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Sunday, February 9, 2020

यौन अपराधों में मौत की सजा बढ़ी पर मामले लंबित

यौन अपराधों में मौत की सजा बढ़ी पर मामले लंबित 

इन दिनों फेसबुक में या अन्य सोशल मीडिया में कई क्लिपिंग वायरल हो रही है जिसमें निर्भया कांड के दोषियों को किस तरह सजा दी जाए इसके बारे में तरह-तरह के मसाले परोसे जा रहे हैं। लेकिन सच तो यह है कि निर्भया कांड के अपराधियों को फांसी देने की सजा कानून के दांव पेच में उलझ के रह गई है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी एक बार  याचिका खारिज कर दी है। कब यह सजा व्याहारिक  होगी यह कहना बड़ा मुश्किल है। लेकिन, अगर आंकड़े देखें तो 2004 से लेकर अब तक भारत में केवल चार लोगों को फांसी दी गई है। आखरी बार 2015 में फांसी हुई थी। इन 4 लोगों में 3 आतंकवाद के दोषी थे और एक नाबालिग से बलात्कार का दोषी था। विशेषज्ञों का मानना है कि निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर दिया लेकिन इससे अपराध कम नहीं होंगे इससे एक ऐसी स्थिति बनेगी जो सुधारों को वस्तुत: लागू करने से सरकार का ध्यान हट जाएंगे जिससे बलात्कार के मामलों में अभियोग चलाने में सुधार आ सकता है ।
       नेशनल क्राईम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के जेल के आंकड़ों के अनुसार 2018 में 126 दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई। जबकि 2017 में 121 दोषियों को सजा सुनाई गई थी। यानी  एक वर्ष में 53% ज्यादा भारत में मौत की सजा रेयरेस्ट ऑफ द रेयर यानी दुर्लभतम मामलों में सुनाई जाती है। अदालतों ने इस विकल्प का उपयोग विभिन्न मामलों में किया है, जैसे हत्या ,आतंकवाद, अपहरण के साथ हत्या, दंगे के साथ हत्या ,नशीले पदार्थ से जुड़े अपराध और बलात्कार के साथ हत्या से संबंधित मामले शामिल हैं। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की वार्षिक रिपोर्ट 'डेथ पेनेल्टी इन इंडिया" की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में मौत की सजा पाने वाले अपराधियों में से 40% से अधिक और 2019 में इनमें से आधे 52.9% एवं अपराधों और हत्या के दोषी थे। जनता की चिंताओं को दूर करने के लिए अदालत ने यही एक आसान रास्ता चुना है। अगर अपराध शास्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो हिंसा के मामले कम हों ऐसी  व्यवस्था साकार नहीं कर पा रही है ना ऐसा सामाजिक सुधार हो पा रहा है। कोलकाता हाई कोर्ट वकील एवं समाजसेवी का मल्लिका राय चौधरी के मुताबिक "2019 में   सरकार ने पॉक्सो एक्ट 2012 में संशोधन किया था और इसमें  व्यवस्था की गई थी 12 साल से कम उम्र के बच्चों के बलात्कार के मामले में सजा-ए-मौत का प्रावधान जोड़ा जा सके।" 2 महीने पहले हैदराबाद में एक पशु चिकित्सक के बलात्कार के मामले में आरोपी चार व्यक्तियों को पुलिस ने एनकाउंटर में मार दिया इसे न्यायिक कार्रवाई के बगैर हत्या की संज्ञा दी गई थी। बाद में आंध्र प्रदेश विधानसभा ने एक विधेयक पारित कर बलात्कार के मामलों में मौत की सजा का प्रावधान किया था। मौत की सजा पर विधि आयोग की 2015 रिपोर्ट के मुताबिक यह साबित नहीं किया जा सकता कि उम्र कैद की तुलना में मौत की सजा एक कड़ा तरीका है।
      निर्भया कांड के बाद कई कानूनी सुधार और बदलाव हुए इनमें क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट 2013 भी शामिल था। पीछा करना, अंग प्रदर्शन ,एसिड अटैक और यौन उत्पीड़न इसके दायरे में लाए गए। इन सुधारों से बलात्कार के अपराधियों को दर्ज करने के मामलों में सुधार आया। परंतु अपराधियों की गिरफ्तारी और उनका दोष साबित करने की दर में बहुत ज्यादा सुधार नहीं आया। 2019 के एक अध्ययन के अनुसार अगस्त 2019 में बलात्कार के मामले में दोषी करार दिए गए लोगों की संख्या  2007 से कम हो रही है साल 2006 में यह 27% थी 2016 में या 18.9 प्रतिशत हो गई।
        31 दिसंबर 2019 तक देश में मौत की सजा पाए 378 कैदी थे। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के रिपोर्ट के मुताबिक निचली अदालतों में 2019 में 102 मामलों मैं मौत की सजा सुनाई थी जबकि पिछले साल की संख्या 162 थी। 2019 में सुनाई गई मौत की सजा में से आधे से ज्यादा यानी 54 अपराधियों की संख्या ऐसी थी जिन पर यौन अपराधों से जुड़ी हत्याओं की सुनाई गई थी। ऐसे 40 मामलों में पुलिस की उम्र 12 साल से कम थी। यहां एक दिलचस्प तथ्य सामने आता है कि अपमान और कानून लागू करने वाले अधिकारियों की लापरवाही  के कारण बलात्कार के पीड़ित लोग रिपोर्ट बहुत कम दर्ज कराते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के  आंकड़ों के मुताबिक अपराध करने वाले पीड़ित की जानकार हुआ करते हैं और 50% तो पीड़ित के दोस्त परिवार या पड़ोसी हुआ करते हैं इसलिए मामले कम दर्ज होते हैं।


Friday, February 7, 2020

सत्ता के लोभ में बंट गया देश

सत्ता के लोभ में बंट गया देश 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा करते हुए कहा कि देश  के विभाजन के लिए सत्ता का लोभ कारक तत्व है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू का नाम लिए बिना कहा कि किसी को प्रधानमंत्री बनना था सिर्फ इसलिए हिंदुस्तान का बंटवारा कर दिया गया और जमीन पर लकीर खींच कर एक पाकिस्तान और एक हिंदुस्तान बना दिया गया। पाकिस्तान में लाखों हिंदुओं और सिखों पर जुल्म और जबरदस्ती हुई इस जुल्म और जबरदस्ती की कल्पना आज की पीढ़ी नहीं कर सकती है। वह नागरिकता संशोधन कानून के संदर्भ में बोल रहे थे।
       जिन्होंने भारत के इतिहास को गंभीरता से पढ़ा होगा और समझा होगा वे इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि बंटवारे के लिए जिम्मेदार कौन था? 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के पूर्व देश के राजनीतिक क्षेत्र में कांग्रेस का दबदबा था और मुस्लिम लीग एक ताकतवर प्रतियोगी के रूप में उभर रही थी। भारत छोड़ो आंदोलन के बाद से ही स्थितियां बदलने लगीं। जिन्ना के पक्ष में और मुस्लिम लीग के पक्ष में सत्ता का संतुलन झुकने लगा।  गांधी को अपनी ज़िद से हटना पड़ा। के एम मुंशी ने अपनी पुस्तक "इंडियन कांस्टीट्यूशनल डेवलपमेंट" में लिखा है कि परिवर्तन यानी मुस्लिम लीग के पक्ष में सत्ता के संतुलन का कारण चाहे जो हो गांधी का पक्ष कमजोर होना बंटवारे का मुख्य कारण है। एक तरफ तो भारतीय राजनीति में गांधी की कोशिशों के बावजूद उच्च वर्गीय समुदाय का वर्चस्व था। उसमें निम्न वर्ग की यूं ही कोई खास कदर नहीं थी। वह केवल मरने मारने या फिर धरने प्रदर्शन के लिए उपयोग में लाए जाते थे। भारतीय समाज परंपराओं और धर्म से जुड़ा हुआ है ,इसलिए आज भी राजनीति की किसी बात को संप्रदायिकता या धर्म का एंगल दे दिया जाता है और बात बढ़ने लगती है। अभी सीएए तथा एनआरसी के बारे में ही देखिए। बात को कुछ इस तरह मोड़ दी गई है कि इससे देश के अल्पसंख्यक समुदाय को हानि होगी और लोगों ने इस पर विश्वास  कर लिया तथा सरकार के विरोध में प्रदर्शन , उपद्रव इत्यादि होने लगे। कभी किसी ने सोचा नहीं या उन्हें सोचने का मौका नहीं दिया गया यह जो बात फैलाई जा रही है उसका उद्देश्य फिर दूसरा भी हो सकता है और वह दूसरा उद्देश्य क्या है? इसको जानना पहले जरूरी है। प्रधानमंत्री के लाभ समझाने के बावजूद ग्रास रूट अस्तर के अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं उन्हें इस सच्चाई के बारे में बहुत कम जानकारी है या कहें सच उन तक पहुंचने ही नहीं दिया जाता है। उन तक पहुंचने के पहले इसके कितने पहलू बना दिए जाते हैं कि गंभीर कन्फ्यूजन हो जाता है।
   ठीक बंटवारे के पहले समाज कि कुछ ऐसी ही स्थिति थी। सत्ता के लोभ में तत्कालीन कांग्रेसी नेता कुछ भी करने को तैयार थे। जिन बच्चों को काट दिया गया ,नौजवानों को फांसी पर चढ़ा दिया गया उन्हें शहादत का लबादा पहनाकर महिमामंडित किया गया। आज सरकार के खिलाफ कुछ ऐसे ही वातावरण की रचना करने की कोशिश की जा रही है। कोई  यह नहीं सोचता कि इंसानी वजूद और पीड़ा प्रमुख है । आज शाहीन बाग और उस तरह के अन्य शहरों में प्रदर्शन को अगर राजनीति की इंटरप्ले के नजरिए से मूल्यांकन करें तो बात समझ में आएगी। इसका सच क्या है? यह कांग्रेस की आदतों में शुमार है। जब जब  उसकी सत्ता को खतरा महसूस हुआ है तब तब उसने कुछ इसी तरह की सामाजिक साजिशों की रचना कर सत्ता को हथियाने की कोशिश की है।  लोग इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं या समझते भी भी जानबूझकर अनजान बने हुए हैं कि किसी भी क्रिया के बराबर विपरीत प्रतिक्रिया होती है। नेहरू के भीतर सत्ता का लोभ पनपा और उसी के प्रतिक्रिया स्वरूप जिन्ना भी अपनी जगह पर अड़ गए। नतीजा हुआ कि भारत बंट गया और बंटवारे के नाम पर बनी नियंत्रण रेखा। उसकी लकीर से अभी भी हिंदुओं और सिखों  का खून रिस रहा है।
    मोहब्बत करने वालों में  झगड़ा डाल देती है
   सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है


Thursday, February 6, 2020

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ राष्ट्रीय एकता का प्रतीक

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ राष्ट्रीय एकता का प्रतीक 
अयोध्या में श्री राम मंदिर को लेकर लंबी कानूनी और सामाजिक लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर के फैसले के 88 दिनों के बाद ट्रस्ट की घोषणा कर दी गई। इसके लिए 9 फरवरी तक का समय दिया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को संसद को यह बताया श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन कर उसे अयोध्या कानून के तहत अधिग्रहित 67.70 एकड़ भूमि सौंप दी गई है। राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण में यह ट्रस्ट अपनी भूमिका निभाएगा और निर्माण के मामले में पूरी तरह स्वतंत्र रहेगा। जिसमें 15 ट्रस्टी होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी दलों से समर्थन की अपील की है और कहा है कि भारत के लोग एक परिवार के हैं। मंदिर में 1 लाख 75 हजार घनफुट पत्थर लगेगा। लगभग एक लाख घनफुट पत्थरों को तराशा जा चुका है। ट्रस्ट का निर्माण का निर्णय एक ऐसे समय में आया है जब दिल्ली के चुनाव होने वाले हैं और लोग इसके राजनीतिक उद्देश्य की भी चर्चा कर रहे हैं। वस्तुतः इस मामले पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का रुख भी नरम है। उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट को 67.70 एकड़ भूमि हस्तांतरित किए जाने के सरकार के फैसले को शानदार बताया है और कहा है की अच्छे काम के लिए कोई वक्त नहीं होता।
       अब यहां सबसे स्वाभाविक प्रश्न है कि राम जन्म भूमि ट्रस्ट के पास मंदिर निर्माण के लिए उपयुक्त धन है या नहीं और अगर धन है तो कितना है। उसके पास कितना पैसा जमा है। यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर सब कोई जानना चाहेगा। राम मंदिर आंदोलन का नेतृत्व करने वाली संस्था विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में भव्य मंदिर के निर्माण के उद्देश्य से 1985 में श्री राम जन्मभूमि न्यास की स्थापना की थी और यह न्यास मंदिर को मिलने वाले चंदे का प्रबंधन करता रहा है। जैसी कि खबर है ट्रस्ट के पास लगभग 13 करोड़ रुपए इस उद्देश्य के लिए जमा हैं। जिनमें लगभग साढे आठ करोड़ रुपए कॉर्पस फंड में और साढे चार करोड़ रुपए नन कॉर्पस फंड में जमा हैं। हां एक तथ्य काबिले गौर है कि ट्रस्ट को 2018 - 19 में करीब 45 लाख रुपए का चंदा मिला था और उसके पिछले वर्ष इस संस्था को डेढ़ करोड़ रुपए मिले थे। 1990 में विश्व हिंदू परिषद ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया था कि उसे 1989 के आंदोलन के दौरान राम मंदिर के लिए 8 करोड़ 29 लाख रुपए का चंदा मिला था जिसमें उसने एक करोड़ 63 लाख रुपया खर्च कर दिए थे। अभी हाल में जारी एक प्रेस रिलीज में विश्व हिंदू परिषद ने कहा है कि वह राम मंदिर निर्माण के लिए कोई चंदा नहीं एकत्र कर रही है ,नाही इस तरह की उसने कोई अपील की है। दूसरी ओर अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि ट्रस्ट की कार्यशाला में अभी भी मंदिर निर्माण के लिए चंदा लिया जा रहा है। विश्व हिंदू परिषद के महासचिव मिलिंद परांडे के मुताबिक राम जन्मभूमि ट्रस्ट ने 1989- 90 के बाद राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए कोई धन संग्रह की अपील नहीं की है और ना ही ऐसा कोई धन संग्रह किया है। उन्होंने कहा कि धन का खर्च न्यास की देखरेख में उद्देश्य के अनुसार ही हुआ है। जो भी धन समाज ने स्वयं लाकर सौंपा है उसे ही स्वीकार किया गया है।
      हममें से बहुतों को याद होगा कि 80 के दशक में विहिप नेता अशोक सिंघल की अगुवाई में राम मंदिर आंदोलन चरम पर था और एक नारा एक गीत के रूप में प्रचलित था कि " सवा रुपैया दे दे भैया, रामशिला के नाम का , राम के घर में लग जाएगा पत्थर तेरे नाम का।" विहिप ने सब को बताया था कि इस पैसे का उपयोग तब होगा जब मंदिर बनेगा।
       विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मंदिर निर्माण की मूल डिजाइन को ही माना जाएगा क्योंकि आंदोलन ने इसी डिजाइन को अनुमति दी है। उन्होंने कहा कि हर एक हिंदू को धन से और शरीर से इस मंदिर के निर्माण में सहयोग देने की आजादी है। आलोक कुमार ने कहा की हर एक व्यक्ति को कम से कम 11 रुपए दान देने को कहा जाएगा ताकि मंदिर निर्माण के लिए धन एकत्र हो। हर एक हिंदू को मंदिर निर्माण में हाथ लगाने का मौका दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि, राम मंदिर आंदोलन के दौरान जिन गांव ने रामशिला या ईंट दिया था 25 मार्च चैत्र नवरात्रि से 8 अप्रैल हनुमान जयंती के बीच राम उत्सव मनाने के लिए कहा जाएगा और वह राम मंदिर निर्माण के लिए शोभा यात्राएं निकालेंगे। आलोक कुमार ने कहा  अयोध्या में राम मंदिर बनने में लगभग 4 वर्ष लगेंगे और प्रयागराज की यात्रा करने वालों की राह में यह एक प्रमुख तीर्थ होगा।
उधर पूर्व मंत्री उमा भारती ने बाबरी विध्वंस पर एक विवादित बयान देते हुए कहा है कि अगर वह ढांचा नहीं गिरा  होता तो सच्चाई लोगों के सामने नहीं आती । अगर संरचना नहीं हटाई गई होती तो पुरातत्व विभाग की टीम महत्वपूर्ण सबूतों का पता नहीं लगा पाती। जब उनसे पूछा गया कि राम मंदिर निर्माण के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले निर्णय का श्रेय किसे दिया जाना चाहिए तो उन्होंने कहा कि यह श्रेय माननीय सर्वोच्च न्यायालय को जाता है लेकिन जिन साक्ष्यों ने वास्तव में निर्णय का आधार बनाया वह 6 दिसंबर 1993 को अपनी जान गंवाने वालों के परिणाम थे। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण में 15 साल पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के बाद अयोध्या में विवादित भूमि की खुदाई की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने 9 नवंबर 2019 को अपने फैसले में कहा था अयोध्या में विवादित स्थल के नीचे की संरचना इस्लामिक नहीं है। लेकिन पुरातात्विक सर्वेक्षण स्थापित नहीं कर पाए कि क्या मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को गिराया गया था।
    बुधवार को राम मंदिर ट्रस्ट की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही कि देश का हर नागरिक भारतीय है। प्रधानमंत्री के इस कथन से देश में एकता को बल मिलेगा और पारस्परिक सौहार्द को बढ़ावा मिलेगा। अगर इस दिशा में सभी सोचें तो भारत सच में महान बन जाएगा। प्रधानमंत्री की बात पर ध्यान देना जरूरी है। इस पर किसी तरह की राजनीति गलत होगी। क्योंकि यह देश की एकता और एकजुटता का प्रश्न है।  इस समय राष्ट्रीय एकजुटता ही सबसे प्रमुख है। ऐसे समय में राम मंदिर निर्माण के लिए कदम बढ़ाया जाना एक तरह से राष्ट्र निर्माण की ओर कदम बढ़ाने की तरह है। क्योंकि राम समस्त देशवासियों को एक साथ लेकर चलने और उनमें सौहार्द भरने के समर्थक थे। उन्होंने केवट को भी यह हक दिया की वह नाव देने से इंकार कर दे ,साथ ही शबरी के जूठे बेर भी खाए। राम भारतीय एकता के प्रतीक हैं और इस समय सबसे ज्यादा संकट भारतीय एकता पर है और प्रधानमंत्री की घोषणा एकता के भाव को  बढ़ावा देगी।
  वह राम न हिंदू हैं न मुसलमान हैं
    वह तो समूचा हिंदुस्तान हैं

 

Wednesday, February 5, 2020

पड़ोसी को पांच 7 दिनों में धूल चटाने का साहस

पड़ोसी को पांच 7 दिनों में धूल चटाने का साहस 

अभी पिछले चार-पांच दिनों में सेना को लेकर दो बड़ी महत्वपूर्ण बातें सामने आयीं। पहली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि हमारी फौज पाकिस्तान को 1 हफ्ते से कम समय में हरा सकती है और दूसरी बात लेखा महा परीक्षक यानी सीएजी रिपोर्ट में कही गई है कि सियाचिन में तैनात भारतीय सैनिकों के पास सर्दियों के लिए विशेष कपड़ों और साजो सामान के भंडार की भारी कमी है। यहां तक कि उन्हें जरूरत के मुताबिक खाना भी नहीं मिल रहा है। रक्षा मंत्रालय ने हालांकि कहा है कि कमियों को ठीक कर दिया जायेगा। एक सेना अधिकारी ने बयान दिया है कि सीएजी की जिस रिपोर्ट को चर्चा का विषय बनाया जा रहा है वह 2015 -16 से  2018 -19 के दौरान की है। अब चीजों को सुधार दिया गया है। सियाचिन में तैनात एक सैनिक की पोशाक पर करीब ₹100000 तक का खर्च आता है।
        हमारे देश में जहां 'ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी' से लेकर देश भक्ति के एक मजबूत आइकन के रूप में सेना को प्रस्तुत करने के प्रयास के बीच सीएजी की रिपोर्ट काफी हताश करने वाली है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री का यह कथन के एक सप्ताह से कम समय में हमारी सेना पाकिस्तान को पराजित कर सकती है। आश्चर्य की बात है कि दुनिया की चौथी  सबसे बड़ी फौजी ताकत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी फौजी ताकत को महज सप्ताह भर से कम समय में पराजित कर सकती है। जबकि ,दोनों देश परमाणु हथियारों से लैस हैं। कुछ लोग इसे प्रधानमंत्री का बड़बोलापन कह रहे हैं। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी मुगालते में रहने वाले व्यक्ति नहीं है और उनमें अकूत स्मार्टनेस है। अगर ऐसा नहीं होता तो वे इस पद तक पहुंचते ही नहीं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न है की आप कोई जंग सात दिनों में या दस दिनों में जीत सकते हैं या नहीं ? यहां जवाब निर्भर करता है कि जीत की परिभाषा क्या होगी? जीत किसे समझा जाए?
   सच्चे रणनीतिक मसले अत्यंत जटिल होते हैं। इसमें सामने वाले का मनोविज्ञान समझना होता है कृष्ण का दूत बनकर कर दुर्योधन की सभा में जाना ऐसे रणनीतिक मसलों का एक बड़ा ही सटीक उदाहरण है । सबसे पहले यह समझना जरूरी है रणनीतिक मसले खिलवाड़ वाले मुद्दे नहीं होते। रणनीतिक मसलों को समझने के लिए रणनीतिक और राजनीतिक इतिहास में ढूंढना पड़ता है और जीत हार की कुछ अशाश्वत परिभाषाओं को खंगालना पड़ता है। इसलिए जो चर्चा नरेंद्र मोदी से शुरू होती है और अपने पीछे 2 भुट्टो, इंदिरा गांधी, वीपी सिंह, अटल बिहारी वाजपई तक जाकर फिर मोदी पर लौटती है। यहां सब से  बड़ी बात है कि वह जमाना बीत गया जो दूसरे विश्वयुद्ध का था। अब किसी देश को या देशों के समूह को दूसरे विश्वयुद्ध वाले अंदाज में हराना नामुमकिन है। उस विश्वयुद्ध के बाद इतिहास में कोई ऐसी मिसाल नहीं है। महाबलशाली अमेरिका कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान और इराक में उलझा रहा। उसने केवल निजाम बदलने में सफलता पाई। अफगानिस्तान में सोवियत संघ की विफलता ने उसकी विचारधारा और सैन्य  गुटबंदी को ही खत्म कर दिया। बेहद अमीर सऊदी अरब करीब 5 वर्षों में गरीब यमन को नहीं हरा सका। इराक ने  1980 में ईरान पर हमला किया और 8 वर्षों की जंग के बाद दोनों देशों के हाथ केवल लाशें ,अपंगता और युद्ध बंदी ही लगे। कोई वास्तविक लाभ नहीं मिला। किसी छोटे देश में बहुराष्ट्रीय दबाव के बल पर निजाम बदलने को उस देश पर विजय नहीं कह सकते। हमारा देश पिछले 73 वर्षों में पाकिस्तान और चीन से चार बड़ी लड़ाइयां लड़ चुका है। जिनमें से दो निर्णायक रहीं। 1971 की लड़ाई में विजय याद रहती है सबको लेकिन 1962 में चीन से लड़ाई के दौरान पराजय कोई याद नहीं रखता। हम उसे भूल जाते हैं। चीन से पराजय भी 2 पखवाड़े के जोरदार ऑपरेशन के बाद हुई थी।
      मोदी जी की बात पर जो लोग हंसते हैं उन्हें हमेशा याद रखना चाहिए कि दोनों युद्ध दो हफ्तों में खत्म किया गया। लेकिन आज आधुनिक राष्ट्रों के बीच के युद्ध में हार जीत की परिभाषा बदल गई है। 1971 में पाकिस्तान का विभाजन कर दिया गया और ढाका पर कब्जा हो गया तो इंदिरा जी ने पश्चिमी क्षेत्र में बराबरी पर चल रही लड़ाई में पाकिस्तान से एकतरफा युद्ध विराम की पेशकश की। जैसे ही पाकिस्तान ने इसे कबूल किया इंदिरा जी ने अपनी जीत की घोषणा कर दी। इसी तरह 1962 में चीन ने भारत को एकतरफा युद्ध विराम की पेशकश की और वह भी घोषित कर दिया गया कि वह लद्दाख के कुछ हिस्से छोड़कर युद्ध से पहले वाली जगह पर लौट रहा है। जैसे ही भारत ने इस पेशकश को कबूल किया और संकल्प लिया कि इसका बदला बाद में लेंगे चीन ने अपनी विजय की घोषणा कर दी।
         चीन को समतल क्षेत्र में ऐसी लड़ाई में उलझे रहने के खतरे मालूम थे। जिसमें जीतना मुश्किल था । ल इंदिरा गांधी को भी सोवियत संघ द्वारा समझाए बुझाने पर समझ में आया कि पश्चिमी क्षेत्र में जो लड़ाई बराबर की है। इसलिए किसी युद्ध में विजय तब तक नहीं होती जब तक दूसरे देश को बुरी तरह परास्त नहीं कर दिया जाता है या घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया जाता है । जैसा कि नाजी जर्मनी और साम्राज्यवादी जापान के मामले में हुआ था। मध्य युग में तय किए गए मानदंड को पूरा कर लिया जाता है तो जीत मानी जाती है जब लड़ाई करने वाला देश यह फैसला कर लेता है उसने अपना मकसद हासिल कर लिया। आज  जीत के लिए सबसे पहले अपना लक्ष्य साफ तौर पर तय करना पड़ता है और यह दूरदर्शिता दिखानी पड़ती है कि अपनी जीत की घोषणा कब कर देनी होगी।
          कारगिल की लड़ाई सबको याद होगी। चर्चा यही से शुरू हुई थी। उस लड़ाई में भारत विजयी हुआ था । उसका कारण था की अटल बिहारी बाजपेई ने जीत की परिभाषा काफी छोटी तय की थी और पाकिस्तान को एलओसी के पीछे धकेल दिए जाने को ही पाकिस्तान पर जीत मान लिया। पाक ने मुख्य इलाके पर कब्जा करके भारत को कश्मीर पर समझौते के लिए मजबूर करने के मकसद से  लड़ाई शुरू की थी। बाजपेई जी ने इस मकसद को नाकाम करना ही अपना लक्ष्य तय किया था और जैसे ही अलग हासिल हुआ उन्होंने जीत की घोषणा कर दी।
        लेकिन इसी वर्णपट पर बालाकोट के हमले को देखें। प्रश्न उलझन भरा है। भारत ने एक रणनीतिक और राजनैतिक संदेश देने के लिए पाकिस्तान में बहुत भीतर तक घुस कर बमबारी की थी। अपना मकसद पूरा कर लेने के बाद उसे पाकिस्तानी जवाब के लिए तैयार रहने के सिवा कुछ नहीं करना था । उधर, पाकिस्तान को भारत का एक पायलट और एक विमान का मलबा हाथ लगा। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी विजय की घोषणा कर दी। इसका मतलब है कि लड़ाई चाहे जो भी हो अगर आप जीत की परिभाषा तय करना जानते हैं और आप में दूरदर्शिता है तो आप युद्ध जीत सकते हैं यहां तक कि बिना लड़े भी जीत सकते हैं और बहुत संभव है कि आने ही वाले वर्षों में ऐसा हो जहां तक सेना को आइकन के रूप में प्रस्तुत करने का सवाल है तो मोदी जी ने बड़ी चालाकी से या कहें बहुत सामर्थ्य पूर्ण ढंग से फौज को आम जनता के लिए एक बिंब बना दिया। उसे होने वाली  तकलीफ हो और उसकी तकलीफ हो इतना गौरवान्वित कर दिया है कि खुद फौजी भी शिकायत ना करें ।अगर इस नजरिए से मोदी जी वाली बात देखें तो  मामला दूसरा ही दिखेगा। मोदी जी की बात देश का साहस बढ़ती   है कि वे एक साथ हैं और  पड़ोसी से डर नहीं है।


Tuesday, February 4, 2020

शाहीन बाग प्रदर्शन: संयोग नहीं प्रयोग है

शाहीन बाग प्रदर्शन: संयोग नहीं प्रयोग है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड में चुनावी रैली में कहा कि शाहीन बाग में बीते कई दिनों से नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन संजोग नहीं प्रयोग हैं । उन्होंने कहा कि इसके पीछे राजनीति का एक ऐसा डिजाइन है जो राष्ट्र के सौहार्द को खंडित करेगा। यह सिर्फ इसी कानून के विरोध का प्रदर्शन का मामला होता तो सरकार के आश्वासन के बाद समाप्त हो चुका होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। संविधान और तिरंगे की ओट में असली साजिश से ध्यान हटाया जा रहा है। प्रधानमंत्री का यह कहना बिल्कुल सही है। कहते हैं, दिल्ली में कम से कम 9 शहर हैं और यहां की अधिकांश आबादी दूसरे शहरों से या दूसरी जगहों से आकर बसी है। अखबारों को सही मानें तो महिलाएं शाहीन बाग में दिन-रात प्रदर्शन कर रहीं  है और प्रतिरोध की कविताएं गा रही हैं ,क्रांति के गीत सुन रही साथ ही  हड्डियों तक पहुंचने वाली सर्द रातों में बच्चों को लोरियां भी सुना रहीं हैं। वह बच्चों को ठंड में भी लेकर आई हैं। प्रदर्शन करने वाली महिलाएं गरीब हैं और बच्चों के लिए दाईयां नहीं रख सकती हैं। उन महिलाओं के बारे में टीवी रपटों को देखा जाए तो यह कहते सुना जा सकता है कि वे संविधान बचाने के लिए प्रदर्शन कर रही हैं।
    जिन लोगों ने जमाना देखा है उन्हें यह मालूम होगा कि प्रदर्शन क्या होते हैं। 80 के दशक में बिहार का प्रदर्शन सामाजिक और राज्य का विरोध के लिए चक्का जाम कर दिया जाना और सड़क परिवहन को ठप किया कर दिया जाना उस समय की मामूली बात थी। आडवाणी जी को गिरफ्तार किए  जाने के बाद लगे कर्फ्यू को तो सब ने महसूस किया होगा। हाईस्कूल की परीक्षाओं में हममें से बहुतों ने सरकार की नीतियों  के निर्देशात्मक सिद्धांत और मूलभूत सिद्धांत पर लेख लिखे होंगे। 2011 में अमेरिका में ओकूपाई मूवमेंट शुरू हुआ था। यह मूवमेंट आर्थिक असमानता का था। टाइम पत्रिका में इस मूवमेंट के बारे में बड़ी अच्छी तस्वीर छपी थी। जिसमें एक दरवाजे पर लिखा था "आप घर छोड़ चुके हैं" और दूसरे पर लिखा था "वेलकम टू लाइफ।" एक तरह  से यह मूवमेंट लोगों को राजनीति में सीधे सक्रिय होने का एहसास कराने वाला था जो लोग इसमें शामिल हो रहे थे वह नए उत्साह से भरे हुए थे। 2012 में फिलाडेल्फिया में "ओकूपाई द हुड" शुरू हुआ था।
      शाहीन बाग के इसी प्रदर्शन के बीच गणतंत्र दिवस भी आया। फूल बरसाते   हेलीकॉप्टर और राजपथ पर निकली झांकियों के बीच फूल से महरूम शहीन बाग की झांकी देखकर  वर्षों पहले लिखी  हरिशंकर परसाई की कविता "सत्यमेव जयते" याद आती है, जिसमें कहा गया है कि "यह हमारा मोटो है लेकिन झांकियां झूठ बोलती हैं।" इन सबके बावजूद मोदी जी का यह कहना कि "यह प्रदर्शन  संजोग नहीं एक प्रयोग है," बिल्कुल सही लगता है। क्योंकि इस प्रदर्शन का असर हमारे समाज पर बहुत दिनों तक रहेगा। इस तरह के प्रदर्शन अक्सर समाज के सोच को बदलते हैं और वर्चस्व स्थापना की ओर कदम बढ़ाने के लिए उकसाते हैं। जब -जब भी इस तरह के सार्वजनिक प्रदर्शन हुए हैं तब -तब व्यवस्था प्रभावित हुई है। भारत में इस तरह का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन सिपाही विद्रोह के बाद लोगों का अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर आना था। उसके बाद नमक आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन , जयप्रकाश के संपूर्ण क्रांति आंदोलन इत्यादि। सब में व्यवस्था को प्रभावित होते देखा गया है और सारे इस तरह की आंदोलन अपने आप में एक प्रयोग के तौर पर थे। वह प्रयोग व्यवस्था को प्रभावित करने वाला था। शाहीन बाग का यह प्रदर्शन एक वैसा ही प्रयोग है। लेकिन इस प्रयोग में समाज को और उसके सौहार्द को दो हिस्से में बांटने  की साजिश दिखाई पड़ती है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समय रहते हैं देश की जनता को चेतावनी दी है।
   इस आग को राख से बुझाइए
इस दौरे सियासत का अंधेरा मिटाइए।


Monday, February 3, 2020

आने वाले दिन और भी मुश्किलें पैदा कर सकते हैं

आने वाले दिन और भी मुश्किलें  पैदा कर सकते हैं

एक पखवाड़े पहले ऑक्सफेम की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें दुनिया भर में अमीर और गरीब आबादी के बीच का फर्क दिखाया गया था। इस रिपोर्ट ने दुनियाभर के नीति निर्माताओं को सकते में डाल दिया। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में अमीरों की संख्या बढ़ी है और गरीबों की घटी है। एक आम आदमी यह सुनकर हक्का-बक्का रह सकता है कि दुनिया में केवल 62 ऐसे लोग हैं जिनके पास इतनी ज्यादा दौलत है जितनी कुल मिलाकर इस धरती पर मौजूद आबादी के आधे सबसे गरीब लोगों के पास  नहीं है। सरल शब्दों में कहें तो 62  लोग जो एक बड़ी बस में समा सकते हैं उनके पास इतनी दौलत है जितनी दुनिया के साढे 3 अरब लोगों के पास कुल मिलाकर नहीं है। आप कह सकते हैं कि यह कौन सी नई बात है ? तो क्या यह नहीं पूछेंगे कि विकास और तरक्की के दावे सिर्फ कुछ लोगों को अमीर बनाने के लिए हैं। गरीब अगर गरीब हुआ तो यह चिंता की बात नहीं है क्या अमीर और गरीब के बीच का अंतर बढ़ना समाज या आम लोगों के लिए चिंता की कोई बात नहीं है? ऑक्सफैम  की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया का हर तीसरा आदमी भारी गरीबी में जी रहा है और ऑक्सफैम की  कोशिश लोगों की सामूहिक शक्ति को जुटाकर गरीबी भुखमरी के खिलाफ मुहिम करना है। इस सिलसिले में स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर  पर नीतियों को प्रभावित करना है ताकि गरीबी कम हो।  2015 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार बीटन को मिला था उनके शोध के अनुसार गरीबी और अमीरी की असमानता की ओर दुनिया को देखना चाहिए। जब ज्ञान और टेक्नोलॉजी का विस्तार हो रहा है तो आखिर गरीबी क्यों बढ़ रही है? इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए।
  ये आंकड़े एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करते हैं, जो   ही यह भी बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सामने आए और इसका समाधान करे, ताकि दूरगामी आर्थिक विकास हो सके। भारत आर्थिक असमानता के लिए कई तरह से बदनाम है।  सुनकर हैरत होगी कि भारत के शीर्ष तकनीकी सीईओ को जितना 1 वर्ष में वेतन मिलता है उतनी दौलत कमाने में  घरेलू कामकाज करने वाली एक महिला को 22 हजार 277 वर्ष लगेंगे ।
        इस पर लगातार बहस होती है दुनिया के हर मंच पर बहस होती है कि विकास हो। लेकिन विकास का अर्थ क्या है? यहां सबसे जरूरी है आज के नौजवान के लिए इस असमानता का भविष्य में क्या अर्थ होगा यह समझना। अगर ऑक्सफैम रिपोर्ट कोई संकेतक है तो इसका मतलब है कि असमान वर्तमान और ज्यादा  असमान भविष्य का सृजन करेगा। इसमें भारतीय समाज की क ई विफलतायें भी शामिल हैं। वैसे  असमानता का यह भार महिलाओं को ज्यादा बर्दाश्त करना पड़ता है। उन्हें लगातार देखरेख और खर्च के बोझ से निपटना पड़ता है। अगर आंकड़ों को देखें तो महिलाओं को रोजाना 352 मिनट इस देखरेख के कार्य में लगाने पड़ते हैं। जबकि, पुरुषों को केवल 51.8 मिनट लगाने होते हैं। यही नहीं इन दिनों समाज कल्याण के काम बहुत कम देखे जा रहे हैं। समाज कल्याण के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है वह किसी निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए हो रहा है। गैर बराबरी के चलते देश में समाज कल्याण पर खर्च बहुत तेजी से घट रहा है और सकल घरेलू उत्पाद का केवल 5% स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च हो रहा है।
         महिलाओं को घरेलू देखरेख के लिए कोई पैसा नहीं मिलता है। यही नहीं अधिकांश महिलाओं को कामकाज करने की अनुमति भी नहीं मिलती है। श्रम शक्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी के बारे में एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 2017 -18 में बड़ी तेजी से इसमें गिरावट आई है और अब केवल 16.5% ही रह गई है । इतना ही नहीं  बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है यह चिंता का विषय है। क्योंकि, बहुत कम महिलाएं श्रम शक्ति में अपनी भूमिका निभा रही हैं। जो पहले  थी भी वह इन दिनों बेकार हो गई हैं एक ऐसे समय में जब महिला और पुरुष की धन के बीच समानता को खत्म करने की कोशिश हो रही है और महिलाओं की आमदनी बढ़ाने का प्रयास चल रहा है वैसे में ऑक्सफैम की यह रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं को कम मजदूरी मिलती है और रोजगार भी कम मिलता है
      रिजर्व बैंक  के आंकड़े बताते हैं की 2019 में लोगों में घर खरीदने की क्षमता तेजी से घटी है इससे पता चलता है की लोग किराया के मकान में रह ले रहे हैं क्योंकि यह माई की बढ़ी हुई दर देने का सामर्थ्य में खत्म होता जा रहा है इस स्थिति का प्रभाव देश के आर्थिक विकास पर पड़ रहा है। विगत 15 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था इस असमानता को इसी प्रकार झेलती रही है। किंतु अब असमानता सीमा पार कर चुकी है । आंकड़ों के मुताबिक देश की 75% महिलाएं जो काम करती हैं उनकी औसत आमदनी ₹20000 है। साथ ही 60% दिहाड़ी पर काम करने वाली महिलाएं केवल ₹5000 कमा पाती हैं। इसमें कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है।  यहां तक कि जो लोग कमाते हैं वह भी इतना नहीं कमा पाते कि राष्ट्रीय व्यय चक्र को संभाल सकें। अभी जो समाजिक  और छात्र विरोध चल रहा है उसके मूल में यही आर्थिक असमानता भी एक कारण है। आर्थिक मंदी के कारण समस्याएं और तनाव बढ़ते जा रहे हैं। लोगों को यह बताना जरूरी है कि यह मामला अर्थव्यवस्था का है। समाजिक खर्चों में वृद्धि कर और देखरेख के काम में प्रवृत्तियों को परिवर्तित कर अच्छे वेतन की  अगर व्यवस्था हो सके तो इस उद्देश्य की ओर यानी संदेश में शांति बढ़ावा देने और तनाव घटाने के उद्देश्य की ओर बढ़ा जा सकता है। इससे केवल वर्तमान प्रभावित नहीं हो रहा है हमारा आने वाला कल भी इससे प्रभावित होगा और देश के सामने अन्य कई समस्याएं उत्पन्न होंगी।


Sunday, February 2, 2020

सब की आकांक्षाओं का बजट

सब की आकांक्षाओं का बजट

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को अपना दूसरा बजट पेश किया। अपने बजट भाषण में उन्होंने कहा "यह देश की आकांक्षाओं को पूरा करने वाला है।" वित्त मंत्री ने कहा कि ,हमारे देश की अर्थव्यवस्था बेहद मजबूत है और जनता को मोदी सरकार पर पूरा भरोसा है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण दूसरी बार बजट पेश करने वाली भारत की पहली वित्त मंत्री हैं। इसके पहले इंदिरा गांधी ने एक बार 1970 का बजट पेश किया था। वित्त मंत्री ने अपने भाषण में कहा , 'इस सरकार को मिला यह प्रचंड जनादेश सिर्फ राजनीतिक स्थिरता के लिए नहीं ,देश के हर नागरिक की उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करने वाला है और यह बजट उन्हीं उम्मीदों और आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में उठाया गया कदम है। 2014 से 2019 के बीच मोदी सरकार ने आर्थिक नीतियों में बहुत बड़ा बदलाव किया। अब अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है ,महंगाई काबू में है और बैंकों में भी सुधार हुआ है।'
     वित्त मंत्री का कथन सही है। क्योंकि जीएसटी की वजह से ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक में फायदा हो रहा है। यानी, इस पर खर्चे कम पड़ रहे हैं और खर्चे कम पड़ने से चीजों की कीमतें  काबू में है।  इससे लोगों के पास पैसे बच रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक आम आदमी अपने परिवार के मासिक खर्च का लगभग 4% हिस्सा बचा पा रहा है। यही नहीं सरकार ने 60 लाख नए टैक्स दाता जोड़े हैं ।  सरकार ने लोगों के पास सीधा फायदा पहुंचाने का प्रयास आरंभ किया है। जिससे बीच की दलाली खत्म होती जा रही है और लोग सीधे सरकार से जुड़ रहे हैं।  "मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिम गवर्नेंस" का जो सरकार का नारा है वह यहां साफ दिखाई पड़ने लगा है। कई कल्याणकारी योजनाएं जैसे, आयुष्मान ,उज्ज्वला, इंश्योरेंस प्रोटेक्शन तथा सस्ते मकानों जैसी योजनाएं लोगों को सीधा लाभ पहुंचा रही हैं। यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच रही है। देश में 27.1 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए। वित्त मंत्री ने कहा कि हमारी सरकार किसानों की मदद कर रही है। बजट में जो प्रावधान हैं उसके अध्ययन से पता चलता है कि इस बार 6. 11 करोड़ किसानों पर फोकस किया गया है। वित्त मंत्री के अनुसार किसानों के बाजार को उदार बनाने की जरूरत है। कृषि उपज लॉजिस्टिक में ज्यादा निवेश की जरूरत है। बजट में इसके लिए 16 एक्शन प्वाइंट्स बनाए गए हैं। 20 लाख किसानों को सोलर पंप लगाने में सरकार मदद करेगी।
        लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इस बजट से बहुत उम्मीदें थीं। सब से बड़ी उम्मीद तो यह थी कि अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने वाले रोड मैप सामने आएंगे और उम्मीदें पूरी होंगी। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता है। वित्त मंत्री के दावों के बावजूद कर संग्रह में धीमापन आया है जिससे विनिवेश की प्रक्रिया को आरंभ  किया जा रहा है। इस कारणवश सरकार की खर्च करने क्षमता बहुत कम हो गई है। अगर सरकार के खर्च करने की क्षमता में थोड़ी वृद्धि आती तो अर्थव्यवस्था में भी तेजी आ सकती थी। लेकिन ऐसा शायद नहीं हो सका है। बजट से उम्मीदें तो बहुत थी लेकिन वह बाधाओं के बोझ से दबा हुआ है। इसमें इरादे और प्रस्ताव भरे हुए हैं। राजकोषीय घाटा है। इस घाटे के बावजूद योजनाओं में खर्च करने के लिए सरकार जो पैसा दे रही है वह बहुत कम है। मध्यावधि में स्थाई आजीविका के जरिए अधिक से अधिक लोगों को आय अर्जित करने में सक्षम बनाकर अर्थव्यवस्था में वृद्धि की जा सकती है जिससे प्रधानमंत्री का सबका साथ सबका विकास वादा पूरा होता है।  यहां तक कि ऊंची विकास दर वाले वर्षों में भी अर्थव्यवस्था में नई नौकरियां नहीं पैदा होती। इकलौता बजट हमारी संरचनात्मक समस्या को हल नहीं कर सकता है। यह संकट इस बजट में भी है।  प्रावधानों से नौकरियां पैदा होंगी लेकिन उनकी संख्या उतनी नहीं होगी जितनी जरूरी है।
     देश में डॉक्टरों की कमी है। इस कमी को पूरा करने के लिए और अस्पताल बनाने के लिए प्रोत्साहित करने की योजना है।  नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस के तहत  रेजिडेंट डॉक्टरों की पर्याप्त क्षमता होगी। इसके अलावा युवाओं में रोजगार की क्षमता बढ़ाने के लिए डेढ़ सौ उच्च शिक्षा वाले संस्थानों में मार्च 2021 से अप्रेंटिसशिप कोर्स की शुरुआत होगी। साथ ही, देश में शहरी स्थानीय निकायों में इंटर्नशिप के अवसर दिए जाएंगे जिससे 1 साल में इंजीनियर तैयार हों। बजट में मोबाइल फोन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामानों के निर्माण को लेकर प्रोत्साहन करने पर भी बल दिया गया है। जिससे फैक्ट्री की नौकरियां पैदा हो सकें। लेकिन इसमें क्या क्या होगा उसके बारे में बाद में बताया जाएगा। सरकार इलेक्ट्रिक सामानों और उससे निवेश के लिए अधिक नीतियों की घोषणा कर सकती है। जो अभी नहीं हो सकी है। इस बजट में जो सबसे बड़ी खुशखबरी है  बैंकों में रखे पैसों को लेकर बीमा की रकम है । पहले धोखाबाजी या घाटे के कारण बैंक बंद होने  जमा करने वालों को केवल  एक लाख रुपए देने का वादा था जो बढ़ाकर  5 लाख कर दिया गया है।

      सारे तर्कों के बावजूद बजट से बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं बनी। बाजार रूठते नजर आए । ऐसा लगा कि बजट एक साधारण और नियमित किस्म की कवायद है और वार्षिक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। जो बड़ी घोषणाएं हैं वह बाजार को नहीं पसंद आई। अमीरों पर चोट करने और इस तरह से गरीबों में काल्पनिक संतुष्टि का भाव भरने वाली यह कौन आए हैं इसके अलावा बजट में कुछ नहीं मिला। ऐसा लगता है कि अब आर्थिक सुधार किस्तों में आएंगे। इसके फैसले सरकार कभी भी ले सकती है। बजट में रक्षा क्षेत्र के आवंटन को बढ़ाया नहीं गया है। इसका मतलब है रक्षा क्षेत्र में कुछ खास होने वाला नहीं है। जबकि रक्षा पेंशन काफी बढ़ चुका है। वित्त आयोग खरीदारी के लिए निरंतर उपलब्ध एक कोष की स्थापना  और संभवतः रक्षा शेष लगाने के विचार के अध्ययन के लिए कमेटी गठित करने को कह रहा है। अब इसकी घोषणा होगी। यह घोषणा किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में हो जाएगी और कोई भी आलोचना का जोखिम भी उठाएगा क्योंकि रक्षा की बात है। इस बजट में एक ही बात साहसिक कही जा सकती है। वह है निजीकरण के बढ़ाने की चर्चा। मोदी जी सुधारों के पक्ष में आर्थिक जोखिम नहीं उठाएंगे। बाजार के किरदार और पैसे वाले इस बात से अभ्यस्त हो चुके हैं। आय और संबंधित अपनी प्राथमिकताओं को बाजार अनुमानों पर हावी होने देंगे तो और तार्किक अपेक्षाएं निर्मित होंगी । इसलिए 1 फरवरी की सुर्ख़ियों से बाहर निकल कर पूरे साल की बड़ी तस्वीर देखने की की कोशिश होनी चाहिए।