिली थीं लेकिन इन 21 सीटों में 18 सीटें नई थीं।  पुरानी 9 सीटों में वह हार गई थी। इसका मतलब है कि नई सीटों पर कांग्रेस के लिए अभी भी संभावनाएं कायम हैं। इस बार चुनाव में कांग्रेस 60 -65 सीटों पर युवाओं को उतारना चाहती है । यानी उन सीटों पर जो पुराने कांग्रेसी थे और जिन से जनता ऊब चुकी थी उन्हें शायद टिकट ना मिले और ताजा हवा के रूप में ऐसे नौजवान उन सीटों पर खड़े हों जिनकी तरफ मतदाता उम्मीद से देख सकें। यह नए बने वोटरों को आकर्षित करने का एक तरीका तो हो ही सकता है इतना ही नहीं जो मतदाता वर्ग कांग्रेस से  छिटक गया है उसे भी पार्टी अपनी ओर लाने की कोशिश में है । 2009 की ही बात लें। इसमें पार्टी को 21 में से 17 सीटें ऐसे इलाकों से हासिल हुई थी जो ग्रामीण बहुल हैं और इसलिए इस बार कांग्रेस ग्रामीण बहुल सीटों पर ज्यादा जोर दे रही है। किसानों को लेकर राहुल गांधी की घोषणाएं इस तरह की उम्मीदें भी जगा रही हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश ग्रामीण क्षेत्र है और वहां  प्रियंका को भेजा जाना इसी रणनीति का एक अंग है। ऐसा करके कांग्रेस यह मान रही है कि  ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस की वापसी हो सकती है। यही नहीं जिस चुनाव पर निशाना है वह लोकसभा चुनाव है और जो गैर भाजपा मतदाता है उनके सामने सपा - बसपा के क्षेत्रीय गठबंधन के मुकाबले राष्ट्रीय स्तर की कांग्रेस एक बेहतर विकल्प के रूप में नजर आ रही है।  उम्मीद की जाती है कि मुस्लिम, ब्राम्हण तथा यादवों को छोड़ कर अन्य पिछड़े वर्ग के मतदाता कांग्रेस की तरफ मुड़ सकते हैं। 2009 में कांग्रेस के ऐसे उम्मीदवारों को विजय मिली थी जिनका  जाति आधार बहुत व्यापक नहीं था और इस बार कांग्रेस खुद को एक राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश कर रही है । यह उसकी सबसे बड़ी समर नीति है । लेकिन यहां भी एक गड़बड़ है । पिछले डेढ़- दो दशक से उत्तर प्रदेश से ही कांग्रेस का अध्यक्ष आता रहा है लेकिन इस प्रदेश में संगठन को मजबूत करने के लिए कोई भी गंभीर प्रयास नहीं हुआ। शीर्ष नेतृत्व हसीन सपने देखता रहा। उत्तर प्रदेश का पार्टी संगठन अपनी बदहाली पर रोता रहा। इन सब के बावजूद कांग्रेस अगर कमर कस ले और संपूर्ण समर्पण के साथ चुनाव अभियान में जुट जाए तो कुछ  भी हो सकता है। जैसा  लखनऊ रैली से  महसूस हो रहा है । लेकिन, इसके बावजूद यह रास्ता सड़क और मैदान की राजनीति का है। इसके लिए कांग्रेस को अपना एजेंडा साफ करना होगा।  स्थिति को मजबूत बनाने के लिए हर संभव प्रयास करने पड़ेंगे।  लखनऊ रैली को इस प्रयास का श्री गणेश कह सकते हैं।

Monday, February 11, 2019

सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए

सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए

राफेल सौदे को लेकर देश में हालात कुछ ऐसे बन रहे हैं कि सब को लगने लगा है कि कहीं ना कहीं कुछ छुपाया जा रहा है।  मुल्क को इस मामले में संतोषजनक स्पष्टीकरण की जरूरत है। बदकिस्मती से टुकड़े टुकड़े में सूचनाएं आ रही हैं। कुछ टुकड़े सीधे फ्रांस से आ रहे हैं, कुछ मीडिया के माध्यम से और कुछ सरकार पर लगे आरोपों के बारे में  दिए गए  जवाबों के जरिए। नतीजा यह हो रहा है कि पूरी स्पष्ट तस्वीर नहीं बन रही है।  स्पष्टता के अभाव में संदेह बढ़ता जा रहा है। अभी हाल में मीडिया में एक खबर आयी कि प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा राफेल सौदे पर समानांतर बातचीत किये जाने के कारण रक्षा मंत्रालय और  सौदेबाजी के लिए गठित भारतीय दल की तोलमोल करने की ताकत कम हो गई। तत्कालीन रक्षा सचिव मोहन कुमार ने एक नोट में कहा है कि "रक्षा मंत्री कृपया इसको देखिए। यह वांछित है। क्योंकि इस तरह की वार्ता प्रधानमंत्री कार्यालय को नहीं करनी चाहिए इससे हम लोगों की सौदेबाजी की स्थिति बिगड़ जाती है।" यह  नोट 1 दिसंबर 2015 को लिखा गया था। इसके जवाब में रक्षा मंत्रालय ने कहा की सुरक्षा सचिव इस बात को प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव के साथ परामर्श कर के हल करें। इसका जवाब 11 जनवरी 2016 को आया। सुरक्षा सचिव द्वारा भेजी गई टिप्पणी के लगभग 1 महीने के बाद। उस समय मनोहर परिकर रक्षा मंत्री थे।  इस विलंब से यह साबित होता है कि उन्हें इस मामले में कोई जल्दी बाजी नहीं थी। मीडिया के एक भाग में यह भी कहा गया है कि जो बातचीत चल रही थी वह गारंटी के बारे में नहीं मूल्य के बारे में  थी। यहां भी  कुछ गड़बड़ है। पहली गड़बड़ तो यह है कि बात कि बात कीमतों की है।  जहां तक गारंटी का प्रश्न है सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में खुद कहा है कि राफेल की उत्पादकों की ओर से उसे कुछ नहीं मिला है । महान्यायवादी ने सुप्रीम कोर्ट को यह बताया कि फ्रांस की सरकार ने भारत को आश्वस्त किया है कि राफेल बनाने वाली कंपनी अपने वादे को पूरा करेगी।
        यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न है की इस बातचीत में रक्षा मंत्रालय को क्यों डाला गया? ऐसा कोई कारण नहीं लगता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने बातचीत करने वाले दल के लोगों को इस प्रक्रिया में क्यों नहीं शामिल किया। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि बातचीत करने वाले दल क्यों नहीं गारंटी पर बात कर सकते हैं । क्योंकि गारंटी आम  तौर पर दी नहीं जाती है। यह मूल्य की सौदेबाजी का हिस्सा होता है। अब यहां कीमतों की बात भी आती है। पहले की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय वार्ताकार दल के सात में से तीन सदस्यों ने  कीमत ,डिजाइन  और  विकास संबंधी मुद्दों पर आपत्ति जताई थी। अब यह मानने के कई कारण हो सकते हैं कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया है। क्योंकि, इसने कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत अपनी टिप्पणी में दावा किया है कि भारतीय वार्ताकार दल इस प्रक्रिया में शामिल था। इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका के बारे में कोई खास बात नहीं कही है। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय कोई गोपनीय खेल खेल रहा है। मार्च 2016 में अवकाश प्राप्त करने से पहले सुरक्षा सेवा के वित्तीय सलाहकार सुधांशु मुखर्जी ने बताया था कि वर्तमान खरीदारी प्रक्रिया राफेल ठेके को  तय करने में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की कोई भूमिका नहीं थी। प्रधानमंत्री कार्यालय के मामले में यह सही था क्योंकि आपूर्ति वार्ताकार दल में प्रधान मंत्री कार्यालय का कोई भी सदस्य नामजद नहीं था। रक्षा खरीदारी प्रक्रिया 2013 के नियमों में वार्ताकार दल को कैसे गठित किया जाए यह पूरी तरह विहित है।  उसमें कोई भी परिवर्तन महानिदेशक (अधिग्रहण) की अनुमति के बाद ही हो सकता है।
       इससे जो बात निकलती है उसे लगता है कि इस मामले में कोई पक्का सबूत नहीं है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कोई सबूत ही नहीं है। कुछ तो सबूत है। अब सरकार कहती है कि सुरक्षा कारणों से इस सौदे के बारे में महत्वपूर्ण सूचनाएं नहीं दी जा सकती। कीमतों के बारे में बताना कोई गोपनीय तथ्य नहीं है बल्कि यह देश के करदाताओं का अधिकार है। इन जेट विमानों में जो गोपनीय है वह कीमत नहीं है, उनका आकार प्रकार नहीं है बल्कि उनकी ताकत है। खास करके, गोपनीय वह साजो सामान  हैं जो उसमें लगे हैं।   इसके बारे में तो सरकार से कोई पूछ नहीं रहा है। जनता तो यह जानना चाहती है कि शर्तें क्या हैं और  सरकार ने पहले तय की गई कीमतों से ऊंची कीमतों पर क्यों सौदा तय किया? जनता यह जानना चाहती है कि क्या इस प्रक्रिया में नियम कानून को सही ढंग से पालन किया गया है ?  जो सबूत हैं उससे तो लगता है कि ऐसा नहीं हुआ है।  अगर ऐसा नहीं हुआ है तो सरकार को इसका स्पष्टीकरण देना चाहिए। वह क्यों नहीं दे रही है यह बहुत ही बुनियादी प्रश्न है।

Sunday, February 10, 2019

सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण और सियासत

सवर्णों को आर्थिक आधार पर आरक्षण और सियासत

अभी हाल में मोदी जी की सरकार ने सवर्णों को आरक्षण दिया। मजे की बात है कि लोकसभा और राज्यसभा में मामूली बहस के बाद इसे पारित कर दिया गया। लेकिन सदन से बाहर इसे लेकर कई मंचों पर तीव्र विरोध दर्ज कराए गए। आरक्षण हासिल करने की दो कैटेगरी है पहला कि जिस व्यक्ति की घरेलू आय 8 लाख रुपए और उसके पास खेती  की जमीन 5 एकड़ हो। चुनाव के मद्देनजर इसे गेम चेंजर माना जा रहा है या कहें चुनावी ब्रह्मास्त्र माना जा रहा है। लेकिन सच तो यह है इसमें कई भारी गड़बड़ियां हैं जो आगे चल कर हिंसा को बढ़ावा दे सकती हैं।
     सबसे बड़ी गड़बड़ी आंकड़ों का अभाव है। सबसे बड़ा अभाव जातिगत और आर्थिक जनगणना का है। इस स्थिति को देखते हुए सरकार की मंशा स्पष्ट हो जाती है । भारत में कितनी जातियां हैं उनमें सवर्ण में कितने हैं शायद किसी को मालूम नहीं। हमारे देश में जनगणना एक पुरानी कसरत है। इसमें एक नियत समय पर सरकारी स्कूल के शिक्षक घर-घर  जाते हैं और हर आदमी को गिनते हैं। उनके बारे में जानकारियां एकत्र कर लेते हैं। यह 1881 से चल रहा है। लेकिन 2011 में एक अलग तरह की गणना शुरू हुई। वो थी सोशियो इकोनामिक एंड कास्ट सेंसस। यह जनगणना 2011 के जून में आरंभ हुई और इसे दिसंबर में पूरा होना था। सरकार के मुताबिक समग्र विकास के लिए इसका बहुत महत्व है। इसका उपयोग 12वीं पंचवर्षीय योजना में किया जाना था। लेकिन यह जनगणना मार्च 2016 में खत्म हुई इस पर 4893 करोड़ रुपये  खर्च हुए । इसका लक्ष्य देश में जातिगत आंकड़े एकत्र करना था। लेकिन, 12वी पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल खत्म हो गया और अब देश 13वीं पंचवर्षीय योजना में प्रवेश कर रहा है।  आंकड़ों का कहीं कोई विवरण नहीं है। एक बार जुलाई 2015 में नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के नेतृत्व में एक एक्सपर्ट कमेटी बनी थी और उस जातिगत गणना फील्ड सर्वे रिपोर्ट  की एक झलक प्रकाशित हुई थी । उसके अनुसार देश में 46 लाख जातियां, उपजातियां और गोत्र हैं। अब न अरविंद पनगढ़िया हैं और ना ही उस एक्सपर्ट कमेटी के किसी सदस्य का नाम सामने है। सरकार ने 9 अगस्त 2018 को राज्यसभा में एक सवाल के तहत स्वीकार किया था इस एक्सपर्ट ग्रुप का कभी गठन नहीं  हुआ इसलिए आगे की कार्रवाई यह रिपोर्ट आने का कोई सवाल ही नहीं है।  देश का 5000 करोड़ रुपया खर्च कर कुछ नहीं मिला सरकार को। यह मालूम नहीं है कि देश में विभिन्न जातियों के लोग कितने हैं उनमें सवर्ण कितने हैं और पिछड़े कितने हैं। उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है। हमारे देश में जाति संबंधित नीतियां बनती हैं, विभाग बनते हैं लेकिन यह सब बिना किसी आंकड़े के काम करते हैं । सबसे बड़ी बात है जिसे लेकर सबसे बड़ा बवाल है वह कि हमारे देश में कौन सी जाति पिछड़ी है इसका कोई प्रमाणिक आंकड़ा नहीं है। जो कुछ है वह 1931 के आंकड़ों के आधार पर है या तो फिर मनमाने तरीके से तय कर दिया जाता है । यही  कारण है कि विभिन्न जातियां लगातार दबाव डालती हैं कि उन्हें ओबीसी में शामिल कर लिया जाए।
      ऐसे में सरकार सवर्णों को आरक्षण देने की बात कर रही है। सबसे बड़ी बाधा तो कौन सवर्ण है और इस आरक्षण के काबिल है यह कैसे साबित होगा। ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे जो बीपीएल कार्ड के लायक नहीं हैं फिर भी बी पी एल कार्डधारक हैं।  उनकी अच्छी आय है। अगर गरीबी का यही या ऐसा ही पैमाना है और उनके आधार पर आरक्षण देने की बात होगी तो कैसे-कैसे लोग आरक्षण पायेंगे और कैसे लोग वंचित रह जाएंगे इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है । यही नहीं जातियों के भीतर और जातियों के बीच में आर्थिक आधार पर भेदभाव आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन सीमा रेखा को धुंधला कर देगा।
         जनगणना के जो आंकड़े 2012 में तैयार हुए थे उनके आधार पर ही एक बार इस ताजा स्थिति का विश्लेषण करें । उन आंकड़ों में आय का विवरण भी था। देश की ग्रामीण आबादी का लगभग 98. 91% और शहरी आबादी का 96.7% भाग 8लाख से कम आमदनी वाला है । यह आंकड़ा 2012 का है। आय के 4 सोपान तय किए गए हैं । पहला दो लाख से नीचे वाले, दूसरा 2 से 5 लाख रुपए आय वाले ,तीसरा 5 से 8लाख रुपये वाले और चौथा 8 लाख से ऊपर आय वाले। ग्रामीण आबादी में 86% ऐसे परिवार हैं जिनकी आय 2 लाख रुपए से कम है। लगभग 11% परिवार की आय 2 से 5 लाख की है और 1.8% परिवार की आय 5 से 8 लाख रुपए की है। अब बचे हुए 1% कुछ ज्यादा परिवार ऐसे हैं जिनकी आय 8लाख रुपये से ऊपर है । शहरी आबादी में और चौंकाने वाले तथ्य हैं। वहां 64% ऐसे परिवार है जिनकी आय 2लाख रुपये से नीचे है। कहा जा सकता है देश की ग्रामीण आबादी में तीन चौथाई से ज्यादा परिवार ऐसे हैं जिनकी आय 2लाख रुपए से कम है । अब हा दो स्थितियां उभर कर आती हैं पहली अगर कम आय आरक्षण का आधार है तो ज्यादा ग्रामीण  आरक्षण के काबिल हैं शहरी आबादी के मुकाबले।
         यही नहीं, जातियों को लेकर भी बड़ा अंतर है। उपरोक्त आंकड़ों के अनुसार शहरों में जो ब्राह्मण परिवार हैं उनमें 46% ऐसे हैं जिनकी 2लाख रुपयों से कम आय है और 36% ऐसे हैं जिनकी आमदनी दो लाख से 5लाख है। अन्य सवर्णों में यह थोड़ी ज्यादा है । अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति में हालत और खराब  हैं ।इनमें 2 लाख रुपयों से कम आय वाला वर्ग 69% है और उससे ज्यादा तथा पांच लाख से कम आय वाला वर्ग 25% है । इससे साफ जाहिर होता है की आर्थिक और सामाजिक पिछड़ापन एक दूसरे से संबंधित हैं ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है की आरक्षण के लिए आर्थिक पिछड़ापन एक दर्जा हो सकता है।  सरकारी नौकरियों के अभाव में इस तरह का आरक्षण एक तरह का भ्रम पैदा करेगा और इसका नतीजा हिंसा में दिखाई पड़ने लगेगा। गलत या काल्पनिक अंतर केवल खराब राजनीति ही नहीं अर्थव्यवस्था के लिए भी हानिकारक है।

Friday, February 8, 2019

सरकार सुरक्षा को लेकर उदासीन क्यों?

सरकार सुरक्षा को लेकर उदासीन क्यों?

2019 के अंतरिम बजट में सुरक्षा पर 3.05 लाख करोड़ का प्रावधान है। साधारण अंकगणित के नजरिये से देखा जाए तो यह पिछले साल के 2. 95 लाख करोड़ से सिर्फ 3.38 प्रतिशत ज्यादा है। अगर सही मायने में देखा जाए तो सुरक्षा बजट में कमी कर दी गई है । पिछले साल के मुकाबले इस वर्ष 4.74% मुद्रास्फीति हुई है इससे रुपए की कीमत पर गिर गई है। अब हमारे अधिकांश सुरक्षा संयंत्र और हथियार विदेशों से आयात होते हैं। रुपए की कीमत डॉलर के मुकाबले कम होने से जो राशि दिख रही है वह खरीदारी में कहां पहुंचेगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है । पिछले साल जनवरी में डॉलर की कीमत 64 रुपए थी इस वर्ष यह 71.25 रुपए हो गई है। इस आधार पर अगर देखें तो पिछले साल से इस साल 11% कम आवंटन हुआ है। इसका अर्थ है कि पिछले वर्ष से कम इस बार आयात होगा। इस वर्ष 1.03 लाख करोड़ रुपयों का ज्यादा आवंटन बहुत कम है। खास करके ऐसे समय में जब वस्तुएं  बहुत महंगी होती जा रही हैं। इसका मतलब है कि इस बार जब रक्षा जरूरतों की खरीदारी होगी उसमें बहुत किफायत बरतनी होगी और यह राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में सही नहीं होगा। 
      वित्तीय वर्ष 2018- 19 में कुल बजट का 12. 10 प्रतिशत सुरक्षा बजट था। इस वर्ष रक्षा बजट कुल बजट का 10. 96% है । अब प्रश्न है कि सरकार सच में चाहती क्या है?  भाजपा या अन्य दक्षिणपंथी दलों के लिए कभी भी सुरक्षा प्राथमिक नहीं रही। हालांकि, वह सुरक्षा का राजनीतिक इस्तेमाल बखूबी करती है। रक्षा के  मामले को हमेशा भुनाने वाली सरकार ने पिछले 5 वर्षों में लगातार सुरक्षा बजट को कम किया है। बार-बार कहा गया है की सेना में फौजी ज्यादा होते हैं और बजट में कमी से राष्ट्रीय सुरक्षा  पर आंच आने का खतरा रहता है। फौज में दो तरह के बड़े खर्चे हैं ।पहला सैनिकों पर और दूसरा साजो सामान पर । साजो सामान पर ज्यादा ही खर्च होता है। अब देश में जो सामान पर होने वाला खर्च है वह और सैनिकों पर होने वाला खर्च लगभग बराबर होते जा रहा है और इससे ऐसा लगता है की सैनिकों की कमी हो रही है।  साजो सामान खास करके तकनीक पर खर्च बढ़ता जा रहा है। भारत में लगभग 10 लाख  सैनिक हैं।  सैनिकों तथा साजो सामान में खर्च का अनुपात 40 और 60 का है लेकिन यह धीरे धीरे कम होता जा रहा है ।   अंतरिम बजट में यह राशि लगभग 1 लाख 33हजार 80 करोड़ है जो कुल सुरक्षा बजट के 34% से थोड़ा कम है। हालांकि यह पिछले साल के रक्षा बजट में सैनिकों पर होने होने वाले खर्च से थोड़ा ज्यादा है । उस वर्ष सैनिकों पर 33% खर्चे का प्रावधान था। पिछले साल सैनिक साजो सामान पर जो आवंटित किया गया था वह पूरा नहीं खर्च हो सकता था लेकिन इस बार लगता है कि वह पूरा खर्च किया जा सकेगा। लेकिन इससे क्या होता है ? तीनों सेनाओं के लिए जो अलग-अलग  खर्च आवंटित किए गए हैं वह चिंताजनक हैं। थल सेना को अभी भी आधुनिक हथियार जैसे राइफल इत्यादि और तोपें नहीं मिली हैं। वायु सेना युद्धक विमानों और हेलीकॉप्टरों के लिए तरस रही है। यही हाल नौसेना का भी है। वहां युद्धपोत ,पनडुब्बियों और माइनस्वीपर का भारी अभाव है। भारत में अभी भी उच्चस्तरीय सैनिक साजो सामान नहीं बनते हैं और उसे आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।  आयात का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है।
      सुरक्षा मंत्री ने जब संसद में यह बताया कि भारतीय सुरक्षा पर 3 लाख करोड़ के ऊपर आवंटित किया गया है तो वहां लोगों ने हर्ष ध्वनि   की लेकिन इससे क्या होता है? इसके सही प्रभाव की गणना जरूरी है। रिटायर्ड सैनिकों की पेंशन पर 1,12 हजार 79 करोड़ खर्च होंगे । यह राशि साजो सामान के लिए आवंटित राशि से कहीं ज्यादा है और भविष्य में रिटायर्ड सैनिकों को पेंशन का खर्च बढ़ता जाएगा। यह कहा जा सकता है कि भारतीय सेना का भविष्य पैसों के लिए कारण तनावपूर्ण है और यह निकट भविष्य में खत्म होने वाला नहीं है।