104 वर्षों से विवाद में फंसे राम मंदिर का 9 नवंबर 2019 को फैसला हुआ। सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया। 9 नवंबर बड़ा ही ऐतिहासिक दिन है इस दिन कई दीवारें गिरीं और आस्था के माध्यम से दिलों को मिलाने के लिए कई नए पुल बने। इतिहास को देखें इसी दिन यानी 9 नवंबर को ही बर्लिन की दीवार गिराई गई थी और जर्मनी एक हो गया था। इसी दिन करतारपुर साहिब कॉरिडोर खोला गया और भारत और पाकिस्तान के सिखों के दिल मिल गए। यही नहीं 104 बरस पुराने अयोध्या विवाद इसी दिन खत्म हुआ और इस फैसले से भारत के इतिहास में शांति और सौहार्द का एक नया सुनहरा पृष्ठ जुड़ गया।
पूरे मामले में जो सबसे दिलचस्प तथ्य है वह है सुप्रीम कोर्ट द्वारा रामलला विराजमान को एक पक्ष स्वीकार किया जाना। 1989 में जब बर्लिन की दीवार गिराई गई थी उसी वर्ष हिंदू पक्ष में रामलला विराजमान को भी इस विवाद को मिटाने के लिए एक पक्ष बनाने का फैसला किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस फैसले के बाद दो बहुत ही महत्वपूर्ण बातें कहीं। एक तो उन्होंने कहा यह राम रहीम नहीं भारत की भक्ति का वक्त है और दूसरी बात राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कही कि आपसी सद्भाव तथा सौहार्द बनाए रखें। पहली बार मोदी जी ने कोई चुनौतीपूर्ण बात नहीं कही ,नाही किसी को ललकारते हुए कुछ ऐसा कहा जिससे किसी को बुरा लगे। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों को एक होकर राष्ट्र निर्माण में आगे आने का आह्वान किया।
इस पूरे मामले में जो सबसे महत्वपूर्ण तत्व है वह है सुप्रीम कोर्ट ने माना कि रामलला का भी हक बनता है और उनकी भी हैसियत है। धर्म और आस्था के इस इंटरप्ले में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आज के युग में बहुत मायने रखता है। राम हमारी संस्कृति के न केवल अगुआ थे बल्कि आपसी सौहार्द के ज्वलंत प्रतीक भी थे।
वक्त और फैसले का कुछ ऐसा सामंजस्य रहा कि अब तक विरोध में खड़े मुस्लिम समाज के नेता भी अपना सुर बदलते दिखे और उनका नजरिया भी शांति सौहार्द तथा राष्ट्रीयता का दिखा। शाही इमाम अहमद बुखारी ने स्पष्ट कहा किस देश में शांति रहनी चाहिए यह हिंदू मुस्लिम बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, फैसला मुसलमानों के पक्ष में नहीं आया है लेकिन इसे माना जाएगा और इसे मानने के लिए देश के मुसलमान भी तैयार हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के बयान पर उम्मीद जाहिर की कि मुल्क में सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ेगा। अब इस फैसले को चुनौती नहीं दी जानी चाहिए। कोर्ट का फैसला मान लिया जाना चाहिए। इस फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जमीयत उलेमा ए हिंद के मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह फैसला हमारी अपेक्षा के अनुकूल नहीं है लेकिन सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च संस्था है उन्होंने देशवासियों से अपील की इस फैसले को हार जीत की दृष्टि से ना देखें और भाईचारा बनाए रखें।
ऊपर रामलला की चर्चा की गई थी यह चर्चा इसलिए भी आवश्यक है कि पहली बार किसी अदालत ने राम को एक सामाजिक अस्तित्व माना है और इसी अस्तित्व के कारण हमारे समाज में समरसता और सौहार्द के लक्षण स्पष्ट होने लगे हैं। मानव जीवन में एक धारावाहिकता है और मनुष्य में सामाजिक रूप से जीवन और अनुभूति के स्तर पर गुणात्मक विकास होता रहा है। यह मनुष्य का एक समग्र मनोविज्ञान है इस मनोविज्ञान के बाद ही जातियों तथा धर्मों का अस्तित्व आरंभ होता है। यही कारण है कि हर विद्वेष के बाद मनुष्य कर्म प्रयोजन और सापेक्षवाद के स्तर पर इतिहास की चीज बन जाता है। इस प्रकार परस्पर वार्ता के स्तर पर मानव जीवन में एक अजस्रता होती है इसीलिए व्यक्ति और समाज में अटूट संबंध होता है। अभी तक धार्मिक बिंब या प्रतीक चिन्ह इस संबंध को कायम रखने का प्रयास करते थे। कई बार कामयाबी भी मिली और कई बार नहीं। लेकिन इस फैसले में रामलला को शामिल किए जाने से सबसे बड़ी उपलब्धि हुई है वह है विषय और अर्थ जो कभी पृथक थे वह आपस में जुड़ गए और भविष्य का पशु व्यवहार भी अर्थ क्रियात्मक हो गया। जो इतिहास था उसमें व्यक्ति और समाज की भूमिका पृथक थी लेकिन इस फैसले के बाद मानव विकास के इतिहास में समय लगता है लेकिन यहां व्यक्ति और समाज दोनों ही समान रूप से प्रधान हो गए और इसमें कोई प्राथमिक नहीं रह गया। मनुष्य की की मानवीय प्रवृत्ति सामाजिक होती जा रही है और मनुष्य अनेक मनुष्य के साथ एक सामान्य जीवन में भागीदार होना चाहता है। यही कारण है कि सांप्रदायिक तनाव से युक्त हमारे समाज में अचानक समरसता और सौहार्द की शुरुआत होती दिख रही है और यह शुभ लक्षण है। इस देश के भविष्य के लिए राम मंदिर का फैसला धार्मिक या आस्था का स्तर पर चाहे जो हो लेकिन सामाजिक स्तर पर उसकी यह भूमिका प्रशंसनीय है और देश के सभी नागरिकों तथा नेताओं को इस स्थिति को और मजबूत करने के प्रयास करने चाहिए। यही कारण है कि इसे यहां इस सदी का भारत भूमि पर सबसे बड़ा फैसला कहा गया है।
Sunday, November 10, 2019
भारत की भूमि पर एक सदी का सबसे बड़ा फैसला
Posted by pandeyhariram at 4:59 PM 0 comments
Friday, November 8, 2019
देश को अयोध्या के फैसले का इंतजार
जैसी उम्मीद है एक हफ्ते के भीतर चार दशकों से चल रहे अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाएगा। बहस इस बात पर नहीं है कि फैसला किस पक्ष के लिए होगा या फैसले में क्या होगा? चिंता इस बात की है कि फैसले के बाद क्या होगा ? देश का हर आदमी चाहता है कि शांति बनी रहे और कोर्ट का फैसला मान लिया जाए। अयोध्या में भी भारी चिंता व्याप्त है। पूरा शहर धड़कते दिल से तरह-तरह की आशंकाओं के बारे में अनुमान लगा रहा है। जैसी कि खबरें हैं पूरा अयोध्या शहर किले में तब्दील हो गया है। राज्य सरकार की पुलिस के अलावा केंद्र सरकार ने भी चार हजार अर्धसैनिक बलों को वहां भेजा है । रेलवे ने अपने पुलिस कर्मियों की छुट्टियां रद्द कर दीं हैं। प्रशासनिक स्तर पर किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने की पूरी तैयारी है। जगह-जगह पुलिस पैदल चलने वालों को और मोटरसाइकिल सवारों को चेक कर रही है उनकी तलाशी ली जा रही है। राम मंदिर जन्मभूमि के भीतर भी चारों तरफ आगंतुकों पर नजर रखी जा रही है। अयोध्या के बाहर धार्मिक और राजनीतिक स्तर पर विचार अलग-अलग लेकिन लगभग सभी चिंतित हिंदुओं में विचार है कि राम जन्मभूमि स्थल उन्हें सौंप दिया जाना चाहिए। मायावती ने ट्वीट कर कहा है समस्त देशवासी अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हर हाल में सम्मान करें । इसके अलावा मायावती ने केंद्र और राज्य सरकारों से भी अपनी संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी निभाने और जनमानस के जानमाल की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।
सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले में सुनवाई पिछले महीने खत्म हो चुकी है। अब देशभर की निगाहें इस मामले में कोर्ट के इस फैसले पर टिकी हुई है। फैसला आने से पहले लोगों में सद्भाव बनाए रखने के लिए सरकारों की तरफ से भी प्रयास हो रहे हैं। पंचकोशी परिक्रमा से लेकर अलग व्यवस्था की गई है। ड्रोन से अयोध्या शहर की निगरानी की जा रही है। अजोध्या को लेकर स्थानीय प्रशासन ने शांति समितियां बनाई हैं। इन समितियों में शामिल लोग जिले के गांव में जाकर लोगों से शांति और प्रेम बनाए रखने की अपील कर रहे हैं। बाहर के जिलों में दर्जनों की संख्या में अस्थाई जेल बनाए गए हैं । स्कूल और अन्य निजी बिल्डिंग्स को अस्थाई जेल के लिए चिन्हित किया गया है। अयोध्या के हर इलाके में अर्धसैनिक बलों की तैनाती है। गृह मंत्रालय ने इस फैसले को देखते हुए सभी राज्यों को सलाह दी है कि वे सतर्क रहें। कुछ लोगों का मानना है फैसला 13 से 16 नवंबर के बीच किसी भी दिन हो सकता है। ज्यादा संभावना 13 नवंबर या फिर 14 नवंबर को है। सुप्रीम कोर्ट के कैलेंडर को अगर देखा जाए तो वहां कार्य दिवस 7 और 8 नवंबर ही हैं। इसके बाद 9, 10, 11 और 12 नवंबर को छुट्टी है। 13 नवंबर को कोर्ट खुलेगा। 16 नवंबर को शनिवार और 17 नवंबर को रविवार है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर कर जाएंगे यानी फैसला 15 नवंबर के पहले हो जाना चाहिए।
अगर इस मामले पर कोई ठोस फैसला नहीं आता और इस फैसले को देश के अधिकांश लोग मानने से इनकार कर देते हैं तो स्थिति बहुत जटिल हो जाएगी। भारत का विभिन्न जातियों में बटा समाज अपने-अपने नजरिए से पूरी स्थिति का विश्लेषण करने लगेगा और वह विश्लेषण एक प्रतिक्रिया को जन्म देगा जिससे व्यापक अंतर्विरोध पैदा हो जाएगा। भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा राजनीति कई तरह के परम्यूटेशन और कंबीनेशन से जुड़ी है। जो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है। अयोध्या का मामले का फैसला हिंदुओं के पक्ष में हो या ना हो यह आने वाले दिनों की सियासत की नई दिशा तय कर सकता है। देखना यह है कि वह दिशा किधर जाएगी। इस बारे में अभी से कुछ भी कहना बहुत जल्दीबाजी होगी। जो कुछ भी होगा वह वक्त बताएगा।
Posted by pandeyhariram at 10:09 PM 0 comments
Thursday, November 7, 2019
रक्षक ही अरक्षित है
समय की विडंबना है कि हमारी रक्षा के लिए बनाई गई पुलिस खुद अरक्षित है। हम रोज पुलिस के साथ राजनीतिज्ञों और उनसे जुड़े हुए लोगों के दुर्व्यवहार देखते हैं, सुनते हैं, अखबारों में पढ़ते हैं और यह कह कर टाल देते हैं कि ऐसा तो होता ही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अभी हाल में दिल्ली में एक अद्भुत घटना हुई है। दिल्ली प्रदेश के पुलिस कर्मचारियों ने कमिश्नर के कार्यालय के समक्ष उपस्थित होकर मांग की उनकी सुरक्षा हो। ऐसा कोई दूसरा उदाहरण है भारतीय पुलिस के इतिहास में नहीं । झगड़ा किस बात का हुआ कि बात यहां तक आ गयी। तीस हजारी कोर्ट के समीप पार्किंग के विवाद को लेकर वहां कानून की हिफाजत करने वाले वकीलों ने पुलिस की पिटाई कर दी। उनका दावा है कि पुलिस ने गोलियां चलाई जिससे वकील घायल हो गए और उसी की प्रतिक्रिया के स्वरूप यह सारा बवाल हुआ। इसके बाद दिल्ली की सभी अदालतों के वकील हड़ताल पर चले गए । अजीब बात है! अब अगर इस घटना की समुचित जांच हो तभी हकीकत सामने आएगी। लेकिन अगर इस पूरी घटना को अपराध शास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषित करें तो दो प्रवृतियां उभरकर सामने आ रही हैं । पहली कि , हमारा समाज तत्काल न्याय चाहता है और वह न्याय भीड़ की कार्रवाई द्वारा मुहैया कराया जा रहा है। दूसरा, पुलिस के उच्चाधिकारी और साधारण पुलिसकर्मी के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं।
हमारे समाज में कानून की प्रतिष्ठा समाप्त होने के कई उदाहरण हैं इनमें सबसे महत्वपूर्ण है कानून को लागू करने में ढिलाई और पक्षपातपूर्ण ढंग से कानून को लागू करने की प्रवृत्ति। कई मामले तो ऐसे भी देखे गए हैं जिसमें पुलिस खुद कानून की परवाह नहीं करती। खुल्लम-खुल्ला लोग कानून का उल्लंघन करते हैं और या तो अपने रुतबे की धौंस दिखाकर या फिर पुलिस कर्मचारियों से सांठगांठ करके मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। हालात धीरे-धीरे बिगड़ते गए और अब विश्रृंखलता पैदा हो गई। हालात बेकाबू होने लगे हैं । लिंचिंग करने वाली भीड़ के लोग कैमरे के सामने डिंग मारते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है हमलावरों को पिछले हमले के बाद कोई सजा नहीं मिली। वह कानून के पंजे से बचा लिए गए। यह सब राजनीतिज्ञों के सहयोग से होता है । क्योंकि अपराधी उनकी पार्टी के सदस्य होते हैं। अब यह जो बचने की और बचा लिए जाने की प्रक्रिया है वह चारों तरफ फैल गई है । कुछ दिन पहले बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार को मार डाला गया क्योंकि वह गौ रक्षकों की भीड़ से एक कथित गौ हत्यारे को बचाना चाहते थे। जहां तक पुलिस का पक्ष है तो उसे देखने से ऐसा लगता है कि केवल कानून हीनता ही मुख्य कारण नहीं है या कि चुनौती नहीं है बल्कि उनके अधिकारियों की प्रभावहीन भूमिका भी इसमें सहयोग करती है।
यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पुलिस के बड़े अधिकारियों का पूरी तरह राजनीतिकरण हो गया है। यहां तक कि वे अक्सर अपनी मुश्किलों के लिए राजनीतिक वर्ग को दोष देते हैं । लेकिन वरिष्ठ अधिकारी राजनीतिक सांठगांठ से ही काम करते हैं। क्योंकि इससे उनके कैरियर को लाभ होता है। अच्छी जगह नियुक्ति होती है। वरिष्ठ अधिकारी खासकर आईपीएस अधिकारी पुलिस सुधार की बात करते हैं लेकिन उसकी बात कभी नहीं करते या उसमें कोई दिलचस्पी नहीं लेते हैं जो उनके अधिकार क्षेत्र में है । वे पुलिस कर्मचारियों के रहन सहन और कामकाज की स्थिति को सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते। वह हथियारों के आधुनिकीकरण ,संचार व्यवस्था में सुधार और आधुनिक औजारों की बात करते हैं। लेकिन कभी भी ट्रेनिंग के स्तर की बात नहीं करते।
अभी समय आ गया है कि पुलिस के बड़े अधिकारियों को पुलिस में सुधार की बात गंभीरता से उठानी होगी। क्योंकि पुलिस एक सेवा है पुलिस बल नहीं है।
Posted by pandeyhariram at 4:34 PM 0 comments
Wednesday, November 6, 2019
पाकिस्तान को कश्मीर से नहीं अफगानिस्तान से ज्यादा खतरा है
कश्मीर का मसला क्षेत्रीय और ग्लोबल एजेंडे से मिट नहीं सकता लेकिन पख्तून का सवाल है जो पाकिस्तान के और इस उपमहाद्वीप के भविष्य को हमेशा शंकित करता रहेगा सदा भयभीत करता रहेगा। हरदम एक प्रकार का भय बना रहेगा। जमायत उलेमा ए इस्लाम के नेता मौलाना फजलुर रहमान का आरोप है पाकिस्तानी सत्ता भारतीय एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगी है। मौलाना ने कहा है कि इमरान खान ने ही कहा था कि "अगर मोदी दोबारा सत्ता में आ जाते हैं तो कश्मीर का विवाद खत्म हो जाएगा।" रहमान का कहना है कि इमरान खान अयोग्य हैं और उन्होंने कश्मीर को बदलाव से रोका नहीं। इस्लामाबाद में भारत पर चारों तरफ से आरोप लगाए जा रहे हैं । पाकिस्तानी सत्ता ने आरोप लगाया कि अफगानिस्तान और तालिबान के झंडे इस देश में चारों तरफ लहराए जा रहे हैं। मौलाना ने इसे फालतू बात कहते हुए नकार दिया। हालांकि मौलाना ने अपने समर्थकों से कहा है कि वे तालिबान का झंडा नहीं लहराएं। लेकिन उन्होंने जनता को यह भी स्मरण दिलाया कि पाकिस्तान और अन्य देशों की सरकारें तालिबान को गले लगा रही हैं।
चाहे जो हो, मौलाना और इमरान दोनों तालिबान के समर्थक रहे हैं। इस्लामाबाद में यह माना जा रहा है भारत एक खतरा है तथा तालिबान दोस्त। इस जुमले में एक कटु सत्य है जो पाकिस्तानी नहीं देख पा रहे हैं और ना समझ पा रहे हैं । पाकिस्तान को सबसे बड़ा खतरा अफगानिस्तान से है, कश्मीर से नहीं। कश्मीर के बारे में जो पाकिस्तान में बड़बोला पन चल रहा है और दिल्ली के प्रति जो खीझ पैदा हो रही है वह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना महत्वपूर्ण अफगानिस्तान में गृह युद्ध की संभावनाएं हैं। अरसे से भारत और पाकिस्तान दोनों मुल्कों में एक रहस्य को हवा दिया जा रहा है कि जब तक कश्मीर पर पूर्ण नियंत्रण नहीं होगा तक तक भारत या पाकिस्तान के राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया संपूर्ण नहीं होगी। एक दूसरी कहानी है कि जम्मू कश्मीर क्षेत्रीय सुसंगति हकीकत को विचलित कर देती है । यहां कई विविधता पूर्ण क्षेत्र एक जगह आ जुटे हैं। तीसरी बात यह घूम रही है कि कश्मीर का जियोपोलिटिकल महत्व ऐसा है कि यह दुनिया का सबसे खतरनाक परमाणु युद्ध का स्थल बन गया है। यह रहस्योद्घाटन वाशिंगटन में परमाणु अप्रसार के समर्थकों ने किया था । ये लोग सदा भारत और पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रमों को खत्म करने में जुटे रहते थे। इस इस कथा से पाकिस्तान ने एक नया सबक सीखा। उसने परमाणु की अपनी रणनीति के माध्यम से दुनिया को ब्लैकमेल करना शुरू किया और दुनिया के विभिन्न देशों ने परमाणु के आतंक के दबाव में दिल्ली को यह समझाना शुरू किया कि वह अपनी जमीन छोड़ दे । एक और कहानी बीच में जुड़ती है, जिसके अनुसार भारत और पाकिस्तान में विवाद का मुख्य विंदु कश्मीर है । लेकिन किसी भी तरह से यह स्पष्ट नहीं है कि यदि भारत पाकिस्तान के साथ कश्मीर का मसला हल कर ले तो रातों-रात पाकिस्तान-भारत दोस्त हो जायेंगे। भारत और पाकिस्तान के विवाद की चड़ बंटवारे की विरासत में गहराई तक घुसी हुई है। यही नहीं बात तो यह भी चलती है कि भारत कश्मीरियों को मुक्त कर दे और यदि रावलपिंडी अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इतने दबाव में डाले कि उनके चलते भारत कश्मीर छोड़ने पर मजबूर हो जाए। पाकिस्तान से अपने विवाद में अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप को लेकर दिल्ली भी भीतर -भीतर आतंकित थी। इस मामले में दिल्ली की तरफ से पाकिस्तान को सिर्फ एक रियायत मिली की 1947 -48 में यह मामला राष्ट्र संघ में ले जाया गया।
कई युद्ध और सैनिक कार्रवाई के बाद भी कश्मीर का मसला हल नहीं हो सका। अब कहा जाता है कि इस उपमहाद्वीप के उद्भव में कश्मीर मुख्य रहा है । कश्मीर यकीनन पाकिस्तान के लिए एक अत्यंत भावना प्रधान मसला रहा है। दोनों देशों में यह विभाजन की ऑडियोलॉजिकल विरासत रहा है। रावलपिंडी के सेना मुख्यालय के लिए यह 1971 के बदले का आधार भी रहा है। कश्मीर भारत-पाक के बीच राजनीति का मुख्य आधार भी है।
उपमहाद्वीप पर कश्मीर में गतिरोध और अफगानिस्तान के प्रभाव की तुलना करें तो इतिहास में अब तक उपमहाद्वीप पर जितने बड़े सैनिक अभियान हुए हैं वह अफगानिस्तान की तरफ से हुए हैं। आज के जमाने में या कहें कि पिछले 4 दशकों में अफगानिस्तान ने दुनिया को क्या दिया? 1978 में सोवियत कब्जे के दौरान सोवियत सेना के खिलाफ पाकिस्तान समर्थित जिहादी दुनिया के हर कोने से एकत्र किए गये और उन्हीं के माध्यम से पाकिस्तान की हुकूमत ने जन समुदाय को कट्टर इस्लाम की घुट्टी दी। पाकिस्तान में तालिबान और अल कायदा का विकास हुआ। अमेरिकी फौज पर लगातार हमले होते रहे और अब अमेरिका वहां से बाहर निकलना चाहता है और यह तालिबान की वापसी का एक संभावित वक्त है। कश्मीर का गतिरोध कायम रहेगा लेकिन यह अफगानिस्तान की रणनीति है जो क्षेत्रीय व्यवस्था को एक बार फिर गड़बड़ाएगी और इसका सबसे बुरा असर पाकिस्तान पर पड़ेगा। कश्मीर में फिलहाल जो हालात हैं उससे भारत में बहुत कुछ नहीं बिगड़ेगा सिवा इसके कि पाकिस्तान प्रत्यक्ष रूप में भारत पर हमला कर दे और यह आशंका लगातार बनी हुई है। यही नहीं ,अगर इमरान खान को सत्ता से हटा दिया गया और वहां मौलाना सत्ता में आ गए तो एक बार अपनी लोकप्रियता को प्रदर्शित करने के लिए मौलाना जरूर भारत की तरफ रुख करेंगे। लेकिन इससे कुछ होने वाला नहीं है उल्टे पाकिस्तान में कट्टर इस्लामीकरण की मांग बढ़ जाएगी जो आने वाले वक्त में विश्व के लिए खतरा बन सकती है।
Posted by pandeyhariram at 5:37 PM 0 comments
Monday, November 4, 2019
महानगरों में बढ़ता प्रदूषण और उससे उत्पन्न समस्याएं
राजधानी दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बुरी तरह खराब हो चुका है और देश के सबसे पुराने महानगर कोलकाता में भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। कोलकाता में काली पूजा दिवाली और भाई दूज के बाद हालात बिगड़े हैं। पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्ययनों के अनुसार उत्तर कोलकाता में एयर क्वालिटी इंडेक्स 233 हो गया है यानी पार्टिकुलेट मटेरियल का प्रतिशत 2.5 के स्तर पर पहुंच गया है। 201 से 300 तक की स्थिति बहुत खराब मानी जाती है और इससे आचरण संबंधी और तरह-तरह की सांस की बीमारियां होती हैं ।
यह आज हिंसा से विश्वपर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, उससे कर्म में असन्तुलन उपस्थित हो गया है। इससे बचने के लिए वेद-प्रतिपादित सात्त्विक भाव अपनाना पड़ेगा।
‘स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्या चन्द्र मसाविव। पुनर्ददताsध्नता जानता संगमेमदि।।’
(ऋग्वेद 2.11.4)
इसी से ऋग्वेद (1.555.1976) के ऋषि का आशीर्वादात्मक उद्गार हैः 'पृथ्वीः पूः च उर्वी भव।' अर्थात्, समग्र पृथ्वी, सम्पूर्ण परिवेश परिशुद्ध रहे, नदी, पर्वत, वन, उपवन सब स्वच्छ रहें, गांव, नगर सबको विस्तृत और उत्तम परिसर प्राप्त हो, तभी जीवन का सम्यक् विकास हो सकेगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए वैज्ञानिक शोधों के अनुसार भी यह प्रतिपादित होता है।प्रदूषण के बढ़ने के साथ-साथ अपराध वृत्ति भी बढ़ती जाती है। यह तो सर्वविदित है सिगरेट पीने से जितने लोगों की मौत होती है उससे कहीं ज्यादा मृत्यु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों से होती है। कोलोरेडो विश्वविद्यालय की एक टीम के शोध के अनुसार धुआं और ओजोन इंसानी आचरण में भयंकर परिवर्तन करते हैं और जितना ज्यादा प्रदूषण होगा इंसानी आचरण खास करके हिंसक आचरण में वृद्धि होती जाएगी। शोध के अनुसार अगर सर्दी का मौसम है तो यह हालात और बिगड़ जाते हैं। एफ़बीआई के अपराध के आंकड़े और अमेरिका में विगत 8 वर्षों में वायु प्रदूषण के अध्ययन से पता चला है कि दोनों में एक आंतरिक संबंध है। जैसे -जैसे प्रदूषण बढ़ता है अपराध वृत्ति भी बढ़ती जाती है। शोध में पता चला है कि प्रत्येक घन मीटर में 10 माइक्रोग्राम वृद्धि हिंसक अपराधों में 1.4% की वृद्धि कर देता है । शोधकर्ताओं ने पाया है कि 0.01 पीएम यानी पार्ट पर मिलियन की वृद्धि से 1.15% हमलावर आचरण में वृद्धि होती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक पार्टिकुलेट स्तर में 10% की गिरावट प्रतिवर्ष अपराध रोकथाम में 1.4 अरब डालर की बचत कर सकता है। लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के शोधकर्ताओं ने पिछले साल सुझाव दिया कि वायु प्रदूषण और अपराध में संबंध का कारण कॉर्टिसोल हार्मोन की वृद्धि से उत्पन्न तनाव है।
वायु प्रदूषण के लिए अंतरराष्ट्रीय क्वालिटी का स्तर 50 से कम होना अच्छा माना गया है। किंतु लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स मुताबिक 35 का आंकड़ा अपराध में 2.8% की वृद्धि करता है। कोलकाता में यह आंकड़ा इस समय काफी बढ़ा हुआ है। शोध के मुताबिक फिलहाल जो नियामक हैं उससे कहीं कम स्तर पर भी प्रदूषण होने से अपराध वृत्ति बढ़ रही है। अपराधों में रोकथाम और समाज में अपराध वृत्ति में कमी के लिए जरूरी है कि वायु प्रदूषण के स्तर को कम किया जाए। पिछले साल किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि वायु प्रदूषण जहां ज्यादा होता है वहां भ्रष्टाचार बढ़ता है और नैतिकता दूषित होती है।
सदर्न कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की एक टीम के अध्ययन के अनुसार इसका सबसे ज्यादा असर किशोरों पर पड़ता है। पार्टिकुलेट स्तर में वृद्धि का सीधा संबंध टीनएजर्स के आचरण खास करके और सामाजिक आचरण से होता है ।
कोलकाता में जैसे-जैसे वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है छात्रों में मानसिक विकृति और अस्पतालों में भीड़ बढ़ती जा रही है। यह तो एक नमूना है। अगर प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया तो तरह - तरह की विकृतियां उत्पन्न होंगी और इससे समाज एक बार फिर असंतुलित हो जाएगा।
पर्यावरण को स्वच्छ-सुन्दर रखने का आग्रह सिर्फ भावनात्मक स्तर पर किया गया हो, ऐसी बात नहीं है। वैज्ञानिक अनुसन्धान के सन्दर्भ में भी सात्विकता की भावना से अनुप्राणित होकर गहरे मानवीय सम्बन्ध की स्थापना पर पर्याप्त बल दिया गया है। उदाहरणार्थ, ऋग्वेद (1.164.33) में वैज्ञानिक अनुसन्धान की प्रक्रिया में भी सूर्य को पिता, पृथ्वी को माता और किरण-समूह को बन्धु के समान आदर देने का स्पष्ट निर्देश है। आज तो गलत प्रतिस्पर्धा के कारण विश्वपर्यावरण विषाक्त बनता जा रहा है। प्रशीतन एवं वातानुकूलन के कृत्रिम प्रयास पारिस्थिति के लिए अभूतपूर्व संकट उत्पन्न कर रहे हैं।
Posted by pandeyhariram at 5:12 PM 0 comments
Sunday, November 3, 2019
राष्ट्रीयता के बदलते मायने
कभी आपने गौर किया है कि राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद में फर्क क्या है ? शायद किसी ने इस ओर सोचा नहीं है या उस पर सोचने का वक्त नहीं मिला है। हाल के दिनों में राष्ट्रवाद बड़ी सफाई से राष्ट्रीयता में प्रवेश कर गया है। यानी, जो राष्ट्रवादी है वही राष्ट्र का नागरिक है, बाकी सब इस देश के नहीं हैं। राष्ट्र राज्य , सिंहासन, राष्ट्रगान इत्यादि के प्रतीक हमारी चेतना से लगभग ओझल हो चुके हैं वैसे कायम जरूर है विलुप्त नहीं हुए हैं। अगर मनोवैज्ञानिक तौर पर देखें तो आधुनिक राष्ट्र राज्य शक्तिशाली हो गया है । इसलिए इन प्रतीकों का महत्व अब स्मृति केंद्रित हो गया है। जरा सोचिए झंडा क्या है. अगर नेपोलियन की बात करें तो झंडा महज कपड़े का एक टुकड़ा है जिसे कुछ ज्यादा महत्त्व दे दिया गया है। नेपोलियन के बाद से वक्त बहुत बदल गया है और बदलते वक्त के साथ प्रतीक भी बदल गए हैं आज यह सवाल कि झंडा क्या है ,इसलिए उठाया जा रहा है कि पिछले कुछ महीनों से कई जगह झंडो की बात चली । जिसमें कुछ तो बहुत ही झकझोरने वाले थे। वे थे कश्मीर में एक ध्वज निरस्त हो गया और दूसरा है नगालैंड में रक्तरंजित बगावत को खत्म करने की जल्दी। शांति वार्ता अब आखरी पायदान पर है और ऐसे ही सवाल पर आकर अटक गई है । नगा क्रांति की बात चल रही है। इससे एक बात स्मृति में आती है। इसे लेकर दोनों पक्ष क्या कहते हैं यानी क्रांतिकारी नगा और सरकार जहां तक खबर है दोनों मानते हैं कि दोनों ने एक दूसरे के साथ बुरा किया है। हिंसा से कुछ मिलने वाला नहीं है। लेकिन बात झंडे पर अटक गई है । नगा पक्ष अभी भी पृथक झंडे की मांग कर रहा है और मोदी सरकार यह मांग नहीं मान रही है। मामला है नागालैंड की राजधानी कोहिमा में भी तिरंगा लहराने की है। बात यहां तक आ गई है कि सरकार कह रही है कि वे अपने सांस्कृतिक और सामुदायिक अवसरों के लिए बेशक अपना झंडा रख सकते हैं। लेकिन नगा आंदोलनकारी इसे मानने को तैयार नहीं है उनका कहना है यह तो एक एनजीओ वाली बात हुई। आप विशेष अवसरों के लिए अपना झंडा रख सकते हैं। समझौता वार्ता ऐसी होनी चाहिए कि दोनों थोड़े थोड़े असंतुष्ट रहें। कम से कम यह तो कहा जाए कि दोनों कुछ ऐसी बातें मानते जो भी नहीं मानना चाहते थे। नगा नेताओं को झंडेवाली अपनी शर्त पर समझौता करना अपमानजनक महसूस हो रहा है । दूसरी तरफ राष्ट्रवाद का ढोल बजाने वाली मोदी सरकार के लिए भी यह विकल्प है क्योंकि अभी हाल में श्रीनगर में जम्मू कश्मीर का झंडा उतारे जाने का जश्न सरकार मना चुकी है और इसे सरदार पटेल के जन्मदिन की श्रद्धांजलि के तौर पर पेश किया। राष्ट्रवाद को रेखांकित करते हुए जो चीज एक बड़े राज्य से छीन ली गई एक छोटे आदिवासी राज्य को कैसे सौंपी जा सकती है?
नरेंद्र मोदी की चिंतन धारा और अटल बिहारी वाजपेई की चिंतन धारा में एक बुनियादी फर्क है। अटल जी से एक बार जब सन्मार्ग ने एक बार पूछा था की भारत सरकार संविधान के ढांचे के अंतर्गत वार्ता के लिए अड़ी है तो इसमें कश्मीरी अलगाववादी कैसे शामिल होंगे? बाजपेई जी ने ऐसा उत्तर दिया था सब लाजवाब हो गए थे। उनका कहना था कि हम इंसानियत के ढांचे के अंदर बात करेंगे। लेकिन नरेंद्र मोदी ने ऐसा कुछ भी कभी नहीं कहा है। उन्होंने राष्ट्रवाद को एक कठोर स्वरूप दे दिया है और इस तरह का राष्ट्रवाद कभी भी लचीला नहीं हो सकता। यही कारण है कि किसी राज्य के झंडे को उतारना एक वक्त में जश्न बन जाता है । जब कोई राज्य अपने खुद के झंडे मांग करता है तो उसका प्रतिकार किया जाता है जबकि एक अन्य राज्य, कर्नाटक, के झंडे को बमुश्किल बर्दाश्त किया जाता है। सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना बंद नहीं किया गया है उसे ऐसा करने की हिम्मत ही नहीं है जबकि इससे संबंधित आदेश सुप्रीम कोर्ट वापस ले चुका है। जब कोई राष्ट्रगान के बजने के दौरान अपनी सीट से खड़ा नहीं होता तो उसे परेशान किया जाता है। इसका मतलब है कि नई पीढ़ी के भारतीय एक दूसरे को यह जताना चाहते हैं कि वह केवल देश भक्त ही नहीं राष्ट्रवादी भी हैं।
1960 के दशक आज तक हम जिस खौफजदा माहौल में रह चुके हैं शायद आज का नौजवान उसकी कल्पना नहीं कर सकता। 1961 से लेकर 1971 तक का भारत ने चार बड़ी और कई छोटी-छोटी लड़ाइयां लड़ी है। 1961 में गोवा का युद्ध और 71 में बांग्लादेश का युद्ध। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि 1971 का युद्ध अगले 5 दशक के लिए आखरी युद्ध होगा और इस अंतराल में भारत अलगाववादी राजनीतिक आंदोलनों को खत्म कर देगा। ऐसा 2014 के बाद नहीं हुआ अगर आप इतिहास देखेंगे 2003 में ऑपरेशन पराक्रम खत्म हुआ था और भारत उस मोड़ पर दबाव की रणनीति का प्रयोग किया। यानी, आज से 15 साल पहले ही भारत अपने शिखर पर पहुंच चुका था और वहां से उसे लौटना आसान नहीं है। लेकिन यहां भी एक बात कहनी जरूरी है कि आज की हमारी राजनीति हमारी सामाजिक समरसता को अगर खत्म नहीं करती है। भारत बिल्कुल सुरक्षित है। आज का भारत इतना ताकतवर और महत्वपूर्ण हो गया है कि उसे दबाया नही जा सकता है ना उसकी जमीन हड़पी जा सकती है। लेकिन शायद हमारी विचारधारा ऐसी नहीं है । हम आज चिंतित हैं और हमारे चिंतित होने का मुख्य कारण है कि इस सरकार के कुछ आलोचक जो लगातार आरोप लगा रहे हैं कि भारत ने कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया। लेकिन शायद इससे कोई विचलित नहीं हुआ है। कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद से अब तक शायद ही किसी देश ने इस बदलाव को रद्द करने के लिए कहा है । सबने इसे भारत का आंतरिक मामला माना है। बेशक यह हमेशा नहीं हो सकता। कश्मीर में स्थिति बहुत जल्दी सामान्य होनी चाहिए इसके नेताओं को ज्यादा दिनों तक कैद में नहीं रखा जा सकता। संचार संवाद पर से रोक हटाने होगी वरना अंतरराष्ट्रीय समुदाय से दबाव पड़ने लगेगा। यहां एक सवाल है कि क्या कश्मीर राष्ट्रीय गीत गाने की उतनी ही मजबूत उपस्थिति कायम रखेगा जैसा देश के अन्य भाग में है या सामूहिक असुरक्षा को भड़काता रहेगा।
कश्मीर के नए हालात से ऊपजी चुनौती यह नहीं है कि इसका अंतरराष्ट्रीय होगा बल्कि यह है कि इससे पहले यह इतना बड़ा आंतरिक मामला नहीं बना था। कश्मीर में समस्या का मतलब है पाकिस्तान ,इस्लामाबाद, पांचवां खंभा, जिहादी आतंकवाद वगैरह । 1972 से 2014 के बीच के वक्त में भारतीय राष्ट्रवाद तनाव मुक्त सुरक्षित एहसास के साथ आगे बढ़ रहा था लेकिन अचानक कुछ ऐसी स्थिति पैदा कर दी गई हमें उसी भय से मुकाबले के लिए कहा जा रहा है जिसे 50 साल पहले दफनाया जा चुका है। एक तो है झंडे को उतारा जहां एक तरफ जश्न बन जाता है वहीं इसकी मांग को मानना सुविधाजनक मजबूरी हो जा रही है। हमें इस मानसिकता से उबरना होगा वरना हम पीछे लौटने के लिए बाध्य हो जाएंगे।
Posted by pandeyhariram at 5:00 PM 0 comments
Friday, November 1, 2019
कश्मीर में बाहरी दखल मंजूर नहीं
भारत ने कश्मीर मामले पर चीन के बयान पर पलटवार करते हुए की पुनर्गठन पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है, इसमें किसी भी देश की दखलंदाजी मंजूर नहीं है । जबकि चीन ने गुरुवार को कहा था यह गैरकानूनी और अमान्य है। भारत ने उसके क्षेत्र को अपने अधिकार में शामिल कर उसकी संप्रभुता को चुनौती दी है। भारत सरकार ने चीन के दावे को खारिज करते हुए कहा कि 1963 के तथाकथित चीन पाकिस्तान सीमा समझौते के तहत पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के भारतीय क्षेत्र पर चीन ने अवैध कब्जा कर रखा है। कश्मीर जब से भारत में शामिल हुआ और उसके टुकड़े पर पाकिस्तान ने गैरकानूनी ढंग से कब्जा किया तब से आज तक वहां किसी न किसी देश की दखलंदाजी से खून खराबा होता रहा है। विगत तीन दशकों से राज्य में सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बावजूद कश्मीरी आतंकी पूरी तरह काबू में नहीं हैं और ना वहां के प्रदर्शनों को दबाया जा सका । ऐसे में देश एक ,संविधान एक का विचार लागू करने का फैसला किया गया और जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया गया। साथ ही उसका विशेष झंडा भी निरस्त कर दिया गया। पाकिस्तान और दूसरे पड़ोसी देश चीन इसे गैर कानूनी बताकर वहां फिर बगावत को हवा देने की तैयारी में है। कश्मीरी झंडे को निरस्त किए जाने यह बारे में यह अफवाह फैलाई जा रही है झंडे के कारण कश्मीरी जनता की भावनाओं को आघात लगा है। इसी आघात की भावना को प्रतिबिंबित करने के लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने दक्षिण कश्मीर में 2 हफ्ते से कम वक्त में 11 लोगों की हत्या कर दी। हालांकि यह नया नहीं है। लेकिन ,रणनीति बदल गई है और पाकिस्तान के आई एस आई की शह पर आतंकी गैर कश्मीरियों को मार रहे हैं । वे साथ ही अल्पसंख्यकों को भी मार रहे हैं। कश्मीर में दो अल्पसंख्यक जातियां हैं। एक तो कश्मीरी हिंदू और दूसरे सिख। यह दोनों जातियां कश्मीर के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में छोटे-छोटे मोहल्लों में रहते हैं। शहरी क्षेत्र तुलनात्मक रूप से थोड़े सुरक्षित हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्र खतरनाक और जोखिम भरे हैं । हालांकि 1990 में कश्मीर में हिंदुओं का पलायन हो गया। यह भी अभी पाकिस्तान की एक रणनीति थी लेकिन इसमें से कुछ लोग वहां रुक गए। अब समय-समय पर यही लोग पाकिस्तान के आतंकवादी समूहों के निशाने पर रहते हैं।
प्रवासी कश्मीरियों की हाल में हो रही हत्या फिलहाल सबसे खतरनाक हैं। वहां रहने वाले लगभग 20 हजार प्रवासियों को गंभीर खतरा है। हथियारबंद और प्रशिक्षित आतंकी कश्मीर में विभिन्न स्थानों पर छिपे हुए हैं और उन्हें बाहरी कमांडरों से निर्देश मिलते हैं। इस समय सबसे ज्यादा ध्यान शोपियां कुलगांव पुलवामा और अनंतनाग पर है। क्योंकि यहीं सबसे ज्यादा प्रवासी रह रहे हैं। हाल में आई एस आई ने अपनी रणनीति में थोड़ा परिवर्तन किया है और उसने वहां विदेशी आतंकियों को तैनात कर दिया है, जो स्थानीय आतंकियों को निर्देश दे रहे हैं । क्योंकि ये पाकिस्तानी कमांडर आई एस आई के लिए ज्यादा विश्वसनीय तथा स्थानीय लोगों के लिए ज्यादा बर्बर और क्रूर हैं।
अब इस प्रवृत्ति का अगर सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया जाए तो पता चलेगा कि पाकिस्तान समर्थित गिरोह ऐसा कर लोगों के मन में जब बैठ जाए कि यहां सुरक्षित नहीं है और सब कुछ होने के बावजूद कश्मीर में अभी सामान्य स्थिति नहीं कायम हो सकी है। भारत को सिर्फ आतंकियों का सफाया नहीं करना पड़ेगा बल्कि उससे कुछ कदम आगे भी जाना होगा। हमारे देश की सुरक्षा संस्थाओं को आतंकियों को यह समझाना होगा कि वे जिस अल्पसंख्यक और बाहरी समुदायों पर हमले कर रहे हैं उसका उन्हें दंड भी मिल सकता है।
Posted by pandeyhariram at 7:01 PM 0 comments