CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Wednesday, April 17, 2019

मॉनसून का शुभ संकेत

मॉनसून का शुभ संकेत 

जो खेती से जुड़े हैं वह समझते हैं मौसम के मिजाज से क्या-क्या गड़बड़ियां हो सकती हैं। अगर अतिवृष्टि हो गई है तो सब कुछ सफेद अगर सूखा पड़ा तो  दाने-दाने को मोहताज हो जाते हैं खेतिहर। इसलिए मौसम का समाचार कृषि व्यवस्था में जुड़े लोगों के लिए एक बड़ा समाचार होता है। हमारे देश के मौसम विभाग ने अनुमान लगाया है कि इस साल मौसम खास करके मानसून सामान्य रह सकता है। वैसे इस पर ज्यादा भरोसा करना है उचित नहीं होगा । क्योंकि कई तरह से मौसमी प्रवाह और प्रभाव इसे बदल सकते हैं। जैसे हाल के अल नीनो प्रभाव ने बहुत कुछ बदल दिया। बहुत उम्मीदें धूल में मिल गयीं। फिर भी सकारात्मक सोचना अच्छी बात है और मौसम विभाग के इस अनुमान से कृषि तथा अर्थव्यवस्था से जुड़े   लोगों को थोड़ी राहत पहुंची है। मौसम विभाग ने बताया है की मानसून के 4 महीने यानी जून से सितंबर तक बारिश अच्छी होगी। तकनीकी तौर पर कहें तो यह बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (एल पी ए ) का 96% रह सकती है। लॉन्ग पीरियड  एवरेज (एल पी ए ) दरअसल विगत 50 साल में देशभर में बारिश का औसत  है। यद्यपि यह मौसम विभाग का पहला अनुमान है और इसमें बदलाव भी हो सकते हैं। मौसम विभाग का मानना है इस साल  सामान्य बारिश की संभावना 39% है जबकि सामान्य से कम बारिश की संभावना 32% है और कहीं कहीं 17% में बारिश की संभावना है यह भी अनुमान लगाया गया है की कई जगहों पर सामान्य से 10% ज्यादा बारिश हो सकती है तथा अतिवृष्टि की सूरत में यह 10% बढ़कर 12 प्रतिशत भी हो सकता है। मौसम विभाग मानसून के संबंध में देश में विगत 50 वर्षों में कितनी बारिश हुई इसी के औसत के आधार पर होने वाली बारिश  का आकलन करता है। अगर यह औषत  96 प्रतिशत से 104% तक हो  सामान्य माना जाता है और 104% से 110  प्रतिशत तक हो तो सामान्य से ज्यादा है।  90 से 96% बारिश को सामान्य से कम और 90 प्रतिशत से कम बारिश हो सूखे की श्रेणी में गिना जाता है। हमारे देश में मानसून के दो चरण होते हैं पहला अरब सागर से नमी को लेकर चलता है और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप से गुजरता है । इससे जून से सितंबर तक बारिश होती है। लेकिन जब यही हवा हिमालय तक पहुंचती है तो वहां से घूम जाती है तथा  बारिश अक्टूबर से दिसंबर के बीच होती है।  यह देश भर से होती हुई  हिंद महासागर में चली जाती है। यह अच्छी बात है कि मानसून सही  समय पर आए और सही बारिश से लाए लेकिन अगर यह विलंब से आती है और कमजोर होती है । वैसी स्थिति में सूखा पड़ जाता है। जब बहुत ज्यादा होती है तो बाढ़ आ जाती है। भारत में कृषि इसीलिए दो तरह की होती है। पहली किस्म जून से सितंबर के बीच होती है जिसे खरीफ कहते हैं और दूसरी किस्म अक्टूबर से दिसंबर के बीच होती है उसे रबी कहते हैं। 
         दरअसल देश की कुल खेती लायक जमीन का लगभग आधा भाग बारिश पर निर्भर रहता है। अगर अच्छी बारिश ना हुई तो खेती उत्पादन में कमी आ जाएगी और इससे पूरी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ेगा क्योंकि देश की लगभग 58% आबादी खेती पर ही निर्भर करती है। सामान्य मॉनसून से खरीफ फसलों की पैदावार अच्छी होगी और गांव के लोगों की आमदनी बढ़ेगी। अगर पैदावार अच्छी हुई तो खाद्यान्न की महंगाई को भी नियंत्रण में रखा जा सकता है और इसका लाभ पूरी अर्थव्यवस्था को मिलेगा। पिछले वर्ष मौसम विभाग ने एलपीए के 97% बारिश की भविष्यवाणी की थी जो बाद में घटकर 95% हो गई। 2018 में वास्तविक तौर पर 91% बारिश हुई जो सामान्य से कम थी यह सिलसिला 5 वर्षों से चल रहा है। 2016 में हालात में बदले थे। उस वर्ष एलपीए के 97% बारिश हुई थी 2014 और 15 तो बेशक सूखे वाले साल रहे। 2018 में हालात थोड़ी सुधरी। देश में खरीफ की फसल की शुरुआत जून से ही होती है और देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में खरीफ की फसल का 50% हिस्सा है। कमजोर मानसून का मतलब क्या होता है? इसका अनुमान आप खुद लगा सकते हैं। आंकड़े बताते हैं 2016 में जब मानसून सामान्य था तो खाद्य उत्पादन में वृद्धि देखी गई थी। लेकिन इसके पहले के 2 वर्षों में उत्पादन में गिरावट भी पाई गई। पिछले वित्त वर्ष में भी खाद्यान्न  के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई। इसका सीधा असर ग्रामीण क्षेत्र की आमदनी पर पड़ता है और इसके फलस्वरूप खपत और आर्थिक विकास कम हो जाता है। कमजोर मानसून से केवल खपत ही प्रभावित नहीं होती बल्कि कई बार तो सरकार को अनाज का आयात करना होता है और किसानों की कर्ज माफी जैसे फैसले लेने पड़ते हैं। जिसका असर प्रत्यक्ष तौर पर वित्त व्यवस्था पर पड़ता है। सकल घरेलू उत्पाद  में कृषि की भागीदारी लगातार कम हो रही है। इस समय वह 17- 18 प्रतिशत के आसपास है । इसलिए  खाद्यान्न की कमी से आंकड़ों पर जो असर पड़ता है वह साफ नहीं दिखता है । इसके बावजूद विगत 5 वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि की दर का असर महसूस होता रहा है।
          विशेषज्ञों का मानना है अगर मानसून सामान्य रहा तो हमारे देश में सकल घरेलू उत्पाद में चौथाई से आधे प्रतिशत तक अतिरिक्त उछाल आ सकती है । 2010 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि हमारे देश का असली वित्त मंत्री मानसून है।  हम इससे सहज ही मॉनसून की विशेषता के बारे में जान सकते हैं।
           हमारे देश में खेती को लेकर कई समस्याएं हैं। देश के अधिकांश भाग में सिंचाई के साधन उपलब्ध हो गए हैं जिससे आपात  स्थिति में उपयोग में लाया जा सकता है । लेकिन इनके साथ समस्याएं भी हैं। पहली मुश्किल तो यह है कि किसानों को इस सिंचाई व्यवस्था के लिए बिजली चाहिए और बिजली का एक विकल्प डीजल है। देश की तेल की कुल मांगो में 40% मांग डीजल की है और किसान इस के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। दूसरी तरफ किसान ही सबसे बड़ा मतदाता वर्ग है। मानसून को लेकर चिंता नई नहीं है। मानसून भारत के जीवन को प्रभावित करता है।  यह केवल मौसमी या कृषि समस्या नहीं बनता है बल्कि एक प्रमुख आर्थिक समस्या भी बन जाता है और तब राजनीतिक डायनामिक्स का स्वरूप बदलने लगता है । यह बदलाव क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर देखा जा सकता है।
       

Tuesday, April 16, 2019

बदजुबानी पर लगाम

बदजुबानी पर लगाम

इन दिनों चुनाव प्रचार में भाषणों का स्तर इतना बिगड़ चुका है के सुप्रीम कोर्ट तक को इस पर संज्ञान लेना पड़ रहा है और चुनाव आयोग को कदम उठाने पड़ रहे हैं।  यह किसी एक पार्टी के लिए नहीं लगभग सभी पार्टियों के साथ है । चुनाव आयोग ने सोमवार को योगी आदित्यनाथ, मायावती, मेनका गांधी और आजम खान पर 48 से 72 घंटे तक चुनाव प्रचार करने से रोक लगा दिया है। उन पर आरोप हैं कि  उन्होंने चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया है। इस पाबंदी पर एतराज जताते हुए मायावती ने कहा कि "यह क्रूर और असंवैधानिक है।  मुझे कहीं भी जाने और बोलने के हमारे बुनियादी अधिकार के उपयोग से रोका जा रहा है।  यह आदेश चुनाव आयोग के इतिहास में एक काले दिवस के रूप में याद किया जाएगा। यह फैसला ऐसा लगता है कि किसी दवाब में लिया गया है इसके पीछे का उद्देश्य स्पष्ट है कि मैं लोगों से अपील न कर सकूं कि भाजपा को गद्दी से हटाओ।"
        समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने ट्वीट किया है यह प्रधानमंत्री के खिलाफ जाएगा। उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय ने चुनाव आयोग से अपील की है कि वह इस आदेश पर पुनर्विचार करे। हमारे लोकतंत्र में फैल रहे एक विशेष रोग का क्या लक्षण है यह। वह रोग है स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के प्रति  राजनीतिक दलों  और उम्मीदवारों  में आनास्था।
चुनाव आयोग का आदेश मंगलवार को एक तरह से चुनाव प्रचार में  बाधा उत्पन्न कर रहा है। इसके पूर्व चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि इस सिलसिले में उसके अधिकार सीमित हैं। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ को यह दलील संतुष्ट नहीं कर पाई।
बात यहीं खत्म हो जाती कोई बात नहीं थी। देशभर में हर जगह कुछ न कुछ इस तरह का कहा जा रहा है । हिमाचल प्रदेश  और केरल के भाजपा अध्यक्षों ने कुछ ऐसा कह दिया है कि वह बात भी चुनाव आयोग तक गई है। हिमाचल प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती में सोलन लोकसभा सीट पर प्रचार करते हुए मंच से कहा की "वह मंच से कह रहे हैं चौकीदार चोर है।  नरेंद्र मोदी को चोर बोल रहे हैं । अरे भैया तेरी मां जमानत पर है, तेरे जीजे की जमानत हुई है। नरेंद्र मोदी की ना जमानत हुई है ना केस बना है और ना किसी ने सजा दी है। तू कौन होता है जज की तरह चोर बोलने वाला।" यही नहीं, चौकीदार चोर है वाले जुमले पर राहुल गांधी को भी सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है। चारों तरफ बदजुबानी का एक माहौल तैयार होता जा रहा है। चुनाव आयोग की परवाह किसी को नहीं है ।1996 के बाद शायद पहली बार चुनाव आयोग इस तरह  निरीह लग रहा है। आज तो यह हालत है कि लोगों के मन में बात बैठ गई है कि चुनाव आयोग आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर या तो अपर्याप्त कार्रवाई करता है अथवा बिल्कुल नहीं करता है। आदर्श आचारसंहिता 10 मार्च को लागू हुई थी और यह 23 मई तक लागू रहेगी। जब से लागू हुई है तब से कुछ न कुछ ऐसा हो रहा है जिसे संहिता का उल्लंघन कहा जा सकता है । उनमें बड़े नेता, यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी, शामिल हैं। नेता भारतीय सेना का   भी चुनाव प्रचार में उपयोग कर रहे हैं । सांप्रदायिक बयान बाजी को तो छोड़ भी दें व्यक्तिगत बयान बाजियां  भी हो रही हैं।
       मॉडल कोड आफ कंडक्ट या कहें आदर्श आचार संहिता भारतीय चुनाव आयोग का अपना अविष्कार है और यह भारत में लोकतंत्र  में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को सुनिश्चित करता है। कुछ निर्देश ऐसे हैं जो कानून नहीं है लेकिन एक प्रभावशाली औजार जरूर हैं। जब चुनाव आयोग चुनाव की तिथियों की घोषणा कर देता है तो उम्मीद की जाती है कि सभी पार्टियां और सभी उम्मीदवार इस प्रक्रिया में शामिल होंगे तथा निष्पक्ष चुनाव को बढ़ावा देंगे । लेकिन आज वक्त बदल गया है। चुनाव आयोग और आचार संहिता दोनों  दोराहे पर खड़ी हैं। इस समय दो स्पष्ट प्रवृत्तियां दिखाई पड़ रही हैं। पहली कि चुनावी गड़बड़ियां एक नया  स्वरूप ले रही हैं। मतदाताओं को रिश्वत दी जा रही है और मीडिया के माध्यम से उन्हें गलत समझाया जा रहा है। इन गड़बड़ियों को रोकना बड़ा मुश्किल है। पहले बूथ दखल की घटनाएं होती थी जिसे देखा जा सकता था।  आज जो हो रहा है उसे जान पाना और रोक पाना दोनों कठिन है। नई चुनौतियों के प्रति चुनाव आयोग क्षमताएं पर्याप्त नहीं दिखाई पड़ रही हैं। चुनाव आयोग ने खर्चों पर पर नजर रखने के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किए। सोशल मीडिया के लिए नई संहिता बनी और अभी हाल में किसी नेता की जीवनी पर फिल्म बनाने पर भी रोक लगा दी गई है । यही नहीं सोमवार को नेताओं की बयानबाजी पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जब चुनाव आयोग  को आंख दिखाई तो उन नेताओं पर चुनाव प्रचार में शामिल नहीं होने की कुछ दिनों के लिए पाबंदी लगा दी गई। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि इन उपायों से कुछ सुधार हुआ है और होगा। दूसरी प्रवृत्ति जो दिखाई पड़ रही है वह है आदर्श आचार संहिता उल्लंघन को रोकने की चुनाव आयोग की क्षमता भी कम हो गई है। बड़े नेता जब कुछ बयान देते हैं तो इस पर चुनाव आयोग की कार्रवाई या तो धीमी हो जाती है अथवा नहीं होती है । इससे नेताओं में आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा है कि चुनाव आयोग कुछ नहीं कर सकता। आदर्श आचार संहिता हमारे देश में बह रही लोकतंत्र की हवा का रुख बताती है। आरंभ में राजनीति के जो बड़े नेता थे उन्होंने स्वेच्छा से चुनाव को निष्पक्ष और स्वतंत्र बनाने का विचार किया था।  उसके पश्चात आदर्श आचार संहिता आरंभ की गई थी। समय के साथ-साथ राजनीतिक वर्ग की प्रतिबद्धताएं कम होती गई और धीरे धीरे निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव से आस्था समाप्त होने लगी। 1990 के आरंभ से ही आदर्श आचार संहिता को  पर  से राजनीतिज्ञों की आस्था खत्म होने लगी। आज हालात बदल गए हैं।  आदर्श आचार संहिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाना पड़ रहा है।
     हम कौन थे क्या हो गए 
और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिलकर
यह समस्याएं सभी

Monday, April 15, 2019

हमारा लोकतंत्र और महिलाओं की हैसियत

हमारा लोकतंत्र और महिलाओं की हैसियत

हमारे देश में महिलाओं को वोट देने का पुरुषों  के बराबर हक है लेकिन नीति निर्माण के क्षेत्र में महिलाओं की हैसियत क्या है? यह एक बड़ा अजीब विरोधाभास है कि घर हो या बाहर ,चाहे वह संसद हो या कार्यक्षेत्र सब जगह हमारे देश में लैंगिक असमानता की जड़ें बहुत गहराई तक फैली हुई हैं। बेशक सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने न केवल अपनी उपस्थिति का एहसास कराया है बल्कि बदलाव में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई है।  चुनाव में लगातार महिलाओं की भागीदारी बढ़ती जा रही है और इस भागीदारी की वजह सरकार में बैठे लोगों द्वारा बनाई गई नीतियों में बदलाव भी आया है ।  महिलाओं ने स्वेच्छा से कदम उठाया है इसे निशब्द क्रांति भी कह सकते हैं। लेकिन इस क्रांति से इस देश में महिलाओं की राजनीतिक हैसियत नहीं बढ़ सकी। आंकड़ों के अनुसार देश के पहले मतदान 1950 के दशक में महिलाओं की मतदान में भागीदारी केवल 38.8 प्रतिशत थी। 60 के दशक में यह 60% हो गई यानी  महिलाओं की भागीदारी में  21 .2% वृद्धि हुई जबकि पुरुषों से भागीदारी केवल 4% बढ़ी। यह भागीदारी लगातार बढ़ती गई। 2004 के आंकड़ों को देखें तो पता चलेगा पुरुषों और महिलाओं की भागीदारी में केवल 8.4 प्रतिशत अंतर रह गया और 2014 में यह अंतर सिर्फ 1.8% रह गया। यानी 2014 के मतदान में महिलाओं और पुरुषों की संख्या लगभग बराबर थी। यही नहीं 2014 में एक नया रिकॉर्ड भी बना कि अरुणाचल, बिहार, मणिपुर ,तमिलनाडु, गोवा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड ,उड़ीसा और पंजाब ऐसे राज्य थे जहां मतदान में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा थी।
         यहां एक शाश्वत प्रश्न आता है कि इन सब के बावजूद हमारे देश में राजनीति में महिलाओं की मौजूदगी कम क्यों है? विशेषज्ञ बताते हैं इसकी एक वजह हमारे देश में खराब लैंगिक का अनुपात है।  2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश में प्रति 1000 पुरुष पर 943 महिलाएं हैं और इस कमी के बावजूद मतदाता के रूप में महिलाओं का पंजीकरण भी कम होता है।  अभी मतदान में महिलाओं की संख्या ना सिर्फ तेजी से बढ़ रही है बल्कि धीरे-धीरे पुरुषों के बराबर होती जा रही है। इस वृद्धि और मतदान में इतना बड़ा हस्तक्षेप करने वाली एक जनसंख्या को राजनीतिक पार्टियां कभी भी वोट बैंक या नीति निर्धारक के रूप में नहीं देखतीं। वोट बैंक नहीं बन पातीं इसलिए उनका कोई समूह अपने हितों को ध्यान में रखकर मतदान नहीं करता।   वे  ज्यादा संगठित नहीं हैं। दूसरी बात महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता थोड़ी कम है और स्वतंत्र सोच का अभाव  है। राजनीतिक पार्टियां इस मनोविज्ञान का फायदा उठाती हैं और उन्हें यह लगता है कि पुरुषों को प्रभावित कर लो तो महिलाओं के वोट खुद ब खुद आ जाएंगे। इसलिए वे अलग से ऐसी कोई तैयारी नहीं करते जिससे यह लगे कि महिलाओं को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। यद्यपि हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं। बिहार में महिलाओं की मांग पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी जैसा कदम उठाया। समाज वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर सही नेता मिले और सही मसले उठाए जाएं तो महिलाएं वोट बैंक के रूप में बदल सकती हैं। परंतु आज एक सशक्त दूरदर्शी नेताओं का भारी अभाव है और ना ही सही मुद्दे हैं। बेशक महिलाओं के लिए आरक्षण के बाद स्थानीय निकायों में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ी है और इसके चलते उनकी राजनीतिक ताकत भी बढ़ी है लेकिन संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या अभी भी कम है । आंकड़ों के अनुसार देश की आबादी में महिलाओं  का अनुपात 48.1% है जबकि वर्तमान लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व केवल 12.1% है। जिस देश में पुरुषों और महिलाओं के बीच आबादी के घनत्व में 2% से भी कम अंतर है वहीं लोकसभा में प्रतिनिधित्व में चौगुना के आसपास अंतर है। वर्तमान लोकसभा चुनाव में भी इससे बेहतर स्थिति नहीं दिखती। इससे स्पष्ट होता है की बड़ी राजनीतिक पार्टियों में भी महिलाओं को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने के लिए बहुत  ज्यादा प्रयास नहीं किया है। दुखद स्थिति तो यह है कि हमारे देश में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री स्तर तक भी महिलाएं पहुंची हैं लेकिन उन्होंने महिलाओं के भीतर नेतृत्व को विकसित करने का कोई प्रयास नहीं किया । ममता बनर्जी ,जयललिता और मायावती निसंदेह प्रधानमंत्री बनकर कर दिल्ली जाने के प्रयास में हैं, लेकिन महिलाओं की नेता के रूप में इनसे क्या उम्मीद है? ममता बनर्जी की कुछ परियोजनाओं को  अगर छोड़ दें को बाकी महिला नेताओं को महिला केंद्रित नीतियां बनाने और महिलाओं को आगे लाने की कोशिश करते नहीं देखा गया। तमाम पार्टियां महिलाओं को लुभाने की कोशिश तो जरूर करती हैं लेकिन वह यथास्थिति बनाए रखते हुए अपना चुनावी लक्ष्य साधने की ओर ज्यादा ध्यान देती हैं। चाहे वह बिहार में ग्रेजुएट हुई लड़कियों को 25हजार रुपए देने या साइकिल देने योजना हो या फिर कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार की शादी भाग्य योजना हो। इससे यथास्थिति में कोई परिवर्तन होते नहीं देखा गया है। केंद्र में सत्तारूढ भाजपा सरकार को भी तीन तलाक के माध्यम से मुस्लिम वोट बैंक के भीतर से महिला वोट बैंक तोड़ने की कोशिश करते  देखा गया है और यही नहीं उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद उनके नेताओं ने यह बारंबार कहा कि मुस्लिम महिलाओं  ने वोट दिया है।  उज्जवला योजना हो या ई हाट हो सब में महिलाओं को सतही मदद करती नजर आती है सरकार। महिलाओं को इस स्तर पर ताकतवर नहीं बनाया जा रहा है कि वह अपने मसलों पर स्वयं निर्णय ले सकें।
          बंगाल में तृणमूल ने 41% महिलाओं को चुनाव में उम्मीदवार बनाया है इससे एक उम्मीद बनती है। ऐसी ही उम्मीद आरक्षण विधेयक से भी की जा सकती है। अगर यह सब होता है तो उनका असर जरूर दिखाई पड़ेगा। इस बार के मतदान में भी 18 साल की लड़कियों की बड़ी संख्या मतदाताओं के रूप में दिखेगी । हो सकता है यह लड़कियां अपने उम्र के लड़कों से ज्यादा शिक्षित हों। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत में 2016 में लड़कों का स्कूल में नामांकन 74.59 प्रतिशत था जबकि लड़कियों में यह अनुपात 75.8% था । अभी हाल में एक सर्वे के मुताबिक 68% लड़कियों ने कहा है कि महिलाओं को राजनीति में पुरुषों की बराबरी की भूमिका निभानी चाहिए।
           यहां एक सवाल है कि लोकतंत्र की प्रक्रिया में महिलाओं की बढ़ती भूमिका को कैसे देखा जाए। क्या इसे आम नागरिकों की भागीदारी के रूप में देखा गया है,यह महिलाओं की भागीदारी मानी जाए । "द सोशियोलॉजिस्ट " पत्रिका में  प्रकाशित शमीक  रवि  के शोध के मुताबिक  "दुनिया भर में महिलाएं  बदलाव को चुनती हैं,  जबकि पुरुष यथा स्थिति को बढ़ावा देते हैं।" भारत में भी महिलाएं बदलाव के एजेंट के रूप में भूमिका निभा रही हैं। वह बिजली ,पानी और सुरक्षा जैसे मसलों पर ज्यादा बात करती हैं और इन्हीं मुद्दों पर वोट भी देती हैं। एक सर्वे के मुताबिक महिलाएं पुरुषों की तुलना में इस बात पर बहुत कम ध्यान देती हैं कि कोई प्रत्याशी किस पार्टी का है । वे प्रत्याशी के पहले रिकॉर्ड को देख कर फैसला करती हैं। इससे साबित होता है कि महिलाओं को निर्णय लेने की भूमिका में शामिल होना जरूरी है।  अगर वह एक मतदाता के रूप में अलग सोचती   हैं तो फैसलों में भी उनकी मानसिकता पुरुषों से अलग होगी हो सकती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, नारी कल्याण और बाल कल्याण जैसे मसलों पर वे ज्यादा उदारवादी ढंग से सोचेंगी। इसलिए नीति निर्माण में महिलाओं की भूमिका को बढ़ाना समाज के विकास के लिए भी जरूरी है।

Sunday, April 14, 2019

रखना इस देश को संभाल के 

रखना इस देश को संभाल के 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गुरुवार को बंगाल में अपनी  चुनाव सभाओं में कहा की वह देशभर में नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस (एनआरसी) लागू करेगी । उन्होंने दार्जिलिंग में भाषण देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एनआरसी के बारे में झूठ फैला रही हैं। उन्होंने कहा कि हमने अपने चुनाव घोषणा पत्र वादा किया है कि अगर नरेंद्र मोदी के सरकार दोबारा बनती है देशभर में एनआरसी लागू किया जाएगा । उन्होंने कहा कि हम देश से हर घुसपैठिए को निकाल बाहर करेंगे , सभी हिंदू तथा बौद्ध शरणार्थियों की पड़ताल की जाएगी और उन्हें भारतीय नागरिकता दी जाएगी तथा देश में उन्हें जगह मिलेगी। असम में लागू नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस का अर्थ है कि इसमें असम राज्य के सभी सही नागरिकों के नाम हैं। जिस दिन से यह रजिस्टर लागू हुआ उस दिन से यह अत्यंत विवादास्पद है। बहुत लोग यह कहते सुना जा रहे हैं कि उनके नाम नागरिकता की सूची से गलत ढंग से हटा दिए गए हैं। जबकि भाजपा प्रतिबद्ध है कि वह घुसपैठियों को निकाल बाहर करेगी । भाजपा के संकल्प पत्र में यह भी कहा गया है कि देश के अन्य भागों में चरणबद्ध तरीके से एनआरसी लाया जाएगा। अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की खिंचाई करते हो कहा कि वे और कांग्रेस आतंकवादियों पर कार्रवाई पर शोकाकुल हैं।  उनकी वोट बैंक पॉलिसी यह नहीं चाहती और उनके वोट बैंक पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के विरोधी हैं। अमित शाह ने ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की नीति पर सवाल उठाया और कहा यह लोग बालाकोट पर हमले का सबूत मांगते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि क्या वे नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला बातों से इत्तेफाक रखती हैं? उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर के लिए अलग प्रधानमंत्री की मांग की थी। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस आज तुर्किस्तान ,माफिया और चिटफंड का पक्ष ले रही हैं। "आपको (ममता को) पाकिस्तान के साथ इलु इलु करना है तो कीजिए लेकिन अगर पाकिस्तान गोली मारेगा तो हम भी मारेंगे।"
       अमित शाह ने कहा कि भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा पत्र वादा किया है कि गोरखा समुदाय को जनजाति का दर्जा दिया जाएगा। गोरखा समुदाय की वीरता और दार्जिलिंग उसकी संस्कृति तथा यहां का प्राकृतिक सौंदर्य दुनिया भर के पर्यटकों के लिए आकर्षण का कारण है । उन्होंने कहा कि अपने  घोषणापत्र में भाजपा ने वादा किया है कि वह दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र, सिलीगुड़ी ,तराई तथा डुआर्स क्षेत्र का स्थाई राजनीतिक समाधान तलाशने के लिए प्रतिबद्ध है। शाह ने यह भी कहा की अगर भाजपा सरकार केंद्र में आई वह धारा 370 समाप्त कर देगी। धारा 370 जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करती है। दार्जिलिंग लोकसभा चुनाव क्षेत्र में 18 अप्रैल को मतदान है और यहां से भाजपा के राज सिंह बिष्ट जोर आजमा रहे हैं।
         दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दार्जिलिंग में अपने भाषण के दौरान भूमि पुत्र का पत्ता फेंका । उन्होंने कहा कि उनकी तरफ से यहां के भूमिपुत्र को चुनाव का टिकट दिया गया है। उन्होंने दिल्ली या मणिपुर से किसी को यहां नहीं पहुंचाया है। उन्होंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि क्या कभी भाजपा अध्यक्ष ने यहां तक की सड़क मार्ग से यात्रा की है ? क्या वे यहां की जगहों को जानते हैं ?वे हेलीकॉप्टर से आते हैं तथा भाषण देकर उड़ जाते हैं। भाजपा ने विगत 5 वर्षों में यहां के लिए क्या किया? अमित शाह एनआरसी के नाम पर सबको यहां से भगाना चाहते हैं । वह कौन होते हैं यह तय करने वाले कि कौन रहेगा या कौन जाएगा? असम में एनआरसी की सूची  से 40 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए। उन्होंने गोरखा, बंगाली हिंदुओं, मुस्लिम, बिहारियों इत्यादि के नाम हटाए हैं । उनका उम्मीदवार मणिपुरी है और दिल्ली से आया है। ममत जी  ने कहा कि  यदि आप 5 वर्षों के लिए विदेशी हो जाते हैं तो सोच सकते हैं कि आपका भविष्य क्या होगा? यह जरूरी नहीं है कि आपको दोबारा नागरिकता प्राप्त हो जाए। ममता बनर्जी ने कहा कि वह भाजपा को पश्चिम बंगाल में एनआरसी नहीं लागू करने देंगी।
        इस दावे -प्रति दावे, आरोप-प्रत्यारोप के बीच जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य गुम हो गया है वह है कि देश में या कहें हमारे राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता और सौहार्द का क्या होगा? राजनीति तथा सत्ता की शतरंज अपनी जगह पर है आम आदमी का जीवन अपनी जगह पर । सत्ता के खेल में यही जीवन सबसे ज्यादा प्रभावित होता है । अगर सचमुच देश भर में एनआरसी लागू हो गया तो  सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाले दिन कैसे होंगे। इस देश को बचाना देश के निवासियों का कर्तव्य है। क्या विडंबना है कि यह सारी बातें तब सामने आ रहे हैं जब संजोग वश जलियांवाला बाग के 100 साल पूरे हुए हैं। जिस देश को स्वाधीनता दिलाने वाले आम लोगों ने गोलियों की परवाह न कर इंकलाब नारा बुलंद किया उस देश में यह क्या सब हो रहा है । राजनीति इस नए खेल से हमें सतर्क रहना होगा।

Friday, April 12, 2019

सन्मार्ग : चैत्रे नावमिके तिथौ

सन्मार्ग : चैत्रे नावमिके तिथौ

आज रामनवमी है भगवान श्री राम के जन्म का दिन और सन्मार्ग की स्थापना का शुभ दिन। बड़ा अजीब अवसर है आज का । अब से 9 दिन पहले यानी चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को नए संवत्सर की शुरुआत हुई थी। इसी दिन शकों को  पराजित कर विक्रम संवत की शुरुआत की गई । महाराजा विक्रमादित्य  सिंहासन आरोहण किया  और उन्होंने बौद्धिक विजय  की घोषणा करते हुए प्रकृति का सूक्ष्मतम अवलोकन किया।  सूरज ,चांद एवं पूरे सौरमंडल की व्यवस्था के रहस्य को समझा।  मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की कई पीढ़ियों ने इसे महसूस किया और प्रकृति का रहस्य-परिवर्तन विक्रमसम्वत में ही झलकने लगे! अब देखिए प्रकृति के इस उत्सव को बसन्त के नाम से ही जाना जाता है। इसी नव संवत्सर के नौवें दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जन्म हुआ।  आदिकवि महर्षि वाल्मीकि भाव विभोर होकर गा उठे
ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतुनां षट् समत्ययु:।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ।।
राम दिव्य शिशु के रूप में जन्मे।  उस तेजस्वी शिशु का तेज आज भी दीपित है। इसी आस्था की रौशनी में  वसुधा का समग्र असह्य विलीन हो जाता है । इसी रहस्य को महाकवि कालिदास ने भी अकेलेपन के अनुभवों में पाया होगा। अभी रामजन्म के दृश्य को महसूस करिए महाकवि कालिदास के साथ-
अथाग्रमहिषी राज्ञ: प्रसूति समये सती।
 पुत्रं तपोपहं लेभे नक्तं ज्योतिरिवौषधि:।।
इसी तेज के एहसास ने मनीषियों को आज से 74 वर्ष पहले सन्मार्ग की स्थापना करने को प्रेरित किया ।
वाराणसी से कोलकाता तक गंगा की यात्रा, राम धुन और उसके समानांतर सन्मार्ग। इसका  खुद में बहुत पौराणिक अर्थ और बिंब है। कोलकाता से आगे जाकर सगर पुत्रों का उद्धार करती हुई गंगा सागर में समा जाती है। कह सकते हैं कि भगवान शिव की जटा से मुक्त होकर पावन सलिला गंगा कोलकाता से आगे बढ़ते ही अपना उद्देश्य पूरा कर लेती है । उसी तरह शिव की नगरी वाराणसी से कोलकाता आए सन्मार्ग का अपना एक उद्देश्य है । यहां सवाल है कि रामनवमी के दिन ही क्यों? रामनवमी में राम का नाम जुड़ा है। "राम" रसायन है। एक बार विख्यात मानस मर्मज्ञ डॉक्टर कामिल बुल्के ने बताया था कि राम का "र" अग्नि वाचक है "अ" बीज मंत्र है और "म" ज्ञान है। यह मंत्र पाप को जलाता है और पुण्य को सुरक्षित रखता है । ज्ञान प्रदान करता है। वह ज्ञान जो आज के समाचारों के घटाटोप को भेदकर कर सच की ज्योति दिखाता है। सच को सुरक्षित रखने का हुनर बताता है और तब सत्य की ओर कदम बढ़ाने के लिए शिक्षित करता है।
यहां जरूरी है कि इस दिन हम थोड़ा ठहर कर अतीत का विहंगावलोकन करें और और इस तथ्य की पड़ताल करने की कोशिश करें कि जिन लक्ष्यों को लेकर सन्मार्ग की स्थापना हुई थी उसे किस हद तक हासिल किया जा सका है। उस समय किए गए हमारे फैसले कितने पूरे हो सके हैं । आज के बदलते वक्त में जब झूठ और उत्तेजना का साम्राज्य चारों तरफ है तो हमें इस बात की चिंता है कि क्या आरंभिक काल में हमारे मनीषियों ने जो फैसले किये थे वह सही और तर्कसंगत थे क्या? क्या हम आज की रोशनी में उन फैसलों को बदलकर एक नई दिशा तय कर सकते हैं । यहां यह जरूरी नहीं है कि हम अपने कर्म में कितने कामयाब हो सके बल्कि यह नितांत आवश्यक है जानना कि वे कर्म कितने सच और शुचिता पूर्ण हैं। सन्मार्ग की स्थापना उस काल में हुई जब हमारा समाज आंदोलन के उत्कर्ष पर था और उसका लक्ष्य थी स्वाधीनता। सन्मार्ग की स्थापना जिन मनीषियों ने की उन्होंने लक्ष्य भी तय किया कि वे चिंतन, कर्म और व्यवस्था को उन्हीं मर्यादाओं से जोड़ेंगे जो 200 वर्षों की अंग्रेजी शासन व्यवस्था में दूषित हो चुकी थी। हमारे स्वतंत्र कर्म और चिंतन को जिन वर्जनाओं ने  200 वर्षों तक रोके रखा उन्हें भंग कर एक सांस्कृतिक वातावरण को तैयार करना ।
चिंतन कर्म और व्यवस्था मानव जीवन के 3 पहलू हैं जिन्हें शुचिता की सीमा में आबद्ध करना  जरूरी है । यह भौतिकता का मूलभूत तत्व है। यही 'सत" है । यही "सत" सच्चिदानंद का सृजन करता है।
सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ ध्वजा पताका ।।
बल बिबेक दम परहित घोरे । क्षमा कृपा समता रजु जोरे ।। 
ईसभजनु सारथी सुजाना । बिरति धर्म संतोष कृपाना ।।
दान परसु बुधि शक्ति प्रचंडा । बर बिज्ञान कठिन कोदंडा ।।
अगम अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ।।
' कवच अभेद्य बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ।' 
लेकिन स्वतंत्रता के बाद हमारी  लोकतांत्रिक संस्थाओं , व्यवस्था  और शिक्षण प्रणाली ने हमारी अध्यात्मिक आस्था और व्यवहारिक कार्यप्रणाली को प्रदूषित कर दिया। यह स्वयं में एक भयदायक दुर्घटना ही नहीं थी बल्कि हमारे सामने एक भारी चुनौती भी थी। वह चुनौती  जो एक सवाल से शुरू होती है कि क्या एक भारतीय होने के नाते हमें अपने देश से कोई लगाव रह गया है। बार - बार सोचते हैं तो  उत्तर एक ही मिलता है -नहीं । क्योंकि हम अब तक  पश्चिम की बौद्धिक गुलामी से मुक्त होने का साहस नहीं कर पाए और ना ही सोचने समझने के चिंतन के अपने औजार विकसित कर पाये। हमारे भीतर एक भारी अभाव पैदा हो गया है और उसे छुपाने के लिए हम आडंबर का रास्ता अपनाते हैं । आज हमारा देश दो तटों के बीच में झूल रहा है। एक तरफ प्रकृति का विनाश और दूसरे छोर पर हमारी स्मृतियां हैं और इन्हें बचाना हमारी चुनौती है। सन्मार्ग की स्थापना करने वाले हमारे मनीषियों ने यही लक्ष्य निश्चित किया। सनमार्ग आज भी उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कटिबद्ध है । तो सवाल उठता है कि हमने उस लक्ष्य को कहां तक प्राप्त किया है। यहां यह बता देना जरूरी है इस किस्म की प्रतिज्ञा या इस प्रकार के लक्ष्य सभ्यता के  भाव बोध के भीतर ही पूरे किए जा सकते हैं । भारत की भौगोलिक एकता का एक ही सूत्र है , वह है संस्कृतियों और धर्म संप्रदाय को प्रेरित करने वाले देश के सभ्यता बोध को बचाने के लिए देशवासियों में एक जज्बा कायम कर दें। यही आज हमारा लक्ष्य है।
हम यह गर्व के साथ कह सकते हैं कि हम अपने लाखों पाठकों के भीतर सभ्यता बोध की इस ज्योति को जलाने में बहुत हद तक कामयाब हो गए हैं। जब सन्मार्ग ने पहला सूर्योदय देखा था तो हालात ऐसे नहीं थे। लेकिन हमारे मनीषियों को  भरोसा था  नमोस्तु रामाय..... जैसे मंत्र पर। क्योंकि मंत्र किसी को पुकारने के लिए नहीं अकेले  संधान के लिए निकल पड़ने की प्रेरणा देता है। यहां गौर करने की बात है कि लक्ष्य हमारा साधन है साध्य नहीं। साधन अगर शुचितापूर्ण हो और वह उपलब्ध हो जाए तो साध्य खुद सध जाते हैं। आज हवा में एक अजीब सी चेतावनी और आने वाली आंधी की भनक सुनाई दे रही है। यही हालात उस समय भी थे। आज झूठ को विश्वसनीय   बनाने के लिए उसमें सत्य का कुछ अंश मिलाया जा रहा है और हमारी परंपरागत धार्मिक भावनाओं का शोषण किया जा रहा है। देश के आम आदमी को धर्म से उन्मूलित  कर सांप्रदायिक बनाया जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में सच क्या है यह बताने के लिए सन्मार्ग की स्थापना हुई थी। वह आज भी उसी उद्देश्य पर कायम है आप पूछ सकते हैं की आज जबकि सूचना क्रांति के संजाल में सूचना का हर कतरा तैरता हुआ ऊपर आ जाता है ऐसे में सन्मार्ग का क्या उद्देश्य रह गया। लेकिन जिसे हम आज सूचना का संजाल समझ रहे हैं वह दरअसल सूचना के आधुनिक स्वरूप का मायावी धुंध है। सन्मार्ग की स्थापना हुई थी तो हम हमारा समाज आशंका के घने कोहरे में खड़ा था आज समाज सूचना के गहरे धुंध में खड़ा है। सच उस दिन भी ओट में था आज भी नजरों से ओझल है। इसलिए हमारा मानना है कि खबरें अनेक सच्चाई एक
      74 वर्ष पहले जो दीपशिखा प्रज्वलित हुई थी आज भी प्रकाशित है । क्योंकि हमारे सुधि पाठक, विज्ञापनदाता और हितैषी अनवरत अपना स्नेह प्रदान कर रहे हैं । हम इस दीपक को प्रकाशमान रखने के लिए उनके अत्यंत आभारी हैं।
   सखा धर्म मय अस रथ जाके। 
जीतन कहँ ना कतहुं रिपु ताके।।

Thursday, April 11, 2019

राफेल का मामला फिर गरमाया

राफेल का मामला फिर गरमाया

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने एकमत से स्वीकार किया राफेल मामले पर दिसंबर 2018 में दिए गए फैसले पर फिर से विचार करेगा। अदालत में मामले पर दायर पुनर्विचार याचिका पर योग्यता के अनुसार सुनवाई की जाएगी और उसने व्यवस्था दी कि अदालत में गवाह द्वारा  सबूत के रूप में प्रस्तुत संवेदनशील दस्तावेज को माना जाएगा तथा अदालत में इसके उपयोग पर केंद्र द्वारा की गई आपत्ति को खारिज कर दिया। सुनवाई की तारीख आगे तय की जाएगी।
          प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति एस के कौल की एक पीठ ने कहा कि आरंभिक आपत्तियों को खारिज करना हम उचित समझते हैं।  उन्होंने स्वीकार किया कि जिन तीन दस्तावेजों को केंद्र ने स्वीकार करने योग्य नहीं बताया था वह प्रासंगिक हैं और उन्हें सबूत के रूप में स्वीकार कर उनके आधार पर सुनवाई की जा सकती है। न्यायमूर्ति केएम जोसेफ ने एक अलग किंतु मिलता जुलता बयान जारी किया। सुप्रीम कोर्ट में  इस संबंध में  दिसंबर 2018 में फैसला दिया था   और पुनर्विचार के लिए दायर याचिका पर  14 मार्च को फैसला टाल दिया था। अदालत ने कहा था कि राफेल जेट खरीदने के फ्रांस से समझौते पर जांच की जरूरत नहीं है। अदालत ने 26 फरवरी को इस पर खुली अदालत में पुनर्विचार पर सुनवाई स्वीकार कर ली थी। राफेल मामले में अदालत को यह तय करना था कि इससे संबंधित जो रक्षा दस्तावेज लीक हुए हैं उसके आधार पर सुनवाई की जा सकती है या नहीं। वहीं अदालत में 14 दिसंबर के फैसले के विवादास्पद अनुच्छेद 25 में दो लाइनों को सुधारने वाली केंद्र सरकार की याचिका के साथ साथ परिवाद याचिका की थी समीक्षा  की गई । उल्लेखनीय है की पिछले साल इस मामले पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रक्रिया में विशेष कमी नहीं रही है और इस पर सवाल उठाना सही नहीं है। अदालत ने यह भी कहा था कि विमान की  क्षमता में कोई कमी नहीं है।
एक अर्जी पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा के साथ साथ वकील प्रशांत भूषण की भी थी । इन्होंने मांग की थी कि अधिकारियों पर अदालत को गुमराह करने के दोष की सुनवाई हो।
         अदालत के फैसले से चुनाव के दौरान सरगर्मियां बढ़ गई हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को अमेठी से नामांकन पत्र भरने के बाद कोर्ट के ताजा फैसले के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कई सवाल दागे। उन्होंने केंद्र सरकार की शुरुआती आपत्तियों को ख़ारिज करके पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के अदालत को सामने रखकर मोदी को घेरा। राहुल ने कहा मोदी ने सुप्रीम कोर्ट से क्लीन चिट ली थी अब नए फैसले से साबित हो गया कि कुछ न कुछ घोटाला हुआ है। राहुल ने कहा, इसमें दो लोग अनिल अंबानी और नरेंद्र मोदी शामिल हैं। राफेल सौदे में खुल्ला चोरी हुई है। साथ ही  कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि राफेल सौदे में कई स्तर पर झूठ बोले गए हैं।
         दूसरी तरफ रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि कुछ पढ़े बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाना सही नहीं है।
          जहां तक तार्किकता है लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को सरकारी गोपनीयता कानून का सहारा लेने का सुझाव ही गलत था। चूंकि पूरा मामला खरीद और सौदे का है ना कि भारतीय सेना का है और सौदा आर्थिक मामला है।  पैसा जनता पर लगाए गए टैक्स से आता है। यदि यही दस्तावेज सेना की तैनाती का होता या उसकी व्यवस्था का होता और वह दस्तावेज लीक हो जाते हो तो मामला गोपनीयता कानून का बनता ही था। विमानों की खरीद में गोपनीयता का कानून का सहारा लेना गलत था। सरकार ने समझा कि वह इसकी आड़ में निकल जाएगी।  मामला उल्टा पड़ गया। सरकार को आरंभ से ही पाक -साफ ढंग से बात करनी चाहिए थी। मामले को उलझाने से बात का बतंगड़ बन गया। सरकार अगर इस मामले में पारदर्शिता बरतती तो विमानों की खरीद में शीघ्रता आ जाती। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार सबको है और सरकार अगर इसमें उत्तरों को नहीं छुपाती तो मामला इतना बिगड़ता नहीं।
       बोलना चाहे जो हो लेकिन अदालत के इस फैसले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार को झटका तो जरूर लगा है। यह कहा जा सकता है कि सरकार ने बड़ी सावधानी से भारत और भारत सरकार के बीच की दूरी को खत्म करने की कोशिश की है। आज सरकार के खिलाफ किसी भी बात को राष्ट्र विरोधी करार दे दिया जाता है या गोपनीयता कानून का उल्लंघन बताया जाता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐसे समय में  सरकार के लिए घातक कहा जा सकता है। सरकार ने इस तरह से राफेल मामले को पेश किया  है कि उसमें अपारदर्शिता है। सरकार को इस तरह से कदम बढ़ाना चाहिए था जिससे वह तर्कसंगत लगे। चुनाव की वजह या फिर जनादेश से सरकार को अप्रासंगिक ढंग से काम करने की अनुमति नहीं मिल जाती। बोफोर्स तोप सौदे से सरकार को सबक लेनी चाहिए थी। बेशक कई बार ऐसा होता है की वित्तीय विवरण देना राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में नहीं होता है लेकिन जब बड़े सौदे किए जाए तो उसमें पारदर्शिता जरूरी होती है।

Wednesday, April 10, 2019

खतरा बना सोशल मीडिया

खतरा बना सोशल मीडिया

20 साल पहले का वह दिन याद करें जब कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने  या शहर छोड़ने के बाद  हम अपने दोस्तों से अलग होते थे। नौजवान गले मिलते थे और कहते थे,
अब के बिछड़े तो ख्वाबों में मिलेंगे
जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिलेंगे
ऐसा लगता था कि अब शायद नहीं मिल पाएंगे तब ना मोबाइल फोन थे और ना ही सोशल मीडिया।  अब दुनिया बदल गई। सोशल मीडिया ने देश के कोने-कोने  में अपनी जगह बना ली है और बिछड़े हुए लोग आपस में दोस्त बनने लगे हैं। यह बड़ा अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कोई क्रांति आ गई है कोई चमत्कार हो गया है। शुरू- शुरू में सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले लोग स्कूल कॉलेज जाने वाले किशोर और नौजवान तथा आईटी कंपनियों में काम करने वाले युवक  थे और यह ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवार के लोग थे या फिर थोड़े से उच्च वर्गीय परिवार के भी। लेकिन अचानक हालात  बदल गए। भारत मोबाइल फोन का एक बहुत व्यापक बाजार बन गया और इंटरनेट उपभोक्ता वर्ग विस्तृत हो गया।  जैसे इसका विस्तार हुआ  इस की बुराइयां  सामने आने लगी । जहां सोशल मीडिया एक दूसरे को जोड़ता था अब उन्हें दूर करने लगा। एक ही परिवार के सभी सदस्य अलग-अलग बैठे अपने-अपने  फोन में व्यस्त रहते हैं । एक दूसरे से बेखबर। सोशल मीडिया ने हमें भावनात्मक स्तर से काट दिया है। विचारधारा के स्तर से भी परिवार बंट गए हैं। दोस्तों और समुदायों के बीच  गहरी खाई पैदा हो गई है। वाल स्ट्रीट की क्रांति और ट्यूनीशिया की अरब क्रांति ने बताया कि सोशल मीडिया की राजनीतिक ताकत  क्या है। सोशल मीडिया के जरिए अरब में या कहें मध्य-पूर्व में लोकतंत्र का पथ प्रशस्त हुआ। शुरू में तो ऐसा लगा की किसी आंदोलन को कम कीमत पर तेजी से ज्यादा भागीदारों और कार्यकर्ताओं तक पहुंचा जा सकता है जो आंदोलन को बल दे सकता है। बहस और तर्क के लिए नए-नए प्लेटफार्म उपलब्ध करा सकता है। लोगों को सच्चाई से अवगत करा सकता है और गलत के खिलाफ खड़े होने के लिए लोगों को एकजुट कर सकता है। 2014 में भारत में आम चुनाव हुए और और हमने सोशल मीडिया ताकत को देखा।  अचानक 2016 में अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में रूस की भूमिका पर से जब पर्दा उठा तो लगा यह सोशल मीडिया लोकतंत्र के लिए एक खतरा बन गया है।
           रूसी एजेंसियों ने अमरीकी नागरिकों के फेक अकाउंट बनाए और कुछ ऐसी खबरों को फैलाना शुरू किया जो लगते थे कि सच हैं लेकिन  खबरें दरअसल गलत थीं। आइरिश शोधकर्ता जॉन नॉटन के अनुसार 2016 के बाद सोशल मीडिया चुनाव को प्रभावित करने वाला औजार ही नहीं रहा बल्कि वह एक ऐसी  जमीन में बदल गया जिस पर हमारी पूरी चुनावी संस्कृति खड़ी है। जिसकी गलियां हमारे रोजाना के विमर्श तय करती हैं और ऐसे भी विमर्श जिन के दुरुपयोग की सीमा नहीं रहती है । हालात इतने खराब हो गए हैं कि हमें कभी भी किसी भी वैचारिक हमले का शिकार होना पड़ेगा और हम अपने आदर्श और अपने विचारों को बदलने के लिए बाध्य हो जाएंगे। सोशल मीडिया आने वाले दिनों में हमारे मन पर हमारी किशोर पीढ़ी दिलोदिमाग पर ऐसे भ्रमित और दूषित विचार छोड़ जाएगा कि वह तय नहीं कर पाएगी कि सही क्या है और गलत क्या है । सच क्या है और सच के आसपास क्या है। 
       इन दिनों हमारा भारत दो हिस्सों में बंट गया प्रतीत हो रहा है । एक हिस्सा नरेंद्र मोदी के समर्थकों का है दूसरा विरोधियों का।  यह विभाजन इतना बढ़ गया है कि लोगों के बीच तनाव के बाद अब नफरत फैलने लगी है। दोस्ती  टूटने लगी है। लोग विचारों को लेकर अतिवाद के दायरे में प्रवेश करने लगे हैं।
        प्यू रिसर्च संस्था की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले कुछ वर्षों से पूरे देश में तेजी से ध्रुवीकरण हुआ है। सोशल मीडिया के विशेषज्ञ रॉबर्ट कोजिनेट्स मुताबिक सोशल मीडिया लोगों के जुनून को भड़काता है और उन्हें अतिवादी बनाता है। हमारे देश में सोशल मीडिया का प्रयोग जितनी तेजी से बढ़ रहा है लोगों में वैचारिक अतिवाद भी बढ़ता जा रहा है । विमर्श की भाषा बदलती जा रही है।साथ ही देश में लोकवादी ताकतों का उभार बढ़ रहा है।  यह  हमारे देश में नहीं यह पूरी दुनिया में हो रहा है। एक ऐसी राजनीति की शुरुआत हो रही है जो भय और तनाव पर फल-फूल रही है। इसके लिए जनता को दो भागों में बांटना जरूरी होता है। सोशल मीडिया पर किसी भी खबर को बिना उसकी विश्वसनीयता तय किए फैलाया जा सकता है। यह स्पष्ट देखने को मिल रहा है कि इस प्लेटफार्म पर अक्सर तर्क और तथ्यों की बात नहीं होती बल्कि भावनात्मकता के जरिए लोगों को भड़काया जाता है, उन्हें गुमराह किया जाता है।
       अंततोगत्वा यह हमें तय करना होगा कि हमें किस राजनीतिक पार्टी के साथ चलना है और अपने से अलग विचारधारा वाले दोस्तों को साथ रहना है या उनसे रिश्ते तोड़ देने हैं। क्या हमें सवाल पूछने की भारतीय लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखना है या उन्हें नष्ट कर देना है।