CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Thursday, November 26, 2015

भाजपाई राजनीति में बदलाव जरूरी


12 नवम्बर 2015
बिहार के चुनाव परिणाम दिखाते हैं कि दिल्ली की हार से पार्टी ने कोई सबक नहीं सीखा है जिसमें ‘‘आप’ ने 70 विधानसभा सीटों में से 67 पर जीत हासिल कर भाजपा को जबरदस्त पटखनी दी थी, बिहार में हार के लिए सभी को इसलिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है ताकि किसी एक को जिम्मेदार नहीं ठहराना पड़े। बिहार के चुनाव के नतीजों पर मंगलवार को भाजपा की बैठक हुई। इस बैठक में पार्टी का अंतर्कलह उस समय खुलकर सामने आ गयी, जब लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ दो अन्य वरिष्ठ नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के खिलाफ असंतोष का बिगुल बजाते हुए कहा कि पिछले एक साल में पार्टी कमजोर हुई है और उसे कुछ मुट्ठीभर लोगों के अनुसार चलने पर मजबूर किया जा रहा है। इनके अलावा बेगूसराय के सांसद भाजपा सांसद भोला सिंह ने भी पराजय के लिए प्रधानमंत्री मोदी के साथ ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधा। पार्टी के वरिष्ठ नेता सीपी ठाकुर ने भी हार पर सवाल उठाए हैं। पार्टी ने नेताओं से अपनी टिप्पणियों में संयम बरतने को कहा है। भाजपा में निर्विवाद नेता के तौर पर उभरने और मई में सरकार बनने के बाद मोदी को पहले बड़े असंतोष का सामना करना पड़ रहा है जिसमें शांता कुमार और यशवंत सिन्हा समेत दिग्गजों ने संक्षिप्त लेकिन कड़े शब्दों में एक बयान जारी कर बिहार की हार की संपूर्ण समीक्षा की मांग उठाई। बयान के अनुसार, ‘‘सबसे हालिया हार का मुख्य कारण पिछले एक साल में पार्टी का कमजोर होना है।’वरिष्ठ नेताओं के वक्तव्य के अनुसार, ‘‘हार के कारणों की पूरी तरह समीक्षा की जानी चाहिए और इस बात का भी अध्ययन होना चाहिए कि पार्टी कुछ मुट्ठीभर लोगों के अनुसार चलने पर मजबूर क्यों हो रही है और उसका आम-सहमति वाला चरित्र नष्ट कैसे हो गया।’भाजपा के पूर्व अध्यक्ष जोशी के आवास से बयान जारी किए जाने से पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व विचारक और पूर्व भाजपा नेता गोविंदाचार्य ने जोशी से बंद कमरे में गुफ्तगू की। यहां प्रमुख प्रश्न है कि मोदी के सहारे पार्टी कबतक चुनावी वैतरणी पार करेगी। प्रधानमंत्री होकर कैसे सीएम की लड़ाई लड़ेंगे। दिल्ली और बिहार में नेता को क्यों नहीं उभरने दिया गया। यही सवाल बिहार चुनाव में बीजेपी पर भारी पड़ गया। बिहार की जनता तो यही पूछ रही थी कि महागठबंधन के पास नीतीश हैं तो एनडीए के पास कौन है। इतनी बड़ी लड़ाई लेकिन बीजेपी के पास सीएम का कोई चेहरा नहीं था जबकि नीतीश और लालू बिहार में महागठबंधन बनाकर नरेन्द्र मोदी को चुनौती दे रहे थे। दूसरी बात ये थी कि नीतीश को काम दिखाने के लिए कानून व्यवस्था, सड़क, बिजली, लड़कियों को साइकिल देने की बात थी लेकिन वोटरों को मोदी का कोई काम सही नहीं दिख रहा था जो आम लोगों से जुड़ा हुआ हो। बीजेपी में ये भी आरोप लगा कि सही उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा गया बल्कि पैसे लेकर उम्मीदवार को उतारा गया। यही सवाल सांसद आरके सिंह उठा चुके थे। चौथी वजह पार्टी में अहंकार को माना गया जो सांसद नाराज थे, उन्हें नहीं पूछा गया बल्कि कुछ ऊपर के नेता रणनीति बनाते रह गये। ये आरोप लग रहा है कि बीजेपी स्कूटर की पार्टी हो गई है यानी तीन लोग ही पार्टी को चला रहे हैं। पांचवीं बात ये थी कि जातीय अंकगणित में एनडीए महागठबंधन से पीछे छूट गया था। बिहार में भ्रष्ट्रराचार और बेरोजगारी मुख्य समस्या थी लेकिन पार्टी के नेताओं ने नीतीश,लालू,जंगलराज,जंतर-मंतर को मुख्य मुद्दा बनाया। बीजेपी की सहयोगी पार्टियों का तो और बुरा हाल हुआ। अखलाक की मौत और साहित्यकारों के अवार्ड लौटाने के मुद्दे को पार्टी ठीक से हैंडल नहीं कर पाई। महंगाई की मार से जनता परेशान थी, प्याज 60 रुपये और दाल 200 रूपये ने लोगों के गुस्से को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। इससे तो यही साबित होता है कि बीजेपी जीतती बाजी हार गई और आत्मचिंतन के नाम पर ऊल जुलूल मुद्दे को उठा रही है। अब भाजपा और नरेंद्र मोदी से देश की हिंदू-मुस्लिम जनता को अपेक्षा है की भाजपा के नेता कांग्रेस जैसा बर्ताव न करके देश की प्रगति के लिए, हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए नयी पहल करेंगे ! देश की सभी मुस्लिम जनता को देशद्रोही ठहराना और जरा - जरा सी बात पर उन्हे पाकिस्तान जाने की सलाह देना गलत है! भाजपा के नेता जितनी जल्दी समझ जाएंगे उतना अच्छा होगा उनके लिए और पूरे देश के लिए भी ! भाजपा के नेता जल्दी से यह जमीनी सच्चाई जान लें और उनके मन से हिंदू-मुस्लिम धर्मीय जनता में फूट डालकर सत्ता के लिए राजनीती करने का भूत निकल जाए ! बिहार की हार संकेत है कि अगर रणनीति-राजनीति में बदलाव नहीं किया गया तो बीजेपी के लिए अच्छे दिन नहीं आने वाले हैं।

दीया आत्म का संपूर्ण विस्तार है


11 नवम्बर 2015
भारत के मन में आज दीपोत्सव की पुलक है। प्रकाशलब्धि है, लेकिन अंधकार हमारा मूल। हम मां के गर्भ में थे, गहन अंधकार था। हमारा प्राथमिक विकास गहन तमस् में हुआ। बीज भी धरती के अंधकार गर्भ में फूटता है, अंधकार से उगता है। बीज का गर्भ भी अंधकार में ही पकता है। हम अंधकार से उगते हैं, व्यक्त जगत में आते हैं। आंखों को प्रकाश देखने का अनुभव नहीं होता। तमस हमारी यथास्थिति है, और प्रकाश हमारी नियति। सो, ज्योतिर्मयता हमारी चिरन्तन प्यास है। उजाला सामूहिक रूप में प्रसारित हो तो जैसे फूल खिल जाते हैं, उसी तरह दीप की पंक्तियां, जिनमें दीप की निष्ठाएं हैं, दीपावली की आभा रच देती हैं। पंक्तिबद्ध होने में जो लय है, वही तो पृथ्वी की उजास है। एक-एक का लालित्य एवं समूह का लालित्य। समूह जब अनुशासन की ज्यामिति हो तो वह भीड़ नहीं होती। दीपावली समाज व व्यक्ति के जीवन के कुरूप पाठों को नया रूपांकन देती है। कृषि संस्कृति में पीड़ाओं व दु:खों के बावजूद उल्लास व उजास के इतने शेड हैं कि देखते ही बनते हैं। सभी एक जैसे मौसम का आनंद उठाते हैं, जिसे सम कहा जा सकता है : न गर्मी, न सर्दी। मिट्टी की कला के इतने सारे रूप इस समय देखने को मिलते हैं कि शायद सालभर न मिलते हों। भिन्न-भिन्न तरह के दीये, हाथी-घोड़े, पेड़-पौधे सभी कुछ मिट्टी की कला में। हमारे यहां इन कलाओं को संरक्षित किए जाने की जरूरत है। वह सबकुछ जो हमें कलात्मक रूप से समृद्धि दे, वैभव दे, उसे बचाके रखा जाना चाहिए। मध्य वर्ग, निम्न वर्ग, किसान आदि दीपावली को नई अभिव्यंजना देते हैं। यहां एक प्रश्न है कि क्या मनुष्य प्रकृति की श्रेष्ठतम रचना है? प्रकृति में अनेक रूप, रंग, रस और नाद हैं। प्रकृति स्वयं को प्रकट करती है बारम्बार। छान्दोग्य उपनिषद् के ऋषि ने बताया है कि प्रकृति समस्त सर्वोत्तम प्रकाश रूपा है। जहां-जहां खिलता है, प्रकृति का सर्वोत्तम, वहां वहां प्रकाश। हम धन्य हो जाते हैं। प्रकाश दीप्ति एक विशेष अनुभूति देती है हमारे भीतर। अर्जुन ने विराट रूप देखा। उसके मुख से निकला-दिव्य सूर्य सहस्त्रांणि। हजारों सूर्य की दीप्ति एक साथ। भारतीय अनुभूति का ‘विराट’ प्रकाशरूपा ही है। पूर्वजों ने प्रकाश अनुभूति को दिव्यता कहा। बगैर परिवर्तन के नई आभा नहीं रची जा सकती। यदि बड़े परिवर्तन न संभव हो सकें, तो छोटे-छोटे बदलाव सृजन की दीपावली ला सकते हैं। राजनीति, इतिहास, मार्क्सवाद से परे ही अब नई दुनिया सृजित होगी। यहां 'राजनीति" का अर्थ सिर्फ राज पाने के लिए बनी नीति से है। जो सृजनधर्मी वृहत्तरता के सापेक्ष नीति होगी, वह समाज, राज व व्यक्ति सबसे सकारात्मक रूप से जुड़ी होगी। यहां 'इतिहास' का अर्थ अपने वर्चस्व को घटना-रूप देना है। इससे अलग जाना होगा। वर्चस्व को तोड़कर ही छोटे-छोटे दीये रास्तों, दीवारों व चौबारों में जल सकते हैं। 'लघु मानव' अपनी आत्मा में 'वृहत' होता है। उसे पता है कि नव-इतिहास के नाम पर चल रहा नव-मार्क्सवाद, सांस्कृतिक भौतिकवाद, जाति, लिंग, वर्गवाद सबकुछ अब धूमिल पड़ने लगे हैं। क्या भाषा वह कहने में असमर्थ है, जो वह कहने का दावा करती है? भाषा और साहित्य जिस सच्चाई का चित्रण करते हैं, उस आधार पर कैसे तय होगा कि सच्चाई क्या है? हम अर्थों को स्थगित कर रहे, प्राप्त नहीं। दीपावली अर्थों की तहों में जाने का दु:साध्य प्रयत्न है। सूर्य और शरद चन्द्र का प्रकाश प्रकृति की अनुकम्पा है, लेकिन दीपोत्सव मनुष्य की प्रकाश अभीप्सु संस्कृति का सृजन। यह कर्मशक्ति का रचा- गढ़ा तेजोमय प्रकाश है। प्रकाश ज्ञानदायी और समृद्धिदायी है। दीपावली को भारत केवल भूगोल नहीं होता, हिंदू-मुसलमान का जोड़ नहीं होता। यह राज्यों का संघ नहीं होता। भारत कर्मतप के बल पर इस रात ‘‘दिव्य दीपशिखा’ हो जाता है। दीपावली परिवर्तन, सौंदर्य, निजता, स्वायत्तता, ज्योति व लघु अंधकार का समन्वयन एक साथ स्थापित करती है। लघुता को सम्मान देती है यह। छोटा दीया आत्म का संपूर्ण विस्तार करता है। वह संवेदना, संवाद व संप्रेषण की स्थिति की ओर ले जाता है। हमें निचले दर्जे की राजनीतिक स्पर्द्धा, संवादहीनता व विद्वेष की भावनाओं से परे जाना है, तभी दीपावली का असली डिस्कोर्स समझ में आएगा। दीपावली हमारे भीतर के सृजन को ऊर्जा व आभा देती है। अमावस की रात प्रकाश पर्व का मुहूर्त घोषित करता है। शरद पूर्णिमा का प्रकाश अमृत कहा गया है। सो, शरद् पूनों को ही प्रकाश पर्व जानना चाहिए था। लेकिन तब गहन तमस् का क्या होता? ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय्’ की प्यास को कर्मतप में बदलने के आह्वान का क्या होता? तमस से मानव संघर्ष की जिजीविषा का क्या होता? अमावस का अंधकार प्राकृतिक है। भारतीय प्रकृति की अनुकम्पा का नीराजन करते हैं और अमावस को प्रकाश से भरने की सांस्कृतिक कार्रवाई करते हैं।

Tuesday, November 10, 2015

बिहार के नतीजे पार्टियों के लिये सबक हैं



10 नवम्बर 2015

देश के पहले चुनाव से लेकर आज तक यह नियम लागू है कि चुनाव में जीत नेता की होती है और हार कार्यकर्ता की। दोष-पाप धोने की यह व्यवस्था हर पार्टी में एक जैसी है। बिहार विधानसभा के चुनावों पर देर-सबेर लागू कर दिया जाएगा।इतिहास गवाह है कि यह सवाल जितनी बार पूछा गया, उत्तर हमेशा यही रहा कि पार्टी विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद स्थिति की ‘समीक्षा’ होगी। वह ‘समीक्षा’, जिसमें अंततः पाया जाता है कि पराजय की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री, पार्टी अध्यक्ष या रिमोट कंट्रोल की नहीं है। बिहार के चुनालव प्रचार के दौरान या किसी भी चुनाव के प्रचार के दौरान यह देखने को मिला होगा कि सभी नेता या दल मतदाताओं को सपने बेचने में लगे हैं। जो जितना बड़ा बिसाती है वह उतने ही सपने बेच पाता है और वोट पा लेता है। बिहार चुनाव के नतीजे बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी सपनों का पहले जैसी सौदागर नहीं रही। उसका टोकरा ख़ाली हो गया? जाति के आधार पर टिकट सभी दलों ने दिए। यादव या कुर्मी बहुल क्षेत्रों में सभी दलों के उम्मीदवार उन्हीं जातियों के थे लेकिन अंतिम परिणाम में सीटों का गणित भाजपा और मोदी के विरुद्ध चला गया। बिहार चुनाव में इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि बिहार ने अश्वमेध का घोड़ा दूसरी बार रोका है। दोनों बार घोड़ा छोड़ने वाली जमात भारतीय जनता पार्टी थी। पहले उसने लाल कृष्ण आडवाणी का रथ रोका था और इस बार नरेंद्र मोदी का।

बिहार के जनादेश में बहुत सारे सन्देश समाहित हैं। लेकिन जनादेश की सबसे बड़ी खासियत यही मानी जाएगी कि नीतीश का मोदी-विरोध सच्चा है। जनादेश ने इसी सच्चाई पर अपनी मोहर लगायी है। जनादेश से ये भी साफ हो गया कि अब राष्ट्रीय स्तर पर भी मोदी-विरोध की क़मान नीतीश के हाथों में ही होगी। केजरीवाल और ममता इस विरोध के प्रादेशिक क्षत्रप के रूप में और मुखर होकर दिखायी देंगे। नया जोश तो कांग्रेस में भी दिखेगा। बशर्ते, राहुल गांधी कुछ ज्यादा परिपक्वता से पेश आएं और अपने सलाहकारों में अनुभवी नेताओं को प्राथमिकता दें। मोदी खेमा ठीक से आत्म-विश्लेषण करे। मोदी जी को यह मानना पड़ेगा कि लोकसभा चुनाव के साल भर में बहुत कुछ बदल गया। बिहार के मतदाताओं ने मोदी के विकास और उनके जाति-समीकरण पर भरोसा नहीं किया। कटाक्ष उलटे पड़ गए। जुमले मजाक बने। एनडीए मूलतः बिहार के डीएनए में नहीं था और उसने इसे दिखा दिया। अमित शाह और नरेन्द्र मोदी के अलावा मोहन भागवत भी अपने गिरेबान में झांकें और भारत की समावेशी राजनीति को आत्मसात करने का गुर सीखें। अब नीतीश के सामने पहाड़ जैसी चुनौतियां हैं। सत्ता का अनुभव उनकी मदद करेगा। लेकिन लालू और आरजेडी को राज्य-हित में साधकर चलना आसान नहीं होगा। सबसे पहले तो नीतीश को जंगलराज के बदनुमा दाग को धोना होगा। इस चुनाव में उन्हें पसन्द करने वाले लाखों मतदाता ऐसे थे जो लालू यादव के साथ जाने से नाखुश थे। इनमें ज्यादातर सवर्ण और शहरी शिक्षित वर्ग के लोग हैं। नीतीश को न सिर्फ बिहारवासियों बल्कि देश के जहन में बैठी इस आशंका को खत्म करना होगा कि कहीं उनकी नयी सरकार लालू की जंगलराज वाली छवि के आगे घुटने तो नहीं टेक देगी। बेहतर होगा कि बिहार का गृह-विभाग और पुलिस-प्रशासन दोनों सीधे मुख्यमंत्री के पास हों। रोजमर्रा का काम बांटने के लिए वो भले ही राज्यमंत्री को साथ रखें। लेकिन इस मोर्चे पर चमत्कार करके दिखाएं। यदि नीतीश ऐसा कर सकें तो जल्द ही वो महागठबन्धन पर लगे दागों को धो सकेंगे। इस चुनाव में जनता ने नई संभावनाओं को खोजा है और नेतृत्व को इससे सीख लेनी चाहिए। राजद को इतनी अधिक सीटें मिलीं। इस राज्य में गरीब, उपेक्षित, पिछड़े, अतिपिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक आदि ही बहुसंख्यक हैं, इसलिए इस विशाल तबके के हितों को ध्यान में रखना नेतृत्व के लिए भी अपेक्षित होगा और राज्य के लिए भी। वहीं जदयू विकास की अपनी नीति को गरीबों के पक्ष में और ज्यादा ले जा सके, तो उसका दूरगामी प्रभाव होगा।

इस चुनाव में बिहार ने सबसे बड़ी सीख यह दी है कि सांप्रदायिक असहिष्णु भाषा और आचरण की अपनी राजनीतिक सीमा है। भारतीय समाज में सामान्य जन उसे व्यापक समर्थन नहीं दे सकता। किसी खास समय और संदर्भ में भले ही वह वोट का जरिया बने, मगर ज्यादा स्थितियों में उसके राजनीतिक और चुनावी परिणाम भी नकारात्मक होंगे। बिहार की कानून-व्यवस्था को यदि नीतीशकुमार ने चमका दिया तो उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी के लिए भगवा फहरा पाना मुश्किल हो जाएगा। नीतीश चाहें तो पड़ोसी नेपाल के साथ भी भारत के ऐतिहासिक रूप से खराब हो चुके रिश्तों में भी नयी जान डाल सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो मोदी जी की लड़खड़ाती विदेश नीति को नीतीश एक जोरदार और शानदार सबक देने में सफ़ल हो जाएंगे। नीतीश और लालू की जोड़ी को एक और बात गांठ बांधनी होगी कि वो मुसलमानों के प्रति ऐसी नीतियां न अपनायें जिससे बीजेपी और संघ को ये प्रचार करने का मौका मिले कि वो कांग्रेस की तुष्टिकरण और वोट-बैंक की राह पर चल रहे हैंं। नेताओं को अपने दिमाग से ये गलतफहमी निकालनी होगी कि मुसलमानों को आरक्षण का झुनझुना थमाकर राजनीति चमकायी जा सकती है।


बिहार की केमिस्ट्री नहीं समझ सके मोदी



9 नवम्बर2015

बिहार में वही हुआ जिसका इम्कान था, वह नहीं हुआ जिसका शोर था। चुनाव के दौरान और मतदान खत्म होने के बाद ए​िग्जट पोल ने जो अलजेबरा दिखाया था वह बिहार के मतदाताओं की केमिस्ट्री को समझ नहीं सका। यहां जो सबसे बड़ी बात थी वह थी कि यह चुनाव अन्य विधानसभा चुनावों से अलग था। जिसके पास जो भी रणनीति थी आजमा ली है। किसी ने गाय खोल दी तो किसी ने सरसों मिर्चा का हवन भी कर लिया। पैकेज से शुरू हुआ चुनाव पाकिस्तान पर चला गया और गवर्नेंस की बात होते होते गाय की होने लगी। डीएनए की बात होते- होते ब्रह्मपिशाच और नरभक्षी की होने लगी। पर हमारी चुनावी राजनीति का स्तर जैसा है हमारे नेताओं ने उसे भाषा के स्तर के मामले में भी बरकरार रखा। रैलियों और सभाओं के मामले में भी यह अप्रत्याशित चुनाव रहा। बीजेपी ने अपने दल- बल के साथ खूब लड़ाई लड़ी है। उसके कई नेता ऐसे हैं जो सौ- सौ सभाएं करने का दावा कर रहे हैं। महागठबंधन ने भी वो सबकुछ किया जो करना चाहिए था। उसके पास बीजेपी की तरह कार्यकर्ताओं और रणनीतिकारों की फौज नहीं थी फिर भी उसकी लड़ाई कई बार बीजेपी पर भारी पड़ी। हेलिकॉप्टर के पायलटों ने बिहार खूब देखा होगा। ज़मीन से बिहार चाहे जैसा दिखे, लेकिन हेलिकाप्टर से बहुत खूबसूरत दिखता है। हरे- हरे खेत और ताड़ के पेड़ किसी कैनवास पर उतारी गई तस्वीर की तरह लगते हैं। बिहार के चुनाव का नतीजा सबके सामने है। एन डी ए ने हार स्वीकार कर ली है। यहां एक बात गौर के काबिल है कि इतना होने के बावजूद भाजपा क्यों हारी? एक नजर में जो कारण दिखते हैं वे हैं , भाजपा की गाय को किसी ने चारा नहीं डाला। बिहारी और बाहरी का मसला ज्यादा दमदार रहा। राज्य के चुनावों में स्थानीय नेताओं की अहमियत सबसे ज्यादा होती है जो भाजपा के पास थी ही नहीं। लोगों को लगता है कि स्थानीय नेता को जरूरत पड़ने पर देख-सुन तो सकते हैं। दिल्ली वालों को कहां खोजते फिरेंगे! इसके साथ ही कहना सही नहीं है कि बिहार में मोदी का जादू नहीं चला। दरअसल, दिल्ली चुनाव के वक्त भी यही बात सामने आई थी। अब भी वही सही है कि जब भी किसी राज्य के चुनाव में केंद्र अपनी पूरी ताकत झोंकेगा, मतदाता इसे कमजोर के सामने बलवानों का मुकाबला मानेगा और मतदाता कमजोर के साथ हो जाएगा। हेलिकाॅप्टर देखकर भीड़ तो आ जाती है लेकिन वह वोट में परिवर्तित नहीं होती। संघ प्रमुख द्वारा उठाया गया आरक्षण का मुद्दा बिहार में भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण रहा। ये भी एक हकीकत है कि विकास के मानदंड पर पिछले डेढ़ साल में मोदी सरकार की साख गिरी है। वे न अच्छे दिन ला पाए न महंगाई से राहत दे पाए। हां, जनता पर बोझ जरूर बढ़ गया। जाहिर है कि विकास के उनके दावे को गंभीरता से नहीं लिया गया। बिहार में हिंदुत्व कार्ड के चलने के बारे में प्रेक्षकों को पहले से ही संदेह था। बिहार में जातिगत राजनीति हमेशा से बहुत शक्तिशाली रही है और इसीलिए हिंदुत्व का हथियार वहां कम ही काम करता है। फिर हिंदुत्व का कार्ड इतना खुल्लमखुल्ला चला गया कि संभव है कि मतदाताओं को उसका छल-छद्म पसंद न आया हो। इसका एक और प्रभाव ये पड़ा कि अल्पसंख्यक समुदाय लालू-नीतीश के साथ जमकर गोलबंद हो गया। लालू का एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण इससे बहुत मजबूत हो गया। नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव जीतने के बाद चार विधानसभा महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनाव जीत चुके हैं लेकिन दिल्ली विधानसभा में करारी हार हुई। बिहार चुनाव नरेंद्र के लिए अहम रहा। अगर नरेंद्र मोदी बिहार का चुनाव जीत जाते तो खुद उन्हें , बीजेपी की पूरी टीम, उनके विरोधियों और मीडिया को भी लगता कि उनका जलवा जारी है। भले दिल्ली में पार्टी हार गई लेकिन उनकी लोकप्रियता और शख्सियत बरकरार है। इस जीत से पार्टी में उभर रहे विरोधियों के लिए सबक भी होता और उनके खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती थी। देश से विदेश में उनकी प्रतिष्ठा में चार चांद लगता और आर्थिक दृष्टि से विकास की गति को रफ्तार मिलती वहीं असहिष्णुता के नाम सरकार की घेराबंदी भी कमजोर हो जाती। विपक्ष के हौसले पस्त हो जाते और जमीनी हकीकत से ताल बिठाने की कोशिश करते। उनके पराजित हो जाने से सारे अरमानों पर जबर्दस्त धक्का लगा है। भले उनकी कुर्सी पर फिलहाल खतरा नहीं है लेकिन पहला सवाल ये उठता है कि क्या उनका जलवा खत्म हो गया है? दिल्ली के बाद बिहार में दूसरी बड़ी हार है। अहिष्णुता के नाम पर सरकार को घेरने वाले साहित्यकार, फिल्मकार और साइंटिस्ट के अलावा विपक्षी पार्टियों को मोदी को घेरने का मौका मिल गया। वहीं पार्टी के अंदर भी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ स्वर उभरेगा। जो पहले से पार्टी के अंदर स्वर उठा रहे थे उन स्वरों को और बल मिल जायेगा। ये भी आरोप लग सकता है कि अहंकार की वजह से पार्टी की हार हुई क्योंकि पार्टी के अंदर पार्टी की नीति, कदम और फैसले से जो नेता असहमत थे, उन्हें मनाने की कोशिश नहीं हुई। विपक्षी तो अब यही आरोप लगाएंगे कि नफरत फैलाने की वजह से जनता ने सबक सिखाने का काम किया है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की टीम को इस हार से उबरने में काफी समय लग सकता है।

हमारी सबसे बड़ी विपदा



7 नवम्बर 2015

कांग्रेस इन दिनों एक नयी प्रकार की भाषा इजाद करने के प्रयास में है। एक ऐसी भाषा जो लोगों में उसके प्रति भरोसा पैदा करे। इसी प्रयास के तहत उसने सहिष्णुता का जुमला उछाला। पर कांग्रेस का यह प्रयास बिल्कुल पाखंडपूर्ण है, इसे समझने के लिए किसी विशेष बुद्धि की जरूरत नहीं है। हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी विपदा है कि वह समस्याओं और मसलों से घिरे रहने का पाखंड करता है। अब कांग्रेस को देखें। इसने सहिष्णुता का मसला उठाया। यह सब जानते हैं कि आप किसी राष्ट्रीय मसले को पेश करना चाहते हैं तो आपको ऐसा कर सकने की अपनी क्षमता भी प्रदर्शित करनी होगी, साथ ही कुछ ऐसा करना होगा जो विश्वसनीय लगे। राष्ट्रपति भवन तक जुलूस लेकर जाने से ऐसा कुछ नहीं लगता कि वह संघर्ष करने को तैयार है। लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाये जाने के मसले पर राष्ट्रपति के पास जाना कुछ ऐसा ही लगता है मानों वह उन्हीं लेखकों - बुद्धिजीवियों की पिछलग्गू है। बेशक एक मामले में भाजपा कांग्रेस से पीछे है कि लेखकों का एक भाग कांग्रेस के साथ है लेकिन यह भी सच है कि बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस के साथ दिखने से कतराता है। कांग्रेस का सबसे बड़ा भ्रम है कि वह चीजों को सुसंगत ढंग से समझ नहीं पाती। चाणक्य का कथन याद आता है कि ‘अपने दोस्तों को निकट रखिए, लेकिन दुश्मनों को और भी निकट रखिए।’ इस मामूली सी बात को कांग्रेस नहीं समझ पा रही है। यही गलती मोदी सरकार भी कर रही है। उसके साथी अपने आलोचकों का मुंह बंद करने में लगे हैं। वह कुछ आलोचकों को अपने में समायोजित कर सकती है और उनका दिल जीत सकती है, जिन्हें वह शत्रु के रूप में देखती है। सत्ता में आकर 15 माह बाद भी वे कांग्रेस को भला-बुरा कहने में ही लगे हैं, गांधी परिवार के लोगों को बदनाम करने में लगे हैं। समझदारी यही होती कि वे दोनों की अनदेखी करते, जैसा कि देश पहले ही कर चुका है। विजेता तो अपने पूर्ववर्तियों से बेहतर चीजें करने पर ध्यान केंद्रित करता है। ‘हम’ बनाम ‘वे’ की बातें तो चुनाव के समय ठीक लगती हैं, तब नहीं जब आप सत्ता में आ चुके हैं। सत्तारूढ़ होने के बाद तो लोगों को विभिन्न मुद्दों पर आपसे आम सहमति निर्मित करने की अपेक्षा रहती है। वे चाहते हैं कि आप नया भविष्य बनाएं बजाय इसके कि आप यही दोहराते रहें कि भूतकाल कितना बुरा था। अभियान चलाने वाले की भूमिका में मोदी महान व्यक्ति हैं। वे अपना वक्त बर्बाद नहीं करते और विरोधियों की चालों में नहीं उलझते, लेकिन वे मोदी देश नहीं चला सकते। केवल राजनीतिक मोदी ही देश चला सकते हैं। उसके लिए तो उन्हें सिर्फ भाजपा का ही नहीं, अन्य सबका समर्थन भी चाहिए। यही गड़बड़ी कांग्रेस के साथ भी है। सहिष्णुता की उसकी अवधारणा पराभौतिक है। उन्हें यह जानना होगा कि पार्टियां आती- जाती रहेंगी और सदा नफरत फैलाने वाले लोग मौजूद रहेंगे। समाज तो उन्हें समर्थन देगा जो या तो आजादी की कटौती नहीं करेंगे या नफरत फैलाने वाले को दंडित करेंगे। तब जाकर आप वह हासिल कर सकते हैं, जिसे आपने अपना लक्ष्य बना रखा है, जिसके लिए आप चल पड़े हैं। आम सहमति निर्मित करना इस दिशा में पहला कदम भर है। मोदी सरकार यहीं पर नाकाम हुई है साथ ही कांग्रेस क्षमता हीन दिख रही है। इनके पास उतनी बौद्धिक गुंजाइश नहीं है कि वह अन्य लोगों के दृष्टिकोण और मतों को भी अपने वैचारिक क्षेत्र में स्थान दे सके। और इसके हाशिये पर पड़े सिरफिरे तत्व इस बात पर तुले हुए हैं कि ऐसे कोई प्रयास कामयाब न हो सकें। किसी और के बजाय मोदी इसे बेहतर जानते हैं। अवॉर्ड लौटाने वाले लेखकों, फिल्मकारों व अन्य बुद्धिजीवियों के प्रति सरकारी प्रतिक्रिया भी अनावश्यक थी। इससे पता चलता है कि भाजपा सांकेतिक मुद्राओं के महत्व के बारे में कितना कम समझती है। यह कोई मोदी विरोधी रवैया नहीं है, जैसा कि उनके चापलूस समझते हैं। ये बुद्धिजीवी किसी का पक्ष नहीं ले रहे हैं। उन पर कांग्रेस के गुट का लेबल लगाना उतना ही मूर्खतापूर्ण है, जितना कि कुछ लेखकों पर या आगे अकादमी अवॉर्ड से सम्मानित होने वालों पर भाजपा का लेबल लगाना। बुद्धिजीवी वर्ग यह चिंता प्रदर्शित कर रहा है कि भारत गलत दिशा में जा रहा है। उन्हेें यह देखकर बेचैनी है कि प्राथमिकताओं का घालमेल हो रहा है और हम गलत सपनों का पीछा कर रहे हैं। कौन जानता है, वे सही भी हो सकते हैं? शायद मोदी को उनकी बात सुननी चाहिए। वे अपने वफादारों को निकट रख सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने आलोचकों को और भी निकट रखना चाहिए। सत्ता में बैठे हर व्यक्ति को वह सब सुनना चाहिए, जो वह सुनना नहीं चाहता। कहते हैं कि ,

निंदक नियरे राखिये आंगन कुटी छवाय

बिन साबुन पानी बिना निर्मल करे सुहाय।


Friday, November 6, 2015

समाधान का संधान करें



6 नवम्बर

भारत में बढ़ती असहिष्णुता की गूंज दूसरे देशों में भी सुनाई देने लगी है। मूडी कारपोरेशन के बाद अबविदेशी अखबारों ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नसीहत देने के अंदाज में लिखना शुरू कर दिया है। न्यूयार्क टाइम्स ने ‘हिंदू अतिवाद की कीमत’ शीर्षक से अपने सम्पादकीय में लिखा है कि भारत में बढ़ते असहिष्णुता के माहौल से देश और विदेश के बिजनेस लीडर निराश हैं। इसके अनुसार यह वह भारत नहीं है, जैसा बड़ी संख्या में भारतीय चाहते हैं। यह वह भारत भी नहीं है, जो विदेशी निवेश आकर्षित कर सके, जिसके लिए मोदी ने अपनी विदेश यात्राओं में मेहनत की है।पिछले हफ्ते मूडी ने भी मोदी को चेताया था कि राजनीतिक विफलता आर्थिक परिणामों के लिए घातक हो सकती है। संस्था ने अपनी रिपोर्ट में प्रधानमंत्री को विवादित बयान देने वाले भाजपा नेताओं पर लगाम लगाने की नसीहत दी थी।मूडी के मुताबिक ऐसा नहीं करने पर मोदी के घरेलू और वैश्विक मोर्चे पर अपनी विश्वसनीयता खो देने का खतरा है।प्रधानमंत्री मोदी अमूमन मीडिया की आलोचना को खास तवज्जो नहीं देते लेकिन उनकी हाल की अमरीकी यात्रा ने दोनों देशों में बहुत उम्मीदें जगा दी हैं। ऐसे में वहीं के एक अखबार द्वारा भारत की स्थिति पर की गई टिप्पणी के काफी मायने हैं। असहिष्णुता के इस बात को ही संदर्भ में रख कर हालातों का जायजा लेंगे तो हमारे समाज में दो तरह के लोग दिखेंगे। एक दक्षिणपंथी हैं , जिन्हें उपहास पूर्वक संघी, कच्छाधारी वगैरह वगैरह की उपमाएं दी जाती हैं। दूसरे तरह के वे लोग हैं जो इस तरह की उपमाएं देते हैं और खुद को उदारवादी कहते हैं। ये शब्द कुछ ऐसे हो गये हैं मानों वे बिम्ब हो गये हैं। संघी कहते ही लगता है कि कुछ लोगों के गिरोह हैं जो बलवा करते चल रहे हैं, उन्मादी आंदोलनकारी हैं। ... और उदारवादी कौन हैं? लगता है कुछ ऐसे लोगों एक तबका जो ड्राइंगरूम बैठ कर भरी भारी तर्क दे रहा है। देश की आर्थिक नीति और धर्मनिरपेक्षता के मुद्दों पर उन उदारवादियों को पता ही नहीं होता है कि भारत वास्तव में कैसा होना चाहिए। उनके पास कभी कोई समाधान होता है, इसलिए यह कहना कठिन है कि वे किस का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका व्यवहार झुंड की तरह होता है। इन्हें अपने भारत के बारे में मालूम नहीं है। अपनी अंग्रेजी शिक्षा ,ऊंचे रसूख और अंतरराष्ट्रीय संस्कृति के अनुभव के कारण वे उच्च वर्ग के साथ घुलमिल सकते हैं। आम आदमी से विशिष्ट होने से उन्हें सर्वश्रेष्ठ नौकरियां मिलती हैं और इससे भी बड़ी बात, समाज में ऊंचा दर्जा मिलता है। विशिष्ट वर्ग के ये लोग अपने जैसे अन्य लोगों को आसानी से पहचान लेते हैं और वे एक-दूसरे के साथ रहना पसंद करते। चूंकि खुद को अलग साबित करना उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है , इसलिए उन्होंने लगभग हर उस चीज को नापसंद करना शुरू कर दिया, जिसे साधारण भारतीय पसंद करते हैं। अभी ताजा उदाहरण ‘विख्यात अर्थशास्त्री’ विवेक देवराय का देखें। इन्होंने फतवा दिया है कि भारतीय समाज कभी सहिष्णु रहा ही नहीं। यह उक्ति उसी विशिष्ट वर्ग की है जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है। विशिष्ट वर्ग के इन लोगों ने अपना एक खास वर्ग बना लिया। समय बदला और भारत आर्थिक प्रगति करता गया। प्रतिभा की मांग बढ़ गई और अब विशिष्ट वर्ग के होेने का उतना अर्थ नहीं रह गया। योग्यता व प्रतिभा के आधार पर नौकरियां हासिल हुईं तो ज्यादा लोग समृद्ध हो गये। उन्हें अंतरराष्ट्रीय संस्कृति का अनुभव नहीं है लेकिन इसकी उन्हें परवाह भी नहीं है। इन प्रतिभाशाली बच्चों को स्थानीय संस्कृति,भाषा और धर्म को निची निगाह से देखने की कोई जरूरत नहीं थी। इन्होंने गौरवभरे राष्ट्रवादियों का बड़ा वर्ग तैयार किया।इस ताजा स्थिति के बाद विशिष्ट वर्ग के लोग खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे। वे ही एकजुट होकर उदारवादियों के नए स्वरूप में उभरे। खुद को धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु कहने लगे। उन्होंने एक ऐसा वातावरण बनाया मानो भारत को हिंदू आक्रमण से बचा रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू भावना पर हमला करने वाले ये उदारवादी, उसी तरह इस्लामी कट्टरपंथियों पर हमला नहीं करते। इन उदारवादियों को उपहास में छद्म धर्मनिरपेक्षवादी और छद्म उदारवादी इसलिए कहते हैं कि उदारवाद उनका एजेंडा है ही नहीं। उनका एजेंडा तो उन वर्गों को निची निगाह से देखना है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय अनुभव की विशिष्टता हासिल नहीं है। ये नकली लोग हैं। हमें ऐसे लोगों की जरूरत है जिनके पास नए विचार हों, समाधान हों और सच्चे अर्थ में सबमें मिलने-जुलने की इच्छा हो। मोदी की गलोचना करने से कुछ नहीं होने वाला, या विवेक देवराय की तरह पूरे हिंदू समाज को असहिष्णु बताने से कुछ नहीं होने वाला या हर बात को कांग्रेस और भाजपा के बीच का खेल बनाने से कोई लाभ नहीं है। गीता में कहा गया है कि ‘जब पृथ्वी पर मिथ्या का राज हो जाता है तो बुद्धि पर माया व्याप्त हो जाती है।’ आज माया से ग्रस्त हैं हालात। समाज में सुधार के लिए आम-सहमति तो बुद्धिजीवी और उदारवादी ही कायम कर सकते हैं। न्यूयार्क टाइम्स और मूडी की बातों को उछालने से कुछ होने वाला नहीं है। उंगलियां उठाना छोड़ें और समाधान की तलाश करें।

.... और अंत में वे मेरे लिये आये



5 नवम्बर

लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाने का विरोध करने वाले अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि जब आपात काल लागू हुआ था तब क्यों नहीं लौटाया पुरस्कार या सम्मान या जब सिख विरोधी दंगे हुए थे तब क्यों नहीं लौटाया या जब गुजरात में दंगे हुए थे तब क्यों नहीं ऐसा हुआ जो आज हो रहा है। पर ऐसे लोग शायद जानबूझ कर मिथ्या प्रचार कर रहे हैं। पहले यहां यह स्पष्ट कर दें कि करीब करीब हर लेखक और कलाकार ये कहलाना पसंद करता है कि वह अराजनीतिक है लेकिन रचनात्मकता शून्य में तो नहीं पैदा होती। हर रचनात्मकता में राजनीति का कुछ न कुछ पुट जरूर होता है और पुरस्कार को लौटा कर ये बुद्धिजीवी एक तरह का कड़ा राजनीतिक संदेश दे रहे हैं। अमरीकी उपन्यासकार टोनी मॉरिसन ने एक बार सही ही लिखा था, "जो लोग ये कह कर कि वे यथास्थिति को पसंद करते हैं, राजनीतिक न होने की बहुत ज्यादा कोशिश करते हैं, वे वास्तव में राजनीतिक सोच वाले लोग होते हैं।" साहित्य अकादमी या पद्म पुरस्कार लौटाने वाले लोगों के समर्थन या विरोध में कई तर्क दिए जा सकते हैं लेकिन ये बात अधिकतर लोग मानेंगे कि उनके इस क़दम ने देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता की ओर सबका ध्यान जरूर खींचा है। पुरस्कार लौटाने की शुरुआत सबसे पहले गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी जब उन्होंने जालियांवाला बाग कांड के विरुद्ध नाइटहुड यानी सर की उपाधि वापस कर दी थी। पद्म पुरस्कारों की निष्पक्षता पर शुरू से सवाल उठते आए हैं। इस पर पहला सवाल पचास के दशक में तत्कालीन शिक्षामंत्री मौलाना आजाद ने उठाया था जब उन्होंने खुद को भारत रत्न दिए जाने के फैसले को अस्वीकार करते हुए कहा था कि पुरस्कार चुनने वाले लोगों को खुद को पुरस्कार देने का अधिकार नहीं है। ऐसे उदाहरण करीब-करीब नहीं के बराबर हैं जब किसी सरकार ने अपने राजनीतिक विरोधियों को इस सम्मान के लिए चुना हो। इसका एक ही अपवाद है जब नरसिंह राव के नेतृत्व वाली सरकार ने विपक्षी दल के अटल बिहारी वाजपेयी को पद्मविभूषण देने का फ़ैसला किया था। आज साहित्यकारों का यह प्रतिरोध इस अर्थ में सफल है कि उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी और बहुलतावादी सह अस्तित्व के मुद्दे पर देश का ध्यान खींचा है। इस दौरान लेखकों को लगातार यह तोहमत झेलनी पड़ी कि उनका पूरा विरोध प्रायोजित है।भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यहां तक कह दिया कि यदि आपको देश में बढ़ती असहिष्णुता की इतनी ही चिंता है तो आपने इससे पहले इतने दंगे हुए, तब अपने पुरस्कार क्यों नहीं लौटाए, जब देश में आपातकाल लागू हुआ, तब आपने पुरस्कार क्यों नहीं लौटाए? उनसे बार-बार यह सवाल पूछा गया कि इसके पहले उन्होंने इमरजेंसी या ऐसी दूसरी बड़ी घटनाओं का विरोध क्यों नहीं किया। यह तोहमत यही साबित करती है कि हम मूलतः ऐसे छिछले समाज में बदलते जा रहे हैं जो बीते हुए संघर्षों को याद तक नहीं करता, क्योंकि उसके लिए राजनीति और सत्ता सबसे बड़े मूल्य, सबसे बड़ा सच हैं। क्योंकि समाज का यह बदलाव राजनीति और सत्ता के ही डायनामिक्स से आता है। जहां तक इमरजेंसी का सवाल है उस दौरान तो राजनीतिज्ञों के अलावा लेखकों, पत्रकारों और चित्रकारों ने भी लड़ी थी। उस दौर के हर अादमी को भारती की ये पंक्तियां याद होंगी , शहर का हर बशर वाकिफ है

कि पच्चीस साल से मुजिर है यह

कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए

कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए

कि मार खाते भले आदमी को

और असमत लुटती औरत को

और भूख से पेट दबाये ढाँचे को

और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को

बचाने की बेअदबी की जाये

इमरजेंसी के दौरान सम्मान लौटाने वालों में फणीश्वर नाथ रेणु और नागार्जुन के अलावा हंसराज रहबर, गिरधर राठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, सुरेंद्र मोहन, डॉ रघुवंश, कुमार प्रशांत, कुलदीप नैयर जैसे कई बड़े लेखक और पत्रकार थे, जिन्हें इमरजेंसी के दौरान जेल तक काटनी पड़ी थी। सिख विरोधी दंगों से क्षुब्ध हो कर पाश ने लिखा था

‘मैंने उसके ख़िलाफ़ जीवन भर लिखा और सोचा है

आज उसके शोक में सारा देश शरीक है

तो उस देश से मेरा नाम काट दो।

मैं उस पायलट की धूर्त आंखों में चुभता हुआ भारत हूं

अगर उसका अपना कोई भारत है

तो उस भारत से मेरा नाम काट दो’

गुजरात दंगों के दौरान मंगलेश डबराल की मशहूर कविता किसे याद नहीं होगी।

संक्षेप में पुरस्कार लौटानेवाले बढ़ती असहिष्णुता और हिंसा के लिए केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी को इसीलिए दोषी मानते हैं कि जो तत्व हिंसा कर रहे हैं, उनको सरकार और पार्टी का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन प्राप्त है। लेकिन पिछले कुछ सालों से स्थिति ख़राब हुई हैं। दाभोलकर, पानसरे और कुलबर्गी की हत्याएं इस खराब होते हालात का प्रतीक है। इस स्थिति पर कोई चुप है तो हो सकता है हालात इतने बिगड़ जाएं कि हम भी उनके शिकार होने लगें। महर्टिन नीमोलर की वह विख्यात कविता है न

‘....अंत में वे मेरे लिये आये,

और तब मेरी मदद करने वाला

वहां कोई नहीं था।’