दिल्ली में हिंसा की पृष्ठभूमि में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के बीच कई समझौते हुए। इनमें रक्षा समझौता और व्यापारिक समझौता प्रमुख है। दोनों में अच्छे बुरे समय में एक दूसरे का हाथ थामने का वादा भी किया। यह शुक्रिया है कि ट्रंप ने अपने किसी भाषण में या किसी बातचीत में कोई ऐसी बात नहीं कही जिससे उनके मेजबान को शर्मिंदा होना पड़े। यहां तक कि सी ए ए जिसे लेकर दिल्ली में उत्ताल तरंगे उठा रही हैं और कश्मीर भी खबरों में है दोनों वाकयों को ट्रंप बचा ले गए। सीएए उन्होंने भारत का आंतरिक मामला बताया और कश्मीर को एक ऐसा मसला बताया जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद हल कर सकते हैं। एक तरह से से उन्होंने इन मामलों में मोदी की पीठ भी ठोक दी।
दिल्ली में जो कुछ भी हो रहा है वह एक दूसरा मसला है। लेकिन, ऐसे महत्वपूर्ण समय में इतना कुछ हो जाना भी अपने आप में एक बड़ी घटना है। ट्रंप के आने को लेकर करो जो उम्मीदें थीं, खास करके भारतीय दृष्टिकोण से, उतना मिला नहीं। जो कुछ भी हुआ वह भारतीय नजरिए से जरा फीका था। मुहावरों से ही बात शुरू की जाए तो "हाउडी मोदी" की तरह "नमस्ते ट्रंप" खुशगवार नहीं था और ना ही ट्रंप को देखने वालों की भीड़ के लिए उतनी जगह थी कि अमेरिका की तरह लोग किसी धुन पर नाच सकें। लेकिन, इसके बावजूद ट्रंप के स्वागत में खास किस्म की गर्माहट थी। आयोजन के बाद हिंदी में जो ट्वीट किया गया उसमें बहुत सुरुचि भी दिखाई पड़ रही थी। हालांकि उसे बहुत सावधानीपूर्वक लिखा गया था और अनुवाद किया गया था। डोनाल्ड ट्रंप के साथ रोमन अक्षरों को लेकर ही कई समस्याएं हैं ,देवनागरी के मामले में क्या होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ट्रंप के इस दौरे की सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि यह उनका पहला भारत दौरा था। कुछ वर्षों से चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपतियों का भारत आना एक तरह से प्रचार का फार्मूला बन गया है। इसमें भारत की किसी भी सरकार का कोई करिश्मा नहीं है। बल्कि अमेरिका में भारतीयों के आकार का करिश्मा है।
ट्रंप साबरमती आश्रम भी गए थे। यह वहां कई बड़ी अच्छी तस्वीरें भी ली गई। ट्रंप ने "भारत माता की जय" के नारे लगाने से खुद को संयमित रखा। ट्रंप अक्सर जैसा भाषण देते हैं उससे अच्छा भाषण उन्होंने दिया। भाषण सुनने वालों की जो भीड़ थी वह अमेरिकी जनता की नहीं थी बल्कि भारतीय जनता की थी। उन्होंने वहां मौजूद भारतीयों को प्रसन्न करने की कोशिश भी की। मसलन, भारतीय समाज की सबसे कमजोर नस है धर्म । अमेरिकी राष्ट्रपति ने स्पष्ट कहा कि "भारत धार्मिक आजादी को लेकर बहुत गंभीर है और काम भी कर रहा है।" यह सी ए ए के विरोध में शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन के परिप्रेक्ष्य में प्रदर्शनकारियों की परोक्ष रूप से आलोचना थी। उन्होंने कहा की आप भारत की तुलना में बाकी जगहों पर देखें तो पाएंगे कि धार्मिक आजादी को लेकर भारत बहुत गंभीर है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मैंने दिल्ली में हिंसा के बारे सुना है लेकिन इसे लेकर पीएम मोदी से कोई बात नहीं की है।
दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन को लेकर हुई हिंसा में अब तक 10 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। इस मसले पर ट्रंप ने बड़ी सफाई से कह दिया "पीएम मोदी अतुलनीय हैं। वह धार्मिक आजादी को लेकर गंभीर हैं।" ट्रंप ने जानकारी दी कि "उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ पाकिस्तान से पैदा होने वाले आतंकवाद पर भी बात की। मोदी आतंकवाद के सख्त खिलाफ हैं उन्होंने इसने एक नया जुमला जोड़ते हुए कहा मोदी जी बहुत ही शांत प्रकृति के व्यक्ति हैं लेकिन बहुत मजबूत हैं।" इसे शाहीन बाग में सक्रिय इस्लामी चरमपंथियों को चेतावनी भी कह सकते हैं।
ट्रंप के जाने के बाद सरकार का परम कर्तव्य है कि वह दिल्ली में हो रही हिंसक घटनाओं को काबू कर ले नहीं तो ट्रंप के पीछे पीछे खबरें दुनिया भर में फैलेंगी और इससे भारत सरकार को कमजोर साबित करने की कोशिश कई खेमे में होगी। इन घटनाओं को देखकर कुछ ऐसा लगता है दिल्ली का अपना खुफिया तंत्र इस हद तक सुस्त हो चुका है कि उसे भनक तक नहीं मिली कि ट्रंप के दौरे में ऐसा हो सकता है उधर आरोप-प्रत्यारोप का बाजार गर्म है। विपक्ष, खास तौर पर आम आदमी पार्टी , का आरोप है कि पुलिस को हरकत में आने का आदेश ही नहीं दिया गया। पुलिस की भूमिका पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं की उसे कहीं भी बल प्रयोग करते नहीं देखा गया। पुलिस सरकार का तंत्र है जो आमतौर पर राज्य सरकार के हाथ में होता है। दिल्ली में ऐसा नहीं है, यह तंत्र केंद्र सरकार के हाथों से संचालित होता है। अगर उसे उपयोग में नहीं लाया गया तो वह कुछ भी नहीं कर सकेगा। वैसे हमारे देश का कानून ऐसा है कोई भी संज्ञेय अपराध यदि पुलिस की मौजूदगी में होता है तो उसे हरकत में आना चाहिए। लेकिन धीरे-धीरे रिवाज कम होता जा रहा है। पुलिस व्यवस्था दो तरह की होती है। रीएक्टिव पुलिसिंग और प्रीवेंटिव पुलिसिंग। यहां पुलिस के दोनों भाग निष्क्रिय नजर आए। खास करके प्रीवेंटिव पुलिसिंग। ऐसी व्यवस्था के तहत पुलिस को इंटेलिजेंस जुटाकर घटना से पहले कार्रवाई करनी होती है। अब भी सरकार को चेतना होगा और पुलिस की इंटेलिजेंस विंग को सक्रिय करके हर चीज पर काबू पाने की कोशिश करनी होगी।
Wednesday, February 26, 2020
Tuesday, February 25, 2020
ट्रंप का भारत आना
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत दौरा कई समझौतों और आश्वासनों के साथ-साथ कई मनभावन प्रदर्शनों के बीच भव्य रहा।यद्यपि पाकिस्तानी सरकार को यह फूटी आंख नहीं सुहा रहा है। लेकिन भारत में इसे लेकर काफी उत्साह है। अभी तक आलोचना के स्वर नहीं सुनने को मिले हैं। केवल उनके दौरे या उनकी भारत में मौजूदगी के बीच शाहीन बाग में जो हिंसक घटनाएं हुई अगर उनको जोड़ा जाए तो यह उनका विरोध कम और भारत का अपमान करने की मंशा ज्यादा थी। यह एक राष्ट्र विरोधी कृत्य है और इसकी भर्त्सना की जानी चाहिए। यद्यपि इसकी पृष्ठभूमि की समीक्षा करें तो एक खास संदेश मिलता है। बकौल वाशिंगटन पोस्ट ट्रंप अपने देश में मुसलमानों पर पाबंदियां लगाना चाहते हैं और मोदी जी ने विपक्षी दलों के कथनानुसार पाबंदियां लगाने का काम शुरू कर दिया है। यह एक तरह से ट्रंप का विरोध किया जाना होगा। लेकिन ऐसे संदेशों को ना माना जाए तो अच्छा है। लेकिन जिन लोगों ने यह सब किया है उन्हें भी अपने देश के सम्मान के बारे में सोचना चाहिए ।
अमेरिका और भारत के बीच क्या है जो समझौते हुए हैं उनसे अलग दोनों देशों के बीच के सियासी संबंधों पर सोचा जाना जरूरी है। भारत और अमेरिका के बीच आरंभ से ही संबंधों में उतार-चढ़ाव होता रहा है। लेकिन तब भी दोनों के संबंध कायम है। इसका कारण है वह सेतु जो भारत के सॉफ्ट पावर से निर्मित हुआ है । इसे संजोग ही कहा जा सकता है कि ट्रंप की भारत यात्रा अहमदाबाद से आरम्भ हुई। अहमदाबाद पटेल समुदाय का निवास स्थान है। वह पटेल समुदाय जो एक जमाने में अमरीका में मोटेल व्यापार का अगुआ था। भारतीय प्रवासियों का समुदाय दोनों देशों के बीच संबंध को कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब भी संबंधों में थोड़ी सी ठंडक आने लगती है तो यह समुदाय उसे फिर से गरमाने का काम करता है। भारत और अमेरिका के बीच यह सब क्लिंटन के जमाने में आरंभ हुआ जब पाकिस्तान दुनिया भर में आतंकवाद के लिए विख्यात था और उसका प्राथमिक लक्ष्य भारत था। आज तक उसकी धमक अमेरिकी राष्ट्रपतियों की बातचीत में सुनाई पड़ती है। डोनाल्ड ट्रंप के भी सब ईगो में कहीं न कहीं वही था तथा यही कारण है कि उन्होंने अपने भाषण में वादा किया कि वह आतंकवाद को समाप्त करेंगे । ट्रंप ने अपने भाषण में कहा कि वह पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के खिलाफ आतंकवाद को रोकने की कोशिश करेंगे। कंपनी भारत के चंद्रयान मिशन की भी तारीफ की और स्पष्ट कहा कि वह भारत के साथ मिलकर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत और तेजी से आगे बढ़ेगा कंपनी कहा कि अमेरिका भारत के साथ प्यार करता है और उसकी इज्जत करता है। वह भारत के लोगों का हमेशा निष्ठावान दोस्त बना रहेगा। 9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने भी समझ लिया कि आतंकवाद कितना खतरनाक है और तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत की तरफ हाथ बढ़ाया। इस दोस्ती को आगे बढ़ाने के लिए क्लिंटन ने कई प्रभावशाली आप्रवासी भारतीयों को सहायता ली। इसके बाद वे भारत आए। उनका भारत आना अटल बिहारी वाजपई द्वारा अपनाई गई भारतीय विदेश नीति के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में माना जाएगा। वाजपेई जी ने उस समय निर्गुट संबंधों को किनारा करके द्विपक्षीय संबंधों पर जोर दिया। यह दो दशक में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली भारत थी। उस समय तक भारतीय आप्रवासी नागरिकों पर आरोप था कि वे 1991 की मंदी के लिए दोषी हैं और अमेरिका में उन्हें अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था। लेकिन बाजपेई क्लिंटन के संबंधों के बाद भारतीय कंपनियां वहां उतरने लगी। बुश के जमाने में भी भारत अमेरिका संबंध कुछ मद्धिम पड़े फिर तब भी भारत को एक विश्वस्त सहयोगी के रूप में माना जाता था। 2010 में लगभग 30 लाख भारतीय अमेरिका में रहते थे और उनकी मौजूदगी को देखते हुए पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति ने व्हाइट हाउस में दीपावली पर दीए जलाए । एक बार फिर सॉफ्ट पावर ने कमाल किया और कूटनीति में शीत युद्ध की जो जंग थी वह खत्म हो गई। हाल में हाउडी मोदी को जो सफलता मिली उसने तो कमाल कर दिया और अब नमस्ते ट्रंप ने एक नया अध्याय संबंधों में जोड़ दिया।
अब जबकि ट्रंप भारत आए हैं तो वे यहां का स्वागत सत्कार देख मुग्ध हो गए। बेशक ताजमहल के सौंदर्य के प्रति उनकी आत्ममुग्धता में कहीं सियासत नहीं दिख रही थी। इन सबके बावजूद जिन लोगों ने उपद्रव करके भारत को बदनाम करने की कोशिश की है उनकी न केवल सार्वजनिक निंदा होनी चाहिए बल्कि उनके नेताओं की शिनाख्त कर उन्हें दंडित भी किया जाना चाहिए।
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Sunday, February 23, 2020
आज से ट्रंप की भारत यात्रा
अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा आज से आरंभ हो रही है। ट्रंप की यह पहली भारत यात्रा है। जाहिर है कि भारत दुनिया के महाबली के स्वागत करने के लिए बहुत उत्साहित है। इसके पीछे राजनीतिक और व्यापार जैसे कई कारण हैं। इस दौरे से जुड़ी है जो सबसे रोचक बात वह है कि दोनों देशों के बीच 70 हजार करोड़ से ज्यादा का प्रस्तावित सौदा होने वाला है। यद्यपि, ट्रंप ने कहा था कि वे भविष्य के लिए बड़े व्यापारिक डील को बचा रहे हैं। यानी ट्रंप ने इशारा किया था इस दौरे में बड़े व्यापारिक समझौते नहीं होंगे। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि रॉबर्ट लाइटहाइजर को पिछले हफ्ते भारत आना था लेकिन उन्होंने अपनी यात्रा मुल्तवी कर दी। क्योंकि ,कई मुद्दों पर दोनों देशों में एकमत नहीं हुआ जा सका। इस बारे में ट्रंप ने कहा था कि भारत हमारे साथ बहुत अच्छा सलूक नहीं करता है लेकिन इसके बावजूद मैं प्रधानमंत्री मोदी को बहुत पसंद करता हूं। पिछले 3 वर्षों से भारत और अमेरिका के संबंधों में कई बार उतार-चढ़ाव देखे गए। चीन के बाद अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। 2018 में अमेरिका का द्विपक्षीय कारोबार 142.6 अरब डालर था यह एक रिकॉर्ड है। लेकिन 2019 में य सोदा घट गया और घटकर 23.2 अरब डालर हो गया। इससे लगता है कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़े हैं। अमेरिका के साथ भारत का व्यापार घाटा फिर कम होने लगा है। लेकिन अमेरिका का गुस्सा अभी उतरा नहीं है। अमेरिका और भारत के बीच व्यवसाय युद्ध तब शुरू हुआ जब ट्रंप ने भारत से आने वाली स्टील उत्पादों पर 25% और अलमुनियम उत्पादों पर 10% ड्यूटी लगा दी। इस ड्यूटी का असर भारत पर पड़े इसके पहले भारत ने अमेरिका से कई बार अनुरोध किया था कि वह अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। इतना ही नहीं भारत ने कोई जवाबी कदम भी नहीं उठाया था। जबकि दूसरी तरफ, अमरीकी राष्ट्रपति ने खुलेआम कहा था कि भारत कैसे अमेरिका से आने वाले उत्पादों पर ज्यादा टैक्स लगाता है। ट्रंप ने भारत को "ट्रैफिक किंग ऑफ वर्ल्ड" कहा था। इसके बाद भारत ने 16 जून 2019 से अमेरिका में बने या अमेरिका से आयातित वस्तुओं पर 28% ड्यूटी लगा दी। अमेरिका को काफी गुस्सा आया और उसने इसकी शिकायत विश्व व्यापार संगठन में भी की थी। अमेरिका और भारत कई मुद्दों पर एक मत नहीं है। फेडरेशन आफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशन के महानिदेशक अजय सहाय के मुताबिक अमेरिका हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल, इलेक्ट्रॉनिक और सूचना तकनीकी उत्पादों पर बड़े शुल्क, मेडिकल उपकरणों की कीमत पर नियंत्रण, डेरी मार्केट में कम पहुंच और डाटा लोकलाइजेशन से भी चिंतित है। अमेरिका के डेरी कारोबारी भारत में अपने उत्पाद बेचना चाहते हैं। लेकिन उनके साथ समस्या है कि वह अपने पशुओं को खून से बना हुआ चारा खिलाते हैं। यह भारतीय धार्मिक भावनाओं से विपरीत है। अब अमेरिका से भारत यह चाहता है की वह एक सर्टिफिकेट जारी करे जिससे यह साबित हो सके कि यह उत्पाद शुद्ध है। राष्ट्रीय किसान महासंघ ने हाल ही में कहा था एक तरफ केंद्र सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दुगनी करने का वादा कर रही है और दूसरी तरफ एक ऐसा व्यापार समझौता करने पर तुली हुई है जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना होगा। इस सौदे की वजह से हर साल कृषि ,डेयरी और पोल्ट्री उत्पाद अमेरिका से आयात किए जाएंगे। भारत सरकार को सावधान करने के लिए गत 17 फरवरी को राष्ट्रीय किसान महासंघ ने भारत अमेरिका व्यापारिक समझौते के खिलाफ प्रदर्शन भी किया था। केंद्रीय बजट में सरकार ने अमेरिका से आयात किए जाने वाले चिकित्सा उपकरणों पर टैक्स लगा दिए। यह तो पहले से विवाद का कारण था। यानी इस बार बजट के प्रावधानों को लेकर भी नया विवाद छिड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है की ट्रंप के दौरे के दौरान अगर भारत और अमेरिका के बीच दोनों दे किसी बड़े व्यापारिक सौदे पर आगे बढ़ने का निर्णय करते हैं। जिसका का प्रभाव आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा। हालांकि 10 बिलियन डालर के व्यापार पैकेज से भारत और पाकिस्तान के बीच सभी द्विपक्षीय मसले नहीं सुलझेंगे । यह हालांकि अनुमान है फिर भी अगले दो-तीन वर्षों में दोनों देशों में व्याप्त तनाव घटेंगे और इससे दोनों देशों को लाभ होगा।
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Friday, February 21, 2020
मोदी की भाजपा के नए मतदाता
एक तरफ बहुत तेजी से मुस्लिम आबादी के विकास का भय फैलाया जा रहा है। कई नेताओं पर मुस्लिमों की तरफदारी के आरोप लगाए जा रहे हैं दूसरी तरफ आंकड़े बता रहे हैं की मोदी की भाजपा के अधिकांश मतदाता बेशक धार्मिक नहीं है लेकिन वे बहुसंख्यक वर्ग के हैं। भारतीय जनता पार्टी की 2019 की शानदार चुनावी सफलता अप्रत्याशित थी। लेकिन उसका अगर उपलब्ध आंकड़ों से आधार पर समाज वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए तो पता चलेगा यह भारतीय राजनीति में एक व्यापक वैचारिक परिवर्तन का नतीजा था। भाजपा विजय को कुछ लोग तात्कालिक संदर्भ के चश्मे से देखते हैं। लेकिन, इसके संरचनात्मक परिवर्तन के कारक तत्वों को नहीं देख पाते हैं। इतिहास के गलियारों में जरा पीछे लौटे तो 1857 के सिपाही विद्रोह के बाद एक ऐसा ही सामाजिक परिवर्तन हुआ था। जिसके परिणाम स्वरूप भारतीय मध्यवर्ग की उत्पत्ति हुई थी। आज लगभग डेढ़ शताब्दी के बाद कुछ वैसे ही कारकों की उत्पत्ति हुई है। सामाजिक बदलाव दिखाई पड़ने लगे हैं। मध्यवर्ग के विस्तार और धार्मिक हिंदू राष्ट्रवाद से इतर एक नए प्रकार के जातीय राजनीति बहुसंख्यक वाद ने भाजपा से ऊंची जाति वालों की पार्टी के ठप्पे को हटाने में मदद की है। भाजपा विपक्षी दलों पर अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण आरोप प्रचारित करती है और खुद सबके साथ समान व्यवहार के सिद्धांत पर चलने का दावा करती है। भाजपा अक्सर कहती है कि वह किसी का तुष्टिकरण नहीं करती है। उसका यह प्रचार उन हिंदुओं के समर्थन को हासिल करने में सहायक हुआ है जिनका मानना है कि भाजपा से पहले जितने भी दल थे वे सब के सब मुस्लिम तुष्टीकरण के तरफदार थे। इसमें कोई आश्चर्य ही कि भाजपा के प्रचार को मुसलमानों और ईसाइयों के संदर्भ में पूर्वाग्रह से ग्रसित कहा जा सकता है। यह जो नया सामाजिक बदलाव हुआ उसके कारक तत्व थे, नरेंद्र मोदी की बेशुमार लोकप्रियता, भाजपा की संगठनात्मक बढ़त, राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे और गरीबों के बारे में सोचने वाली एक सरकार की छवि। इसी वैचारिक बदलाव के दायरे में भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा के मसलों पर बढ़ चढ़कर बोलती है और उसे अपनाती भी रही है। यह मसले भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा के अनुरूप थे। साथ ही अधिकाधिक मतदाताओं तक सीधे पहुंचने के लिए भाजपा द्वारा सोशल मीडिया के प्रयोग और कल्याणकारी योजनाओं के फायदे, परिवारों और पार्टी के बीच की कड़ी साबित करने में पार्टी की सफलता इसकी राजनीति के वैचारिक धरातल में बदलाव को उजागर करते हैं। शुरुआत कहां से हुई यह जानना ज्यादा जरूरी है। सबसे पहले मतदाता की वैचारिक सोच में ढांचागत परिवर्तन हुआ। भाजपा ने खुद को प्रचारित करना आरंभ किया और जहां उसकी छवि ऊंची जाति वाले पार्टी की थी। वहीं व्यापक हिंदू समाज की छवि बनने लगी। यह सवाल उठता है कि भाजपा के नए मतदाता कौन हैं? इसके लिए नेशनल इलेक्शन स्टडीज (एन ई एस) 2019 के तीन सवालों का उपयोग किया जा सकता है। एन ई एस में पूछा गया है कि 2019 और 2014 के चुनाव में उत्तरदाता ने किसको वोट दिया था? क्या वह खुद को किसी पार्टी विशेष का पारंपरिक समर्थक मानता है? सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार इन सवालों का जवाब देने वालों में से लगभग 13% ने खुद को भाजपा का परंपरागत मतदाता कहा है। इसके बाद लगभग 22% ने खुद को मोदी के शीर्ष की ओर बढ़ने के बाद भाजपा का समर्थक बताया और 11% भाजपा के निवर्तमान समर्थक थे। भाजपा के नए मतदाताओं के पिछड़ी जातियों के ग्रामीण अर्ध शिक्षित और नौजवान होने की अधिक संभावना है। 2019 में भाजपा के लिए पहली बार वोट डालने वालों के स्वरूप भारतीय समाज के प्रतिबंधित करते हैं और इसका एकमात्र अपवाद है धार्मिक अल्पसंख्यक। परंपरागत रूप से उच्च और मध्यम वर्ग के लोग भाजपा के समर्थन में थे।2014 में यह स्थिति बदल गई। 2019 आते-आते हालात और बदले तथा गरीब तबका भी भाजपा से जुड़ गया। यही नहीं भाजपा ने सामाजिक बदलाव की दिशा में एक और काम किया। वह कि इसने अपने वोटरों के बीच लैंगिक भेदभाव के अंतर को खत्म करने में सफलता पाई। पहले महिला वोटरों में भाजपा की लोकप्रियता कम थी। यही नहीं भाजपा का समाज सुधार आयु पिरामिड को भी ज्यादा बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करता है। इतना ही नहीं भारत में बहुत व्यापक जनसांख्यिकी परिवर्तन हो रहा है और हर क्षेत्र में जो बदलाव हो रहे हैं वह चिताओं पर असर डाल रहे हैं।
गुरुवार को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने रांची में कहा कि राष्ट्रीयता को हिंदू वाद के साथ जोड़ा जा रहा है। लेकिन एन ई एस में सवाल का उत्तर देते हुए बताया गया है कि सर्वे में ऐसा कुछ नहीं पाया गया है। इन निष्कर्षों के आधार पर कहा जा सकता है कि भाजपा की 2019 की विजय सिर्फ चुनाव पूर्व तात्कालिक कारणों से नहीं हुई बल्कि इसमें भारतीय राजनीति और समाज में जारी बदलाव की भूमिका थी और यह परिवर्तन लंबे काल तक चलता रहेगा और इससे यह उम्मीद की जा सकती है अगले चुनाव में भी भाजपा को ही सफलता मिलेगी।
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Thursday, February 20, 2020
राम मंदिर निर्माण के लिए उठा दूसरा चरण
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए दूसरा चरण आरंभ हो गया है पहला चरण तब हुआ था जब सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में फैसला सुनाया था। अब राम मंदिर निर्माण के लिए दूसरा चरण श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन के बाद आरंभ हो गया। इस ट्रस्ट का गठन नरेंद्र मोदी सरकार ने किया है । शीर्ष अदालत द्वारा राम मंदिर के पक्ष में फैसला देने के बाद वह मंदिर निर्माण के लिए न्यास के गठन के आदेश पर 5 फरवरी को केंद्र सरकार ने ट्रस्ट का ऐलान किया था। इस कार्रवाई के बाद राम मंदिर निर्माण की ओर आगे बढ़ने में सरलता होगी। बुधवार को ट्रस्ट की पहली बैठक हुई विश्व हिंदू परिषद चंपत राय को ट्रस्ट के महासचिव का दायित्व और स्वामी गोविंद देव गिरी जी को कोषाध्यक्ष का पद सौंपा गया। प्रशासनिक अधिकारी रहे नृपेंद्र मिश्र को समिति का चेयरमैन बनाया गया है। नृत्य गोपाल दास ने कहा है कि लोगों मध्य निर्माण के दौरान लोगों की भावनाओं का सम्मान किया जाएगा और जल्दी से जल्दी मंदिर का निर्माण होगा । इस ट्रस्ट का प्रमुख वरिष्ठ अधिवक्ता के परासरण को बनाया गया है एवं इसके अन्य सदस्य है जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती जी महाराज (इलाहाबाद) जगद्गुरु माधवाचार्य स्वामी विश्व प्रसिद्ध प्रसन्न तीर्थ जी महाराज (उडुपी के पेजावर मठ से) युगपुरुष गोविंद देव गिरी जी महाराज (पुणे ) और देवेंद्र प्रकाश मिश्र (अयोध्या) शामिल हैं।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में की थी। भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की स्थापना संबंधित गजट अधिसूचना जारी की थी। उत्तर प्रदेश सरकार ने कैबिनेट बैठक में मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन दिए जाने पर भी मुहर लगाई थी। अयोध्या के रौनाही में यह जमीन दी जाएगी। रौनाही अयोध्या लखनऊ मार्ग पर है।
हालांकि यह सब हो गया लेकिन मंदिर का निर्माण तो थन से होगा और उस धन को जमा करने के लिए अभी तक कोई समुचित व्यवस्था नहीं हुई है। राम मंदिर जन्मभूमि क्षेत्र को दो करोड़ रुपए का एक बड़ा दान मिला था। ट्रस्ट की 12 करोड़ के कई चेक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 5 फरवरी को सदन में की गई घोषणा के बाद ही मिले थे। इस ट्रस्ट ने इन चेक वापस कर दिया है।दो करोड़ चेक बिहार के रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल दे दिया था। इसकी मुख्य वजह यह है कि ट्रस्ट के पास अभी तक इतनी बड़ी धनराशि रखने के लिए कोई जगह नहीं है। कोई साधन नहीं है। कुणाल ने यद्यपि 10 करोड़ रुपए दान देने की बात कही थी। लेकिन जैसे ही नए ट्रस्ट की घोषणा हुई वह दो करोड़ के चेक के साथ अयोध्या पहुंचे। ट्रस्ट ने चेक को लौटा दिया क्योंकि इतने बड़े दान को स्वीकार करने की कोई व्यवस्था उनके पास नहीं है। ट्रस्ट के सदस्यों के मुताबिक निर्माण के लिए मिलने वाले फंड की कोई कमी नहीं। देशभर से लोग दान देने को तैयार हैं। इसके लिए इसी प्रकार के अभियान की जरूरत नहीं है। ट्रस्ट के गठन के तुरंत बाद गृह मंत्रालय के अपर सचिव डी मुर्मू ने एक रुपए का दान देकर इसके शुरुआत की औपचारिक राशि प्रदान की । 1989 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए पहला पत्थर लगाने वाले ट्रस्ट के अकेले दलित सदस्य कमलेश चौपाल के अनुसार लोगों ने दान देना शुरू कर दिया है। लेकिन उसे स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हैं। सबसे पहले खजांची की नियुक्ति होगी, बैंक में खाता खोला जाएगा, ट्रस्ट का ऑफिस कहां होगा यह देखा जाएगा इसके बाद ही यह राशि स्वीकार की जा सकती है। सी ए ए और एनआरसी की पृष्ठभूमि में ट्रस्ट का निर्माण अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला है और साहसिक कृत्य है। सरकार को भारतीय संस्कृति एवं भारतीय सातत्य को बनाए रखने के लिए इस तरह का कदम उठाने के लिए साधुवाद। सरकार को यह भी प्रचारित करना चाहिए जिस मंदिर का निर्माण हो रहा है उसके नायक भगवान श्री राम हैं जो किसी जाति के नहीं है भक्तों के है पूरे हिंदुस्तान के हैं।
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Wednesday, February 19, 2020
ट्रंप की भारत यात्रा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले हफ्ते के पहले दिन 24 फरवरी को भारत आ रहे हैं। इनकी यात्रा को लेकर दुनिया भर में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। किसी ने इसके नकारात्मक इसके सकारात्मक पक्ष पर रोशनी डाली है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने ट्रंप की भारत यात्रा और उस दौरान होने वाली रैलियों की बात कहते हुए ट्रंप को मोदी का पिछलग्गू बताया है। लेकिन चुनाव के पहले 40 लाख भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक ट्रंप के लिए इन टिप्पणियों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका में नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। ट्रंप ने अपनी भारत यात्रा के दौरान हवाई अड्डे से स्टेडियम तक लाखों लोगों की भीड़ की बात कही है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 50 से 70 लाख लोगों की उपस्थित होने की बात कही है। ट्रंप को यह महसूस हो रहा है यह यात्रा उनके चुनाव में प्रवासी भारतीयों से संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह यात्रा उनके वोटों को आकर्षित कर सकती है। जैसा कि लग रहा है डोनाल्ड ट्रंप इस यात्रा में कश्मीर का पत्ता तुरुप का हो सकता है। क्योंकि ट्रंप इस यात्रा के दौरान व्यापार संधि और कूटनीतिक रिश्ते को बिगाड़ने वाली अपनी छवि को सुधारने का प्रयास करेंगे।
राष्ट्रपति की यात्रा से कुछ ही दिन पहले चार अमरीकी सांसदों ने भारत का दौरा किया और उन्होंने कश्मीर के हवाले से अपने विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो को पत्र लिख कर प्रजातंत्र में जारी इतने लंबे इंटरनेट बैन और आम लोगों को नेताओं के लंबे कैद को लेकर चिंता जताई थी। जिन्होंने पत्र लिखे थे उनमें सत्तारूढ़ दल के दो तथा विपक्ष के दो सदस्य थे। ट्रंप ने पहले भी भारत और पाकिस्तान के बीच इस मसले पर मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पहल की थी हालांकि भारत ने साफ इंकार कर दिया था। पाकिस्तान के बालाकोट पर हमले के दौरान पकड़े गए एयरफोर्स के पायलट अभिनंदन को रिहा करवाने में प्रमुख भूमिका निभाने के संकेत भी राष्ट्रपति ट्रंप में उस दौरान दिए थे। अमेरिकी चुनाव नजदीक आ रहे हैं और राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए यह प्रयास दोबारा कर सकते हैं। हालांकि अब तक जितने भी सर्वे आए हैं उनमें ट्रंप की लोकप्रियता का आंकड़ा 50% से कम है। अमेरिका को महत्वपूर्ण दिखा सकने वाला किसी भी तरह का फैसला इस आंकड़े को बढ़ाने में मददगार हो सकता है।
खबर है कि राष्ट्रपति ट्रंप कई बड़ी भारतीय कंपनियां जैसे तेल और गैस क्षेत्र की जानी-मानी कंपनी रिलायंस ऑटो और कई दूसरे अहम क्षेत्रों में मौजूद टाटा संस, टेलीकॉम कंपनी एयरटेल, महिंद्रा एंड महिंद्रा तथा अन्य कई कंपनियों के प्रमुखों से मिलेंगे। निर्माण क्षेत्र में तेजी लाना और नौकरियों के लिए नए मौके मुहैया कराना ट्रंप प्रशासन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है खास करके इस चुनाव में। फिलहाल अमेरिकी निर्माण क्षेत्रों में सुधार आया है और सुधार के आंकड़े आशा जनक हैं। महिंद्रा एंड महिंद्रा ने अमेरिका में एक अरब डॉलर निवेश और उसके बलबूते रोजगार से नए अवसरों बात की थी। 100 अरब डालर से टाटा समूह की 13 कंपनियां अमेरिका में हैं। जिसमें 35000 लोग काम करते हैं । व्यापार संस्था सीआईआई के एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका में कम से कम एक सौ भारतीय कंपनियों में कुल 18 अरब डालर का निवेश है और इनमें एक लाख से अधिक अमरीकी लोगों को रोजगार हासिल है । अभी उम्मीद की जा रही है कि भारत अमेरिका से 24 लड़ाकू हेलीकॉप्टरों की खरीद के लिए 2.6 अरब डालर के रक्षा सौदे को अंतिम रूप दे सकता है।
विश्लेषकों के अनुसार डॉनल्ड ट्रंप की भारत यात्रा उनसे अपने चुनाव के मद्देनजर है। लेकिन यहां सवाल उठता है कि भारतीय मूल के अमेरीकीयों का कितना वोट ट्रंप के खाते में जाएगा इसे लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। एशियन अमेरिकन लीगल डिफेंस एजुकेशन फंड नाम की संस्था के मुताबिक अधिकांश भारतीय डेमोक्रेट्स के वोटर है और इकोनामिक एंड पॉलीटिकल वीकली के अनुसार 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में इन लोगों ने 77% वोट हिलेरी क्लिंटन को दिया था। यद्यपि हाल के वर्षों में अमेरिका में रिपब्लिकन हिंदू कोलिशन जैसी संस्थाओं की पहुंच में इजाफा हुआ है। प्रवासी भारतीयों इस संस्था इंडियास्पोरा के कार्यकारी निदेशक संजीव जोशीपुरा का कहना है यह बड़ा मुश्किल है बताना कि राजनीतिक तौर पर राष्ट्रपति के लिए यह यात्रा कितनी मददगार होगी उनका कहना है कि वोटर दोनों नेताओं के बीच फरिश्तों को किस तरह देखेंगे अभी से कहना मुश्किल है। लेकिन, यह तय है कि अपने वोट का फ़ैसला करते समय उनके मन में कहीं न कहीं राष्ट्रपति ट्रंप को लेकर दिए गए बयानों कदमों और अमरीकी वीजा को निश्चित बनाए जैसे सवाल जरूर घूम रहे होंगे जिनका सीधा असर भारत जैसे देशों से वहां जाने वाले लोगों पर पड़ता है।
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Tuesday, February 18, 2020
फौज में महिलाओं को बराबर का हक
महारानी लक्ष्मी बाई , दुर्गावती और लक्ष्मी सहगल के इस मुल्क में फौज में बराबरी का दर्जा हासिल करने के लिए महिलाओं को 17 बरस लंबी कानूनी लड़ाई से जूझना पड़ा। तब कहीं जाकर बराबरी का दर्जा हासिल हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने सेना में लैंगिक भेदभाव को खत्म करते हुए सोमवार को अपने अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि इस सभी पात्र महिला अफसरों को 3 महीने के भीतर सेना में स्थाई कमीशन दिया जाए। अदालत ने केंद्र की दलील को निराशाजनक बताया। जिसमें महिलाओं को कमांड पोस्ट ना देने के पीछे शारीरिक क्षमताओं और सामाजिक मानदंडों का हवाला दिया गया था। अभी तक थल सेना में 14 वर्ष तक सेवा देने वाले पुरुष अफसरों को ही स्थाई कमीशन के बारे में पात्र माना जाता था। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर महिला अधिकारियों के आदेश लेने को तैयार नहीं होंगे लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले दुनिया के कई ऐसे देश हैं जहां महिलाएं सेना में कमांडिंग पोजीशन में है अगर इतिहास की बात करें तो दूसरे विश्व युद्ध में सैनिकों को शुरू हुई तो बहुत से देशों में औरतों को सेना में शामिल करना शुरू किया। लेकिन इनमें सिर्फ सोवियत संघ ही एक ऐसा मुल्क था जिसने मैदाने जंग में महिलाओं को उतारा था। हालांकि सोवियत संघ के विघटन के बाद वहां भी अब महिलाओं को युद्ध में लड़ने की इजाजत नहीं है। दुनिया भर में 80 के दशक के बाद महिलाओं की प्रशासनिक और सहायक भूमिका में बड़ा बदलाव 21वीं सदी की शुरुआत में हुआ। जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और शांति औरतों की समान भूमिका का प्रस्ताव किया यह वही वक्त था जब 11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर आतंकी हमला हुआ था और उसके बाद अमेरिका और ब्रिटेन ने अफगानिस्तान और इराक में सेना भेजी थी। इन सेनाओं में औरतों की खास टुकड़ियां थी। जिन्हें फीमेल इंगेजमेंट टीम कहा जाता था। अमेरिका और ब्रिटेन में औपचारिक रूप से औरतों को युद्ध में शामिल होने की इजाजत नहीं थी पर युद्ध की आवश्यकता ही कुछ ऐसी थी कि उनकी टीम शामिल हुई और करीब डेढ़ सौ औरतों की युद्ध में जान गयी। अमेरिका में यह औपचारिक इजाजत 2013 में दी गई। 2016 में ब्रिटेन ने की औपचारिक इजाजत दे दी। कुछ ऐसे देश हैं जहां युद्ध में औरतों को हिस्सेदारी देने की असल वजह उदारवादी सोच है। दुनिया में मर्द और औरतों की बराबरी के मामले में सबसे आगे आने वाले स्कैंडिनेवियन देश नार्वे, फिनलैंड और स्वीडन में भी इजाजत है। 2018 में नैटो में शामिल स्लोवेनिया एकमात्र ऐसा देश बना जिसने एक महिला को देश के सुप्रीम कमांडर के रूप में नियुक्त किया। फ्रांस में महिलाएं पनडुब्बियों और दंगा नियंत्रण दल को छोड़कर वहां की सेना सभी क्षेत्रों में सेना में सेवा देती हैं।
सरकार ने इस फैसले के पूर्व सुप्रीम कोर्ट में तरह-तरह की दलीलें पेश की थी परंतु सुप्रीम कोर्ट ने इसे नहीं माना कोर्ट का कहना था कि खेसारी दलीलें बताती हैं की माइंडसेट यानी सोचने के तरीके को बदलना होगा ताकि सेना में सच्ची बराबरी हासिल हो सके। अदालत ने सभी भेदभाव को खत्म कर दिया। अब महिला सैनिक अफसर सभी मोर्चों के कमांड पोस्ट पर तैनात की जा सकेंगी। इसका अर्थ महिलाएं एवं सभी तरह की ट्रेनिंग भी हासिल कर सकती हैं। जिससे उन्हें विभिन्न मोर्चों पर तैनात किए जाने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। हालांकि सेना ने आधिकारिक तौर पर इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं जाहिर की है लेकिन फैसले के कुछ ही घंटों के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसका स्वागत किया। अब इस फैसले का जो प्रभाव पड़ेगा उसे मानव संसाधन विभाग तथा सेना के मानव संसाधन प्रबंधन विभाग को झेलना है। अब इस संबंध में उसे अपनी नीति बदलनी होगी। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव सेना की संस्कृति उसके नियमों ,पदों के मूल्यों इत्यादि में आएगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से अब किसी को कुछ नहीं करना है क्योंकि यह बाध्यता मूलक है।
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