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Monday, August 19, 2019

बातें अब अधिकृत कश्मीर पर ही होंगी

बातें अब अधिकृत कश्मीर पर ही होंगी

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रविवार को कहा कि पाकिस्तान से बातें अब केवल अधिकृत कश्मीर पर ही होंगी या नहीं होंगी।भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया की वर्तमान भारत के कब्जे वाले कश्मीर पर अब कोई बातचीत नहीं होगी। इसके पहले पाकिस्तान ने कश्मीर से धारा 370 और 35 ए हटाए जाने को देखकर काफी बवाल मचाया था। वह इस मामले पर दुनिया के कई देशों की चौखट पर पेशानी रगड़ रहा था, पर कोई लाभ नहीं हुआ। कुछ ने  तो इस पर ध्यान ही नहीं दिया और कुछ ने कहा कि यह भारत का आंतरिक  मामला है ,बस बात खत्म हो गई। अब पाकिस्तान एक दूसरे शिगूफेबाजी में लगा है। प्रधानमंत्री इमरान खान ने रविवार को कहा कि " हिंदू सर्वोच्चतावादी और फासीवादी  मोदी सरकार  के नियंत्रण में  भारत के परमाणु भंडार की सुरक्षा के बारे में दुनिया को चिंता करनी चाहिए । " उन्होंने कहा कि "यह एक ऐसा मसला है जिससे केवल यह क्षेत्र ही प्रभावित नहीं होगा। बल्कि पूरी दुनिया पर इसका असर होगा। " दरअसल ,2 दिन पहले सुरक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि भारत परमाणु शक्ति के पहले इस्तेमाल वाले नियम पर दोबारा सोच सकता है। उनके इस कथन से इमरान खान की घिग्घी बंध गई है। इसके बाद इमरान खान लगातार ट्वीट कर रहे हैं । इमरान खान ने कहा कि " कश्मीर में लगभग 9लाख कश्मीरियों को भारत से खतरा है । वहां सूचना पर पाबंदियों  और संचार को ठप किए जाने की भारत सरकार की कार्रवाई की इमरान खान ने नाजी जर्मनी के फासीवाद से तुलना करते हुए कहा इससे 90 लाख कश्मीरी दो हफ्तों से बंद पड़े हैं और पूरी दुनिया में इसे देखकर खतरे की घंटी बज रही है। राष्ट्र संघ के पर्यवेक्षक वहां भेजे जा रहे हैं।"
        दूसरी तरफ भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हरियाणा की  एक रैली  में कहा कि कश्मीर में धारा 370 उसके विकास के लिए हटाई गई है। हमारा पड़ोसी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दरवाजे खटखटा रहा है और कहता फिर है कि भारत ने गलती की है। अब तो पाकिस्तान से बातें केवल अधिकृत कश्मीर पर ही होंगी।"
    कश्मीर के मामले पर पाकिस्तान को चीन भी शह दे रहा है।  पिछले हफ्ते फिल्म यह मामला राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में उठाया था, लेकिन राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद ने इस पर कुछ नहीं कहा। लगभग 5 दशकों के बाद जम्मू कश्मीर की स्थिति पर मसला उठा था। वैसे भारत द्वारा कश्मीर में लागू धारा 370 को हटाए जाने के कारण भारत और दुनिया भर को चकित करने की जम्मू कश्मीर की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को खींचने का पाकिस्तान का यह अभियान आरंभ हुआ है। मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करना पाकिस्तान के भीतर भय का सबूत है। अमरीका और फ्रांस द्वारा  इसे भारत का   अंदरूनी मामला कहे जाने से स्थिति बदलती नजर आ रही है। क्योंकि इस पर सुरक्षा परिषद में बहस नहीं हो सकती है और कोई महत्वपूर्ण बयान या संकल्प जारी नहीं हो सकता है। अब से कोई पांच दशक पहले शीत युद्ध के जमाने में कश्मीर जब सुरक्षा परिषद के एजेंडे में था तो रूस ने भारत के पक्ष में इस पर वीटो कर दिया था और कहा था किसे भारत और पाकिस्तान दोनों मिलकर सुलझा लें। ब्रिटेन ने परोक्ष रूप से इस मामले में फिलहाल चीन का साथ दे रहा है फिर भी सुरक्षा परिषद  कश्मीर के मामले को उठाए जाने को लेकर दुनिया का सामूहिक मत भारत के पक्ष में है ।  इस संबंध में पाकिस्तान की चीख पुकार को भारत आसानी से नजरअंदाज कर सकता है लेकिन चीन की मदद से पाकिस्तान के सुरक्षा परिषद में दोबारा जाने को भारत नहीं नजरअंदाज कर सकता।  अगली बार सुरक्षा परिषद में क्या होगा यह कश्मीर की स्थिति पर निर्भर करता है। कश्मीर में किसी तरह की कानून और व्यवस्था में  गड़बड़ी और वहां के नागरिकों के खिलाफ दिल्ली द्वारा सुरक्षाबलों के इस्तेमाल से भारत के पक्ष में अंतरराष्ट्रीय समर्थन घट सकता है। नियंत्रण रेखा पर  मोर्चाबंदी और फौजी जमाव में वृद्धि को अंतरराष्ट्रीय समुदाय अंतरराष्ट्रीय खतरे की तरह मान सकता है ।  यह स्थिति सुरक्षा परिषद के हस्तक्षेप का आधार बन सकती है।  अगर ऐसा होता है तो भारत को तीन तरफा हमले का खतरा है। पहला  पाकिस्तान घाटी में आतंकवाद को खुला छोड़ सकता है । इससे सेना के हस्तक्षेप में वृद्धि हो सकती है और नियंत्रण रेखा पर भी सरगर्मियां बढ़ सकती हैं। चीन  ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान को सुरक्षा परिषद में पूरा समर्थन करने का आश्वासन दिया है। दिल्ली के पास कोई और विकल्प खोजने का वक्त नहीं रह गया है।  चीन भारत की सीमा पर फौज की तैनाती बढ़ा सकता है क्योंकि भारत ने कश्मीर में यथास्थिति को परिवर्तित कर उसके सार्वभौमिक हितों को चुनौती दी है।  भारत के खिलाफ चीन में बढ़ते राजनीतिक मतभेद से यह संकेत मिलते हैं कि  भारत को अभी से इसके मुकाबले की रणनीति बनानी होगी। इसमें विफलता का क्या परिणाम होगा वह भारत को मालूम है।
वैसे भी पाकिस्तान की यह चीख- पुकार का कोई मतलब नहीं है। दुनिया ने देखा-समझा है उसके झूठ को। कुछ दिन पहले तक वह कहता चल रहा है था कि बालाकोट हमले को लेकर भारत झूठ बोल रहा है । ऐसा कोई हमला हुआ ही नहीं। अब इमरान खान साहब रो - रो कर कह रहे हैं कि भारत बालाकोट से भी बड़े हमले की तैयारी में लगा है। इसका सीधा अर्थ है कि वह बालाकोट हमले को स्वीकार कर रहा है।
         

Sunday, August 18, 2019

बारिश से कोलकाता बेहाल

बारिश से कोलकाता बेहाल

गुरुवार से लगातार बारिश के कारण महानगर कोलकाता का जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार केवल शनिवार को 24 घंटों में 181 मिली मीटर से ज्यादा वर्षा हुई है और रविवार को भी बारिश जारी है। इससे आवागमन  ठप हो गया है और कई लोगों का जीवन बेहद प्रभावित हुआ है। ऐसा लगभग हर वर्ष होता है इसलिए इसे संजोग नहीं कह सकते या कोई आकस्मिक मौसमी घटना नहीं कह सकते। कोलकाता में बारिश विपदा का पर्यायवाची बन गई है। एक प्रश्न उठता है कि क्या मौसम का यह डायनामिक्स हमारी समझ से परे है? हर साल बारिश के दौरान कोलकाता महानगर क्षेत्र में कुछ लोग मरते हैं ,कुछ संपत्ति बर्बाद होती है और उसके बाद सब कुछ सामान्य सा होने लगता है। सरकार से लेकर आम आदमी तक किसी को इसकी फिक्र नहीं कि हम अपनी जमीन,  अपने जल स्रोतों और जल निकासी व्यवस्था का इतना क्रूर उपयोग करते हैं? एक दूसरे पर आरोप लगाकर हम अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। आरोप लगाना आसान है।  यह सोचना जरूरी है कि किसी दूसरे के अलावा हम इसके लिए कितने दोषी हैं? यहां हम का अर्थ है इस शहर का आम आदमी जो  शहर की सुविधाओं का उपभोग करना चाहता है ,शहर के लिए जिम्मेदारी लेना नहीं चाहता। अखबारों की सुर्ख़ियों में बारिश की खबर के साथ विनाश की खबरें आती हैं, मुश्किलों की खबरें आती हैं लेकिन हम जरा रुक कर यह नहीं सोचते की एयर कंडीशनर चालू करने के पहले जरा यह सोच लें कि इसकी जरूरत है या नहीं । हम यह नहीं सोचते कि जो पानी हमारे सामने नालियों से बह रहा है वह कितना उचित है ,हम में से कितने लोग सार्वजनिक बसों के उपयोग के हामी हैं? हमारी कल्पनाओं में हमारी अपनी सुविधाएं हैं लेकिन इन सुविधाओं से होने वाली मुश्किलों के बारे में हम नहीं सोचते। हम कभी नहीं सोचते कि हमारे जीवन में एक मामूली सा बदलाव मौसम को कितना ज्यादा प्रभावित करेगा। बेशक हम पर्यावरण पर कभी-कभी बात कर लेते हैं क्योंकि यह अक्सर चर्चा में रहता है लेकिन हमने मौसम पर कभी नहीं सोचा या बहुत कम सोचते हैं। हम तो बस यही मानते हैं कि यह दुनिया भर के नेताओं की  जिम्मेदारी है। हाल की कुछ घटनाओं को जरा रुक कर देखें। अगर हम इस शहर में आए हैं तो इसके प्रति हमारी कुछ जिम्मेदारियां भी हैं। हमारा फैलता (विकसित होता )  शहर पूर्वी भाग के खालों और भेरियों समाप्त करता जा रहा है। कुछ लोग जल निकासी व्यवस्था और सफाई को इस विपदा के लिए जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन यही केवल समस्या नहीं है यह तो देश के अन्य बड़े शहरों में भी है। जरा गौर करें, हम जिस महानगर में रहते हैं उसकी भौगोलिक स्थिति क्या है? क्योंकि किसी भी शहर की भौगोलिक स्थिति ही उसकी पहचान होती है । जैसे हम दशकों से  से यह सुनते आए हो कि काशी दुनिया से अलग शिवजी के त्रिशूल पर है, यानी उसका कुछ भौगोलिक वैशिष्ट्य है ,उसी तरह जरा कोलकाता के बारे में सोचिए?         
कोलकाता औसत समुद्र तल से केवल 20 फुट ऊपर है। इसलिए यहां जल निकासी की व्यवस्था बहुत कठिन है। यहां तक कि साधारण बारिश का पानी भी यहां निकलना कठिन हो जाता है। इसके अलावा समुद्र में समय-असमय आने वाला ज्वार इसे और भी कठिन बना देता है।
    कोलकाता के वैज्ञानिकों के अनुसार शहर में डूब की स्थिति बड़ी विकट है। विगत दो दशकों में पच्चीस लाख लोग इससे प्रभावित हुए हैं। शहर 1930 के बाद पूरब की तरफ बढ़ने लगा और आजादी के बाद यह बढ़ना और तेज हो गया कोलकाता महानगर विकास प्राधिकरण  तथा शहर के परिप्रेक्ष्य में 1990 में बनी विकास की योजनाओं में जल निकासी की कमी को को नजरअंदाज कर दिया गया। कोलकाता शहर के पुराने खाल या कहें नहर प्रणाली जो विगत तीन सदी से एक अच्छी जल निकासी व्यवस्था के रूप में काम कर रही थी वह मरम्मत के बिना समाप्तप्राय  है। इसके अलावा शहर से बाहर निकलने वाले कई नाले, नालिया और खाल भर गए है । साथ ही रोज निकलने वाला कूड़ा बढ़ती आबादी के साथ बढ़ता गया और उसे निपटाना समस्या बनती गई।
        कोलकाता की मूल जल निकासी व्यवस्था उसके सब बेसिन की जल निकासी क्षमता पर आधारित लेकिन धुआंधार विकास के कारण सब बेसिन नष्ट हो गए या उन पर बहुत ज्यादा दबाव बढ़ गया। कुल मिलाकर कह सकते हैं यह शहर अत्यंत प्राचीन है और यहां की जलजमाव की समस्या कई समस्याओं से जुड़ी है और इसके लिए किसी एक समस्या को खोज पाना बड़ा कठिन है। एक तरफ जमीन की बनावट ,उसकी भौगोलिक स्थिति, बारिश इत्यादि कारण है तो दूसरी तरफ जल निकासी व्यवस्था का अभाव शहरीकरण के कारण जनसंख्या में विस्तार शहर के उत्तर से दक्षिण भाग की ओर लोगों का पुनर्वास इत्यादि कारण है। यहां के शहर के लोबगों को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि इसकी व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए उनका भी कुछ न कुछ कर्तव्य है और वह शहर के विकास के लिए सरकारी योजनाओं के अमल में सहयोग करें ना कि संसाधनों के दुरुपयोग से उनका गलत उपभोग करें।

Friday, August 16, 2019

अपना टाइम आ गया है

अपना टाइम आ गया है

स्वाधीनता दिवस की 73 वी वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से देश को संबोधित किया तो उनके बॉडी लैंग्वेज से लेकर शब्दों के चयन और हालातों के बयान तथा आने वाले दिनों की योजनाओं के बारे में उनकी बातों ऐसा लगा कि भारत को एक महाशक्ति बनने का समय आ गया। वैसे भी जो नकारात्मक सोच के लोग हैं वे साल दर साल की उपलब्धियों को गिनते हैं, लेकिन किसी देश के इतिहास में खासकर भारत जैसे प्राचीन सभ्यता वाले देश के इतिहास में काल की गणना दशकों में नहीं सदियों में होती है। भारत के आजाद हुए मात्र 72 वर्ष हुए हैं और इतिहास में काल गणना के लिहाज से यह एक नया देश है। ऐसे में जरूरी है कि इतिहास के भविष्यत गलियारों में उत्पन्न होने वाली चुनौतियों और अवसरों का विश्लेषण किया जाए। मौर्य काल के बाद भारत एक विशेष किस्म के व्यामोह में फंस गया।  बाद में वह मध्य एशिया के आक्रमणकारियों तथा यूरोप के बंदूकधारी व्यापारियों के कब्जे में आ गया।  इन हालातों ने एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा किया ।  आज भी हमारा देश उसी प्रभाव की खिड़की से खुद को और दुनिया को देखता है। अब भारत इस हालत से खुद को मुक्त कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बातें कर रहा है तथा उन महा शक्तियों की बराबरी करने जा रहा है जो कल तक हमें हीन समझते थे। देश एक मृदु सत्ता की श्रेणी से उठकर एक दृढ़ शक्ति के रूप में खुद को स्थापित करने की स्थिति में आ गया है। धारा 370 को समाप्त किया जाना हमारे देश की इसी दृढ़ता का प्रमाण है।
      लाल किले से राष्ट्र को लगातार अपने छठे संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा, "हम समस्याओं को टालते नहीं, पालते नहीं" , यह जुमला जन कल्याण के लिए उनकी दृढ़ता और संकल्प को प्रतिध्वनित करता है। इससे साफ जाहिर होता है कि भारत की सत्ता कठिन समस्याओं से  कतरा कर निकलने वाली नहीं है वह उनका भी समाधान करेगी । मोदी जी ने तीन तलाक और कश्मीर में धारा 370 को हटाए जाने के बारे में काफी कुछ कहा। उन्होंने कहा कि अब तक किसी को इन स्थितियों को बदलने क्या इस पर बात करने का साहस नहीं था। भाजपा सरकार ने इसे खत्म कर डाला। इसका विरोध करने वाले विपक्षी दलों को चुनौती देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर वे इसे इतना ही जरूरी समझते थे तो इन धाराओं को उन्होंने स्थाई क्यों नहीं किया, क्यों इसे अस्थाई रहने दिया। मोदी जी को मालूम था कि इन बातों पर विपक्ष की बोलती बंद हो जाएगी।
        प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से स्वाधीनता दिवस के अपने संबोधन में देश के भविष्य के लिए रोड मैप भी पेश किया। उन्होंने  कहा कि  " हम देश को अगले 5 वर्षों में 5 खरब डालर की अर्थव्यवस्था बना देंगे। विगत 5 वर्षों में हमने अर्थव्यवस्था में एक अरब डालर की वृद्धि की है।" कुछ लोग उनकी इस बात की आलोचना करते हुए कहते हैं कि अर्थव्यवस्था के निराशाजनक तथ्य इस कथन की स्पष्ट रूप से खिल्ली उड़ाते हैं । कई क्षेत्र मंदी की मार से ग्रस्त हैं। बेरोजगारी बढ़ती जा रही है और बढ़ती हुई है वह पिछले 4 वर्षों में सबसे निचली अवस्था पर पहुंच गई है। कोई भी चाहे वह मोदी हों या अन्य ,आर्थिक विपदा को नहीं स्वीकार करता है ।  स्वाधीनता दिवस जैसे अवसरों पर उनकी अन्य बातों पर कैसे यकीन किया जाए।
        मोदी जी ने कई और महत्वपूर्ण योजनाओं को गिनाया जिनमें ढांचा विकास परियोजनाओं में 101 खराब डालर के निवेश, जल शक्ति मिशन पर 3.5 खरब डालर का खर्च एवं "इज ऑफ डूइंग बिजनेस"  के मामले में दुनिया के 50 देशों मैं शामिल होना। तीनों सेना के प्रमुख के पद का निर्माण और प्लास्टिक के उपयोग पर रोक के अभियान इत्यादि भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि अब धीमी विकास का वक्त खत्म हो गया है। हमें और छलांग लगानी होगी। प्रधानमंत्री जो अक्सर स्वाधीनता दिवस के अपने भाषणों का बड़ी-बड़ी घोषणाओं के लिए उपयोग करते रहे हैं इस वर्ष भी उन्होंने जनसंख्या वृद्धि की समस्याओं पर बहुत देर तक अपने विचार रखे।  परिवारों को सीमित करने का अनुरोध किया। यहां सवाल उठता है कि आने वाले दिनों में परिवार सीमित करने के लिए क्या किसी कठोर व्यवस्था को अपनाया जाएगा? अब यह तो समय ही बताएगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि जनसंख्या विस्फोट आने वाली पीढ़ी के लिए अनेक संकट पैदा करेगा। उन्होंने कहा हमारे देश में एक जागरूक वर्ग ऐसा भी है जो इस बात को भलीभांति समझता है।  तेजी से बढ़ती जनसंख्या को जनसंख्या विस्फोट का नाम दिया है। भारत की वर्तमान आबादी 130 करोड़ से भी ज्यादा है और यह बुरी तरह बढ़ रही है। इस समस्या पर हाल में जंतर मंतर में एक सभा का आयोजन किया गया था। क्या ट्रेजेडी है हमारे देश की कि एक विचारधारा विशेष के लिए आयोजित यह सभा एक धर्म विशेष के खिलाफ प्रोपेगेंडा का प्लेटफॉर्म बन गई। प्रधानमंत्री द्वारा जनसंख्या को काबू किये जाने की अपील को एक मजबूत पहल माना जा सकता है। देश में लंबे अरसे से "हम दो हमारे दो " का नारा चल रहा था।  इसका असर नहीं दिख रहा था। आज मोदी जी की बात से ऐसा लग रहा है कि हमारा देश और हमारी सरकार  भौतिक शास्त्र के पुराने सिद्धांतों को छोड़कर नवीन भौतिक शास्त्र जिसे "क्वांटम फिजिक्स " कहते हैं, उसके सिद्धांतों को पढ़ने लगी है। इसमें स्पष्ट है कि पृथ्वी की हर घटना एक दूसरे से संबद्ध होती है । उन्होंने यह स्वीकार किया है कि विकास और धन अगर छोटे समूहों में विभाजित किया जाए दो बेरोजगारी और गरीबी कम होगी। पहले नीति से संबंध सवाल उठाए जाते थे कि  जनसंख्या नियंत्रण लोकतांत्रिक विचार कैसे हो जाएगा? बलात जनसंख्या नियंत्रण के उपाय चीन की तरह स्थिति पैदा कर देंगे। अभी तक "डेमोग्राफिक डिविडेंड" की बात चलती थी लेकिन यह व्यवस्था तभी संभव है जब शिक्षा, रोजगार और रोजगार के लायक बनाए जाने का हुनर एक साथ जुड़े। अब शायद ऐसा नहीं हो पा रहा है। आपातकाल के जमाने में जबरन परिवार नियोजन शुरू किया गया और आपातकाल असफल हो गया। यह पहला अवसर है जब प्रधानमंत्री परिवार को सीमित करने के लिए खुद प्रयास किए जाने की अपील कर रहे हैं। मोदी जी यह समझते हैं कि जब तक स्वयं प्रयास न किया जाए जनसंख्या नियंत्रण नहीं किए हो सकता और उसका लाभ नहीं मिल सकता। इसलिए प्रधानमंत्री ने इस पर कदम आगे बढ़ाने की जनता से अपील की यह एक समझदारी भरी पहल है लेकिन इसका प्रभाव बहुत देर से दिखेगा।

Wednesday, August 14, 2019

आजादी का जश्न क्यों मनाते हैं 

आजादी का जश्न क्यों मनाते हैं 
आज हमारे देश का स्वाधीनता दिवस है। 1947 को इसी दिन हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र हुआ था और हमें अपना मुकद्दर खुद लिखने का हक हासिल हुआ था। उस दिन से यह एक परंपरा बन गई है कि इस दिन को हम जश्न के साथ मनाएं। आजादी मनुष्य का बुनियादी हक है जिससे वह स्वतंत्र माहौल में चिंतन कर सके और इंसानियत के लिए कुछ भला कर सके। हमारे पूर्वजों ने इसी हक को हासिल करने के लिए अनगिनत कुर्बानियां दीं। इस हक को हासिल करने की जंग किसी खास आदमी का सपना नहीं बल्कि उस  पीढ़ी का उद्देश्य था जिसने अंग्रेजों को खुल्लम खुल्ला चुनौती दी थी कि " देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।" 
       पिछले पांच सात वर्षों से हमारे देश में देश भक्ति या  देश प्रेम का ज्वार आया हुआ है। ऐसे में एक प्रश्न प्रासंगिक है कि देश क्या है? भारत से आप क्या समझते हैं और देश प्रेम क्या है? स्वाधीनता का यह पर्व क्यों मनाते हैं? अलग-अलग लोग अलग-अलग व्याख्या करेंगे। अगर पूछें कि वह कौन सी अमूर्त भावना है जो दिखती नहीं है लेकिन हमें बांधे रखती है? बकौल नादीन गाडीमर "भावनाएं आत्मा की घटनाएं हैं।" हावड़ा पुल को पार करते समय हममें से बहुतों ने देखा होगा कि पुल से गुजरते हुए लोग नदी को प्रणाम करते हैं।  अगर नदी पर गौर करें तो वह एक मटमैली सी धारा होती है। मनोवैज्ञानिक तौर पर देखें तो प्रणाम करने की घटना किसी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप नहीं है बल्कि भीतर से उत्पन्न स्वउच्छवासित घटना है। आप कहीं उंगली रखकर नहीं कर सकते यही देश है। यानी इसका कोई मूर्त रूप नहीं देख सकता। यही भावना देश प्रेम है। दरअसल यह भावना एक स्मृति है जीवन से अधिक विराट और समय की सीमा से परे। देश प्रेम एक चिरंतन घटना है जो हर पीढ़ी के भीतर है, उसकी आत्मा में है। यह एक शक्ति है जो अचेतन में अन्तरगुम्फित होती है इसी अन्तरगुम्फन के कारण पत्थर का एक टुकड़ा शिव बन जाता है ,पर्वत कैलाश और गंगा मां बन जाती है।
        "श्मशान में साधते शंकर जीवन स्रोत
मरण रास के तमस में जैसे अभिनव ज्योत"
   जो लोग आज देश प्रेम या राष्ट्रभक्त पर सवाल उठाते हैं उन्हें यह स्पष्ट समझना चाहिए कि यह व्यक्ति जीवंत पवित्रता का गौरव है जो एक प्रकार की धार्मिक संवेदना ग्रहण कर लेता है। यही आत्मीय उपकरण राष्ट्रभक्ति की भावना को उत्पन्न करता है। कभी आपने राम पर गौर किया है। जी हां उस अयोध्या के राम पर। राम को अगर दर्शन के नजरिए से अलग कर दें तो वह एक पौराणिक कथा के रूपक हैं। एक रूपक का ऐसा जीवंत स्वरूप वहीं संभव है जहां भूगोल की देह पर संस्कृति की रचना हुई है। यही संस्कृति रचना एक झुंड में चलते हुए लोगों की यात्रा को तीर्थ यात्रा बना देती है। कुछ लोगों को वंदे मातरम में सांप्रदायिकता नजर आती है। वे यह नहीं समझ पाते की प्रेम की भावना को स्मृतियों और इतिहास में सनी पीड़ा से पृथक कर देने से भावना की पवित्रता नष्ट हो जाती है। उसकी गरिमा समाप्त हो जाती है। ऐसा इसलिए कि हम इतिहास की व्यथा को उस स्मृति के साथ देख सकें और महसूस कर सकें। इतिहास अध्ययन करते वक्त उसके हर पायदान पर समाजशास्त्र और दर्शन का एहसास होता है। ऐसा इसलिए होता है कि इतिहास की घटना समाज और उसकी सोच के दबावों के फलस्वरूप घटती है। इतिहास की घटनाएं  संगीत की लयबद्धता  की तरह हुआ करती हैं  जिसमें छोटे-छोटे वाद्य अनुशासित ढंग से सम्मिलित होकर एक नए सुर का जन्म देते हैं।
         आज कश्मीर सुर्ख़ियों में है। सुर्ख़ियों में इस लिए नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां से धारा 370 हटा दिया या इशारा किया कि अगला निशाना अधिकृत कश्मीर पर है। पूरे देश में सनसनी मच गई है ऐसा इसलिए हुआ है कश्मीर केवल भारत का अंग ही नहीं है बल्कि अलबरूनी के शब्दों में "कश्मीर हिंदू दर्शन और आध्यात्मिक शोध का काशी के बाद सबसे बड़ा केंद्र है।" जरा ग़ौर करें कि क्या हम राज तरंगिणी जैसी एतिहासिक रचनाओं को अपनी  पारंपरिक चिंता धारा से अलग कर सकते हैं? कश्मीर की चर्चा इसलिए है कि इस की सीमाएं समय के साथ साथ संस्कृति के नक्शे में बदल गई। हमारे स्वतंत्रता संघर्ष की अंधेरी रातों को इसी संस्कृति की ज्योत ने आलोकित किया। बेशक कई दबाओं और तूफानी झोंकों के कारण वह लौ थोड़ी डगमगा रही है लेकिन लोगों के भीतर राष्ट्रप्रेम  कायम  है तो इसका कारण यह आश्वासन है कि यह वह ज्योति जल रही है।  यही कारण है कि "आज तेरी हिम्मत की चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है।"

Tuesday, August 13, 2019

सरकार चुस्त : अर्थव्यवस्था सुस्त

सरकार चुस्त : अर्थव्यवस्था सुस्त

कल हमारे देश का 75 वां स्वाधीनता दिवस है इस अवसर पर यकीनन सरकार की ओर से बड़ी-बड़ी बातें कहीं जाएंगी। जमीन से लेकर आसमान तक कई मिसाले गढ़ी जाएंगी और इसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है हमारे देश की अर्थव्यवस्था की सुस्ती। जिस पर शायद कल बातें ना हो और यदि होंगी तो उनमें  ढेर सारी चीजें ऐसी होंगी जिनका हकीकत से नाता नहीं है । आज सच यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार बहुत धीमी है और  यह धीमापन भी वेग ह्रास  से ग्रसित मालूम पड़ रहा है । करीब 6 महीने पहले भारतीय बाजार के लगभग हर क्षेत्र में मंदी रही थी। आंकड़े कह रहे थे कि देश में बेरोजगारी 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है । लेकिन उस समय चुनाव का माहौल था और इस तरह की खबरें राजनीतिक सुर्खियों में नकारा साबित हुईं। आम चुनाव के बाद जब नई सरकार बनी और श्री नरेंद्र मोदी को निर्णायक जनादेश मिला तो अर्थशास्त्रियों को उम्मीद थी कि सरकार कुछ ऐसे कदम उठाएगी जिससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ेगी और माहौल खुशनुमा होगा। लेकिन इसका असर विपरीत हुआ । बजट के एक पखवाड़े के बाद ही अखबारों में खबर देखने को मिलने लगी है कि मंदी की ओर अर्थव्यवस्था बढ़ रही है फिर शेयर बाजार टूटने लगे। बेशक सरकार यह ना माने कि हालात बिगड़ रहे हैं लेकिन भीतर ही भीतर उसे अंदाजा लग चुका है। प्रधानमंत्री कार्यालय बेचैन है और ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि बजट के प्रावधानों में बदलाव लाए जाएंगे।
       मंदी को समझने के लिए किसी बड़े अर्थशास्त्री या अर्थशास्त्र का बहुत ज्ञान होने की जरूरत नहीं है। देश का व्यापारिक माहौल  भी इस ओर इशारा कर रहा है । ऑटोमोबाइल सेक्टर की रफ्तार धीमी होती जा रही है और यह पिछले 3 महीनों से गिरने लगा है। बाजार के आंकड़े बताते हैं कि जून में गाड़ियों की बिक्री इतनी कम रही है जितनी पिछले 19  वर्षों में नहीं थी जुलाई में हालत और बिगड़ने लगी गाड़ियों की बिक्री और कम हो गई। कई कारखाने तो ऐसे हैं जहां से अस्थाई कर्मचारियों को हटा दिया गया या भारी कमी की गई । देश में वाहन डीलरशिप यूनिट्स तेजी से बंद हो रही हैं। बिक्री में गिरावट केवल मोटर कारों में नहीं है बल्कि ट्रैक्टर और ट्रकों में भी है। मोटर कार के या कहें कि मोटर वाहन बिक्री में तेजी से गिरावट असर फाइनेंस कंपनियों पर भी पड़ रहा है। क्योंकि इन दोनों में आपसी तालमेल होता है।  अगर यही हालात रहे तो आने वाले दिनों में बड़ी संख्या में लोगों की रोजी-रोटी छिन जाएगी । कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में भी यही हालत है। मकान बन कर तैयार हैं लेकिन खरीदार नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि देश के लगभग 30 शहरों में 12 लाख 75 हजार फ्लैट्स बन कर तैयार हैं लेकिन  खरीदार नहीं हैं। बिल्डरों पर कर्ज का संकट बढ़ रहा है। यद्यपि बजट में सरकार ने इस ओर प्रोत्साहन जरूर दिए हैं लेकिन अभी तक उनका तो प्रभाव नहीं दिख रहा है। कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में अकुशल मजदूरों को रोजगार मिलता रहा है या ऐसा कहें उनके लिए यह रोजगार का बड़ा स्रोत रहा है। लेकिन अब वह स्रोत खत्म होता था नजर आ रहा है। फलस्वरूप अकुशल मजदूरों की नौकरियां जा रही हैं । यह लोग गांव लौट रहे हैं । खेतों पर बोझ बढ़ रहा है। अकाल और अनावृष्टि के कारण पहले ही खरीफ की बुआई नहीं हो सकी है और बाढ़ ने स्थिति को और बिगाड़ दिया। ऐसा लग रहा है कि गांव में भुखमरी आ जाएगी।
         उधर बजट के बाद शेयर बाजार में तेजी से गिरावट आने लगी है। भविष्य बताते हैं कि गिरावट ने विगत 17 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया । बजट में सुपर रिच टेक्स के कारण विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना पैसा निकाल रहे हैं। आर्थिक क्षेत्र के विशेषज्ञ बताते हैं किस सिर्फ जुलाई में भारतीय इक्विटी बाजार से 11000 करोड़ रुपए निकाले जा चुके हैं। इसके अलावा कंपनियों के लिए पब्लिक होल्डिंग बढ़ाए जाने के प्रस्ताव से शेयर बाजार में गिरावट लगातार चल रही है। कहां पर यहां तक जा रहा है कि जुलाई में शेयर बाजार की हालत खस्ता होने के कारण निवेशक 10,000 करोड़ से ज्यादा गवा चुके हैं।
          कॉरपोरेट जगत आर्थिक नीतियों के खिलाफ लामबंद होता नजर आ रहा है। यही नहीं छोटे- छोटे शहरों में भी लघु उद्योगों की हालत बिगड़ती जा रही है। इन स्थितियों को देखते हुए यह भय लगने लगा है कि आर्थिक स्थिति मंदी की तरफ बढ़ रही है। कुछ लोगों का तर्क है कि अर्थव्यवस्था के चक्कर में ऐसा समय आता है । लेकिन वह समय अस्थाई होता है यहां तो काफी समय लग चुका है। जीडीपी वैश्विक रैंकिंग में भारत की अर्थव्यवस्था फिसल कर सातवें स्थान पर आ गयी है। 2018 के लिए विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक जीडीपी के मामले में ब्रिटेन और फ्रांस क्रमशः पांचवें और छठे स्थान पर आ गए हैं। 2017 में भारत  ब्रिटेन को पछाड़कर पांचवा स्थान हासिल कर चुका था।  फिर वह नीचे की तरफ सरकने लगा है। रिपोर्ट के अनुसार डॉलर के मुकाबले रुपए के कमजोर होने से भारत की अर्थव्यवस्था को झटका लगा है।

Monday, August 12, 2019

इमरान खान! भारत बदल चुका है!!

इमरान खान! भारत बदल चुका है!!

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को अमरीका की यात्रा से लौटे और  राष्ट्रपति  डोनल ट्रंप द्वारा कश्मीर पर मध्यस्थता करने की पेशकश के बमुश्किल एक पखवाड़ा भी नहीं गुजरा होगा कि भारत सरकार ने कश्मीर में लागू धारा 370 और 35 ए को समाप्त कर दिया।  इमरान खान बेचारगी भरे गुस्से में आग बबूला होते रहे । यही नहीं  जब  इमरान खान  डलास  हवाई अड्डे पर पहुंचे  तो  कथित रूप से  अमरीकी प्रशासन का  कोई भी  बड़ा अधिकारी  उनकी  अगवानी के लिए वहां नहीं था । इसके विपरीत प्रधानमंत्री इमरान खान  के साथ गए पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल बाजवा को गार्ड ऑफ ऑनर मिला और जब वे पेंटागन पहुंचे तो इक्कीस तोपों की सलामी दी गई । सेना की संयुक्त कमान के अध्यक्ष जोसेफ एफ डनफोर्ड मे उनकी अगवानी की। उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप और अमरीकी विदेश सचिव माइक पॉम्पियो से खास मुलाकात की। अमरीकी और बाकी दुनिया के लोग यह बखूबी जानते हैं कि पाकिस्तान में सत्ता किसके हाथ में है।  इस बार भी अमेरिकीयों ने कोई गलती नहीं की। इस सबके बावजूद पेंटागन ने पाकिस्तान के एफ 16 युद्धक विमानों के लिए 12.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर की तकनीकी तथा अन्य सहायता दी।
       इन सब के परिप्रेक्ष्य में धारा 370 हटाए जाने मामले में इमरान खान और पाकिस्तानी फौज भारत के खिलाफ अपना गुस्सा दिखाएगी यहां तक कि अगर सचमुच वे कुछ नहीं कर सकते फिर भी वे ऐसा दिखावा करेंगे कि वह कुछ कर रहे हैं। अगर ऐसा नहीं करते हैं तो उनके यहां विपक्षी दल , जिहादी और सेना गड़बड़ी पैदा कर देगी। यह सब लज्जित होने के बाद  बेकरारी भरे गुस्से से उपजा आचरण है। पाकिस्तान राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जाने की धमकी दे रहा और ओआईसी में गुहार लगा  चुका है फिर भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुप है। अगर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने कोई कदम उठाता है या भारत के इस कदम को चुनौती देता है तो यह कुछ वैसा ही होगा जैसे कोई देश एक हाथ में भीख का कटोरा और दूसरे हाथ में चाकू ले कर घूम रहा हो। इमरान खान भारत के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगा सकते है और भारत को भूखा मारने की खोखली धमकी दे सकते हैं।  भारत सरकार से कह सकते हैं कि धारा 370 को फिर से लागू करें । अगर वह ऐसा करते हैं तो यह भारत के लिए राहत होगी। क्योंकि हमें कूटनीतिक विवरणों की तरफ नहीं जाना पड़ेगा। क्योंकि पाकिस्तान हर दम कूटनीतिक विवरणों के गलत मायने निकालता है। पाकिस्तान विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दरवाजे खटखटा सकता है। हो सकता है मनोवैज्ञानिक युद्ध आरंभ कर दे और कश्मीर में अशांति फैला दे। जिसका सबूत कश्मीर में जैश के आतंकियों के प्रवेश की खबर से प्रतीत होता है। या फिर ,वह करतारपुर गलियारे को बंद कर दे जैसा कि उसने समझौता एक्सप्रेस के साथ किया। यकीनन पाकिस्तान अपने देश में ट्रेंड और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में लड़ चुके 30 - 40 हजार आतंकियों को भी छुट्टा छोड़ सकता है। अब इमरान खान के पास एक विकल्प है कि वह अमरीका और ब्रिटेन को अमान्य कर दे और आतंकियों को खुला छोड़ दे, अथवा वह पाकिस्तानी सेना को अमान्य कर दे और सभी आतंकी शिविरों को बंद करने का आदेश दे। क्योंकि, पाकिस्तानी सेना भारत के साथ जंग नहीं लड़ सकती। फिलहाल जैसी स्थिति है उसमें  अमरीका तथा अन्य देशों ने कश्मीर के मामले को भारत का आंतरिक मामला बताया है अब केवल चीन ही एक बड़ा देश है जो  इस मामले को शांतिपूर्ण बातचीत से हल करने की वकालत कर रहा है। भारत ने अभी तक चीन में उइगर मुसलमानों पर चल रहे हो हमलों के प्रति किसी तरह का कोई बयान नहीं जारी किया है लेकिन अब वक्त आ गया है कि हम  चीन को भी जवाब दें और बिल्कुल ताकतवर ढंग से तथा तीखे अंदाज में जवाब दें। पाकिस्तान और भारत के बहुत से लोग नरेंद्र मोदी की इस खूबी को समझने में नाकामयाब हो गए हैं। वह है हैरत में डाल देने की उनकी खूबी। वह किसी को भी हैरत में डाल सकते हैं। चाहे वह अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क के नेताओं को आमंत्रण हो या नवाज शरीफ की पोती की शादी में अचानक पहुंच जाना और बधाई देना हो। इससे पाकिस्तानी जनरल थोड़े नाराज हो गए थे और उन्होंने कई आतंकी हमले भी करवाए थे। उसी तरह उरी और पुलवामा हमला के प्रति प्रतिक्रिया से साफ जाहिर होता है कि भारत बदल चुका है इससे पता चलता है कि भारत जंग से नहीं डरता लेकिन शुरू नहीं करेगा।
        अब धारा 370 और 35 ए कानून की किताबों से बाहर हो गए। यह एक संपूर्ण रूप से कानूनी प्रक्रिया थी। क्योंकि भारत ने इसे 1954 में लागू किया था और अब उसे हटा दिया गया। दोनों कार्रवाइयां  एकतरफा थीं। इसमें कहीं भी राष्ट्र संघ वगैरा कुछ नहीं था। अगले कुछ सप्ताह बहुत सावधान रहना होगा। सड़कों पर वाहन सामान्यतया चल रहे हैं और मस्जिदों में नमाज भी अदा की जा रही है। यह सब सकारात्मक संकेत हैं।  इस सामान्य स्थिति को वास्तविक शांति समझने की गलती नहीं होनी चाहिए। अफवाहबाजों से सावधान रहना होगा। यह एक ऐसा खेल है जिसमें जो पहले मारेगा वह जीतेगा बाद में बकबक से कुछ नहीं होने वाला है। इसलिए सुरक्षा उपायों में ढील नहीं दिया जाना उचित है। नागरिकता के मामलों को सुलझाने का काम, कश्मीरी पंडितों की वापसी और जम्मू कश्मीर चुनाव जितनी जल्दी हो सके हो कराया जाना चाहिए। फिर भी यह सब  रात तो हो नहीं सकता है । हमने 70 वर्षों तक प्रतीक्षा की थोड़े दिन और कर लेंगे।

Sunday, August 11, 2019

देखिए आगे आगे होता है क्या

देखिए आगे आगे होता है क्या

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी ने ऐसा किया, खासकर करके कश्मीर को लेकर लगता है कि यह पार्टी सचमुच 21वीं सदी की राजनीतिक पार्टी है ना कि बीसवीं सदी के उत्तरकाल की । एक आधुनिक पार्टी की हैसियत से मोदी सरकार ने अपने शासन के पिछले दौर में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश की, शौचालय बनवाए, ग्रामीण क्षेत्रों का विद्युतीकरण किया, बैंक अकाउंट और डिजिटाइजेशन से लोगों को न केवल परिचित कराया बल्कि उसकी आदत डालने की भी कोशिश की। आज एक आम आदमी  तरह-तरह के डिजिटल लेन-देन कर रहा है। मोदी जी की सरकार ने अपने शासन से पहले दौर में सड़कें बनवाई, नहरे बनवाई और दूसरा दौर जब से शुरू हुआ है तब से सिर्फ सियासत हो रही है । नरेंद्र मोदी जवाहरलाल नेहरू और गांधी के युग के उत्तर काल का भारत बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।  कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने की प्रक्रिया उसी कोशिश की एक कड़ी है। गांधी के काल कि कुछ गांठ  हैं उन्हें काटना जरूरी है सुलझाना नहीं। जम्मू-कश्मीर भारतीय संविधान में एक इसी तरह की गांठ के रूप में मौजूद था। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने गांठ को काट डाला। धारा 370 हटा दी गई। इस धारा से देश के फेडरल ढांचे में एक अजीब विसंगति दिख रही थी। जम्मू कश्मीर और कह सकते हैं लद्दाख भी, पूरी तरह भारत का हिस्सा नहीं लगता था।। भारत के साथ कश्मीर का जुड़ाव  कुछ शर्तों के साथ हुआ था और उन शर्तों में बहुत से अधिकार कश्मीर की विधानसभा के थे ना कि भारत सरकार को। इसमें जो सबसे प्रमुख कमी थी वह थी भारत सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों का संपूर्ण लाभ कश्मीरियों को नहीं हासिल हो सकता था उसी तरह कश्मीर में उपलब्ध हर सुविधा उस क्षेत्र में भारत के अन्य भाग के लोगों को मयस्सर नहीं थी। ऐसा लगता था कि वह भारत का हिस्सा नहीं है। मोदी जी ने जम्मू और कश्मीर की इस स्थिति को बदल दिया। मोदी सरकार का पहला दौर नोटबंदी का था। वह एक अच्छा कदम था लेकिन गड़बड़ी यह हुई थी की समय अनुकूल नए नोट नहीं उपलब्ध हो सके थे। मोदी सरकार ने दूसरे दौर में इस बात पर सावधानी रखी कि जोर का झटका धीरे से लगे। अमित शाह मोदी जी को एक बेहतरीन पार्टनर के रूप में मिल गये। पूरा ऑपरेशन गुप्त रहा। अर्धसैनिक बल भेजे गये, पर्यटकों को वहां से हटाया गया। हालांकि कश्मीर पुनर्गठन विधेयक सूची बद्ध था लेकिन शुरुआत ऊपर से हुई। पहले राष्ट्रपति ने इस पर टिक लगाया। ऐसा करने का एक कानूनी कारण था वह कि जम्मू-कश्मीर राष्ट्रपति शासन के अधीन था और वहां विधानसभा भंग कर दी गई थी। संसद को जम्मू कश्मीर की ओर से कानून बनाने और लागू करने का अधिकार था। यह एक पतला गलियारा था, लेकिन धारा 370 को हटाने के लिए वांछित संवैधानिक  जरूरतों को पूरी करता था। कश्मीर को विभाजित कर ना इस कानून का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा था। लद्दाख एक विशाल क्षेत्र है और  जम्मू कश्मीर से पूरी तरह अलग है। यह बौद्ध बहुल है और सौर ऊर्जा का एक विशाल स्रोत है। यह भारत का पहला बौद्ध केंद्र शासित क्षेत्र है। लद्दाख कि जनता ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है।
अब यहां एक महत्वपूर्ण विवाद उठ रहा है कि क्या इस बदलाव से कश्मीर की अपनी पहचान नहीं खो देगा? लेकिन यहां पूछा जा सकता है कौन सी पहचान ? क्या वह कश्मीर जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों समभाव से निवास करते थे?  या वह  कश्मीर जहां मुस्लिम औरतें बिना बुर्के लगाए जाती थी और मस्जिदों में नमाज पढ़ती थी, या फिर वह कश्मीर जहां से पंडितों को खदेड़ दिया गया था और इस्लाम अपने संपूर्ण रूढ़ीवादी स्वरूप में कायम था? पिछले गुरुवार को प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कश्मीर का जिक्र करते हुए कहा कि वह कश्मीर जो भारतीय सिनेमा वालों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय था और वहां की धरती  पर रोमांटिक गाने फिल्माए जाते थे। उन्होंने फिल्म बनाने वालों से अनुरोध किया कि   वे दोबारा घाटी में आएं । क्योंकि जो कश्मीर कुछ दिन पहले था वह अब समाप्त हो गया। वह कश्मीर राजनीतिक अलगाववाद से नहीं बल्कि नए इस्लाम अस्तित्व में आने से बना था।
        भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली ने परिवर्तन के लिए निर्णायक मतदान किया था। मोदी जी की पहली विजय को पुरानी पार्टी के नेताओं ने एक गलती बतायी थी। दूसरी विजय ने इसे 21वीं सदी की शासक पार्टी बना दिया और अब मोदी के तीसरे दौर के लिए भी तैयार रहिए।