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Friday, August 9, 2019

मोदी जी ने बताया, 370 क्यों हटाया

मोदी जी ने बताया, 370 क्यों हटाया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के बाद गुरुवार की रात राष्ट्र को संबोधित किया। स्वाधीनता दिवस समारोह में प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र को संबोधित किए जाने के हफ्ते भर पहले राष्ट्र को संबोधन की सूचना चौंकाने वाली थी । लेकिन प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में जो कुछ कहा वह देश की 130 करोड़ जनता के विभ्रम को मिटाने वाला था। प्रधानमंत्री ने कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के संबंध में देश के सामने सरकार का पक्ष रखा। प्रधानमंत्री ने बताया कि इस धारा के लागू रहने की वजह से कश्मीर और लद्दाख के लोगों काफी नुकसान हो रहा था और कहीं भी इस नुकसान की चर्चा नहीं थी। उन्होंने पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए कहा कि वह इसका उपयोग लोगों की भावनाओं भड़काने में करता था। प्रधानमंत्री ने कहा कि आर्टिकल 370 ने जम्मू कश्मीर को आतंकवाद, अलगाववाद ,परिवारवाद और भ्रष्टाचार के अलावा कुछ नहीं दिया। पाकिस्तान ने इसका लाभ उठाया और इसके कारण 42 हजार निर्दोष लोग जान से हाथ धो बैठे । विकास का जो आश्वासन था वह पूरा नहीं हुआ । संसद में जो कानून बनता था वह देश के एक हिस्से में लागू नहीं हो पाता था और जम्मू कश्मीर के डेढ़ करोड़ लोग उसके लाभ से वंचित रह जाते थे। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया की देश में बच्चों को शिक्षा का अधिकार है लेकिन जम्मू-कश्मीर में नहीं। देश में जो बेटियों को अधिकार है वह इस राज्य में नहीं मिलते। देश में सफाई कर्मचारी कानून लागू है लेकिन जम्मू कश्मीर के कर्मचारी वंचित थे। देश में दलित समुदाय पर जुल्म रोकने के लिए कानून थे लेकिन कश्मीर में नहीं। ऐसे कई और कानून हैं जिसका लाभ कश्मीरियों को नहीं मिलता था। इतना ही नहीं लाखों ऐसे लोग थे जो बंटवारे के वक्त  पाकिस्तान से आए थे  इसलिए विधानसभा तथा लोकल चुनाव नहीं लड़ पाते थे और ना उस चुनाव में वोट दे पाते थे कश्मीर में अब ऐसा नहीं होगा।
      हालांकि प्रधानमंत्री की धारा 370 हटाए जाने की घोषणा  अचानक नहीं थी। उन्होंने अपने पिछले 5 साल के विभिन्न भाषाओं में इसकी तरफ प्रचुर इशारा किया था।  पिछले दौर के शासन के  दौरान अंतिम बार 14 अप्रैल 2019 कठुआ में अपने चुनावी भाषण में कहा था कांग्रेस पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस का गठबंधन अवसरवादी है और ये पावर के भूखे हैं । उसके पहले उन्होंने कहा था कि इस धारा की वजह से जम्मू कश्मीर में विकास नहीं हो पा रहा है । पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की यह नीतियां थी जिसके कारण घाटी में विकास बाधित है।
प्रधानमंत्री ने कश्मीर के लोगों को मुतमईन किया हे ईद के दिन किसी भी तरह की कोई दिक्कत नहीं होगी। सरकार इस बात का ख्याल रख रही है। जो लोग अपने घर से दूर है उन्हें कश्मीर में  अपने घर पहुंचाने के लिए सरकार हर मुमकिन कोशिश करेगी।
        प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि हालात सुधरने के बाद कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस कर दिया जाएगा लेकिन लद्दाख केंद्र शासित राज्य ही रहेगा। पीएम ने कहा कि जम्मू कश्मीर में अलगाववाद नहीं रहेगा और धरती का स्वर्ग विकास की नई ऊंचाइयों को जबर स्पर्श करने लगेगा तो पूरी दुनिया उसकी ओर आकर्षित होगी। नागरिकों को उनके हक मिलने लग जाएंगे। प्रशासन और शासन दोनों यहां की जनता के लिए होंगे और इनका भी उद्देश्य जनहित होगा। लोगों की जिंदगी आसान हो जाएगी
प्रधानमंत्री ने कहा की कश्मीर के कर्मचारियों को और जम्मू कश्मीर पुलिस को अन्य केंद्र शासित प्रदेश के कर्मचारियों तथा पुलिस के बराबर   सहूलियतें  मुहैया कराई जाएंगी। उन्होंने कहा कि फिलहाल अन्य केंद्रशासित प्रदेशों में एलटीसी, हाउस रेंट एलाउंस ,हेल्थ स्कीम जैसी कई वित्तीय सुविधाएं कर्मचारियों को दी जाती हैं। जबकि जम्मू कश्मीर के कर्मचारियों और पुलिसकर्मियों को यह सुविधाएं नहीं मिलती। इन सुविधाओं  की सरकार तत्काल समीक्षा करेगी और जल्द ही लागू करेगी। इतना ही नहीं, उन्होंने कहा कि राज्य में और लद्दाख में जो सरकारी पद चाहे वह केंद्र के हों या राज्य के उन्हें भरने की प्रक्रिया आरंभ की जाएगी। नौजवानों को रोजगार के अवसर  उपलब्ध कराए जाएंगे। इतना ही नहीं जो केंद्र  द्वारा संचालित सार्वजनिक तो था निजी कंपनियां है उन्हें भी प्रोत्साहित किया जाएगा वे शीघ्र रोजगार उपलब्ध कराएं।
       प्रधानमंत्री ने लोगों को भरोसा दिलाया की उन्हें संपूर्ण पारदर्शी वातावरण और ईमानदारी के साथ अपने प्रतिनिधि चुनने का मौका दिया जाएगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि सबकी इच्छा है कि भविष्य में जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनाव हों, नई सरकार बने, नौजवान विधायक बने, मंत्री बनें और मुख्यमंत्री बनें। प्रधानमंत्री ने बड़े भावुक अंदाज में कहा कि अब कश्मीर के नौजवान यहां के विकास में नेतृत्व करेंगे और राज्य को नई ऊंचाइयों तक ले जायेंगे। यहां के नौजवान तथा बहन -बेटियां अपने क्षेत्र के विकास की कमान संभालेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि नई व्यवस्था के तहत जब इन पंचायत सदस्यों को काम करने का मौका मिलेगा तो कमाल हो जाएगा। जम्मू कश्मीर की जनता अलगाववाद को पराजित कर नई आशाओं के साथ आगे बढ़ेगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि हालात सुधरने के बाद जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान कर दिया जाएगा  लेकिन लद्दाख  केंद्र शासित राज्य बना रहेगा। लद्दाख का विकास केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। लद्दाख के नौजवानों इनोवेटिव स्किल को बढ़ावा मिलेगा। उन्हें बेहतर शिक्षा के लिए संस्थान हासिल होंगे। वहां की जनता को अस्पताल मिलेंगे। लद्दाख में तेजी से आधुनिकीकरण होगा। प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा इससे साफ जाहिर होता है उन्होंने राष्ट्र को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि जो कुछ किया गया वह कश्मीर की जनता  के लिए ही किया गया और बंटवारे के बाद के जम्मू कश्मीर के आईने में प्रधानमंत्री की बात  विश्वसनीय प्रतीत होती है। इसके बावजूद सरकार को एतिहात के लिए कुछ कदम उठाने की जरूरत थी।

Thursday, August 8, 2019

पाक अपना सोचे, भारत का वह कुछ नहीं बिगाड़ सकता

पाक अपना सोचे, भारत का वह कुछ नहीं बिगाड़ सकता

आने वाले बृहस्पतिवार को स्वाधीनता दिवस है भारत के लिए एक  विशिष्ट दिवस खासकर इस वर्ष का यह दिवस ऐतिहासिक होगा, क्योंकि इस बार कश्मीर का वह घाव जो 70 वर्षों से रिस रहा था उसे खत्म कर दिया गया। बेशक इस ऑपरेशन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद शुरू हो गए हैं । एक तरफ जहां संयुक्त अरब अमीरात ने भारत के इस कदम का समर्थन किया है वहीं अमरीका ने कहा है कि भारत ने इसकी जानकारी से पहले नहीं दी थी । पाकिस्तान ने तो इसे गाजा पट्टी की संज्ञा दी है और भारत के इस फैसले से बेहद नाराज हो गया है। नाराजगी यहां तक बढ़ गई है कि पाकिस्तान भारत के साथ अपने विपक्षी व्यापारिक रिश्ते को तोड़ दिया है और राजनयिक संबंध हो सीमित कर दिया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की अध्यक्षता में हुई पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति एक बैठक में यह फैसले लिए गए। इस बैठक में विदेश मंत्री ,गृहमंत्री सहित सेना और खुफिया एजेंसियों अफसर भी शामिल थे। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने बयान दिया है कि दिल्ली से वे अपने उच्चायुक्त जल्द बुला लेंगे साथ ही भारतीय उच्चायुक्त  यहां से वापस भेज दिए जाएंगे। यही नहीं, पाकिस्तान अपने स्वाधीनता दिवस 14 अगस्त को कश्मीरियों के साथ एकजुटता दिवस के रूप में उमंग आएगा और भारत के स्वाधीनता दिवस 15 अगस्त को काला दिवस के रूप में मनाएगा। इसी के साथ प्रधानमंत्री इमरान खान ने यह भी कहा है कि पाकिस्तान कश्मीर में मानवाधिकार का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं करेगा और इसे रोकने के लिए भारत के खिलाफ सभी कूटनीतिक उपायों को इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया है। यहां तक कि फौज को भी अलर्ट कर दिया गया है।
       पाकिस्तान ने यह जो राजनयिक संबंध सीमित किया है यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा पहले भी हो चुका है। भारत की संसद पर हमले के बाद जब पता चला  कि हमला जैश ए मोहम्मद की करतूत है तो भारत ने भी पाकिस्तान से अपने उच्चायुक्त बुला लिए थे। पाकिस्तान ने भी ऐसा ही किया था। लेकिन संबंध तो रखने ही होते हैं। आर्थिक कंगाली की ओर बढ़ रहे पाकिस्तान को अपने देश की जनता का ध्यान हटाने के लिए यह एक विकल्प मिला है। वह राष्ट्र संघ में जाना चाहता है वह जाएगा ,पहले भी जा चुका है।  होगा क्या ? 
पाकिस्तान द्वारा द्विपक्षीय संबंध खत्म करने के साथ  ही व्यापारिक संबंध भी है खत्म कर दिए जाने से भारत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत के साथ पाकिस्तान का लगभग 2 अरब डालर का कारोबार था। यह बढ़कर 2.5 अरब डालर हो गया था । पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान ने सभी प्रकार के निर्यात पर 200% की ड्यूटी लगा दी थी जिससे व्यापार घट गया था। भारत पाकिस्तान को रसायन निर्यात करता था, बदले में पाकिस्तान भारत को वनस्पति तेल ,तेल और खनिज भेजता था। पाकिस्तान की इस कदम से भारत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला उल्टे पाकिस्तान इससे प्रभावित होगा।
पाकिस्तान की सबसे बड़ी ट्रेजडी  है की वहां के प्रधानमंत्री वहां की फौज के सहायक की भूमिका में हैं। जो सेना कहेगी वही करेंगे और मौजूदा हालात में फौज को यह एहसास हो चुका है कि ताकत से कुछ नहीं होने वाला। इसलिए वह इमरान खान को सामने रखकर उसी की आड़ में दुबकी हुई है। पाकिस्तान की मानवाधिकार मंत्री शिरीन मजारी ने कहा है  कि "कश्मीर में भारत जो कुछ कर रहा है वह किसी धूर्त सरकार के युद्ध अपराधों जैसा है। भारत  जो हिंसा कर रहा है वह खासतौर वह साफ तौर पर नस्लीय सफाया तथा नरसंहार है।" पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी सेनेटर राजा रब्बानी ने कहा है ,"कश्मीर अब इस उपमहाद्वीप का गाजा पट्टी बन जाएगा। अगर इसे व्यापक संदर्भ में देखें तो यह अमरीका इसराइल और भारत का एक गठजोड़ है। जिसे हम समझ नहीं पा रहे हैं । जरा पीछे जाकर देखें तो यह साफ दिखाई देगा कि अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप ने मध्यस्था की थी तो गोलन पहाड़ियों को इसराइल को दे दिया था।"  पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने कहा कि यह पूर्वी पाकिस्तान की ट्रेजडी की तरह है। वहीं मुस्लिम लीग के नेता ख्वाजा आसिफ ने इमरान खान को भी दोषी बताते हुए कहा कि "हमें इतिहास से सबक लेने के लिए  ना कहें ,यह भी न बताएं कि इतिहास में क्या हुआ हमें यह बताएं कि भविष्य में क्या होने वाला है।"
       पाकिस्तान ने भारत के लिए अपना हवाई क्षेत्र ,एअर कॉरिडोर बंद कर दिया है और अब भारत के विमानों को 12 मिनट ज्यादा समय देना होगा। हालांकि इससे भारत को कोई ज्यादा नुकसान होगा।
कूटनयिक संबंध को सीमित करने के फैसले को भारत के पूर्व विदेश मंत्री एवं कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने निकट दृष्टि दोष बताया है। सलमान खुर्शीद ने कहा ऐसे वक्त में द्विपक्षीय संबंध रखना जरूरी होता है इस संबंध को सीमित कर देने से भारत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। 
बिल्कुल सही है कि मौजूदा हालात में पाकिस्तान के इन किसी भी कदम का भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा और ना ही राष्ट्र संघ का राग आपने से कोई लाभ होगा। अभी जरूरत है कि पाकिस्तान भारत के इस कदम को स्वीकार कर ले और आगे की सोचे। कहीं ऐसा ना हो कि अधिकृत कश्मीर भी हाथ से निकल जाए।

Wednesday, August 7, 2019

आखिर हंगामा है क्यों बरपा?

आखिर हंगामा है क्यों बरपा?

कश्मीर का मसला धीरे धीरे अंतरराष्ट्रीय सरहदों की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में मंगलवार को कहा कि पूरा कश्मीर हमारा है, यानी पाक अधिकृत कश्मीर और अक्साई चिन। अमित शाह बात पर चीन ने गहरी आपत्ति जताई है और चीन के विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि "भारत कानूनों में सुधार कर  चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता पर एक तरफा हमला कर रहा है ,यह काम अमान्य है।"  अमित शाह जब कहा कि अधिकृत कश्मीर और अक्साई चीन भी हमारा है तो इस कथन के साथ ही मामला अंतरराष्ट्रीय सरहदों की ओर इशारा करने लगा। पाकिस्तान द्वारा भारतीय सीमा में आतंकियों को प्रवेश कराने की पुरानी प्रक्रिया में तेजी की खबर मिल रही है।  साथ ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने जम्मू कश्मीर के मामले पर आग बबूला होते हुए कहा है कि " इस तरह का नजरिया अपनाने से पुलवामा जैसी घटना का फिर से होना निश्चित है। " उन्होंने मंगलवार को अपने देश के पार्लियामेंट में कहा कि " मैंने यह पहले से ही चेता दिया है वे लोग हम पर हमला कर सकते हैं।  यदि वे  हमला करते हैं  तो हम भी पलट कर हमला करेंगे लेकिन  इसके बाद क्या होगा? वह हमला करेंगे हम जवाब देंगे और अपने खून की आखिरी बूंद तक लड़ेंगे। लेकिन इसके बाद विजयी कौन होगा कोई नहीं? जीतेगा और इसका समूची दुनिया पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। यह परमाणु ब्लैकमेल नहीं है।" नेशनल असेंबली के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए इमरान खान ने कहा कि "सरकार चाहती थी कि रिश्ते अच्छे हो क्योंकि इससे दोनों देश है की आर्थिक स्थिति को विकसित करने  मदद मिलेगी।" इमरान खान ने कहा कि मैंने जब पहली बार भारत से बात की तो "उन्होंने क्षोभ जाहिर किया और कहा कि आतंकी संगठन पाकिस्तान से संचालित होते हैं। मैंने बताया कि आर्मी पब्लिक स्कूल के हत्याकांड के बाद पाकिस्तान के राजनीतिज्ञों ने संकल्प लिया कि वे अपनी धरती का आतंकवाद के लिए उपयोग नहीं होने देंगे। लेकिन अब मुझे महसूस हो रहा है कि भारत इन सब बातों पर गंभीर नहीं है।"
        इमरान खान ने कहा कि " हम इस हालात से दुनिया को वाकिफ कराएंगे और और इसकी जिम्मेदारी हम खुद लेते हैं ।मुझे लगता है कि पश्चिमी दुनिया और पाकिस्तान दोनों एक ही तरफ से सोचते हैं लेकिन उन्हें कश्मीर के बारे में पूरी जानकारी नहीं है। हम उन्हें बताएंगे कि वहां भारत की सरकार क्या कर रही है और मुसलमानों तथा अल्पसंख्यकों के साथ क्या हो रहा है। तब दुनिया इसको समझेगी।" उधर पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल बाजवा ने कहा है कि " उनकी फौज कश्मीरियों की मदद के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है।"
        चीन ने भी स्थिति पर नाखुशी जाहिर की है। चीन ने मंगलवार को कहा कि " कश्मीर में जो कुछ भी हो रहा है उससे वह बहुत चिंतित है।" खास तौर पर चीन ने लद्दाख को पृथक केंद्र शासित क्षेत्र बनाए जाने पर चिंता जाहिर की है। हालांकि भारत ने  चीन की इस बात  का  उत्तर देते हुए कहा  कि यह हमारा आंतरिक मामला  है। भारत किसी भी देश के आंतरिक मामले पर कोई टिप्पणी नहीं करता उसी तरह  उम्मीद भी करता है कि दूसरा देश ऐसा ही करे। यह बात ऐसे समय में हुई है जब कुछ महीनों के बाद ही सीमा समस्या पर भारत के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री तथा स्टेट काउंसलर वांग मैं बातें होने वाली हैं और विदेश मंत्री एस जयशंकर इसी महीने 11 अगस्त को दो दिवसीय यात्रा पर बीजिंग जाने वाले हैं । चीन  1950 से ही अक्साई चीन पर अपना दावा करता आया है और 1962 के युद्ध के बाद उसने इस पर कब्ज़ा कर लिया।  एक साल के बाद पाकिस्तान ने भी अधिकृत कश्मीर का एक हिस्सा चीन को दे दिया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई ने सन 2000 में यह मामला उठाया था, लेकिन कुछ नहीं हो सका।            इस मामले पर विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अभी तुरंत यह मामला शायद नहीं उठाएगा। लद्दाख सदा से भारत का हिस्सा रहा है यह भी सच है चीन लद्दाख और अधिकृत कश्मीर के कुछ हिस्सों पर दावा करता आया है। लेकिन अभी कुछ कहने का मतलब है कि वह  पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक चलाना और चीन ऐसी स्थिति से बचना चाहेगा।
      वैसे यह बता देना जरूरी है कि जिस धारा 370 पर इतना विवाद हो रहा है और जिसे लेकर बहुत बड़ी बड़ी बातें की जा रही है वह भारत की एकता और अखंडता से नहीं जुड़ा है वह महज कश्मीर को कुछ स्वायत्तता देने के मामले से जुड़ा है। जो लोग इसे भारत की एकता और अखंडता से जोड़ रहे हैं वह गुमराह कर रहे हैं। समानता और एकता दोनों अलग अलग स्थितियां हैं। विविधता के साथ एकता ज्यादा दिन तक कायम रह सकती है। जैसा देश के अन्य भागों में दिखाई पड़ता है। इसलिए धारा 370 को हटाया जाना एक बहुत ही बुद्धिमानी भरा कदम है और इस पर भारत सरकार की प्रशंसा की जानी चाहिए नाकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाती पिटनी चाहिए और ना ही हंगामा खड़ा करना चाहिए।

Tuesday, August 6, 2019

अब आगे क्या होगा?

अब आगे क्या होगा?

भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी परीक्षा
कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म हो गया और अब वह भारत का अंग बन गया। इसे देखकर कुछ लोग कश्मीर के महाराजा हरिसिंह के साथ हुए समझौते को भंग करने का पीत आरोप लगा रहे हैं। लेकिन समझने की जरूरत है यह संधि दो स्वतंत्र निकायों के बीच आपसी सहमति से हुई थी। अधिकतर रियासतों के साथ संधि में बाद में उनके भारत में विलय पर सहमति हुई थी लेकिन कश्मीर पर धारा 309 के तहत जो संधि हुई वही बाद में संविधान की धारा 370 बन गई । इस संधि के तहत कश्मीर में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारत के अधिकार के रूप रूपरेखा शामिल थी। ए जी नूरानी ने अपनी पुस्तक "आर्टिकल 370 : कांस्टीट्यूशनल हिस्ट्री ऑफ़ जम्मू एंड कश्मीर " में लिखा है कि "यह संधि विवादों से भरी थी। जम्मू कश्मीर के मामले में राष्ट्रपति को जो अधिकार प्रदत्त थे वह दूसरे राज्यों के मुकाबले कम थे। शेख अब्दुल्ला ने यह सवाल जवाहरलाल नेहरू और वीपी मेनन के  समक्ष उठाया था।  केंद्र को जो अधिकार हासिल थे उसी के अंतर्गत 1953 में शेख अब्दुल्ला को सत्ता से बेदखल कर दिया गया ।"  आज उसी अधिकार का इस्तेमाल कर जम्मू कश्मीर का मौलिक ढांचा बदल दिया गया। पहला मामला एक नकाब की तरह था 1951 में बनी जम्मू और कश्मीर संविधान सभा अपना काम करती रही और जिसके अंतर्गत 1954 में भारत  में इसके शामिल होने की औपचारिकता पूरी होने के लिए रास्ता बनता रहा। 1957 में धारा 370 के अंतर्गत राज्य का संविधान लागू किया गया। सोमवार को वह नकाब उतार कर फेंक दिया गया और जम्मू कश्मीर विधानसभा से कोई मशवरा नहीं किया गया। यह कार्रवाई 1951 में तिब्बत के प्रतिनिधियों और चीन के बीच 17 सूत्री संधि को भंग करने के बराबर थी। 1959 में निर्वासन के बाद दलाई लामा ने चीन के इस कदम का विरोध किया था लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। और चीन ने संधि की शर्तें  तोड़ दी थी। दलाई लामा के विरोध से कुछ नहीं हुआ। तिब्बत में चीन ने अपना शासन स्थापित कर लिया। चीन की यह नीति  थी। वह हमेशा इस बात पर कायम रहा कि तिब्बत हमेशा चीन सा अंग रहा है। इस नीति को लागू करने के लिए केवल ताकत का इस्तेमाल किया गया।
      कश्मीर से धारा 370 हटाने का फैसला मोदी सरकार ने फरवरी में अपने पहले कार्यकाल में ही ले लिया था इसकी घोषणा लोकसभा चुनाव से पहले की जाने वाली थी परंतु सरकार को इसे टालना पड़ा। क्योंकि पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान मारे गए और भारत पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया। हालांकि गृह मंत्रालय ने उसी समय 370 हटाए जाने की संपूर्ण प्रक्रिया, यहां तक कि संभावित प्रश्न और उनके उत्तर उत्तरों का मसौदा तक तैयार कर लिया था। मई में सरकार के दोबारा आने पर सभी बारीक डिटेल पर काम किया गया और जून में अमित शाह की कश्मीर यात्रा इस योजना की कड़ी थी। यही नहीं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की कश्मीर यात्रा भी इसी उद्देश्य के लिए हुई थी।
        अब मोदी सरकार के इस फैसले से पाकिस्तान सरकार काफी बेचैन सी दिख रही है । इसका मुख्य कारण है की अफगानिस्तान के संदर्भ में अमरीका के समक्ष पाकिस्तान अपनी वैधता बढ़ाना चाहता था। क्योंकि अफगानिस्तान से बाहर निकलने के लिए अमरीका को पाकिस्तान की जरूरत है । अब पाकिस्तान के इस कदम को रोकने के लिए भारत ने यह रणनीतिक पासा फेंका ताकि , पाकिस्तान कोई सेंटर स्टेज ना हासिल कर ले। कश्मीर के मामले में भारत हमेशा पाकिस्तान से बात करता रहा है। लेकिन बात किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। अब पाकिस्तान से कोई बातचीत नहीं होगी । इसलिए भारत ने उसे बड़ी सफाई से डिफेंसिव में डाल दिया है।
     यह शुरू से ही भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा रहा है। 1993 में भारतीय जनता पार्टी के नेता और तत्कालीन उपाध्यक्ष के आर मलकानी ने "इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया" में लिखा था कि धारा 370 अस्थाई है और उसे खत्म करना है । लेकिन यह तभी खत्म होगा जब संसद में दो तिहाई बहुमत होगा। इसमें कुछ वक्त लगेगा और साथ ही देश को और कश्मीर की जनता को यह विश्वास दिलाने में थोड़ा समय लगेगा कि धारा 370 उनके हित में नहीं है । यह सदा से कश्मीर में भ्रष्टाचार पर पर्दे के रूप में काम करता आया है। एक बार यह खत्म हो गया तो कश्मीर को वही अधिकार तथा जिम्मेदारी हासिल   हो जाएगी जो बंगाल और पंजाब को है।" अब कश्मीर की जनता जो रोजाना फौज के हाथों अपमानित होती रही है वह अब अब मुक्त महसूस करेगी। एडवर्ड लूस ने अपनी पुस्तक" रिट्रीट ऑफ वेस्टर्न लिबरलिज्म" में लिखा है कि "यद्यपि मोदी में बोनापार्ट के लक्षण हैं लेकिन यह कल्पना करना भी कठिन है कि वे पूरे सिस्टम को खत्म कर देंगे। यह मानना और भी कठिन है कि देखना है वे कैसे सफल होते हैं। भारतीय संस्कृति में शोर भरा मतभेद और बहुलता वाद बहुत ज्यादा है लेकिन इसके बाद भी भारतीय लोकतंत्र बिल्कुल सुरक्षित है खासकर पश्चिमी विश्व के कई देशों की तुलना में और भारत अपने विकास के लिए जो करने जा रहा है वह सबसे बड़ी बात है।" यही नहीं , विख्यात कश्मीरी कवि आग़ा शाहिद अली ने एक बार लिखा था ,"कश्मीर में शांति के लिए युद्ध के सभी नियमों को ताक पर रखकर वहां वीरानी फैला दी जाती है और कहते हैं कि अमन कायम हो गया।" अब देखना है की 5 अगस्त का वह दिन कश्मीर में क्या रंग लाता है क्या वह कश्मीरियों के लिए  अमन और तरक्की की शुरुआत का दिन होगा या फिर भारत के खोखले उदारवादियों के शोर मचाने और कश्मीर लोगों को भड़काने का नया अवसर होगा। घाटी में जो कुछ होता है जिसे कश्मीर समस्या के अंत के रूप में देखा जाता है या उसके विरोध में वहां के लोगों में अपमान और गुस्सा भड़कता है। वैसे छोटे राज्यों और अधिक संघों के युग में कश्मीर को यह दर्जा देना बहुत ही अच्छा और ज्ञान भरा कदम कहा जा सकता है। इसकी विशेष स्थिति समाप्त कर इसे भारत के साथ संपूर्ण रूप से जोड़ देना और सीधे तौर पर केंद्र के अधिकार क्षेत्र में रखे जाने के मामले को सरकार को थोड़ा स्पष्ट करना चाहिए। भाजपा को चाहिए कि वह कश्मीर में कुछ वर्गों के गुस्से को विनम्रता से खत्म करने की कोशिश करे ना कि उत्साह पूर्ण समारोहों के माध्यम से उसे भड़काने की।

Monday, August 5, 2019

कश्मीर का नया स्वरूप क्या रंग लाएगा

कश्मीर का नया स्वरूप क्या रंग लाएगा

अमरनाथ की यात्रा रोक दी गई थी और कश्मीर में अर्द्ध सैनिक बलों  की तैनाती के पश्चात मानो पर्वत राज्य की चोटियों पर गूंज रहा हो:
टाटवी-गलज्जल-प्रवाह-पावित-स्थले गलेऽव-लम्ब्य-लम्बितां-भुजंग-तुंग-मालिकाम्  डमड्डमड्डमड्डम-न्निनादव-ड्डमर्वयं चकार-चण्ड्ताण्डवं-तनोतु-नः शिवः शिवम् ॥
संपूर्ण देश को लगने लगा कि कुछ न कुछ होने वाला है, क्या होने वाला है इसका अंदाजा नहीं था। अचानक सोमवार को  सरकार ने घोषणा की कि जम्मू कश्मीर में लागू संविधान की धारा 370 को हटा दिया गया है और इसके साथ ही  जम्मू कश्मीर को प्राप्त विशेष दर्जा खत्म हो गया। गृह मंत्री अमित शाह ने इसकी घोषणा की। यह कि नहीं उस हिमालयी राज्य का दो भाग हो गया। पहला लद्दाख । किसी विधान मंडल के बगैर लद्दाख केंद्र शासित क्षेत्र होगा। दूसरा  जम्मू कश्मीर । यह भी केंद्र शासित क्षेत्र  होगा लेकिन यहां विधानमंडल रहेगा । गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि लद्दाख के लोगों की यह बहुत दिनों से मांग आ रही थी और यह फैसला कश्मीर में कायम सुरक्षा की स्थिति को देखते हुए लिया गया है । लद्दाख आनुपातिक रूप में बड़ा क्षेत्र है लेकिन यहां आबादी कम है और जो है वह भी बहुत ही जटिल स्थिति में है। अरसे से मांग हो रही थी कि लद्दाख को केंद्र शासित राज्य का दर्जा दे दिया जाए ताकि वहां की जनता अपनी अपेक्षाओं को प्राप्त कर सके। लद्दाख में कोई विधानमंडल नहीं होगा। श्री अमित शाह में कहा कि जम्मू और कश्मीर को पृथक केंद्रशासित राज्य बनाए जाने के पीछे सुरक्षा कारण है वहां सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इसके साथ ही कश्मीर का मिशन मोदी पूरा हुआ और उसका इतिहास तथा भूगोल दोनों बदल गया।
       सुविज्ञ सूत्रों के अनुसार इस घोषणा के बाद घाटी में कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ सकती है। यहां अर्धसैनिक बलों की 300 कंपनियां तैनात हैं । फिलहाल कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की स्थिति का फायदा उठाते हुए केंद्र सरकार ने राज्य का चरित्र बदलने के लिए यह महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है। दरअसल संसद ने जम्मू कश्मीर की तरफ से काम करते हुए धारा 370 में संशोधन का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इससे संवैधानिक रूप में ऐसा लगता है कि कश्मीर यह चाहता था। हालांकि कश्मीर के लोग इसका विरोध कर रहे थे। धारा 370 एक बुनियादी प्रावधान था जिसके तहत कश्मीर भारत के साथ जुड़ा। सोमवार को संसद में प्रस्तुत प्रस्ताव के दो हिस्से थे। पहला हिस्सा 370 धारा के प्रावधानों को खत्म करने का था जिसके तहत जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल था। विशेष दर्जा में यह भी शामिल था कि केंद्र द्वारा पारित किसी कानून को कश्मीर विधानसभा से पास करवाना होगा।
        प्रस्ताव का दूसरा भाग राज्य को केंद्र शासित क्षेत्र में बदलना था। इसके लिए भी एक विधेयक पेश किया गया। यद्यपि धारा 370 कश्मीर को एक विशेष दर्जा देती है लेकिन तकनीकी तौर पर भारत से मिलाने के लिए यह एक अस्थाई प्रावधान था। धारा 370 की उप धारा 3 में कहा गया है कि राष्ट्रपति को अधिकार है  कि इस धारा को  खत्म करने के लिए किसी भी समय एक अधिसूचना जारी कर सकते हैं। लेकिन यहीं पर एक फंदा था कि राष्ट्रपति के अधिसूचना जारी करने के बाद जम्मू कश्मीर विधानसभा से भी मंजूरी लेना जरूरी था। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रावधान को कैसे पूरी तरह से कम करके आंका गया। फिलहाल जम्मू और कश्मीर में राष्ट्रपति शासन है । जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन होता है तो संसद को उस राज्य के विधानसभा के अधिकार प्राप्त होते हैं। इसका मतलब है कि फिलहाल संसद जम्मू कश्मीर विधानसभा के तौर पर काम कर रही है और  प्रस्ताव तथा विधेयक पेश कर रही है । अब मुश्किल यह है कि कश्मीर की जनता का बहुत बड़ा भाग इस परिवर्तन के खिलाफ है और साथ ही कश्मीर के निर्वाचित प्रतिनिधि भी इस परिवर्तन के विरोध में हैं।  जो हुआ वह संघीय ढांचे पर एक आघात है। इसके अलावा धारा 35 ए को रद्द करने का राष्ट्रपति का आदेश ऐसा लगता है कि संविधान की धारा 367 और जम्मू कश्मीर से जुड़े इसके प्रावधानों में संशोधन हो रहा है । क्या राष्ट्रपति एक आदेश जारी कर धारा 370 में  संशोधन कर सकते हैं? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
       पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कश्मीर ताजा स्थिति को देखते हुए अपने कैबिनेट की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाने वाले हैं। सूत्रों का मानना है कि पाकिस्तान मोदी सरकार के इस कदम का कड़ा जवाब देने वाला है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने पहले ही इसकी निंदा करते हुए कहा है कि "भारत अधिकृत जम्मू और कश्मीर एक विवादास्पद क्षेत्र है जिसे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता हासिल है और राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद द्वारा प्रतिस्थापित है। भारत सरकार का कोई भी एकतरफा कदम इसके विवादास्पद दर्जे को नहीं बदल सकता है। इसे जम्मू कश्मीर की जनता भी नहीं बर्दाश्त करेगी । इस अंतरराष्ट्रीय विवाद का एक पक्ष होने के कारण पाकिस्तान इस गैरकानूनी कदम का विरोध करने के लिए सभी प्रकार के अधिकारों का उपयोग करेगा।" पाकिस्तान ने कहा है कि वह कश्मीर के हित के लिए सभी तरह के राजनीतिक कूटनीतिक और नैतिक समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध है। आशंका है कि पाकिस्तान इस मामले को राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में भी ले जा सकता है साथ ही वह ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन से भी मदद ले सकता है।
      रविवार को राष्ट्र संघ ने नियंत्रण रेखा पर तनाव को देखते हुए दोनों देशों से कहा है कि वह संपूर्ण संयम बरतें। उधर, प्रधानमंत्री इमरान खान ने दुबारा कहा है कि वे अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से कश्मीर मामले में मध्यस्था करने को कहना चाहते हैं।
       कुल मिलाकर हालात बिगड़ते जा रहे हैं और इसका भविष्यत परिणाम क्या होगा यह तो समय ही बताएगा। लेकिन चारों तरफ एक खास किस्म की आशंका व्याप्त है । वैसे भारतीय जन में इसे लेकर व्यापक हर्ष है और आम लोग मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं। फिर भी आशंका के धब्बे साफ दिखाई पड़े हैं और पर्वतराज की घाटियों से स्वर आ रहा है:
        
ललाट-चत्वर-ज्वलद्धनंजय-स्फुलिंगभा- निपीत-पंच-सायकं-नमन्नि-लिम्प-नायकम्  सुधा-मयूख-लेखया-विराजमान-शेखरं महाकपालि-सम्पदे-शिरो-जटाल-मस्तुनः ॥

Sunday, August 4, 2019

कुछ बहुत बड़ा हो रहा है, लेकिन क्या?

कुछ बहुत बड़ा हो रहा है, लेकिन क्या?

कश्मीर में बहुत जल्दी कुछ बड़ा होने वाला है लेकिन क्या होने वाला है इस पर गंभीर विभ्रम है। शनिवार को पाकिस्तान के बॉर्डर एक्शन ट्रूप के कुछ कमांडो ने हमला कर दिया और भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई में कुछ कमांडो मारे गए। उधर, सुरक्षा कारणों से अमरनाथ यात्रा रोक दी गई है। घाटी में अफरा तफरी है । राज्यपाल सत्यपाल मलिक का कहना है कि यात्री हमारी जिम्मेदारी हैं और हम उन्हें सकुशल वापस पहुंचाएंगे। दूसरी तरफ , घाटी के लोगों में भयानक दहशत फैल गई है और वह अपने खाने-पीने के सामान खरीद कर इकट्ठा कर रहे हैं। सरकार बार-बार कह रही है की धारा 35 ए को फिलहाल हटाया नहीं जा रहा है और सुरक्षा बलों की तैनाती केवल सुरक्षा कारणों से की जा रही है। सरकार खासकर जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बार बार यह कह रहे हैं कि इस तरह के अफवाह राजनीतिक दल फैला रहे हैं। कुछ भी निश्चित का पाना बड़ा कठिन है। कश्मीर के नेता उमर अब्दुल्ला बार-बार पूछ रहे हैं कि अगर खतरा नहीं है तो यात्रा क्यों रोकी गई? उमर अब्दुल्ला ने राज्यपाल से मुलाकात के बाद बताया कि कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या हो रहा है। राज्य के अफसरों से पूछा जाता है तो वह कहते हैं कुछ हो रहा है लेकिन क्या किसी को मालूम नहीं है। राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाले राजनीतिक   नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला ना हो जाए इसलिए यात्रा रोकी गई है। सुरक्षा एजेंसियों को खबर मिली है कि बड़े पैमाने पर आतंकी हमले की साजिश रची जा रही है। इसलिए यात्रा को रोकना केवल एक सुरक्षात्मक कदम है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह किसी भी संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन का कोई प्रयास नहीं है। दूसरी तरफ कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने शनिवार को कहा कि विगत कुछ दिनों से कश्मीर में अतिरिक्त अर्धसैनिक बलों की तैनाती हुई है। अमरनाथ यात्रा रोके जाने से चारों तरफ हड़कंप मचा हुआ है अभी यात्रा में 10 दिन बाकी हैं और जानकारों का कहना है कि देश के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ। सन 2000 में अमरनाथ यात्रियों पर हमले हुए थे और बहुत यात्री तथा नागरिक मारे गए थे। तब भी ऐसी एडवाइजरी नहीं जारी की गई थी। कभी कश्मीर के सदरे रियासत रहे डॉ करण सिंह ने भी अमरनाथ यात्रा रोकी जाने पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि एक या दो स्नाइपर मिलने से अगर यात्रा रोक दी जाती है तो यह हजम होने वाली बात नहीं है। क्योंकि, ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। राज्य में सुरक्षा के लिए पहले से ही बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है। इसके बाद भी लगभग तीस हजार सुरक्षा कर्मियों की तैनाती हुई है। डॉ. कर्ण सिंह  ने कहा, 70 साल के सार्वजनिक जीवन में मैंने जम्मू कश्मीर में कई मुश्किल परिस्थितियों देखी हैं लेकिन फिलहाल जो हुआ है वैसा कभी नहीं हुआ। अमरनाथ की यात्रा कभी बंद नहीं की गई । यह शिव भक्तों के लिए गहरा आघात है। उन्होंने कहा कि पवित्र छड़ी का हर साल हर हाल में अमरनाथ की गुफा में पहुंचना होता है। अगर वह नहीं पहुंचती है इसे बढ़ा अशुभ माना जाता है। उन्होंने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में जो हालात बना दिए गए हैं इससे तो सारा विकास ही ठप हो जाएगा।
      अब यहां सवाल उठता है कि कश्मीर में आखिर हो क्या रहा है? सब यही पूछते हैं। अटकलें कई हैं। क्या सरकार संविधान की धारा 35 ए या  संविधान की धारा 370 को रातों-रात  खत्म कर देना चाहती है या मोदी सरकार राज्य को तीन टुकड़ों जम्मू कश्मीर और लद्दाख में विभाजित कर देना चाहती है। कुछ लोगों का मानना है कि अगर ऐसा होता है तो यह कश्मीरियों को भारत से और अलग कर देगा तथा यह भारत के हित में नहीं होगा। या फिर य राज्य में सुरक्षा व्यवस्था को अत्यंत चुस्त करने का प्रयास है ताकि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी स्वाधीनता दिवस के दिन लाल किले के बदले लाल चौक से भाषण दे सकें।  कश्मीर में आतंकी हमले का भय है इसलिए एहतियात के तौर पर यह कदम उठाए जा रहे हैं। इस बात पर मोदी भक्तों के सिवा कोई यकीन नहीं कर रहा है। भारत में आज भारी ध्रुवीकरण हो गया है । संयोगवश मोदी के विरोधी राष्ट्रीय सुरक्षा के फंदे में फंस गए हैं। हो सकता है सोमवार को मोदी सरकार यह घोषणा करें कि बहुत बड़ा खतरा टल गया और सरकार ने हिंदू तीर्थ यात्रियों की जान बचाई जा सकी। यहां एक अजीब स्थिति हो गई है। अगर तीर्थ यात्रियों पर हमले हो जाते है यही मोदी विरोधी लोग पानी पी पीकर कोसेंगे कि सरकार खुफिया तंत्र नाकाम है। अब अगर सरकार खुफिया सूचनाओं पर काम करती है तब भी वह नाराज है ।
        देश को बेचन रखने का सरकार के लिए खास फायदा है विशेष तौर पर इससे लोगों का ध्यान बट जाएगा और मोदी सरकार की अर्थव्यवस्था के डूबने पर लोग ध्यान नहीं देंगे।  क्यों वह वास्तविक आतंक नहीं है । यही नहीं जितनी अव्यवस्था फैल जाएगी  उतना5 ही राजनीतिक लाभ होगा घाटी की ताजा स्थिति जहां 35 ए को हटाए जाने की खबर बेचैनी पैदा कर रही है वही घाटी में मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं बढ़ने और वहां के नागरिकों को मिलने वाली आजादी में कटौती की आशंका भी पैदा हो रही है। ऐसी स्थिति में सरकार की खामोशी  से अस्थिरता और डर बढ़ रहा है । कहीं ऐसा तो नहीं कि राजनीतिक लाभ उठाने के लिए यह चुप्पी जानबूझकर कायम रखी गई हो। जम्मू कश्मीर में 2 महीनों के बाद चुनाव होने वाले हैं। जितना  अव्यवस्था फैल जाएगी उतना ही कम मतदान होगा और इससे दक्षिण कश्मीर तथा उत्तरी कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में बीजेपी को लाभ मिल सकता है बीजेपी के कुछ मुख्य  सदस्यों को  हाईकमान  ने मंगलवार को दिल्ली तलब किया है इससे भी राजनीतिक लाभ वाले सिद्धांत को बल मिलता है साथ ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बड़ी चालाकी से अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समक्ष कश्मीर पर मध्यस्था की पेशकश कर दी है। यह सही समय है जब आतंकी और रावलपिंडी में बैठे उनके आका कश्मीर पर हमले कर दें ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय क्य कर इस ओर ध्यान देना शुरू कर दे कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मसाला बनाना हमेशा से उनका एजेंडा रहा है कुल मिलाकर घाटी में कुछ तो ऐसा हो रहा है जिस के लक्षण शुभ नहीं है लेकिन क्या यह पता नहीं चल रहा है।

Thursday, August 1, 2019

तीन तलाक के आगे भी जारी रहेगा संघर्ष

तीन तलाक के आगे भी जारी रहेगा संघर्ष

संसद ने तीन तलाक विधेयक को मंजूरी दे दी। अब यह कानून बन जाएगा और तीन तलाक बोलकर या लिखकर अपनी बीवियों को तलाक देने वाले सजा के भागीदार होंगे। अब से करीब 2 साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे और संवैधानिक करार दिया था।  तब से नरेंद्र मोदी की सरकार इसे खत्म करने के प्रयास में लगी थी । अब मुस्लिम महिलाओं को इस कुरीति से निजात मिल गई। लेकिन सरकार का जो रुख है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि तीन तलाक मंजिल नहीं है एक शुरुआत है। इसके आगे निकाह हलाला और बहु विवाह जैसे मामले भी हैं और यह मामले फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। तीन तलाक से संबद्ध विधेयक के कानून बन जाने के बाद मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी में एक दहशत खत्म हो जाएगी । यही नहीं पहले की स्थिति में अगर गलती से उसे तीन तलाक बोल - लिख कर तलाक दे दिया जाता था तो उसे दूसरी शादी करके फिर उससे तलाक लेकर पहले शौहर पास आना होता है। जिसे  निकाह हलाला कहते हैं। यह भयानक मानसिक त्रासदी है। तीन तलाक से संबद्ध विधेयक कानून बन जाने के बाद महिलाओं को इस मानसिक त्रासदी  से मुक्ति मिल जाएगी।
     सबसे पहले यह मामला 2016 में सुप्रीम कोर्ट में गया। इस मानवीय समस्या पर गंभीरता से विचार करते हुए प्रधान न्यायाधीश जे एस खेहर ने 23 अगस्त 2017 को तीन तलाक को  असंवैधानिक कहा था। इस फैसले के बाद अचानक छोटी-छोटी बात पर तलाक देने की घटनाएं सामने आने लगी। इन घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में  महिलाओं के संगठनों ने मांग शुरू कर दी। इन महिलाओं को इस उत्पीड़न से बचाया जाए संसद ने विधेयक बना दिया, जो जल्दी ही कानून का दर्जा प्राप्त कर लेगा। 
     लेकिन, मुस्लिम महिलाओं की मानसिक वेदना यहीं खत्म नहीं हुई है। अभी निकाह हलाला बाकी है इसके खिलाफ भी कई याचिकाएं संविधान पीठ में लंबित हैं। इनमें महिलाओं के बुनियादी हकों की हिफाजत के साथ बहुविवाह प्रथा का विरोध किया गया है इस पर रोक लगाने की मांग करते हुए   दावा किया गया है कि इन प्रथाओं से संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में प्रदत्त मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है।
         अब निकाह हलाला और बहुविवाह प्रथा के विरुद्ध भी मुस्लिम महिलाएं खड़ी हो गई हैं। इस प्रथा को चुनौती देते हुए कहा गया है कि यह आईपीसी की धारा 494 के तहत अपराध है। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ की वजह से यह प्रावधान मुस्लिम समुदाय पर लागू नहीं हो रहा है। इस कारण से विवाहित मुस्लिम महिला के पास ऐसा करने वाले अपने पति के खिलाफ शिकायत का रास्ता नहीं बचता है। याचिका में मुस्लिम विवाह विच्छेद कानून 1939 को असंवैधानिक और संविधान के अनुच्छेद 14 ,15, 21 तथा 25 में  अधिकारों का हनन करने वाला घोषित करने का अनुरोध किया गया है । 
लेकिन बात ही खत्म नहीं हो जाती। तीन तलाक विधेयक के पास हो जाने हैं के बावजूद इसका प्रचंड विरोध जारी है । कुछ लोगों का कहना है कि इस विधेयक पर विचार करने से पहले यह ध्यान देना जरूरी है कि विभिन्न धर्मों में परिवारों के भीतर महिलाओं के हालात क्या हैं । 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि शादीशुदा महिलाओं का प्रतिशत मुसलमानों में 87.8 है जबकि हिंदुओं में 86. 2 ईसाइयों में 83.7 और अन्य अल्पसंख्यकों में 85.8 है। मुसलमानों में विधवाओं की संख्या अन्य सभी धर्मों से कम केवल 11.1%  है। हिंदुओं में 12.9 ,ईसाइयों में 14.6 और अन्य अल्पसंख्यकों में 2.3 प्रतिशत है। सिर्फ एक मामले में , तलाकशुदा मामले में फर्क है। मुस्लिमों में जहां 0. 49 प्रतिशत तलाकशुदा हैं वहीं हिंदुओं में सिर्फ 0. 22% हैं।
     इसका विरोध करने वालों का दावा है कि यह विधेयक जहां इंस्टेंट तलाक पर रोक लगाता है वहीं एक गड़बड़ी भी है। इसके कानून बनने के बाद एक तरफ जहां तीन बार तलाक बोलने से तलाक नहीं होता वहीं इसके बाद पति को सजा का प्रावधान भी है। महिला के रक्त संबंधी द्वारा शिकायत किए जाने पर पति को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है। ऐसे में बड़ी अजीब स्थिति हो जाएगी। तलाक और शादीशुदा होने के बीच महिलाएं फंस जाएगी।  पति जेल में और उसकी बीवी बाहर । इससे तो वैवाहिक स्टेटस का सवाल उठने लगता है। पति जेल में रहेगा तो वह अपनी बीवी को कोसेगा। शादी तोड़ने के लिए दवाब बनाएगा इससे समाज में एक खास किस्म की मजबूरी बढ़ेगी।
इन सबके बावजूद निकाह हलाला और बहु विवाह के खिलाफ आवाज उठाने वाली मुस्लिम महिलाओं का कहना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत शादियां उनके मौलिक अधिकार का हनन करती हैं। उम्मीद की जाती है कि सती प्रथा, देवदासी प्रथा और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं पर अंकुश लगाने के बाद मुस्लिम महिलाओं को इन प्रथाओं के तहत मानसिक त्रासदियों से मुक्ति दिलाने के लिए कानून में संशोधन के पूर्ववर्ती सरकारों  के प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए मोदी सरकार भी मुस्लिम महिलाओं को मानसिक यातना उसे मुक्ति दिलाने के लिए कदम आगे बढ़ाएगी। मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए मोदी सरकार का यह संघर्ष जारी रहेगा और आने वाले दिनों में बहु विवाह तथा निकाह हलाला पर रोक लग सकती है।