CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Monday, November 8, 2010

दीवाली के प्रकाश पर्व पर


दीवाली प्रकाश का पर्व है। आज के दिन लक्ष्मी जी की आराधना खुलकर की जाती है। वैसे तो लक्ष्मी का हर कोई भक्त है पर बाकी दिन आदमी अपने आपको नि:स्वार्थ और परोपकार में लीन रहने का दिखावा करता है। अवसर मिले तो आध्यात्मिक ज्ञान का भी प्रदर्शन करता है और कहता है कि.. धन ही सभी कुछ नहीं है।.. इससे भी आगे कुछ लोग जो सरस्वती के भक्त होने का भी प्रतिदिन प्रदर्शन करते हैं पर उन सभी को भी..लक्ष्मी जी.. के प्रति भक्ति का प्रदर्शन करते हुए संकोच नहीं होता। लक्ष्मी जी की आराधना और बाह्य प्रकाश में व्यस्त समाज में बहुत लोग ऐसे भी हैं जो अंधेरों में आज भी रहेंगे और उनके लिये दीपावली एक औपचारिकता भर है। जिनके पास लक्ष्मी जी की कृपा अधिक नहीं है - याद रखें लक्ष्मी जी की थोड़ी कृपा तो सभी पर होती है वरना आदमी जिंदा नहीं रह सकता - वह बाह्य प्रकाश करने के साथ उनकी आराधना ऊंची आवाज में करेंगे। लक्ष्मी के साथ जिनपर सरस्वती की भी थोड़ी कृपा है- जिन पर उनकी अधिक कृपा होती है लक्ष्मी जी उनसे दूर ही रहती हैं, ऐसा भी कहा जाता है - वह भी अनेक प्रकार के ज्ञान की बात करेंगे। बाह्य प्रकाश में लिप्त लोगों को आंतरिक प्रकाश की चिंता नहीं रहती जो कि एक अनिवार्य शर्त है जीवन प्रसन्नता से गुजारने की।

दीवाली पर्व से जुड़े भौतिक तत्वों के उपयोग में परंपरागत शैली अब नहीं रही। वैसे तो सारे पर्व ही बाजार से प्रभावित हो रहे हैं पर दीवाली तो शुद्ध रूप से धन के साथ जुड़ा है इसलिये आधुनिक बाजार को उसे अपहृत करने में देर नहीं लगी। अपने देश ही के नहीं बल्कि विदेशी बाजार को भी इससे लाभ हुआ है। सबसे अधिक चीन के बाजार को इसका लाभ मिला है। वहां के बने हुए सामान इस समय जितना बिकते हैं उतना शायद कभी नहीं उनका व्यापार होता। बधाई संदेशों के लिये टेलीफोन पर बातें हुईं या एस.एम.एस. संदेश भेजे गये, जिससे संबद्ध कंपनियों को अच्छी कमाई हुई।
इसके बावजूद दीपावली केवल भौतिकता का त्यौहार नहीं है। एक दिन के बाह्यï प्रकाश से मन और विचारों में छाया हुआ अंधेरा दूर नहीं हो सकता। लक्ष्मी जी तो चंचला हैं चाहे जहां चली जाती हैं और निकल आती हैं। सरस्वती की पूर्ण कृपा होने पर लक्ष्मीजी की अल्प सुविधा से काम चल सकता है पर लक्ष्मी जी की अधिकता के बावजूद अगर सरस्वती की बिल्कुल नहीं या बहुत कम कृपा है तो आदमी जीवन में हमेशा ही सब कुछ होते हुए भी कष्ट सहता है। तेल या घी के दीपक जलाने से बाहरी अंधेरा दूर हो सकता है पर मन का अंधेरा केवल ज्ञान से ही दूर करना संभव है। हमारे देश के पास धन अब प्रचुर मात्रा में है पर आप देख रहे हैं कि वह किसके पास जा रहा है? हमसे धन कमाने वाले हमें ही आंखें दिखा रहे हैं। चीन इसका एक उदाहरण है। इसका सीधा मतलब यह है कि धन सभी कुछ नहीं होता बल्कि उसके साथ साहस, तर्कशक्ति और मानसिक दृढ़ता और देश के नागरिकों में आपसी विश्वास भी होना चाहिए। दीपावली के अवसर एक दूसरे को बधाइयां देते लोगों का यह समूह वास्तव में दृढ़ है या खीरे की तरह अंदर से दो फांक है? यह भी देखना चाहिये। अपने अहंकार में लगे लोग केवल इस अवसर पर अपने धन, बाहुबल, पद बल या कुल बल दिखाने में लग जाते हैं। आत्मप्रदर्शन के चलते कोई आत्म मंथन करना नहीं चाहता। नतीजा यह है कि अंदर अज्ञान का अंधेरा बढ़ता जाता है और उतना ही मन बाहर प्रकाश देखने के लिये आतुर होता है। यह आतुरता हमें धनलोलुप समुदाय का गुलाम बना रही है। स्वतंत्र विचार का सर्वथा अभाव है। देश विकास कर रहा है फिर भी अशांति है।

लोग यह समझ रहे हैं कि लक्ष्मी अपने घर में स्थायी है। समाज में गरीबों, मजबूरों और परिश्रमी समुदाय के प्रति उपेक्षा का भाव जिस विद्रोह की आग को हवा दे रहा है उसे बाहरी प्रकाश में नहीं देखा जा सकता है। उसके लिये जरूरी है कि हमारे मन में कामनाओं के साथ ज्ञान का भी वास हो ताकि अपनी संवेदना से हम दूसरों का दर्द पढ़ सकें। मनुष्य योनि का यह लाभ है कि उसमें अन्य जीवों से अधिक विचार करने की शक्ति है पर इसके साथ यह भी जिम्मेदारी है कि वह प्रकृति और अन्य जीवों की स्थिति पर विचार करते हुए अपना जीवन गुजारे। अंतर्मुखी हो पर आत्ममुग्ध न हो। यह आत्ममुग्धता उसी अंधेरे में रहती है जो आदमी अपने अंदर पालता है। इस अंधेरे से लडऩे की ताकत आध्यात्मिक ज्ञान के दीपक में ही है और इसे इस अवसर पर जलाना है।

ओबामा बस मेहमान हैं


ओबामा का यह मानना है कि भारत हमेशा पाकिस्तान का भला चाहेगा, क्योंकि पाकिस्तान की कामयाबी में भारत का हित छुपा है। मुंबई में स्टूडेंट्स के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने माना कि पाकिस्तान अमरीका के लिए काफी अहमियत रखता है। हालांकि वहां आतंकी समूह सक्रिय हैं और खुद पाकिस्तान सरकार भी यह बात जानती है। उन्होंने कहा कि हम सिर्फ मजबूत, शांतिपूर्ण और स्थिर पाकिस्तान चाहते हैं। उन्होंने कहा कि एक समृद्ध, शांतिपूर्ण और स्थिर पाकिस्तान सुनिश्चित करने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी किसी देश की हो सकती है तो वह है भारत। अगर पाकिस्तान अस्थिर है तो उसका नुकसान भारत को झेलना होता है। कश्मीर की सरहद पर असंतोष की आग भड़काना पाकिस्तान की नीति रही है, लेकिन उकसावा एक ऐसा खेल है, जो बहुत जल्द नियंत्रण के बाहर जा सकता है। खासतौर पर तब, जब आतंकवाद भी इसी खेल का हिस्सा हो लेकिन पाकिस्तान ने कई कारणों से अस्थिरता में ही अपना हित खोज निकाला है। भारत के लिए सुरक्षा का मतलब है, हिमालय के समूचे इलाके में अमन और चैन, जिसमें हिंदुकुश के पहाड़ों से लेकर अरुणाचल प्रदेश की निचली पहाडिय़ां भी शामिल हैं। यदि अमरीका को लगता है कि भारत के साथ किसी भी तरह का संबंध महत्वपूर्ण है तो उसे भारतीय हितों के साथ अपनी रणनीतियों का मेल करना होगा।
ओबामा भारत के दौरे पर आये हैं। उनकी यात्रा से किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं है। मुंबई में एक दिन बिताने के पीछे ओबामा का मकसद यह नहीं है कि विद्यार्थियों से गपशप की जाए। उनका मकसद था निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ तगड़ी डील साइन करना। इस अवसर पर उतारी जाने वाली तस्वीरें अमरीका में सबूत के तौर पर दिखाई जाएंगी कि देखिए हमारे राष्ट्रपति मुंबई की होटल ताज में अपना फर्ज निभा रहे हैं, आगरा में मिशेल ओबामा के साथ ताजमहल के सामने फोटोग्राफरों के लिए पोज नहीं दे रहे हैं।
भारतीय स्वभाव से ही भावुक होते हैं और यह उनके अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी नजर आता है। हम या तो बहुत उतावले हो जाते हैं या बहुत ठंडे पड़ जाते हैं, लेकिन हमें शांत रहने का महत्व नहीं पता। भारत और अमरीका दोनों को ही एक - दूसरे की जरूरत है, लेकिन भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का शुक्रिया अदा करें कि अमरीका को आज भारत की ज्यादा जरूरत है। यहां एक बात गौर करने की है कि भारत के लिए अहम मुद्दों पर अमरीका शिखर यात्रा के उपलक्ष्य में अपने घोषित रुख बदलेगा, ऐसी उम्मीद न पहले थी, न अब है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का सवाल हो या आतंक विरोधी लड़ाई में पाकिस्तान के साथ अमरीका की कुटिल मित्रता का, वह सचाई तभी स्वीकार करेगा, जब खुद उसके हितों पर चोट पड़ेगी। चुनाव प्रचार में ओबामा भारत का हौआ खड़ा करते रहे हैं।
आउटसोर्सिग के नाम पर हमारी सॉफ्टवेयर कंपनियों के लिए वीजा की मुश्किलें भी पैदा की गयीं। पराजय के बाद कोई कारण नहीं कि वह भारत के खिलाफ यह संरक्षणवादी रवैया बदलेंगे। इसलिए महाशक्ति मेहमान का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए हमें भूलना नहीं चाहिए कि भारत सिर्फ अपनी ताकत के बूते आगे बढ़ सकता है। अब हमारे पास एक विशाल और उभरते बाजार की ताकत भी है, जिसकी भाषा अमरीकी राष्ट्रपति सबसे बेहतर समझते हैं।

Wednesday, November 3, 2010

स्वागतम् बराक ओबामा


प्रकाश पर्व के इस अवसर पर आपका स्वागत है, ओबामा साहब।
भारत-अमरीका के अपने सम्बंधों के ताने बाने में कई कमजोर रेशों और काले धब्बों के बावजूद आपके स्वागत में लाल कालीन की दोनों तरफ सुनहरे दिये जलाने में कोई प्रयास बाकी नहीं रखेगा। बेशक भारत और अमरीका के नजरिये में कई अंतरराष्ट्रीय मसलों पर भारी मतभेद हैं, खासकर हमारे निकटतम पड़ोसी को लेकर। यह कहना सही नहीं है कि हम दोनों एक ही नाव पर सवार हैं, जैसा कि अक्सर अमरीकी विदेश विभाग द्वारा कहा जाता है, इसके विपरीत हम इतिहास और अपने समय की धारा में एक ही दिशा में बह रहे हैं। हम एक स्थायी राष्ट्र हैं और लोकतंत्र पर भरोसा ही नहीं करते बल्कि उसकी राह पर दृढ़तापूर्वक चल भी रहे हैं। भारत को जल्दी आजादी दिलाने में अमरीका की भूमिका हम भूले नहीं हैं। जाहिर है कि आतंकवाद, भारत और पाकिस्तान में जिहादी सक्रियता और वैश्विक इस्लामी कट्टरपंथ पर दोनों देशों में वार्ता होगी। दुनिया में अमन के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में इससे लोहा लेना अमरीका की जिम्मेदारी है और भारत इस जंग में उसका समर्थन करता है।
शीतयुद्ध की समाप्ति और भारत के अमरीका की ओर स्पष्ट झुकाव के बावजूद वाशिंगटन ने कभी भी निर्गुट आंदोलन का समर्थन नहीं किया, उल्टे इसे तीसरी दुनिया के देशों का कम्युनिस्ट मोर्चा कहता आया है। हालांकि यह बात अभी सब नहीं जानते कि अमरीकी नीति में भारत की वैश्विक सामरिक विचारों को अमरीका के लिये हितकारी नहीं माना जाता है। इससे लगता है कि अमरीका में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की चौंधराहट का दंभ अभी भी कायम है। ओबामा साहब कृपया अमरीका को इस मनोस्थिति से निकलने में मदद करें।
1980 के दशक में अमरीका ने आतंकवाद से मुकाबले के लिये भारत को अपनी ताकत बढ़ाने सहायता की शुरूआत की। उस समय खुफिया-सुरक्षा एजेंसियों को बंधक समस्या से निपटने में विशेष दक्ष बनाने के लिये अमरीका बुलाया गया था। उसके बाद सन् 2001 में साइबर सुरक्षा और महाविनाश के हथियारों से लैस आतंकियों से निपटने की विशेष ट्रेनिंग दी गयी। कहने को तो कह दिया गया कि आतंकवाद से मुकाबले के लिये भारत और अमरीका में खुफिया सूचनाओं की लेन देन शुरू हो गयी है पर यह सहयोग अत्यंत असंतोषजनक है। 26/11 के पहले शायद ही अमरीका ने भारत को कोई काम की सूचना दी हो। मुम्बई हमले की खबर तो उसके पास पहले से ही थी पर वह चुप रहा और हमारे देश में सैकड़ों लोग मारे गये। अमरीका-पाकिस्तान जैसे दानव को पाल रहा है और कहता है कि वह आतंकवाद से जंग में साथी है। अमरीका की इस बात पर हंसी आती है।
इसे छोटी मुंह बड़ी बात न समझें लेकिन बराक ओबामा की भारत यात्रा न केवल भारत, बल्कि दुनिया की राजनीति और शक्ति-समीकरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। चीन से अर्थ-युद्ध लड़ रहे ओबामा भारत से क्या चाहते हैं ? आखिर अमरीका को भारत की जरूरत क्यों है?
बराक ओबामा की भारत यात्रा के ठीक पहले यह सोचना जरूरी है कि आखिर वे कौन-सी चीजें हैं, जो हम उनकी इस यात्रा से हासिल कर लेना चाहते हैं ? हम यह लगातार देख रहे हैं कि दुनिया में शक्ति के समीकरणों में बहुत तेजी से बदलाव आ रहे हैं। अगर हम चाहते हैं कि इस बदलाव में हमारी भी हिस्सेदारी हो, तो हमें ड्राइविंग सीट पर बैठा होना चाहिए। लेकिन भारत या भारतीयों को ड्राइविंग की आदत नहीं है।
हम अक्सर सहमतियों की तलाश करते हैं, मुकाबला की स्थिति में नहीं आते। हम..ना.. नहीं कह पाते, उसकी जगह.. शायद.. कहना हमारी आदत में शुमार है। हम आगे बढ़कर शक्ति को हासिल कर लेने की बजाय शक्ति की याचना करने में ज्यादा यकीन करते हैं। सौभाग्य है या दुर्भाग्य कि इस समय हम द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़े सत्ता-शक्ति-संघर्ष के बीचोबीच खड़े हैं। अमरीका और चीन के बीच एक आर्थिक लड़ाई चल रही है। यह युद्ध एक साथ कई मोर्चो पर लड़ा जा रहा है- करेंसी, जी 20, आयात-निर्यात, यहां तक कि सांस्कृतिक मोर्चे पर भी।
इन दिनों ग्लोबल लड़ाइयां पहले के मुकाबले ज्यादा महीन, जटिल और परिष्कृत हो चुकी हैं। पहले की लड़ाइयों का उद्देश्य हुआ करता था- हमला करो और किसी की जमीन हथिया लो। अब ऐसा नहीं होता। जब तक कि आप जमीन पर तेल या आतंकवादियों की तलाश न कर रहे हों, तब तक किसी भौगोलिक क्षेत्र को जीत लेने, अपने अधीन कर लेने का कोई मतलब ही नहीं।

हां, आप किसी देश की अर्थव्यस्था को जीतकर लगभग अपने अधीन कर लें, तो वह बहुत फायदेमंद हो सकता है। जैसा कि चीन ने अमरीका के साथ किया है। अमरीका के ट्रेजरी मार्केट का 40 प्रतिशत हिस्सा चीन नियंत्रित कर रहा है। इसका अर्थ है कि अमरीकी सरकार जो भी कर्ज दे रही है, उसकी फंडिंग चीन कर रहा है। जैसा कि हम जानते हैं कि अमरीकी सरकार अपने कॉरपोरेट्स के पुनरुत्थान के लिए अरबों डॉलर दे रही है। इस तरह, अमरीका अपनी अर्थव्यवस्था को रिवाइव करने के लिए जितने भी आर्थिक प्रयास कर रहा है, उनकी फंडिंग चीन द्वारा हो रही है। तो आखिर अमरीका की अर्थव्यवस्था में चीन क्यों निवेश कर रहा है ? इसके दो कारण हैं- पहला यह कि चीनी माल की खपत के लिए अमरीका सबसे बड़ा इकलौता उपभोक्ता देश है और दूसरा यह कि अगर अमरीका को चीन फंडिंग करता है, तो उसे अपने उपभोक्ता के ऊपर एक विराट आर्थिक वर्चस्व हासिल हो जाता है।
यह पूरा मामला किसी क्रेडिट कार्ड कंपनी की तरह है, जो वे सारे लुभावने सामान बनाती है, जिन्हें देखकर आपकी इच्छा और अधिक खर्च करने या और अधिक उपभोग करने की होती है। यानी आप जिन चीजों का उपभोग कर रहे हैं, वे उसी कंपनी ने बनाई हैं, जिसका क्रेडिट कार्ड आप इस्तेमाल कर रहे हैं। इस तरह आप उस कंपनी के और ज्यादा कर्जदार होते जा रहे हैं। ऐसी स्थिति निजी तौर पर किसी व्यक्ति के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। और अगर यह स्थिति किसी देश के साथ आती है, तो इससे शक्ति का पूरा ग्लोबल समीकरण ही बदल जाता है।
इन्हीं स्थितियों के बीच, ओबामा के पास उन चीजों की लंबी फेहरिस्त है, जो वे भारत से चाहते हैं- रिटेल सेक्टर में एफडीआई से शुरू होकर भारत को लड़ाकू विमान बेचना हो, भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अमरीकी कंपनियों का प्रवेश सुनिश्चित करना हो, न्यूक्लियर डील करनी हो या उसके जरिए अमरीकी कंपनियों को भारत में व्यापार करना हो। वे चीन के साथ चल रही अपनी आर्थिक लड़ाई में भी भारत का समर्थन चाहते हैं।
भारत-चीन और अर्थव्यवस्था का यह कार्ड कैसे चलेगा ? क्या हमारा कद इतना बड़ा हो चुका है कि हम ग्लोबल स्टेज पर अपने अधिकारों की पुरजोर मांग कर सकते हैं या ओबामा की यात्रा से पहले ही हम सब कुछ से पल्ला झाड़ लेंगे? जब अमरीका और चीन जैसे दो विशालकाय हाथी लड़ रहे हों, तो हमारी स्थिति क्या होगी? क्या हम उनके बीच रौंदी जाने वाली घास होंगे या हम इसके बीच से एक मध्यस्थ की तरह उभरेंगे? मनमोहन सिंह के सामने यही सबसे बड़ा सवाल है। जहां तक उम्मीद है कि मनमोहन सिंह इन्हीं सवालों का उत्तर खोजने हाल में अपनी विदेश यात्रा पर निकले थे।

फिर बढ़ती जा रही है कश्मीर में भयावहता


अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत आने की तारीख जैसे - जैसे नजदीक आती जा रही है कश्मीर में भयावहता बढ़ती जा रही है। इनके पहले राष्ट्रपति की हैसियत से बिल क्लिंटन भारत आये थे और कश्मीर में भारी कत्लेआम हुआ था। अब फिर ओबामा के संदर्भ में कश्मीर चर्चा का विषय बन चुका है। हैरत इस बात की है कि कश्मीर जब भी खबरों में लौटता है तो भारतीयों के दिमागों में लौट आता है और धीरे धीरे जबानी मारामारी का माहौल बन जाता है। फिर यह किस्सा उसी मोड़ पर आकर खत्म हो जाता है, जहां पहले भी दसियों बार हुआ है - एक ठंडापन और नए धमाके का इंतजार। आपका चाहे जिस किसी भी पॉलिटिकल आइडियोलॉजी से नाता हो, आप भारत के नाम पर मरने को तैयार रहते हों या देश की सीमाओं को नहीं मानते हों, आपसे महज इतना कहना है - कश्मीर को वहां मत छोडि़ए, जहां वह है। इस समस्या को यहीं खत्म कीजिए, क्योंकि इसके साथ भारत आगे नहीं चल सकता। यह एक ऐसी चट्टान है, जो भारत की तकदीर को डुबो देगी।
राजनीतिक शतरंज के खिलाडिय़ों ने कश्मीर की भौगौलिक स्थिति और सीमाओं को लेकर हमेशा एक भ्रामक स्थिति बनाए रखी। आमतौर पर जब लोगों से पूछा जाता है कि कश्मीर कहाँ है, तो वे कहते हैं,.. यह रहा.. और भारत के मानचित्र के..सिर.. की ओर इशारा करते हैं। अरुंधति राय, गिलानी और ना जाने उन जैसे कितने.. देसी- विदेशी.. लोग कश्मीर की आजादी का फतवा देते सुने जाते हैं। पर क्या कश्मीर इस लायक है? कश्मीर बहुत छोटा है आजादी के लिए।

कश्मीरियों की यह आम शिकायत रहती है कि शेष भारत वाले कश्मीर और कश्मीरियों को सही से समझते नहीं। किसी हद तक यह सही भी है। कश्मीर के विषय में कई मिथकों में से एक मिथक यह तोडऩे की आवश्यकता है कि कश्मीर भारत का एक उत्तरी राज्य है। जी नहीं, कश्मीर एक राज्य नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर राज्य का एक छोटा सा हिस्सा है केवल 6.98 प्रतिशत हिस्सा। यहां तक कि यह कहना भी गलत है कि..कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है.., क्योंकि कश्मीर तो भारत का सबसे उत्तरी भाग है ही नहीं। वह श्रेय लद्दाख सूबे को जाता है। और यदि भारत का आधिकारिक मानचित्र देखा जाए तो गिलगित और अक्साई-चीन उससे भी उत्तर में हैं। न लद्दाख, न गिलगित, न अक्साई चीन कश्मीर का हिस्सा हैं। जिस क्षेत्र को पाकिस्तान आजाद कश्मीर कहता है, और हम पाक-अधिकृत कश्मीर, वह क्षेत्र भी दरअसल कश्मीर नहीं है। कश्मीर और जम्मू-कश्मीर के इस अन्तर को हमेशा छुपाया क्यों गया है, और इस अन्तर को उजागर करना क्यों आवश्यक है?

दरअसल राज्य का यही छोटा हिस्सा भारत के लिए दर्दे-सर बना हुआ है, क्योंकि इस मुस्लिम बहुल क्षेत्र ने पूरे राज्य को और पूरे क्षेत्र को अपहृत कर रखा है। राज्य का यह भाग जो राज्य का केवल 7 प्रतिशत है, स्वयं को एक गैर मुस्लिम देश का भाग मानने में आनाकानी करता है। राज्य के दक्षिण में जम्मू है, जो हिन्दू-बहुल है, जहां के लोग पंजाब-हिमाचल जैसे हैं, और उत्तर में लद्दाख है जहां बौद्ध और शिया मुस्लिम रहते हैं, कुछ कुछ तिब्बत से मिलता जुलता। दोनों क्षेत्रों को भारत का भाग होने में कोई दिक्कत नहीं है। केवल कश्मीर है, जहां गैर-मुस्लिमों के पलायन के बाद अब 97 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है। यही वह हिस्सा है जो आग का गोला बना हुआ है। वह खूबसूरत वादी, जिसे कभी जन्नत कहा जाता था, और जिसे अलगाववाद ने जहन्नुम में तब्दील कर दिया है। इस राज्य की विविधता, भारत की विविधता में तो घुलमिल जाएगी, पर हरे-झंडे ले लेकर पत्थर बरसाते अलगाववादियों के कश्मीर में कैसे चलेगी?
अगर आप भारत का भला चाहते हैं, अपने और अपनी संतानों को एक बेहतर जमाने में ले जाना चाहते हैं, अगर आपको भारत से प्यार है और उसकी तरक्की पर आपको गर्व महसूस होता है, तो अपने जज्बातों पर काबू रखिए। अपनी आज के सोच से कल के भारत की किस्मत खराब मत होने दीजिए। भारत को अपनी कैद से आजाद होने दीजिए, क्योंकि इस देश और दुनिया के इतिहास में हमारी जिंदगी, हमारी समझ एक छोटा-सा टुकड़ा है। देश हमसे बड़ा है और यह तब भी रहेगा, जब हम नहीं होंगे। हमारी खुदगर्जी क्यों इससे बड़ा होने का दावा करे?

विकास का हवाई किला


लीजिए, अब 2010 के गुजरने में फकत दो माह रह गये हैं। पिछले लगभग दो दशकों से की जा रही वे ढेरों प्रस्तुतियां, योजनाएं, लेख, अध्ययन और भविष्यवाणियां याद करें, जिनमें से बहुतों का शीर्षक होता था - विजन 2010, भारत होगा महाशक्ति 2010 तक, 2010 की ओर। जी हां, आखिरकार हम उस 2010 को लगभग पार कर ही गये।
यह उन वर्षों में से एक है, जब तक बहुत सी चीजें हो जानी चाहिए थीं, लेकिन नहीं, हमने जो भविष्यवाणियां कीं, हम उनके आसपास भी कहीं नहीं हैं। अब बड़े सुविधाजनक ढंग से उन भविष्यवाणियों की जगह दूसरे ज्यादा बेहतर, आकर्षक वर्ष 2020 ने ले ली है और कुछ ज्यादा उत्साही लोगों ने 2050 तक की भविष्यवाणियां कर दी हैं।
वस्तुत: संभावना है कि 2050 तक हम पश्चिमी देशों से भी ज्यादा अमीर होंगे। ये आश्चर्य पैदा किया है विभिन्न शोध संस्थानों और उनके आंकड़ों ने, जो सनसनीखेज टीवी चैनलों से कम नहीं हैं।
इस तरह की भविष्यवाणियां मानकर चलती हैं कि वर्तमान विकास दर लगातार बनी रहेगी, वे पहले के प्रभावों को नकार देते हैं और इस तथ्य को बिल्कुल दरकिनार कर देते हैं कि बहुसंख्यक भारतीय जनता को ज्यादातर आर्थिक विकास का बहुत कम लाभ मिलता है।
वे इस बात को भी नकार देते हैं कि हमारे पास एक विकसित अर्थव्यवस्था के अधिकारों की बुनियादी चीजें भी नहीं हैं - एक प्रभावशाली कानून व्यवस्था, वित्तीय समझदारी, भ्रष्टाचार के खिलाफ समुचित प्रावधान, बौद्धिक संपदा कानून, व्यवसायों में सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप, पूंजी के प्रसार को प्रेरित करने के लिए प्रोत्साहन और ऐसी शिक्षा व्यवस्था, जो प्रतिभाओं को उभारे और उन्हें प्रेरित करे।
ये सब करना कितना उबाऊ और बोझिल है, जबकि आपको बस इतना करना है कि आंकड़ों को तब तक खींचते रहिए जब तक कि भारत पश्चिम को पीछे छोड़कर आगे न निकल जाए। अगर कागज पर बिखरे आंकड़ों में ये काम हो सकता है तो असल जिंदगी में भी कभी हो ही जाएगा। हकीकत को देखिए। हम सन् 2010 में हैं और अभी भी हम एक विकसित देश होने से कोसों दूर हैं।

हमारे यहां खाद्य पदार्थों की कीमतों में 20 प्रतिशत का इजाफा हो गया है, लगभग सभी सरकारी दफ्तर भ्रष्ट हैं, कानून व्यवस्था ऐसी है, जिसमें चीजें सिर्फ खिंचती जाती हैं और हमारे नेता इसे बदलने की बहुत कम फिक्र करते हैं क्योंकि जनता इन कारणों से वोट नहीं देती। बेशक काफी संख्या में पढ़े-लिखे और अगर मैं इस शब्द का इस्तेमाल करूं तो कहूंगा कि प्रबुद्ध लोग हैं, जो और कुछ नहीं, सिर्फ ये चाहते हैं कि काम हो। लेकिन भारत में अधिकांश लोग आज भी जाति, परंपरा, व्यक्तित्व और वंश के नाम पर वोट देते हैं। अब आप कहेंगे कि ये तो हम जानते हैं।
देश भर में फैले हुए प्रबुद्ध लोगों का समूह, जो अब तक बड़ा वोट बैंक नहीं है, उसे अपनी ताकत का इस्तेमाल करना चाहिए। चुनाव आयोग की वेबसाइट के अनुसार भारत में करीब 60 करोड़ मतदाता हैं। उनमें से भी आधे लोग वोट नहीं देते, इसलिए वोट देने वाले असल लोगों की संख्या आधी घटाकर 30 करोड़ कर देते हैं।
अब भी यह काफी बड़ी संख्या है। अगर आप प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में विजयी उम्मीदवार और दूसरे नंबर पर आने वाले उम्मीदवार के मतों का फर्क देखें और इस तरह संपूर्ण 530 निर्वाचन क्षेत्रों के मतों को जोड़ दें तो जो फर्क है, वह सिर्फ चार करोड़ वोटों का है। यही वे चार करोड़ वोट हैं, जो सभी निर्वाचन क्षेत्रों में ये तय करते हैं कि कौन विजयी होगा। वस्तुत: अगर उस चार करोड़ में से आधे लोग अपना वोट दूसरे उम्मीदवार को दे दें तो वह दूसरा उम्मीदवार जीत सकता है।
चार करोड़ का आधा होता सिर्फ दो करोड़ और यही वह संख्या है, जो यह तय कर सकती है कि कौन सबसे ऊपर होगा। दो करोड़ ऐसी संख्या है, जो आसानी से संभाली जा सकती है। एक मोटा अनुमान लगाएं तो यह संख्या उतनी है, जितनी दो बड़े महानगरों की जनसंख्या है। 2 करोड़ कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या का मात्र 3 प्रतिशत है। अगर हमें इतनी संख्या में ही प्रबुद्ध लोगों की जरूरत है तो यह कोई असंभव लक्ष्य नहीं है लेकिन इस संबंध में भी कई पूर्वानुमान संभव हैं। सबसे पहले तो प्रबुद्ध व्यक्तियों को एकजुट होना चाहिए और आपस में गहराई से जुड़े रहना चाहिए। संभवत: हम सभी अपने देश से प्यार करते हैं, लेकिन हम सभी अलग-अलग दिशाओं में खिंच सकते हैं।
एक बार यदि हम एक प्रभावी वोट बैंक नजर आएंगे तो राजनीतिज्ञों के पास और कोई रास्ता नहीं होगा सिवाय इसके कि वे हमारी बातों पर गौर करें। छोटी-छोटी चिंगारी के रूप में पूरे देश में बिखरे होना अच्छी बात है, लेकिन अगर हम एक अग्निपुंज के रूप में इकट्ठे हो सकें तो यह और भी अच्छी बात है।
इंटरनेट, कॉलेज महोत्सव, गैर सरकारी संगठनों के बीच का नेटवर्क इत्यादि इन समस्त चिंगारियों को एकजुट करने के अवसर हैं। वैसे भी धीरे-धीरे ये परिवर्तन हो रहे हैं, लेकिन हमें इस बदलाव की गति को तेज करने की जरूरत है। ये मत कहिये कि क्या आपका मुद्दा है, बल्कि ये पूछिए कि क्या हमारा मुद्दा है।
ढेरों बेहतर इरादों वाले लोग हैं। बस, वे सब वोट बैंक के एक सूत्र में नहीं बंधे हैं। अगर हम आने वाले समय को ऐसा बना सकें, जिसमें हम ये करने का निश्चय लें, 2 करोड़ लोगों का वोट बैंक बना सकें तो सन् 2020 तक पन्नों पर बिखरे उन आंकड़ों का सचमुच कोई अर्थ होगा।

Saturday, October 30, 2010

और बढ़ेगी महंगाई


ग्रामीण गरीबों के लिए मंदी का समय और भूख पर्यायवाची हैं। मौसमी मंदी वह समय होता है जबकि जमा किया हुआ अनाज समाप्त हो जाता है और नयी फसल आने में थोड़ा समय होता है। खाद्य पदार्थों के मूल्य में उतार-चढ़ाव, संस्थागत ऋण तक पहुंच का न होना और भंडारण की अपर्याप्त सुविधा के कारण किसानों को बाध्य होना पड़ता है कि वे पूर्व में लिए गए ऋण की अदायगी और फसल को कीड़ों इत्यादि से नष्ट होने से बचाने के लिए अपनी पैदावार (फसल) को कम कीमत पर बेच दें। इसी किसान को कुछ महीनों बाद बाजार में अधिक दाम चुकाकर पुन: अनाज खरीदना पड़ता है।

लंबे समय से भारत ऐसा देश रहा है, जहां एक तरफ तो संपन्नता और समृद्धि की चमक-दमक है तो दूसरी तरफ घोर निर्धनता है। हाल के कुछ दशकों में यह फासला और बढ़ा है। एक छोटा तबका आला दर्जे की जीवनशैली का आनंद उठा रहा है, वहीं करोड़ों लोग विकास की दौड़ में पीछे छूट गए हैं।
हमारे यहां दुनिया के सबसे अमीर लोगों की फेहरिस्त में शामिल धनकुबेर हैं तो लगभग दो करोड़ लोग भूखे पेट सोने को भी मजबूर हैं। हमारे लगभग आधे बच्चे कुपोषित हैं। इनमें भी बीस फीसदी ऐसे हैं, जो पर्याप्त पोषक आहारों के अभाव में पूर्णत: विकसित नहीं हो पाते। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने आगामी 2 नवंबर को आने वाली नयी मौद्रिक नीति से पहले जारी अपने आर्थिक विश्लेषण में खाद्य पदार्थों की महंगाई को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उसके मुताबिक यह ढांचागत महंगाई है, जिसका असर अभी की तरह आने वाले महीनों में भी सभी चीजों के महंगा होते जाने के रूप में दिखाई पड़ेगा।
सरकार ने अब तक गेहूं, चावल, दाल, चीनी, सब्जी वगैरह की महंगाई थामने के जो भी उपाय किए हैं, वे सब के सब बेअसर साबित हुए हैं। इससे संदेह होता है कि वह इस सवाल को लेकर चिंतित भी है या नहीं। रोजाना सौ रुपए या उससे कम की कमाई में जीने वाली देश की लगभग तीन चौथाई आबादी की ज्यादातर आय खाने और तन ढकने के कपड़ों पर ही खर्च हो जाती है। पिछले साल दिसंबर में 20 प्रतिशत की सीमा पार कर जाने के बाद फिलहाल 15 प्रतिशत से ऊंची चल रही खाद्य पदार्थों की महंगाई आबादी के इस हिस्से की हैसियत बढऩे की नहीं, उसके तबाह होने की सूचना दे रही है।
आरबीआई ने देश में प्रोटीन की आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार से दालों के आयात या कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का सहारा लेने की अपील की है। खुद को आम तौर पर पैसे-कौड़ी की चिंताओं में ही व्यस्त रखने वाले रिजर्व बैंक के लिए सरकार को इस तरह का सुझाव देना कोई सामान्य बात नहीं है। इससे आने वाले दौर की उन समस्याओं की थाह मिलती है, जिसे ऊंची विकास दर की संकरी दूरबीन से देख पाना वित्तमंत्रियों के लिए संभव नहीं होता।
ऐसे अवसरों पर हमारे अर्थशास्त्री दिमाग के बजाय दिल से सोचें। वे एक ऐसे वैकल्पिक अर्थशास्त्र पर भी अपना ध्यान केंद्रित करें, जो अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप होने के साथ ही देश के आम जन के हित में भी हो।

खरीफ की फसलों का उत्पादन इस साल ऐतिहासिक होने का आकलन कई कृषि विज्ञानी पेश कर चुके हैं। इसके बावजूद बाजार में खाने-पीने की चीजों की कीमत कम होने का नाम नहीं ले रही है। यह खुद में एक असाधारण बात है। सरकार को देश की ऊंची विकास दर को लेकर अपनी पीठ थपथपाने के बजाय आम आदमी के सिर पर मंडरा रही इस आपदा का कोई निदान खोजना चाहिए।

भोजन से वंचित और कुपोषित आबादी की संख्या सरकार के अर्थशास्त्रियों द्वारा चिह्नित किए गए लोगों से कहीं ज्यादा है। यदि सरकार देशभर में किसानों से लाभकारी कीमतों पर खाद्य पदार्थ क्रय करती है, तो उसके पास वितरण प्रणाली के लिए खासी मात्रा में अनाज होगा। सरकार इसे जरूरतमंदों को आधी कीमतों पर मुहैया करा सकती है।
आज हमारे देश में पर्याप्त मात्रा में अन्न का उत्पादन होता है। ऐसे में सरकार यदि चाहे तो इस अन्न को हमारे एक अरब से भी ज्यादा लोगों तक पहुंचाने का खर्च वहन कर सकती है। अलबत्ता अर्थशास्त्री इसके उलट सरकार को यह हिदायत देते हैं कि उसे अपने सार्वजनिक व्ययों पर लगाम लगानी चाहिए, या उसे खाद्य पदार्थ वितरित करने के बजाय कार्यों को प्रोत्साहन देने में निवेश करना चाहिए या सस्ता या मुफ्त भोजन मुहैया कराने से किसान उत्पादन के लिए प्रेरित नहीं होंगे।

अरुंधति राय बनाम राष्ट्र


क्या अरुंधति राय राजद्रोह की दोषी हैं ? क्या विख्यात लेखिका और सोशल वर्कर अरुंधति राय ने अपने भाषणों और कामकाज से जम्मू कश्मीर के आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति दिखाकर और उनके आंदोलन को समर्थन देकर कुछ ऐसा काम किया है जिससे उन पर राष्ट्रद्रोह का मामला बनता है ?
अगर सरल परिभाषा की बात करें या सहज जानकारी की बात करें तो कह सकते हैं कि राष्ट्रद्रोह (सीडेशन) का अर्थ होता है सत्ता के खिलाफ विद्रोह और राष्ट्र के प्रति विश्वासघात का मतलब होता है राष्ट्र की सम्प्रभुता से अपने सम्बंधों को खत्म करना। या फिर ऐसे कह सकते हैं कि ..सीडेशन.. अपने देशवासियों को सत्ता के खिलाफ भड़काना है और ..ट्रीजन.. देश के विरुद्ध सक्रिय तत्वों को गुप्त रूप से मदद पहुंचाना है। जहां तक अरुंधति राय का प्रश्न है तो उन्होंने घाटी में विद्रोह या अपघात या आतंकवाद की शुरूआत नहीं की।
अरुंधति ने किया केवल यह कि घाटी में फैलते असंतोष पर ध्यान दिया,उसका विश्लेषण किया और फिर जिन्होंने वहां हथियार उठाया है, उनके प्रति सहानुभूति जाहिर की। इसलिये उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला प्रमाणित करना शायद कठिन हो जायेगा। अरुंधति के इस ताजा अभियान का मुकाबला कश्मीर और देश के अन्य भागों में जनता के विचारों में बदलाव लाकर करना होगा, न कि उन्हें गिरफ्तार कर और मामला चला कर। उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही से बचना होगा।
लेकिन कश्मीरियों के दुःखों को दूर करने का नुस्खा बताने वाली बेहद चालाक महिला अरुंधति से एक सवाल है कि क्या अगर कश्मीर मतांतरित न हुआ होता, हिंदू या बौद्ध ही बना रहता तो क्या आज कश्मीर समस्या होती?
हां, कश्मीर में समस्याएं तो होतीं, रोजगार और गरीबी की,अशिक्षा की और विकास की, जैसी कि शेष भारत में हैं,लेकिन कोई कश्मीर-समस्या न होती। राजनीति जब ईश्वर-अल्लाह के नाम पर चलने लगती है तो जाहिर है वह हमें आज की समस्याओं का समाधान नहीं देती।
क्या धर्म ने पाकिस्तान की समस्याओं का समाधान कर दिया है ?
नहीं, क्योंकि धर्म तो जिंदगी के बाद का रास्ता बनाता है।

हमें मालूम है कि कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन की असलियत क्या है ? अगर कश्मीर पाकिस्तान के कब्जे में चला जाता तो वही सब कुछ पाकिस्तानी भू-स्वामी वर्ग और पाकिस्तानी सेना द्वारा वहां किया जाता, जो कबाइलियों ने 1947 में प्रारंभ किया था। अरुंधति को शायद मालूम होगा कि हुर्रियत के बिलाल गनी लोन ने स्वीकार किया है कि ये पैसों पर बिकी कायरों की जमातें हैं। पाकिस्तान का समापन किस रूप में होगा,इसका परिदृश्य सामने आने लगा है। कश्मीर को अपनी आखिरी उम्मीद मानकर वह किसी भी तरह वार्ताओं का दौर प्रारंभ करना चाहता है। पाकिस्तान से वार्ता करना तो उसके आतंकी और साजिशी स्वरूप को मान्यता देना है। अरुंधति ने अगर इतिहास पढ़ा हो तो शायद उन्हें याद होगा कि आजादी के आंदोलन के अंतिम दौर में कश्मीर को लेकर ब्रिटिश सोच बदल चुका था। यही सोच समस्या का कारण बना। माउंटबेटन उत्तरी कश्मीर के स्ट्रेटेजिक महत्व से वाकिफ थे। उन्होंने सेनाओं को जानबूझकर उड़ी से डोमेल, मुजफ्फराबाद की ओर नहीं बढऩे दिया। वह चाहते थे कि गिलगिट बालतिस्तान का क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में रहे, जिससे आगे चलकर सीटो, सेंटो संगठन द्वारा उसका उपयोग सैन्य अड्डों के लिए किया जा सके। कश्मीर मामला संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के प्रस्ताव में उनकी मुख्य भूमिका थी।
शेख अब्दुल्ला जनमत संग्रह के पक्ष में नहीं थे, लेकिन जनमत संग्रह के प्रस्ताव ने कश्मीर को एक ऐसी..ओपेन एंडेड स्कीम.. का रूप दे दिया, जिसमें कभी भी कोई भी निवेश कर सकता है। कश्मीर की इन नकली समस्याओं के कारण जो असल समस्याएं शिक्षा, रोजगार और विकास की हैं, पीछे रह गई हैं। इस जहालत के माहौल ने उन्हें राष्ट्रीय नागरिक नहीं बनने दिया।
हम सशक्त देश हैं, पर कमजोरों की तरह व्यवहार करते हैं।
गठबंधनों से आ रही सत्ताएं हमारी कमजोरी का मूल स्रोत बन गई हैं।

यहां अरुंधति से हम पूछना चाहेंगे कि आखिर कश्मीर समस्या क्या है ? क्या जो समस्या कश्मीर की है वही जम्मू की भी है ? क्या लद्दाख भी वही सोचता है जो घाटी के हुर्रियत नेता चाहते हैं? जो बात जम्मू के लिए कोई समस्या नहीं वह कश्मीर घाटी के चालीस लाख लोगों के लिए समस्या क्यों है ? अरुंधति को मालूम होना चाहिये कि यह आजादी की लड़ाई है ही नहीं। यह मूलत: एक मनोवैज्ञानिक समस्या है.. हिंदू भारत.. के साथ रहने की।
अरुंधति जैसे लोगों की साजिश के कारण वे हमारे 15 करोड़ मुसलमानों से अपने को अलग समझते हैं। कश्मीर घाटी के लोगों को अलगाववादी मानसिकता के हवाले कर दिया गया है। यह मनोविज्ञान जनमत संग्रह के अनायास स्वीकार से पैदा हुआ है। इतिहास में कहीं भी और कभी भी वोट देकर राष्ट्रीयताओं पर निर्णय नहीं हुआ।
मनोवैज्ञानिक समस्याओं का इलाज आपरेशन नहीं होता और न गिरफ्तारियां होती हैं । सशक्त राष्ट्र की तरह व्यवहार करना हमें सीखना है। युद्ध अवश्यंभावी है तो युद्ध होगा, लेकिन उसकी आशंकाओं से कमजोरों की तरह व्यवहार करना हमें समाधान की ओर नहीं ले जाता। अरुंधति जैसी दो कौड़ी के लोगों को इस देश पर भारी पडऩे से रोकना होगा और सियासत इसका इलाज नहीं है।