प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को कोरोनावायरस पर लॉक डाउन को लेकर एक सर्वदलीय बैठक की और उस बैठक से जो निष्कर्ष निकला इससे लगता है कि एक साथ लॉक डाउन का खत्म होना मुश्किल है। सरकार ने कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए 25 मार्च को देशभर में 21 दिनों का लॉक डाउन लागू कर दिया था। यह दिन 14 अप्रैल को पूरा होता है। इस बीच सरकार यह समीक्षा कर रही है कि लॉक डाउन को आगे बढ़ाया जाए या नहीं या उसे क्रमिक रूप में खत्म किया जाए।
कई राज्य सरकारों ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है लॉक डाउन बढ़ाया जाए। प्रधानमंत्री ने देश के हालात को सामाजिक आपातकाल की संज्ञा दी है। उन्होंने कहा कि देश के प्रत्येक व्यक्ति की जान को बचाना हमारी प्राथमिकता है। लॉक डाउन खोला जाए इस पर पिछले दिनों कई लोगों ने विशेषकर मुख्यमंत्रियों ने अपनी राय दी। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने कहा कि इसे जारी रखने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं है। इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। पिछले कुछ दिनों से मीडिया में यह बात चल रही है कि 14 अप्रैल के बाद भी लॉक डाउन बढ़ सकता है। इसको देखते हुए लोगों में संवेदनशीलता बढ़ी है । लेकिन सब तरफ एक ही सवाल है कि अगर लॉक डाउन रहा तो क्या होगा? उधर उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त मुख्य गृह सचिव अवनीश अवस्थी ने कहा है कि हमारे प्रदेश में अगर एक भी मरीज रह जाता है तो लॉक डाउन खोलना उचित नहीं होगा। यही नहीं इस बैठक में राज्य सरकारों, जिला प्रशासनों और विशेषज्ञों ने लॉक डाउन को आगे बढ़ाने की सिफारिश की। प्रधानमंत्री ने इसे सामाजिक आपातकाल बताते हुए सुझाव दिया है कि सामाजिक दूरी बनाए रखें और जनता कर्फ्यू या लॉक डाउन का पालन करें। इसमें प्रत्येक नागरिक का योगदान और उसके साथ अनुशासन समर्पण और प्रतिबद्धता की उन्होंने प्रशंसा की है। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बदली हुई परिस्थिति में देश को अपनी कार्य संस्कृति और काम करने की शैली में बदलाव करने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि हमारी पहली प्राथमिकता प्रत्येक व्यक्ति का जीवन बचाना है। वर्तमान स्थिति मानवता के इतिहास में युगांतरकारी घटना है और भारत को इसके दुष्प्रभाव से निपटना ही होगा।
यह बैठक ऐसे वक्त में हुई है जब सरकार ने संकेत दिया है कि वायरस को तेजी से फैलने से रोकने के लिए कई राज्यों और विशेषज्ञों ने देशव्यापी लॉक डाउन को 14 अप्रैल के बाद बढ़ाने का सुझाव दिया है। हाल ही में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, द्रमुक के प्रमुख स्टालिन सहित कई नेताओं से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बातचीत कर महामारी को रोकने के लिए सरकार के प्रयासों की जानकारी दी। देश में 24 मार्च को 21 दिनों का लॉक डाउन हुआ और उसके बाद प्रधानमंत्री की विपक्षी दलों से यह पहली बातचीत है। हालांकि प्रधानमंत्री ने इस मसले पर 2 अप्रैल को देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बातचीत की थी। प्रधानमंत्री ने हाल के दिनों में डॉक्टरों ,पत्रकारों ,विदेशों में भारतीय मिशन के राजनयिकों सहित विभिन्न पक्षकारों से बात की थी।
2 हफ्ते पहले जब अमेरिका के राष्ट्रपति ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को खोले जाने और ईस्टर तक उसके गति पकड़ने के लिए तैयार होने की उम्मीद व्यक्त की थी तो बात निहायत मूर्खतापूर्ण लगी थी। अब कुछ दिन के बाद ही ईस्टर है। लेकिन अमेरिका में इसके संक्रमण के मामले चार लाख से ऊपर हो गए हैं जिनमें 12000 लोग काल के गाल में समा गए। ऐसे में अगर ट्रंप लॉक डाउन हटाते हैं तो निहायत हृदय हीन व्यक्ति होंगे, जिन लोगों की मुसीबतों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। ट्रंप बेशक इस मामले में गलत हैं। भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तरह की बात सोच भी नहीं सकते। इंसानियत को अगर एक तरफ रख दें, मानवीयता को अगर नजर से ओझल कर दें तो हकीकत बहुत ही कठोर है। अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट जारी है और कमजोर वर्गों के स्वास्थ्य तथा उनकी जिंदगी पर इसका बहुत गंभीर असर पड़ेगा। लोगों की जान बचाने के लिए लागू किए गए निवारक उपाय के रूप में लॉक डाउन अंततः आजीविका और जिंदगी दोनों के लिए काफी भयावह होगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी नौकरशाही और कई राज्यों के राजनीतिज्ञों का भारी दबाव है कि लॉक डाउन की अवधि को और बढ़ाया जाए। यह अवधि 14 और 15 अप्रैल के दरमियानी रात को होगी अगर आंकड़ों को माने तो उस समय तक हमारे देश में संक्रमण के मामले 10,000 से ऊपर हो चुके रहेंगे। जो शायद अगले सप्ताह में दोगुने हो जाएं अतः स्पष्ट है कि लॉक डाउन को आगे बढ़ाने में फायदे ज्यादा है और बेरोजगारी की दर में उछाल से ज्यादा लाभदायक भी है सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकोनॉमी के अनुसार B 23.4% बेरोजगारी बढ़ेगी और यह शहरी क्षेत्र में 30.9% हो जाएगी। इसलिए लॉक डाउन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना होगा और इसकी मोडालिटी सरकार को तैयार करनी होगी। प्रधानमंत्री को लॉक डाउन की अवधि को बढ़ाने यह सुझाव को अक्षरश: BबB नहीं मानना चाहिए लेकिन बुरी तरह प्रभावित इलाकों को अपवाद रूप में रखा जा सकता है इस बीमारी के टीके और दवाइयां आने में डेढ़ साल 2 साल के आसपास समय लग सकता है। ऐसे में संक्रमण के मामले को रोकने के लिए लॉक डाउन सबसे बढ़िया उपाय है। लेकिन इसके बारे में जो राजनीतिक सलाह आ रही है उस पर प्रधानमंत्री को गंभीरता से विचार करना चाहिए। कई बार बीमारी के मुकाबले इलाज अधिक नुकसान देह होता है। जान बचाने के लिए रोजगार खत्म करना बिना रोजगार के जीवन भी उतना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। जिस तरह बीमारी के लिए सही प्रतिरोधक है स्वस्थ शरीर और कोविड-19 के लिए सही प्रतिरोधक है स्वस्थ अर्थव्यवस्था। बेशक प्रधानमंत्री इसे तुरंत हटाने की नहीं सोच रहे। वह इसे चरणबद्ध रूप में खत्म करने की योजना पर विचार कर रहे हैं।
Thursday, April 9, 2020
अभी जल्दी नहीं खत्म होगा लॉक डाउन
Posted by pandeyhariram at 7:43 PM 0 comments
Wednesday, April 8, 2020
मामूली दवा को लेकर असाधारण हालात
मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को लेकर एक बार दुनिया का संतुलन गड़बड़ाता नजर आ रहा है अमेरिका ने चेतावनी दी है कि अगर भारत ने यह दवा नहीं दी तो जवाबी कार्रवाई की जा सकती है। दरअसल यह बहुत पुरानी दवा है और बेहद सस्ती भी । अमेरिका में कोरोना पीड़ितों के इलाज के रूप में ट्रंप इसे देख रहे हैं वहां इस बीमारी से अब लगभग 16000 लोगों की मौत हो चुकी है और अट्ठारह लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हो गए हैं। ट्रंप ने भारत से मदद मांगी है और कथित रूप में साथ में चेतावनी भी दी है कि अगर उसे यह दवा नहीं दी गई तो वह जवाबी कार्रवाई कर सकता है। यहां यह बता देना जरूरी है कि भारत में इस दवा के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। खबर है कि भारत ने इस प्रतिबंध में आंशिक ढील का निर्णय किया है और कंपनियों को यह सुविधा मिल रही है कि वे पुराने आर्डर को भेजें। भारत में इसके निर्यात पर इसलिए रोक लगाई है कि वह चाहता है कि हम अपनी जरूरतों का आकलन कर सकें और हमारे पास पर्याप्त स्टॉक रहे। भारत में भी इसका उपयोग चुनिंदा लोगों पर किया जा रहा है। अमरीका ने पहले ही इस दवा के 2.9 करोड़ डोज का राष्ट्रीय स्टॉक तैयार कर लिया है।
वैसे अभी इस दवा के कारगर होने की पुष्टि नहीं हुई है। यूरोपियन मेडिसन एजेंसी ने कहा है कि कोरोनावायरस के इलाज में इस दवा का इस्तेमाल क्लीनिकल ट्रायल के अलावा नहीं किया जाना चाहिए। उधर विदेश मंत्रालय ने अपने एक बयान में यह भी कहा है कि मीडिया के एक वर्ग में कोरोनावायरस से जुड़ी दवाओं को लेकर गैरजरूरी विवाद पैदा किया जा रहा है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा भी है की किसी भी जिम्मेदार सरकार की तरह हमारी भी पहली प्राथमिकता अपनी आबादी के लिए दवा को जमा करना है। इस पर जो प्रतिबंध लगा था वह इसी को देखते हुए लगाया गया था। सरकार ने सभी परिस्थितियों का आकलन करने के बाद 14 दवाओं के निर्यात पर रोक लगा दी है लेकिन अभी यह रोक आंशिक तौर पर हटाई गई है।
इसमें दो बातें बहुत ही महत्वपूर्ण लग रही हैं। पहली बात कि मलेरिया की दवा को लेकर कोरोना के मामले में इतनी हाय तौबा क्यों और दूसरी बात कि मोदी सरकार ने क्या कहा है? यद्यपि जिस दिन ट्रंप और मोदी की टेलीफोन पर बातचीत हुई थी उस दिन तो अमेरिकी विदेश विभाग ने भी बयान में कहा था की वार्ता बहुत ही अच्छी हुई ।
अभी पहली बात पर आते हैं कि आखिर दवा को लेकर इतनी परेशानी क्यों? विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि कोरोनावायरस के इलाज में यह दवा कितनी प्रभावी है इसके प्रमाण नहीं हैं। कैसे अमेरिका के राष्ट्रपति ने मलेरिया में काम आने वाली दवाई का बार-बार जिक्र किया है। जबकि फेसबुक ने ब्राजील के राष्ट्रपति बोलसोनारो का एक वीडियो गलत जानकारी फैलाने की वजह से हटा दिया है। उस वीडियो में बोलसोनारो को यह कहते हुए दिखाया गया है कि यह दवा सब जगह काम कर रही है। लंबे समय से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल मलेरिया को भगाने में किया जाता था या मलेरिया का बुखार कम करने में किया जाता था। यद्यपि कुछ डॉक्टरों का कहना है यह दवा कुछ मामलों में काम कर रही है, फिलहाल इसके कारगर होने या प्रभावी होने के सबूत नहीं हैं। दूसरी ओर इस दवा का लीवर पर गंभीर साइड इफेक्ट होता है। डॉक्टरों का मानना है कि इसके लिए रेंडम क्लीनिकल ट्रायल की जरूरत है। अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन और चीन में इस दवा के 20 से ज्यादा परीक्षण चल रहे हैं। उधर यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए ) का मानना है कि कई मामलों में इसका सीमित उपयोग किया जा सकता है। यानी, एफडीए इन दवाइयों का इस्तेमाल करने की अनुमति देता है। हालांकि भारत सरकार की शोध संस्था ने इसके प्रयोग को लेकर सीमित उपयोग की इजाजत दी है।
अब आती है बात ट्रंप की चेतावनी की। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और पेरासिटामोल बहुत ही सस्ती दवाइयां हैं इसका इस्तेमाल होना चाहिए। कोविड-19 ने अक्सर थोक में बेची जाने वाली इन दवाइयों को दुनिया के लिए मूल्यवान वस्तु बना दिया। अब राष्ट्राध्यक्ष इसके लिए फोन कर रहे हैं तो यह भारत के लिए बेहतरीन अवसर है। वैसे पेरासिटामोल का कच्चा माल चीन से आता है, सच कहें तो वुहान से। साठ के दशक में जो अमेरिका विरोध था भारत में वह आज नहीं है। लेकिन आज भी कुछ लोग कहते चल रहे हैं कि अमेरिका ने इस दवा को मांगा है। हमें उन्हें मना करना चाहिए । यही कारण है की विचार शुन्य विरोध हमारा सबसे टिकाऊ पाखंड है। 6 मार्च कि शाम को जब ट्रंप ने मोदी से दोबारा बातचीत की और बाद में प्रेस को बताया की भारत ऐसा नहीं करेगा क्योंकि भारत और अमेरिका के बीच परस्पर संबंध अच्छे हैं बाद में उन्होंने जोड़ा की भारत अगर इंकार करेगा तो बेशक प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की जा सकती है, क्यों नहीं। जब यह बात हुई तो भारत में मंगलवार को सुबह 4:00 बज रहे थे। कुछ अमेरिका विरोधी लोग नींद से जागे और कहने लगे ट्रंप ने मोदी की बांह मरोड़ दी। भारत ने एक बार फिर अमेरिका के सामने घुटने टेके। मोदी ने ट्रंप से भारत की संप्रभुता का सौदा किया। लेकिन जो लोग मोदी जी को नीचा दिखाना चाहते हैं उन्होंने इस तथ्य को देखा नहीं इस दवा पर से प्रतिबंध को हटा दिया गया है और निर्यातकों को यह छूट दे दी गई है कि वे पुराने ऑर्डर की आपूर्ति करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद जिद्दी हैं लेकिन मानवता को लेकर उनमें व्यापक सहानुभूति है। जो लोग इस तरह की अफवाहें उड़ा रहे हैं उनके बारे में देशवासियों को यह सोचना होगा की वह केवल अपने देश की और सरकार की आलोचना नहीं कर रहे हैं बल्कि एक दूसरे देश की प्रशंसा भी कर रहे हैं। जबकि मोदी जी का कहना है कि "हम रहे ना रहे हमारा हिंदुस्तान रहना चाहिए।" हम हिंदुस्तान के बारे में नहीं सोचते।
Posted by pandeyhariram at 7:40 PM 0 comments
Monday, April 6, 2020
देश ने दिखाया संकल्प की शक्ति
देश ने दिखाया संकल्प की शक्ति
सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्ति: क्षमाशिखा।
अंधकारे प्रवेष्टव्ये दीपो यत्नेन वार्यताम्
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की जनता से अनुरोध किया था कि वह रविवार को रात 9:00 बजे 9 मिनट तक अपने अपने घरों की बत्तियां बुझा दें और दी,ए मोमबत्ती, टॉर्च यहां तक कि मोबाइल फोन के फ्लैशलाइट को जलाए रखें। पूरे देश ने प्रधानमंत्री किस बात का सम्मान किया। रविवार की रात 9:00 बजे सारी बत्तियां बुझा दी गयीं और सभी खिड़कियों पर दीए जलने लगे। दीयों की संख्या को अगर नजरअंदाज कर दें तो ऐसा लगता था कि यह दिवाली ही है। दिवाली से भी कुछ आगे। क्योंकि , इसका वर्तमान में स्पष्ट उद्देश्य था। कह सकते हैं कि जब पूरा विश्व डगमग कर रहा था भारत जगमग कर रहा था। यह दिवाली कुछ ऐसी थी जैसे संपूर्ण देश किसी को चुनौती दे रहा है। सभी जानते हैं की वह चुनौती कोरोना वायरस से मुकाबले के रूप में थी। पूरा देश "तमसो मा ज्योतिर्गमय" की शक्ति महसूस कर रहा था। दीपक या मोमबत्ती या प्रकाश का कोई भी स्वरूप स्वयं में एक ऊर्जा है। विज्ञान कहता है ऊर्जा का नाश नहीं हो सकता, उसका स्वरूप बदल जाता है। दीपक के प्रकाश से निकली ऊर्जा का स्वरूप अगर सूक्ष्म रूप में सामने आएगा तो वह कुछ वैसा ही होगा जैसे कोई धर्म योद्धा युद्ध भूमि में असत से उत्पन्न असुर का विनाश करने के लिए उपस्थित हुआ है और पूर्ण सृष्टि को सत की ओर जाने की प्रेरणा दे रहा है , "आसतो मा सद्गमय"। प्रधानमंत्री के इस आह्वान पर तरह तरह की बातें होने लगीं। कुछ लोग इसमें सियासत करने लगे। कुछ लोग इसे देश को भरमाने वाला बताने लगे। जितनी मुंह और जितने तरह की सोच उसी तरह की बातें। लेकिन इन सबसे अलग इसका एक अपना महत्त्व भी है । हमारे देश में दीपक प्रज्वलन को शुभ मानते हैं। इसीलिए किसी भी शुभ अवसर पर दीप जलाने की परंपरा है। लेकिन पूछ सकते हैं कि कोरोनावायरस से होने वाली मौतों और बीमारियों यह बीच ऐसा शुभ क्या है जिसे प्रधानमंत्री देख रहे हैं? लेकिन है! सचमुच है! पहले तो पूरे देश ने यह बता दिया की संकट की घड़ी में वह ना केवल प्रधानमंत्री के साथ है बल्कि संकट से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है । दीप केवल प्रकाश का उत्स ही नहीं है बल्कि अंधेरे से संघर्ष की शंख ध्वनि भी है।
सूर्यपुत्र हूं मैं उजाल हूं
मैं उन्नत अंगार भाल हूं
बिंदु बिंदु झरते जाना है
मुझे तिमिर पीते जाना है
बस यह लक्ष्य लिए अर्पित हूं
दीपक हूं मैं लालायित हूं
वैसे प्रधानमंत्री की बात पर सियासत से अलग होकर कुछ सोचें तो इसके स्पष्ट रूप में दो पक्ष सामने आएंगे। पहला इसका अध्यात्मिक पक्ष और दूसरा इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष। आध्यात्मिक पक्ष पर कई बातें हो सकती हैं बहस हो सकती है। लंबे-लंबे व्याख्यान दिए जा सकते हैं। एक दूसरे के तर्कों को काटा जा सकता है । लेकिन मनोवैज्ञानिक पक्ष चूंकि विज्ञान से संबंद्ध है इसलिए इस पर भरोसा किया जा सकता है।
इस महामारी के कारण बेरोजगारी, आर्थिक तंगी जैसी चिंताएं लोगों को सता रही हैं और लोग मानसिक दबाव में हैं । इस माहौल में घबराहट बेचैनी अकेलापन और अवसाद एक गंभीर समस्या बन सकता है। ऐसे में अंधकार में दीपक का जलाना लोगों के भीतर संकल्प की नई ऊर्जा ,नई शक्ति की अभिव्यक्ति होगी और लोग सकारात्मकता से एक दूसरे से जुड़ जाएंगे। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार प्रकाश एक ऐसी शक्ति है जो मनुष्य के वैचारिकता को प्रभावित करती है। अतः प्रकाश "कॉग्निटिव मैप" है और "इमोशनल ड्राइवर" भी। साथ साथ यह "गेस्टालटिक डिवाइस" के रूप में भी काम करता है। जिससे मनुष्य को बाहरी सच्चाई को अपने भीतर देखने और समझने क्षमता पैदा होती है । यह एक तरह से मनुष्य के आचरण में सकारात्मक सोच को विकसित करता है। यही कारण है कि मोदी जी ने अंधेरी रात में बत्तियां बुझा कर एक चिराग जलाने की गुजारिश की। इससे यह महसूस होगा कि हम अपने पीड़ित भाइयों बहनों से पृथक नहीं हैं और ना हमें तथा हमारे प्रयास को अनदेखा किया जा रहा है। यह एक सामूहिक प्रयास था। ऐसी महामारी में समाज जब हारने लगता है तो उसमें लड़ने की क्षमता को विकसित करने के लिए साहस के संचार की आवश्यकता होती है और अगर साहस के साथ संकल्प आ गया तो फिर "पंगु चढ़े गिरीवर गहन।" रोशनी एक तरह से रक्षा कवच है और इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है जिससे इंसान के और समाज के सामूहिक सोच में निरंतरता बनी रहती है।
मोदी जी के आह्वान पर समूचा राष्ट्र उनके साथ हो गया है। इसका मतलब है कि पूरे देश को इस वायरस से मुकाबले की ना केवल इच्छा है बल्कि जिजीविषा भी और इसीलिए देश ने दीपक को जलाना सार्थक समझा।
शुभं करोति कल्याणमारोग्यं धनसंपदा ।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते ॥
Posted by pandeyhariram at 7:05 PM 0 comments
Sunday, April 5, 2020
एक और विपदा आसन्न है
जब कोविड-19 का प्रसार शुरू हुआ तो कहा गया इससे सबसे ज्यादा प्रभावित वरिष्ठ नागरिक हो रहे हैं और इसलिए उन्हें अलग रखने की जरूरत है। शोध में पाया गया कि दुनिया भर में करीब 11 लाख लोग इससे संक्रमित हुए हैं और मरने वालों की संख्या 59 हजार 131 पहुंच गई है केवल भारत में कोरोना के 2902 से ज्यादा मामले सामने आए हैं जिनमें 68 लोगों की मौत हो चुकी है। डॉक्टरों ने भी कुछ ऐसी ही राय दी थी। लेकिन अब जो शोध हुए हैं उससे निष्कर्ष प्राप्त हुआ है कि नौजवान ही सबसे ज्यादा इसके शिकार हो रहे हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययन में पाया गया है कि कोरोना वायरस से संक्रमित 14.5% युवा अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद दोबारा संक्रमित हो गए। हालांकि यह अध्ययन चीन और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने किया है इसके अनुसार 262 मामले में से 38 ऐसे पाए गए कि युवा ठीक होने के 2 सप्ताह बाद इस संक्रमण से ग्रस्त होकर दोबारा अस्पताल में आए। यह भी पाया गया है कि बच्चे इसके ज्यादा शिकार हो रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि एक बार आदमी जब इससे संक्रमित हो जाता है तो आपने भीतर इसके प्रतिरोध की क्षमता विकसित कर लेता है । लेकिन शोध में जिन 262 लोगों का अध्ययन किया गया और जो लोग दोबारा शिकार होकर लौटे थे उन 38 लोगों में एक व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से ऊपर थी और 7 लोगों की उम्र 14 वर्ष से कम थी। भारत की स्थिति दूसरी है । कोरोना संक्रमण को लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय के ज्वाइंट सेक्रेट्री लव अग्रवाल ने बताया कि भारत में अब तक मिले संक्रमितों में से 42 फ़ीसदी मरीजों की उम्र 21 से 40 साल के बीच है और 33% मरीज 41 से 60 के बीच के उम्र के हैं। इसके अलावा 60 वर्ष से ऊपर केवल 17% मरीज हैं और 20 साल के नीचे केवल 9% मरीज पाए गए हैं। अब तक 17 राज्यों में 1023 कोरोना के मामले तबलीगी जमात से जुड़े हुए लोगों में पाए गए हैं। इंपीरियल कॉलेज लंदन के अध्ययन के मुताबिक जिन लोगों की उम्र 80 वर्ष से ज्यादा है। उनमें कोरोना की मृत्यु दर की आशंका 10 गुना ज्यादा है। जबकि 40 वर्ष से कम उम्र वालों मैं बहुत कम है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। यहां सबसे ज्यादा संक्रमण युवाओं में देखा जा रहा है। लेकिन मैरीलैंड विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मेडिसिन की प्रोफेसर करीन कोटलोफ के अनुसार यह सिद्धांत बहुत ज्यादा निर्भर योग्य नहीं है और ना ही यह भी मानना सही है की लॉक डाउन से वायरस अनियंत्रित हो जाएगा या उसकी श्रृंखला भंग हो जाएगी। जितने भी शोध हो रहे हैं किसी के भी निष्कर्ष एक तरह से नहीं आ रहे हैं। कुछ न कुछ भिन्नता सब में है। किसको माना जाए और इस पर कदम आगे बढ़ाया जाए यह बड़ा कठिन होता जा रहा है। लेकिन पूरी दुनिया इस बात को स्वीकार करती है कि यदि इसके प्रसार से पहले संवाद स्पष्ट होता तो इस पर नियंत्रण हो सकता था लेकिन संवाद हीनता या उसकी अस्पष्टता ने स्थिति को खराब कर दिया। जहां तक भारत का सवाल है अगर कुछ ग़लतियां जैसे विदेशों से आने वाली यात्री कुप्रबंधन से सबक नहीं लिया जाना इत्यादि। कुछ लोग इसके लिए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोषी बताते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। दोष उनमें ना होकर संपूर्ण तंत्र में है और हमारे देश की जनता की आदतों में है। विदेशों से इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी लौटते हैं लेकिन उनकी स्क्रीनिंग में लापरवाही बरती गई। 18 जनवरी 2020 से हवाई अड्डों पर यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू हुई थी और तब से लेकर 23 मार्च 2020 तक कुल 15 लाख लोग भारत आए और इन से जुड़ी जानकारियां आपस में साझा नहीं की गई। ना इनकी ठीक से निगरानी हो सकी जिससे वायरस का प्रसार हो गया। जब चीन में इसका संक्रमण बड़ा तो दुनिया के कई देशों में मास्क और वेंटिलेटर का भंडारण शुरू हो गया। उन्होंने अपने अस्पतालों को इसके लिए दुरुस्त करना शुरू कर दिया। लेकिन भारत के स्वास्थ्य अधिकारी बहुत देर से जागे और उन्होंने न जाने कैसे यह मान लिया कि हवाई अड्डे पर स्क्रीनिंग करने से ही सब कुछ हो जाएगा। भारत में आबादी का घनत्व बहुत ज्यादा है और इसके साथ ही पोषण व्यवस्था भी सही नहीं है। ऐसे में अगर सावधानी नहीं बरती गई तो इसमें सरकार दोषी नहीं है। हमारे यहां लापरवाही की स्थिति यह है कि कई जगहों पर डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मी संक्रमित हो रहे हैं और अस्पताल जाने से डर रहे है। यही नहीं है संवादों में भी स्पष्टता दिखाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने। जिस दिन जनता कर्फ्यू की घोषणा की उस दिन से सरकार की बातों में स्पष्टता दिखने लगी और लोगों के मन से भ्रम दूर होने लगा। इसके बावजूद लोग अफवाह फैलाते रहे कि आवश्यक सामग्री नहीं मिलेगी। परिणाम यह हुआ की लोगों में आतंकवश खरीदने की होड़ लग गई । सड़कों पर भीड़ उमड़ पड़ी और एक खास किस्म की अव्यवस्था दिखाई पड़ने लगी। बड़ी मुश्किल से इसे संभाला गया। लेकिन इससे संक्रमण बढ़ता गया। सरकार की तरफ से साफ-साफ बताया गया कि किसी भी आवश्यक वस्तु का अभाव नहीं होगा तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
लेकिन यहां यह गौर करने की चीज है कि इस कोरोनावायरस के प्रकोप के खत्म होते ही बड़ी संख्या में हमारे देश में लोगों की मौत हो सकती है। क्योंकि कोरोना केंद्रित उपचार में सब लगे हैं। लॉक डाउन है और इस दौरान देशभर के अधिकतर लैब और क्लीनिक बंद होने के कारण मधुमेह तथा दिल इत्यादि के मरीजों को बहुत बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। डॉक्टरों को डर है कि आने वाले दिनों में कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों की मौतों की तुलना में गैर कोरोना वाले रोगियों की मौत ज्यादा हो सकती है। हमारे देश में लगभग रोज एक करोड़ से अधिक रोगी अपने इलाज के लिए डॉक्टरों या उनके क्लिनिक्स में जाते हैं। वे मधुमेह, ब्लड प्रेशर या दिल के मरीज तथा अन्य बीमारियों से ग्रस्त होते हैं। उन्हें तरह-तरह की जांच की जरूरत होती है। जो इस समय प्राथमिकता का विषय नहीं है। लॉक डाउन के कारण तीन चौथाई से ज्यादा लैब और क्लीनिक बंद हैं इस बंदी का प्रभाव भी पड़ना सुनिश्चित है।
Posted by pandeyhariram at 7:22 PM 0 comments
Friday, April 3, 2020
उत्साहो बलवानार्य
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार की सुबह राष्ट्र को एक बार फिर संबोधित किया। संबोधन से पहले लोगों के मन में तरह-तरह की आशंकाएं पैदा हो रही थीं, क्या होगा, क्या नहीं होगा? क्या नई घोषणा होगी? लेकिन प्रधानमंत्री ने जो कहा उससे प्रत्येक देशवासी के भीतर ना केवल उम्मीद बढ़ी बल्कि उनमें साहस और संकल्प की क्षमता भी बढ़ गई। जहां आशंका थी लॉकडाउन की अवधि और बढ़ेगी या फिर आंतरिक आपात स्थिति की घोषणा होगी या कोई और नई पाबंदी लागू होगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और प्रधानमंत्री हैं जो कुछ कहा उससे देश के 130 करोड़ लोगों में सामूहिक शक्ति और सामूहिकता का संकल्प पैदा हुआ। रामनवमी के दूसरे दिन और शक्ति पूजा के आखिरी दिन प्रधानमंत्री ने जो शक्ति की परिभाषा बताई वह अतुलनीय थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह लॉक डाउन की अवधि जरूर है, हम सब अपने अपने घरों में बंद हैं ,लेकिन हम में से कोई भी अकेला नहीं है। "130 करोड़ देशवासियों की सामूहिक शक्ति सबके साथ है और समय-समय पर इसकी भव्यता और इसकी दिव्यता का अनुभव करना आवश्यक है।" सचमुच जब देश इतनी बड़ी लड़ाई लड़ रहा है ,इतने बड़े युद्ध मैं शामिल है तो ऐसे में जनता जनार्दन के विराट स्वरूप का दर्शन करते रहना चाहिए। इससे आत्मशक्ति पैदा होती है। इससे लगता है कि हमारे साथ पूरा देश है पूरा राष्ट्र है। हम पराजित नहीं हो सकते। इस कोरोना नामक जंजीर से हमें, हमारे उत्साह ,हमारे संकल्प को बांधा नहीं जा सकता। ऐसे में महाकवि दिनकर की एक पंक्ति याद आती है- जब जनार्दन को बांधने दुर्योधन चला था तो उन्होंने अपना विराट रूप दिखाया था और जनार्दन ने कहा था:
यह देख जगत मुझ में लय है
यह देख पवन मुझमें लय है
बांधने मुझे तो आया है
जंजीर बड़ी क्या लाया है
सचमुच जिसे अहिर की छोहरियां छछिया भर छाछ पर नाच नचाती थीं उसने बता दिया कि राजसी शक्ति नगण्य है, आत्मबल और संकल्प ही सर्वोपरि है सर्वशक्तिमान है । मोदी जी ने इसी संदर्भ का सूत्र पकड़ते हुए देश के 130 करोड़ लोगों को शक्ति संपन्न बनने का एक सूत्र बताया कि सब एकजुट होकर जनता से जनार्दन बन जाएं। कोरोनावायरस को हमारी शक्ति इंकार कर देगी। उसका महत्व हमारी एकजुटता के आगे कुछ नहीं है। उन्होंने देशवासियों का साहस बढ़ाते हुए कहा कि "करोना से त्रस्त जो हमारे गरीब भाई बहन हैं उन्हें निराशा के अंधियारे से निरंतर प्रकाश की ओर जाना है।" कोरोना से जो निराशा का अंधकार उत्पन्न हुआ है उससे निकलने की राह यह है कि उनके भीतर की निराशा को समाप्त कर दिया जाय और इसका एक मात्र उपाय है कि उन्हें यह महसूस हो कि इस दुख में हम अकेले नहीं हैं। हमारे साथ हमारे देश के करोड़ों भाई बहन हैं। प्रधानमंत्री ने देश की जनता से अपील की -" पांच अप्रैल रविवार को रात 9:00 बजे सब लोग अपने घरों की बत्तियां बुझा दें और अपने घरों के दरवाजे पर, बालकनी में या टेरेस पर खड़े होकर एक मोमबत्ती या दीपक या टॉर्च और कुछ ना हो तो मोबाइल की बत्ती 9 मिनट तक जलाए रखें। आलोचक यह पूछ सकते हैं कि फिर इससे क्या होगा? यह उपचार है क्या? किसी भी भयंकर स्थिति से मुकाबले के लिए चाहे वह बीमारी हो, चाहे वह युद्ध सबके मन में एक संकल्प होना चाहिए और एकजुटता का आत्मबल होना चाहिए । संकल्प से उम्मीद जागती है और आत्मबल से उत्साह में वृद्धि होती है और मुकाबले की शक्ति बढ़ती है:
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्। सोत्साहस्य च लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥
इससे यह भी स्पष्ट होता है हम सब एक ही लक्ष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं और वह लक्ष्य कोरोना के अंधकार को मिटाकर स्वास्थ्य का प्रकाश फैलाना है। प्रधानमंत्री ने इस अपील से पैदा होने वाले एक प्रश्न का पहले ही जवाब दे दिया कि "चिराग जलाते समय सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें । सबको कहीं भी एकत्र नहीं होना है। इसके बाद कुछ देर बैठ कर देश के पीड़ित भाई बहनों के चेहरे को याद करें और फिर कोरोना के अंधकार को दूर करने के लिए प्रकाश की ओर चल पड़ें । महाभारत के युद्ध में अर्जुन निराश हो गए थे तो कृष्ण उन्हें उत्साहित किया था।
तस्मादुतिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः
आज फिर कोरोना से भयभीत जनता को अपने भीतर संकल्प की शक्ति भरकर इससे मुकाबले के लिए तैयार हो जाना चाहिए।
Posted by pandeyhariram at 7:03 PM 0 comments
Thursday, April 2, 2020
लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में 21 दिन के लॉक डाउन का प्रस्ताव रखा। उसका अंदाज कुछ ऐसा था जैसे आदेश दिया गया हो और संपूर्ण देश ने उस आदेश को स्वीकार किया। सबको अपने जान की चिंता रहती है और उसी चिंता के तहत लोगों ने संपूर्ण लॉक डाउन को स्वीकार कर लिया। यद्यपि सरकार ने इस अवधि में जरूरी सामानों को मुहैया कराने व्यवस्था की थी। एक सीमा के तहत लगभग सभी जरूरी सामान उपलब्ध हो रहे हैं। बस आवागमन और परिवहन सुविधाएं मुल्तवी कर दी गयीं हैं।
कुछ लोग इसे सरकार का अदूरदर्शिता पूर्ण कदम मान रहे हैं। क्योंकि, 21 दिन की बंदी से देश का मेडिकल ढांचा नहीं सुधर सकता है और जब मेडिकल ढांचा नहीं सुधरेगा तो फिर कैसे इस महामारी का मुकाबला किया जा सकेगा। ऊपर ऊपर सुनने में यह बात तार्किक लग रही है लेकिन एक तरह से इसमें प्रश्न ज्यादा हैं। ऐसे लोगों को संवाद की मर्यादाओं का ख्याल रखना चाहिए। यह ठीक वैसे ही है जैसे तबलीगी जमात के कुछ लोग पकड़े गए और उनके पक्ष में भी कुछ लोग तर्क दिए जा रहे हैं।
बेशक हमारे देश का मेडिकल ढांचा आबादी की तुलना में अपर्याप्त है और ऐसे में देश की जनता के जीवन की रक्षा के लिए जो संभावित और सरलतम उपाय है वह सरकार ने किया। क्योंकि ऐसे समय में स्वास्थ्य के लिए मेडिकल उपाय करने के बदले अस्वस्थता रोकने के गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए। उपचार से रोकथाम ज्यादा मुफीद है। भारत के स्वास्थ्य ढांचे को देखते हुए अगर 130 करोड़ की आबादी तक पहुंचने के प्रयास किए जाएं तो पूरा का पूरा ढांचा और सिस्टम चरमरा कर टूट जाएगा। कुछ विशेषज्ञों का कहना है की 21 दिन में ठीक हो जाने की क्या गारंटी है? टीके की अनुपलब्धता के बरअक्स इस तरह लॉक डाउन सचमुच चुनौतीपूर्ण होगा। लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है यह उम्मीद से कहीं ज्यादा सफल हो। क्योंकि जो लोग इसे गलत बोल रहे हैं उन्हें भी इस बात का कोई इल्म नहीं है कि आगे क्या होगा? सारी चीजें अनुमानों और आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर हो रही हैं।
भारत में स्वास्थ्य पर व्यय जीडीपी के 3.7% है जिसमें लगभग एक चौथाई भाग ही सरकारी व्यय का है। यह निम्न आय वर्ग वाले देशों के औसत 5.4% से काफी कम है। आंकड़े बताते हैं भारत में मरने वालों में बड़ी संख्या नौजवानों की है। यही कारण है कि विकास के बावजूद हमारे देश में जीवन की प्रत्याशा कम है । कुछ लोगों का कहना है अपने देश में वायु प्रदूषण ,डायरिया, टीबी, सड़क दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या में लोग मारे जाते हैं। यह सोच नकारात्मक है। विभिन्न स्थितियों में मारे जाने वाले लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण महामारी के आंकड़ों के साथ देखें इससे ज्यादा गलत कुछ नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री ने 21 दिन की बंदी घोषित कर कम से कम महामारी के प्रसार को अवरुद्ध तो कर दिया है। इस तरह की किसी भी महामारी के प्रसार में कई तरह के कारक तत्व होते हैं। जिनमें सबसे ज्यादा खतरनाक आपस में मिलना जुलना ही होता है। भारत जैसे आबादी के घनत्व वाले देश में जहां वर्जनाओं की अवहेलना करना आदत के साथ-साथ मजबूरी भी है वहां आपस में मिलना जुलना रोकने का लॉक डाउन ही सबसे सरल तरीका है। लॉक डाउन के माध्यम से निवारण और इलाज के प्रयासों से जुड़े नीतिगत बदलाव के जरिए मौत की संख्या कम की जा सकती है। मौत के आंकड़े अक्सर जाति ,वर्ग ,क्षेत्र और लिंग के अनुसार बदलते हैं और कोरोना वायरस के साथ भी कुछ ऐसा ही है। सार्वजनिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के उद्देश्य और उसके कार्यान्वयन के बीच एक बड़ा फासला होता है। इनमें बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी होता है। कुछ लोगों का कहना है कि अचानक बंदी के कारण काम धंधे बंद हो गए और लोग अपने अपने घरों से भागने लगे। इसलिए इसलिए जरूरी है कि पलायन करने वाले उन मजदूरों को खाना, कपड़ा और विश्राम की जगह मुहैया कराई जाय। यहां यह गौर करने वाली बात है कि महामारी पर उठ रहे सवाल केवल सवाल नहीं है खुद में जवाब भी हैं । वह सवाल है कि अगर इलाज का ढांचा पर्याप्त नहीं है तो क्या हो? महामारी एक दुर्लभ घटना है और इसमें सरकार से बहुत उम्मीद की जाती है ,लेकिन उन उम्मीदों को पूरे किए जाने के उपाय भी बताना जरूरी है और लोकतंत्र में तो सबसे ज्यादा जरूरी है। इसलिए ऐसे कठिन समय में सरकार की आलोचना कर उसे हतोत्साहित करने के बजाय उपाय बता कर उत्साहित करना चाहिए। मोदी जी का यह कदम सीमित साधनों वाले देश भारत में कारगर साबित हो रहा है।
Posted by pandeyhariram at 6:03 PM 0 comments
Wednesday, April 1, 2020
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः
आज रामनवमी है। भगवान श्री राम का जन्मदिन और आज ही कोलकाता के सर्वप्रिय समाचार पत्र सन्मार्ग का स्थापना दिवस भी है। बड़ा अजीब संयोग है कि सन्मार्ग की स्थापना उसी दिन हुई थी जिस दिन पुरुषोत्तम राम का आविर्भाव इस धरा पर हुआ था। जिनके बारे में सदियों बाद द्वापर में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।।
इसी दिन हमारे मनीषियों ने सन्मार्ग की स्थापना भी की थी। आपने सोचा है कि सन्मार्ग क्या है? एक भौतिक अस्तित्व से अलग एक सूक्ष्म और अध्यात्मिक अस्तित्व भी इसमें लिपटा हुआ है। वह अस्तित्व भी ब्रह्मांड की तरह 3 डायमेंशन वाला है। पहला डायमेंशन खुद में इसका नाम है। यह जानना भी बड़ा दिलचस्प होगा के राम और सन्मार्ग की व्याख्या लगभग समान है। डॉक्टर मंगल त्रिपाठी अपने विष्णु सहस्त्रनाम में लिखा है कि राम विष्णु के 394 वें अवतार हैं और मार्ग स्वयं 397वां अवतार है। जो कि सत्य के संधान की ओर मनुष्य को प्रवृत्त करता है।हमारे मनीषियों ने पुरुषोत्तम को मार्ग से आबद्ध किया और उस मार्ग को सत से आवेशित कर दिया और इसीलिए सन्मार्ग का शिरो वाक्य बना "नमोस्तु रामाय सलक्ष्मणाय .... ।"यहां यह भी गौर करने की बात है की यह सत वह सत्य नहीं है। क्योंकि सत्य एक अवस्था है जो देशकाल और स्थिति के अनुसार परिवर्तित होता है। मसलन पानी बर्फ और भाप तीनों सत्य हैं।तीनों का अपना अस्तित्व है। तीनों के अपने गुणधर्म हैं। जबकि उसका मूलभूत तत्व हर स्थिति में एक ही होता है ,वही सत है । सन्मार्ग शब्द का अर्थ उसी सत के साथ विष्णु का संयोग है। जो खुद में सत है। इसका दूसरा डायमेंशन है कर्म। यह भी गौर करने वाली बात है कि सन्मार्ग की स्थापना करने वाले हमारे मनीषियों ने कर्म तत्व को नहीं अपनाया, क्योंकि गीता में जिस कर्म की व्याख्या की गई है वह अभिव्यक्ति में अनासक्ति है। सिर्फ प्रयास है, उपलब्धि नहीं है। इसीलिए हमारे पूर्वजों ने "हनुमत प्रयास" के मंत्र को अपनाया। इस मंत्र में जिजीविषा है लक्ष्य है और भगवती सीता का संधान है। इस का तीसरा डायमेंशन है "सन्मार्ग एव सर्वत्र पूज्यते.....।" मर्यादा के भी यही तीन डायमेंशन हैं और इसी 3 डाइमेंशंस के बीच में पुरुषोत्तम की उत्पत्ति हुई।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपिचो
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः
राम भारतीय अस्मिता और संस्कृति के प्रतीक पुरुष हैं। इसलिए सन्मार्ग की स्थापना के लिए राम जन्म के पवित्र दिवस का चयन किया गया। आज भी सन्मार्ग अपने उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयासरत रहता है। कुछ लोग हमसे पूछते हैं कि कलकत्ता ही क्यों और संस्कृति को बचाना ही क्या जरूरी है। आजादी के बाद हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था दूषित हो गई। यह स्वयं में भयावह दुर्घटना है। इसके साथ एक और प्रश्न है कि कलकत्ता ही क्यों? गंगोत्री से चलकर कल्लोलिनी गंगा कोलकाता से कुछ दूर सागर में समा जाती है और यही उसका उद्देश्य भी खत्म हो जाता है या नहीं भगीरथ ने जिस उद्देश्य के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तपस्या की थी वह उद्देश्य पूरा हो गया सगर पुत्रों को मुक्ति मिल गई इसीलिए हमारी व्यथित संस्कृति और सभ्यता को एक दिशा देने के लिए कोलकाता में सन्मार्ग की स्थापना की गई।
ऊपर कहा गया है की स्वतंत्रता के बाद जो हमारी स्थिति हुई वह स्वयं में एक दुर्घटना है संस्कृति को धर्म संस्थानों से जोड़ दिया गया और हमें आत्म रिक्त होने पर मजबूर कर दिया गया। यह आत्मरिक्तता कुछ ऐसी थी कि हम अपने आदर्शों से गिरने लगे। सन्मार्ग ने सदा यह बताने की कोशिश की है कि अर्थों के भ्रम में नहीं रहना है देवी देवताओं के विभिन्न स्वरूपों के बावजूद सत एक ही है, जो एक भारतीय के "आत्मन" में रहता है ना कि संस्थानों में । इसका बड़ा ही रोचक उदाहरण हमारे पुराणों में मिलता है। ब्रज की गलियां छोड़कर जब कृष्ण द्वारका चले गए और लौट कर आए तो गोपियों ने उन्हें द्वारकाधीश कह कर पुकारा । यह संबोधन भगवान कृष्ण को उचित नहीं लगा उन्होंने इस पर आपत्ति की तो गोपियों ने कहा कि अब तुम वह नहीं रहे जिन्होंने महज एक गेंद के लिए गोवर्धन उठा लिया था। तुम तो वह कृष्ण हो गए जिसने अपनी आंख के सामने अपनी सेना को मरवा दिया। यह स्पष्ट करता है कि आज भी एक भारतीय का धर्म उसके भीतर होता है, संस्थानों में नहीं। जब तक एक भारतीय की संस्कृति और धर्म संप्रदाय एक दूसरे से प्रेरणा पाते रहे तब तक सब ठीक था जैसे ही प्रेरणा का स्रोत अवरुद्ध हुआ और भारतीयता पर आघात लगा तो विभाजन हो गया। इसका यह एक भौतिक सबूत है । भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जिसकी राष्ट्रीय अस्मिता विनाश से नहीं अपनी सभ्यता के विभिन्न चरित्रों से गढ़ी गई है। पिछले 75 वर्षों से सन्मार्ग इसी परंपरा को कायम रखकर सत की ओर जाने वाले मार्ग पर चल रहा है। हमारे मनीषियों ने 75 वर्ष पहले जिस दीपशिखा को प्रज्वलित किया था उसमें हमारे पाठकों विज्ञापन दाताओं और हितैषी जनों का "नेह" मिलता रहा है और यह दीपशिखा प्रज्वलित है। इस दीपक को प्रकाश मांग करने में उनकी भूमिका के लिए अत्यंत आभारी हैं।
Posted by pandeyhariram at 7:27 PM 0 comments