CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Monday, February 17, 2020

मुफ्त की सुविधाएं और हमारे चुनाव

मुफ्त की सुविधाएं और हमारे चुनाव 

किसी हिंदी फिल्म का एक दृश्य याद आता है कि झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले कुछ मतदाताओं को कुछ राजनीतिक नेता पैसे बांट रहे थे और जब पुलिस ऑफिसर बने उस फिल्म के नायक को यह बात पता चली तो उसने घटनास्थल पर पहुंचकर पैसा लेने वाले नौजवान की जमकर पिटाई की। अभी पिटाई चल ही रही थी कि उस नौजवान की मां आ गई और उसने बहुत मार्मिक बात कही कि " इस थोड़े से रुपए में आपको बेशक फर्क नहीं पड़ता लेकिन हमें पड़ता है। आप बच्चे को पीट रहे हैं लेकिन उन लोगों को कुछ नहीं कर पाते जो यह पैसे बांट रहे हैं।" यह दृश्य खुद में भारतीय चुनाव व्यवस्था और उसके बरक्स हमारी समाज व्यवस्था का एक उदाहरण है। अभी हाल में दिल्ली चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने मुफ्त की बिजली, मुफ्त का पानी और महिलओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की सुविधा देकर प्रचंड बहुमत से चुनाव में विजय  पाई। अरविंद केजरीवाल ने मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया कि यह सुविधाएं आगे भी जारी रहेगी। बेशक यह सही है। कोई भी सरकार अपने प्रदेश की जनता के हितों के लिए क्या कर सकती है, कल्याण के लिए कुछ कदम ,जिसे वह उचित कदम कहती हैं , उसे उठाने का फैसला कर सकती है। लेकिन सवाल है ,क्या मतदाताओं को मुफ्त सुविधाएं प्रदान करने का वादा या प्रलोभन लोकतांत्रिक शुचिता के अनुरूप है? जब चुनाव आते हैं तो राजनीतिक दल मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अपने घोषणा पत्रों में कई सुविधाओं का जिक्र करते हैं। उन्हें एक तरह से प्रलोभन देते हैं और प्रलोभन देने की इस प्रवृत्ति से सुप्रीम कोर्ट भी सहमत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि चुनाव के दौरान घोषणा पत्रों में मुफ्त की सुविधाएं देने या कह सकते हैं रेवड़ियां बांटने का प्रलोभन मतदाताओं को नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की बुनियाद कमजोर होती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में अपने फैसले में कहा था कि चुनाव घोषणा पत्रों में किए गए वायदों का जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 के तहत भ्रष्ट आचरण नहीं है। परंतु इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बड़े पैमाने पर मुफ्त सुविधाएं समाज के सभी वर्गों के लोगों को प्रभावित करती है और इस तरह की गतिविधियां बड़े पैमाने पर स्वतंत्र निष्पक्ष चुनाव की जड़ों को हिला देती है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि चुनाव आयोग को आदर्श आचार संहिता में अलग से एक शीर्षक के तहत राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों के बारे में प्रावधान करना चाहिए।
         संविधान की धारा 324 के अंतर्गत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होती है और वह इसके लिए लगातार प्रयास करता रहता है। उन प्रयासों में विभिन्न तरह के आदेश और निर्देश भी रहते हैं । चुनाव आयोग को यह मालूम है कि  इस सरकार की कीमत पर इस तरह की सुविधाओं के वायदों से निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया प्रभावित होती है और इसलिए उसने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों या निर्णय लागू करने की इच्छा भी व्यक्त की थी। चुनाव आयोग इस तरह का कोई भी आदेश या निर्देश नहीं दे सकता जो कानून के दायरे में नहीं हो। मुफ्त की सुविधाओं के वायदे पर अंकुश लगाने के बारे में कोई कानून नहीं है इसलिए राजनीतिक दल एक सीमा तक ही सुविधाएं दे सकते हैं। यद्यपि चुनाव घोषणा पत्र को सीधे-सीधे शासित करने के लिए हमारे देश में कोई नियम नहीं या कोई कानून नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले के बाद 2014 में चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता में एक नया प्रावधान जोड़ा। इस प्रावधान में मतदाताओं को अपने मताधिकार का प्रयोग करने के दौरान उन्हें प्रभावित करने से रोकने के लिए कई तरह के आदेश  जारी किए। इसका असर भी हुआ। पर कोई विशेष प्रभाव दिखाई नहीं दिया ना ही कोई बदलाव नहीं आया जितने प्रावधान हैं सब सुझाव की तरह थे। चुनाव आयोग ने भी कहा था कि राजनीतिक दलों को ऐसे वादे करने से बचना चाहिए जिनसे चुनाव की स्वतंत्रता और निष्पक्षता प्रभावित होने के साथ-साथ मतदाताओं पर गैर जरूरी असर भी पड़ने लगे।    कोर्ट के फैसले के 7 साल गुजर गए लेकिन हालात वही के वही हैं। मतदाता वर्ग से किए गए वायदे ऐसे अव्यावहारिक होते हैं जिन्हें पूरा ही नहीं किया जा सकता या पूरा करना व्यवहारिक नहीं है। संभवत ऐसा नहीं देखा गया है कि किसी राजनीतिक दल के पास कोई ठोस योजना हो कि वह सत्ता में आएगा तो विकास कार्यों से अलग इस तरह के वायदों को पूरा करने के लिए क्या करेंगे और इस पर कितना धन खर्च करेंगे।लेकिन मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए मुफ्त की सुविधाएं देने का सिलसिला चल रहा है इसका परिणाम यह हुआ की सरकारी धन का उपयोग विकास कार्यों की बजाए मतदाताओं को संतुष्ट करने या कह सकते हैं अपने वोट बैंक को एकजुट कर बनाए रखने के लिए अनावश्यक और अन उत्पादक कार्यों पर खर्च होता है । यह मुफ्त की सुविधाएं देने की बातों का दिनोंदिन इन दायरा बढ़ता जा रहा है और अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई तो एक बहुत गंभीर विभ्रम की स्थिति पैदा हो जाएगी जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। साथ ही इससे विकास भी प्रभावित होगा। उदाहरण के लिए देख सकते हैं कि आप पार्टी का मुफ्त बिजली
बसों में महिलाओं की यात्राएं फ्री करने पर  जितना खर्च हो रहा है वह तो दिल्ली के विकास के खर्चों को काटकर ही होगा अथवा अनावश्यक टैक्स बढ़ाकर होगा। इससे बड़ी कठिनाई पैदा होगी। विकास रुक जाएगा और मुफ्त के पाने   की आदत  बढ़ती जाएगी और बाद में दूसरे राज्यों के लोग भी इस तरह की सुविधाओं की अपेक्षा करेंगे अथवा एक नए किस्म का सामाजिक तनाव शुरू हो जाएगा इस पर रोक लगाना जरूरी है।


Sunday, February 16, 2020

असहमति और लोकतंत्र

असहमति और लोकतंत्र 

सुप्रीम कोर्ट के  न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ में शनिवार को कहा कि असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व है और  असहमति को सिरे से राष्ट्र विरोधी करार देना लोकतंत्र विरोधी है। ऐसे विचार  संरक्षण वादी ताकतों के खिलाफ विचार विमर्श करने की मंशा को बढ़ावा देते हैं। चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी ऐसे वक्त आई है जब संशोधित नागरिकता कानून (सी ए ए) और एनआरसी ने देश के कई हिस्सों पर व्यापक असर डाला है और देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि सवाल करने की गुंजाइश खत्म करना और असहमति को दबाना सभी तरह की प्रगति चाहे वह राजनीतिक हो आर्थिक हो सांस्कृतिक हो या सामाजिक उसकी बुनियाद को नष्ट करना है। असहमति को खामोश करना और लोगों के मन में भय पैदा करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन और संवैधानिक मूल्य के प्रति प्रतिबद्धता को खत्म करना है। असहमति दरअसल लोकतांत्रिक तौर पर निर्वाचित एक सरकार में विकास एवं सामाजिक संबंधों के लिए अवसर पैदा करते हैं। कोई भी सरकार उन मूल्यों एवं पहचानों को अपना बताने का और एकाधिकार का दावा नहीं कर सकती जो बहुलवादी समाज की हो गई है। चंद्रचूड़ के भाषण या कहिए अभिव्यक्ति से यह प्रतीत होता है कि असहमति  पर अंकुश लगाने के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल और डर की भावना को पैदा करना स्वतंत्र शांति के खिलाफ है और बहुलवादी समाज की संवैधानिक दूर दृष्टि को भड़काता है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की इस टिप्पणी के प्रिज्म में   नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी खिलाफ प्रदर्शनों को देखें । देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हो रहे हैं। यहां यह बता देना प्रासंगिक होगा कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ उस पीठ का हिस्सा थे जिसने उत्तर प्रदेश में सी ए ए के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले से क्षतिपूर्ति वसूल करने के जिला प्रशासन द्वारा कथित प्रदर्शनकारियों को भेजी गई नोटिस पर जनवरी में प्रदेश की सरकार से जवाब मांगा था। किसी भी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए राष्ट्र विरोधी नहीं कहा जा सकता  क्योंकि वह किसी कानून का विरोध करता है या करना चाहता है। विरोध को रोकना नाजायज है, खास करके ऐसे विरोध को जो किसी सरकार के किसी कदम के मुकाबले खड़ा करता  है।
      इन दिनों  संशोधित नागरिकता कानून सी (ए ए ) पर सबसे ज्यादा बहस चल रही है इस बहस में भविष्य के भारत के दो पृथक अवधारणाओं की अभिव्यक्ति के लिए एक संदर्भ बिंदु तैयार हुआ है। हमारे समाज की यह ट्रेजडी है कि  बौद्धिक आलस्य  के कारण हम इस पर एक नए दर्शन की नींव नहीं रख पा रहे हैं । अब से पहले भी धर्मनिरपेक्षता तथा फासीवाद, राष्ट्रवाद जैसे पुराने द्वैत सिद्धांतों पर बहस हुई है। सी ए ए पर बहस ने भारत की अवधारणा संबंधी पुराने सिद्धांतों पर पुनर्विचार का एक नया अवसर प्रदान किया है। जरूरत है वर्तमान भारतीय राजनीति की दशा और दिशा को स्पष्ट करने वाले विचारों पर मनन हो। इस नए हालात से राजनीतिक विचारों का एक नया संघर्ष शुरू होता है।
     नए भारत के विचार को आधिकारिक तौर पर पेश किया गया है। एक तरफ सीए ए की वैचारिक बुनियाद है दूसरी तरफ भारत के स्वधर्म का उतना ही प्रभावशाली विचार है। यही विचार हमारी राजनीतिक संस्कृति में एक बुनियादी बदलाव का प्रस्ताव पेश करता है। यह याद रखना जरूरी है कि नया भारत  एक वैचारिक रूपरेखा है।  इसे भाजपा ने दो हजार अट्ठारह में अपने राजनीतिक सिद्धांत के तौर पर अपनाया था। मोदी जी ने नए भारत की तीन विशेषताओं को बताया है। वह है नवाचार, कड़ी मेहनत और रचनात्मकता से संचालित राष्ट्र। शांति ,एकता और भाई चारे की विशेषता वाला राष्ट्र भ्रष्टाचार ,आतंकवाद, काले धन और गंदगी से मुक्त भारत। मोदी जी ने इन उद्देश्यों को हासिल करने के लिए भारतीय नागरिकों से 8 सूत्री शपथ लेने की अपील की है। इनमें दो बिंदु अत्यंत दिलचस्प है कि  मैं "एक सुगम में भारत के लिए अपना पूर्ण समर्थन देता हूं और मैं नौकरी देने वाला बनूंगा ना कि नौकरी ढूंढने वाला।"
        स्वधर्म - लोकतंत्र विविधता और विकास की पश्चिमी राजनीति का दर्शन को भारतीय संदर्भ में नए सिरे से परिभाषित करने यह कोशिश ऐसी है जिससे भारत ने दुनिया को यकीन दिला दिया है कि बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में और औपचारिक शिक्षा के अभाव की स्थिति में भी लोकतंत्र कायम रह सकता है। विविधता में एकता भारत का एक पुराना नारा है। जिसने  विविधता की भारतीय अवधारणा ,सांस्कृतिक, धार्मिक   अंतरों पर जोर देने कि नहीं बुनियादी रूप में विभिन्नता और तरीकों की स्वीकार्यता के  विकास की अवधारणा को परिभाषित किया गया है, जो कि जीडीपी विकास दर या प्रति व्यक्ति आय तक सीमित नहीं है। आखरी व्यक्ति के बारे में सबसे पहले सोचने का विचार विकास की अवधारणा में हमारा विशिष्ट योगदान है और मोदी जी ने अक्सर यह बात कही है। अब इन आंदोलनों का फल  क्या होगा यह कोई नहीं जानता लेकिन नए भारत और न्याय संगत भारत के बीच वैचारिक संघर्ष जो शुरू हो चुका है वह भविष्य में भी कायम रहेगा।


Friday, February 14, 2020

चुनाव में दागी उम्मीदवारों की बढ़ती तादाद पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश

चुनाव में दागी उम्मीदवारों की बढ़ती तादाद पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश 

देश की सबसे बड़ी अदालत सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को यह फैसला दिया के दागी उम्मीदवारों को चुनाव का टिकट देने के कारणों को स्पष्ट करना होगा और उनके संपूर्ण चुनावी इतिहास के बारे में अखबारों में विज्ञापन देने होंगे। राजनीति में अपराधियों की बढ़ती दखलंदाजी से पूरा का पूरा वातावरण है अपराधमय  दिखने लगा था । अगर आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि स्थिति कितनी बिगड़ती जा रही है। भारत में 2004 में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की संख्या 24% थी जो 2009 में बढ़कर 30% हो गई और 2014 में यह संख्या 34% हो गई। हैरत होती है 2019 में यह अनुपात बढ़कर 41% हो गया। इसका मतलब है लगभग आधे लोग आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं।
      आगे क्या होगा? लेकिन, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उम्मीद की जाती है की ऐसे चलन पर रोक लगेगी। खुद को साफ सुथरा और अपराध से दूर बताने वाले यह राजनीतिज्ञ किस पैमाने तक अपराध के दलदल में फंसे हैं यह अंदाजा लगाना मुश्किल है। यह आंकड़े तो उनके हैं जो सजायाफ्ता हैं। अपराध शास्त्र के अनुसार सबसे खतरनाक होता है अपराध किस दिशा में सोचना। आपराधिक सोच वाले राजनीतिज्ञ देश के साथ कुछ भी कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट तो सिर्फ उन्हीं पर रोक लगा रहा है जो सजा पा चुके हैं। कोर्ट के इस फैसले से अपराधिक पृष्ठभूमि वालों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बेशक दूर रखने में मदद मिलेगी लेकिन इससे दूर होना बड़ा कठिन है। न्यायिक व्यवस्थाओं का ही नतीजा है कि अदालत से 2 साल से अधिक की सजा होते ही अब ऐसे सांसदों- विधायकों की सदस्यता समाप्त हो रही है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। देश की राजनीति को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले तत्वों से मुक्त करने की कल्पना को साकार करने के लिए राजनीतिक दलों के सक्रिय सहयोग की अपेक्षा की जाती है। लेकिन, किसी भी तौर पर सत्ता को हासिल करने की लालसा की वजह से यह लक्ष्य हासिल करने में कितनी सफलता मिलेगी यह तो आने वाला समय बताएगा।
                   इस लक्ष्य को हासिल करने की विदिशा में तरह-तरह के तर्क और कुतर्क दिए जा सकते हैं। लेकिन, इन तर्कों से जनता के बीच राजनीतिक दलों की छवि किसी भी तरह सुधर नहीं रही है । बल्कि जनता के बीच यह धारणा तेजी से बन रही है कि सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। कोई किसी से कम नहीं है। आज राजनीतिज्ञ का मतलब है दबंग होना है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के 27 अगस्त 2014 के फैसले को देखना उचित  होगा। जिसमें संविधान पीठ ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को सुझाव दिया था कि बलात्कार और हत्या जैसे अपराधों तथा भ्रष्टाचार के आरोपों में अदालत में मुकदमों का सामना कर रहे व्यक्तियों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि जब न्यायपालिका और प्रशासनिक सेवाओं में संदिग्ध छवि वाले व्यक्तियों की नियुक्ति नहीं हो सकती है तो सरकार में कैसे जगह दी जा सकती है। लेकिन, अदालत के इस सुझाव की ओर ज्यादा गंभीरता नहीं दिखाई  गई। चुनाव आयोग और अदालत में चुनावी प्रक्रिया में दागी उम्मीदवारों की भागीदारी पर अंकुश लगाने के लिए कई आदेश दिए इनकी वजह से हालात कितने बदले हैं यह अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है। लेकिन अभी भी चुनाव में ऐसे नेताओं की जमात दिख सकती है जिन पर गंभीर किस्म के अपराध के आरोप हैं।  आपराधिक छवि वाले नेताओं के कारण ही आपराधिक मामलों के निपटारे में देरी हो रही है और देश की लगभग हर अदालत में लंबित मामलों की फेहरिस्त और लंबी होती जा रही है। अदालत या चुनाव आयोग चाहता है राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को चुनाव लड़ने के लिए अपना उम्मीदवार नहीं बनाए लेकिन इस विषय पर राजनीतिक दलों में कोई भी आम सहमति नहीं देखी जाती है। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के विश्लेषण के मुताबिक 17 वीं लोकसभा चुनाव 1070 प्रत्याशियों के खिलाफ बलात्कार ,हत्या ,हत्या के प्रयास महिलाओं के प्रति अत्याचार जैसे गंभीर अपराधों के मामले लंबित  होने की जानकारी उनके हलफनामे में थी। इनमें भाजपा के यानी कह सकते हैं सत्तारूढ़ दल के 124 ,कांग्रेस के 107, बसपा के 60 ,सीपीएम के 24 और 292 निर्दलीय उम्मीदवार थे। स्वच्छ सरकार बनाने का दावा करने वाली भाजपा के 67 में से 17 और कांग्रेस के 66 में से 13 उम्मीदवार दागी छवि की है बसपा भी पीछे नहीं है इसके 66 प्रत्याशियों में से 10 खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं।
       आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को चुनाव में टिकट नहीं देने के सवाल पर राजनीतिक दलों में आम सहमति नहीं है। ऐसी स्थिति में उम्मीद की जानी चाहिए अनुच्छेद 370 से अधिकांश प्रावधान खत्म करने और नागरिकता संशोधन कानून बनाने जैसे कठोर कदम उठाने वाली केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मद्देनजर कानून में अपेक्षित संशोधन कर उन लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने का प्रावधान करेगी जिनके खिलाफ गंभीर प्रकार के अपराध के आरोप हैं। यही नहीं , अगर सभी राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सत्यता से पालन करें तो देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण  कदम होगा।
      


Thursday, February 13, 2020

सजा हाफिज सईद को

सजा हाफिज सईद को 

मुंबई हमले के मास्टरमाइंड और कई आतंकी कार्रवाई को अंजाम देने वाले कुख्यात आतंकी हाफिज सईद को आतंकवाद के लिए नाजायज फंडिंग के दो अलग-अलग मामलों में साढे़ 5 साल की अलग-अलग सजा सुनाई गई। यह दोनों सजाएं एक साथ शुरू होंगी। पाकिस्तान में मेलजोल और शांति के पैरोकार के रूप में मीडिया में प्रचारित हाफिज सईद को लाहौर के आतंकवाद विरोधी अदालत ने लाहौर और गुजरांवाला में दायर दो मामलों में सजा सुनाई। हाफिज सईद जमात-उद-दावा का प्रमुख है और उसका साथी जफर इकबाल दोनों पर आतंकवाद के लिए गैर कानूनी ढंग से धन इकट्ठा करने और मुहैया कराने का आरोप है। हाफिज सईद के संगठन जमात-उद-दावा पर बंदिशें हैं और उन पाबंदियों के बावजूद उसने पाकिस्तान में अपनी कारगुजारियां  बंद नहीं की। हालांकि सईद और उसके साथी ने इन आरोपों को गलत बताया है और कहा है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण यह सब हुआ है। सईद की गिरफ्तारी साल भर पहले पंजाब के लाहौर में हुई थी और पंजाब पुलिस के काउंटर टेररिज्म डिपार्टमेंट ने पिछले साल 17 जुलाई को हाफिज सईद और उसके संगठन के नेता जफर इकबाल को पंजाब के शहर गुजरांवाला से गिरफ्तार किया था।
      हालांकि इस सजा के बावजूद पाकिस्तान के कट्टरपंथी धार्मिक नेता सईद को सुरक्षा देने की बात कर रहे हैं। पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री शहरयार अफरीदी मिल्ली ने कई नेताओं के साथ मिलकर इस पर बात की है। सईद की पार्टी को चुनाव आयोग से मान्यता मिलनी थी लेकिन नहीं मिली। पाकिस्तानियों को संदेह है कि अमेरिकी दबाव के कारण ऐसा हुआ है। पाकिस्तान के कुछ मंत्रियों का मानना है कि हाफिज सईद पाकिस्तान और धर्म के हक में है। इसलिए उस का साथ देना जरूरी है। वे उसे संसद में लाना चाहते हैं।
         अब सईद को सजा मिल गई है। लेकिन जबसे उसे गिरफ्तार किया गया तब से इसमें अमेरिका की भूमिका पर उंगली उठाई जा रही है। उसकी गिरफ्तारी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की वाशिंगटन यात्रा से कुछ दिन पहले हुई थी माना जा रहा है इस कार्रवाई से पाकिस्तान संदेश देना चाहता था कि वह आतंकियों - चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई में जुटा हुआ है। इस कार्रवाई पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट किया था कि 10 साल की तलाश के बाद मुंबई हमलों के कथित मास्टरमाइंड को पाकिस्तान में सजा दे ही दी। जब से हाफिज सईद को गिरफ्तार किया गया है तब से आलोचक इस कार्रवाई पर संदेह की नजर रखे हुए हैं। रक्षा विशेषज्ञ सुशांत सरीन के मुताबिक पाकिस्तान ने भले ही उस पर कार्यवाही की है लेकिन उसकी नीति में कोई बुनियादी परिवर्तन आया हो इसके संकेत नजर नहीं आ रहे हैं। अभी यह कहना जल्दी बाजी होगी कि सजा पूरी करेगा या नहीं इसके पहले भी कई बार देखा गया है कि जब दबाव पैदा होता है तो पाकिस्तान कुछ इस तरह की कार्रवाई करता है और जब समय के साथ दबाव कम होने लगता है तो वह अपने आप मामला खत्म हो जाता है। पिछले 15-20 सालों में पाकिस्तान की ओर से ऐसी कार्रवाई या करीब 6 या 7 बार हो चुकी है। मुंबई हमलों के बाद भी हाफिज सईद को गिरफ्तार किया गया था। उसके बाद कई बार उसे हिरासत में लिया गया और नजरबंद किया गया। कुछ दिन मुकदमा चला कर छोड़ दिया गया।  साल 2008 में जब सबसे पहले हाफिज सईद और उनके सहयोगियों पर कार्रवाई हुई थी तो उस समय भी ऐसा लगा था अब कड़ी कार्रवाई होगी लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। इसलिए किसी भी एक कार्रवाई से यह मान लेना कि पाकिस्तान की ओर से आतंकवाद का समर्थन करने वाले इस संगठन पर या ऐसे संगठनों पर ठोस कार्रवाई की शुरुआत होगी यह गलत है। इमरान खान बेहद चुनौतीपूर्ण हालात में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे और उन्होंने वादा किया था नए पाकिस्तान का। लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं रहा है।  इस समय पाकिस्तान पर चौतरफा दबाव है। आईएमएफ और फाइनेंशियल फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स  पाकिस्तान पर लगातार दबाव बन रहा है। टास्क फोर्स ने तो अक्टूबर तक समय दिया था यही वजह है कि पाकिस्तान ने पिछले दिनों आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले संगठनों की संपत्तियों और अकाउंट को जप्त करने और फ्रिज करने की कार्रवाई की। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज किया गया।
       वैसे रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की  कार्रवाई दिखावा है। केवल हाफिज सईद के संगठन ही नहीं लश्कर-ए-तैयबा और फलाहे इंसानियत जैसे संगठनों पर भी अर्से से मुकदमे चल रहे हैं। लेकिन, कोई नतीजा नहीं निकला  है। यह भी वैसा ही होगा। हाल के मामलों से पता चला है कि पूरी दुनिया में स्वीकार्य आतंकवाद की अवधारणा को पाकिस्तान ने पहली बार स्वीकार किया है। पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों को विभिन्न प्रकारों से बांटता था ,जैसे जो पाकिस्तान में एक्टिव हैं या नहीं और जिन से सीधे पाकिस्तान को खतरा है या नहीं। पेरिस में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की हालिया बैठक में पाकिस्तान ने कहा था यह संगठन आतंकवादी गतिविधियों में शामिल नहीं है। इनसे ज्यादा खतरा तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान या आईएसआईएस जैसे खतरनाक समूहों से है। हालांकि वैश्विक समुदाय का मानना है की इन सभी संगठनों से समान तरह के खतरे हैं। आज जो अंतरराष्ट्रीय स्थिति है इसमें पाकिस्तान को अपनी नीतियों में बदलाव लाना ही बेहतर होगा ताकि उसे वैश्विक दबाव के सामने झुकना ना पड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह अलग-थलग नजर नहीं आए। बेहतर होगा पाकिस्तान अन्य संगठनों पर भी कार्रवाई करे। जब तक वैसा नहीं करता है तब तक उस पर वैश्विक दबाव बना रहेगा।


Wednesday, February 12, 2020

दिल्ली चुनाव से सबक

दिल्ली चुनाव से सबक

दिल्ली इतिहास से लेकर आज तक हमेशा खबरों में रही है। चाहे वह मुगलों के दिल्ली हो या अंग्रेजों की या कांग्रेसियों की या फिर आज के भाजपा की दिल्ली की। सबसे बड़ी खूबी है कि वह हर परीक्षा में एक नया सबक दे जाती है। चुनाव भी परीक्षा ही है ,फर्क यही है इस परीक्षा में जिसे लोकतंत्र की परीक्षा कहते हैं वहां इंसानों को तौला नहीं जाता है बल्कि गिना जाता है कि किसके हिस्से में कितने लोग खड़े हैं। यह एक ऐसी जंग है जिसमें जंग का नायक खुद नहीं लड़ता बल्कि लड़ने वाली योद्धाओं के साथ खड़ा रहता है और बार-बार पूछता है "मामकाः पांडावैश्चैव किम अकुर्वत संजय:।" हर बार चुनाव सबक दे जाता है। उसके खुद के सबक भी होते हैं। मसलन दिल्ली चुनाव के नतीजों में केजरी  का केसरी बनाना और नमो - अशा को निराशा हाथ लगना यह सबक देता है कि चुनाव में कामयाबी के भाजपा के फार्मूले ने  इसे  सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया।
    ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर के सिद्धांतों के मुताबिक सबसे अच्छी रणनीति के मॉडल के कुछ अभिशाप भी होते हैं। मोदी और शाह के अधीन भाजपा ने 2014 में ही चुनाव जीतने का एक कामयाब फार्मूला बना लिया है। वह इसे पार्टी की सबसे अच्छी रणनीति का मॉडल कहते हैं। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि आत्म संतुष्टि के चलते योद्धा लापरवाह हो जाते हैं और उनकी कार्यशैली में बदलाव की जरूरत होती है। जिसे कामयाब रणनीति कहते हैं वह एक तरह से टेंपलेट बन जाता है। जिसमें कोई परिवर्तन किया ही नहीं जा सकता दिल्ली में भाजपा के साथ यही हुआ। इसकी जो सबसे अच्छी रणनीति थी वह अंतिम क्षणों में पाकिस्तान विरोधी बयानबाजी  विपक्ष को राष्ट्र विरोधी साबित करने तथा चुनाव क्षेत्र में बड़े नेताओं की विशाल शोभा यात्राएं थी। इससे एक वातावरण तो बनता है। पार्टी और समर्थकों में थोड़ा जोश तो आता है। लेकिन, इसने भाजपा को एक ऐसे टेंप्लेट में बांध दिया कि इसमें बदलाव किया ही नहीं जा सकता। अगर मार्क्सवाद के पराभव को देखें तो उसके साथ भी कुछ ऐसी ही कमी थी। मार्क्सवादी दूसरों की सुनने को तैयार नहीं थे। आज भाजपा के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। हर आलोचक को राष्ट्र विरोधी करार दे दिया जाना इसकी सबसे बड़ी पहचान है।
         अब जरा दिल्ली को  देखें । वहां की टोपोग्राफी कुछ अजीब सी है। दिल्ली का एक हिस्सा जो लुटियंस का हिस्सा है उसे इस बात का अहंकार है कि वह सरकार बनाता है और उसे चलाता है। दूसरा हिस्सा दिल्ली में बसी ब्यूरोक्रेसी है जिसमें वर्तमान और निवर्तमान लोगों का हिस्सा है। वे केवल सिद्धांत और गणना की बात करते हैं। तीसरा हिस्सा पंजाबियों और जाटों का है जो एकदम स्पष्ट सोचता है और सीधी बात करता है जो सच है। चौथा हिस्सा बिहार तथा अन्य प्रांतों से आए प्रवासी मजदूरों का है। जिसे हर बात में अपना लाभ दिखता है दिल्ली में किसी भी सरकार को बनाने और रोकने में तीसरे और चौथे हिस्से की सबसे बड़ी भूमिका होती है। क्योंकि यही तबका सड़कों पर लोगों के विचारों को बनते बिगड़ते देखता है तथा उसमें परिवर्तन और परिवर्धन की कोशिश करता है। इस तबके को यह विश्वास है कि सरकारी सेवाओं की डिलीवरी केजरीवाल सुनिश्चित करते हैं। केजरीवाल हिंदुत्व विहीन राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाते हैं और हिंदुत्व को भी गले लगाते हैं। यह भाजपा के लिए एक नई चुनौती है।  इसके अनुरूप भाजपा ने अपने सिद्धांतों और नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं किया। सॉफ्टवेयर क्षेत्र में एक शब्द बड़ा ही पॉपुलर है। उसे सिस्टम कहते हैं।  यदि सिस्टम बहुत दृढ़ता से कनफिगर किया गया हो तो बाहरी परिस्थितियों से इसमें सुधार नहीं किया जा सकता। आज मोदी और शाह के बीच का जो सिस्टम है भाजपा का उसमें  कामयाबी का जो फार्मूला कनफिगर किया हुआ है उसमें बदलाव किया ही नहीं जा सकता। भाजपा की दूसरी सबसे बड़ी रणनीति है उसका धुआंधार प्रचार। 2014 के चुनाव बहुतों को याद होंगे। गुजरात मॉडल का प्रचार किस तरीके से किया गया था। इसका कथानक कैसे गढ़ा गया था। सबने ध्यान दिया होगा कि चुनाव आते-आते गुजरात की पृष्ठभूमि से उभरकर मोदी असाधारण व्यक्तित्व हो गए। ऐसी भूमिका बनाई गई मानो भारत को मोदी का ही इंतजार था। कांग्रेस के पास ऐसी रणनीति नहीं थी जो इस मिथक को खत्म कर सके।
        उधर 2018 में आम आदमी पार्टी ने मोहल्ला क्लीनिक और स्कूलों में सुधार का काम बड़े जोर शोर से आरंभ किया। भाजपा ने इस पर सवाल उठाने में देर कर दी। उसे मोदी और शाह के तिलिसमात पर भरोसा था। भाजपा ने बड़ी चालाकी से कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाया और पूरी लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने में सफलता पाई। इससे वोट बैंक में सेंध लगाने की उसकी मंशा बहुत कामयाब हो गई। भाजपा ने मनोज तिवारी को आगे कर दिया। लेकिन वह केजरीवाल की लोकप्रियता का मुकाबला नहीं कर पाए। उधर मनोज तिवारी की मदद के बजाय भाजपा ने शाहीन बाग को खलनायक साबित करने पर ज्यादा जोर लगाया। इस रस्साकशी में भाजपा यह नहीं देख सकी कि अन्य पार्टियां भी उसकी रणनीति का अनुकरण कर सकती हैं और कर रही है। आम आदमी पार्टी ने भाजपा के कई विशिष्ट तरीकों को जैसे मीम चुटकुले और व्हाट्सएप संदेशों को अपनी तौर पर गढ़ लिया । भाजपा ने एक समय में इसके जरिए राहुल गांधी का कद  छोटा कर दिया था आम आदमी पार्टी ने इसी के जरिए मनोज तिवारी को निस्तेज कर दिया और वह वास्तविक तौर पर कभी मुकाबले में आ ही नहीं सके। अरविंद केजरीवाल की बहुत सी शिकायतें प्रसारित की गयीं और अरविंद केजरीवाल ने लगातार उन शिकायतों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। मोदी जी की गोटी उल्टी पड़ गई।


Tuesday, February 11, 2020

अब चुनाव में लड़ाई लंबी होनी चाहिए

अब चुनाव में लड़ाई लंबी होनी चाहिए 

दिल्ली में एक बार फिर "कमल" का सपना चकनाचूर हो गया और स्वप्न जो फूल से झरे थे उन पर झाड़ू फिर गई।  केजरीवाल का "अरविन्द " तीसरी बार दिल्ली में खिल रहा है। अरविन्द केजरीवाल तीसरी बार मुख्यमंत्री बन रहे हैं। यह करिश्मा से कम नहीं है।  एक ही व्यक्ति लगातार तीसरी बार देश के सबसे महत्वपूर्ण और सजग विधानसभा  में सरकार बनाने जा रहा है। दिल्ली कहते हैं दिलवालों का शहर है और लोग अपनी बातों का एक साथ दबंग अंदाज में खुलकर इजहार करते हैं। केंद्र सरकार की लगातार कोशिशों के बावजूद दिल्ली उसके हाथ नहीं लग रही है। चुनाव के पहले एक सॉनेट बड़ा प्रचारित हुआ था,

निकले करने विकास सूरज की सुर्ख गवाहीमें
आज खुद टिमटिमा रहे जुगनू से नौकरशाही में

लेकिन, अरविंद केजरीवाल ने यह प्रमाणित कर दिया कि वह जुगनू से नहीं टिमटिमा रहे हैं। इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण यह जानना है कि भाजपा के विशाल आकार और पूर्णत: साधन संपन्न होने के बावजूद वह क्यों पराजित हो गई और तुलनात्मक रूप में बहुत छोटी पार्टी "आम आदमी पार्टी " कैसे जीत गई? बेशक इसकी वजह अरविंद केजरीवाल हैं। 2019 के चुनाव में पराजय के बाद अरविंद केजरीवाल ने बहुत महत्वपूर्ण सबक सीखी। दिल्ली में यह बात फैलाई गई "केंद्र में नरेंद्र मोदी  का कोई तोड़ नहीं है " और उसी संदर्भ में जब भी केजरीवाल वोटरों के बीच गए तो उन्होंने ने वोटरों को यह समझाने की कोशिश की कि " दिल्ली में केजरीवाल का कोई विकल्प नहीं है।"
   भाजपा की सबसे बड़ी कमी है कि विधानसभा चुनाव में पेश करने के लिए उसके पास वैसे विराट चेहरे नहीं है जैसे केंद्र में बैठे हैं। यही कारण था कि भाजपा को दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र ,हरियाणा और झारखंड जैसे राज्यों में भी धूल चाटनी पड़ी। यहां तक कि आम चुनाव से पहले राजस्थान चुनाव में भी ऐसा ही नारा था "वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं।" इन तमाम कारणों से यह स्पष्ट हो गया कि भाजपा के लिए राज्यों में अच्छे नेता नहीं हैं। दिल्ली में पिछले चुनाव में भी भाजपा के समक्ष यही संकट था। हिंदी में एक कहावत बहुत लोकप्रिय है कि " दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है।" 2015 में किरण बेदी को पेश कर राजधानी में 70 में से 3 सीटों पर सिमटी भाजपा ने इस बार किसी को सामने रखने का जोखिम नहीं उठाया और केजरीवाल के मुकाबले ऐसे अनजान चेहरों को उतारा जिनके हारने से कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की सरगोशियों पर ध्यान दें तो इसके संकेत मिल सकते हैं दोनों दलों के बड़े नेताओं में चुपके-चुपके  ही सही लेकिन स्पष्ट कहा जा रहा था  कि वह केजरीवाल के मुकाबले किसी मजबूत कैंडिडेट को खड़ा करके उसको खत्म नहीं करेंगे। यानी ,उन्हें यह भरोसा था शायद ही जीत सकें।
     चमकीली कोठियों और चौड़े राजपथों की दिल्ली का बहुत बड़ा हिस्सा झुग्गियों और सिंगल बैडरूम की सीलन भारी कोठारिया में रहता है। सरकार के द्वारा मुफ्त में दी जाने वाली सुविधाओं और चीजों की जहां उच्च मध्यवर्ग आलोचना करता है वही यह निम्न मध्यवर्ग और झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले मजदूरों के किए एक बहुत बड़ी नेमत है या फिर उनके बीच खूब चलते हैं। यह  वोटर झुग्गियों और अनधिकृत कालोनियों में रहते हैं। आम चुनाव में बुरी तरह पराजित होने के बाद केजरीवाल ने मुफ्त की चीजों का ऐलान करना शुरू कर दिया।जब उन्होंने बस और मेट्रो को महिलाओं के लिए मुफ्त करने की घोषणा की तो यह लगभग  धमाके की तरह था। महिलाओं के लिए बस फ्री कर दी मेट्रो में अभी तक यह सुविधा नहीं मिली है। इसके बाद इस तरह की कई घोषणाएं ,जिसमें सबसे महत्वपूर्ण 200 यूनिट बिजली की खपत पर जीरो बिल। यह घोषणा सोशल मीडिया से सड़क तक चर्चा का विषय रही और ऑटो वालों तक ने कहना शुरू कर दिया "केजरीवाल मेरा हीरो, बिजली का बिल मेरा जीरो।" जिन्होंने पिछले चुनाव के बाद दिल्ली की यात्रा की है उन्होंने ऑटो के पीछे स्लोगन को लिखा देखा होगा और स्लोगन से एक खास वर्ग के लोगों की भावनाओं का साफ साफ पता चलता है।  इस बार वोटों की गिनती में यह भावनाएं वोट में बदलती देखी गई, फलस्वरूप केजरीवाल तीसरी बार सीएम बन गए। हाल में देश में कुछ खासकर दिल्ली में कुछ घटनाएं हुईं। जिनमें से सी ए ए और अन्य नागरिकता संबंधी  से उन मुद्दों को राष्ट्र प्रेम के मुद्दे में बदलने में लगी भाजपा दिखी। लेकिन केजरीवाल ने सारे सकारात्मक प्रयोग किए।  बिजली, पानी, स्कूल, स्वास्थ्य इत्यादि को अपना मुद्दा बनाया। आप  ने पूरा चुनाव मुद्दों पर लड़ा। वह  जैसे मसले को अखबार बनाते रहे और आदमी पार्टी वायदे पूरे करने पर काम करती रही। वोटरों को भाजपा के राष्ट्रीय मुद्दों की जगह 'आप' के स्थानीय मुद्दे ज्यादा पसंद आए। यद्यपि भाजपा ने कैंपेन में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन 'आप ' ने लगभग रोजाना प्रेस कॉन्फ्रेंस करके एक टेंपो बनाए रखा। 'आप' ने भारतीय चुनाव अभियान प्रणाली में एक नया अध्याय जोड़ा कि आज के चुनाव में प्रचार यानी लड़ाई लंबी लड़नी होगी। कुछ हफ्तों या पखवाड़े में लड़ाई खत्म नहीं होती है।  यही कारण है कि 'आप' ने चुनाव की घोषणा होने से पहले से अपना अभियान आरंभ कर दिया और उसे जारी रखा। पिछले दो चुनावों में बुरी तरह पराजित होने के बावजूद कांग्रेस ने कोई सबक नहीं सीखा।  उसने लगभग हथियार डाल दिए।
    केजरीवाल ने चुनाव से ठीक पहले हनुमान चालीसा का पाठ किया जिसकी चर्चा बहुत है। हालांकि यह चर्चा नेगेटिव है फिर भी यह कहा जा सकता है की बेशक उनकी सफलता यह बताती है की किसी काम के पहले अगर हनुमान चालीसा पढ़ी जाए तो सफलता जरूर मिलती है:
       प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहीं
     जलाधि लांघ गए अचरज नाहीं


Monday, February 10, 2020

आलोचना के पहले सोचना होगा

आलोचना के पहले सोचना होगा 

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण कहा है कि बजट में 2024 25 तक देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बनाने की आधारशिला रखी गई है। उन्होंने कोलकाता में संवाददाताओं से कहा वित्त वर्ष 2020 - 21 में बजट में खपत बढ़ाए जाने के उपाय किए गए हैं। साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए निवेश करे। इससे आखिरकार देश की अर्थव्यवस्था को 5000 अरब डालर का बनाने में मदद मिलेगी। वित्त मंत्री ने कहा कि हमने खपत बढ़ाने और पूंजीगत निवेश को सुनिश्चित करने की नींव डाली है। सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर खर्च करेगी इसका लघु एवं दीर्घ अवधि में व्यापक असर देखने को मिलेगा।
       वित्त मंत्री के इस कथन के परिप्रेक्ष्य में अगर देखा जाए तो बहुत उम्मीदें जगती हैं हालांकि कुछ टीकाकारों का कहना है कि अर्थव्यवस्था के मामले में वर्तमान सरकार का काम ठीक नहीं रहा है। लगभग आम सहमति इस बात पर है 2014 के चुनाव अभियान के दौरान प्रधानमंत्री जी ने जो वायदे किए थे उन्हें पूरा नहीं किया जा सका।  निकट भविष्य के आसार बहुत अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं। बेशक इस बात को कहने का कोई फायदा नहीं है कि आने वाले दिनों में भी बहुत कुछ अच्छा होगा। सरकार तमाम प्रमुख आर्थिक पहल करने में पिछड़ गई है और वह संरक्षणवाद की ओर मुड़ गई है। रोजगार और व्यापार के मोर्चों पर उसका कामकाज ठीक नहीं है ,लेकिन अगर इस बात का विश्लेषण करें तो सबसे पहले एक बात मान कर चलना होगा कि इस साल वृद्धि दर 5% रही और अगले साल 6% रहेगी। 2020- 21 तक के  3 वर्षों में औसत वृद्धि दर महज 5.7% ही रहेगी। यह आंकड़ा मनमोहन सिंह सरकार के आखरी 3 वर्षों में औसतन वृद्धि दर के आंकड़े की तुलना में काफी कमजोर रही। मनमोहन सरकार के अंतिम 3 वर्षों में वृद्धि दर 6.2% थी इस आंकड़े को नई सदी के शुरुआती वर्षों के बाद कभी नहीं छुआ जा सका है। इसलिए आलोचकों को पूरा आधार मिल गया है। इसका अंदाजा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के भाषण से नहीं लगता है। आखिर सरकार के पहले 4 वर्षों में वृद्धि दर 7.7% थी और दोनों कार्यकालों को जोड़ कर देखा जाए तो 7 वर्षों में औसत वृद्धि दर 6.9% थी। यह उठना गिरना लगभग चौथाई सदी से जारी है। मनमोहन सरकार के आखिरी 3 वर्षों की कमजोर दर से पहले के 3 वर्षों में यह दर प्रशंसनीय थी। उस अवधि में यह दर 7.5 प्रतिशत रही और सब हासिल हुआ था जब दुनिया आर्थिक संकट से जूझ रही थी। इसी तरह 2003 में 4.2% गिरावट दर्ज की गई। लेकिन इसके बाद के 3 साल में इसका औसत 4.23 प्रतिशत का रहा था और फ़िर गति तेज हो गई थी। अगर संक्षेप में कहें तो फिर गति तेज हो गई थी फिर सुस्त हो गई फिर तेज हो जा सकती है। इसकी वजह आपस में जुड़ी हुई है। फिलहाल जिसे सुस्ती कहा जा रहा है उसकी सबसे और सामान्य बात है यह बिना किसी बाहरी कारण के आई है। जैसा कि पिछले 50 वर्षों में आई सुस्ती के दौरों के साथ हुआ। यह वर्तमान दौर की सुस्ती को तुलनात्मक रूप से ज्यादा गंभीर बना देता है। अगर भारतीय अर्थव्यवस्था ठीक नहीं होती है तो जाहिर है कि व्यवस्था में ही कमजोरी है।
         अब इसके बाद आलोचना की ओर दूसरा कदम उठाने से पहले इस बात पर गौर करना  होगा कि मोदी सरकार ने क्या-क्या सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन किए  वित्तीय सेवाओं में। रसोई के लिए साफ-सुथरे ईंधन, शौचालय ,बिजली, डिजिटल लेनदेन को आसान बनाया और अब किसानों को नगद में भुगतान तथा मुफ्त मेडिकल सेवा भी मुहैया कराई । अब जैसा कि वित्त मंत्री ने बताया की मूल मुद्रास्फीति सहित माइक्रोइकोनॉमिक बैलेंस अच्छी अवस्था में है । मोदी जी के आलोचक सामाजिक बदलावों को और उसके महत्व को लगभग समझ नहीं पाते हैं। इसकी वजह यह हो सकती है की विफलता है तो दिख जाती है। जैसे गंभीर होती बेरोजगारी, उपभोग में गिरावट और इसका निवेश पर असर , निर्यात में गतिरोध नीतिगत  सुधारों के प्रमुख पदों पर कानूनी निष्क्रियता ,किसानों के समक्ष चुनौतियां इत्यादि इत्यादि।HH अब इसमें जो ज्यादा बाल की खाल निकालते हैं वह संस्थाओं के हरा जैसी समस्याओं को भी जोड़ सकते हैं तू बात वित्त मंत्री ने कही है वाह 1 दिन में तो हो नहीं सकता किसी के पास कोई जादू की छड़ी तो होती नहीं है लेकिन इन तथ्यों की समीक्षा करने वालों के लिए यह जरूरी है कि वे आक्रामक रुख ना अपनाएं बेरोजगारी जैसी समस्या से बेशक निपटना होगा क्योंकि यह बढ़ती विषमता और विकास के लाभ के असमान वितरण से उत्पन्न हुई है। इसकी मूल में वही बातें हैं । कई मोर्चों पर ज्यादा काम करने की जरूरत है। जैसा कि वित्त मंत्री ने कहा है कि  इंफ्रास्ट्रक्चर  को सुधारना होगा और अगर ऐसी स्थिति में आर्थिक वृद्धि रफ्तार पकड़ती है तो मोदी सरकार को दाद देनी होगी। क्योंकि इससे सरकार का आर्थिक रिकॉर्ड चमक सकता है। लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो तेज वृद्धि का अगला चरण शुरू होने में देर हो सकती है। फिर भी वित्त मंत्री की है बात आशा जनक है एवं उम्मीद करनी चाहिए कि विकास होगा। क्योंकि हमारे देश में इंफ्रास्ट्रक्चर की सबसे बड़ी कमी है। अगर इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं होगा तो  अर्थव्यवस्था को विकसित होने के प्रचुर आधार नहीं मिलेंगे। अर्थव्यवस्था पर असर बहुत धीरे-धीरे होता है इसलिए सरकार की आलोचना करने से पहले कुछ सोचना जरूरी है।