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Tuesday, November 26, 2019

ये जो कुछ हो रहा है इसपर चुप क्यों हैं आप ?

ये जो कुछ हो रहा है इसपर चुप क्यों हैं आप ?

बड़ा अजीब संयोग है 26 नवंबर को संविधान दिवस है । संविधान की रक्षा और उसकी शक्तियों पर लंबी-लंबी बहसें  रही हैं और ठीक इसके 1 दिन पहले महाराष्ट्र में जो सियासी नाटक हुआ वह संविधान द्वारा प्रदत्त संस्थानों को अपना अधिकार छोड़ने और राजनीतिक हेरा फेरी का परिणाम था। पहली संस्था जो अपने पद से या अधिकार से नीचे गिरी वह था राज्यपाल का कार्यालय। ऐसा अन्य राज्यों में भी होता देखा गया है।  इसके बाद संविधान के संरक्षक के तौर पर तैनात राष्ट्रपति का कार्यालय। 23 नवंबर की सुबह राष्ट्रपति के कार्यालय ने धारा 356 खत्म कर दिया। इस बात पर विचार करने की जरूरत नहीं है कि भाजपा के पास बहुमत था या नहीं लेकिन प्रश्न यह है कि सुबह-सुबह दावा क्यों स्वीकार कर लिया और उस पर कार्रवाई क्यों हुई ? लोकतांत्रिक  संस्था का अधिकार खत्म करने की संपूर्ण प्रक्रिया तब पूरी हुई जब कोर्ट ने सदन में बहुमत साबित करने की प्रक्रिया के आदेश देने के बदले सुनवाई की तारीख को टालना शुरू कर दिया। यहां रूसो का "थ्योरी ऑफ सोशल कॉन्ट्रैक्ट" का एक कथन याद आता है कि "एक राजनीतिक दल विभाजित  आस्था पर काम करता है। किसी भी राजनीतिक दल के सदस्यों द्वारा अपने  दल के घोषित सिद्धांतों के विपरीत अपनी मर्जी से वोट लेने की आजादी ना केवल दल को शर्मसार करेगी बल्कि इसकी प्रसिद्धि एवं जनता के बीच इसकी छवि को भी आघात पहुंचाएगी।  जबकि जनता का भरोसा ही इसके कायम रहने का जरिया है।" लेकिन, रूसो का आदर्शवाद का सिद्धांत बहुत पुराना हो चुका है।  बट्रेंड रसैल  की  पुस्तक  "पॉलिटिकल पावर"  के मुताबिक  इन दिनों राजनीति में आदर्शवाद की उम्मीद रखने वाले लोगों को बेवकूफ माना जाता है। नेता सत्ता हड़पने के लिए हर बार ज्यादा से ज्यादा दुस्साहस दिखाते हैं और नागरिक मौन रहकर उस नेता का मनोबल बढ़ाते हैं। सत्ता के लिए ध्रुवीकरण के दौर में ऐसा लगता है कि सही अथवा गलत की परिभाषा बदल चुकी है। हम जो करें और सब सही है दूसरा करे वह गलत। हम संविधान दिवस का जश्न मनाते हैं उस पर बहस होती है लेकिन संविधान जिस पर आधारित है वह है लोकतंत्र।  लोकतंत्र के अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों पर सार्थक चर्चा की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है। राजनीतिक खिलाड़ियों के किसी भी काम पर हम चुप रहते हैं जबकि जिंदा कौमें या विचारशील कौम 5 साल तक इंतजार नहीं करती। अब जनादेश का अपमान देखकर लोग बौखलाते नहीं है। विगत कुछ वर्षों में कई राज्यों में जनादेश की अनदेखी हुई है लेकिन जनता में इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं देखी गई। मजबूत और सत्ताधारी दल हमेशा से मनमानी करते हैं । अपने दौर में कांग्रेस ने तो आपातकाल लगा कर उदाहरण ही स्थापित कर दिया था। लेकिन  अभी जो हो रहा है वह सब कुछ जाएज है और पर सवाल नहीं उठने चाहिए । पिछले कुछ वर्षों के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लोकतांत्रिक मूल्यों में किसी का भी विश्वास नहीं रहा । महाराष्ट्र के मामले में ही देखें जनादेश शिवसेना और भाजपा के गठबंधन को मिला था, लेकिन हो क्या रहा है । जनता तो ठगी सी महसूस कर रही है । भले वह कुछ ना बोले । लेकिन यहां यह मानना जरूरी है कि हर खेल के कुछ तो नियम होते हैं, चाहे वह कितना भी छोटा खेल क्यों ना हो। जो कुछ भी हो रहा है वाह संविधान और लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा मसला है। इसलिए इस पर गंभीरता से बात होनी चाहिए। कुछ सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब राज्यपाल महोदय महामहिम कोशियारी से मांगे जाने चाहिए । उनकी गतिविधि को देखकर ऐसा महसूस होता है कि उन्हें अपने पद का खतरा था और नियम मानने की बजाय उन्होंने हुक्म मानना बेहतर समझा। हालांकि वे पहले राज्यपाल नहीं हैं जिन्होंने ऐसा किया । उनके पहले कई आ चुके हैं जो नियम और कानून को ताक पर रखकर काम करते रहे हैं।
          महाराष्ट्र में राजनीतिक दलों ने जो कुछ किया ऐसा लगता है कि उन्होंने मतदाताओं और वहां के लोगों की उम्मीदों को पैरों तले रौंद दिया। ऐसे दल जिनके सिद्धांत राजनीतिक तौर पर एक दूसरे से विपरीत थे वे साथ आ गए । उन्होंने सत्ता की भागीदारी कर ली। यहां एक बात उठाई जा सकती है कि अगर किसी राजनीतिक पार्टी के उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि तथा उसकी दौलत की घोषणा हो सकती है और उसे कानूनन मान्य किया जा सकता है तो फिर क्यों नहीं चुनाव आयोग किसी भी राजनीतिक दल के उम्मीदवार अथवा इंडिपेंडेंट उम्मीदवार से यह घोषणा पत्र मांगे कि उसके सिद्धांत क्या हैं और वह किन सिद्धांतों के आधार पर किसी दल से गठबंधन करेगा । इससे मतदाताओं को यह तय करने का अवसर मिलेगा कि किसी विशिष्ट दल पर कितना भरोसा किया जा सकता है। उसकी क्या प्रतिबद्धता हो सकती है। संविधान सभा में बीआर अंबेडकर ने कहा था कि "किसी भी संविधान का कार्य पूरी तरह से संविधान की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता। संविधान की आवाज राज्य जैसे तंत्र मुहैया करा सकता है।" इसमें प्रमुख कारक हैं वहां की जनता और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल, जो जनता तथा राजनीति की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए अपने तंत्र तैयार करेंगे। लोकतंत्र केवल वोट देना नहीं है या सरकार बनाना नहीं है। यह मतदाताओं तथा चुनाव के बाद बनी सरकार के बीच एक भरोसा भी है। महाराष्ट्र में क्या हुआ? यह भरोसा कहां तक खत्म हुआ है यह हमारे देश की जनता खुद तय करे।


Monday, November 25, 2019

न जाने आगे क्या है!

न जाने आगे क्या है!

महाराष्ट्र का राजनीतिक नाटक कई मोड़ से गुजरता हुआ आगे बढ़ रहा है। जो कभी समाज के अगुआ समझे जाते थे आज समाज में जाल लिए घूमते हैं किसको कहां से उठाएं और कहां डालें। आधुनिक राजनीति में होटल और रिसोर्ट राजनीति की प्रतिनिधियों के शरण स्थल बन गए हैं। महाराष्ट्र में पिछले दो-तीन दिनों से जो कुछ हो रहा है उसमें कहीं भी नैतिकता के प्रतिमान नहीं दिखाई पड़ रहे हैं। शुक्रवार को हालात कुछ ऐसे थे मानो एनसीपी की कांग्रेस के साथ मिलकर मिलकर सरकार बन जाएगी लेकिन अचानक भाजपा के देवेंद्र फडणवीस और एनसीपी के अजित पवार ने शपथ ले ली। दोनों ने विधायकों की जरूरी संख्या दावा भी किया। दिन बीतने के साथ-साथ स्थितियां बदलने लगीं। भाजपा ने जिस बहुमत का अपनी मुट्ठी में होने का दावा किया था वह रेत की तरह उसकी मुट्ठी में से फिसलता हुआ नजर आने लगा। उधर एनसीपी के प्रमुख शरद पवार ने नारे लगाए अजित पवार के पास दो तिहाई बहुमत के लायक समर्थन नहीं है। ऐसे में भाजपा अपना बहुमत साबित नहीं कर पाएगी । उधर जब बीजेपी को लगा शिवसेना और एनसीपी मिलकर राज्य में सरकार बना सकती है तब बीजेपी ने पवार की कमजोर कड़ी को तोड़ने की कोशिश की। अजीत पवार को अपने ही परिवार से कुछ समस्याएं थीं। अजित पवार अपने भतीजे रोहित पवार के करजत सीट से विधानसभा चुनाव  से नाराज थे और इन मामलों को लेकर  परिवार में मनमुटाव चल रहा था । भाजपा ने शरद पवार की इसी कमजोर स्थिति यानी अजीत पवार का फायदा उठाया। शरद पवार यह कह तो रहे हैं कि उनके पास विधायक हैं और सरकार बनाएंगे लेकिन उनकी समस्या यह है कि वह सरकार बनाने में ध्यान लगाएं या फिर परिवार बचाने में। उधर एनसीपी को बचाना पवार के लिए चुनौती है। इधर अजित पवार की घटना के बाद लोग कहने लगे शरद पवार को उनके भतीजे ने पटकनी देदी और राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा करने वाले शरद पवार से उनकी पार्टी को छीनने का काम अजीत पवार ने कर डाला। वैसे भी अजित पवार और शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के बीच  पार्टी की विरासत को लेकर  रस्साकशी चल रही थी। लेकिन , जैसा कि  लोग जानते हैं  सुप्रिया सुले को  केंद्रीय राजनीति में दिलचस्पी है  और  वह  सांसद के रूप में  दिल्ली में राजनीति कर रहे हैं।  दूसरी तरफ  अजीत पवार को  महाराष्ट्र की राजनीति में  सक्रिय पाया जाता है। अभी जो स्थिति है  उससे तो लग रहा है कि अजित पवार  एनसीपी की  लीडरशिप की दौड़ से  बाहर निकल आए हैं और  शरद पवार की  राजनीतिक विरासत अजित पवार के हाथों से फिसल गई है। लेकिन बदले हालात ने यह प्रमाणित कर दिया है कि अजित पवार बुरे फंसे । जब अजित पवार ने भाजपा का समर्थन कर सरकार बनाई तो यह दावा किया गया है कि उनकी पार्टी के कुल 54 विधायकों में से 35 उनके साथ हैं । कानूनन अगर दो तिहाई या उससे ज्यादा विधायक अथवा सांसद किसी दल से अलग होते हैं तो उन पर दल बदल कानून नहीं लागू होता है उनकी सदस्यता कायम रह जाती है। एनसीपी के विधायकों के मामलों में यह संख्या 36 बनती है । अगर 35 विधायक अजित पवार के साथ होते तो एक विधायक का और जुगाड़ कर वे आसानी से एनसीपी को तोड़ सकते थे। लेकिन यही गणित गड़बड़ हो गया। अधिकांश विधायक अभी शरद पवार के साथ हैं। एनसीपी की बैठक में 54 में से 49 विधायक शामिल थे अब अजित पवार फंस गए हैं । जो कुछ भी हुआ हो रहा है उसमें शरद पवार शिकार नहीं की बल्कि उसके केंद्र में है और ऐसा लगता है कि पवार ने अपने भतीजे के माध्यम से भाजपा को फजीहत करने की योजना बनाई थी। लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है इस समय जो ताजा स्थिति है उसमें महाराष्ट्र की राजनीति में पवार सबसे मजबूत खिलाड़ी के रूप में दिखाई पड़ रहे हैं और एक साथ कई निशानों को भेदते नजर आ रहे हैं । अब जो नई राजनीतिक परिस्थितियां बन रही है उससे लगता है कि एनसीपी के विधायक अजित पवार के साथ नहीं है और इस आधार पर कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के लिए विधानसभा में बहुमत साबित करना कठिन हो जाएगा।  अगर ऐसा होता है तो फडणवीस के लिए आगे का राजनीतिक सफर बहुत मुश्किल नजर आ रहा है।
          शरद पवार की चाल का सबसे बड़ा प्रभाव भाजपा अध्यक्ष एवं गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर होता हुआ दिख रहा है। सूत्रों के मुताबिक अजित पवार के कहने पर भाजपा के महाराष्ट्र प्रभारी भूपेंद्र यादव ने अमित शाह को बहुमत का भरोसा दिलाया था लेकिन अब ताजा परिस्थिति में ऐसा नहीं लग रहा है और अगर पार्टी बहुमत साबित नहीं कर सकी तो सबसे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति पार्टी के शीर्ष नेताओं की हो जाएगी। कहा जाने लगेगा कि कैबिनेट बैठक बुलाए बिना महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाया जाना और राज्यपाल के माध्यम से भाजपा सरकार को शपथ दिलाने का काम किए जाने की क्या जल्दी थी? अमित शाह ने पिछले कुछ वर्षों से ऐसी छवि बनाई थी जिससे लोग उनको भारतीय राजनीति का चाणक्य समझने लगे थे। लेकिन इस ताजा स्थिति से उनकी इस छवि को आघात लग सकता है। शरद पवार की नीति अमित शाह पर भारी पड़ती दिख रही है।
पॉलिटिक्स की बिसात पर विपक्षी को मात देने का हुनर भाजपा अच्छी तरह से जानती है और उसने यहां भी वही किया है। आगे देखना है कि यह सब लोकतंत्र के लिए कितना शुभ और कितना अशुभ है।


Sunday, November 24, 2019

महाड्रामा: क्लाइमेक्स तो अभी बाकी है

महाड्रामा: क्लाइमेक्स तो अभी बाकी है

देश के सियासी इतिहास में शनिवार को एक महा ड्रामा हुआ। शह और मात का रोमांचक खेल। ऐसा लग रहा था जैसे 80 के दशक की फिल्में देख रहे हैं या फिर उन्हीं फिल्मी कहानियों को 22 वीं शताब्दी के दूसरे दशक में चस्पा कर दिया गया है। शुक्रवार की शाम को शिवसेना के उद्धव ठाकरे को अंधेरे में रख राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अजित पवार ने अचानक बाजी उलट दी और भाजपा के देवेंद्र फडणवीस के साथ उप मुख्यमंत्री की शपथ ले ली। शरद पवार जब नींद से जागे तो उन्हें यह खबर मिली और अजीत पवार की चाल ने उन्हें चौंका दिया।
कहा तो यह जा रहा है अजित पवार के ऐसा करने के पीछे मुख्य कारण है उनके ऊपर चल रही जांच। वे फिलहाल 2 आपराधिक मामलों में फंसे हुए हैं। पहला मामला  मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने दायर किया है। यह महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक में 25000 करोड़ रुपयों के घोटाले का मामला है और मुंबई हाई कोर्ट के निर्देश पर यह मामला दायर किया गया। सिंचाई घोटाले में भी उन पर जांच चल रही है।
अजित पवार की यह चाल उनके चाचा शरद पवार की 41 साल पहले की चाल को याद कराती है, जब शरद पवार ने कांग्रेस के दो धड़ो की  सरकार गिरा कर राज्य के सबसे नौजवान प्रधानमंत्री का तमगा हासिल कर लिया । शरद पवार ने 1978 में जनता पार्टी  की गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया था जो 2 साल से भी कम समय तक चली।संजोग से इस बार भी वह राज्य में कांग्रेस और शिवसेना से हाथ मिला कर इसी तरह का गठबंधन करने की कोशिश में थे। लेकिन  उनके भतीजे अजित पवार ने उन्हें मात देदी। उन्होंने 23 नवंबर की सुबह उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। इस पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए शरद पवार ने कहा कि भाजपा को समर्थन देने का फैसला उन्होंने नहीं किया है। यह उनके भतीजे अजीत पवार का व्यक्तिगत फैसला है। शरद पवार ने अपनी किताब "ऑन माय टर्म्स" लिखा है कि "1977 में इमरजेंसी के बाद देशभर में इंदिरा विरोधी लहर चल रही थी और कई लोग स्तब्ध थे। पवार के गृह क्षेत्र बारामती से वीएन गाडगिल कांग्रेस की टिकट से हार गए थे। इंदिरा जी ने 1970 की जनवरी में कांग्रेस को विघटित कर दिया और पवार स्वर्ण सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस (एस ) में चले गए। क्योंकि उनके गाइड यशवंतराव चौहान भी इसी गुट में थे । 1 महीने के बाद महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस ( एस) को 69 सीटें तथा कांग्रेस (आई) को 65 सीटें मिलीं। जनता पार्टी को 99 सीटें हासिल हुईं और इस तरह से किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला ।  कांग्रेस के दोनों धड़ों को मिलाकर सरकार बनाई गई। लेकिन दोनों में तनातनी कायम रही और सरकार का चलना मुहाल था। पवार ने कांग्रेस के 38 विधायकों के साथ मिलकर नई सरकार बनायी और वह सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने ।  1980 में दोबारा इंदिरा जी की सरकार बनी और पवार की सरकार को होने बर्खास्त कर दिया कुंवार बड़ी चालाकी से राजीव गांधी के नेतृत्व के तहत अपनी मूल पार्टी में चले आए। आज जो अजित पवार ने किया है यह संभवत शरद पवार के सियासी  स्टाइल का दोहराव है। इस बार भी किसी को बहुमत नहीं मिला है। महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 21 अक्टूबर को चुनाव हुए थे और 24 अक्टूबर को उसके नतीजे आए थे। चुनाव में भाजपा को 105 शिवसेना को 56 एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिली थीं। किसी भी पार्टी का  गठबंधन के सरकार बनाने का दावा नहीं पेश कर सका। इस के बाद 12 नवंबर को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था । इसके बाद जो ताजा समीकरण बने हैं उनको देखते हुए ऐसा लग रहा है कि देवेंद्र फडणवीस सबसे बड़े घाटे में रहेंगे। क्योंकि शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी ने अपने विधायकों को अपने पास रखा है और इनके लिए बहुमत साबित करना मुश्किल हो जाएगा। इनके बाद घाटे में रहेंगे अजित पवार क्योंकि उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के साथ बगावत कर एनसीपी की विश्वास को आघात पहुंचाया है । इससे उनकी साख को भारी नुकसान हुआ है। उन्हें शरद पवार के वारिस के रूप में देखा जाता था और यह जो कुछ हुआ वह शरद पवार के साथ गद्दारी मानी जाएगी। उन्होंने यद्यपि परीक्षा पास की लेकिन अभी कई परीक्षाएं बाकी हैं और इसमें भाजपा के फेल होने के आसार बहुत ज्यादा हैं। उधर अजीत पवार को एनसीपी के विधायक दल के नेता के पद से हटा दिया गया है और उनकी जगह राज्य एनसीपी अध्यक्ष जयंत पाटील को दी गई है। पाटिल की नियुक्ति का स्पष्ट अर्थ है की जब देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार की सरकार सदन में अगले हफ्ते बहुमत साबित करने के लिए खड़ी होगी तो पाटिल व्हिप जारी कर सकते हैं।  व्हिप के उल्लंघन का स्पष्ट अर्थ है पार्टी से निष्कासन और निष्कासन का मतलब विधायक पद समाप्त उधर अटकलें लगाई जा रही हैं 25 से ज्यादा विधायक अजित पवार से संपर्क में है लेकिन एनसीपी के विधायक दल बैठक में 45 विधायकों की उपस्थिति यह स्पष्ट करती है कि पार्टी के अधिकांश विधायक अजीत पवार के साथ नहीं हैं। विधायक दल की बैठक में कहा गया कि अजीत पवार ने जो कुछ किया है वह पार्टी के विरुद्ध है इसलिए उन्हें विधायक दल के पार्टी से निष्कासित किया जाता है और विधायकों को व्हिप देने का अधिकार भी उनसे वापस दिया जाता है इसके पूर्व शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शरद पवार ने कहा कि उन्हें नहीं लगता राज्य सरकार बहुमत साबित कर पाएगी।
           अब मामला किस करवट बैठता है यह आने वाला समय बताएगा । क्योंकि पूरी की पूरी बात सुप्रीम कोर्ट के सामने है और सुप्रीम कोर्ट रविवार को ही इस पर सुनवाई करने जा रहा है।
आंकड़े बाज लोग आंकड़े इकट्ठे करते रहे ।कुछ लोगों का मानना है इस पूरे गेम में देवेंद्र फडणवीस सबसे ज्यादा घाटे में रहेंगे। इस पूरे मामले का क्लाइमेक्स अभी बाकी है देखिए क्या होता है आगे आगे।


Friday, November 22, 2019

अब चुनावी बांड का मामला गरमाया

अब चुनावी बांड का मामला गरमाया 

कांग्रेस और विपक्षी दलों ने गुरुवार को लोक सभा में चुनावी बांड का मामला उठाया और सरकार पर भ्रष्टाचार को अमलीजामा पहनाने का आरोप लगाते हुए काफी शोर-शराबा मचाया तथा सदन से बहिर्गमन  कर गया।
दरअसल कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहां हालात सामान्य करने को लेकर कांग्रेस ने संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत को मुद्दा बनाया। गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के बाद अब चुनावी बांड का मुद्दा उठने लगा ।  बुधवार को सोनिया गांधी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक की। उसमें चुनावी बांड के बारे में प्रदर्शन करने का फैसला किया गया।
कांग्रेस का कहना है कि रिजर्व बैंक के मना करने के बावजूद भाजपा ने चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था की ताकि ना चंदा देने वाले का और ना चंदे की राशि के स्रोत तथा ना चंदा पाने वाले का पता चले। जहां तक पता चला है कि 2017 के बजट के ठीक पहले रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने चुनावी बांड का विरोध किया था । लेकिन मोदी सरकार ने रिजर्व बैंक की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए चुनावी बांड की घोषणा कर दी ।  रिजर्व बैंक ने चुनावी बांड का खुलकर विरोध किया था। लेकिन कुछ नहीं हुआ और तत्कालीन राजस्व सचिव हंसमुख अढिया ने रिजर्व बैंक की आपत्तियों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि बैंक इस सिस्टम को सही ढंग से समझ नहीं पाया। उन्होंने  रिजर्व बैंक के पत्र के जवाब में लिखा कि बैंक की सलाह देर से आई है और वित्त विधेयक छप चुका है। इसलिए सरकार इस प्रस्ताव पर आगे कदम बढ़ा सकती है। कुल मिलाकर बैंक की आपत्तियों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया गया। बांड जारी करते हुए सरकार का दावा था कि इसके माध्यम से राजनीतिक दलों के खातों में चंदा जमा करने की गुमनाम व्यवस्था पर रोक लगेगी और चुनाव में काले धन पर अंकुश लगेगा। लेकिन, बांड खरीदने वाले की पहचान को गुप्त रखने का जो प्रावधान इस योजना में रखा गया उससे सरकार क्या चाहती है यह स्पष्ट हो गया। एक तरफ चुनावों में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों का खर्च बेतहाशा बढ़ रहा है और चुनाव आयोग इस खर्च पर अंकुश लगाने में खुद को असमर्थ पा रहा है। कारपोरेट क्षेत्र से प्राप्त चंदे की अब चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका है। सात- सात चरणों तक चुनाव को खींच ले जाना सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में जा सकता है । क्योंकि , चुनावी बांड के माध्यम से प्राप्त धन को वह चुनाव प्रचार में झोंक सकती है ।
अपने देश में चुनाव में सबसे अधिक काला धन खर्च होता है 2017 के बजट से पहले 20000 रुपए से ऊपर चंदा देने वालों को चेक से देने की व्यवस्था थी और उसके बाद उससे कम के लिए रसीद लेनी होती थी ।राजनीतिक पार्टियां इस प्रावधान का गलत इस्तेमाल करने लगी थीं। इससे देश में काला धन बढ़ रहा था। इस धन का इस्तेमाल चुनाव में भी होता था। कुछ दलों ने तो ऐसा दिखाया 80- 90% चंदा 20,000 से कम रुपय के रूप में हासिल हुआ। चुनाव आयोग की सिफारिश पर 2017 18 के बजट सत्र में केंद्र सरकार ने गुमनाम नगद की सीमा घटाकर ₹2000 कर दी थी। इसका मतलब यह हुआ कि ₹2000 से अधिक चंदा लेने के लिए राजनीतिक दलों को बताना होगा कि यह चंदा किस स्रोत से आया है। सरकार ने घोषित तौर पर इसे रोकने के लिए बड़े जोर जोर से चुनावी बांड की व्यवस्था की। लेकिन शायद उससे घोषित उद्देश्य पूरा नहीं हो सका।
विधि आयोग ने अपनी 255 वीं रिपोर्ट में 20000 के नीचे  राजनीतिक चंदों को भी राजनीतिक दलों द्वारा सार्वजनिक किए जाने की जाने की अनुशंसा की थी जबकि सब मिलकर 20 करोड़ से ज्यादा धन हो जाते हैं।
राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पार्टियों की ओर से चुनाव आयोग को दाखिल की गई वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट में जो जिक्र है उसके अनुसार 2018  - 19 में  जो चुनावी बांड बिके और उसके आधार पर जो आंकड़े सामने आए हैं उनसे ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए 45 सौ करोड़ रुपये के बांड खरीदे गए हैं। हालांकि भाजपा ने अभी तक अपनी रिपोर्ट पेश नहीं की है जबकि वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट जमा करने की अंतिम तारीख 31 अक्टूबर थी।
      रिपोर्ट जमा  नहीं करने की सूरत में यह समझ में नहीं आ रहा है कि भाजपा को कितना मिला और पार्टी की ओर से इस पर चुप्पी साध ली गई है । जनप्रतिनिधि कानून की विभिन्न धाराओं के मुताबिक राजनीतिक पार्टियों को चुनावी बांड के बारे में जानकारी देने की जरूरत नहीं है लेकिन इनकम टैक्स के मुताबिक राजनीतिक पार्टियों के लिए अपनी आय की जानकारी चुनाव आयोग को देनी जरूरी है। चुनाव आयोग के पास इस मामले में बहुत ज्यादा अधिकार नहीं हैं। वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट ना जमा करने की सूरत में आयोग पार्टियों को केवल कारण बताओ नोटिस दे सकता है। यहां सवाल उठता है कि आखिर   क्यों मोदी सरकार में जनवरी 2018 में इस बांड योजना अधिसूचित की गई थी और उसके साथ कहा गया था कि इससे चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता आएगी लेकिन शायद ऐसा नहीं हो सका। क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि राजनीतिक पार्टियां चुनावी बांड खरीदने वालों के बारे में चुनाव आयोग को बताए। अब इससे कभी पता नहीं चल पाएगा कि 6000 करोड़ के चुनावी बांड  खरीदने वाले कौन लोग थे। कुल मिलाकर इससे राजनीतिक भ्रष्टाचार को एक तरह से बढ़ावा ही मिलता है और काला धन भी प्रोत्साहित होता है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस दूध की धुली है लेकिन लोकसभा में कांग्रेस द्वारा इस बात को उठाया जाने का स्पष्ट अर्थ मोदी सरकार को घेरने का एक अवसर पैदा कर रही है । राजनीति में यह चलता ही है लेकिन इसमें जो रणनीति है वह बिल्कुल इमानदारी भरी नहीं है, क्योंकि कमोबेश बांड की राशि उसे भी तो मिली है।
         


Thursday, November 21, 2019

एनआरसी पर गरमा रही है राजनीति

एनआरसी पर गरमा रही है राजनीति 

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा की  केंद्र सरकार का नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर तीव्र आलोचना की है और कहां है कि वह इस राज्य में एनआरसी नहीं लागू कर देंगी। गृहमंत्री अमित शाह ने बुधवार को संसद में बयान दिया था कि जब भी देशभर में एनआरसी लागू किया जाएगा असम में भी उसे दोहराया जाएगा। विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों ने  देश भर में एन आर सी के  खिलाफ बयान दिए हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एनआरसी बिल पर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है । उन्होंने कहा है कि कोई भी किसी से नागरिकता का अधिकार नहीं छीन सकता और उसे शरणार्थी नहीं बना सकता है।
राज्य सरकार का दावा है कि बंगाल में एनआरसी को लेकर आतंक बढ़ता जा रहा है और कई लोगों ने पिछले 1 महीने में आत्महत्या कर ली है। उधर, अमित शाह ने कहा है, पश्चिम बंगाल में एनआरसी का लागू होना तय है और उससे पहले सरकार नागरिकता संशोधन अधिनियम के जरिए हिंदू सिख जैन ईसाई और बौद्ध शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दे देगी। अमित शाह ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह एनआरसी को लेकर लोगों को गुमराह कर रही है। उधर राजनीतिक हलकों में यह बात उठ रही है कि सरकार एनआरसी के जरिए बांग्लादेशी नागरिकों को देश से बाहर निकालने की बात तो कर रही है लेकिन यह कैसे होगा यानी कैसे निकाला जाएगा लोगों को इस मुद्दे पर सरकार चुप है।
उन्होंने कहा कि असम में एनआरसी असम समझौते का हिस्सा था और यह समझौता राजीव गांधी के जमाने में हुआ था। उन्होंने कहा कि यह देशभर में कभी लागू नहीं हो सकता। ममता जी ने किसी के नाम तो नहीं लिया लेकिन कहा, कुछ लोग राज्य में उपद्रव करना चाहते हैं यह कह कर कि बंगाल में एनआरसी लागू किया जाएगा। मै  स्पष्ट करना इसे कभी लागू नहीं करने दिया T। मैं लोगों को धर्म के नाम पर बांटने नहीं दूंगी।" उन्होंने दावा किया कि राज्य को धर्म के नाम पर बांटने की साजिश चल रही है लेकिन अगर कोई बंगाल को ऐसा करने के बारे में सोचता है तो गलतफहमी में है । असम में लगभग 19 लाख लोग एनआरसी की सूची से बाहर   जिन्हें एनआरसी की सूची से बाहर रखा गया है। उनमें बंगाली हिंदू, मुसलमान ,गोरखा और बौद्ध है इन्हें डिटेंशन सेंटर में भेजा जाएगा। बंगाल में ऐसा कभी नहीं करने दिया जाएगा और ना ही कोई डिटेंशन सेंटर बनने दिया जाएगा। यहां एक बुनियादी प्रश्न है कि यदि एनआरसी एक कानूनी प्रक्रिया है तो असम एनआरसी के तहत गैर नागरिक घोषित लोगों के साथ कानूनी प्रक्रिया कैसे अपनाई जाएगी? एक तरफ सरकार बांग्लादेश की आश्वासन देती है कि एनआरसी की प्रक्रिया उसे प्रभावित नहीं करेगी तो फिर असम के इन 19 लाख लोगों का क्या किया जाएगा? कब तक की 19 लाख लोग मानवाधिकारों के बिना रहेंगे?
        उधर असम में भी एनआरसी के खिलाफ आवाज उठ रही है बुधवार को ही असम के मंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने कहा है इसे रद्द किया जाना चाहिए और  एक ही  कट ऑफ  तारीख से  देशभर में लागू किया जाना चाहिए। असम में यह कटऑफ तारीख 24 मार्च 1971 है। जो आवेदक यह प्रमाणित कर देगा कि उस तारीख से या उसके पहले से वह  या उनके पूर्वज असम में रह रहे थे उनके नाम नागरिकता सूची में  कर लिए जाएंगे। असम में पहली एनआरसी 1951 में बनी थी और वर्तमान एनआरसी उस संदर्भ में अद्यतन है। जिन लोगों के नाम 1951 की सूची में हैं उनके परिवार के  नाम एनआरसी में लिखे जा सकते हैं और अब जो नए नाम लिखे जाएंगे वह 25 मार्च 1971 के आधार पर होंगे। यानी ,उस दिन की रात के 12:00 बजे तक यदि किसी के नाम मतदाता सूची में अथवा वैसे ही किसी वैधानिक दस्तावेज में है तो वह नाम एनआरसी में लिखा जा सकता है। एनआरसी की पहली सूची 31 अगस्त को प्रकाशित हुई थी जिसमें  19 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं थे। ऐसे लोगों को राज्य के विदेशी ट्रिब्यूनल के समक्ष अपनी बात कहने का मौका दिया जा सकता है।
           इसके पहले अमित शाह ने कहा था कि नागरिकता संशोधन विधेयक संसद के इसी सत्र में रखा जाना है और यह अखिल भारतीय स्तर पर एनआरसी के पहले पारित हो जाएगा। यहां एक ध्यान देने की बात है कि एनआरसी यानी  नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन कट ऑफ तारीख के आधार पर नागरिकता तय करेगा जबकि नागरिकता संशोधन विधेयक धर्म के आधार पर बाहर से आए लोगों के बारे में तय करेगा। लेकिन अभी  राज्यसभा में जाने से पहले ही प्रस्तुतीकरण की तारीख पार होने के कारण निरस्त हो गया। इस विधेयक में नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन का प्रस्ताव है। इसमें भारत के गैर मुस्लिम 6 अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय के लोगों के लिए थोड़ी रियायत मिली है । इनमें शामिल हैं अफगानिस्तान ,बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख ,बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई । प्रभावशाली सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का कहना है कि नागरिकता संशोधन विधेयक एनआरसी के विपरीत है । अगर असम में यह विधेयक पारित हो जाता है तो जो हिंदू एनआरसी से वंचित रह गए हैं वे भी नागरिक हो जाएंगे जबकि मुसलमान इस सुविधा से वंचित रहेंगे। ऐसी स्थिति में वर्तमान एनआरसी बेकार है। अगर देशभर में एनआरसी लागू होता है तो एक बार फिर राजनीतिक तौर पर बवाल होगा और तनाव बढ़ेगा। वैसे तनाव संभवत कोई असर नहीं डाल पाएगा क्योंकि क्योंकि ग्रास रूट स्तर तक सरकार की राजनीतिक दलबंदी  है और इसका स्पष्ट उदाहरण बाबरी मस्जिद फैसले के बाद देखने को मिला।
    


Wednesday, November 20, 2019

जरा कल के बारे में भी सोचें

जरा कल के बारे में भी सोचें

भारत में  दूषित हवा  और दूषित पानी  की खबरों ने  चारों तरफ तहलका मचा दिया है। हर आदमी  परेशान है कि सांस कैसे ले पिए क्या ? दिल्ली जैसे शहर में तो ऑक्सीजन काउंटर खुल गया है। धीरे धीरे धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है, समुद्र उथला होता जा रहा है। यानी हमारी पृथ्वी को और हमारे देश को मौसम का खतरा झेलने के लिए बाध्य होना पड़ेगा एक तरह से हम  अपनी ही  करनी का अभिशाप भोगने को मजबूर किए जा रहे हैं।
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति 
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु ॥1॥

विख्यात पत्रिका लांसेट की काउंटडाउन  रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस तेजी से कार्बन का उत्सर्जन हो रहा है उसका असर आज पैदा होने वाले हर बच्चे को जिंदगी भर भुगतना पड़ेगा। आज पैदा हुआ बच्चा जब 71 वर्ष का होगा तब तक धरती का तापमान 17 वीं शताब्दी के मध्य से 4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहेगा। यानी गर्मी बहुत बढ़ेगी। हमारे देश के ऐसे बच्चे जो इस समय दूषित हवा में सांस ले रहे हैं , दूषित जल पी रहे हैं और कुपोषण तथा संक्रामक रोगों की चपेट में आसानी से आ सकते हैं उन पर इस जलवायु परिवर्तन का  व्यापक असर पड़ेगा। कृषि उत्पादन घटेगा। अब सवाल है कि हमारी आने वाली पीढ़ी की जिंदगी में कृषि कितना असर डालेगी? सरकारी रिपोर्ट बता रही है कि चावल और मक्का की औसत पैदावार कम हो रही है।  अब ऐसा होने से इनकी कीमत बढ़ेगी जिससे कुपोषण का बोझ बढ़ेगा। हमारे देश के बच्चे वैसे ही पहले से कुपोषण के शिकार हैं।  मौसम बदलने से संक्रामक रोग बढ़ेंगे और बच्चे इस का सबसे पहला शिकार होंगे। वायु प्रदूषण बढ़ने से जलकण में व्याप्त धूल के कण से मरने वालों की संख्या बढ़ेगी। विनाशकारी बाढ़ ,सूखे जंगलों में आग इत्यादि परिणाम होंगे बढ़ते तापमान के। यह आम बात है कि बच्चे बदलते जलवायु के कारण होने वाले स्वास्थ्य जोखिम के शिकार जल्दी जाते हैं। क्योंकि, उनके शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली  पूरी तरह विकसित नहीं हुई रहती है। एक और रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दुनिया में औसत तापमान में वृद्धि से भारत की आधी आबादी को खतरा है। भविष्य को बचाने के लिए हमें ऊर्जा परिदृश्य में तेजी से परिवर्तन लाना होगा और ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस पर सीमित करने की कोशिश करनी होगी। जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले संकट आज मनुष्यता के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक हैं। लेकिन हम आज भी अपनी सरकार की ओर देख रहे हैं , खुद कुछ नहीं करते। यानी हम आने वाली पीढ़ी को तड़प तड़प कर मरने के लिए सरकार के भरोसे छोड़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए पेरिस समझौता हुआ यह 2020 से कार्यान्वित होगा । लेकिन अगर इसे ईमानदारी से और पूरी ताकत से लागू नहीं किया गया तो जो विनाश होगा उसे  बर्दाश्त नहीं किया जा सकेगा।
          जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा कृषि पैदावार घटने लगेगी और खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ने लगेगी। यह वृद्धि गरीबों की पहुंच से बाहर होगी। जैसा कि सब जानते हैं नवजात और छोटे बच्चे कुपोषण के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं । नतीजा यह होता है कि उनका विकास रुक जाता है और उनके भीतर की  प्रतिरक्षा प्रणाली सुस्त हो जाती है ।  भविष्य की समस्याएं बढ़ जाती हैं। जैसी की खबर है, बढ़ते तापमान के कारण में पिछले 30 वर्षों में दुनिया भर में अनाज की उपज की क्षमता घट गई है। रिपोर्ट  के अनुसार मक्के की उपज में 4% गेहूं की उपज में 6% सोयाबीन की उपज में 3% और चावल की उपज में 4% गिरावट आई है। 1960 को आधार मानकर किए गए आकलन के अनुसार भारत में मक्का और चावल की उपज में औसत 2% की गिरावट आई है और पिछले 5 साल में 5 साल से कम उम्र के दो तिहाई बच्चों की मृत्यु का कारण कुपोषण रहा है । इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक भारत में जलवायु परिवर्तन से कृषि उत्पादन लगातार गिर रहा है 2010 अगर आधार मान लिया जाए तो 2030 में भारत में कृषि उत्पादन बहुत ज्यादा गिर जाएगा।  2030 में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण भूख से पीड़ित लोगों की अनुमानित संख्या 22.5 प्रतिशत से ज्यादा हो सकती है । या कह सकते कि एक सौ 20 करोड़ की आबादी में करीब 24 करोड़ लोग भूख से पीड़ित होंगे।  यह भूख क्या रंग लाएगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
       और तो और बीमारियां बढ़ेंगी। बदलते मौसम के साथ एक खास किस्म की बैक्टीरिया विब्रियो के फैलने का खतरा बढ़ जाता है और इससे पेचिश की बीमारी दुगनी हो जाती है। अस्पतालों में डायरिया से ग्रस्त बच्चों की लंबी सूची को देखकर स्पष्ट अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम किधर बढ़ रहे हैं । जलवायु परिवर्तन के साथ मच्छर बढ़ते हैं और इस समय डेंगू दुनिया में सबसे ज्यादा तेजी से फैलने वाला रोग बन गया है । एक शोध के मुताबिक भारत की आधी आबादी को इससे खतरा है । आज के बाद जो परिदृश्य रहेगा और हवा की प्रदूषण तथा वातावरण  के तापमान की जो स्थिति रहेगी उससे बच्चों के फेफड़े ज्यादा प्रभावित होंगे और सांस की बीमारियां बढ़ती जाएगी। अभी खनिज तेल का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है और इससे वातावरण में कार्बन मोनोऑक्साइड के पार्टिकुलेट मैटर भी बढ़ रहे हैं अत्यंत बारीक इसके कण सांस के साथ हमारे रक्त प्रवाह में फैलते जा रहे हैं। इससे अकाल मृत्यु का खतरा बढ़ता जा रहा है । आज बच्चा जन्म ले रहा है, उसके सामने जीवन में आगे चलकर गंभीर बीमारियां, लंबे समय तक सूखे और जंगली आग का खतरा बढ़ जाएगा । रिपोर्ट के मुताबिक 196 देशों में से लगभग 152 देशों में 2001 से 4 के बाद जंगल की आग के शिकार लोगों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ी है ।भारत में इस संख्या में लगभग 2 दशमलव 10 करोड़ और चीन में 1 दशमलव 70 करोड़ से ज्यादा वृद्धि हुई है इस वजह से लोग मर रहे हैं। सांस की बीमारियां फैल रहीं हैं और उन्हें अपने घरों से भी हाथ धोना पड़ रहा है। 2018 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है इस साल दुनिया भर में 22 करोड़ लोग लू से मरे भारत में जनसंख्या 4.30 करोड़ थी। भारत में साल 2000 बाद अत्यधिक गर्मी के कारण है    काम के घंटे बर्बाद हुए।अकेले कृषि क्षेत्र में 12 अरब काम के घंटों का नुकसान हुआ। इस खतरनाक  स्थिति से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाला दिन कैसा होगा और हमारे बच्चों को क्या झेलना पड़ेगा।


Tuesday, November 19, 2019

सड़क दुर्घटनाओं में बंगाल सबसे आगे

सड़क दुर्घटनाओं में बंगाल सबसे आगे 

कोलतार की लंबी काली सड़कें और उस पर दौड़ते काले टायर उन दैत्यों की तरह है जो सड़कों पर बिखरे खून को मिनटों में चाट जाते हैं और बचे रह जाते हैं अपनों के चेहरे पर आंसुओं के निशान और उनके जीवन पर व्यथा की लकीर । ताजा आंकड़े बताते हैं कि अपने प्रदेश में पांच जानलेवा सड़क दुर्घटनाओं में 3 यहां  के हाईवे पर होती है। अभी हाल में सड़क परिवहन एवं राज्य पथ मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक  2018 में  बंगाल में  कुल रोड एक्सीडेंट का 62% हाईवे पर हुए। दुर्घटना की ऊंची दर इस साल नई नहीं है बल्कि पिछले 3 वर्षों से लगातार चली आ रही है 2015 16 और 17 में भी यही हालत थी। सरकारी सूत्रों के मुताबिक राज्य में 2,998 किलोमीटर नेशनल हाईवे है और 3,693 किलोमीटर राज्य सरकार की हाईवे है। 2018 में बंगाल की सड़कों पर दुर्घटनाओं की कुल 12 हजार 705 घटनाएं हुई और अगर मोटे तौर पर आबादी से हम इसका अनुपात आंकते है तो प्रति एक लाख आबादी पर 13.4 दुर्घटनाएं होती हैं। हालांकि सरकार  कहना है की दुर्घटनाओं की संख्या तेजी से घट रही है।
         दुर्घटनाओं में न केवल जाने जाती हैं बल्कि उसका एक दूरगामी असर भी पड़ता है। आंकड़े बताते हैं कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद पर दुर्घटनाओं का 3.5% असर पड़ता है और  शहरों की सड़कों में सुधार  और  ड्राइवर्स  की ट्रेनिंग के साथ-साथ  परिवहन नियमों  को कड़ाई से लागू करने पर  इस  घाटे को रोका जा सकता है । दुर्घटनाओं में मरने वालों का अनुपात अगर देखें तो इनमें 70% लोग 18 से 45 वर्ष की आयु के बीच के हैं। 2018 में  विश्व बैंक की  एक रिपोर्ट में  कहा गया था कि  अगर 2038 तक इन सड़क दुर्घटनाओं में घायल और मरने वालों की संख्या को आधा कर दिया जाए तो हमारा सकल घरेलू उत्पाद 7% के आसपास हो जाएगा। 2018 में देश भर में कुल 4,67,044 सड़क दुर्घटनाएं हुई जो पिछले वर्ष से 0. 5% ज्यादा थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में जितने वाहन हैं उसका केवल एक प्रतिशत भारत में है और दुनिया भर में सड़क दुर्घटनाएं होती हैं उसका 6% केवल भारत में होता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018 में दक्षिण और दक्षिण पूरब एशिया में जितने लोगों की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हुई उसमें केवल 73% मौतें भारत में हुई । भारत में मृत्यु के 12 आम कारण है सड़क दुर्घटना उनमें से एक है। 2017 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी ग्लोबल हेल्थ एस्टिमेट्स के मुताबिक भारत में मौतों के 12 कारण है जिनमें सड़क दुर्घटना भी 7वां कारण है और अपंगता कि जितने भी कारण से उनमें सड़क दुर्घटना दसवां कारण है। 2018 में जितनी भी सड़क दुर्घटनाएं हुई उनमें ज्यादातर 36% दुपहिया वाहनों के कारण में और 13% सड़क के किनारे चलने वालों के कारण हुईं। सड़कों पर फर्राटे से तेज रफ्तार चलने वाले दुपहिया वाहनों के कारण ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं। हमारे देश के कानून के मुताबिक इसके लिए 500 रुपये से 5000 रुपये तक जुर्माना है और कई मामलों में ड्राइवर को जेल भी हो सकती है।
हमारे देश में चार लेन की सड़कों पर गति सीमा 80 किलोमीटर प्रति घंटा है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे 53 से 57 किलोमीटर प्रति घंटा के बीच करने का सुझाव दिया है। सरकार  ने  गति सीमा का उल्लंघन करने  के लिए  दी जाने वाली सजा  में संशोधन किया है। नए कानून में पहली घटना में 6 महीने तक की कैद और ₹10000 जुर्माना है दूसरी घटना में 2 साल की कैद ₹15000 जुर्माना अथवा दोनों है।
         दरअसल सड़क दुर्घटनाओं में सबसे बड़ी भूमिका परिवहन कानून की है और इस कानून को हमारे देश में या हमारे राज्य में बहुत ढीले ढाले ढंग से लागू किया जाता है। कई बार तो देखा गया है कि पुलिस के सामने से तेज रफ्तार दोपहिया या चार पहिया वाहन निकल जाते हैं और वहां ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी से देखता रहता है, कुछ नहीं कर पाता। इसके कई कारण हो सकते हैं लेकिन अगर कारणों को नजरअंदाज कर दिया जाए और सख्ती से कानून लागू किया जाए तो बहुत बड़ी संख्या में लोगों की जानें बचाई जा सकते हैं।  इसके लिए जरूरी है वाहन चालकों में कानून का डर और वाहन नियमों के प्रति जागरूकता। यहां तक कि शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों को भी रोका नहीं जाता। या जो लोग इस अपराध में पकड़े भी जाते हैं उन्हें बहुत ज्यादा सजा नहीं मिलती। लेकिन इसे लागू किए जाने में केवल रानू में ढिलाई बरतना ही एकमात्र कारण नहीं है बल्कि कानून लागू करने वाले तंत्र का कमजोर होना भी है । हमारे देश में, पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में कुल 85 हजार 144 ट्रैफिक के सिपाहियों की जरूरत थी जबकि है उसका 30% ही भरा गया है, बाकी खाली हैं।
    यही नहीं, सड़क पर चलने वाले बहुत से वाहन ऐसे हैं जिनके चालकों के पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं होता। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2018 में जितने एक्सीडेंट हुए उनमें शामिल 20% वाहनों के चालकों के पास  लाइसेंस नहीं पाया गया। वैसे भी लाइसेंस कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिससे पता चल सके कि ड्राइवर योग्य है। वस्तुतः वाहन मालिक ही ऐसे ड्राइवरों को काम दिया करते जिनके पास वैध लाइसेंस नहीं होता अथवा जो बहुत योग्य नहीं होते। यही नहीं , अक्सर यातायात नियंत्रण और संचालन के लिए तैनात पुलिसकर्मियों के पास ऐसे औजार नहीं होते या बहुत कम होते हैं जिससे पता लगाया जा सके कि ड्राइवरों ने शराब पी रखी है।  यही नहीं घटनास्थल पर यातायात पुलिस के पहुंचने में देरी के कारण दोषी बच जाते हैं। यदि यातायात नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए तो बहुत बड़ी संख्या में लोगों की जानें बच सकती हैं और भारत के सकल घरेलू उत्पाद में उनकी भूमिका भी शामिल हो सकती है।