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Tuesday, September 1, 2015

मोदी के गुजरात में आरक्षण की आग



26 अगस्त 2015

आजकल जब भी वाट्सएप पर नजर जाती है, हार्दिक पटेल का संदेश ही छाया रहता है। कुछ ही दिनों में 22 साल के हार्दिक ने गुजरात के पटेल समुदाय में अपनी अलग पहचान बनाई है। पिछले चार साल से हार्दिक पटेल अपने समुदाय के लिए काम कर रहे हैं। हार्दिक पटेल की गिरफ्तारी के बाद भड़की हिंसक घटनाओं के बीच गुजरात के कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया है। इस बीच सरकार ने हिंसक समर्थकों को काबू करने के लिए हार्दिक पटेल को रिहा कर दिया है,हालांकि हार्दिक ने आंदोलन जारी रखते हुए गुजरात बंद बुलाया है। वहीं दूसरी ओर अहमदाबाद में हुई हिंसक घटनाओं के बाद नौ थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा दिया गया है और शहर में 13 साल बाद सेना को बुलाया गया है। सरकार ने अफवाह फैलने से रोकने के लिए इंटरनेट सेवा भी बाधित कर दी। आरक्षण को लेकर जारी आंदोलन मंगलवार रात को हिंसक हो गया। पुलिस द्वारा अपने नेता हार्दिक पटेल को हिरासत में लिए जाने से गुस्साए समर्थकों ने अहमदाबाद, जूनागढ़, सूरत, वलसाड, राजकोट और मेहसाणा समेत कई शहरों में वाहनों में तोड़फोड़ और आगजनी की। आरक्षण समर्थकों ने राज्य के गृह राज्यमंत्री रजनीकांत पटेल के आवास पर पथराव किया और आगजनी की। अहमदाबाद, सूरत और मेहसाणा में उग्र हिंसक वारदातों के चलते कर्फ्यू लगा दिया गया। उग्र समर्थकों ने पुलिस वाहनों को कई जगह फूंक दिया। हार्दिक पटेल के आंदोलन को बिहार के सीएम नीतीश कुमार का सपोर्ट मिला है। माना जा रहा है कि नीतीश ने मोदी के विरोध के चलते इस आंदोलन के समर्थन में अपना बयान दिया है। इस समय बिहार में विधानसभा चुनाव की गहमागहमी तेज हो गई है और इस चुनाव को नीतीश बनाम मोदी के तौर पर देखा जा रहा है। गुजरात की कुल आबादी 6 करोड़ 27 लाख है। इसमें पटेल-पाटीदार लोगों की तादाद 20 प्रतिशत है। ये लोग खुद को ओबीसी कैटेगरी में शामिल कराना चाहते हैं, ताकि कॉलेजों और नौकरियों में काेटा मिल सके। आेबीसी में 146 कम्युनिटी पहले से लिस्टेड है। पटेल-पाटीदार समुदाय खुद को 146वीं कम्युनिटी के रूप में ओबीसी की लिस्ट में शामिल कराना चाहती है। राज्य के 120 भाजपा विधायकों में से 40 इसी कम्युनिटी से आते हैं। गुजरात में पटेल समुदाय को बीजेपी का मेन वोट बैंक माना जाता है। अनुभव बताते हैं कि राजनीतिक दल वोट बैंक के दबाव में तुरंत आत्मसमर्पण कर देते हैं। ताकतवर और संपन्न जातियों को आरक्षण देना आरक्षण के सिद्धांत का मजाक उड़ाना है लेकिन राजनीतिक दल इस पर स्पष्ट रुख अपनाने से बचते हैं। कई बार तो ऐसी जातियों को खुश करने के लिए सरकारें आरक्षण दे भी देती हैं। गुजरात सरकार हार्दिक की मांग को लेकर कितनी गंभीर है, यह अभी तक पता नहीं चला पाया है, लेकिन हार्दिक के खिलाफ कई संगठनों ने अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी हैं। गुजरात का ओबीसी समुदाय अपनी एक महा-रथयात्रा 1 सितम्बर को शुरू करने जा रहा है। रणवीर देसाई की अगुवाई में 'आरक्षण सुरक्षा संगठन रथयात्रा' पूरे गुजरात में निकलेगी। रणवीर देसाई ने बताया की यह रथयात्रा गुजरात की 248 तहसीलों, 162 नगर पालिकाओं, 8 महा नगरपालिकाओं में पहुंचेगी। यह यात्रा 26 जनवरी 2016 तक चलेगी। रणवीर देसाई का कहना है कि अगर सरकार पटेल समुदाय के लिए कुछ करना चाहती है तो करे, लेकिन ओबीसी के लिए जो 27 प्रतिशत आरक्षण है, उसमें इस समुदाय को शामिल न न करे। अगर सरकार 27 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण देती है तो इस पर विचार किया जा सकता है। रणवीर देसाई ने यह भी सवाल उठाया है कि जब सरदार पटेल खुद आरक्षण के विरोध में थे तो यह लोग अब आरक्षण क्यों मांग रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि आर्थिक मापदंड को लेकर सरकार कुछ करना चाहती है तो सभी जातियों के लिए करे। इस आंदोलन से ओबीसी जातियों और पटेलों में तनाव पैदा होगा। ओबीसी जातियां क्यों चाहेंगी कि उनके आरक्षण में पटेल समुदाय की भी हिस्सेदारी हो। अगर 12 प्रतिशत पटेल ओबीसी में आ जाएंगे तो मुक़ाबला और बढ़ जाएगा। इस लड़ाई में कौन जीतेगा और कौन हारेगा, यह तो मालूम नहीं, लेकिन ऐसी लड़ाई गुजरात की राजनीति में भूचाल जरूर लाएगी। इस तरह पटेल आरक्षण की मांग ने गुजरात भाजपा के लिए नया सिरदर्द पैदा कर दिया है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि ताकतवर जातियां भी आरक्षण को मुक्ति का रास्ता मानती हैं।

पाक की ‘परमाणु भभकी’

पाक की ‘परमाणु भभकी’

24 सितम्बर 2015

भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों (एनएसए) की बैठक रद्द होने के बाद भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में कटुता बढ़ गई है। पाकिस्तानी एनएसए सरताज अजीज ने भारत को धमकाया है। उन्होंने कहा है, ''मोदी सरकार ऐसे बर्ताव कर रही है जैसे कि वह क्षेत्रीय महाशक्ति हो। लेकिन हम खुद परमाणु क्षमता वाले देश हैं। हम जानते हैं कि खुद की हिफाजत कैसे करनी है।'' अजीज ने कहा कि पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने में भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के शामिल होने के सबूत हमारे पास हैं। पाकिस्तानी अखबार द डॉन की सोमवार की खबर के मुताबिक, अजीज ने भारत पर पाकिस्तान के खिलाफ प्रौपेगेंडा करने का आरोप लगाया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सलाहकार अजीज ने कहा, ''हमें सबूत देने के बदले पाकिस्तान के खिलाफ प्रौपेगेंडा करना भारतीयों का काम हो गया है।'' अजीज ने कहा कि भले ही एनएसए स्तर की मीटिंग नहीं हुई लेकिन बाकी मीटिंग्स होंगी। उन्होंने कहा, ''रेंजर्स और बीएसएफ के बीच मीटिंग होगी। डीजीएमओ भी मिलेंगे ताकि तनाव कम करने को लेकर कोई मैकेनिज्म बनाया जा सके। पाकिस्तानी रेंजर्स-बीएसएफ के बीच बातचीत 6 सितंबर को होनी है। डायरेक्टर्स जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन (डीजीएमओ) भी जहां चाहेंगे मिल सकेंगे।'' आंकड़ों के मुताबिक तीन साल पहले पाकिस्तान के पास भारत से 10 न्यूक्लियर बम ज्यादा थे। बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट ने मार्च में जारी अपनी एक रिपोर्ट में बताया था किन देशों के पास कितने न्यूक्लियर बम हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के पास 110 न्यूक्लियर बम हैं, जबकि भारत के पास 100 बम हैं। हालांकि, ये आंकड़े 2012 की स्थिति के मुताबिक बताए गए थे। तीन साल में हालात कितने बदले हैं, इस बारे में कोई आंकड़ा नहीं है। एनएसए मीटिंग होती तो भारत पर पाकिस्तान उन्हीं आरोपों को दोहराने वाला था जो 2012 में लगा चुका है। जानकारी के मुताबिक, 'बलूचिस्तान में टेरर बढ़ाने के लिए राजस्थान में कैंप', 'लाहौर में लश्कर-ए-तायबा के नेतृत्व को मदद', 'सिंध में मोहाजिर कौमी मूवमेंट को आर्थिक सहायता ' और 'कश्मीर घाटी में जनसंख्या के अनुपात में बदलाव की कोशिश' जैसे आरोप लगाए जाने वाले थे। इस्लामाबाद में 2012 में हुई होम सेक्रेटरी लेवल मीटिंग में भी पाकिस्तान ने भारत पर आरोप लगाते हुए तीन डोजियर सौंपे थे। उस वक्त यह भी आरोप लगाया गया था कि भारत समझौता एक्सप्रेस बम धमाकों के आरोपियों को बचा रहा है। सोमवार को अजीज ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगले महीने अमरीका के न्यूयॉर्क में जब दोनों देशों के नेता (नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ) मौजूद होंगे तो वह बातचीत की पहल नहीं करेगा। अजीज ने कहा कि यह भारत पर है कि वह बातचीत की पहल करे। भारत और पाकिस्तान के बीच नेशनल सिक्यूरिटी एडवाइजर्स (एनएसए) की मीटिंग रद्द होने से पड़ोसी देश को ज्यादा फिक्र है। पाकिस्तानी विशेषज्ञों का मानना है कि इस गतिरोध की वजह से दोनों देशों को नुकसान होगा, लेकिन पाकिस्तान पर इसका असर ज्यादा पड़ेगा। उनका मानना है कि दोनों देशों के बीच बातचीत न होना क्षेत्रीय शांति के लिए भी अच्छी बात नहीं है। अमरीकी प्रेसिडेंट ओबामा की भारत यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच कुछ दूरियां कम करने की कोशिश हुई थी, जिसका नतीजा निकला दोनों प्रधानमंत्रियों की ऊफा में मुलाकात। लेकिन सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत रद्द होने के बाद एक बार फिर दोनों देश वहीं पहुंच गए हैं, जहां से शुरुआत हुई थी। जब रूस के उफा में दोनों देशों के बीच यह सहमति बन गई थी कि आतंकवाद और सीमा पर शांति के मुद्दे पर बातचीत होगी तो कश्मीर और हुर्रियत का मुद्दा उठना बिल्कुल गैरजरूरी था। दरअसल पाकिस्तान शुरू से बातचीत से पीछे हटने के लिए बहाने ढूंढ़ रहा था। पाकिस्तान की सेना बिल्कुल नहीं चाहती है कि शांति बहाल हो।

भारत और पाकिस्तान के बीच गतिरोध को लेकर पाकिस्तान पर अमरीका और यूरोपियन यूनियन का दबाव बढ़ेगा। भारत पर भी दबाव होगा, लेकिन पाकिस्तान की तुलना में काफी कम। पाकिस्तान पर ज्यादा दबाव इसलिए होगा क्योंकि वह अमरीका से भारी पैमाने पर फौजी साज-ओ-सामान और आर्थिक मदद हासिल करता है, लेकिन भारत के साथ ऐसा नहीं है। अगर अमरीका सैन्य और आर्थिक सहायता पर रोक लगा दे तो पाकिस्तान की स्थिति खराब होनी शुरू हो जाएगी। अमरीका ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए, जिससे उनकी स्थिति काफी खराब हो गई। लेकिन ईरान से ज्यादा मजूबत मामला पाकिस्तान का है। पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने की बात अमरीका खुद मान चुका है। ऐसे में पाकिस्तान पर भारी दबाव है। पाकिस्तान की सरकार मुश्किल हालात में है और उन पर बाहरी के साथ-साथ आंतरिक दबाव काफी ज्यादा है। इसी के कारण पाक ऐसी हरकतें कर रहा है। क्योंकि पाकिस्तान को पूरा भरोसा है कि भारत आर्थिक वृद्धि और विकास पर इतना केंद्रित है कि वह युद्ध का जोखिम नहीं लेगा। वह भारत के बर्दाश्त करने की सीमा का सावधानी से आकलन कर अपनी चालें चल रहा है। ऐसे सोच के कारण वह जम्मू-कश्मीर कार्ड खेलने का दुस्साहस कर रहा है, जबकि वह खुद घरेलू आतंकवाद के कारण हिंसा से खदबदा रहा है। उसे लगा कि जम्मू-कश्मीर उसकी पहुंच से बाहर होता जा रहा है, इसलिए वह ज्यादा दुस्साहस में लग गया। जहां तक परमाणु क्षमता का सवाल है वह कृत्रिम संरक्षण है, जिसे पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व अपना तुरुप का इक्का समझती है।

वार्ता तो होनी ही नहीं थी


23सितम्बर 2015

भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक जिस तल्खी के साथ रद्द हुई है, उससे अब जल्द दोनों देशों के बीच बातचीत की संभावना नहीं दिखती। पाकिस्तान ने यह कहकर बैठक रद्द कर दी कि वह भारत की शर्तों पर बातचीत नहीं करेगा। भारत इस बातचीत को 'आंतकवाद पर ही केंद्रित' रखना चाहता था और इसके एजेंडे में कश्मीर मुद्दे को शामिल करने को वो तैयार नहीं था। पाकिस्तान सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि उसने सुषमा स्वराज की बताई शर्तों का 'गहराई से अध्ययन' किया और इसके बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि भारतीय विदेशमंत्री की ओर से रखी गई दोनों शर्तों के आधार पर दोनों देशों की प्रस्तावित एनएसए वार्ता होती है, तो इससे कोई मकसद पूरा नहीं होगा। पाकिस्तान के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा, पाकिस्तान का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने शनिवार को भारत का रुख साफ कर दिया। उन्होंने साफ शब्दों में पाकिस्तान से कहा कि आप इन दो मुद्दों पर मानेंगे तो बातचीत होगी, वर्ना नहीं होगी। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने रूस के उफा में बातचीत को जारी रखने पर सहमति जताई थी, लेकिन वो कोशिश बहुत जल्द रुकती दिख रही है। दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होना जरूरी है। जाहिर है, रिश्ते सामान्य होने के लिए सबसे पहले चरमपंथ पर रोक ज़रूरी है। सुषमा स्वराज और सरताज अजीज ने शनिवार को जो बातें मीडिया के सामने कहीं, उन्हें बंद कमरे में दोनों देशों के बीच साझा किया जाता तो बेहतर होता। इससे इतना जरूर हुआ कि भारत और पाकिस्तान की जनता को भी पता चल गया कि दोनों देशों के बीच किन मुद्दों पर मतभेद हैं। लेकिन जिस तरह से दोनों देशों ने लकीरें खींची हैं, उसके बाद आगे कैसे बातचीत होगी ये बहुत बड़ी समस्या होगी। कुछ विश्लेषक यह मानते हैं कि पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज ने भारत के खिलाफ तैयार किए गए एक डॉसियर के खुलासे की धमकी दी थी लेकिन सच तो यह था कि अगर वह भारत आए होते तो शर्मिंदगी के साथ हैरान रह जाते। पड़ोसी देश की जमीन से चल रहे आतंकी संगठनों और साल 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों के मास्टरमाइंड दाऊद इब्राहिम को जारी पाकिस्तानी मदद की डिटेल के साथ भारत सरताज अजीज का सामना करने के लिए तैयार था। पाकिस्तान द्वारा उड़ाई गयी हवा में यह सही नहीं है कि बलूचिस्तान में जारी संकट में भारत की कथित भागीदारी है। पाकिस्तान का कहना है कि उसी सबूत से शर्मिंदगी के डर से भारत ने वार्ता रद्द की।
भारत के पास जो सबूत हैं उससे और आतंकियों को मदद और दाऊद को मिल रही पाकिस्तानी मेजबानी के पुख्ता प्रमाणों से अजीज इनकार नहीं कर सकते थे। भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान में दाऊद के पते-ठिकानों का पूरा डिटेल तैयार कर लिया था। अजीब विडम्बना है कि रोज युद्धविराम को ठेंगा दिखाकर भारतीय सीमा पर गोलाबारी करने वाला देश मासूम सा चेहरा बना मीडिया के सामने 'डोजियर' लहरा रहा है और अवाम अवाक् सी देख रही है। अपनी धरती पर आतंकवादियों को प्रशिक्षित कर हिंदुस्तान की सार्वभौमता, सद्भावना और भाईचारे पर चोट करने वाला यह देश 'हुर्रियत' के नेताओं से मिलने को इतना बेताब क्यों है? मुंह में अल्लाह ताला, बगल में मोर्टार, ए के 47, नाम पाकिस्तान, इरादे हमेशा नापाक! हाफिज सईद हो या दाऊद इब्राहिम, इन्हीं की सरजमीं पर पनाह ली.... लादेन हो या लखवी … इन्ही के आंगन में पले बढ़े! इनसे उम्मीद करेंगे कि ये आतंकवाद को खत्म करने में मदद करेंगे? हमसे बातें करने आएंगे। दरअसल वहां बात चीत का कोई माहौल ही नहीं है। पाक में भारत से बात करने का माहौल केवल एक सूरत में ही बन सकता है जब वहां पर सक्रिय आतंकी तत्व खुद पाक के लिए एक बड़ा खतरा बन जाएं और उसकी सेना को बड़े पैमाने पर खुली चुनौती देने की स्थिति में आ जाएं। आज जिस तरह से पाक में आईएस के कुछ लोगों के सक्रिय होने की ख़बरें सामने आ रही हैं तो यह भी संभव है कि आने वाले समय में आईएस जैसे संगठन का पाक के चरमपंथियों पर पूरा प्रभाव हो जाये और वे अपनी खिलाफत को पाक में भी लाने का प्रयास करें ? वह ऐसी स्थिति होगी जब पाक के सामने करो या मरो की स्थिति आ जाएगी। आज यदि आईएस को सीरिया और इराक के साथ अन्य देशों में भी सफलता मिल रही है तो उसके पीछे केवल इन देशों की सेनाओं में फैला हुआ भ्रम ही है कि वे किस तरफ रहकर सही कर पाएंगें और इस दुविधा में ही सेना की लड़ने की जुझारू शक्ति पर भी बुरा असर पड़ता है जिसका असर पिछले दो दशकों में इराकी सेना की हालत देख कर ही लगाया जा सकता है। क्या कोई यह कह सकता है कि यह वही सेना है जिसने कुवैत पर कब्ज़ा कर अमरीका की नाक में दम कर दिया था ? तब इराकी सेना सद्दाम हुसैन जैसे नेता के कब्जे में थी और पूरी तरह से सक्षम भी थी। कहीं पाक भी उस तरह की परिस्थिति में फंसकर ही अपने लिए बड़ी समस्या तो नहीं पैदा करने वाला है क्योंकि ऐसी परिस्थिति में आज नहीं तो कल उसकी सेना का मनोबल विभाजित होना ही है जिससे ही पाक के भविष्य के बारे में कुछ कहा जा सकेगा, फिलहाल तो वह सेना और आतंकियों के दबाव में काम करते हुए पाक का लोकतान्त्रिक नेतृत्व अपने लिए समस्याओं का अम्बार लगाने में ही लगा हुआ है।


Thursday, August 20, 2015

बिहार के विकास का वादा

बिहार का चुनावी घमासान तेज होता जा रहा है। इस चुनाव में विजय के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास एक से एक व्यूह हैं। अभी हाल में उन्होंने जंगलराज का एक शिगूफा छोड़ा और अब बिहार के विकास का जाल फैला रहे हैं। उन्होंने बिहार के विकास के लिये सवा लाख करोड़ का फंड देने की घोषणा की है। यह राशि ​बिहार में चल रही 44 हजार करोड़ की परियोजनाओं से अलग है। अब देखना यह है कि प्रधानमंत्री जी की यह दानशीलता उतनी ही नाटकीय है जितनी सुनने में लग रही है या कुछ अलग है। सबसे बड़ी बात है कि इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं है। उन्होंने यह साफ नहीं किया है कि पैसा इसी साल से लगना शुरू हो जायेगा या चुनाव के बाद आयेगा। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरा में कहा है कि दिल्ली को समझने में टाइम लगा है। एक-एक चीज़ का बारीकी से पता किया है तब जाकर ये ऐलान किया है। अपने भाषण में प्रधानमंत्री बिहार पर दिल खोल कर खजाना लुटा रहे थे। उनके बोलने के अंदाज से लग रहा था कि केंद्र के लिए किसी राज्य को पैसे देना बाएं हाथ का खेल है। पीएम ने कहा कि पुरानी सरकार ने 12,000 करोड़ का पैकेज दिया था जिसका 8282 करोड़ रुपया बाकी पड़ा है। राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने में 12,000 करोड़ के काम चल रहे हैं। बांका में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का बिजली का कारखाना लगने वाला है 20 हज़ार करोड़। ये भी जोड़कर एक लाख पैंसठ करोड़ हो जाता है। उधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार कह रहे हैं कि बिहार को ​विशेष पैकेज नहीं बल्कि विशेष दर्जा चाहिये। विशेष दर्जा और विशेष पैकेज में क्या अंतर है इसे राजनीतिक विद्वान बांचते रहेंगे लेकिन जिन्हें मंच लूटना था वो लूट ले गए। जनता को एक फाइनल फिगर मिल गया है। चौक चौराहे पर लोग सेक्टर के आधार पर हिसाब नहीं लगाएंगे। उन्हें सिर्फ एक लाख पैंसठ हज़ार करोड़ दिखाई और सुनाई देगा। हममें से बहुत लोग जो बिहार की ​स्थितियों में दिलचस्पी रखते हैं उन्हें याद होगा कि इसी वर्ष जनवरी में केंद्र और बिहार सरकार ने एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया था कि पूसा के राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय में बदल दिया जाएगा। इसके लिए मार्च 2017 तक 400 करोड़ की आर्थिक मदद दी जाएगी। जून 2015 में कैबिनेट ने बोधगया में आईआईएम बनाने का प्रस्‍ताव मंज़ूर किया था। यही नहीं मजे की बात है कि अगर इस वर्ष के बजट को देखें और प्रधानमंत्री के ऐलान को मिलाएं तो एक विचित्र बात नजर आती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि बिहार के ग्रामीण सड़कों के लिये 13,820 करोड़ रुपये मुहय्या कराये जाएंगे। जबकि बजट में ग्रामीण सड़क का कुल प्रावधान है 14291 करोड़। जिसमें 1155 करोड़ नॉर्थ ईस्ट और सिक्किम के लिए है। यानी शेष भारत के लिए बचता है 13,136 करोड़ तो आप बताइये बिहार को कैसे मिल गया 13,820 करोड़। मोदी सरकार ने जिस 14वें वित्त आयोग के सुझावों को स्वीकार किया है उसके अनुसार केंद्रीय करों का 42 फीसदी हिस्सा राज्यों को दिया जाएगा। लेकिन इसकी भरपाई केंद्रीय वित्त मंत्री ने कई केंद्रीय योजनाओं का बजट काट के कर ली। 14वें वित्त आयोग ने 11 कमज़ोर राज्यों के लिए ग्रांट की बात की है। इसके अनुसार जम्मू कश्मीर को 2019 से 20 तक 1,94,821 करोड़ मिलेगा। तो बिहार को एक लाख पैंसठ हज़ार करोड़ कितने साल में मिलेगा। इसी तरह बिहार को ग्रामीण सड़कों के लिए 13,820 करोड़ दिये जाने की बात कही गई है। केंद्रीय बजट में पूरे भारत की ग्रामीण सड़कों के लिए 14,291 करोड़ का प्रावधान है। इसमें से 1155 करोड़ नॉर्थ ईस्ट और सिक्किम के लिए है। यानी शेष भारत के लिए बचता है 13,136 करोड़ तो आप बताइये बिहार को कैसे मिल गया 13,820 करोड़। नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री की भाषा शैली पर एतराज़ जताया और कहा कि हमने अलग-अलग सेक्टरों के विकास के लिए 2 लाख करोड़ का पैकेज मांगा है लेकिन 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत 12000 करोड़ ही मिला। जिसमें से कई काम हुए और जो हज़ार करोड़ बचे हैं उसे भी प्रधानमंत्री ने अपनी घोषणा में शामिल कर लिया है।नीतीश कुमार का दावा है कि प्रधानमंत्री के ऐलान में कई योजनाएं ऐसी हैं जो पहले से मंजूर हैं या पहले से केंद्रीय योजनाओं के तहत चली आ रही हैं। कृषि के लिए बिहार ने 41,587 करोड़ मांगा था, मिला है 3094 करोड़। कौशल विकास के लिए 12580 करोड़ और मिला है 1550 करोड़। शिक्षा के लिए 1000 करोड़ दिया है। नीतीश ने कहा कि 1000 करोड़ में क्या होगा। नीतीश ने कहा कि ये उसी टाइप का है जैसे लोकसभा में कहा गया कि चुनाव के बाद सबको 15 से 20 लाख रुपया मिलेगा। जैसे हालात बता रहे हैं उससे लगता नहीं है कि रुपया मिलेगा पर चुनावी जंग काफी तेज होगी इसकी गारंटी है।





Wednesday, August 19, 2015

मोदी की अमीरात यात्रा एक अच्छी पहल


दुबई आम भारतीयों के लिए सपनों का मुल्क रहा है , तस्करों के लिये सोने का मुल्क और भाई बिरादरी के लिये आश्रय का मुल्क। दाउद भाई से लेकर टुटपुंजिये तक वहां अपने चरण कमल जरूर रखते हैं। इमरजेंसी के जमाने में जाना कि हाजी मस्तान वहीं से अमावस की रात गोदी पर सोना लेकर आते थे या दुबई भाग जाते थे। शेष भारत दुबई की इस छवि में जीता रहा तो एक भारत रोजगार तलाशते दुबई पहुंच गया। एक छोटे से भारत के लिए दुबई रईसी का अड्डा भी बना। यहां के फैंसी मार्केट वालों का भी शुक्रिया अदा करना चाहिए। उनके मार्फत भी दुबई का सामान न जाने कितने घरों में पहुंचा होगा। इन तमाम छवियों के बीच हम यह भूल गए कि दुबई या अन्य खाड़ी देशों में मेहनतकश ईमानदार भारतीय भी रहते हैं। दुबई, कतर, अबू धाबी, अजमान, फुज़ायरा, रास अल ख़ायमा, शारजाह, और उम अल क्वैन। इन सात अमीरातों को मिलाकर संयुक्त अरब अमीरात बनता है जिसके दौरे पर हमारे प्रधानमंत्री गये थे। वहां 25 लाख भारतीय रहते हैं। ऐसे में दुबई समेत संयुक्त अरब अमीरात में बसने वाले 25 लाख भारतीयों की 34 साल बाद क्यों सुध आई भारत सरकार को? सबसे ज्यादा भारतीय यहीं बसते हैं और 50 अरब डॉलर हर साल देश भेजते हैं। इनके हित, इनके अधिकार और भारत के साथ यूएई के आपसी रिश्ते क्यों हमारी विदेश नीति में अब अहम् हो गए हैं? पहली बार प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा से अरब मुल्कों में मजदूरी करने गए लाखों भारतीयों को अमरीका द्वारा एन आर आई जैसा महत्व मिला है। अमीरात की आबादी का तीस प्रतिशत हिस्सा भारतीयों का है। वहां की स्थानीय आबादी से भी ज्यादा वहां भारतीय हो गए हैं। यहां आजमगढ़ के मुसलमान रहते हैं तो सिवान के हिन्दू भी रहते हैं। संयुक्त अरब अमीरात के पास निवेश के लिए पैसे का एक ऐसा भंडार है जो दुनिया के बहुत कम मुल्कों ने खासतौर पर निवेश के लिए अलग रखा है। अबू धाबी इनवेस्टमेंट अथॉरिटी के पास 800 बिलियन डॉलर का फंड खास तौर पर निवेश के लिए अलग रखा गया है । इसी तर्ज पर दुबई इनवेस्टमेंट अथॉरिटी के पास 500 बिलियन डॉलर की राशि निवेश के लिए अलग रखी गई है। यह दुनिया भर में स्टॉक, बांड, रियल एस्टेट, कीमती धातुओं के सेक्टर और हेज फंड्स में निवेश के लिए अलग रखा गया है। ऐसा फंड वही देश बना सकते हैं जिनके पास बजट से अतिरिक्त पैसा हो और जिनकी कोई अंतरराष्ट्रीय देनदारी न हो। भारत की नजर इसी फंड पर है और निवेशकों को लुभाने के लिए मोदी ने अरबी उद्योगपतियों को भारत में सौर ऊर्जा, किफायती मकानों , डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में निवेश का न्यौता दिया। प्रधानमंत्री मोदी बार बार 21 वीं सदी को एशिया की सदी कहते हैं। क्या अब वह वक्त आ गया है कि उनकी इस बात को फलसफे के तौर पर देखा जाए। इस यात्रा को मिलाकर वे सात मुस्लिम देशों की यात्रा कर चुके हैं। मध्य एशिया के दौरे पर मीडिया ने कम ही ध्यान दिया। उज्बेकिस्तान, कजाकस्तान, किर्गीस्तान, ताजीकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान से पहले वे बंगलादेश जा चुके हैं। इससे पहले वे बौद्ध धर्म के लिहाज़ से म्यांमार, कोरिया, श्रीलंका, जापान चीन और मंगोलिया की यात्रा कर चुके हैं। 25 देशों की विदेश यात्रा में प्रधानमंत्री ने एशिया के सत्रह छोटे बड़े मुल्कों की यात्रा की है। सामरिक तौर पर भी इस साझेदारी की अहमियत कम नहीं। भारत के कई कुख्यात अपराधी दुबई , यूएई में शरण लेकर अपना धंधा चला रहे हैं। दाऊद के यूएई की कई कंपनियों में शेयर हैं, कई बेनामी संपत्तियां हैं। पीएम मोदी चाहेंगे कि उस पर कार्रवाई की जाए। इस्लामिक स्टेट के बढ़ते कदमों की आहट ने भारत को चौकन्ना कर दिया है। अरब क्षेत्र में यूएई के साथ मज़बूत रिश्ते आईएस के खिलाफ रणनीति के लिए ज़रूरी हैं। दोनों देश धर्म और आतंकवाद के बीच किसी रिश्ते और चरमपंथ को खारिज करते हैं। दोनों देश ऐसी कोशिशों की निंदा करते हैं चाहे वो देशों द्वारा ही की जा रही हों जहां धर्म को दूसरे देशों के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा या समर्थन देने के लिए इस्तेमाल किया जाता हो। दोनों देश पश्चिम और दक्षिण एशिया में ऐसे देशों की कोशिशों की निंदा करते हैं जो राजनीतिक मुद्दों और विवादों को धार्मिक और कट्टर रंग देते हैं और अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए आतंकवाद का इस्तेमाल करते हैं।
खैर यूएई दौरा अच्छी पहल है हमारे लिए, हमारी ज़रूरतों के लिए और हमारे उन 26 लाख लोगों के लिए जिन्होंने यूएई में मिनी इंडिया बसा रखा है। यह तो मानना होगा कि पीएम की सोच एक मामले में बिलकुल साफ और खरी है । ये है उनकी कारोबारी सोच और इस मामले में भारत को वो दुनिया के सामने अच्छे से रख रहे हैं। परंतु, दुनिया भर से निवेशकों को बुलाने और यहां टिकाने के लिए देश के अंदर बेहतर कारोबारी माहौल चाहिए। जब देश का उद्योगजगत सुधारों की सुस्त रफ्तार पर सब्र खोने लगा हो तो बाहर से आने वाले निवेशक क्यों आएंगे।

असली आजादी तो वैचारिक परिवर्तन में है


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को लाल किले से वादों की फुलझड़ियां बिखेरीं। वायदे कुछ ऐसे थे मानों दिल्ली से गंगा निकल कर सबको माेक्ष दिला देगी। तिरंगे के बैज से लेकर झंडा, बैनर, पोस्टर आदि से पटे बाजार में एक ही चीज नदारद थी, वह थी आजादी। कोलकाता की सड़कों पर कागज के झंडे बेचने वाला भी बार-बार इधर-उधर देखते हुए सतर्क है कि कहीं कोई पुलिस वाला आकर सब कुछ जब्त ना कर ले। लाल किले से बह रही वायदों की गंगा के सामने इस हाल में आजादी का प्रतीक बेचने वाले के मन में आजादी के प्रति कोई सम्मान होगा क्या? कहने को तो हम-आप आजाद हैं, लेकिन पार्षद से लेकर विधायक, सांसद और मंत्री सभी हमारी आजादी कतरा-कतरा चुराते जा रहे हैं और हम हैं कि अच्छे दिनों के मरमरी ख्वाब से जगने को तैयार ही नहीं! मोदी ने रिटायर्ड फौजियों के लिए वन रैंक-वन पेंशन योजना का एलान नहीं किया। उन्होंने कहा- ‘‘मैं तिरंगे की छत्रछाया में लाल किले के प्राचीर से कह रहा हूं कि सैद्धांतिक रूप से हमने वन रैंक-वन पेंशन योजना को मंजूर कर लिया है। प्रधानमंत्री ने लालकिले से अपनी सरकार को सौ फीसदी मार्क देते हुए कहा कि सरकार पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं है। मोदी ने कहा कि बीते एक साल के दौरान देश में एक नया विश्वास पैदा हुआ है और उन्होंने जनधन योजना, स्वच्छ भारत अभियान और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना को अपनी सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि प्रधानमंत्री ने पिछले साल साफ नियत से कई योजनाओं को परवान चढ़ाने की कोशिश की है, जिनमें स्वच्छ भारत अभियान के तहत देश भर के स्कूलों में टॉयलेट निर्माण का कार्य पूरा होने की ओर अग्रसर है, साथ ही साथ देश में 17 करोड़ से ज्यादे खाते और २२ हजार करोड़ से ज्यादा रुपये भी जमा हुए हैं, किन्तु इस बात की ओर भी ध्यान देने की जरूरत है कि स्कूली टॉयलेट में पानी और लगभग 46 फीसदी खातों में पैसा नहीं जमा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित करने के दौरान एक ओर तो कालाधन, पूर्व सैनिकों, पूर्वोत्तर भारत, विदेश नीति समेत कई मुद्दों पर सरकार का पक्ष रखा वहीं, उन्होंने अपने निराशावादियों को भी तीखे कटाक्ष के साथ निशाने पर लिया। पीएम का कहना था, 'मैं देख रहा हूं कुछ लोग होते हैं जो निराशा ढूंढ़ते रहते हैं, निराशा फैलाते रहते हैं और जितनी ज्यादा निराशा फैले, उतनी उनको ज्यादा गहरी नींद आती है। ऐसे लोगों के लिए न योजनाएं होती हैं, न कार्यकलाप होते हैं और न ही सवा सौ करोड़ देशवासियों की टीम इंडिया इनके लिए समय इन्वेस्ट करने के लिए तैयार है।' मोदी का यह कथन बेशक सकारात्मक है और प्रशंसनीय है पर क्या सदा पॉजिटिव सोचने भर से सबकुछ पॉजिटिव हो जाता है? अब देखें इस खुशगवार मौके पर सीमा पर पाकिस्तान ने फायरिंग की और बहुत से लोग जान बचा कर भागे। इसमें क्या पॉजिटिविटी है? आप कहेंगे कि इस मौके पर पाक उल्लेख क्यों? भारत-पाकिस्तान का इतिहास, भूगोल, आजादी, संस्कृति, त्योहार एक-दूसरे से चाहकर भी जुदा नहीं हो सकते, न ही वहां के लोग। अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, 'हम अपने दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं।' पाकिस्तान और हिंदुस्तान को आजाद हुए 70 साल होने को आए, लेकिन ये बिल्कुल नहीं बदले। पूरा दोष इनका भी नहीं रहा, सियासतदानों ने इन्हें वैसा ही रखना चाहा और ये भी वैसे ही रहे। कहीं औरतों को नजरबंद करके जुल्म ढाए जाते हैं तो कहीं उन्हें दहेज के लिए जलाया जाता है। दोनों देश अमीर-गरीब की खाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, मानव विकास सूचकांक के मामले में एक-दूसरे को टक्कर दे रहे हैं। कई लोगों को लगता है कि बंटवारा इतिहास की सबसे बड़ी भूल थी। सोचिए, अगर इस देश का बंटवारा न होता तो क्या होता! क्या दिलों में इतनी नफरत भरे लोग एक साथ रह पाते? भले ही बेवकूफी के आधार पर ही सही, पर उन्हें जबरन साथ रखे जाने की कोशिश की जाती। भगत सिंह ठीक ही इसे राजनीतिक आजादी कहते थे और कहते थे, ऐसी आजादी मिल भी गई तो क्या फायदा! यानी केवल कागजों पर आजादी। दिमाग तो हमारे अब भी वही ताकतें संचालित कर रही हैं। बेशक नई पीढ़ी जज्बे के साथ आजाद भारत का वारिस होने का दम भरती है और भ्रष्टाचार व अपराध को मिटाना चाहती है। असली आजादी तो गरिमा और मर्यादा की परिधि में रहकर वैचारिक रूप से परिवर्तन लाने की कोशिश में है। इन वादों से क्या होने वाला?

लाल किले से रिकार्ड भाषण, पर क्या?


देश ने आज अपना सबसे बड़े पर्व मनाया। स्वाधीनता दिवस के रूप में यह पर्व हमें अतीत के कटु अनुभवों से निकालकर वर्तमान संघर्ष और भविष्य की सुखद कामना को बार बार याद दिलाता है। स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का अभिभाषण हुआ जिसमें उन्होंने संसद को अखाड़ा बनाये जाने पर चिंता जाहिर की और अपील की कि ऐसा ना हो। लोकतान्त्रिक संस्थाओं के दबाव में होने की बात, धर्मनिरपेक्षता के प्रति सजगता, चरमपंथ के प्रति सख्ती, पडोसी देशों के साथ सम्बन्ध, शिक्षण व्यवस्था पर आत्मनिरीक्षण, जल प्रबंधन और लोकतंत्र के नवीकरण जैसे मुद्दों को उभारते हुए राष्ट्रपति ने आने वाले समय की रूपरेखा ही स्पष्ट की। उनके इस भाषण के बिन्दुओं से शायद ही कोई असहमत हो। पर यहां प्रश्न आता है कि क्या इन सबके लिए सिर्फ सरकार ही जिम्मेवार है। हमसब की कोई जवाबदेही नहीं बनती है? क्या आज़ादी के लिए हमारे पूर्वजों का बलिदान हमारी पूंजी नहीं है? अगर वो बलिदान हमारी पूंजी है तो हमारी जिम्मेवारियां भी किसी सरकार से कम नहीं हैं। दरअसल नायक वह होता है जो आजादी के साथ आने वाली जिम्मेवारियों को समझता है और उन्हें पूरी करने के पक्ष में सदा खड़ा रहता है। यहां विख्यात वैज्ञानिक अलबर्ट आईंस्टीन का वह कथन याद आता है जिसमें उन्होंने कहा है कि आप क्या पाते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि आप क्या देते हैं यह खास है। आजादी के लिए हजारों लाखों देशभक्त, क्रान्तिकारी, स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन समर्पित किया है और इस मशाल को आगे ले जाने की जिम्मेवारी निश्चित रूप से देश के युवा कन्धों पर ही है।
आज आजादी के 69 वें समारोह में शिरकत करते समय हमें उन तथ्यों से अवगत रहना चाहिए, जिन्हें हमने हासिल कर लिया है और उससे भी ज्यादा उन उद्देश्यों के बारे में याद करते रहने की आवश्यकता है जो हमारी पहुंच से दूर दिखते हैं। सकारात्मक बात यह है कि अब हमारा देश अपने मानव संशाधन, आर्थिक क्षमता, राजनीतिक नेतृत्व, रक्षा क्षेत्र, अंतरिक्ष क्षेत्र जैसे क्षेत्रों में न केवल आत्मनिर्भर हो रहा है, बल्कि विश्व को नेतृत्व देने वाले देशों की कतार में शामिल होने की क्षमता का जबरदस्त प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन इन धमकाते विंदुओं को त्याग दें तब भी चंद अंधेरे कोने हैं और उन कोनों की तादाद भी कम नहीं है। मोदी सरकार से भारतीय जन को काफी उम्मीदें हैं। गत वर्ष आज के ही दिन जब मोदी जी ने लाल किले के प्राचीर से भाषण दिया था तो कई वायदे गिनाये थे। पर सवाल यह है कि एक साल बाद क्या वे वायदे पूरे हुये या बस वायदे ही रह गये। सरकार द्वारा पेश आंकड़े के मुताबिक वायदे पूरे होते दिखते हैं। पर वे पूरी तरह सच नहीं बताते हैं। सच छुपा हुआ है। आज हमारी सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है। देश भर में हर साल 120 लाख लोगों को नौकरियों की जरूरत होगी। इसके इलावा खेती करने वाले 26 करोड़ से ज्यादा युवाओं को इस योजना में शामिल नहीं किया गया है। रोजगार के अतिरिक्त, आतंरिक सुरक्षा, पाकिस्तान से अस्थिर सम्बन्ध और चीन की घेरेबंदी भी आधुनिक भारत की मुख्य समस्याओं में से एक है। इस बार प्रधानमंत्री ने विशेषकर रोजगार के ऊपर कोई सीधी बात नहीं कही, जिससे देश की इस मुख्य समस्या के प्रति असमंजस की स्थिति यथावत बनी हुई है. हालांकि, यह कोई ऐसा विषय है भी नहीं जो एक दिन में चुटकी बजाकर हल कर लिया जाय। लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने एक बार फिर समृद्ध भारत और स्वच्छ भारत का सपना दिखाते हुए अपनी सरकार की योजनाओं के बारे में बताया। दूसरी बार स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने देश वासियों से 2022 का रोडमैप तय करने की अपील की । उन्होंने देश से दस वादे किये हैं। वे वादे हैं , जिसमें प्रमुख हैं 18, 500 गांवों में बिजली पहुंचाना, छोटी नौकरियों में इंटरव्यू खत्म,कृषि मंत्रालय का नाम बदलना इत्यादि। उन्होंने सीना ठोंक कर कहा कि उनके शासन काल में एक पैसे का भी भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। संसद के मानसून सत्र के बजरिये यह कितना सच है यह तो जनता ही तय करेगी। कुल मिला कर प्रधानमंत्री का रिकार्ड लम्बा भाषण कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पैदा कर सका।