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Tuesday, November 29, 2011

सामान्य राजनीतिक वातावरण के विनाश पर तुले हैं माओवादियों के हमदर्द

-हरिराम पाण्डेय
बाईबिल की एक पंक्ति है 'हू लिव्स बाई सोर्ड, डाइज बाई सोर्ड Ó यानी 'जो
हथियारों के बल पर जीवित रहता है वह हथियारों से ही मारा जाता है। Ó
कुख्यात माओवादी नेता एम कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी के मामले में! यह बात
बिल्कुल सही है। किशन जी का मेदिनीपुर के जंगलों में पुलिस और
अद्र्धसैनिक बलों की संयुक्त कारवाई में मारा जाना जितनी बड़ी घटना है
उससे कहीं बड़ा उस घटना के बाद का प्रभाव कहा जा सकता है।
किशन जी के मारे जाने को लेकर पहले तो पश्चिम बंगाल के बुद्धिजीवी और
विभिन्न राजनीतिक दल कई गुटों में बंट गये हैं। आने वाले दिनों यहां की
सिविल सोसायटी में इस मसले को लेकर व्यापक आंदोलन शुरू होने की आशंका है।
माओवादियों के हमदर्द एवं विप्लवी कवि वारवरा राव ने तो पश्चिम बंगाल के
मुख्य सचिव से मिल कर किशनजी की मौत की जांच कराने की मांग की है।
माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेताओं ने किशन जी के पोस्टमार्टम
रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है। माओवादियों से सहयोग करने वाले
शहर के बुद्धिजीवियों के संगठन गणतंत्र बचाओ संघ या ए पी डी आर
(एसोसियेशनफॉर प्रोटेक्शन ऑफ डिमोक्रेटिक राइट्स) ने सुप्रीम कोर्र्ट के
जज से जांच कराने की मांग कर रहा है। इनका कहना है किशन जी को पकड़ कर
मारा गया। खबर है कि किशन जी की मां ने ए पी डी आर के माध्यम से इस मौत
के विरोध में कोर्ट जाने की धमकी दी है। माओवादियों और राज्य सरकार के
बीच शांति के लिये मध्यस्थता करने वालों का कहना है कि इस मौत का शांति
वार्ता पर प्रतिगामी असर पड़ेगा। शांति के लिये मध्यस्थता करने वाले दल
के एक प्रमुख सदस्य का कहना है कि अब शायद ही माओवादी वार्ता के लिये
तैयार हों।
ये सारी हमदर्दी माओवादी नेता को लेकर है। अब सवाल उठता है कि जब माओवादी
नेता ने सैकड़ों लोगों को मारा, कई लोगों को मार कर पेड़ से लटका दिया,
सुरंगें लगा कर पुलिस वाहन उड़ा दिये तब कहीं कोई मानवाधिकार का शोर नहीं
उठा। किसी ने इन हत्याओं पर कुछ नहीं कहा। इनके हमदर्द जांच की मांग कर
रहे हैं पर जांच करेगा कौन? और अगर जांच किया भी तो उसके नतीजे को वे
मानेंगे।
अबसे कुछ माह पहले सरकार ने जंगलमहल (वन क्षेत्र)के दस हजार बेरोजगारों
को नौकरी तथा रोजगार देने की योजना बनायी थी। उसके लिये आवेदन आमंत्रित
किये गये थे। लेकिन उस क्षेत्र के सभी आदिवासियों के घरों पर रातोंरात
पोस्टर लग गये जिसमें आवेदन करने को मना किया गया था वरना जान जा सकती
है। इस बेरोजगारी को बढ़ाने वाले कदम के विरोध में किसी संगठन ने आवाज
नहीं उठायी। ऐसा क्यों हुआ?
यहां सियासी हलके में चर्चा है कि किशन जी को केवल इस लिये मारा गया कि
उसने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बगावत कर दी। ममता बनर्जी की पार्टी
तृणमूल कांग्रेस के एक पूर्व वरिष्ठï नेता कबीर सुमन ने अपनी जीवनी
'निशानेर नाम तापसी मल्लिकÓ में ममता बनर्जी और किशन जी की मुलाकात का
पूरा ब्यौरा दिया है। यह मुलाकात तृणमूल कांग्रेस के मुख्यालय में हुई थी
और उस समय राजा सारखेल और प्रसून चट्टïोपाध्याय भी उपस्थित थे। राजा और
प्रसून अभी जेल में हैं। हालांकि कबीर सुमन अभी तृणमूल कांग्रेस में नहीं
हैं लेकिन किशन जी को ही समर्पित इस पुस्तक में जो कुछ भी लिखा है उसका
खंडन नहीं किया गया।
इस आरोप में चाहे जितना भी दम हो लेकिन क्या निरीह लोगों की हत्या के इस
'अपराधीÓ को मारा जाना क्या सचमुच मानवाधिकार का हनन है? वाक् विप्लवी
संगठन ए पी डी आर उन लोगों के लिये यह सब कर रहा है जिन्होंने लोकतंत्र
पर कभी भरोसा किया ही नहीं। जिस क्षण किसी ने गणतांत्रिक प्रक्रिया को
अस्वीकार कर बंदूक उठा लिया उसी क्षण उसका गणतांत्रिक अधिकार समाप्त हो
जाता है। यह अत्यंत सबल सत्य है कि एक आदमी की हत्या के बाद हत्यारे के
जीने का हक खुद ब खुद खत्म हो जाता है। किशन जी की मौत को लेकर
माओवादियों के हमदर्द बुद्धिजीवी या ये ए पी डी आर के कार्यकर्ता आखिर
क्यों इतने परेशान हैं? यह एक प्रश्न है जिसका उत्तर खोजा जाना जरूरी
है। माओवादियों के आदिवासी और पिछड़े हुए इलाकों में सांगठनिक विस्तार को
ही गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि इनमें से अधिकांश इलाकों में वे तब ही
गए हैं जब वहां किसी न किसी प्रकल्प के लिए जमीन ली गयी, बांध बनाया गया,
कारखाना लगाया गया या अन्य किसी काम के लिए आदिवासियों को बेदखल किया
गया। आदिवासियों की बेदखली के पहले माओवादी इन इलाकों में नजर नहीं आते।
आदिवासी इलाकों में बेदखली के खिलाफ उनकी मांगें क्या हैं ? वे सारी
मांगें आदिवासी इलाकों के विकास से जुड़ी हैं। इनमें भी वे आदिवासियों को
उनकी जमीन पर अधिकार दिलाने या उनका मालिकाना हक बरकरार रखने पर च्यादा
जोर देते हैं।
माओवादी राजनीति के उभार के कारण नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के शासनकाल
तक के दौरान हुए विकास की सीमाएं बड़ी तेजी से आम लोगों के सामने उजागर
हुई हैं। माओवादियों ने बुर्जुआ विकास की तमाम बातों की
महानरीय-मध्यवर्गीय सीमाओं को उजागर किया है।
माओवादियों ने अंधाधुंध विकास की नवउदारवादी नीतियों का देश के विभिन्न
इलाकों में जनांदोलन खड़ा करके प्रतिवाद किया है । अनेक स्थानों पर
उन्होंने सरकार को पीछे हटने के लिए मजबूर किया है। इसमें गरीबी को
उन्होंने अपनी हिंसा के लिए वैध अस्त्र ठहराया है।
माओवाद के खिलाफ कुछ लोग यह तर्क दे रहे हैं कि हमें उनके खिलाफ राजनीतिक
जंग लडऩी चाहिए। उन्हें जनता में अलग-थलग करना चाहिए। उनके खिलाफ जनता को
गोलबंद करना चाहिए। सवाल यह है कि क्या माओवादी हिंसा के समय जनता में
राजनीतिक प्रचार किया जा सकता है ? क्या माओवाद का विकल्प जनता को समझाया
जा सकता है? राजनीतिक प्रचार के लिए शांति का माहौल प्राथमिक शर्त है और
माओवादी अपने एक्शन से शांति के वातावरण को ही निशाना बनाते हैं,सामान्य
वातावरण को ही निशाना बनाते हैं, वे जिस वातावरण की सृष्टि करते हैं
उसमें राज्य मशीनरी के सख्त हस्तक्षेप के बिना कोई और विकल्प संभव नहीं
है। राज्य की मशीनरी ही माओवादी अथवा आतंकी हिंसा का दमन कर सकती है।
दूसरी बात यह है कि जब एक बार शांति का वातावरण नष्ट हो जाता है तो उसे
दुरुस्त करने में बड़ा समय लगता है। माओवादी और उनके समर्थक बुद्धिजीवी
माओवादियों की शांति का वातावरण नष्ट कर देने वाली हरकतों से ध्यान हटाने
के लिए पुलिस दमन,फर्जी मुठभेड़ आदि को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करते
हैं।
माओवादी राजनीति या आतंकी राजनीति का सबसे बड़ा योगदान है सामान्य
राजनीतिक वातावरण का विनाश। वे जहां पर भी जाते हैं सामान्य वातावरण को
बुनियादी तौर पर नष्ट कर देते हैं। ऐसा करके वे भय और निष्क्रियता की
सृष्टि करते हैं। इसके आधार पर वे यह दावा पेश करते हैं कि उनके साथ जनता
है। सच यह है कि आदिवासी बहुल इलाकों से राजनीतिक दलों के लोग चुनाव के
जरिए विशाल बहुमत के आधार पर चुनकर आते रहे हैं। इसलिये किशन जी की मौत
को लेकर उठाये जा रहे सवाल एक खास उद्देश्य से प्रेरित हैं अत: न सरकार
को इस पर ध्यान देना चाहिये और जनता को इस झांसे में आना चाहिये।
अब सवाल उठता है कि क्या किशन जी मारे जाने से जो वैकुअम पैदा हो गया है
उसके कारण क्या यहां माओवादी आंदोलन शांत हो जायेगा या जंगलमहल शांत हो
जायेगा। शायद ऐसा नहीं होगा, क्योंकि ये सारा शोर शराबा केवल इस लिये है
कि सरकार अपना हस्तक्षेप बंद करे और माओवादियों को इस क्षति से उभरने तथा
किशन जी का विकल्प खोजने का अवसर मिल जाये।


Friday, November 25, 2011

दैनिक हिंदुस्तान के सम्पादकीय पृष्ठ पर 24 नवम्बर 2011 को प्रकाशित आलेख


दैनिक हिंदुस्तान के सम्पादकीय पृष्ठ पर 24 नवम्बर 2011 को प्रकाशित आलेख

Monday, November 7, 2011

अमर उजाला में दिनांक 8-11-11 को छपी एक रचना

Tuesday, October 25, 2011

तमसो मा ज्योतिर्गमय



हरिराम पाण्डेय
26 अक्टूबर 2011
आज दीपावली है, अंधेरे को दूर भगाने का त्योहार है। इस त्योहार का भारतीय लोकजीवन में विशेष आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व है। दीपावली की रात दीपक जलाकर हम अंधेरे पर उजाले की विजय का उत्सव मनाते हैं। अंधेरा असत्य, अन्याय या नकारात्मक पक्ष का सूचक है, वहीं उजाला सत्य, न्याय और सकारात्मक पक्ष का सूचक है। समाज में व्याप्त बुराइयों पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भी है दीवाली। यह पर्व सुख और समृद्धि का प्रतीक भी है। इस पर्व का व्यक्तिगत जीवन में भी काफी महत्व है। इस दिन हम दीप जलाकर अन्याय, असत्य और अंधेरे को दूर भगाने के साथ ही मन के मलिन पक्ष को भी स्वयं से दूर करते हैं। उजाला हमारे अंदर सत्य, न्याय और अच्छे गुणों का समावेश करता है।
यहां एक बात उठती है कि अंधेरा यदि प्रकाश की अनुपस्थिति है, तो छाया अंधेरे और प्रकाश के बीच की एक ऐसी स्थिति है जो होकर भी नहीं है और न होकर भी है। यहां एक दर्शन है। अंधकार का अर्थ है एक काला आकार जो अंधेरे का समुद्र है। आंख बंद करते ही सब अंधेरा ही अंधेरा है। उसका कोई रूप - रंग नहीं होता लेकिन छाया ऐसी नहीं है। छाया का अर्थ प्रकाश तो है, किन्तु उसके मार्ग में कोई बाधा आ गयी है। उस बाधा की पृष्ठभूमि में प्रकाश उपस्थित रहता है। उसकी किरणें उस वस्तु को न भेद कर उसके इधर-उधर बिखर गयी हैं। उस वस्तु का बिम्ब ही छाया है। इस छाया को पहचानना बहुत ही कठिन है। यह तो बताया जा सकता है कि यह पेड़ की छाया है या किसी वस्तु की छाया है। पर यह बताना बड़ा कठिन है कि यह किस विशेष वृक्ष या वस्तु की वास्तविक छाया है। जब तक कि उस वस्तु को पहले न देखा हो। छाया विश्रामस्थल तो हो सकती है लेकिन वहां स्पष्टता नहीं हो सकती; क्योंकि वहां प्रकाश नहीं। जहां प्रकाश नहीं, वहां स्पष्टता भी नहीं होगी। बिना ज्ञान के चलना अंध मार्ग पर चलना है। इसीलिए ज्ञान प्राप्ति को ब्रह्म और मोक्ष का मार्ग व द्वार बताया गया है। प्रकाश के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है। प्रकाश का अवरोध ही छाया का निर्माण करता है लेकिन व्यक्ति की पृष्ठभूमि में प्रकाश की उपस्थिति छाया का निर्माण नहीं करती अपितु वह परछाई बनाती है। परछाई में छाया तो है, लेकिन वह 'परÓ अर्थात दूसरे की है। भला स्वयं उसकी छाया को दूसरे की छाया कैसे कहा जा सकता है?
हम जो कुछ भी कर रहे हैं, कह रहे हैं, वह सब दूसरों का ही तो है, सिवाय इस शरीर के, तो बात स्पष्ट है कि इस शरीर से जो कुछ भी हो रहा है, वह अपनी छाया न होके परछाई ही तो है। साथ ही यहां जिस प्रकाश की बात कही गयी है, वह प्रकाश स्व-बोध का प्रकाश है, यह स्व को जानने का है, स्व को पा लेने का है। और जब व्यक्ति अपनी निजता को पा लेता है, तो उसका समूल परिवर्तन हो जाता है क्योंकि वह दुनिया के सामने मौलिक व्यक्तित्व के रूप में सामने आता है। इसलिए वह विद्रोही मान लिया जाता है। दूसरों का अन्धानुकरण न कर व्यक्ति को अपने स्वतंत्र और मौलिक अस्तित्व का निर्माण करना चाहिए। इसी प्रकार के व्यक्तित्व दूसरों के लिए छाया बनते हैं। छाया कल्याणकारी होती है, पर परछाई किसी भी रूप में कल्याणकारी नहीं होती। प्रकाश बनने का प्रयास करना चाहिए, यदि प्रकाश न बन सकें तो छाया भी बन सकते हैं लेकिन परछाई नहीं बनना चाहिए, उसमें न तो सुख है और न ही आनन्द। प्रकाश के समस्त अवरोधों को गिराकर हमें प्रकाशमय बन जाना चाहिए : तभी हम प्रकाशपुंज होकर ज्योतिर्मय हो सकते हैं।
ऋषियों ने इसीलिए बड़े स्पष्ट शब्दों में प्रार्थना की-'तमसो मा ज्योतिर्गमयÓ। इन साधारण से लगने वाले शब्दों में अत्यंत गंभीर भाव छिपे है। इसमें भौतिक अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने की प्रार्थना तो है ही, साथ ही हमें अविद्यान्धकार से छुड़ाकर विद्यारूपी सूर्य को प्राप्त कराने की भावना और प्रार्थना अंतर्निहित है। हमारे पूर्वज वैदिक ऋषियों ने सभी प्रकार की सामाजिक समस्याओं को तीन श्रेणियों में बांटा-ये है अज्ञान, अन्याय और अभाव। चाहे कोई भी देश हो, कैसा भी समाज हो, सब जगह ये समस्याएं रहेंगी ही। इन तीनों समस्याओं में भी अज्ञान की समस्या सबसे बड़ी है। यदि ये कहा जाए कि अन्य दोनों-अन्याय और अभाव की समस्याएं भी अज्ञान के कारण ही जन्म लेती है, तो अनुचित नहीं होगा।

Tuesday, October 4, 2011

विजयादशमी: 'विरथ रघुवीरÓ की विजय यात्रा



हरिराम पाण्डेय
6अक्टूबर2011
दशहरा यानी विजयदशमी। बुराई पर अच्छाई की विजय। लेकिन इस विजय का अर्थ क्या है? क्या यह आधिपत्य है, अथवा यह कोई अपने लिए किसी वैभव की प्राप्ति है? यदि हम प्राचीन दिग्विजयों की कथाओं का विश्लेषण करें तो तीन बातें स्पष्ट होती हैं -
एक तो इन दिग्विजयों का उद्देश्य आधिपत्य स्थापित करना नहीं रहा हैं। कालिदास ने एक शब्द का प्रयोग किया है - 'उत्खात प्रतिरोपणÓ। यानी उखाड़ कर फिर से रोपना। यह उस क्षेत्र के हित में होता है। उसी क्षेत्र के सुयोग्य शासक को वहां का आधिपत्य सौंपा जाता हैं। उस क्षेत्र की दुर्बलताएं अपने आप नष्ट हो जाती है।
दूसरी बात इस प्रकार की विजय यात्रा में निहित थी कि किसी सामान्य जन को सताया नहीं जाय। विभीषण किसी भी प्रकार रावण की चिता में अग्नि देने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। राम ने कहा कि बैर मरने के बाद समाप्त हो जाता हैं।
तीसरी बात यह थी कि दिग्विजय का उद्देश्य उपनिवेश बनाना नहीं था, न अपनी रीति नीति आरोपित करना था। भारत के बाहर जिन देशों में भारत का विजय अभियान हुआ, उन देशों को भारत में मिलाया नहीं गया, उन देशों की अपनी संस्कृति समाप्त नहीं की गई, बल्कि उस संस्कृति को ऐसी पोषक सामग्री दी गई कि उस संस्कृति ने भारत की कला और साहित्य को अपनी प्रतिभा में ढाल कर कुछ सुंदरतर रूप में ही खड़ा किया।
अब प्रश्न है कि केवल राम का ही विजयोत्सव क्यों इतना महत्वपूर्ण है? इसका कारण है वह अकेले 'एक निर्वासित का उत्साहÓ है, जिसने राक्षसों से आक्रांत अत्यंत साधारण लोगों में आत्मविश्वास भरा और जिसने रथहीन हो कर भी रथ पर चढ़े रावण के विरुद्ध लड़ाई लड़ी।
ऐसी यात्रा से ही प्रेरणा ले कर गांधी जी ने स्वाधीनता के विजय अभियान में जिन चौपाइयों का उपयोग किया वे 'रामचरितमानसÓ की हैं - 'रावनु रथो बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।Ó ऐसी विजय में किसी में पराभव नहीं होता, राक्षसों का पराभव नहीं हुआ, केवल रावण के अहंकार का संहार हुआ। राक्षसों की सभ्यता भी नष्ट नहीं हुई। उसी प्रकार जैसे अंग्रेजों का पराभव नहीं हुआ। अंग्रेजों की सभ्यता नेस्तनाबूद करने का कोई प्रयत्न भी नहीं हुआ, केवल प्रभुत्व समाप्त करके जनता का स्वराज्य स्थापित करने का लक्ष्य रहा। इसलिए विजयादशमी आज विशेष महत्व रखती है। हमारे लिए विजययात्रा समाप्त नहीं होती, यह फिर से शुरू होती है, क्यों कि भय और आतंक से दूसरों को भयभीत करने का विराट अभियान जब तक है, कम हो या अधिक, विरथ रघुवीर को विजययात्रा के लिए निकलना ही पड़ेगा। सभी विज्ञापनदाताओं , पाठकों और हितैषियों की यह विजययात्रा शुभ हो।

जाके बैरी चैन से सोये, वाके जीवन पर धिक्कार

हरिराम पाण्डेय
4अक्टूबर2011
इन दिनों पश्चिमी देशों में खास कर अमरीका में एक बहस चल रही है कि क्या फांसी की सजा जायज है? अमरीका में 1970 के पूर्व फांसी की सजा पर पाबंदी थी पर 1970 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे लागू किया और आज उस पर फिर सवाल उठाये जा रहे हैं लेकिन उसमें कहीं भी यह बहस नहीं है कि देशद्रोह के अपराधी को फांसी नहीं दी जाए, लेकिन हमारे देश भारत में संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को क्षमा देने के प्रस्ताव पर क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के लिए हमारे राष्ट्रीय दलों-कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी तथा राज्य के प्रमुख दलों-नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी ने जिस तरह की शर्मनाक भूमिका निभाई उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि इन पार्टियों में राष्ट्रीय स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम का कोई भी जज्बा नहीं है। अफजल गुरु को क्षमादान देने का प्रस्ताव विधानसभा में आना ही नहीं चाहिए था और अगर वह आ गया था तो इन चारों राजनीतिक दलों का यह फर्ज था कि वे सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित कराते कि अफजल गुरु को जल्द से जल्द मृत्युदंड दिया जाए। इसके विपरीत इन दलों ने ऐसा माहौल बनाया जिससे इस प्रस्ताव पर कोई चर्चा ही न हो सके। सबसे पहले भाजपा के विधायकों ने नारेबाजी करके सदन के काम में बाधा डाली जो निश्चय ही प्रस्ताव का विरोध माना जा सकता है, मगर कांग्रेस के उप मुख्यमंत्री सहित उसके विधायकों ने प्रस्ताव का विरोध करने के बजाय इन विधायकों की ही सदस्यता समाप्त करने की मांग उठा दी। दरअसल, विधान परिषद के चुनावों में भाजपा के कुछ विधायकों ने दूसरे दलों के पक्ष में वोट डाले थे। भाजपा ने इन्हें निलंबित कर रखा है मगर विधानसभा में इनकी सदस्यता बनी हुई है। कांग्रेस की इस मांग का औचित्य अपनी जगह है मगर इस समय विरोध करने का अर्थ इस बात के अलावा और क्या हो सकता है कि सरकार में नेशनल कान्फ्रेंस की सहयोगी कांग्रेस को नहीं मालूम कि संबंधित प्रस्ताव का विरोध किया जाए या समर्थन? उसने, जाहिर है, ऐसी रणनीति बनाई जिससे प्रस्ताव पर चर्चा ही न हो सके और बात विधानसभा के अगले सत्र तक के लिए टल जाए क्योंकि नियमों के अनुसार सदन की विषय सूची में दर्ज किसी विषय पर अगर निर्धारित दिन विचार नहीं होता तो फिर उस सत्र में उस पर विचार ही नहीं हो सकता। संसद पर हुआ हमला देश पर हुए आक्रमण के समान था, जिसमें कुछ पाकिस्तानी आतंकवादी मौके पर ही मार डाले गए थे। कश्मीरी आतंकवादी अफजल गुरु की हमले की साजिश में भूमिका मानकर सुप्रीम कोर्ट उसे मौत की सजा दे चुका है मगर हमारे ढीले राजनीतिक नेतृत्व की वजह से उस पर अमल नहीं हो पाया है। क्या कांग्रेस उसकी सजा के खिलाफ है? यदि नहीं तो कांग्रेस के विधायकों के लिए इस प्रस्ताव पर ह्विप क्यों नहीं जारी किया गया और क्यों मामला उनकी अंतरात्मा पर छोड़ दिया गया? जहां तक नेशनल कान्फ्रेंस का सवाल है तो यह आग ही मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की लगाई हुई है, जिन्होंने राजीव गांधी के हत्यारों को क्षमादान देने के तमिलनाडु एसेंबली के प्रस्ताव के बाद अपने यहां भी एक शोशा छोड़ा था और जिसे एक निर्दलीय विधायक शेख अब्दुल राशिद ले उड़े। विपक्षी पीडीपी की भूमिका तो और भी ज्यादा खतरनाक है जिसके विधायक सदन में भले ही शांत बैठे रहे हों मगर जिसने क्षमादान का समर्थन किया था। लोकतंत्र में न्याय का हर दरवाजा सभी के लिए खुला रहना चाहिए, मगर अफजल, भुल्लर और राजीव गांधी के हत्यारों को क्षमादान दिलाने के लिए वोटों की खातिर जो गंदी राजनीति की जा रही है, वह देश के लिए अंतत: खतरनाक होगी। क्योंकि अब तक एक राष्टï्र के रूप में हमारी छवि एक 'डरपोक राष्टï्रÓ की बन चुकी है और आहिस्ता- आहिस्ता यह छवि एक दब्बू और नालायक देश की बन जायेगी। इससे ज्यादा शर्म की बात क्या हो सकती है कि चार -छ: हथियारबंद लोग उस तरफ से आते हैं और हमारी संसद को उड़ाने का साहस कर लेते हैं, हाथ में ए के रायफलें लेकर हमारे सबसे बड़े कारोबारी शहर में सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं और हमारे नेता उन्हें बचाने में लगे हैं। यह देश की जनता के मुंह पर तमाचा है और कानून से बदतमीजी।
जाके बैरी चैन से सोये
वाके जीवन पर धिक्कार

मंदी का कारण पूंजी संचय की नीति है

हरिराम पाण्डेय
3अक्टूबर2011
आर्थिक मंदी, कामकाजी वर्ग में बढ़ती कंगाली और राजकोषीय पूंजी के बारे में सन्मार्ग कार्यालय में एक बहस के दौरान एक आर्थिक सलाहकार ने बड़ी दिलचस्प बात कही। पूंजी के आगमन और उसके विनियोग में भारी अंतर पैदा होता जा रहा है। मसलन किसी को किसी वित्तीय संस्थान से 100 करोड़ की सहायता मिलती है। अब वह निवेशक उसका आधा संचित कर लेता है और आधा ही विनिवेश के लिये प्रयुक्त होता है, इससे विकास सुस्त पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में वह कटौती के लिये कदम उठाता है, नतीजतन कामकाजी वर्ग में गरीबी फैलने लगती है और धीरे- धीरे मंदी बढऩे लगती है। आज दुनिया का आर्थिक संकट, उससे निपटने के लिए सरकारों द्वारा कटौती उपायों की घोषणा और जनता द्वारा कथित मितव्ययिता के उपायों का विरोध विकास की खगोलीय अवधारणा की विफलता के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की नयी आहट है। ब्रिटेन, यूनान, स्पेन से लेकर इटली और पूर्वी यूरोप तक के सभी राजनेता और अर्थशास्त्री संकट के कारणों से अधिक पूरी बहस को संकट के उपायों पर केंद्रित कर रहे हैं। कई देशों का कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद के नब्बे या सौ प्रतिशत से भी अधिक हो चुका है। इस ऋण भार से निपटने के लिए यूरोपीय देशों की सरकारें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोपीय सेंट्रल बैंक के निर्देश पर राजकोषीय घाटे में कमी लाने की कोशिश कर रही हैं। अब इस कटौती का भार मध्यवर्गीय परिवारों के जेबों से निकालने के लिए पूरी पश्चिमी दुनिया वालों के खर्च में कटौती की शुरुआत हो चुकी है। इससे उस वर्ग की वास्तविक आय और सामाजिक सुरक्षा बुरी तरह प्रभावित हो रही है। यह कटौती जहां मध्यवर्गीय कामगारों की आय और सामाजिक सुरक्षा को ध्वस्त कर रही है, वहीं बाजार के स्वामियों और उच्च मध्यवर्ग के लिए और अमीरी का कारण भी बन रही है। कमोबेश यही स्थिति भारत सहित सभी एशियाई देशों में पैदा हुई है। भारत का कुल ऋण उसके सकल घरेलू उत्पाद के 56 प्रतिशत के आसपास है। भारतीय विकास के नीति निर्माता ऊंची विकास दर के कारण इसे अपनी एक उपलब्धि कह सकते हैं। परंतु विकास के इस वितरण की तसवीर आर्थिक संकट में फंसे पश्चिमी देशों की तुलना में कहीं ज्यादा खराब है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के निर्देश पर मितव्ययिता का अर्थ है आम आदमी की आय में कटौती, जो निश्चय ही अर्थव्यवस्था में प्रभावी मांग को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी। फिर मांग में गिरावट का अर्थ है मांग और आपूर्ति के संतुलन का बिगडऩा। मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़कर ही अर्थव्यवस्था में मंदी का कारण बनता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद केन्स के राजकीय हस्तक्षेप के सिद्धांत पर चलकर ही विश्व अर्थव्यवस्था ने 1930 की महामंदी को झेला था। अब आर्थिक विकास की खगोलीय अवधारणा के पैरोकार पूंजी संचय के जुनून में भूमंडलीकरण के इस विरोधाभासी संबंध को समझना ही नहीं चाहते कि वर्तमान आर्थिक संकट बढ़ते राजकीय व्यय के कारण नहीं, बल्कि उनकी उत्पादन-विरोधी पूंजी संचय की नीतियों के कारण है।