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Thursday, May 9, 2019

चुनावी वायदे और नई सरकार

चुनावी वायदे और नई सरकार

चुनाव अब खत्म होने वाले हैं। अब चर्चा नई सरकार की हो रही है। इस चर्चा के दौरान एक तथ्य विचारणीय है की नई सरकार को क्या करना होगा? अपने देश के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण है कि उसे चुनावी वायदों को फिलहाल दरकिनार कर अर्थव्यवस्था के मामले पर ठंडे दिमाग से और सही ढंग से काम करना होगा। पिछले दिनों राजस्व के आंकड़े प्रकाशित हुए थे। उन आंकड़ों को देखकर दिल दहल जाता है। 3 महीने पहले संसद में पेश किए गए 2018 -19 के इन आंकड़ों में 1.6 खरब की कमी दिखती है। यह सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 0.8 प्रतिशत के बराबर है। इस कमी को आखरी समय में व्यय  नियंत्रण कर या उस में कटौती कर रोका जा सकता था । जो बताया गया था उसके अनुरूप वर्ष के अंत में यह व्यय लगभग 60 हजार करोड़ था। अगर इसे सही मान लिया जाए तो साल के लिए वित्तीय घाटा 3.4% से बढ़कर 3.9% हो जाता । जो विगत 2 वर्षों के स्तर में अब तक गिरावट दर्शाता है। यही नहीं एक आतंकित करने वाली समस्या यह भी है कि केंद्र सरकार की राजस्व वृद्धि 6.2% पर पहुंची है जबकि अनुमान था की यह 19.5 प्रतिशत होगी। इसमें ज्यादा चिंताजनक तो यह है राज्यों के हिस्से को मिलाकर कुल संग्रह में 8.4 प्रतिशत इजाफा हुआ है जोकि मुद्रास्फीति सहित वर्तमान कीमतों के आधार पर जीडीपी में 11.5 प्रतिशत से नीचे है। कहा जा सकता है की टैक्स और जीडीपी अनुपात में वृद्धि की प्रवृत्ति उल्टी हो गई है। विशेषज्ञ बताते हैं कि राजनीतिक कारणों से जीएसटी दरों में लगातार कमी के कारण यह गिरावट हुई है। जबकि सरकार ने  वास्तविक आर्थिक वृद्धि  7% होने का दावा किया था।  उम्मीद है यह भी वास्तविक आर्थिक वृद्धि से कम है।
           आंकड़े जो बता रहे हैं  उन्हें देखते हुए कुल मिलाकर जो संभावनाएं हैं वह आशा जनक नहीं हैं। बजट के मुताबिक 2019 - 20 में अनुमानित राजस्व वृद्धि 2018- 19 के लिए इस अनुमानित आंकड़े का 14.9% रह सकती है । यानी वास्तविक राजस्व आधार जो स्पष्ट हो रहा है उसके अनुसार यदि बजट अनुमानों को हासिल करना है तो टैक्स वसूली में 29.1% की वृद्धि जरूरी है लेकिन यह असंभव है। इसलिए चुनाव के बाद बनने वाली नई सरकार को दोबारा बजट बनाना पड़ सकता है। आमदनी और खर्चे के आंकड़ों में कटौती करनी पड़ेगी। इसके बाद ही बजट उपभोग में गिरावट के कारण आर्थिक मंदी को दर्शा पाएगा। सरकार के अधिकांश खर्च ब्याज भुगतान, सब्सिडी, वेतन और पेंशन मदों में होते हैं। बीते वर्ष की भांति नए वर्ष में भी कटौती  बुनियादी ढांचे पर निवेश में की जाएगी। अब तक ढांचे पर निवेश वृधि को गति देने वाला प्रमुख कारण रहा है।
             वृद्धि की संभावना में कुछ मामलों में सुधार जरूर हुआ है। जैसे, विश्व की आर्थिक स्थिति सुधरी है। अमरीका और चीन के बीच व्यापार युद्ध से आसार घट गए हैं। तेल की कीमतें बढ़ी हैं लेकिन ईरान से मिलने वाले तेल पर रोक को प्रभावहीन करने के उद्देश्य से कुछ तेल निर्यातक अपना उत्पादन बढ़ा सकते हैं। दूसरी तरफ, मौसम विभाग के अनुसार मानसून कमजोर हो सकता है। विमानन और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्र घाटे में जा रहे हैं। साथ ही टेलीकॉम सेक्टर में कीमतें गिर रही है वित और कारपोरेट सेक्टर "बैड लोंस" के गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं और संकट के दौर से गुजर रहे हैं। हालांकि क्रेडिट ने गति पकड़ी है लेकिन अभी यह पर्याप्त नहीं है। इसमें और सफाई जरूरी है। इसलिए व्यवस्था गत  झटकों की उम्मीद से इंकार नहीं किया जा सकता। मुद्रा नीति ने वृद्धि को सहारा देने की कोशिश की लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक ने दरों में जो कटौती कर दी है उसका कोई असर लिक्विडिटी संकट से त्रस्त बाजार पर नहीं दिखाई पड़ता। इसके कई कारण हैं  जिनमें सरकारी कर्ज भी एक है। उधर, वार्षिक ब्याज दर में गिरावट नहीं आई है।
मिसाल के तौर पर ले सकते हैं कि कांग्रेस ने जो वादे किए उनके बारे में खास तौर पर दो बातें कहीं जा सकती हैं। पहली यह कि सरकारी खर्च बढ़ेंगे लेकिन आमदनी कहां से होगी यह नहीं बताया गया है। जो वादे किए गए हैं उनका वास्तविकता के आधार पर विश्लेषण किया जाना जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकारों का कुल कर राजस्व 17% है और सकल घरेलू उत्पाद में पहले से ही घाटा 6% से ज्यादा है अब यदि ऐसी स्थिति में चार लाख सरकारी पद जो खाली पड़े हैं उन पर नियुक्ति की जाएगी और भी कई नियुक्तियां की जाएंगी तो इन्हें वेतन कहां से दिया जाएगा। अतः  इन वादों पर जरा सोच समझ के भरोसा किया जाना जरूरी है।
लेकिन  कांग्रेस ही कयों  दूसरी प्रमुख  पार्टी भाजपा भी खाद्य सब्सिडी देने जैसे कई वायदे किए हैं इन वायदों को यदि पूरा किया जाए तो यकीनन वे सरकारी खजाने पर बोझ बन सकते हैं। अब ऊपर बताए गए आर्थिक हालात के संदर्भ में इन वायदों कि अगर व्याख्या करेंगे तो लगेगा इनमें से किसी को पूरा करने की माली स्थिति नहीं है। अब यहां एक स्पष्ट खतरा यह दिख रहा है । अपने वायदों को पूरा करने के चक्कर में सरकार कहीं उल्टा रास्ता ना पकड़ ले और आगे चलकर आर्थिक फंदे में फंस जाए। इसलिए नई सरकार को चुनावी वायदे को पूरा करने के चक्कर में नहीं पड़ कर वास्तविक आर्थिक स्थिति में सुधार के प्रयास करने होंगे जोकि उसके लिए एक कठिन कार्य होगा।

Wednesday, May 8, 2019

100 में 100 ! हे प्रभु !! 

100 में 100 ! हे प्रभु !! 

मंगलवार को  आईसीएसई  की 10 वीं कक्षा और आईएससी  की 12 वीं कक्षा  के नतीजे कौंसिल ऑफ इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन  द्वारा प्रकाशित  किए गए। नतीजों को देख कर अच्छे अच्छों को पसीना आ गया। भारत के इतिहास पहली बार आई एस सी परीक्षा में  बच्चों को शत प्रतिशत अंक प्राप्त हुए। लड़कियों ने इसमें बाजी मारी है। लड़कियों को दसवीं कक्षा की परीक्षा में 99. 05 प्रतिशत और लड़कों को 98.12 प्रतिशत नंबर प्राप्त हुए। 12वीं कक्षा में 97.84 प्रतिशत लड़कियां सफल हुईं जबकि 95.40 लड़के सफल हुए। आईसीएसई परीक्षा की दसवीं कक्षा में  दो बच्चों को 99.60% नंबर आए जबकि दूसरे स्थान पर 10 बच्चे आए जिनके अंक थे 99.40 प्रतिशत थे तथा तीसरे स्थान पर 24 बच्चे आए जिनके अंक थे 99.20% थे। आईएससी बोर्ड की 12वीं कक्षा में दो बच्चों को 100% नंबर आए और दूसरे स्थान पर 16 छात्र थे जिन्हें 99.75 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए थे। तीसरे स्थान पर 36 बच्चे थे जिन्हें 99.50 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए । यही नहीं सोमवार को घोषित सीबीएसई बोर्ड की दसवीं कक्षा  की परीक्षा में 13 छात्रों को सर्वोच्च अंक प्राप्त हुए।  सर्वोच्च अंक 500 में 499 थे। इस परीक्षा में 92.45 प्रतिशत छात्र पास हुए थे जिसमें 57,256 छात्रों को 95% तथा सवा दो लाख छात्रों को 90% से ऊपर अंक प्राप्त हुए थे।
         इतने ज्यादा अंक प्राप्त करने वाले छात्र अतीत के उन छात्रों की तरह ही है जिनमें से अधिकांश को किसी काम के लायक नहीं माना गया था। अब तो अधिकतम अंक की तो बात छोड़िए पास करने वाले छात्रों की संख्या भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। इससे साफ पता चलता है कि कुछ तो ऐसा हो रहा है जिसके कारण इतने ज्यादा अंक आ रहे हैं। मजे की बात है इस साल जिन बच्चों को बहुत ज्यादा नंबर हासिल हुए हैं उनमें से अधिकांश न किसी बड़े स्कूल के छात्र थे न किसी बड़े शहर के निवासी। वे मामूली स्कूलों से पास करने वाले छात्र थे । इन्होंने मानवीकी जैसे विषयों में भी उतने ही ज्यादा अंक हासिल किए जितने विज्ञान के विषयों में प्राप्त होते हैं। इन्होंने विषयनिष्ठ अंक प्रदान किए जाने इस सीमा को भंग कर दिया। शीर्ष स्थान पर छात्रों की बढ़ती संख्या उच्च शिक्षा पर दबाव बना रही है जहां अभी भी अच्छी गुणवत्ता वाले शिक्षण संस्थानों क्षमता सीमित है। उच्च शिक्षा में नामांकन  की लंबी प्रतीक्षा सूची और लगभग शत-प्रतिशत कट ऑफ नंबर और 5-5 ,6-6 नामांकन सूचियों को निकाला जाना  बताता है कि अच्छे शिक्षण संस्थानों में नामांकन के लिए कितना दबाव है। यही नहीं, अच्छे नंबर हासिल करने का दबाव बच्चों पर बढ़ता जा रहा है। पिछले साल तक नंबरों के इस उफान का कारण मॉडरेशन बताया जाता था अब तो लगता है कि  बोर्ड यह दिखाना चाहते हैं कि उनके यहां ज्यादा सफल छात्र हैं। लेकिन केवल यही कारण नहीं है। इसके अलावा कक्षाओं में लगातार टेस्ट परीक्षा और उच्च अंक प्राप्त करने  के लिए ट्यूशन इत्यादि के साधन छात्रों पर लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं। अब तो फोन में भी टेस्ट की तैयारी के एप्स आ रहे हैं। यही नहीं इंटरनेट के माध्यम से भी ट्यूशंस की व्यवस्था हो रही है। पिछले छात्रों के आंसर शीट दिखाए जाते हैं ताकि तैयारी करने में सहूलियत हो।
          दरअसल हमारी परीक्षाएं ज्ञान और रचनात्मकता की परीक्षा नहीं रह गई। अब तो बस स्मरण और तेजी से तथा शुद्ध रूप से उसे उपयोग करने की बात हो गई। प्रश्नों के उत्तर रट लिए जाते हैं और इतनी बार उनको लिखा जाता है की छात्रों को उसके कामा - फुल स्टॉप तक याद हो जाते हैं। यह ज्ञान की परीक्षा नहीं है, समझ की परीक्षा नहीं है। एक हिंदी फिल्म में ऐसे ही एक छात्र को दर्शाया गया था जिसे चमत्कार और बलात्कार में अंतर नहीं मालूम था और वह भाषण में चमत्कार को बलात्कार पढ़ता रहा। ऐसी परीक्षाएं और ऐसे ज्ञान उच्च शिक्षा के लिए बच्चों को तैयार नहीं करते। वे विषयों को रट लेते हैं। सोचते नहीं है, विचार नहीं करते हैं, तर्क नहीं करते हैं और ऐसे बच्चे स्वतंत्र क्षमता का निर्माण नहीं कर सकते और ना कॉलेज के पाठ्यक्रम को सही ढंग से समझ पाते हैं।  अगर समझ लेते हैं तो वह समझदारी मशीनी होती है। वे विषय को अक्सर समझते नहीं है बस परीक्षाओं में नंबर लाना चाहते हैं। परीक्षक उनके  ग्राहक हैं और अंको में उन्हें पुरस्कृत करते हैं। बस जरूरी है साफ-साफ लिखना और अच्छे तथा सही डायग्राम्स बनाना। परीक्षक  बच्चों के उत्तरों को देखे बिना। क्योंकि उन्हें मालूम है कि उत्तर  हूबहू वही रहेंगे जो पुस्तकों में लिखे हुए हैं। इसलिए परीक्षक को भी ज्यादा जहमत नहीं उठानी पड़ती। बस डायग्राम्स  का मिलान कर लेते हैं। लिखे उत्तरों को पढ़ते तक नहीं हैं। इससे कॉपी जांचने की प्रक्रिया तेज तो हो जाती है क्योंकि उसे मालूम है कि छात्र इन दिनों छात्र नहीं जेरॉक्स मशीन बन गए हैं । वे उन उत्तरों को इतनी बार रटते हैं और लिखते हैं कि गलती की गुंजाइश नहीं रहती। उच्च शिक्षा का उद्देश्य रोजगार के लिए बच्चों को तैयार करना है ताकि वे अपना भविष्य बना सकें ।  ज्यादा नंबर योग्यता की निशानी नहीं है क्योंकि प्रश्नों को इस तरह से तैयार किया जाता है कि छात्रों की स्मरण शक्ति की परीक्षा होती है ना कि वैचारिक क्षमता और ज्ञान के उपयोग की परीक्षा। छात्रों द्वारा इस तरह से रटकर परीक्षा पास करने के कारण उनकी क्षमता कुंद होने लगती है या कह सकते हैं अच्छे नंबर हासिल करने के लिए जो प्रतियोगिता होती है वह उच्च शिक्षा में या रोजगार में अच्छे नौजवान की क्षमता को हानि पहुंचाती है। हमारी परीक्षाओं का स्वरूप बदलना होगा। प्रश्नों को कुछ इस तरह से तैयार करना होगा कि छात्र उन पर विचार करें और उन्हें हल करने के क्रम में उन विचारों का उपयोग करें । रट कर  परीक्षा पास करने का उच्च शिक्षा में कोई अर्थ नहीं रह  जाता।

Tuesday, May 7, 2019

.......लेकिन चुनाव आयोग हार गया

.......लेकिन चुनाव आयोग हार गया


इन दिनों चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कर्तव्य परायणता पर सवाल उठने लगे हैं। किसी जिम्मेदार और संविधानिक संस्था पर इस किसिमके सवाल उठे इससे काफी निराशा होती है। कुछ दिन अहले तक चुनाव आयोग की इतनी साख थी कि उसने देश की सबसे बड़ी अदालत से मांग की थी कि उसे भी मान हानि करने वालों को उसी तरह के अधिकार मिलने चाहिए जैसे उसे है ताकि राजनीतिक दल या उम्मीदवार अथवा आम आदमी उसके फैसले की आलोचना ना कर सके। लेकिन अब सत्ता या कहें प्रधानमंत्री के प्रति जो उसका लिजलिजा रुख है उसे देख कर लग रहा है कि चुनाव के नतीजे चाहे जो हों लेकिन इस चुनाव में चुनाव आयोग हार गया। क्योंकि उसे विजयी तो तब माना जाता जब वह विश्वसनीयता के नए प्रतिमान गढ़ता। लेकिन अब तो उसके आचरण में कहीं निष्पक्षता दिख ही नहीं रही है। आप पूछ सकते हैं कि ऐसा क्यों? खुद ही देख लें।मोदीजी सेना में शौर्य का बखान कर वोट का जुगाड़ कर रहे हैं और उन्हें कोई रोक नहीं रहा है। यह संयोग मात्र है कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री के विरुद्ध शिकायतों पर कार्रवाई ना होने में मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले गयी आयोग झट उसे यह कह कर निपटा दिया कि शिकायतों पर विचार के बाद पाया गया कि वे सही नहीं हैं और ऐसे आरोपों पर क्या कार्रवाई हो? मामला खत्म। 
लेकिन प्रधानमंत्री ने वायनाड में जो हिन्दू मुसलमान किया या बालाकोट को सामने रख कर वोट समर्पण का जो आह्वान किया क्या यह आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है? एक राजनीतिक दल के पोस्टर में विंग कमांडर अभिनंदन की तस्वीर के उपयोग पर संज्ञान लेते हुए 19 मार्च को चुनाव आयोग की इस वर्जना का मोल क्या रह जाता है जिसमें उसने सभी दलों से ताकीद की है कि वे चुनाव अभियान में सैनिकों और सैन्य अभियानों की तस्वीरों का उपयोग ना करें। कुछ अपेक्षाकृत छोटे कद या पद वाले नेताओं-उम्मीदवारों से सख्ती और प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष से नरमी की राह पर चल कर चुनाव आयोग सांविधानिक तकाजों की अवहेलना कर रहा है। यह देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए बेहद चिंताजनक है। 
    जो नियम हैं उनके मुताबिक आचार संहिता के उलंघन की शिकायतों के निपटारे के मामले में कोई भी अदालत हस्तक्षेप नहीं करती। संहिता के नियमों के मुताबिक किसी भी दल को ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे जातीय या धार्मिक या भाषाई समूहों में नफरत बढ़े या घृणा बढ़े। साथ ही कोई राजनीतिक दल ऐसी कोई अपील जारी ना करे जिससे किसी की धार्मिक या जातीय भावनायें आहत हों। लेकिन प्रधानमंत्री तक इसके अनुपालन नहीं करें और इसकी शिकायतें चुनाव आयोग से किये जाने के भी कार्रवाई ना हो तो लगाता है कि कुछ गड़बड़ ज़रूर है।
      एक जमाने में चुनाव आयोग की साख इतनी ज्यादा थी कि ब्रिटेन में 1991 में जब चुनाव आयोग का गठन हुआ तो कहा गया था कि वह भारत के अनुभवों से सीख सकता है।दरअसल चुनाव आयोग को सियासत के बीहड़ों से गुजरना होता है जिसमें हर कदम पर  जोखिम है। ऐसे में कोई जटिल फैसला लेना बड़ा जटिल है। दूसरे आयोग की आलोचना हो तो सार्वजनिक रूप में अपना बचाव करना बड़ा कठिन होता है। पूर्व नौकरशाहों ने राष्ट्रपति को पत्र लिख कहा था कि " साख के संकट से जूझते चुनाव आयोग ने जिस अंदाज में बर्ताव किया है कि उससे उसकी साख इतनी गिर गयी है जितनी कभी नहीं गिरी थी। संविधान की धाराओं  के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए आयोग को बहुत अधिक अधिकार प्राप्त हैं। इन अधिकारों से अलग आयोग की साख उसकी नैतिक ताकत है।  जिस ताकत का आयोग उपयोग नहीं कर पा रहा है। वरना क्या बात थी कि विपक्षी दलों के शासन वाले पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में पुलिस के उच्चाधिकारियों के तबादले इस अंदाज में  किये गए जिसे देख कर ही लगता है कि उनमें विसंगति है। तमिलनाडु में डी जी पी का तबादला नहीं हुआ जबकि विपक्षी दलों ने बारम्बार इसकी मांग की थी। चुनाव के दौरान विपक्षी नेताओं के यहां आयकर छापे पड़े लेकिन आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की सिवाय ऐतराज जताने के। संविधानिक दायित्वों में आयोग का पिछड़ना आम बात हो गयी है खासकर प्रधानमंत्री और अमित शाह के मामले में। एन्टी सैटेलाइट वेपन को आधार बना कर प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित किया। इस अप्रत्याशित निर्णय पर चुनाव आयोग चुप बैठा रहा। आयोग ने एक लचर तर्क दे  दिया कि इसका प्रसारण दूरदर्शन से नहीं हुआ था। आयोग मूल सवाल ही गोल कर गया कि चुनाव के दौरान ऐसा होना चाहिए अथवा नही। अमित शाह ने उन समुदायों के नाम गिनाए जिन्हें घुसपैठिया नही माना जायेगा। लेकिन चुनाव आयोग ने चुप्पी साधे रहा। किसी के नैतिक बल की परीक्षा तब होती जब वह सबसे ताकतवर को ललकारे। इस चुनाव में आयोग सबसे ताकतवर का तरफदार लग रहा है या बिल्कुल निरुपाय। 

मोदीजी और राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र में सबसे ज्यादा कुपोषण

मोदीजी और राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र में सबसे ज्यादा कुपोषण

चुनावों में एक तरफ जहां पैसा पानी की तरह बहाया जाता है और सभी उम्मीदवार गरीबी दूर करने का वादा करते हैं, खुशहाली लाने की बात करते हैं वहीं दुनिया के सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चों में से एक तिहाई केवल इसी देश में हैं। हाल के के अध्ययन के अनुसार 543 चुनाव क्षेत्रों मवेइन से 73 ऐसे हैं जहां 20 प्रतिशत बच्चे बेहद कुपोषित हैं। इनमें चुनाव क्षेत्र झारखंड में हैं,19 मध्यप्रदेश,10 कर्नाटक,8 उत्तरप्रदेश और 6 राजस्थान में हैं।कई चुनाव क्षेत्र तो ऐसे हैं जहां कई तरह के कुपोषण हैं जिनपर तुरत ध्यान देना जरूरी है। कुपोषण के शिकार लोग रोजगार के काबिल नहीं रह जाते क्योंकि उनका मानसिक विकास रुक जाता है और इससे आर्थिक  विकास को भी आघात पहुंचता है। खुशहाली के बड़े बड़े वादों के बावजूद हमारे देश में 4 करोड़ 66 लाख बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। आंकड़े बताते हैं कि इससे 2030 तक भारत को 46 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है। विडंबना यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान खुशहाली और विकास के वादे चाहे जितने हों कभी कुपोषण इनके एजेंडा में नहीं रहा।  हार्वड यूनिवर्सिटी में पॉपुलेशन, हेल्थ एंड जॉग्रफी के प्रोफेसर एस वी सुब्रमण्यम के मुताबिक भारत में 5 वर्ष से कम उम्र बच्चों में अविकसित बच्चों की तादाद 35.9 प्रतिशत है जबकि कम वजन वाले बच्चों का अनुपात 33.5% और रक्तल्पता के शिकार बच्चों की संख्या 56.8% है। यानी देश के 5 वर्ष से कम उम्र बच्चों में से एक तिहाई से ज्यादा अविकसित हैं और काम वजन के हैं तथा आधे से ज्यादा रक्त की कमी के शिकार हैं। इनमें उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनाव क्षेत्र में सबसे खराब स्थिति है। यही नहीं उत्तर भारत के अधिकांश मंत्रियों के चुनाव क्षेत्रों में भी यही हाल है। वाराणसी चुनाव क्षेत्र में अविकसित बच्चों अनुपात 43.1% है जो राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। मोदी जी 2014 में वाराणसी से चुने गए थे लेकिन 2009 में भी यह सीट भा ज पा के पास ही थी। मोदीजी के मंत्रिमंडल के 8 कैबिनेट मंत्री उत्तर भारत से हैं , खास तौर पर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान से। कर्नाटक और गुलबर्गा का प्रतिनिधित्व विपक्ष के नेता कांग्रेस के  मल्लिकार्जुन खड़गे करते हैं और  18 बड़े नेताओं के चुनाव क्षेत्रों में से इसकी हालत सबसे खराब है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी और उनके मित्र ज्योतिरादित्य सिंधिया के गुना की स्थिति गुलबर्गा के बाद नीचे से दूसरी और तीसरी है। दुखद तथ्य यह है कि खड़गे गुलबर्गा से 2009 में राहुल गांधी 2004 से और सिंधिया 2002 से इन चुनाव क्षेत्रों से जीत रहे हैं।केरल का तिरुवनंतपुरम कांग्रेस के शशि थरूर का चुनाव क्षेत्र है और हैदराबाद मजलिसे इत्तहादुल मुसलमीन के असादुद्दीन ओवैसी का है और इनकी स्थिति 18 हाई प्रोफाइल चुनाव क्षेत्रों में सबसे अच्छी है।
   मध्य और उत्तर भारत के चुनाव क्षेत्रों खासकर उत्तरप्रदेश, बिहार,मध्यप्रदेश और झारखंड में कुल मिलाकर देश की 31 प्रतिशत आबादी निवास करती है।इन राज्यों में कुपोषण से प्रभावित बच्चों का अनुपात सबसे ज्यादा है। इनमें उत्तरप्रदेश में साध्वी सावित्रीबाई फुले के चुनाव क्षेत्र बहराइच में 63.6%, भाजपा के दद्दन मिस्र के श्रावस्ती में 61.3% और भाजपा के ही बृज भूषण शरण सिंह के क़ैसर गंज में 59.7% कुपोषण का अनुपात है।
        भारत सरकार ने 1993 में संसदीय क्षेत्र विकास के लिए हर सांसद को 5 करोड़ रुपयों का कोष देने की योजना बनाई। 2016 तक कुल मिला कर सांसदों को इस योजना के अंतर्गत 31,833 करोड़ रुपये दिए जा चुके । इस योजना के तहत जो राशि दी गयी उनमें स्वास्थ्य के लिए खर्च के मद में अस्पतालों को औजार खरीदने के लिए, एम्बुलेंस खरीदने के लिए , क्रीड़ा विकास के लिए खर्च किये गए। सबका उद्देश्य स्वास्थ्य विकास और स्वास्थ्य परिचर्या की स्थिति यह है कि 
देश में स्वास्थ्य उप केंद्र की 19% कमी है और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 22% तथा 30% सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों का अभाव है। सरकार के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में एक उप स्वास्थ्य केंद्र से लगभग 5000 लोगों को इलाज इलाज की सुविधा मिलती है जबकि एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र  30,000 और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में 1,20,000 लोगों को उपचार की सुविधा मुहैया कराता है। प्राथमिक  उपचार केंद्र गांव की आबादी और एक डॉक्टर के संपर्क का पहला आधार है। इनमें 46% महिला स्वास्थ्य और 60% पुरुष स्वास्थ्य सहायकों का अभाव है । डॉक्टरों की कमी के कारण प्राथमिक उपचार केंद्र में से 12% में कोई डॉक्टर नहीं है। सरकारी ऑडिटर की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक हमारे देश में उपचार का संकट पैदा हो रहा है और दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए आवंटित धन बिना खर्च हुए लौट जा रहा है। 21 अगस्त 2018 को सीएजी की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है की 28 राज्यों  और केंद्र शासित प्रदेशों  के 34  से 38 प्रतिशत प्राथमिक उपचार केंद्रों में स्वास्थ्य कर्मियों की कमी है । रिपोर्ट में यह भी पाया गया 75% उप केंद्र सबसे दूरदराज के गांव से 3 किलोमीटर दूर है और इनमें 28% तो ऐसे हैं जहां सार्वजनिक वाहन से पहुंचा ही नहीं जा सकता और 17% केंद्र बेहद गंदे हैं।
अब चुनाव क्षेत्रों में कुपोषण के आंकड़े अलग किस्सा बयान करते हैं।स्वास्थ्य की स्थिति अलग तस्वीर पेश करती है। ऐसे में  क्या यह माना जा सकता है कि अपने क्षेत्र में बच्चों की इस दुर्दशा के बारे में सांसदों को जानकारी नहीं होगी? बेशक इस राशि का उपयोग राजनीतिक लाभ को ध्यान में रख कर किया जाता होगा। अगर बच्चों का विकास नहीं होगा तो राष्ट्र के विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। तो भविष्य के एक अविकसित राष्ट्र के लिए इतनी लान्तरनियाँ क्यों? 

संस्कृति, मतभेद और सियासत

संस्कृति, मतभेद और सियासत

6 मई 2019
इसबार का चुनाव सियासत के संदर्भ में  संस्कृति पर बहस को हवा देकर मतभेद की नई बुनियाद खड़ी कर रहा है। एक वक्त जब बुद्धिजीवी मानवाधिकार, समाज सुधार और गरीबों के अधिकारों की बात करते थे। अब बुद्धिजीवी भी सियासत की बात में जुटे हैं और समाज संस्कृति के विभिन्न खांचों में विभाजित हो रहा है। यह विभाजन राजनीति की सतह से बहुत गहरा होता जा रहा है। राजनीति की इस ताजा गतिविधि को समझने के लिए जरूरी है कि पहले राजनीति के नीचे के सांस्कृतिक तनावों को समझें। विख्यात समाज शास्त्री पियरे बोर्दु ने "डिस्टिंक्शन" में लिखा है कि मनुष्य अवचेतन विभिन्न संस्कृतियों को प्राथमिकता प्रदान करता है। बोर्दु ने उदाहरण के तौर पर कहा है कि अधिकांश बुद्धिजीवी रूढ़ियों पर नहीं विश्वास करते वहीं श्रमिक वर्ग या किसान वर्ग के लोग उस पर विश्वास करते हैं। ऐसा इस लिए नहीं कि एक वर्ग बुद्धिजीवी है और एक किसान है बल्कि इसलिए कि दोनों का विभिन्न सांस्कृतिक परिवेश में लालन पालन हुआ है। लेकिन जब यही श्रमिक या किसान वर्ग के लोग विकसित होकर ऊपर की ओर बढ़ने लगते हैं तो उनके भीतर एक सांस्कृतिक द्वंद्व आरम्भ हो जाता है। इनके भीतर नए परिवेश के अनुरूप बदलाव आने लगता है। इस बदलाव के कारण उस बदलते व्यक्ति के कुटुम्ब में भी तनाव बढ़ जाता है।कुछ लोग इसे आर्थिक खुशहाली के कारण उत्पन्न स्थिति बताते हैं पर दरअसल यह नई संस्कृति में प्रवेश के कारण होता है क्योंकि इसके फलस्वरूप विचार, चिंतन तथा रहन-सहन में बदलाव आने लगते है। यही तनाव राष्ट्रीय सांस्कृतिक मतभेद के रूप में परिलक्षित होता है जो हमें इस चुनाव में देखने को मिल रहा है। बहस सम्प्रदायों के अस्तित्व को लेकर चल रही है। हम इस बात पर नहीं बहस कर रहे हैं कि कैसे शिक्षा की व्यवस्था में सुधार हो, भ्रष्टाचार खत्म हो ,लोंगो की आर्थिक हालत सुधरे, रोजगार के अवसर बढ़ें बल्कि हम बहस कर रहे हैं कि किस सम्प्रदाय के लोगों को  देश में रहने दिया जाय और किसे नहीं। हमारी कोशिश यह नहीं है कि चुनाव का नतीजा चाहे जो हो हमारा साम्प्रदायिक सद्भाव   बढ़े।
  समाज में फैल रही वैमनस्यता आगे चल कर हिंसा को जन्म देगी। जिसकी बानगी हम लिंचिंग और विभिन्न प्रकार के सीमित हिंसक प्रयासों में अभी ही देख सकते हैं। यह तय है कि हिंसा से कभी किसी देश या समाज का कल्याण नहीं हुआ। बेशक उसका धेय्य चाहे जो हो। दुनिया के सामने कम्यूनिज्म के नाम पर जितने लोग मारे गए उतने दोनों विश्वयुद्ध में नहीं मारे गए थे। नतीजा क्या हुआ कम्युनिज्म दुनिया से समाप्तप्राय है। इसके अलावा मिस्र, अफगानिस्तान, अरब इत्यादि कई देशों में हिंसक क्रांतियां हुईं पर क्या वह दीर्घकालिक रह सकीं? भारत में भी स्वतंत्रता  संग्राम के दौरान हिंसा हुई लेकिन संग्राम का मूल अहिंसक था इसलिए आज भी विविधता पूर्ण समाज कायम है।अब उस विविधता में विभाजन का प्रयास हो रहा है। वे यह शायद समझ नहीं पा रहे हैं कि विभाजन की नींव पर खड़ा समाज आगे चल कर और विभाजित होगा। 
यहां एक सवाल है कि हिंसा की सरभौमिक्ता की हमारे जीवन में प्रासंगिकता क्या है? इस के उत्तर के बारे में संकेत हमारे जीवन में निराशा की भावना को जाहिर करते हैं। क्या कभी हमने सोचा कि इसका विकल्प क्या है या सबपर शाषन करने के मौत के ड्राइव के मनोभाव से हम ग्रस्त हैं?
यह कोई समझने को तैयार नहीं दिख रहा है कि धर्म का मूल शांति और सद्भाव में है। शांति और मनवमूल्य धूलधूसरित होते दिख रहे हैं। न्याय ,समानता और एकता अब विशिष्ट समूहों के लिए होती जा रही है। समाज हम और वे दो भागों में तकसीम हो रहा है।     
हम यह नही सोचते कि सबलोग सद्भाव से रहें उल्टे यह सोचने के लिए समाज को उकसाया जाता है कि चुनाव के बाद अगर सरकार से सुविधाएं मिलेंगीं तो क्यों वह दूसरे सम्प्रदाय को मिले। हमारे देश में एक तिहाई बच्चे कुपोषण के शिकार हैं उनका पोषण प्राथमिकता नहीं है। समाज को विभाजित करने के लिए झूठी खबरें फैलाई जा रहीं हैं। सांस्कृतिक तनाव पैदा करने में हमारी सोशल मीडिया की भूमिका सर्वोपरि है। समाज के निम्न और मध्य स्तर तक मोबाइल फोन तथा इंटरनेट की पहुंच के कारण खबरें तड़ितवेग से फैलतीं हैं। एक सर्वे के अनुसार 52 प्रतिशत लोग फेस बुक और व्हाट्सऐप से खबरें मालूम करते हैं। आंकडें बताते हैं कि इस चुनाव के दौरान लगभग 25 करोड़ लोग फ़ेसबुक और व्हाट्सएप से जुड़ गए। झूठी खबरों में सबसे ज्यादा होती हैं राजनीतिक खबरें और उनमें भी समाज को विभाजित करने वाली खबरें। इससे होता यह है कि हम उन्हीं अंधेरों में भटकते रहते हैं जहाँ से निकलने की कोशिश करते रहे हैं। राजनीतिज्ञ यह अच्छी तरह समझते हैं कि विकास से समझ और विचार का दायरा भी विकसित होगा। इससे सियासी चालबाजियों का असर नहीं होगा। यह तय है कि सभी सम्प्रदाय को यहीं रहना है पर चुनाव के बाद हमारे सामने एक बदला हुआ समाज रहेगा जिसमें अविश्वास का बोलबाला रहेगा।

मसूद अजहर पर प्रतिबंध

मसूद अजहर पर प्रतिबंध

4 मई 2019
मसूद अजहर पर प्रतिबंध को लेकर एक सवाल उठता है कि राष्ट्र संघ के नियम के अनुसार अजहर पर पाबंदी पर चीन ने जो विटो लगा रखा था उसे उसने अभी क्यों वापस लिया? एकदम चुनाव के मध्य में उसने ऐसा क्यों किया? उत्तर हो सकता है ,नरेंद्र मोदी जी को मदद कर आभारी बनाने के लिए। मोदीजी ने इसके खिलाफ जोर शोर से अभियान चलाया था। लेकिन , यह उत्तर बड़ा सरल और नौसिखुआ प्रकार का है। क्योंकि चुनाव के चार चरण बीत चुके हैं और इसलिए मोदी जी को अब इसमें मदद नहीं की जा सकती है। हो सकता है चीनी  दो तरफा चाल चल रहे हों। अगर मोदी जी जीतकर दोबारा प्रधानमंत्री बनते हैं तो वह कहता फिरेगा कि उसने इनकी मदद की और अगर हारते हैं तो कहेगा कि चुनाव  से कोई लेना देना नहीं था। दूसरा सवाल है कि भारत इसके बदले चीन को क्या देगा? अगर कोई यह समझता है कि चीन भारत की बात से सहमत था तो वह दिवास्वप्न देखता है।
            सही बात तो यह है कि मोदी जी ने अपनी चुनावी रणनीति के तहत इसके लिए बहुत मेहनत की थी। उन्होंने चुनाव जीतने के लिए इस रणनीति का जितना उपयोग करना था किया है । चाहे वह जातीय समीकरण हो या विपक्षियों को हड़काने के लिए प्रवर्तन निदेशालय का उपयोग हो या टीवी शो या फिर फिल्म अभिनेताओं द्वारा समर्थन ही ,मोदी जी ने कुछ नहीं छोड़ा। इसी तरह उन्होंने कूटनीति का भी प्रयोग किया। कुछ लोगों का मानना है कि विदेश सचिव विजय गोखले की 21 से 23 अप्रैल की दो दिवसीय चीन यात्रा इसी प्रयास का एक अंग थी। सरकारी तौर पर वे नियमित विचार-विमर्श के लिए बीजिंग गए थे लेकिन कूटनीतिक क्षेत्रों में कहा जा रहा है कि वे चीन से मसूद अजहर पर पाबंदी के लिए सहयोग का वादा करवाने गए थे।  चीन बेल्ट एंड रोड फोरम के दूसरे अभियान मे जुटा है और पिछले हफ्ते वहां 37 देशों के विदेशी विभागों के प्रमुख थे जिनमें राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, राष्ट्र संघ के सेक्रेटरी जनरल एंटोनियो गुटेरेस तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख क्रिस्टिन लागार्डे भी शामिल थे। इसलिए चीन ने यह फैसला अभी किया।
        हमें इस बात पर बहुत ज्यादा मुतमईन   नहीं रहना चाहिए कि गोखले जो अतिरिक्त सबूत लेकर चीन गए थे उसे बीजिंग ने मान लिया ।  यह एक साधारण और सरल राजनीतिक सौदेबाजी थी। दरअसल अजहर मसूद पर पाबंदी के लिए राष्ट्र संघ की नोटिस में यह साफ था कि चूंकि  अजहर  जैश ए मोहम्मद का संस्थापक है और पूर्ववर्ती हरकत उल मुजाहिदीन का प्रमुख था।  दोनों राष्ट्र संघ की  इसी नोटिस  के तहत पहले से ही राष्ट्र संघ में पाबंदीशुदा थे। हाल के वर्षों में जैश पर पुलवामा पठानकोट जैसी कोई रिपोर्ट भी नहीं थी। जैश का भारत से जुड़ा लंबा इतिहास रहा है। अजहर मसूद जो कभी हरकत उल मुजाहिदीन का प्रमुख था वह जैश ए मोहम्मद का प्रमुख बन गया। उसे विमान अपहरण में फंसे यात्रियों को रिहा कराने के लिए सन 2000 में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने रिहा कर दिया था। दूसरे ही साल उसके नए संगठन ने भारत की संसद पर हमला कर दिया। हाल के वर्षों में उसने लश्कर-ए-तैयबा को भी अपने संगठन में शामिल कर लिया। उसने 2016 में पठानकोट ,उड़ी और नगरोटा पर ,सुंजवान पर 2018 में और 2019 में पुलवामा में अर्धसैनिक बलों के वाहन पर हमले किए।
          राष्ट्र संघ ने अजहर पर  पाबंदी की नोटिस पेश की लेकिन चीन ने अड़ंगी लगा दी। भारत ने 2009 में ही इस पर प्रतिबंध के लिए आवेदन किया था इसके बाद पठानकोट हमले के पश्चात अमरीका,  इंग्लैंड और फ्रांस की मदद से फिर  आवेदन किया। चीन ने फिर वही किया।  2017 में भी पुनः प्रयास किया गया  लेकिन वह भी नाकाम हो गया। इस वर्ष पुलवामा हमले के बाद फ्रांस और इंग्लैंड के सहयोग से फिर से कोशिश हुई इस बार तो जैश ए मोहम्मद ने उस हमले में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी तब भी  चीन ने वही किया जो अब तक करता रहा है । अब सवाल उठता है कि क्या चुनाव में वर्तमान सरकार को क्या इससे मदद मिलेगी? क्या  सचमुच  यह एक बहुत बड़ी विजय है?
           वस्तुतः अजहर मसूद आज  एक आतंकी है और वह भारत पर कई हमलों का दोषी भी है। उस पर प्रतिबंध का भारत के चुनाव पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ने वाला। इसके पहले लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज मोहम्मद पर 2009 नए प्रतिबंध लगा था लेकिन वह पाकिस्तान में फलता फूलता रहा। प्रतिबंध से केवल यही होता है कि उसकी संपत्ति जप्त हो जाती है और विदेश यात्राओं पर रोक लग जाती है। पिछले 3 वर्षों से जैश ए मोहम्मद ने भारत के कई स्थानों पर हमले किए और सुरक्षाकर्मियों को मारा। इसमें मोदी सरकार ने केवल एक ही आ कि राष्ट्र संघ में उसके खिलाफ कागजात को आगे बढ़ा दिया और कागज पर ही उस पर पाबंदी लग गई। अजहर जैसे आतंकवादी का सबसे अच्छा इलाज यह होता की उसे पकड़ लिया जाता और जेलों में बंद कर दिया जाता  उस पर मुकदमा चलता या फांसी पर लटका दिया जाता। लेकिन ऐसा कुछ भी मोदी सरकार ने नहीं कहा है।  इस तरह की पाबंदी को बहुत बड़ी विजय बताना सचमुच जरा खोखला लगता है। यह बात याद दिलाती है पिछले चुनाव में मोदी जी ने दाऊद इब्राहिम को भारत लाने का वादा किया था क्या हुआ उसका? बस यह पाबंदी भी कुछ वैसा ही करेगी।

इस चुनाव का विरोधाभास

इस चुनाव का विरोधाभास

3 मई 2019
2019 का चुनाव  अत्यंत विरोधाभासी है। चुनाव आयोग का पहला कर्तव्य है कि वह इस बात पर पूरा ध्यान रखे कि सत्तारूढ़ दल केवल अपनी क्षमता के कारण दूसरे दलों के प्रति कोई नाजायज लाभ नहीं उठा सके। लेकिन शायद ऐसा नहीं होता है। भारत में चुनाव के दौरान चुनाव आयोग ब्यूरोक्रेसी का बॉस होता है । वह अपनी इच्छा अनुसार या किसी दबाव के अनुसार जूनियर और सीनियर अफसरों के तबादले करता है । हमारे देश का चुनाव आयोग इस वर्ष एक शोध का विषय है। ऐसा चुनाव जिसमें  किसी एक दल को अनुचित लाभ मिले और वह भी सिर्फ इसलिए कि वह सत्ता में है ऐसे चुनाव को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कैसे कहा जा सकता है? इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक  वोटिंग मशीन में गड़बड़ी की बात बहुत जोर शोर से उठ रही है लेकिन यह समझने के लिए कोई तैयार नहीं है कि मतदान शुरू होने के पहले ही राजनीतिक प्रक्रिया में अगर धांधली कर दी गई तो ईवीएम में गड़बड़ी की  कोई जरूरत नहीं रह जाती। कई ऐसे मसले हैं जिन पर विचार के बाद ऐसा लगता है यह चुनाव सबके लिए एक तरह का नहीं है। यह अत्यंत विरोधाभासी है। सबसे पहली बात तो चुनाव में होने वाले खर्च की। चुनाव आयोग के अनुसार  एक चुनाव में एक प्रत्याशी 70लाख रुपये तक खर्च कर सकता है। यह सीमा है । लेकिन  एक प्रत्याशी अनाप-शनाप खर्च करता है और उसके खर्च की कोई सीमा नहीं रहती। इस कारण जो अमीर दल हैं वह लाभ में रहते हैं और गरीब दल हाथ मलते रहते हैं। चुनाव आयोग चाहता है कि उनके लिए भी सीमा बने लेकिन राजनीतिक दल इसे नहीं मानते। जो सत्तारूढ़ दल होता है उसकी आर्थिक संभावनाएं भी दूसरों से अलग और ज्यादा होती हैं। अब एक लोकतंत्र की हैसियत से हमें पूछना होगा क्या यह सही है कि एक अमीर पार्टी जा संसाधनों से भरी पार्टी है वह एक बड़ा अभियान चला सकती है और मतदाताओं को लुभा सकती है। चुनाव में खर्च की सीमा कम करने का वक्त आ गया है। चुनाव में किसी पार्टी की खर्च की सीमा नहीं होने से यह एक तरह से अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में बदल गया है। सबसे जरूरी है कि आम लोगों और सरकार के बीच सांसदों के माध्यम से संवाद कायम हो। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता है बीच में दौलत की खाई है और यह आम आदमी को आगे बढ़ने से रोक देती है। सांसद उनके लिए आकाश कुसुम होते हैं।
       यह हकीकत है लेकिन थोड़ी कड़वी है कि हमारे देश की राजनीति काले धन पर चलती है। सारे दल काले धन के खिलाफ ताल ठोकते हैं और उसी का सहारा लेते हैं। मिसाल के तौर पर देखिए, लोकसभा के एक उम्मीदवार के लिए खर्च की सीमा 70 लाख रुपए तय की गई है। ऐसा लगता है यह कोई मजाक है। शायद ही कोई सांसद इतने कम में चुनाव लड़ता है। चुनाव में कालेधन का उपयोग कुछ ऐसी हकीकत है जिस को बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन तब भी अफसरों और विपक्ष में भेदभाव नहीं होना चाहिए। ऐसा प्रदर्शित किया जाता है कि केवल विपक्षी दलों के पास ही काला धन है। विपक्षी नेताओं के घर पर उनसे संबंधित लोगों के घर पर या  कार्यालय में चुनाव से पहले और चुनाव के बाद  छापे पड़ते रहते हैं। इससे सत्तारूढ़ दल को 2 फायदे मिलते हैं पहला की वह चीख चीख  कर बताता है कि विपक्षी नेता भ्रष्ट हैं और दूसरा कि विपक्षी नेताओं की चुनाव अभियान क्षमता पर भी चोट पहुंचती  है। विपक्षी दलों पर और उनके साथ वालों पर छापे से लोगों को यह मानने पर मजबूर किया जा रहा है कि वह दल और उनसे जुड़े दल कालेधन का उपयोग करते हैं बाकी सत्तारूढ़ दल और उनसे जुड़े दल एकदम पाक साफ हैं। वह काले धन का उपयोग बिल्कुल नहीं करते हैं। 
ऐसे में जॉर्ज ऑरवेल की एक बात याद आती है कि "एक समाज जितना एक दूसरे से दूर होगा उतना ही वह उन लोगों से नफरत करेगा जो उसके बारे में बोलते हैं ।" इस के आलोक में एक बात समझने की कोशिश करें , लोकतंत्र में लोक की शक्ति ज्यादा है लेकिन हमारे लोकतंत्र में धन की शक्ति ज्यादा दिखाई पड़ती है। अवांतर सत्य और वैकल्पिक वास्तविकता के इस महा समुद्र में कुछ तो सच है जो वास्तविक और डरावना है।  कोई इस पर बहस नहीं करना चाहता। एक ऐसा स्वनिर्मित नेता जो खुद को "चायवाला" और "चौकीदार" बताता है वह आज भारत के इतिहास में सबसे अमीर पार्टी का मुखिया है। उनके कार्यकाल में भाजपा देश के इतिहास में सबसे अमीर पार्टी बन गयी। अब चूंकि जांच एजेंसियां इसी पार्टी की सरकार के अंतर्गत हैं तो दौलत के इस बेशुमार इजाफे की जांच कौन करे? यहां तक कि खोजी पत्रकारिता की धार भी कुंद हो गई सी प्रतीत हो रही है। चुनाव आयोग के समक्ष 8 फरवरी 2018 को प्रस्तुत वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार 2016 -17 में भाजपा की आय 1,034 करोड़ हो गई जबकि 2015- 16 में यह 570 करोड़ थी। भारत दुनिया के गरीब देशों में से एक है जहां लाखों लोगों को स्वास्थ्य शिक्षा और रोजगार उपलब्ध नहीं है । लेकिन लोग लाखों रुपए राजनीति में झोंक रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि यह लोकतंत्र गरीबों के लिए, गरीबों द्वारा और गरीबों का नहीं रहा।" दुनिया का यह सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र आज अमीरों का लोकतंत्र बन गया है और हार तथा जीत  में दौलत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
अभी हाल में सोशल मीडिया में एक खबर वायरल हुई कि  जो बहुत ही महत्वपूर्ण है उन्हें समाचार चैनलों में नहीं दिखाया जा रहा है।  क्यों नहीं मीडिया की भूमिका पर एक राष्ट्रीय बहस का आयोजन किया जाए। यह स्पष्ट है कि इन दिनों मीडिया सत्तारूढ़ दल के प्रचार की मशीन में बदल गई है। देश के लोगों को यह समझाने की कोशिश की जा रही है की कांग्रेस के राहुल गांधी सत्ता के लिए उपयुक्त नहीं हैं। माहौल को हास्यास्पद बनाने के लिए तैयार किए गए संपादित, सैद्धान्तिक वीडियो सोशल मीडिया से इतने ज्यादा प्रचारित हुए हैं कि बहुत बड़ी संख्या में लोग राहुल गांधी के संबंध में इस तथ्य को मानने लगे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था दूरदर्शन को सभी दलों के लिए समान समय देना चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। हाल में इसके लिए चुनाव आयोग ने भी उसे काफी फटकारा था। पिछले 5 वर्षों में मीडिया को धमकाया गया है। फर्जी खबरों को वायरल किए जाने के कारण हमारा लोकतंत्र दयनीय होता जा रहा है सत्य निरर्थक होता जा रहा है। एक नेता के अलावा कोई विकल्प नहीं यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक नहीं है और राष्ट्र को इस पर सोचना चाहिए।
       बेशक हमारा चुनाव आयोग अत्यंत सक्षम है तथा विश्वसनीय है लेकिन इस चुनाव में वह तटस्थ नहीं दिख रहा है। कुछ नेता अपने प्रचार के दौरान सेना के लिए धर्म और संदर्भों का खुल्लम- खुल्ला उपयोग कर रहे हैं और चुनाव आयोग देख कर भी अनदेखी कर रहा है। चुनाव आयोग के  इस आचरण के बारे में रिटायर अफसरों ने राष्ट्रपति से  शिकायत भी की है। एक प्रश्न ,चुनाव ड्यूटी पर  तैनात एक अफसर प्रधानमंत्री के हेलीकॉप्टर की जांच क्यों नहीं कर सकता? रूल आफ लॉ सबके लिए बराबर है। तमाम नियम और कानून प्रधानमंत्री पर क्यों नहीं लागू हो सकते? शिकायत के बावजूद चुनाव आयोग ने कोई कदम नहीं उठाया। इससे स्पष्ट होता है कि वह तटस्थ नहीं है। चुनाव जीतने और हारने से एक चीज ज्यादा महत्वपूर्ण है वह है लोकतांत्रिक सिद्धांतों का कायम रहना और संस्थानों का अक्षुण्ण रहना। अगर हम लोकतंत्र के लिए तन कर खड़े नहीं होंगे तो वह दिन दूर नहीं कि यह देश बुरी तरह विभाजित लोगों का देश बन जाएगा और लोग एक दूसरे से इतनी नफरत करने लगेंगे इस पर बात भी नहीं करेंगे तथा जिसकी परिणति भयंकर हिंसा में हो सकती है।