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Sunday, July 14, 2019

बिखरती कांग्रेस: कारण क्या है

बिखरती कांग्रेस: कारण क्या है

देश भर के कई राज्यों से खबर आ रही है के कांग्रेस से विधायक टूट कर दूसरी पार्टियों में जा रहे हैं। कई दिनों से यह अखबारों की सुर्खियां हैं। लेकिन, भारत की राजनीति के लिए यह नया नहीं है। लगभग हर  राजनीतिक पार्टी के साथ कभी न कभी ऐसा होता है कि कुछ लोग किसी मौके पर एक से टूट कर दूसरे में चले जाते हैं। शुरू में इन खबरों को पढ़ने सुनने वाले थोड़ी हैरत में आते हैं। थोड़ी चर्चा करते हैं। बाद में अभ्यस्त हो जाते हैं और बस यही कहते हैं छोड़ो यार यह सब चलता है। निर्वाचकीय राजनीति का एक और पक्ष है वह है  समाज का नैतिक पतन । हालांकि,  यह स्थिति  विश्वव्यापी है लेकिन इन दिनों इसे भारत में नया विचार माना जा रहा है और चालाकी भरी राजनीतिक रणनीति का दर्जा दिया जा रहा है। अब ऐसे में सारी स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि किसी की सहानुभूति किस तरफ है और साथ ही एक कारण और है कि जिस पक्ष से लोग टूट कर जा रहे हैं उसमें वैचारिक एवं आदर्श के खिंचाव का कम होना। यही नहीं, इसके साथ ही अवसरवादियों को चुनाव का टिकट देना भी एक कारण है। लेकिन यह सारे तर्क इस बात का जवाब नहीं देते कि झंडा बदलने वालों को किसी होटल या पर्यटन स्थल पर क्यों छुपाया जाता है ? ऊपरी तौर पर तो ऐसा लगता है कि झंडे बदलने वाले विधायक अपना निर्णय न बदल दें इसलिए ऐसा किया जाता है। लेकिन यह तो बाद की बात है । यहां सबसे महत्वपूर्ण है इस बात पर विचार करना कि एक नाव से दूसरे नाव पर सवार होने की प्रवृत्ति क्या है या उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के बीच बदलते रिश्ते क्या हैं। परंपरागत तौर पर तो उम्मीदवार रणनीति तथा चुनाव लड़ने के लिए धन पर निर्भर करते हैं ,साथ ही पार्टी के कार्यकर्ता और बाहुबली की मतों को जुटाने की प्रक्रिया में पार्टी की साख पर निर्भर करते हैं। साधारणतः पार्टियां उम्मीदवारों के लिए इन सब चीजों का ध्यान रखती हैं। यकीनन उम्मीदवार भी अपने व्यक्तिगत कार्यकर्ताओं- समर्थकों को लेकर मैदान में उतरते हैं लेकिन इसके बावजूद बात पार्टी की ही चलती है और संबंधों में उसी का वर्चस्व रहता है। यह बात उस जमाने की है जब कहा जाता था की अगर सही पार्टी साथ में हो तो कोई भी चुनाव जीत सकता है।
           लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं। उन हालात के बदलाव की लहर दो तरह की होती है। पहली राजनीतिक तौर पर सत्तारूढ़ दल में जाने से ज्यादा लाभ का लोभ। इस स्थिति में राजनीतिक दल भी टिकट मांगने वालों को तौलते हैं कि उनकी माली हालत क्या है, उनके पास कितने लोग हैं और वह अपनी जाति तथा धर्म के कितने मतदाताओं को अपने साथ ला सकते हैं। उम्मीदवार की यह खूबी प्रतिद्वंदी दलों में स्थानीय स्तर पर प्रतियोगिता का सृजन करती है और आगे चलकर यह व्यक्तिवादी अपील में बदल जाती है। इसमें दूसरे प्रकार की लहर है कि जब बाहुबली, धनदाता और प्रभावशाली ग्रुप अपनी ताकत को पहचानने लगते हैं और यह समझने लगते हैं कि वह चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं तो क्यों नहीं खुद पार्टी में चले जाएं। दूसरे को यह सारी सुविधाएं देने से तो ज्यादा यही अच्छा है। अब इससे संगठन में दरार आने लगती है और उम्मीदवार के चुनाव में उसके विजयी होने का पैमाना बदलने लगता है। एक तरह से टिकटों की नीलामी आरंभ हो जाती है। ऐसा होने पर उम्मीदवार की चुनाव में निर्भरता कम हो जाती है वह खुद चुनाव के अपने खर्चे निकाल लेता है। पार्टी के भीतर गुटों का बनना यह बताता है यह लोग पार्टी के तंत्र पर कम भरोसा करते हैं। इससे पार्टी हाईकमान और निर्वाचकों के बीच दूरी बढ़ने लगती है तथा एक नई स्थिति उत्पन्न होने लगती है । विचार पैदा लेता है कि पार्टी बहुत ज्यादा वोट नहीं प्राप्त कर सकती है अगर उस खास उम्मीदवार से पल्ला झाड़ ले तो ।इससे जो संदेश मतदाताओं के पास जाता है वह उम्मीदवार के पक्ष में ज्यादा होता है।
        यदि राजनीतिक दल उम्मीदवारों या उनकी उम्मीदों से बहुत ज्यादा किनारा नहीं करते हैं तो सारी स्थितियों के बाद भी पार्टियों के पास बहुत कुछ देने के लिए होता है। यह स्थिति निर्दलीय उम्मीदवारों के साथ   लागू नहीं होती । लेकिन जो पार्टी के साथ हैं उनके साथ पूरी तरह लागू होती है। सबसे बड़ी बात है कि पार्टी उम्मीदवारों को साख के लिए एक मंच देती है और यही नहीं, धन की कमी के मौके पर चुनाव लड़ने के लिए धन मुहैया कराती है। बड़े स्टार प्रचारकों को  चुनाव प्रचार के लिए उपलब्ध कराती है तथा मंत्री पद की संभावनाएं पैदा करती है । अब एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने की यात्रा का पथ थोड़ा छोटा हो जाता है। ऐसे में एक महत्वाकांक्षी उम्मीदवार के लिए अपना परिश्रम, धन और ताकत लगाने के विकल्प खुल जाते हैं और वह जिस विकल्प को बेहतर समझता है उस ओर का रुख करता है, स्थानीय मतभेद को रोकता है। फिलहाल इस विकल्प के रूप में भारतीय जनता पार्टी का उदाहरण दिया जा सकता है। तो वह यानी भारतीय जनता पार्टी ऐसे उम्मीदवारों को बेशक अपने यहां स्वागत करेगी।
        अब एक ऐसी पार्टी जिसका चुनाव तंत्र बेहतरीन हो और एक ऐसा स्थानीय उम्मीदवार जो अपनी संपूर्ण क्षमता को प्रस्तुत करता हो ऐसे संबंधों को पराजित करना कठिन हो जाता है। चुनाव पूर्व जिन्होंने ऐसा नहीं किया तो चुनाव के बाद ऐसी स्थिति उत्पन्न होने की संभावना बनी रहती है। क्योंकि उसे महसूस होता है की हालात तेजी से बदल रहे हैं और निकट भविष्य में बदल जाएंगे। लेकिन इस दलील के विपरीत भी तर्क हैं । उदाहरण के लिए  देखा जा सकता है कि इन दिनों भाजपा में वह लोग भी जाने को तैयार हैं जिन्होंने कभी उसे चुनौती दी थी इसका मतलब है की हमारी राजनीतिक व्यवस्था का बहुत बड़ा भाग हमेशा एकदम से दूसरे दल के बीच झूलता रहता है और उसे रोका नहीं जा सकता। आज जो एक पार्टी से दूसरे पार्टी के बीच भगदड़ मची है उसके पीछे मुख्यतः यही कारण है और इन कारणों को खत्म नहीं किया जा सकता।

Friday, July 12, 2019

कर्नाटक के नाटक का नया सीन

कर्नाटक के नाटक का नया सीन

कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के बागी विधायकों के इस्तीफे के बाद कई घटनाएं हुई और अब एक नया सीन सामने आया है।  बागी विधायकों ने इस्तीफा नहीं स्वीकार होने की सूरत में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था । क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार ने कई विधायकों के इस्तीफे को अस्वीकार कर दिया था उनका कहना था इस्तीफा में तकनीकी गलती है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। इस बीच कर्नाटक के मुख्यमंत्री  कुमार स्वामी ने सदन में अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष से अनुमति मांगी है तथा समय भी। कर्नाटक राजनीतिक नाटक क्लाइमेक्स उस समय आ गया था जब 16 विधायकों ने इस्तीफे दे दिए थे। सरकार अल्पमत में आ गई थी और नई सरकार बनाने के लोभ में भारतीय जनता पार्टी के बी एस येदुरप्पा दनादन मीटिंग कर रहे थे। पिछले हफ्ते से बागी विधायकों को मनाने की लगातार कोशिश चल रही है। गठबंधन सरकार के संकटमोचक शिव कुमार इसी प्रयास में मुंबई भी गए थे लेकिन वहां होटल में ठहरे बागियों से उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। सुरक्षा कारणों से पुलिस ने इसकी इजाजत नहीं दी। बागी विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली और सुप्रीम कोर्ट में रात तक फैसला लेने का निर्देश दिया। लेकिन विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार में भावपूर्ण बयान देकर सबका मुंह बंद कर दिया। उन्होंने कहा कि वह विलंब इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वेबसाइट के राज्य से प्रेम है। दूसरी तरफ, केंद्रीय मंत्री राज जोशी ने कर्नाटक की राजनीतिक अस्थिरता पर कहा है कि इस पर जल्दी से जल्दी फैसला लिया जाना जरूरी है। सभी विधायकों ने इस्तीफे सौंप दिए है। कर्नाटक में विधान सभा का अधिवेशन आरंभ हो गया है और किसी भी गड़बड़ी को संभालने के लिए कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता कर्नाटक में उपस्थित हैं। कांग्रेस ने अपने सभी विधायकों को इस अधिवेशन में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है गैरहाजिर विधायकों पर दल बदल कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी।
         दूसरी तरफ शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई तथा न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता एवं न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस ने कहा कि इस पूरे मामले से संविधान की धारा 190 और 361 भी जुड़ी हुई है। जहां धारा 190 विधायक के अयोग्य ठहराने से संबद्ध वहीं धारा 361 के मुताबिक कुछ खास पदों पर आसीन लोग अदालत के जवाबदेह नहीं होते, इससे संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विधानसभा अध्यक्ष विधायकों के इस्तीफे  के
सम्बद्ध में  विचार करेंगे । जैसे-जैसे समय बीत रहा है कर्नाटक का नाटक और दिलचस्प होता जा रहा है।
लेकिन इस पूरे नाटक को यदि राजनीतिक मनोविज्ञान की निगाह से देखें ऐसा कोई आश्चर्य नहीं होता है। इसके तीन कारण हैं। पहला जब पार्टी डूबती है तो उसके आम कैडर और कार्यकर्ता दूसरे दल में शामिल हो जाते हैं। कर्नाटक में भी जो हुआ कांग्रेस की भारी पराजय के कारण होता हुआ दिख रहा है। क्योंकि ,भविष्य के नेतृत्व के बारे में उन्हें कोई संभावना नहीं दिख रही है। दूसरा कारण हो सकता है कि, राजनीतिक पार्टियां ज्यादा से ज्यादा  कार्यकर्ताओं को अपने दल में शामिल करने की कोशिश में रहती हैं और ऐसे में दूसरे दलों के लोगों को शामिल किया जाना या उन्हें शामिल होने के लिए लोभ देना कोई आश्चर्यजनक नहीं है। इन दिनों राजनीतिक कार्यकर्ता किसी भी पार्टी से आदर्श के रूप में नहीं जुड़े हैं और ना जुड़े रहते हैं उन्हें अवसर की खोज रहती है। तीसरा कारण इस खास समीकरण के लिए है । इससे पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी कितनी तेजी से अपने साथ दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं को मिला रही है। वह राज्य में स्थाई प्रचार न चलाकर कर दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं को शामिल करने ने विश्वास करने लगी है। इस नई स्थिति से हम भारतीय जनता पार्टी के संगठन एक और आर्थिक वर्चस्व का अंदाजा लगा सकते हैं।

Wednesday, July 10, 2019

कर्नाटक का सियासी नाटक

कर्नाटक का सियासी नाटक

कर्नाटक के सियासी नाटक में अब नया मोड़ आ रहा है। इस्तीफा देने वाले 13 विधायकों के इस्तीफों में से 8 विधायकों के इस्तीफे कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष के आर रमेश कुमार ने तकनीकी कारणों से नामंजूर कर दिया। अब वे दोनों दलों के विधायकों से 12, 15 तथा 21 जुलाई को मुलाकात करेंगे। इस्तीफा देने वाले 13 विधायकों में से 10 विधायक कांग्रेस के हैं और 3 जनता दल सेकुलर के । विधानसभा अध्यक्ष के इस कदम से दोनों दलों ,कांग्रेस तथा जनता दल सेकुलर, को गठबंधन बचाने के लिए थोड़ा समय मिल गया । अगर उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया होता तो 224 सदस्यों वाली विधानसभा में गठबंधन की स्थिति घटकर 103 हो गई होती। विधानसभा अध्यक्ष का यह नया निर्णय संभवतः भाजपा को रोकने की गरज से किया गया है। क्योंकि सदन में भाजपा के  105 विधायक हैं और दो निर्दलीय विधायकों का समर्थन उसे प्राप्त है। विधान सभा की बैठक 12 जुलाई को होगी। नई स्थिति से गठबंधन को बागी विधायकों को मनाने और संभवतः उन्हें मंत्रिमंडल में जगह देने के लिए अवसर प्राप्त हो गया। लेकिन इसमें एक बात और दिखाई पड़ रही है कि यदि वर्तमान सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया और उस पर मतदान हुआ तो ये बागी विधायक अगर उस मतदान से अनुपस्थित हो जाते हैं तो सरकार नहीं बच पाएगी। इसलिए फिलहाल अध्यक्ष का इस्तीफा स्वीकार करना केवल कुछ समय देने  के सिवा कुछ नहीं है।
सोमवार को तो कर्नाटक का यह सियासी नाटक लगा कि क्लाइमेक्स पर पहुंच गया है। क्योंकि पूरे मंत्रिमंडल में इस्तीफा दे दिया था ताकि मंत्री परिषद मे फेरबदल कर बागी विधायकों को अवसर देने का मौका मिल सके।
         इस बीच खबर है कि कांग्रेस के नेता तथा जल संसाधन मंत्री डी के शिवकुमार बागी विधायकों को समझाने- बुझाने के लिए मुंबई जाने वाले हैं। क्योंकि  सब मुंबई के किसी होटल में ठहरे हुए हैं । उधर कांग्रेस के बागी विधायक बी सी पाटील का कहना है कि नहीं मंत्री पद नहीं इस्तीफे दिए गए हैं। वे मुख्यमंत्री एचडी कुमार स्वामी को पद से हटाना चाहते हैं। क्योंकि, उत्तर कर्नाटक ने कोई काम ही नहीं हुआ है। पाटिल का कहना है कि भाजपा ने अभी तक कोई भी पेशकश नहीं की है और इस संबंध में सारे दावे गलत हैं। उन्होंने कहा कि 2018 में जरूर पैसे और मंत्री पद का लोभ दिया गया था लेकिन उन्होंने स्वीकार नहीं किया।
         कर्नाटक के सियासी नाटक का असर दिल्ली में भी हुआ है । कांग्रेस ने लोकसभा में वॉकआउट आउट किया है। इस  वॉकआउट में राहुल और सोनिया गांधी भी शामिल थे। ऐसा बहुत कम हुआ है कि राहुल गांधी ने नारेबाजी भी की । वैसे, लगता नहीं है कि सरकार गिर जाएगी। क्योंकि सभी विधायकों के मन में एक भय तो है कि अगर सरकार गिरती है तो नए चुनाव होंगे और कोई भी विधायक इतनी जल्दी नया चुनाव नहीं करना चाहता। भले ही हो बीजेपी का ही विधायक क्यों न हो।  वैसे भी सब जानते हैं की अगर चुनाव होते हैं तो भाजपा को ही लाभ होगा और भाजपा के खेमे में येदुरप्पा के पक्ष में कोई खास हवा नहीं है। क्योंकि वहां भाजपा अपना नेतृत्व करना चाहती है और येदुरप्पा की जगह दूसरा नेता लाना चाहती है। इसके साथ ही यह भी सही है कि कांग्रेस के बहुत से लोग खासकर सिद्धारमैया वगैरह मुख्यमंत्री से बिल्कुल खुश नहीं हैं। वैसे भी एक गठबंधन की सरकार तभी चलती है जब उसका नेतृत्व किसी राष्ट्रीय पार्टी द्वारा किया जाता है। फिलहाल कांग्रेस सिमट गई है और जनता दल सेकुलर की वैसे भी कोई पकड़ नहीं है । राष्ट्रीय पार्टी गठबंधन को बांधे रखने का काम करती है । क्योंकि छोटी- छोटी पार्टियां गठबंधन में तो सिर्फ इसलिए शामिल होती हैं कि  उन्हें सत्ता का सुख प्राप्त हो सके।  फिलहाल ऐसा दिख नहीं रहा है। इसलिए संभवतः सरकार गिर जाएगी और तब भाजपा सरकार बनाने के लिए सामने आएगी।

Tuesday, July 9, 2019

कर्नाटक का गहराता संकट

कर्नाटक का गहराता संकट

कर्नाटक में राजनीतिक संकट गहराता जा रहा है। वहां कांग्रेस और जनता दल सेकुलर की मिली जुली सरकार के सभी मंत्रियों ने इस्तीफे दे दिए हैं ताकि मंत्रिपरिषद का पुनर्गठन किया जा सके और नाराज विधायकों को उसमें शामिल किया जा सके, जिससे लड़खड़ाता  हुआ गठबंधन फिर से खड़ा हो सके। कर्नाटक में दो निर्दलीय विधायक एच नागेश और एच शंकर को गत 14 जून को सरकार में शामिल किया गया था ताकि आंकड़ों खेल का समायोजन हो सके। पिछले शनिवार को कर्नाटक में गठबंधन सरकार के  13 विधायकों ने इस्तीफे दे दिए थे और उसके बाद वहां 224 सदस्य वाली विधानसभा में कांग्रेस विधायकों की संख्या घटकर 104 हो गई। जिसमें कांग्रेस के 69 और जनता दल सेकुलर के 34 सदस्य हैं तथा एक बसपा का विधायक है। जबकि ,भाजपा के कुल विधायकों की संख्या 107 है जिनमें भाजपा के 25 और निर्दलीय दो हैं । कांग्रेस नेताओं ने गठबंधन को कायम रखने का विश्वास जाहिर किया है ।साथ ही उन्होंने इन सारी गड़बड़ियों के लिए भाजपा को दोषी बताया है और कहा है यह भाजपा विधायकों को मंत्री पद और पैसे का लोभ देकर यह सब करा रही है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव के सी वेणुगोपाल में कहा है कि "कुछ विधायकों की शिकायतें हो सकती हैं और कुछ तो मंत्रिमंडल के विस्तार की बात कर रहे हैं और पार्टी के व्यापक हित में  सभी मंत्रियों ने इस्तीफे दिए हैं। उन्होंने कहा कि जिन विधायकों ने इस्तीफे दिए हैं वह वापस चले आएं और पार्टी को मजबूत बनाएं । हम समझते हैं कि वे जरूर आएंगे और सरकार कायम रहेगी।" इसके साथ ही उन्होंने कहा कि "  सरकार को गिराने का भाजपा का 1 साल में यह छठा प्रयास है।"
          उधर कर्नाटक के भाजपा नेताओं के अनुसार अगले 2 दिनों में और विधायक इस्तीफे दे सकते हैं।  अगर ऐसा होता है तो विधानसभा अध्यक्ष के आर रमेश पर 13 विधायकों के इस्तीफे स्वीकार करने की दबाव बढ़ेगा । सोमवार की सुबह निर्दलीय विधायक एच नागेश इस्तीफे के बाद गठबंधन की सरकार को बचाने के लिए जो भी खिड़की खुली थी वह बंद होती नजर आ रही है । जिस जल्दबाजी में नागेश को बंगलुरु से मुंबई ले जाया गया उससे तो लगता है कि भाजपा तख्ता पलटने की तैयारी में है। कुछ विश्लेषक यह भी कहते सुने जा रहे हैं कि अगर वहां सरकार नहीं बनती है तो चुनाव हो सकते हैं। लेकिन यह सहज बुद्धि का सवाल है कि कोई भी विधायक इतनी जल्दी चुनाव नहीं चाहता।  चूंकि  , भाजपा के बारे में इन दिनों कहा जा रहा है कि वह स्थाई सरकार दे सकती है इसलिए गठबंधन से असंतुष्ट विधायक निकलना चाहते हैं ।
    अब जैसी की भाजपा की योजना है कि बुधवार तक स्पीकर अगर 13 विधायकों के इस्तीफे मंजूर नहीं करेंगे तो अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी शुरू होगी। इसके लिए 12 दिन का नोटिस देना होता है और इस बीच दलबदल की शतरंज शुरू होने की उम्मीद है। भाजपा को महसूस हो रहा है कि अगर दल बदल का खेल लंबा चले तो उसे फायदा होगा। फिलहाल अगर विधानसभा अध्यक्ष 13 विधायकों के इस्तीफे मंजूर कर लेते हैं तो वहां की 224 सदस्यों वाली विधानसभा की वास्तविक संख्या 211 हो जाएगी और  ऐसी स्थिति में सरकार बनाने के लिए महज 107 विधायकों की जरूरत है। जबकि भाजपा के कुल विधायकों की संख्या 105 है यानी बहुमत से केवल दो विधायक कम। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए अपनी सरकार को बचाना टेढ़ी खीर हो जाएगा।
            ताजा स्थिति में कुमार स्वामी सरकार के पास केवल दो विकल्प बचे हैं। पहला कि मुख्यमंत्री इस्तीफा दे दें और असंतुष्ट विधायकों के प्रतिनिधि को सत्ता सौंप दें। लेकिन यह आसान नहीं है। इसमें मनोवैज्ञानिक अवरोध बड़ा गंभीर है। देवगौड़ा परिवार को यह त्याग शायद मंजूर नहीं होगा। दूसरा विकल्प है कि विधान सभा का अधिवेशन फिलहाल टाल दिया जाए। लेकिन इसके लिए राज्यपाल की सहमति जरूरी है और राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि होता है। वैसी सूरत में ऐसा होता दिखना शायद बड़ा कठिन है। कांग्रेस  अपने असंतुष्ट विधायकों को मनाने की गरज से सभी मंत्रियों से इस्तीफे ले लिए हैं और सुना जा रहा है की असंतुष्ट विधायकों को मंत्री पद का ऑफर मिला है। अब इस पर भी अगर वह नहीं मानते तो बस उन पर कार्रवाई हो सकती है।
             दूसरी तरफ कर्नाटक में जो भी हो रहा है वह अप्रत्याशित नहीं है और वैसी सूरत में तो बिल्कुल नहीं है जब 23 मई 2018 यह सरकार गठित हुई तभी से  महसूस होता था  यह होगा। भाजपा की शानदार वापसी के बाद तो यह और भी संभव लगने लगा है।

Monday, July 8, 2019

तपती धरती बढ़ता संकट

तपती धरती बढ़ता संकट

धरती लगातार तप रही है और पानी का जमीनी स्तर तेजी से घट रहा है लिहाजा खेती और अन्य चीजें प्रभावित हो रही हैं। अभी हाल में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारत में अगले 10 वर्षों में काम के घंटों में 5.8% की कमी आएगी जोकि 3.4 करोड़ नौकरियों के खोने के बराबर है।  इसका सबसे ज्यादा प्रभाव कृषि और भवन निर्माण पर पड़ेगा। विशेषज्ञ बताते हैं कि इसका मुख्य कारण यह है की गर्मी के कारण दिमाग कम काम करता है और आपसी झगड़े ज्यादा बढ़ जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण पूरी पृथ्वी गर्म हो जाएगी और इसका असर काम पर भी पड़ेगा। रपट के अनुसार 21वीं सदी के अंत तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा इसका प्रभाव काम के घंटों पर भी पड़ेगा।
          डर है कि सदी के अंत तक आधी दुनिया में हर साल तापमान के रिकॉर्ड टूट जाएंगे और ऐसा होता हुआ दुनिया के कई देशों में दिखाई भी पड़ रहा है। कुवैत और सऊदी अरब का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। हाल में मिली रिपोर्ट के अनुसार कुवैत का तापमान 52 डिग्री सेंटीग्रेड और सऊदी अरब का तापमान 63 डिग्री तक पहुंच गया था। दूसरी तरफ पाया गया है कि कनाडा के उत्तरी हिस्से में जमी बर्फ पिघलने लगी है। जबकि अनुमान लगाया गया था यह बर्फ 70 साल बाद पिघलेगी। बर्फ का पिघलना एक बहुत बड़े संकट की ओर इशारा कर रहा है। क्योंकि इस बर्फ के पिघलने से कई हजार टन ग्रीन हाउस गैस रिलीज होगी और इससे धरती का तापमान और तेजी से बढ़ेगा। जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है की तापमान बढ़ने से काम के घंटे कम होने लगेंगे। उससे भी कहीं खतरनाक संकेत यह मिल रहे हैं कि भारत में बड़ी आबादी मानसून पर निर्भर करती है यानी खेती बारी और सी फूड के कारोबार पर करोड़ों परिवार निर्भर हैं।  ग्लोबल वार्मिंग की वजह से  इस कारोबार पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय के ग्लेशियर दुगनी रफ़्तार से पिघल रहे हैं । इधर वैज्ञानिकों को डर है कि मानसून की कमी से भूजल स्तर में भारी गिरावट आ सकती है। नीति आयोग की हाल की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 21 बड़े शहरों में भूजल खत्म हो जाएगा। भूजल की कमी के कारण तरह-तरह की बीमारियां हो रही हैं  सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग दो लाख लोग हर साल केवल इसलिए मर जाते हैं कि उन्हें पीने का पानी नहीं मिलता है या साफ  पानी नहीं मिलता है। आबादी तेजी से बढ़ रही है और उसी के अनुसार पानी की मांग भी बढ़ रही है । 2019 का चुनाव जीतने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगले 5 साल में वे देश के सारे घरों में पीने का पानी पहुंचा देंगे लेकिन जो हाहाकार मचा है उससे तो नहीं लगता है कि यह लक्ष्य आसान होगा।
        बात केवल पीने की पानी तक रहे तब भी कुछ गनीमत है लेकिन मानसून की कमी के कारण खरीफ फसलों की बुवाई भी घटती जा रही है। अभी तक जो बुवाई की खबर मिली है उसके अनुसार पिछले साल से इस बार 27% कम बुवाई हो सकी है। इस तरह के हालात से अभी से ही रोजगार और जीविका के उपार्जन के साधन तेजी से घटने लगे हैं और लोग अपना घर बार छोड़कर दूसरे इलाकों में जाने लगे हैं। पहले यह जाना अस्थाई था लेकिन अब यह स्थाई होता हुआ महसूस हो रहा है। हर साल विस्थापित होने की प्रक्रिया में तेजी आ रही है। वैश्विक स्तर पर शरणार्थियों पर काम करने वाली संस्था नार्वेजियन रिफ्यूजी काउंसिल के इंटरनल डिस्प्लेसमेंट मॉनिटरिंग सेंटर के अध्ययन में पाया गया है कि 2018 में दुनिया में 4.13 करोड़ लोगों को अपने ही देश में इधर से उधर जाकर बसना पड़ा इनमें से 1. 72 करोड़ लोग केवल मौसम संबंधी आपदाओं के कारण अपना बसा बसाया घर छोड़ कर चले गए। इनमें 94% लोगों को चक्रवात और सूखे के कारण इस विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा। एशियाई देशों को खासकर भारत ,चीन और फिलीपींस को इस दर्द का सबसे ज्यादा शिकार होना पड़ा है। इन देशों में विस्थापित होने वालों की संख्या एक करोड़ से ज्यादा है। अगर रिपोर्ट को माने तो गत वर्ष केवल भारत में ही 26.8 लाख लोग प्राकृतिक आपदाओं की वजह से विस्थापित हुए। यह संख्या 2017 से दोगुनी है। केवल तमिल नाडु, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में आए चक्रवाती तूफानों से 6.5 लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा था। उड़ीसा में हाल में आए फनी नामक चक्रवाती तूफान से लगभग एक करोड़ लोग प्रभावित हुए थे, जिससे पांच लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा था और इससे कुल 12हजार करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ था। कहीं बारिश से और कहीं सूखे से अपना घर बार छोड़कर लोग जा रहे हैं जिंदगियां प्रभावित हो रही हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन बहुत तेजी से हो रहे हैं और जिसके चलते प्राकृतिक आपदाएं की बढ़ रही हैं। अब अगर दुनिया नहीं चेती खास करके भारत में इसका कोई निदान नहीं खोजा गया तो बहुत बड़े संकट का मुकाबला करना होगा।

Sunday, July 7, 2019

कर्नाटक के राजनीतिक संकट का अर्थ

कर्नाटक के राजनीतिक संकट का अर्थ

कर्नाटक में जेडीएस और कांग्रेस की गठबंधन की सरकार है लेकिन पिछले 2 दिनों से इसमें संकट पैदा हो गया है। गठबंधन  लगता है खुलने वाला है । क्योंकि इसके 11 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है और जानकारों का कहना है कि 4 दिन के बाद विधानसभा सत्र के दौरान कुमार स्वामी सरकार के सामने  भाजपा विश्वास मत हासिल करने का प्रस्ताव रख सकती है । कर्नाटक में  भाजपा के नेता  सदानंद गौड़ा  ने कहा है  कि अगर राज्यपाल  उन्हें बुलाया  तो  भाजपा वहां सरकार बनाने के लिए तैयार है।  कर्नाटक में भाजपा के  105 विधायक हैं । उन्होंने यह भी कह दिया है कि अगर   वहां भाजपा सरकार बनाती है  तो  बीएस येदुरप्पा  मुख्यमंत्री बनेंगे ।
दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहां है मोदी देश में खरीद-फरोख्त की राजनीति कर रहे हैं उन्होंने कहा कि यह बहुत निराशाजनक है। पैसे और पद के प्रलोभन के जरिए भाजपा एक चुनी हुई सरकार को गिराने की कोशिश कर रही है और यह लोकतंत्र को कलंकित किया जाना है ।224 सीटों वाली कर्नाटक विधानसभा में बहुमत के लिए 113 विधायकों की जरूरत होगी।   कांग्रेस के एक विधायक आनंद सिंह ने 1 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दिया था। अगर उनके साथ 11 और विधायकों का इस्तीफा मंजूर हो जाता है तो सदन में सदस्यों की कुल संख्या 212 रह जाती है और बहुमत के लिए 107 लोगों की भी जरूरत पड़ेगी। अगर ऐसा होता भी है तो इसके बाद भी कांग्रेस जेडीएस गठबंधन के पास बसपा के एक और निर्दलीय दो विधायकों के समर्थन की बदौलत उनकी संख्या बहुमत के आंकड़े से ज्यादा है। लेकिन निर्दलीय विधायक नागेश पलड़ा बदलने में माहिर है और अगर वह पलड़ा बदल देते हैं तो वहां बीजेपी की सरकार भी बन सकती है।
कर्नाटक की स्थिति से एक सवाल पैदा होता है कि क्या देशभर में गठबंधन की सरकारों की हालत खराब है और सारे गठबंधनों  की सरकार खतरे में है। लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा एक ताकतवर पार्टी के रूप में उभरी है। यह उभार ठीक वैसा ही है जैसा 1971 में बांग्लादेश युद्ध के बाद इंदिरा गांधी का केंद्र में उभार हुआ था और उन्होंने सत्ता का एकीकरण कर दिया था। वर्तमान में मोदी ने जी सत्ता का एकीकरण कर दिया है। लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद सत्ता में आई इंदिरा गांधी को लोग गूंगी गुड़िया कहते थे और कांग्रेस पार्टी की हालत बहुत खराब थी। ऐसे में 1967 में भारत में गठबंधन की राजनीति का श्रीगणेश हुआ और संयुक्त विधायक दल सरकार का उदय हुआ। जो भारतीय क्रांति दल, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय जनसंघ के गठबंधन से बना था। आगे चलकर यही गठबंधन भारतीय जनता पार्टी में बदल गया। इसके  बाद 1971 का वक्त आया और इंदिरा जी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए और उसी के साथ और सत्ता पर काबिज हो गईं। साथ ही अलग-अलग राज्यों में गठबंधनों की सरकारों का दौर खत्म हो गया। संयुक्त विधायक दल की  सरकारें गिर गईं। केरल को छोड़कर पश्चिम बंगाल में हाल तक वामपंथ की स्थिति मजबूत रही। इसके बाद गठबंधन की सरकारों का दूसरा चरण 1989 में आरंभ हुआ और इस बार गठबंधनों केंद्रीय सत्ता भी हासिल की । यह दौर नरेंद्र मोदी के 2014 में जीत तक कायम रहा।
      2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें हासिल हुईं थीं। लेकिन कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर वहां सरकार बना ली। यही सबसे बड़ी राजनीतिक भूल हुई कि कांग्रेस ने जेडीएस के एचडी कुमार स्वामी को मुख्यमंत्री का पद दे दिया। जबकि जेडीएस के पास कांग्रेस की आधी सीटें भी नहीं थी। यह एक बेमेल गठबंधन था। क्योंकि पिछले कई वर्षों से दक्षिण में जेडीएस और कांग्रेस आपस में भिड़ी हुई थी और यह बेमेल गठबंधन फकत साल भर में खतरे में आ गया। इसके लगभग एक दर्जन विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है और गायब  हो गए हैं । कहा जा रहा है कि उन्हें मुंबई के किसी होटल में ठहराया गया है। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि जिन विधायकों ने इस्तीफा दिया है उनमें अधिकांश सिद्धारमैया के विरोधी हैं संभवत उन्होंने   कुछ   हासिल करने के लिए, खासतौर पर मंत्री पद हासिल करने के लिए, दबाव डालने की गरज से ऐसा किया है।
कर्नाटक की ताजा स्थिति के बारे में दिल्ली में वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की बैठक हुई। इस बैठक में आनंद शर्मा ,गुलाम नबी आजाद, मोतीलाल वोरा, अहमद पटेल, मल्लिकार्जुन खड़गे ,ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितेंद्र सिंह , रणदीप सिंह सुरजेवाला तथा दीपेंद्र हुड्डा शामिल थे।
विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रक्रिया के पीछे भाजपा का ऑपरेशन कमल काम कर रहा है। इस्तीफा देकर आए सदस्यों को आने वाले दिनों में भाजपा से चुनाव लड़ने और चुने जाने का वादा किया गया है। ऐसा ही प्रयोग 2008 में भी हुआ था। ऐसी परिस्थिति में यह कहा जा सकता है कि पूरा देश एक पार्टी के शासन की ओर बढ़ रहा है । जनता ने  पूरे देश में  गठबंधनों को  नकार दिया है और संभवतः गठबंधनों का दौर खत्म होने जा रहा है। लोगों ने तय किया है कि एक पार्टी की सरकार बेहतर शासन दे सकती है । गठबंधन अपने आंतरिक खींचतान में ही लगा रहता है। लोकसभा के ताजा चुनाव के संदर्भ में देखा जाए तो लगता है कि देश की तमाम पार्टियां अपनी साख गंवा चुकी है और भाजपा से मुकाबले की क्षमता किसी में नहीं है।  कोई ऐसा नेता नहीं है जो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती दे सकें।

Friday, July 5, 2019

अर्थव्यवस्था और समाज को सही दिशा देने वाला बजट

अर्थव्यवस्था और समाज को सही दिशा देने वाला बजट

गरीबों किसानों और गांव को खुशहाल तथा जीवन को अधिक सरल बनाने के दर्शन के साथ नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे दौर का  पहला बजट बुधवार को संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पेश किया। उन्होंने बजट पेश किए जाने की प्रक्रिया में एक क्रांतिकारी परिवर्तन किया और लाल बैग और त्याग कर बजट भाषण कपड़े में बांधकर संसद में लाया गया। यह भी जानना दिलचस्प होगा कि निर्मला सीतारमण देश की पहली फुल टाइम महिला वित्त मंत्री हैं जिन्होंने 2019 का केंद्रीय बजट प्रस्तुत किया। प्रधानमंत्री   नरेंद्र मोदी ने बजट की प्रशंसा करते हुए देश को को संबोधित किया।
      2019 के बजट में अर्थव्यवस्था को गति देने का नजरिया है और इसी उद्देश्य के साथ मीडिया, विमानन ,बीमा और खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी  निवेश को उदार बनाने का प्रस्ताव किया गया है। बजट में ऐसा प्रस्ताव किया गया है की आम लोगों के दायरे में बीमा योजनाएं तथा पेंशन योजनायें आ जाएं । वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण के दौरान कहा कि चुनाव के दौरान देशभर में एक मजबूत भारत की लहर चली  थी और लोगों ने उसी उम्मीद से इस सरकार को चुना । क्योंकि इसने अपने पहले दौर में काम करके दिखाया है। मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में एक नए भारत के लिए काम शुरू किया था और अब इस काम की रफ्तार बढ़ाई जाएगी। अफसरशाही को कम किया जाएगा ताकि विकास में दिक्कत है ना आए। बजट में बैंक खाते से एक करोड़ से ज्यादा रुपया निकालने पर 2% की दर पर टीडीएस लगाए जाने का प्रस्ताव है। साथ ही पेट्रोल डीजल की कीमत 1 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दी गई और सोने पर ड्यूटी ढाई प्रतिशत बढ़ाई गई । बजट में प्रस्ताव है कि 45 लाख  के घर खरीदने पर साढे तीन लाख रुपया ब्याज में छूट दिया जाएगा। ज्यादा आय करने वालों  पर सरचार्ज लगाया जाएगा। बजट प्रस्ताव के अनुसार 5 करोड़ से ऊपर सालाना आय वालों पर 7% और 2 से 5 करोड़ की सालाना आय पर 3% और सर चार्ज लगेगा। लेकिन 5लाख रुपये से कम आमदनी वालों को इनकम टैक्स से निजात मिल गई। इसके साथ ही डेढ़ करोड़ से कम के सालाना कारोबार वाले तीन करोड़ खुदरा कारोबारियों एवं दुकानदारों को प्रधानमंत्री कर्मयोगी मानधन योजना के तहत पेंशन योजना का लाभ दिया जाएगा। असंगठित क्षेत्र में जिन मजदूरों ने इस योजना को अपनाया है उन्हें 60 साल की उम्र के बाद 3 हजार रुपये मासिक पेंशन दिया जाएगा। वित्त मंत्री के अनुसार असंगठित क्षेत्र में इस योजना को 30 लाख मजदूरों ने अपनाया है। वित्त मंत्री के अनुसार गत वर्ष 64.37 अरब डॉलर का एफडीआई आया जो उसके पूर्ववर्ती वर्ष से 6% ज्यादा है। वित्त मंत्री ने कहा वे इस लाभ को और बेहतर बनाने के लिए नए प्रस्ताव कर रहीं हैं जिससे भारत विदेशी निवेश  के लिए एक आकर्षक स्थान हो सकेगा। वित्त मंत्री ने आश्वासन दिया है कि किराए वाले मकानों को प्रोत्साहित करने के लिए कई सुधार किए जाएंगे। वर्तमान कानून बहुत पुराने हैं।  इसमें पट्टा देने वाले और पट्टा लेने वाले दोनों के संबंधों की समस्याओं का ढंग से निदान नहीं करता। वित्त मंत्री ने कहा कि श्रम कानूनों को भी सरल बनाया जाएगा। वित्त मंत्री ने भविष्य की योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि 2022 तक प्रत्येक गांव के हर परिवार में बिजली और स्वच्छ इंधन युक्त रसोई घर की सुविधा होगी। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत तीसरे चरण में एक लाख पच्चीस हजार किलोमीटर सड़कें बनाई जाएंगी जिस पर अस्सी हज़ार दो सौ पचास करोड़ रुपयों की लागत आएगी । प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत 2019 से 2022 तक जो इसके लायक होंगे वैसे लोगों को 1.95  करोड़ मकान मुहैया कराए जाएंगे। इनमें बिजली, रसोई गैस और शौचालय की सुविधा होगी।
          प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजट की तारीफ की और कहा कि बजट लोगों को यह विश्वास दे रहा है कि सही दिशा है, गति सही है इसलिए लक्ष्य पर पहुंचना भी सही है। यह बजट 21वीं सदी के भारत का सपना पूरा करने वाला है। उन्होंने कहा कि इस बजट से 5 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था को पूरा करने की दिशा में सहायता मिलेगी।
        गृहमंत्री अमित शाह ने बजट को समावेशी बताया है और कहा है कि इस ने किसानों, नौजवानों , महिलाओं तथा गरीबों के सपनों को पंख दिए हैं। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने भी बजट की तारीफ की है और कहा है कि इस बजट में आधारभूत ढांचे को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी गई है।
         जबकि कांग्रेस ने इस बजट को निराशाजनक बताया है। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि बजट में गांव, गरीब और किसानों को हाशिए पर डाल दिया गया है। उन्होंने कहा कि क्या थोथे शब्दों से किसी समस्या के हल होगी?
        वैसे कुल मिलाकर बजट भारतीय समाज एवं अर्थव्यवस्था को एक  विशेष दिशा देने वाला कहा जाएगा।