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Monday, November 18, 2019

फिर अब तूल पकड़ने वाला है अयोध्या मामला

फिर  अब तूल पकड़ने वाला है अयोध्या मामला 

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अयोध्या में राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानने से इनकार किया है और इस पर पुनर्विचार याचिका दायर करने की घोषणा की है । मुस्लिम पक्ष ने कहा कि उसे किसी दूसरी जगह पर मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन नहीं चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला राम मंदिर के पक्ष में जाने के बाद रविवार को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस मामले पर मीटिंग की और इसके बाद फैसले को चुनौती देने का एलान किया। बोर्ड ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि विवादित जमीन पर नमाज पढ़ी जाती थी और मंदिर तोड़कर मस्जिद नहीं बनाई गई है। गुंबद के नीचे जन्मस्थान होने कोई सबूत नहीं है और जन्म स्थान को न्यायिक व्यक्ति नहीं माना जा सकता। बोर्ड का कहना है कि उसने जिस जमीन के लिए लड़ाई लड़ी हुई जमीन से चाहिए। बोर्ड का मानना है अगर मस्जिद को ना तोड़ा गया होता तो क्या अदालत मस्जिद तोड़कर मंदिर बनाने के लिए कहती ?
       देश के प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा ए हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी का मानना है कि कोर्ट ने 1000 से ज्यादा पृष्ठों वाला फैसले में मुस्लिम पक्ष के अधिकतर तर्कों को माना है ऐसे में अभी भी कानूनी विकल्प मौजूद है। कोर्ट ने स्वीकार किया है कि मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को तोड़कर नहीं किया गया और 1949 में मस्जिद के बाहरी हिस्से में अवैध तरीके से मूर्ति रखी गयी है फिर वहां उसे अंदर गुंबद के नीचे वाले हिस्से में स्थान्तरित किया गया । जबकि उस दिन तक नमाज का सिलसिला जारी था। मदनी ने कहा 1949 तक वहां नमाज पढ़ी जा रही थी तो फिर 90 साल तक जिस मस्जिद में नमाज पढ़ी गई उसको मंदिर बनाने के लिए देने की बात समझ से परे है। जिलानी ने कहा के उस जमीन के लिए आखिरी दम तक कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी ।उन्होंने कहा कि 23 दिसंबर 1949 की रात बाबरी मस्जिद में भगवान राम की मूर्तियों को रखा जाना और असंवैधानिक था तो फिर उच्चतम ने उन मूर्तियों को आराध्य कैसे मान लिया। वह जो हिंदू धर्म शास्त्र अनुसार भी आराध्य नहीं हो सकते।
       ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मीटिंग के लिए अंतिम समय में जगह बदल दी गई। लखनऊ के नदवा क्षेत्र में होने वाली थी बैठक। अचानक उस क्षेत्र को बदल दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में रामलला विराजमान के नाम से फैसला सुनाया है और निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया था तथा मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का निर्देश दिया था
           इस बैठक के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव जफरयाब जिलानी, बोर्ड के सदस्य  रसूल इलियास और अन्य सदस्यों ने पत्रकारों से बात की। जिलानी ने बताया की मुस्लिम पक्ष कारों में से मिसबाहुद्दीन, मौलाना महफूज उर रहमान, मोहम्मद उमर और हाजी महबूब ने पुनर्विचार याचिका दायर करने की अनुमति दे दी है। एक अन्य पक्षकार इकबाल अंसारी के बारे में पूछे जाने पर कहा गया कि उन पर पुलिस प्रशासन और जिला प्रशासन बहुत दबाव डाल रहा है। गिलानी के अनुसार इकबाल अंसारी इसलिए याचिका के पक्ष में नहीं है क्योंकि अयोध्या के प्रशासन और पुलिस उन पर दबाव डाल रहा है।  प्रशासन ने हमें भी इस बैठक को आयोजित करने से मना किया था और हमने बैठक दूसरी जगह किया जिलानी के अनुसार वरिष्ठ वकील राजीव धवन बोर्ड की तरफ से पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे। उन्होंने ही पहले सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्षकारों के वकील थे। लेकिन, हिंदू महासभा के वकील वरुण सिन्हा के अनुसार मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड केस में पक्षकार है ही नहीं वह याचिका कैसे दायर कर सकता है। इस मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड का फैसला लेना होगा। वरुण ने कहा कि हर किसी को पुनर्विचार याचिका दायर करने का अधिकार है लेकिन इस फैसले के खिलाफ जाने का कोई कानूनी आधार नहीं है। जिलानी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह जोर दिया कि मुस्लिम इंसाफ मांगने सुप्रीम कोर्ट में गए थे। बाबरी मस्जिद के बदले कोई दूसरी जगह मांगने नहीं गए थे। उन्होंने कहा कि अयोध्या में पहले से ही  27 मस्जिदें हैं इसलिए  बात मस्जिद की नहीं है।
दूसरी तरफ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जफर फारुकी ने फैसले के दिन कहा था कि बोर्ड अपील में नहीं जाएगी या किसी तरह के पुनर्विचार पर जोर नहीं देगी। जो भी हो चुका उसे सुन्नी वक्फ बोर्ड स्वीकार कर लेगी। सुन्नी वक्फ बोर्ड कोर्ट द्वारा तय की गई 5 एकड़ जमीन लेगी या नहीं लेगी इस पर 26 नवंबर को एक बैठक में फैसला किया जाएगा। सुन्नी वक्फ बोर्ड का यह कथन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के निर्णय से सीधा विपरीत है
पुनर्विचार याचिका का मामला सामाजिक रूप में तूल पकड़ सकता है इसलिए पूरे समाज में सौहार्द एवं शांति बनाए रखने की कोशिश की जानी चाहिए ,हालात का शोषण नहीं। ऐसा कभी-कभी होता है खास करके जो भावना प्रधान मामले होते हैं कि हम अपने निष्कर्ष निकालते हैं और इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि जो हमारे विपरीत सोच रहे हैं या कर रहे हैं उन्हीं की गलती है और इसका उन्हें परिणाम भुगतना होगा। यह एक सामूहिक सोच बन जाती है और कार्रवाई में बदल जाती है। पिछले अनुभवों से एक बार सोचें जब  हम किसी स्थिति के बारे में सभी तथ्यों को नहीं समझते हैं और    कुछ ऐसा  करने की संभावना बन जाती है जो हमें नहीं करना चाहिए। मंदिर और मस्जिद का मामला बिल्कुल भावना प्रधान है और इस पर हमें सामाजिक रूप से बहुत सतर्क रहने की जरूरत है।


Sunday, November 17, 2019

शहर की हवा पानी सब खराब कैसे जिएंगे आप

शहर की हवा पानी  सब खराब कैसे जिएंगे आप 

शहर की हवा पानी सब खराब कैसे जिएंगे आप
खबरों के मुताबिक अपने देश के महानगरों में मुंबई का पानी सबसे सुरक्षित है और कोलकाता का पानी अत्यंत दूषित। ब्यूरो इंडियन स्टैंडर्ड्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली, कोलकाता और  के पानी की जांच करने पर 11 मामलों में से 10 में नकारा साबित हुआ। 17 अन्य राज्यों में पानी के नमूने इकट्ठे किए जो इंडियन स्टैंडर्ड के मानकों के मुताबिक नहीं थे। उपभोक्ता मामले के मंत्री रामविलास पासवान ने अध्ययन के दूसरे चरण फिर रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि मुंबई को छोड़कर देश के सभी राज्यों की राजधानियों का पानी अत्यंत दूषित है। सरकार इस पानी को शुद्ध करने के लिए कठोर कार्रवाई करने का निर्देश राज्यों को दे रही है।
आबादी के तेजी से बढ़ते दबाव और जमीन के नीचे से पानी का अंधाधुंध दोहन साथ ही जल संरक्षण की कोई कारगर नीति नहीं होने की वजह से पानी की समस्या साल दर साल गंभीर होती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 10 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं है। लेकिन यह आंकड़ा सिर्फ शहरी इलाकों का है। गांव के 70% लोग अभी प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं। अब जबकि 2028 तक भारत की आबादी चीन से ज्यादा पहुंच जाएगी यह समस्या और भयावह हो जाएगी । एक और तो गांव में शुद्ध जल नहीं मिल रहा है और दूसरी ओर महानगरों में वितरण की कमी के कारण लाखों गैलन पानी रोज बर्बाद हो जाता है। फिलहाल देश में प्रति व्यक्ति 1000 घन मीटर पानी उपलब्ध है और धीरे-धीरे यह उपलब्धता घटती जा रही है। नदियों का देश होने के बावजूद हमारी नदियों  का पानी पीने के लायक नहीं है और ना नहाने के लायक है।
         दरअसल किसी भी शहरी क्षेत्र में पानी की आपूर्ति नगर निगम के पाइपों से की जाती है और उसकी शुद्धता का आकलन पेयजल की उपलब्धता, उससे उत्पन्न होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और उस तक आम आदमी की पहुंच के आधार पर किया जाता है। पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और कोलकाता नगर निगम द्वारा जारी प्रासंगिक आंकड़ों में कई बातें बहुत ही महत्वपूर्ण है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है की उपलब्ध पेयजल की गुणवत्ता अच्छी नहीं है। इसका मुख्य कारण है उसकी उपलब्धता साथ ही नगर निगम की जलापूर्ति के विकल्प के रूप में लोगों द्वारा अपनाया जाने वाला भूजल भी दूषित  है। उसमें आर्सेनिक और लेड जैसे भारी धातु की उपस्थिति पाई गई है। अब जल की अनुपलब्धता और उसके शुद्धिकरण में कमी के कारण तरह-तरह की बीमारियां पनप रही हैं। कोलकाता नगर निगम द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों के मुताबिक कोलकाता शहर में अधिकांश लोगों को पेचिश और उसकी छूत से उत्पन्न होने वाली आंत की विभिन्न बीमारियां शहर के अधिकांश भाग में फैली हुई हैं। यह जल जनित बीमारियां हैं। सही पेयजल की व्यवस्था और स्वच्छता से इन बीमारियों से मुक्ति पाई जा सकती है । शहर के जल के दूषण के और भी कारण हैं। इनमें विशिष्ट भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों के साथ साथ विशाल आबादी, इसकी ढलवां भूमि और जलजमाव के साथ-साथ जल निकासी की समुचित व्यवस्था का अभाव यहां के पेयजल के दूषण में अपनी भूमिका निभाता है। कोलकाता नगर निगम शहर की आबादी के 70% को पानी मुहैया कराता है बाकी 30% आबादी विभिन्न स्रोतों से पेयजल का बंदोबस्त करती है। 2011 की जनगणना के मुताबिक कोलकाता मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी के 79 प्रतिशत भाग में पेयजल की सप्लाई होती है लेकिन व्यवहारिकता में यह कम है। आबादी रोजाना बढ़ रही है। खास करके, शहर का हर क्षेत्र तेजी से जन संकुल होता जा रहा है। इसके साथ ही शहर में जमीन घटती जा रही है और शहर का माइक्रोक्लाइमेट धीरे-धीरे बिगड़ता  जा रहा है।  इससे शहरी लोगों के लिए बाहरी समस्याएं पैदा हो रही हैं। यही नहीं शौचालयों की अपर्याप्त व्यवस्थाओं के कारण अभी भी शहर की फुटपाथों पर खूब तड़के शौच करते लोग देखे जा सकते हैं। शहर में  जो लोग रहते हैं उनके खान-पान और उनके भीतर की बीमारी  के अनुसार  उनके मल मूत्र में भी  तरह-तरह के रोगाणु  पाए जाते हैं।  जैसे  1 ग्राम  मल मैं एक करोड़ वायरस, 10 लाख बैक्टीरिया होती है , एक हजार पैरासाइट तथा कीटाणुओं के एक सौ अंडे होते हैं।  इससे विभिन्न तरह की छूत की जानलेवा बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं।
कोलकाता महानगर इतना जन संकुल हो गया है इसमें अब लोगों के रहने की जगह नहीं है और यह शहर चारों तरफ फैल रहा है और तालाबों को पाट कर ऊंची ऊंची इमारतें बन रही हैं और और उसमें भूजल के दोहन की व्यवस्था है। इन इलाकों में एक तरफ लगातार जमीन की पानी को निकाला जा रहा है और दूसरी तरफ महानगर में एक बड़ी आबादी के लिए पीने का पानी नहीं है। इससे तरह-तरह की बीमारियां फैल रही हैं।
2014 में अन्थामेटेन तथा हेजेन द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार हवा और पानी में बढ़ता प्रदूषण कोलकाता शहर की समस्या है और निकट भविष्य में इस समस्या के समाधान की कोई राह भी नहीं दिख रही है। जल संरक्षण के उपाय और जमीन में स्थित पानी के दोहन की नीति बनाकर इस समस्या पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। लेकिन इसको लागू कैसे किया जाए? इसके लिए सबसे जरूरी चीज है जन जागरूकता। जब तक इस ओर कदम नहीं उठाया जाएगा कोई उपलब्धि नहीं होने वाली।


Friday, November 15, 2019

राफेल पर हमला फेल

राफेल पर हमला फेल 

सुप्रीम कोर्ट ने राफेल विमान के सौदे इस समीक्षा के लिए पेश की गई सभी दलीलों को खारिज करते हुए पूरे मामले को खत्म कर दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार के दौरान चौकीदार चोर कहे जाने पर भी अदालत ने सख्ती बरतते हुए इसे समाप्त कर दिया। इस तरह राफेल और उससे संबंधित सारी हवाई लड़ाई या कहें राहुल गांधी का सारा हमला नाकाम हो गया। भाजपा ने इसके लिए कांग्रेस तथा राहुल गांधी से माफी मांगने को कहा है जबकि विपक्षी दल ने कहा है कि यह अदालती फैसला एक आपराधिक जांच के दरवाजे खोलता है। पूर्व वायु सेना प्रमुख धनोवा ने भी इस न्याय की आलोचना की है ।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राफेल मामले में अदालत के फैसले को सत्य की जीत बताया और कहा राहुल गांधी इस संबंध में माफी मांगें। शाह ने कहा ,राफेल मामले में पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उन दलों और नेताओं को करारा जवाब मिलता है जो बेबुनियाद और दुर्भावनापूर्ण अभियान चला रहे हैं। अमित शाह ने एक ट्वीट में कहा है कि 'शीर्ष अदालत के फैसले से स्पष्ट हो गया है कि राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर संसद को बाधित करना शर्मनाक था।' उन्होंने कहा कि, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला नरेंद्र मोदी सरकार की विश्वसनीयता की पुष्टि करता है । नरेंद्र मोदी के सरकार पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कहा कि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार ईमानदार और स्वच्छ है यह कोर्ट के फैसले से स्पष्ट हो गया। उन्होंने कहा कि  इस दुर्भावना प्रेरित अभियान के लिए देश की जनता  कांग्रेस को कभी माफ नहीं करेगी। कांग्रेस लोगों को गुमराह कर रही थी इसलिए वह लोगों से माफी मांगे।
जैसा कि स्वाभाविक है कांग्रेस ने इस मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की मांग की है। कांग्रेस ने कहा है कि फैसले से यह साबित होता है कि इस घोटाले में  जांच के लिए बड़ी गुंजाइश है और ऐसे जांच के लिए अब संयुक्त संसदीय समिति का गठन होना चाहिए।राहुल गांधी ने    सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जोसेफ के हवाले से कहा कि  जस्टिस जोसेफ ने भी कहा है  कि राफेल घोटाले की जांच के लिए बड़ी गुंजाइश पैदा हुई है और पूरे मामले की जांच शुरू होनी चाहिए।
     भारतीय वायु सेना के पुराने विमानों को बदल कर उनकी जगह अधिक क्षमतावान विमानों को खरीदने के काम में कथित भ्रष्टाचार को लेकर अदालत में पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी। हालांकि यूपीए सरकार ने भी 126 विमान खरीदने का फैसला किया था लेकिन आपत्ति इस बात पर थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में अपनी फ्रांस यात्रा के दौरान 36 विमान खरीदने की घोषणा की जो कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा तय किए गए दामों से ज्यादा कीमत पर थी। राफेल से जुड़े एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी का माफीनामा मंजूर कर लिया है। राहुल गांधी ने 2019 के चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी द्वारा खुद को   चौकीदार कहे जाने पर आपत्ति उठाते हुए एक नारा दिया था कि चौकीदार चोर है । राफेल सौदे के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 14 दिसंबर को एक फैसला दिया था जिसमें उसने भारत सरकार को साफ बरी कर दिया था ।
लेकिन अदालत के समक्ष याचिका दायर की गई जिसमें निर्णय लेने की प्रक्रिया, मूल्य निर्धारण और ऑफसेट पार्टनर के चयन पर सवाल उठाया गया।
अब  इस फैसले की समीक्षा के लिए अदालत में कई याचिकाएं दायर की गई थीं और 10 मई 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद इस पर अपना फैसला टाल दिया था। याचिका दायर करने वालों में पूर्व मंत्री अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और आम आदमी पार्टी के संजय सिंह की याचिका है शामिल थी। इन सभी लोगों ने सुप्रीम कोर्ट से दरख्वास्त की थी कि पिछले साल दिए गए फैसले पर फिर से विचार करें । इसी में एक और मामला जुड़ गया था क्योंकि इसी सौदे के संदर्भ में राहुल गांधी ने 2019 के चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कहा था कि "चौकीदार चोर है।" अब इस आरोप के खिलाफ भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी कोर्ट में चली गयीं और राहुल गांधी पर आपराधिक मामला चलाने की मांग की । उन्होंने कहा कि एक राजनीतिक पार्टी के नेता को प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
       सुप्रीम कोर्ट ने इस पर 15 अप्रैल को सुनवाई की और उसने साफ कहा था इस तरह की टिप्पणी उसने कभी की ही नहीं, जैसा कि राहुल गांधी अपने बयानों में हवाला दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को 22 अप्रैल तक अपना जवाब देने को कहा था। राहुल गांधी ने अपने शपथ पत्र में लिखा  " मेरा बयान सियासी प्रचार की गर्मा गर्मी में दिया गया था और मेरे विरोधियों ने इसे गलत ढंग से पेश किया ताकि ऐसा प्रतीत हो यह मैंने कहा है। ऐसी सोच तो ले ली दूर-दूर तक कहीं नहीं है। यह भी स्पष्ट है कोई भी अदालत कभी भी ऐसा कुछ नहीं कहेगी और इसके लिए मैं अदालत से क्षमा मांगता हूं।"
        साथ ही राहुल गांधी ने बिना माफी मांगी और इस केस को बंद करने की गुहार लगाई। चाहे जो हो कानूनी दांव पर से पृथक सामाजिक रूप में अगर देखा जाए तो राजनीतिज्ञों को इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।


Thursday, November 14, 2019

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का भी कार्यालय अब आरटीआई के दायरे में

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का भी कार्यालय अब आरटीआई के दायरे में 

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कार्यालय भी अब सूचना के अधिकार के अंतर्गत आ गया। यह फैसला मुख्यतः पारदर्शिता और स्वतंत्रता के अधिकार के संतुलन के लिए आया है। यह फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण है । यह महत्व इसलिए है क्योंकि सूचना के अधिकार के दरवाजे खोल रहा है। लेकिन, इसके विभिन्न बिंदुओं का अध्ययन करने से यह ज्ञात होगा कि कौन सी लाल पट्टी इसके प्रभाव के बारे में निर्णय करेगी। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि पारदर्शिता से न्यायिक आजादी कभी प्रभावित नहीं होती। प्रधान न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि निजता और गोपनीयता का अधिकार अपने आप में एक महत्वपूर्ण स्थिति हैं और मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय से जानकारी प्राप्त करते समय यह संतुलित होनी चाहिए। 2010 का यह मामला सुप्रीम कोर्ट में एक अपील के तौर पर था और यह अपील सुप्रीम कोर्ट के महासचिव ने दिल्ली हाई कोर्ट के एक आदेश के तहत की थी। संविधान पीठ ने 4 अप्रैल को इस पर अपना फैसला दे दिया था, लेकिन उसे सुरक्षित रख लिया गया था।  हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का कार्यालय आरटीआई कानून की धारा 2 (एच) के अंतर्गत पब्लिक अथॉरिटी है यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल में चीफ जस्टिस के कार्यालय को आरटीआई के तहत जाने की याचिका दायर की।
        जहां तक आरटीआई का मामला है इसकी शुरुआत 1766 में स्वीडन में हुई थी और फ्रांस में 1978 में स्वीडन में 1982 में लागू हुआ भारत में यह कानून  2005 में लागू हुआ था । अब एक ऐसे संस्थान जिसकी सार्वजनिक जांच नहीं हो सकती है और जो अपने भीतर झांकने की शायद ही कभी इजाजत देता है उस संस्थान के दरवाजे न्यायिक  जिम्मेदारी को स्पष्ट करने के लिए खोल दिए गए हैं। अक्सर देखा गया है की कार्यपालिका और न्यायपालिका में नियुक्तियों को लेकर रस्साकशी चलती रहती है और कोर्ट अपने फैसले के बारे में आम जनता को बताने के लिए बाध्य नहीं होता। जबकि सरकार अपने किसी भी फैसले के बारे में आम जनता को बताने के लिए बाध्य होती है। सार्वजनिक बहस में कभी भी उसपर उंगली नहीं उठाई जाती । लेकिन इस   मामले पर बहुत खुश होने की जरूरत नहीं। क्योंकि, अदालत द्वारा सूचना के अधिकार के आवेदन को स्वीकार करने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि हो सकता है वह उसे स्वीकार ही ना करे।  ऐसा करने के कई कारण गिना दिए जाएंगे। अभी जो व्यवस्था दी गई है आम आदमी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों और तबादलों के बारे में जानकारी ले सकता है। इस अधिकार के तहत व्यक्तिगत सूचना निर्णयाधीन रहेगी।
      जब यह कानून बनाया गया तो कुछ अप वादों को छोड़कर सब पर लागू करने के लिए कहा गया। जिन अपवादों को छोड़ा गया वह भारतीय कानून की धारा 8 के अंतर्गत आते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा मसला या जहां तक किसी आपराधिक मामले की जांच जिससे प्रभावित हो ऐसे कुछ अपवाद हैं इसके अलावा सब कुछ सूचना के अधिकार के तहत आता है भारतीय कानून की धारा 24 के तहत खुशियां और सुरक्षा एजेंसियों को छोड़कर यह सब पर लागू होता है। इन एजेंसियों में भी भ्रष्टाचार और मानवाधिकार के मामले में सूचना देनी पड़ती है। यह कानून बहुत व्यापक है इसलिए सुप्रीम कोर्ट इसके अंतर्गत ना आए यह तो अजीब था।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से एक बार फिर आरटीआई कानून की श्रेष्ठता से उभर आई है और एक बार फिर यह कानून न्याय की कसौटी पर खरा उतरा है। यह खासकर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार ने लगातार इस कानून को और इससे जन्मी प्रणाली को कमजोर करने की कोशिश करती रहती है। मौजूदा सरकार ने हाल ही में इस कानून में संशोधन करके सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और उनके वेतन पर अपना नियंत्रण और बढ़ा दिया इसके पहले भी कई बार इस कार्यालय को कमजोर करने की कोशिशें हुई हैं एक संशोधन के तहत सभी राजनीतिक पार्टियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया था।


Wednesday, November 13, 2019

अभी भी मौका है

अभी भी मौका है 

महाराष्ट्र में विधानसभा को निलंबित कर दिया गया है और राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है। इसका मतलब है की वहां सत्ता के जितने भी दावेदार हैं वह किसी भी वक्त अपेक्षित  समर्थन के  सबूत लेकर राज्यपाल का दरवाजा खटखटा सकते हैं। विशेषज्ञों का मत है कि चुनाव के बारे में चुनाव आयोग की अधिसूचना को नई विधानसभा के रूप शिवसेना और कांग्रेस के बीच सुरती एनसीपी की यह गति शरद पवार की राजनीतिक शास्त्रीय प्रतिगामी माना जा सकता है अब ऐसे हालात नगर चुनाव होते हैं तो बीजेपी के लिए मैदान खुला हुआ है भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन सरकार नहीं बना पाए और इसके कारण शिवसेना विचारधारा से विपरीत जाकर सरकार बनाने की कोशिश में लग गई भाजपा इस नई स्थिति को चुनाव प्रचार के दौरान खूब भुना सकती है बाकी दल इस सियासी हालात को कैसे फोन आएंगे यह तो कहीं कोई योजना स्पष्ट नहीं दिख रही है लिया जाएगा। 1994 में एसआर बोम्मई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन परिस्थितियों के बारे में व्यवस्था दी थी जहां अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करना जरूरी हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद ऐसे परिदृश्य बन सकते हैं कि राष्ट्रपति विधानसभा भंग कर सकते हैं और जल्द चुनाव कराने के लिए कह सकते हैं या विधानसभा को निलंबित रखकर राजनीतिक पार्टियों को सरकार बनाने के राज्यपाल के समक्ष दावा पेश करने की अनुमति दे सकते हैं। अब यह राज्यपाल की प्राथमिकता है कि वह राज्य में सरकार बनने देते हैं अथवा नहीं।
       ऐसा बहुत कम होता है की चुनाव के पूर्व राजनीतिक दलों में जो गठबंधन हुआ और जिस गठबंधन के बल पर बहुमत हासिल हुआ वह सरकार नहीं बना सका। भाजपा और शिवसेना के गठबंधन ने महाराष्ट्र में बहुमत हासिल किया लेकिन यह गठबंधन सरकार नहीं बना सका और वहां राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। भाजपा और शिवसेना में यह राजनीतिक समझौता लगभग तीन दशकों से चला आ रहा है। वहां स्थानीय निकायों में, प्रांतीय सरकार में और यहां तक कि केंद्र में भी दोनों पार्टियां शासन में शामिल हैं। दोनों के आदर्श बहुत मिलते जुलते हैं । खासकर हिंदुत्व के मामले में और इसी के कारण इनके रिश्ते भी बड़े मजबूत हैं। अब खटपट शुरू हुई है और महाराष्ट्र में सरकार बनाने के मौके दोनों चूकते जा रहे हैं। "नई भाजपा" फिलहाल विजय रथ पर सवार है लेकिन उस के लिए यह आत्म निरीक्षण का वक्त है। कुछ साल पहले तक भाजपा को कांग्रेस से विपरीत  समझा जाता था । समझा जाता है कि इस पार्टी में लचीलापन है और गठबंधन में आई दरार को पाटने का हुनर भी है। 1996 में जब 13 दिन की सरकार के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई बहुमत हासिल करने से चूक गए थे तब से इस पार्टी के बारे में कहा जाता था यह राजनीतिक विभाजन कर अपना वर्चस्व बढ़ा रही है। लेकिन इस दौरान इसने खुद को इतना काबिल बनाया कि किसी भी गठबंधन के साथ निभा सके।  अब थोड़ा बदलाव आ रहा है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कमान में कई चुनाव जीतने के बाद अब पार्टी में धीरे-धीरे पुराना लचीलापन खत्म होता जा रहा है।  दूसरों के साथ गठबंधन करने की उसकी इच्छा समाप्त होती जा रही है। महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव के नतीजे भारी बहुमत से भाजपा के दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीतने के बाद आए।  यह नतीजे अपने आप में एक संदेश भी हैं। वह कि कोई भी पार्टी मतदाताओं का स्थाई विश्वास नहीं पा सकती है और यह लोकतंत्र के लिए एक अच्छी बात है।
       महाराष्ट्र में जो कुछ भी हुआ शिवसेना के साथ उसके बाद कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र में भाजपा ने अपना आखिरी पत्ता खोल दिया। वहां राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका है । लेकिन एक सवाल जो सबके मन में आता है कि जब राज्यपाल ने एनसीपी को मंगलवार की रात 8:30 बजे तक का समय दिया तो दोपहर आते-आते हैं उनका मन क्यों बदल गया? शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की गोटी किसने बिगाड़ दी। अब यह देखना जरूरी है कि इस सारे गेम में किसने सबसे ज्यादा खोया?
जहां तक शिवसेना का प्रश्न है उसने मुख्यमंत्री पद की मांग की थी लेकिन वह नहीं हो सका। अब यहां तो वह सत्ता से बेदखल हो गए और केंद्र में भी मंत्री पद जाता रहा। उधर एनसीपी कांग्रेस के हाथ में सत्ता की लगाम दिखने से आदित्य ठाकरे के करियर का शानदार आगाज होते होते रुक गया। हालांकि शिवसेना सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है लेकिन शायद ही उसे कुछ हासिल हो पाएगा।
       दूसरी तरफ दुविधा के संक्रमण से पीड़ित कांग्रेस एक बार फिर फैसला नहीं कर पाई। कांग्रेस ने इस सारी प्रक्रिया को विशेषकर राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की प्रक्रिया को लोकतंत्र का अपमान बताया है। कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि राज्यपाल संवैधानिक प्रक्रिया का मखौल उड़ा रहे हैं। सुरजेवाला ने कहा कि चुनाव के पहले सबसे बड़े गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बुलाना चाहिए था इसके बाद चुनाव से पहले बने दूसरे गठबंधन को बुलाना चाहिए था और राज्यपाल सिंगल पार्टियों को बुला रहे थे। उन्होंने कांग्रेस को क्यों नहीं बुलाया? सुरजेवाला का आरोप है राज्यपाल ने समय का मनमाना आवंटन किया। भाजपा को 48 घंटे दिए और शिवसेना को 24 घंटे तथा एनसीपी को 24 घंटे भी नहीं। जो लक्षण दिखाई पड़ रहे हैं उससे ही लगता है कि महाराष्ट्र  कांग्रेस चाहती थी कि सरकार को समर्थन दे दिया जाए लेकिन सोनिया गांधी ने ऐसा कुछ नहीं किया और मामला धरा का धरा रह गया। अब हो सकता है आने वाले दिनों में कांग्रेस में टूट-फूट हो।
       जहां तक एनसीपी की बात है तो शरद पवार को कांग्रेसियों से बातचीत के लिए अधिकृत किया गया था और कांग्रेस के सुशील कुमार शिंदे के साथ एनसीपी की बातचीत चल रही थी।  बात चलती रही और उधर बात बिगड़ गई। अब क्या भाजपा को यह भनक लग गई कि शायद शिवसेना ,एनसीपी और कांग्रेस में बात बन जाए और उसने अपना पत्ता चल दिया ।
वैसे महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा विधायक दल के नेता देवेंद्र फडणवीस का मानना है कि सरकार न बनने के कारण राष्ट्रपति शासन लगना दुर्भाग्यपूर्ण है। क्योंकि महागठबंधन के पक्ष में स्पष्ट जनादेश था। उन्होंने उम्मीद जताई है की जल्दी ही स्थिर सरकार बनेगी साथ ही उन्होंने अस्थिरता से होने वाले खतरों को लेकर आगाह किया है।

शिवसेना और कांग्रेस के बीच झूलती एनसीपी की यह गति को शरद पवार की राजनीतिक प्रक्रिया का प्रतिगामी माना जा सकता है। अब ऐसे हालात अगर चुनाव होते हैं तो बीजेपी के लिए मैदान खुला हुआ है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन सरकार नहीं बना पाई और इसके कारण शिवसेना विचारधारा से विपरीत जाकर सरकार बनाने की कोशिश में लग गई। भाजपा इस नई स्थिति को चुनाव प्रचार के दौरान खूब भुना सकती है बाकी दल इस सियासी हालात को कैसे भुनाते हैं यह तो कहीं कोई योजना स्पष्ट नहीं दिख रही है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सरकार बनाने के मौके अभी भी हैं बशर्ते राजनीतिक तालमेल हो और उस तालमेल के पक्के सबूत हों। उनके साथ राज्यपाल से पार्टियां मुलाकात करें और राज्यपाल को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो सकें कि सरकार कायम रहेगी। अगर ऐसा नहीं होता है यह मौका भी हाथ से निकल जाएगा तथा चुनाव की रणभेरी बज उठेगी जो ऐसी स्थिति में लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है।


Tuesday, November 12, 2019

हिंदू राष्ट्र से लेकर आर्थिक गतिरोध तक

हिंदू राष्ट्र से लेकर आर्थिक गतिरोध तक 

शनिवार को देश की सबसे बड़ी अदालत ने फैसला दिया ,राम मंदिर वहीं बनेगा जहां 1992 तक बाबरी मस्जिद थी। यह फैसला बहुत ही महत्वपूर्ण है और आस्था एवं देश को  तीन दशकों से  नियंत्रित करने वाली सियासत के दोराहे के चतुर्दिक घूम रहा है। अब कानूनी जंग खत्म हो गयी और देखना है कि इस बिंदु से वह कौन से दिशा होगी जिधर आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति अपना कदम बढ़ाएगी। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो हिंदू राष्ट्रवाद हाशिए पर खड़ा एक विचार था। 1947 के बाद के कुछ दशकों तक हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी जनसंघ की  लोकसभा में बहुत मामूली उपस्थिति थी और यह पार्टी कुछ ही राज्यों में सिमटी हुई थी। जनसंघ से पार्टी का नया रूप बदलकर भारतीय जनता पार्टी हुआ और 1984 के लोकसभा चुनाव में इसे केवल 2 सीटें मिलीं। 1980 के दशक के आखिरी दिनों में राम जन्मभूमि का आंदोलन आरंभ हुआ और पूरे देश की राजनीतिक फिजां अचानक बदल गई। हिंदुत्व मुख्य हो गया। इस आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला। भाजपा ने एक कदम और आगे बढ़ाया और आंदोलन का उग्र स्वरूप सामने आया। बाबरी मस्जिद ढहा दी गई । इसके बाद राज्यों में हिंदुत्व की लहर फैल गई।  गौ मांस विरोधी कानून सख्त हो गया, धर्म परिवर्तन पर कठोर अंकुश लग गया तथा धर्मनिरपेक्षता मजाक की बात हो गई । भारतीय संघ ने  नई दिशा की तरफ कदम बढ़ाना शुरू किया वह कदम था हिंदू आईडियोलॉजी के लक्ष्य को प्राप्त करना।
        अब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया और  इस फैसले ने एक तलाश है राम जन्मभूमि के आंदोलन को स्वीकृति दे दी यह समझने के लिए कि धर्म और सत्ता किस तरह आपस में घुल मिल गई फैसले को समझना जरूरी है सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर बनाने के लिए किसी निजी संस्था को आदेश नहीं दिया है, बल्कि मोदी सरकार द्वारा गठित एक ट्रस्ट को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस जमाने में जो आदर्श, जो आईडियोलॉजी हाशिए पर थी और उस आईडियोलॉजी की बात करने के लिए या सत्ता के गलियारे हैं उस बात को सुने जाने के लिए चरमपंथी आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया गया था। वह आज भारत का सहज ज्ञान हो गया है। भाजपा ने हिंदू राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाना शुरू किया। हिंदुत्व के विकास में भारतीय जनता पार्टी के विकास अंतर्निहित हैं। जबकि 1986 में कोर्ट के आदेश पर बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा कर वहां  पूजा करने के लिए  अनुमति दिए जाने के रूप में राम जन्मभूमि के आंदोलन को वस्तुतः कांग्रेस ने हवा दी थी लेकिन देखते ही देखते भाजपा ने उस पर कब्जा कर लिया है और ऐसा जन आंदोलन आरंभ किया जो बाबरी मस्जिद को जाता है। पड़ा और आज वहां मंदिर बनने जा रहा है जहां बाबरी मस्जिद थी। महज दो दशक बाद भाजपा को लोकसभा में साधारण बहुमत मिला और उसके बाद धीरे-धीरे उसकी पकड़  भारत राष्ट्र पर मजबूत होती गई। हमारे लिए यानी देश की जनता के लिए बहुत ही संतोष का विषय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में राम मंदिर का मामला सुलझ गया। अब भाजपा एक ऐसी पार्टी नहीं है जिसे लोकसभा में केवल बहुमत हासिल है बल्कि एक ऐसी पार्टी बन गई है जो देश का विचार गढ़ रही है। जैसा कांग्रेस में 1947 के पहले और बाद में किया था अब जब भारत राष्ट्र का इतिहास दोबारा लिखा जाएगा तो यह काल स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। इन सारी स्थितियों से उभरकर एक निष्पत्ति सामने आती है वह है कि हिंदुत्व का विकास मुस्लिम विचारधारा को हाशिए पर धीरे-धीरे लाने के बाद ही हुआ और या आगे भी जारी रहेगा ,उदाहरण के लिए 2014 में लोकसभा में मुसलमानों का अनुपात 1951 के बाद सबसे कम था। सामाजिक आर्थिक आंकड़े भी बताते हैं की मुस्लिमों की आर्थिक स्थिति आज तक बहुत खराब थी। यहां तक कि दलितों के मुकाबले भी वह अच्छी नहीं थी। कानून भी बने तो वह भी कुछ ऐसे जो मुस्लिमों को अलग-अलग करने वाले थे। जैसे अपनी पत्नी को छोड़ने के लिए केवल मुस्लिम ही दंडित किए जाएंगे। इधर अर्थव्यवस्था की हालत यह है कि गरीबों को जीवन यापन करना कठिन होता जा रहा है। गरीब रोटी का एक टुकड़ा नहीं मांग सकते हैं ।  पर सिक्किम मिल रहा है ,पीओके का झुनझुना बजाने को मिल रहा है। इस तरह की कई चीजें प्राप्त हो रही हैं। 2019 में तो कमाल ही हो गया। भाजपा के मन में यह बात थी कि अगर मंदिर बनता है या मंदिर के पक्ष में फैसला होता है तो यह भारत के लोगों का ध्यान आर्थिक गतिरोध तथा सामाजिक दुरावस्था से विचलित कर देगा। भाजपा जो चाहती थी वही हुआ। चारों तरफ  बात चल रही है कि अगले ही कुछ वर्षों में मंदिर का निर्माण हो जाएगा। यहां वास्तविकता यह लग रही है की बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने का मुख्य लक्ष्य भारतीय राजनीति के दायरे में एक नई स्थिति का सृजन करना है जो अति राष्ट्रवाद के पर्दे में सारी कमियों को छुपा दे। शनिवार को जो फैसला आया फिर ठीक उसी दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मुस्लिम पर्सनल लॉ समाप्त किए जाने की बात शुरू कर दी। अब केवल अयोध्या ही नहीं था हिंदुत्व विचारधारा के लोगों से अगर बात की जाए तो वह बताते हैं कि बहुत से मंदिर हैं जिन्हें तोड़कर मस्जिदें  बनाई गई है और आने वाले दिनों में इन मस्जिदों पर बात हो सकती है। वैसे उम्मीद नहीं है कि बहुत जल्दी इन चीजों के बारे में भी भाजपा बात करें लेकिन यह आवश्यक है कि जब जरूरत हुई तो यह पत्ते भी फेंके जा सकते हैं।


Monday, November 11, 2019

सहमी हुई है खुशी चारों तरफ

सहमी हुई है खुशी चारों तरफ 

सोमवार के अखबारों की सुर्खियां देशभर में सहमी हुई  खुशी की ओर इशारा कर रही हैं। ऐसे हालात के बरअक्स मंदिर फैसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश के नाम संबोधन को अगर देखें तो पता चलेगा भाषण बड़ा ही मधुर था।  नरेंद्र मोदी का घोर विरोधी भी उस भाषण में कोई कमी नहीं निकल सकते। उस भाषण से तीन सुर थे। पहला की एक लंबे समय के बाद सुप्रीम कोर्ट ने आखिर मामले को निपटा ही दिया और इसी के साथ एक विभाजन कारी मसला खत्म हो गया। अब समय है नकारात्मकता को भूलकर आगे बढ़ा जाए । सचमुच अगर देश  को अब तरक्की करनी है और एक समावेशित समाज के रूप में खुद को प्रस्तुत करना है तो यह जरूरी है। प्रधानमंत्री के भाषण से एक दूसरा स्वर यह निकला कि 9 नवंबर को ही बर्लिन की दीवार गिराई गई थी। बर्लिन की दीवार एक बिंब है जिसने शीत युद्ध के दौरान दुनिया को बांट दिया था। बर्लिन की दीवार गिराए जाने का बड़ा ही दिलचस्प उदाहरण है। मंदिर की रोशनी में यह बात उन्होंने अयोध्या के प्रसंग में नहीं बल्कि करतारपुर साहब के प्रसंग में कही। करतारपुर के गलियारे उद्घाटन भी 9 नवंबर को हुआ। इसने भारत और पाकिस्तान के बीच एक धार्मिक सेतु का निर्माण किया। इसके लिए भारत और पाकिस्तान दोनों ने अपने झगड़ों को भुलाकर मिलकर काम किया था। मोदी जी के भाषण से तीसरा स्वर सामने आता है वह है कि अब सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर बनाने के लिए हरी झंडी दिखा दी। अब देश के सभी नागरिकों को राष्ट्र निर्माण में खुद को लगा देना चाहिए। उन्होंने भाषण के आखिर में ईद उल मिलाद की बधाई भी दी। इसमें हिंदू मुस्लिम एकता का स्वर साफ सुनाई पड़ रहा था।
     दूसरी बार सत्ता में आने के बाद मोदी और भाजपा सरकार ने अपने हर उस वादे को पूरा कर दिया जो वह अभी तक अपने मतदाताओं से खासकर हिंदू मतदाताओं से करती आ रही थी। उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं के लिए भी समान आचार संहिता जैसे तीन तलाक पर रोक इत्यादि का काम खत्म कर दिया। अब सवाल है कि आगे क्या हो? बाकी करने के लिए क्या बचा है? 2014 में जब मोदी जी आए थे तो उन्होंने कई वादे किए थे, जैसे अच्छे दिन, विकास और रोजगार, अधिकतम शासन न्यूनतम सरकार इत्यादि। लेकिन पिछले 3 साल से अर्थव्यवस्था - रोजगार की स्थिति बिगड़ती जा रही है। 2019 में हिंदू राष्ट्रवाद और गरीबों के खाते में करोड़ों रुपए डाले  और देश के करोड़ों वोटरों को अपनी आर्थिक तंगी को भूल जाने के लिए फुसलाने में सफल हो गए। इसके बल पर जनादेश हासिल हो गया। लेकिन अब?
        आगे बढ़ने के पहले कुछ ऐसी बातें चिंतनीय है जिनका असर आगे हो सकता है। 5 जजों की पीठ ने अयोध्या का फैसला दिया है। बेशक इस फैसले में वजन है लेकिन यह सामूहिक और प्रतियोगिता मूलक दावों  के रास्ते आड़े आएगा। यह फैसला सांप्रदायिक शिनाख्त तथा आस्था पर प्रभाव भी डाल सकता है। यहां जो सबसे मूलभूत प्रश्न है वह है  कि क्या इसके बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा? वह जो हो रहा है वह सब बंद हो जाएगा। लेकिन शायद ऐसा नहीं होगा ? आने वाले दिनों में हो सकता है कि इस मामले को लेकर अदालत में अपील ना हो या कोई याचिका दायर ना हो पर पूरी संभावना है कि देश भर में ऐसे कई स्थल हैं जिनकी सूची तैयार होगी और उनके लिए भी इसी तरह के मामले आरंभ होंगे और अयोध्या का फैसला उसका आधार बनेगा। वैसे देश थक चुका है मंदिर मस्जिद विवाद  और सांप्रदायिक भेदभाव से। अब जरूरत है कि कोर्ट के फैसले के बाद यह सब खत्म हो जाए और सब लोग मिलजुल कर सौहार्दपूर्ण ढंग से देश के निर्माण में जुटे जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा है ।
         अब देश में अमन कायम करने के लिए सरकार को कश्मीर में पाबंदियों में रियायत देकर हालात हो सामान्य बनाने की कोशिश करने के  साथ  ही पाकिस्तान से तनाव कम करने और कुछ ऐसा करने की जरूरत है कि लोग उसके नाम से उग्र ना हों। सरकार को बालाकोट में बमबारी, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे जुमलों को इस्तेमाल कर आक्रामकता को बढ़ावा नहीं देना चाहिए । सरकार को  चाहिए कि सब देश की खुशहाली के लिए काम करें और जनता को यह महसूस  होने दें सब बराबर हैं। किसी से कोई भेदभाव नहीं है और देश खुशहाली की ओर बढ़ रहा है। बेरोजगारी खत्म हो रही है जब तक ऐसा नहीं होगा तनाव कायम रह सकता है।