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Wednesday, July 29, 2015

चेत जाना जरूरी है

पंजाब के गुरदासपुर में सोमवार को आतंकी हमला हुआ जिसका पंजाब पुलिस ने बड़ी दक्षता और साहस से मुकाबला किया। इसमें पुलिस के सात लोग शहीद हो गये और तीन आतंकी मारे गये। घटनास्थल पर चीन के बने बम पाये गये। वहां बरामद जी पी एस से पता चला कि हमलावर रविवार को ही पाकिस्तान से आये थे। पंजाब में विगत दो दशक में यह पहला हमला है और जम्मू- कश्मीर के बाहर इस तरह के मोर्चे बनाकर पहला फिदायीं हमला है। यहां यह बताना उचित होगा कि यह क्षेत्र जम्मू क्षेत्र के करीब है। इस हमले को लेकर कुछ ज्ञान गुमानी लोगों में दो बातें चल रही हैं। पहली कि यह खालिस्तान की मांग से जुड़ा है और दूसरा यह लाकूब मेमन की फांसी का बदला है। हालांकि इसकी समीक्षा करें तो दोनों जुमले भ्रामक हैं। यह हमला खालिस्तान की मांग से इसलिये जुड़ा नहीं है कि ‘खालिस्तान समर्थक आत्महंता नहीं हैं और इस हमले में जीवन के समाप्त हो जाने तक लड़ते रहने का संकल्प दिखता है। ’ रही बात याकूब मेमन की फांसी के बदले स्वरूप तो यह हमला गुरदासपुर में नहीं होता बल्कि महाराष्ट्र या दिल्ली में होता। यह हमला वहां इसलिये हुआ कि जम्मू- कश्मीर में सीमा पर कड़ी चौकसी होने के कारण फिदायीं आतंकी समूहों को नये मार्ग तलाशने पड़े। उनके पास जीपीएस का पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि वे इस क्षेत्र से अनजान थे। आतंकी अनजान क्षेत्रों में अक्सर अपना टार्गेट जी पी एस से ही खोजते हैं। आईबी ने इस महीने के शुरू में आर्मी स्टेशन्स पर हमले की चेतावनी दी थी। जिन स्टेशन्स को लेकर खासतौर पर चेतावनी दी गई थी उनमें 9 कोर (हिमाचल प्रदेश), 26 इन्फेंट्री डिविजन (जम्मू-कश्मीर) और 29 इन्फेंट्री डिविजन (पठानकोट) शामिल हैं। इन तीनों पर हमले की आशंका इसलिए है क्योंकि ये तीनों ही क्रॉस बॉर्डर आतंकवाद से निपटने में माहिर मानी जाती हैं। घारोट से घुसपैठ की आशंका को तो खास तौर पर आईबी अलर्ट में उल्लेख किया गया था। दीना नगर के करीब कठुआ पुलिस स्टेशन पर इसी साल मार्च में हमला हो चुका है लेकिन इसके बाद भी पंजाब के थानों की सुरक्षा कड़ी नहीं की गई।

जहां तक हमले का चरित्र है उसका अध्ययन करने पर पता चलता है कि यह लश्कर-ए तायबा और जैश-ए-मोहम्मद की कार्रवाई हो सकती है। इन संगठनों के आतंकियों ने इस बार हमले की जगह जम्मू से बदल कर पंजाब कर दी थी। भारी हथियारों और पूरे रसद पानी के साथ आए इन आतंकियों का निशाना इस राजमार्ग से होकर गुजरने वाले अमरनाथ यात्री बनने वाले थे। लेकिन कश्मीर के बलताल में बादल फटने के बाद अमरनाथ यात्रा को तात्कालिक रूप से रोक दिया गया था और यह राजमार्ग आस्थावानों की भीड़ से खाली था। इस ईश्वरीय संयोग ने तीर्थयात्रियों की जान तो बचा ली लेकिन इसकी कीमत देश के सात सपूतों को अपनी जान से चुकानी पड़ी। पठानकोट जम्मू हाईवे कोई ऐसा- वैसा राजमार्ग नहीं है। जम्मू- कश्मीर को भारत की मुख्यधारा से जोड़ने वाली यह इकलौती सड़क है और पाकिस्तान से लगी हमारी सीमा के लगभग समानांतर चलती है। कई जगहों पर सीमा से इसकी दूरी पांच किलोमीटर तक सिमट जाती है। इसलिए पाकिस्तान के आतंकियों के हमले के लिहाज से यह खास संवेदनशील इलाका है। इस साल आतंकियों ने कम से कम तीन बार इस राजमार्ग को निशाना बनाया है जिस पर हमें तत्काल चेतने की जरूरत है। इस राजमार्ग के किनारे सेना के दर्जनों कैंटोनमेंट हैं और अनेक रेलवे स्टेशन इससे जुड़े हैं। ऐसे हमले तड़के उस समय होते हैं जब दुनिया की अलसायी आंखें खुल रही होती हैं और व्यवस्था अमूमन सुस्त रहती है। ऐसी हालत में पाकिस्तान को कोसने से कुछ नहीं होने वाला। अपने बचाव की हर तैयारी हमें खुद रखनी होगी और हर ऐसी कायराना हरकत के मुंहतोड़ जवाब के लिए सतर्क रहना होगा। आतंक पर राजनीति की रोटियां सेंकने वालों पर भी तत्काल लगाम की जरूरत है। पिछले दिनों रूस के उफा शहर में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों में जैसी गर्मजोशी नजर आई थी, उसके लिए नवाज शरीफ का जबर्दस्त विरोध हुआ।

पाकिस्तान के कट्टरपंथी डरे हुए हैं कि कहीं दोनों मुल्कों के रिश्ते सुधरने न लगें। लगता है, यह हमला दोस्ती की किसी भी संभावना को कमजोर करने के लिए ही कराया गया है। खुद पाकिस्तान सरकार भी देश में अपने पांव टिकाए रखने के लिए भारत विरोधी बयानबाजी का सहारा लेती है। अगले महीने दोनों मुल्कों के नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर्स की मीटिंग होने वाली है। मीटिंग में पाकिस्तान 'बलूचिस्तान में भारत की भूमिका' का मुद्दा उठाएगा। एक बात तो तय है कि अभी की स्थितियों में पाकिस्तान पर भरोसा करना बेहद मु्श्किल है। फिर भी बातचीत का रास्ता बंद नहीं होना चाहिये। पाकिस्तान को यह अहसास करा देना जरूरी है कि भारत विरोधी आतंकवाद को पालना व्यर्थ है।

Sunday, July 26, 2015

पत्र पत्रिकाओं का साहित्य की भाषा को अवदान


 उत्तर प्रदेश ​​हिन्दी संस्थान द्वारा 23-24 जुलाई 2015 को वाराणसी में आयोजित राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में ‘समाचार पत्र और साहित्य : बदलते आयाम ’ संगोष्ठी में ब्लागर हरिराम पाण्डेय द्वारा ‘पत्र पत्रिकाओं का साहित्य की भाषा को अवदान’ विषय पर दिया गया व्याख्यान।

पत्र पत्रिकाओं का साहित्य की भाषा को अवदान

- हरिराम पाण्डेय

सम्पादक सन्मार्ग, कोलकाता

यहां स्पष्ट कर दें कि मीडिया का सामान्य अभिप्राय समाचारपत्र, पत्रिकाओं, टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट आदि से लिया जाता है। ये आधुनिक मीडिया के चर्चित और प्रभावशाली रूप हैं, जो सूचनाओं के संग्रहण एवं संप्रेषण का दायित्व बाखूबी निभाते हैं। समाचार पत्र और पत्रिकाएं आज समाज के सभी वर्गों के बीच रुचि से पढ़े जाते हैं । यहां यह बहुत महत्वपूर्ण है कि पत्रकारिता की भाषा कोई वायवीय आ आकाशीय भाषा नहीं है न ही व विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की तरह अलग है । उसका संबंध तो सीधा जनता एवं उसके सरोकारों से है । पत्रकारिता की भाषा जीवन की भाषा से अलग नहीं है, वह जिंदगी के साथ हंसती, खेलती, बतियाती हुई चलने वाली भाषा है । समाचार पत्रों की भाषा न तो सर्वथा और शुद्ध साहित्यिक है न ही आम-फहम । वह दोनों के बीच की एक चीज है जो वस्तुतः लोकव्यवहार से प्रभावित होती है। डेनियल डेफो के अनुसार – ‘यदि कोई मुझसे पूछे कि भाषा का सर्वोत्तम रूप क्या हो, तो मैं कहूँगा कि वह भाषा, जिसे सामान्य वर्ग के भिन्न-भिन्न क्षमता वाले पांच सौ व्यक्ति (मूर्खों एवं पागलों को छोड़कर) अच्छी तरह समझ सकें।’ जहां तक ,साहित्य का शब्दार्थ है, सबका कल्याण, सः हितः, यानी ऐसी युक्ति ऐसा नियोजन, ऐसा माध्यम, ऐसी संप्रेरणा जिसके पीछे किसी एक वर्ग-जाति-धर्म-समाज-समूह-संप्रदाय-देश के बजाय समस्त विश्व-समाज के कल्याण की भावना सन्निहित हो। साहित्यकार के पास भरपूर कल्पनाशीलता और विश्वदृष्टि होती है। अपनी नैतिक चेतना से अभिप्रेत, कल्पनाशीलता के सहयोग से वह श्रेयस् के स्थायित्व एवं उसकी सार्वत्रिक व्याप्ति के लिए शब्दों तथा अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों द्वारा प्राणीमात्र के कल्याण का प्रयोजन रचता रहता है। संपूर्ण चराचर जगत के कल्याण यानी ‘सर्व भूत हिते रतः’ की सद्कामना ही साहित्यकार का अभीष्ठ होती है। सृजन के आनंदोत्सव के दौरान वह न तो ‘राजपाट की वांछा रखता है, न स्वर्ग, न ही मोक्ष आदि की। वह सच्चे मन से कामना करता है कि प्राणिमात्र के दुःखों और व्याधियों का अंत हो। सभी सुखी हों, सभी निर्भीक होकर मुक्त विचरण करें।
समाचार पत्र  जीवन के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यावसायिक, खेलकूद एवं चलचित्र आदि सभी पक्षों की प्रस्तुति करते हैं । इसलिए एक औसत भारतीय की समझ एवं परिवार के समस्त सदस्यों की रुचि के विषय एवं उनकी समझ में आने वाली भाषा का विचार यहाँ निरंतर चलता रहा है । भाषा के सवाल पर अखबार को सदैव अपने पाठकों की बौद्धिक क्षमता और अवधारणा शक्ति के अनुरूप बनने के प्रयास करना होता है । ऐसे अनेक कारणों से उसकी भाषा में व्यापकता, सर्वजन सुबोधता, प्रयोगधर्मिता और लचीलापन होता है, जो उसे एक विशिष्टता प्रदान करता है । भाषा शास्त्रियों ने इस तथ्य की ओर बराबर संकेत किया है कि प्रयोग क्षेत्रों के अनुसार भाषा एक विशिष्ट स्वरूप धारण कर लेती है । इसी प्रकार उसकी शब्दावली एवं भाषायिक समझ का विकास होता चला जाता है । पत्रकारिता की भाषा की यही स्थिति है । हालांकि पत्रकारिता के भाषायी स्वरूप एवं उसके जन सरोकारों को लेकर बराबर बहस चलती रही है पर वह आज तक किसी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंची है। साहित्य की भांति पत्र-पत्रिकाओं को भी समाज का दर्पण कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पत्र-पत्रिकाओं में प्रारंभ से ही साहित्य का एक निश्चित हस्तक्षेप रहा है। प्रारम्भिक दौर के प्राय: अनेक महत्वपूर्ण साहित्यकार या तो पत्र-पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं, या किसी न किसी रूप में पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे हैं। साहित्य की विकास यात्रा को समझने के लिए पत्र-पत्रिकाओं को महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। साहित्य में जहां प्राणिमात्र का अंत: और बाह्य जगत चित्रित होता है, वहीं पत्र-पत्रिकाओं में समाज एवं जीवन का प्रतिबिम्ब अंकित होता है। हिंदी समाज, भाषा और साहित्य की संरचना में पत्र-पत्रिकाओं ने महती भूमिका निभाई है। पत्र-पत्रिकाओं से नवजागरण का कार्य तो होता रहा, इसके साथ साहित्य और भाषा में संशोधन भी होता रहा। विदेशी साहित्य के संपर्क में आए हिन्दी के साहित्यकारों के लेखन पर इस साहित्य का प्रभाव स्वाभाविक रूप से पड़ रहा था। विदेशी साहित्य से प्राप्त ज्ञान को इन पत्र-पत्रिकाओं ने दूर-दूर तक पहुँचाने का कार्य किया, अनेक नवोदित रचनाकार पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से ही जाने गए। पत्रिकाओं के माध्यम से सामान्य जन की समस्याओं को भी प्रभावकारी ढंग से जनमानस और शासन के सामने रखा जा सका। इससे समाज में व्यक्ति स्वातंत्र्य की चेतना पैदा हुई । हिंदी साहित्य को 1886-1900 ई. के बीच विशेष दिशा मिली और नवजागरण में तेजी आई। इस समय पत्र-पत्रिकाओं के लेखों और उनकी रचना प्रक्रिया में भी परिवर्तन हुआ, साथ ही साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन में भी वृद्धि हुई। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी पत्रकारिता को एक महत्वपूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित किया । उन्होंने लेखों और पुस्तकों में व्याकरण और भाषा की अशुद्धियाँ दिखाकर लेखकों को सावधान किया, जिसके जरिये भाषा में एक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया। सरस्वती पत्रिका में जो लेख छपते थे, उनके विषय विविध होते थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित सरस्वती बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरण का विश्वकोष है। वे विविध विषयों के विद्वानों से हिंदी में लेख लिखवाकर छापते थे। द्विवेदी जी शास्त्र और सर्जना दोनों पर ध्यान देते थे। उन्होंने सरस्वती के माध्यम से साहित्यिक रचनाओं की अशुद्धियों को दूर करने का कार्य किया, जिससे हिंदी साहित्य को संशोधित, प्रचारित और प्रसारित होने का अवसर मिला। अनेक शास्त्रीय रूढिय़ां टूटीं, जिससे साहित्यिक उद्देश्य व्यापक हुआ। इस पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली में राष्ट्रभाषा और राजभाषा बनने की क्षमता प्राप्त हुई। पहली हिंदी कहानी भी सरस्वती पत्रिका में ही प्रकाशित हुई। पत्रिकाओं से भाषा और साहित्य का साथ-साथ विकास हुआ। पत्रिकाओं का मूल लक्षण भावों और विचारों का सटीक एवं व्यापक संप्रेषण है जो मानव हित में हो। पत्र-पत्रिकाओं ने साहित्य की विधाओं के विकास में सहयोग किया है। इनके प्रारंभ के बाद से ही कहानी, उपन्यास, जीवनी, आत्मकथा, यात्रा वृत्तांत, संस्मरण, गद्यगीत, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, आलोचना, समालोचना, डायरी और निबंध आदि विधाओं को पल्लवित और पुष्पित करने में पत्रिकाएं सदैव अग्रणी रहीं हैं। साहित्य जीवन को प्रतिबिंबित करता है और इसके जरिये  समाज का बौद्धिक विकास होता है। साहित्य और पत्रिकाओं का मुख्य लक्ष्य मानव समाज में एकता एवं पारस्परिकता की भावना स्थापित करना है । मानव के भावों विचारों की सरल अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन साहित्य है, जो अपनी विभिन्न विधाओं द्वारा रचनाकार की लेखनी से प्रकाशित होता है।
इसके लिए रचनाकार को उसकी रचनाओं के लिये कच्चा माल आपूर्ति करने की गरज से  एक ओर  समाचार पत्र और पत्रिकाएं जहां सरकार और सत्ता-केंद्रों यथा धर्मसत्ता, राजसत्ता, अर्थसत्ता आदि की योजनाओं, कार्यक्रमों तथा उपलब्धियों को जनता के बीच ले जाती है। उनकी विशेषताओं, कमजोरियों और खामियों पर समालोचनात्मक विमर्श करता है, वहीं वह जनता की इच्छा-आकांक्षाओं, सपनों, उसकी अंदरूनी हलचलों और विभ्रमों को भी उसके दूसरे वर्गों एवं विभिन्न सत्ता-केंद्रों तक पहुंचाने का कार्य करती है। संवादवहन की इस प्रक्रिया में तथ्यों एवं घटनाओं के प्रस्तुतीकरण की ईमानदारी और निस्पृहता ही उसकी व्यावसायिक नैतिकता को रेखांकित करती है। लोकतांत्रिक समाजों में जनता चूंकि अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से स्वयंशासित होती है, इसलिए उनमें मीडिया का दायित्व और भी बढ़ जाता है। इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जब मीडिया की शक्ति एवं लोकमानस पर उसकी पकड़ को पहचानते हुए महान लोगों ने उसका उपयोग लोक-परिवर्तन के अहिंसक, प्रभावशाली और भरोसेमंद हथियार के रूप में किया है। यहीं  साहित्य इस परिवर्तन को रेखांकित करते हुये कालजयी रचनाओं को जन्म देता है।
शब्द से भाषा का सृजन होता है। शब्द  अपने आप अर्थ नहीं ग्रहण करते , वे सदा एक खास प्रकार के कॉन्सेप्ट से जड़े होती हैं। शब्दों के अर्थ सदा एक बिम्ब तैयार करते हैं और वही बिम्ब अर्थ बन कर हमारे मन में उभरते हैं। अगर शब्दों की बात करते हैं तों तो 70 के दशक के पहले तक उसका अर्थ एक रचनात्मक और सोद्देश्यपूर्ण क्रांतिकारी के रूप में उभरता था और अचानक वह आज के नौजवानों के बीच विध्वंसक अर्थ लेकर प्रगट होता है। यह नया अर्थ उसे मीडिया ने ही दिया। जैसे नवजागरण काल के पहले की खाक और खाकी नवजागरण काल में खाकी वर्दी के रोब और आदर्शों का बिम्ब था और अब जुल्म तथा भ्रष्टाचार का बिम्ब पैदा करता है। यहां कहने का अर्थ है कि साहि​त्यिक बिम्ब विधान के लिये शब्द बिम्बों की आपूर्ति समाचार पत्र और पत्रिकाएं ही करतीं हैं।
बेशक आप पत्र पत्रिकाओं की भाषा को चाहे जितना कोस लें लेकिन यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिये कि वस्तुत: पत्रपत्रिकाएं जितनी बड़ी जनसंख्या को छूती हैं, विशुद्ध साहित्य का उतनी बड़ी जनसंख्या तक पहुँचना असंभव है।  समाज के जिस वर्णपट तक इसकी पहुंच होती है और जिस स्तर से इसका संवाद हाता है वहां साहित्य नहीं पहुंच सकता और उस वर्ग की अशाओं, सपनों एवं पीड़ा  को चित्रित करने के लिये साहित्य को माटी के शब्द सदा पत्र पत्रिकाओं से ही लेने होते हैं। बस हमें याद रखना होगा कि मीडिया और साहित्य दोनों अन्योन्याश्रित हैं, उनके बीच अटूट-सी सहसंबद्धता है, उनके वर्तमान संबंध भले ही अस्पष्ट और दुविधामय नजर आते हों।



उत्तर प्रदेश ​​हिन्दी संस्थान द्वारा 23-24 जुलाई 2015 को वाराणसी में आयोजित राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में ‘समाचार पत्र और साहित्य : बदलते आयाम ’ संगोष्ठी में ब्लागर हरिराम पाण्डेय( ऊपर वाले चित्र में दायें से दूसरे), विख्यात कवि एवं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष डा. उदय प्रताप सिंह, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक एवं कवि डा. सुधाकर अदीब, तिब्ब्ती विश्वविद्यालय सारनाथ के कुलपति प्रो एल एन शास्त्री एवं अन्य।

Sunday, June 21, 2015

भारतमित्र दैनिक पत्र में पत्रकारिता पर मेरा आलेख


Saturday, May 2, 2015

मतदाता बना अन्नदाता की खुदकुशी

भारत गांवों का देश है। यहां फौज के जवानों की अगर इज्जत है तो गांवों में अन्न उपजाने वाले किसानों की भी बराबर प्रतिष्ठा है। इसी कारण लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था‘जय जवान , जय किसान।’ यही नहीं जवानों और किसानों की तुलना करते हुये पेशे से सख्त पुलिस अफसर और दिल से बेहद कोमल कवि एवं गायक मृत्युंजय कुमार सिंह ने लिखा :

तोहsरो बलम कप्तान सुनs सजनी

हमsरो बलमुआ किसान, हो सजनी,

तोहsरो बलsमुआ के मथवा पs टोपिया

करेले ऊ खूनsवा के दान

तs हमsरो बलsमुआ के माथे रे पगड़िया

करे ले ऊ अनsवा के दान सुन सजनी

इस बेहद संवेदनशील गीत में जो सामाजिक सामंजस्य है वह अब खत्म होता जा रहा है या कहें खत्म हो गया। अब सियासत ने अन्नदाता को मतदाता बना दिया तथा मत ले कर उनसे अन्न छीनने के बाद उनके ऋण माफ कर स्वयं का जय-घोष करने वाले क्या अब कुछ मानवीय होंगे? किसान की​ आत्म हत्या हमारी संवेदना की मौत का दृश्य है । सूखे, फटे, उजड़े, खेतों के किसी अनजान कोने में वह मर जाने वाले उस किसान की पीड़ा से राष्ट्र अनजान ही रहता है। उसके खाली बर्तनों में अन्न नहीं है। कुचले डिब्बों में दाना नहीं, फटे कुर्ते में सिक्के नहीं। वह क्या करेगा। राजधानी के मध्य में बदलाव लाने का दावा करने वाली सरकार की सभा में एक किसान की खुदकुशी चाहे जितने कानूनी और सियासी पहलुओं के दरवाजे खोलती है लेकिन इसका सबसे बड़ा पक्ष है कि अब तक जिन किसानों को सरकारें इस्तेमाल करती रही हैं ये मौतें उनका पीछा करेंगी। किसानों की आमदनी के स्रोत राजनीतिज्ञों की बनायी नीतियों ने सोख लिया अब किसान विवश हैं। दिल्ली में जो आत्महत्या हुई है वह इसी विवशता का प्रतिबिम्ब है। वह प्रयास बना जीवन से मुंह मोड़ने का। वह प्रथम रहा जो हजारों किसानों को जिंदा जता गया कि जितने भी उन्हें इकट्ठे कर जोड़ने का जतन दिखा रहे हैं, वे उन्हें तोड़ने का तांडव कर रहे हैं। किसान जुड़ जाएंगे तो खेतों में पसीना बहाकर सोना निकालेंगे। रैलियों में क्यों जाएंगे? दिल्ली एक किसान मरता रहा और और मुख्यमंत्री भाषण देते रहे। गुरूवार को संसद में शोर मचा यानी मौत भी उनके लिये अवसर बन गयी है।

मृत्युंजय अपने धुन में गाते हैं

तोहsरो बलsमुआ के छाती पs के तsकमा में

चमsकेला देसवा के सान

तs हमsरो बलsमुआ के गेहूँआ के बलिया में

दमsकेला धरsती के जान सुनs सजनी

लेकिन सुनता कौन है। जिसे सुनना है वह तो मौके की तलाश में है। जिन देशवासियों ने रात को समाचार देखे-सुने, उन्हें भरोसा नहीं हुआ कि नेता, हर एक पार्टी के नेता, ‘किसान आत्महत्या क्यों करते हैं’ पर भयानक आरोप-प्रत्यारोप में लीन थे।
जंतर मंतर पर हजारों लोगों की भीड़ के सामने पेड़ से लटक कर खुदकुशी कर लेने वाले राजस्थान के किसान गजेंद्र सिंह की मौत अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गई है । ये सवाल एक तरफ जहां आम आदमी पार्टी और उसके नेताओं के रवैये को लेकर हैं, तो दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन और व्यवस्था संभाल रहे लोगों के साथ-साथ आसपास मौजूद अन्य लोग भी सवालों के घेरे में हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब गजेंद्र फांसी लगा रहे थे, तब किसी ने उन्हें रोकने की कोशिश क्यों नहीं की? ऐसा कैसे हुआ कि हजारों लोगों की भीड़ के बीच पेड़ पर चढ़े एक शख्स ने खुदकुशी कर ली और करीब 15-20 मिनट तक किसी का उस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। कहते हैं कि, अपनों के मरने पर जानवर तक दुखी हो जाते हैं लेकिन ये दुखी नहीं हुये , कौन सी प्रजाति के जानवर हैं ये। जय-जवान, जय-किसान का देश हमेशा याद रखेगा। जिस राष्ट्र का किसान हताश, वहां हर तरक्की बिखरते परिवारों को रौंदकर होगी।

Saturday, December 6, 2014

हम हंसना भूलते जा रहे हैं

आजादी के 67 वर्षों बाद भी हमारा समाज धर्म, क्षेत्रीयता और जातीयता  के आधार पर बंटा हुआ है। यह एक सामूहिक विफलता है और इसके लिए केवल वे लोग नहीं जिम्मेदार हैं जो धर्म की राजनीति करते हैं बल्कि वे लोग भी हैं जो सेकुलरिटी की आंच पर अपनी रोटी सेंक रहे हैं। ये खोटे सिक्के के दो पहलू हैं। हमारा देश चाहे जितनी तरक्की कर जाये लेकिन वह तरक्की बेमानी होगी। राजनीतिज्ञ बांटने की राजनीति कर रहे हैं और हम उसे लेकर लगातार बंटते जा रहे हैं। यही नहीं इसके लिए हमारा मीडिया भी दोषी है। एक अशालीन बात ममता जी ने एक जनसभा में कह दी और उसे अंग्रेजी मीडिया ने उछालना शुरू कर दिया। उन्होंने यह बात बंगला में कही थी और उसे अंग्रेजी या हिंदी में समझाने की कोशिश की जा रही है। जब अटल बिहारी वाजपेयी 13 दिनों के लिये प्रधानमंत्री बनने के बाद कोलकाता आये थे तब उन्होंने स्थानीय प्रेस क्लब में 'मीट द प्रेसÓ कार्यक्रम में एक जुमला कहा था, 'घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाये क्या।Ó अंग्रेजी और बंगला में इसका अनुवाद हुआ और पूरे मुहावरे का मजा खराब हो गया। उन्होंने अपनी मूढ़ता पर परदा डालने के लिए बात का बतंगड़ बना दिया। क्या यही निष्पक्षता है मीडिया की। हम तो इतने सैडेस्टिक हो गये हैं कि बात का मजा भी नहीं ले पाते। जहां तक ममता जी की 'बांसÓ वाली बात है वह एक स्थानीय जुमला है। लोकभाषा में इसका इस्तेमाल बहुत गलत नहीं माना जाता है। अलबत्ता इसमें कुलीनता का अभाव है और भदेसपना है। लेकिन यह भाषा का सौंदर्य भी है। गुरुवार को एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने इसी बात की हंसी उड़ाने के लिए इसे मुख्य खबर बनायी है। हमारा मीडिया 'ठस्स पनÓ का शिकार होता जा रहा है। इसका कारण है मीडिया का अपना कामकाजी वातावरण। आज राजनीति की खबर बनाने का वातावरण स्वस्थ नहीं है। जाहिर है कि पत्रकार अपनी बोर परिस्थतियों के शिकार हो रहे हैं , हंसी के सहज प्रसंगों पर हंसने की क्षमता तक खोते जा रहे हैं। वे ममता बनर्जी की व्यंग्यात्मक गुगली को नहीं समझ सके।  इस व्यंग्य में जबर्दस्त ताकत है। पत्रकारों के ऐसे ठस्स पन के कई कारण कहे जा सकते हैं। पहला कारण शायद यही है कि पत्रकार जिस माहौल में काम करते हैं उसमें हंसी-मजाक की जगह शायद बची नहीं है। हर आदमी तनाव में रहता है। शायद काम की बदहवासी उसे हंसने का अवकाश नहीं देती। उनके काम करने की जगह में हंसना शायद मना है। उनकी ट्रेनिंग में तो हंसना होता ही नहीं है। उन्हें अपने कामकाज में हंसने की फुर्सत नहीं मिलती है। कामकाज की जगह में अतिरिक्त तनाव है, कंपटीशन से ज्यादा बदलाखोरी, एकदूसरे की टांग खिचाई है। ऐसे में जब हंसने की बात होगी तो हंसा न जा सकेगा। एक मजाक, एक मुहावरा, एक कटाक्ष लंबे-उबाऊ भाषण से कहीं अधिक संवाद पैदा करता है क्योंकि उसका चुटीलापन सबके आनंद का विषय बनता है। कटाक्षभरी आलोचना घोर विपक्षी के लिए भी सहने की जगह बनाती है। सहनशीलता में दीक्षित करती है। इससे संवाद और बढ़ता है। यह अंग्रेजी में उस तरह से संभव नहीं, लेकिन उसे देसी भाषा  में तो होना चाहिए। क्योंकि वह लोकजीवन  से उद्भूत भाषा है। लोकभाषा  का अपना मिजाज है, जहां हंस कर, उपहास कर, तंजकर, व्यंग्य करके अपनी बात कही जाती है। राजनीतिक विमर्श में ऐसी मजेदार भाषा का इस्तेमाल सबसे पहले लोहिया ने शुरू किया था। इसी जमीन पर अटल जी बोला करते थे और इसी जमीन पर लालू ने राजनीति की टीआरपी इतने दिन बटोरी। इसी राजनीतिक देसी स्कूल के शरद यादव हैं और वे जब बोलते हैं तब बेलौस और दोटूक बातें करने के आदी हैं और जरूरत पडऩे पर व्यंग्य कर बात को इस कदर चुटीली बनाकर पेश करते हैं कि आप हंसते-हंसते लोटपोट हो जाएं। 'पाकिस्तान रंडुआ है और हम रंडुए के चाचाÓ जरा इस मुहावरे पर गौर तो करिए कि शरद यादव कह क्या रहे थे? और इसे सुनकर राम गोपाल यादव जैसे सांसद हंसी से लोटपोट क्यों हुए होंगे? इस मार को वही समझ सकता है जो मुहावरे जानता है, देसी भाषा की कीमियागीरी जानता है। इस पदावली को सुनकर स्त्रीत्ववादी आरोप लगा सकते हैं कि शरद का उक्त कथन 'मर्दवादीÓ पदावली है और इसमें 'रिवर्स सेक्सिज्मÓ की बू आती है!  हंसी की भाषा अलग होती है। वह पत्रकारिता में नहीं सिखाई जाती। जिसके पास हंसी की भाषा ही नहीं वह उसे पहचाने कैसे! अंग्रेजी की हंसी हमारी लोकभाषा की हंसी से अलग होती है, इसलिए लोकभाषा में या हिंदी में कहे वाक्य का हास्य अंग्रेजी में समझा भी कैसे जा सकता है। हंसी की कमी का एक कारण शायद हमारे राजनीतिक विमर्श की बदलाखोर भाषा है जो हल्के- फुल्के क्षणों को बनने ही नहीं देती। हमारी भाषा सपाट, कड़वी और कटखनी बन चली है। ममता जी ने जो कहा ऐसे सबाल्टर्न कटाक्ष भरे मुहावरे अनंत अर्थो की तरंगें देर तक पैदा किया करते हैं। अंग्रेजी वाले लाख अनुवाद करके भी इस मुहावरे का मजा नहीं ले सकते। अफसोस यही हाल हमारे हिंदी वाले रिपोर्टरों का भी है। इसी के कारण चारों तरफ बड़ी गलत फहमियां पैदा हो रहीं हैं। समाज को स्वस्थ सूचना देना पत्रकारिता का धर्म है पर शुष्क सूचना देकर समाज को मानसिक तौर पर बीमार करना कलम का धर्म नहीं है। 

बांस तो शाश्वत है भाई

लस्टम पस्टम
इन दिनों बांस चर्चा में है। बांस पहले भी चर्चा में हुआ करता था पर आज जैसी उसकी शोहरत नहीं थी। वरना हमारे एक मित्र हैं
 अक्सर मंचों पर कविता पढ़ते समय एक खास कविता सुनाते हैं:'बांस के व्यापारी हईं, बांस देहब जी...Ó। यही नहीं , वकीली महकमे में एक मसल तो बेहद मशहूर है कि 'एक बार एक वकील एक केस की बहस कर रहा था। जज साहेब अंग्रेज थे। वकील ने कहा, मी लॉर्ड, देयर वाज ए खूंटा। अब जज साहेब खूंटा पर अटक गये। पूछा , वॉट इज खंटा? वकील ने कहा, मी लार्ड, इट इज ए पीस ऑफ बंबू , हाफ भीतर हाफ बाहर।Ó या फिर आपने सुना होगा कि 'उल्टे बांस बरेली को।Ó या, फिर बंगला की वह मशहूर कविता- 'बांस तुमी केनो झाड़े...Ó। यानी बांस हमारे लोकजीवन में अरसे से है पर आज कल इस पर ज्यादा दबाव है। अरे भाई, हमारे एक कवि मित्र ने हाल के बांस विमर्श पर टिप्पणी की कि बांस उतनी बुरी चीज नहीं है अगर बुरी होती तो कोलकाता के एक आयकर कार्यालय का नाम 'बम्बू विलाÓ क्यों होता। अपने बांस से परेशान एक दूसरे दोस्त ने फरमाया, भाई वहां उस विला में केवल बम्बू है , छोटे बड़े सब वेराइटी के और उसे आयकर विभाग वाले यत्र तत्र डालते हैं। अब कौन उस विला की हेठी करे।
  प्रश्न है कि ,  बांस किसे कहते हैं? भाई मेरे , जिसे देख कर भूत भागते हैं, जिसके इशारे पर शेर नाचते हैं। जिससे बंद सीवर खोले जाते हैं। छोटा दीखता है, कुछ चिकना होता है, किंतु मारक होता है। वार कहीं करता है, घाव कहीं होता है। बांस ना हो तो बांसुरी ना बजे और बजे तो बेसुरी बजे। ... और मजे की बात है कि बांस यदि बॉस के हाथ में हो तो कितना कुछ होता है यह तो बॉसत्व के मारे लोग अच्छी तरह जानते होंगे। कहते भी हैं कि बांस नहीं तो बॉस नहीं। सच बात है। बांस रखना और बांसुरी बजाना बॉस का धर्म है। घनिष्ठ इस संबंध के अतिरिक्त बॉस और बांस के मध्य कुछ समानता भी हैं। मसलन, बॉस और बांस दोनों गांठ -गठीले होते है। प्रत्येक गांठ कुछ शंका, कुछ आशंकाओं, कुछ प्रश्न और कुछ रहस्यों से भरी होती हैं। एक गांठ का रहस्य सुलझाने का प्रयास करोगे, दूसरी गांठ पहली से ज्यादा मजबूत नजर आएगी। गांठें कच्चे धागे की गांठ के समान होती हैं, जो कभी खुलती ही नहीं हैं, प्रयास करने पर उलझती ही चली जाती हैं।
बॉस का और बांस का मुसकराना यदा-कदा ही होता है। सदियों में जाकर कभी बांस पर फूल खिलते हैं और जब खिलते हैं, तो अकाल साथ लेकर आते हैं। बॉस कभी मुस्कराते नहीं है और जब कभी मुस्कराते हैं तो किसी के लिए संकट के बादल लेकर आते हैं। ऐसी ही कुछ समानताओं के कारण बॉस और बांस कभी-कभी एक दूसरे के पर्यायवाची से लगते हैं। अंग्रेज बॉस और बांस के पारस्परिक संबंधों से भीलीभांति परिचित थे, इसलिए वे और उनके अधिकारी हाथ में सदैव बांस रखते थे। उनके लिए बांस बॉसिज्म का प्रतीक था, जिसे वे रूल कहते थे। उस रूल के ही सहारे रूलिंग चलती थी। रूल के सामने शेष सभी 'रूलÓ व्यर्थ थे। बांस के सहारे ही वे 150 वर्ष तक भारत के शानदार बॉस बने रहे। बांस रूपी रूल का ही कमाल था कि उनके राज्य में कभी सूरज डूबा ही नहीं। बांस कमजोर हुआ तो सूरज ऐसा डूबा की अब ब्रिटेन में भी उगने का नाम भी नहीं ले रहा है।
विश्व की समूची राजनीति के दो ही आधार हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म। नटनी के समान विश्व राजनीति भी बांस के सहारे ही तो पतली रस्सी पर चल कर अपना सफर पूरा करती है। हो भी क्यों ना राजनीति और नटनी सगी बहने ही तो हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा, प्रयास करने पर पता किया जा सकता है, मगर राजनीति और नटनी कब किस करवट लुढ़क जाएं किसे पता है। 'उसका बांस मेरे बांस से लंबा क्यों?Ó बांसिज्म के इसी दर्शन पर विश्व की राजनीति टिकी है। समस्या बंगाल की हो या  कश्मीर की हो या अफगान की अथवा इराक की, जड़ में सभी के बांस है। अमरीका आज अमरीका न होता यदि उसके हाथ में बांस न होता। आई एस आई एस इसलिये इतना कत्ले आम कर रहा है कि उसका बांस दूसरे से लम्बा हो जाय। झगड़ा बांस का ही है भाई। मेरे बांस से उसका बांस लंबा क्यों? आज बंगाल की समस्या भी यही है कि दिल्ली का बांस कोलकाता के  बांस से लम्बा क्यों है? हमारा मानना है कि तृतीय विश्वयुद्ध यदि कभी होगा भी तो, न तेल के लिए होगा और न ही पानी के लिए। होगा तो केवल बांस के लिए होगा, क्योंकि युद्ध जब कभी भी हुए हैं, बॉसिज्म और बांसिज्म को लेकर ही हुए हैं। मजबूत बांस वाला ही युद्ध में विजयी होगा और वही विश्व-बॉस कहलाएगा।