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Friday, November 25, 2016

नोटबंदी नही चुनाव सुधार की जरूरत

नोटबंदी को लेकर पूरे देश में हां हो ना ना मचा हुआ है। विरोधी दल एकजुट हो रहे हैं। फिजां में चर्चा है कि विरोधियों के पास बहुनत कालाधन है इसी लिये यह बेचैनी है। लेकिन क्या इस सारे मामले से कुछ सकारात्मक होगा। संसद के शीतकालीन सत्र से कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक में एक मसला उठाया था , वह अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाया पर था महत्वपूर्ण। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव  के लिये सरकारी धन  मुहय्या  कराने (स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन) का मसला उठाया था। प्रधानमंत्री ने कहा था कि ‘‘ अब समय आ गया है कि हम चुनाव के लिये सरकारी खजाने से धन प्रदान करने और एक साथ चुनाव कराने के विषय पर बात करें। क्योंकि सभी दल अर्थ व्यवस्था में अघोषित  सम्पति से चिंतित हैं। हम संसद के शीतकालीन संत्र में इस पर विस्तार से विचार करें। ’’ प्रधानमंत्री की इस बात पर पहला सवाल उठता है कि चुनाव की स्टेट फंडिंग क्या होती है? यह एक भ्रामक शब्द है जो हकीकत पर परदा डालने की गरज से गढ़ा गया है। इसका अर्थ साधारणत: यह समझा जाता है कि जोलोग चुनाव लड़ेंगे उनका खर्च सरकार देगी। यह भ्रम ‘स्टेट यानी शासन ’ शब्द से पैदा होता है।  इस विचार से यह बात उत्पनन होती है कि यह पैसा सरकार के पास है। जैसे आम आदमी सोचते हैं कि सरकार बिजली मुफ्त कर दे, शिक्षा मुफ्त कर दे , पानी मुफ्त कर दे वगैरह वगैरह। हम यानी स्वभावत:  मुफ्तखोर हैं इसलिये ऐसा सोचते हैं। हम नहीं जानते कि सरकार चुनाव खर्चे कैसे उठा सकती है। यहां सोचना यह है कि सरकार रुपये लाती कहां से है। यह रिजर्व बैंक से जारी करेंसी नोट से नहीं आता बल्कि यह हमारे आपके द्वारा दिये गये करों से आता है। अतएव सरकार का रुपया जनता का रुपया है जो टैक्स के रूप में हमने दिया है। इसलिये स्टेट फंडिंग शब्द में यह संशोधन जरूरी है कि इसे ‘पब्लिक फंडिंग’ कहा जाय। यानी टैक्स के रूपयों से चुनाव का खर्चा। दशकों से चुनाव का खर्च इस तरह से दिये जाने पर चर्चा है। जयप्रकाश नारायण ने इस विषय पर 1975 में तारकुंडे समिति से चर्चा भी की थी।  इस विषय पर अध्ययन करने के लिये 1998 में इंद्रजीत गुप्ता कमेटी भी गठित की गयी थी। उसकी रिपोर्ट के बाद चर्चा हुई कि कमेटी ने चुनाव खर्च सरकारी खजाने से देने की सिफारिश की है। जबकि सच यह है कि कमेटी ने आंशिक खर्चे देने की बात की थी वह भी चुनाव सामग्री की छपाई और मोटर गाड़ियों के तेल इत्यादि का खर्च। कमेटी की रपट में यह साफ लिखा था जोकि किसी नेता या सररकार ने नहीं घेश्घ्ति किया कि ‘इससे चुनाव में बहुत मामूली सुदार हो सकते हैं। जबकि चुनाव पक्रिया को पूरी तरह से ओवरहालिंग की जरूरत है ताकि यह विखंडतावादीण् और बुरे ततवों से मुक्त हो सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि धनबल और बाहुबल ने चुनाव के उद्देश्य को ही खत्म कर दिया।’ अब मूल बात यह है कि नोटबंदी और चुनाव के सरकारी खजाने से खर्च का क्या लेना देना है? पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था कि ‘हर विधायक अपने करियर की शुरुआत गलत खर्चो का हिसाब (इलेक्शन रिटर्न)दाखिल करके करता है।’ यहीं चुनाव के लिये सरकारी खर्च और नोटबंदी का सम्बंध शुरू होता है। सब जानते हैं कि चुनाव में बड़े पैमाने पर अघाहेषित धन का उपयोग होता है। यहां दो तरह के विचार हैं। अगर कोई आदमी सरकारी खजाने से दान हासिल कर चुनाव लड़ता है तो वह अघोषित सम्पति ा उपयोग नहीं कर पायेगा और अगर देश में आो्रश्त सम्पति होगी ही नहीं तो कोई कैसे चुव में इसका उपयोग करेगा।अब पहले विचार पर आये। हम यह मानते हैं या मानने को तैयार हैं कि हम अपने उम्मीदवारों को चुनाव में अघोषित धन का उपयोग करने से रोक नहीं सकते और उन्हें अघोषित धक का उपयोग नहीं करने को  मजबूर करने के लिये नोटबंदी की शक्ल में पूरी अर्थ व्यवस्था को गंभीर क्षति पहुंचाना स्वीकार कर सकते हैं। यहां एक बात हम भूलते हैं कि सकल नगदी अर्थ व्यवस्था कालाधन नहीं है। हमारे देश का आकार और सुविदाओं का अभाव नगदी को जरूरी बनाता है। उपरोक्त विचार का दूसरा खंड है कि अगर हम अपने उम्मीदवारों को अघो्रश्त दान का उपयोग करने से राक नहीं सकती तो फिर सरकारी खजाने से दान दिये जाने के बावजूद वे कालेधन का उपयोग चुनाव में नहीं करेंगे इसकी क्या गारंटी है। ऐसे में तो चुनाव के लिये सरकार से खर्च दिये जाने का मतलब जनता कारुपया फेंकना हुआ। इसलिये जरूरी है कि राजनीतिक दल कानून का पालन करें नोटबंदी से कुछ नहीं होने वाला। दूसरी बात है कि कालाधन चुनाव में उपयोग होता है यह मुख्य नहीं है मुख्य यह हे कि चुनाव में काले धन का उपयोग किया जा सकता है और उसके जरिये चुनाव को प्रभावित किया जा सकता है इसलिये कालाधन पैदा किया जाता है। लेकिन नोटबंदी से ऐसा कुछ होता दिख नहीं रहा है।

Thursday, November 24, 2016

भय की सियासत

भय की सियासत
महान दार्शनिक अरस्तू ने कहा था जो भय मुक्त हो गया वस्तुत: स्वतंत्र है। हम जब से पैदा लेते हैं तबसे हमारा समाज हमें सिखाना शुरू कर देता हे कि हमें क्या करना चाहिये। विख्यात मनोविज्ञानी फ्रायड ने भय और संत्रास को हथियार की संज्ञा देते हुये कहा है कि हमें यह सिखा जाता है कि यदि हम समाज का अनुसरण नहीं करेंगे तो मुश्किलों में पड़ जायेंगे। माता पिता हमें सिखाते हैं कि एक खास किस्म से आचरण करो। अगर हम उनके मनोनुकूल आचरण करते हैं तो वे हमें पुरस्कद्त करते हैं वरनाह दंडित होना पड़ता है। तब फितरतन बच्चा मां बाप की आज्ञाओं का पालन करता है क्योंकि यह जीवन का प्रश्न है। स्कूल में हमारे गुरू जन सिखाते हैं कि सोच की दिशा क्या हो , हम अपे सोच को विकसित कैसे करें। मजे की बात है कि सब लोग एक ही बात सिखाते हैं कि हम अगर उनके यानी शिक्षकों के बताये मार्ग का अनुसरण नहीं करते हैं तो सारे शिक्षक और साथी छात्र हमें खराब कहते हैं। परीक्षाओं में खराब ग्रेड मिलेंगे, स्कूल से निकाला भी जा सकता है। धर्म भी यही सिखाता है कि धर्म ग्रंथों को मानों वरना नर्क भुगतोगे। बात यहीं तक नहीं है जो संस्थान फर्ज कि विश्वविद्यालय हमें यह डरना सिखाते हैं वे खुद भी डरे हुये हैं। उन्हें अपनी स्वायतता को खो देने का भय है या एक ख्गास किस्म के आदर्शै के साथ जीने के लिये मजबूर होने का भय है। इन दोनों प्रकार की भीत दशाओं का सरकार ,चाहे वह राज्य हो याह केंद्र, सृजन और नियंत्रण करती है। इसलिये हम हर जगह समझौता करते हैं। यह हथकंडा रोजमर्रा की जिंदगी में भी अपनाया जाता है और हम इससे अंजान रहते हैं। 

बात बस इतनी ही है कि किसी ने कुछ नियम बना दिये हैं और आप हर इंसान से उम्मीद करते हैं कि वह उनके अनुसार जिये। यह असंभव है। लेकिन समाज को अपना सामाजिक अहम् बनाए रखने के लिये ऐसे नियमों की जरूरत होती है। समाज का अपना अहम् होता है, है कि नहीं? हर छोटी-मोटी बात को ले कर पूरा समाज क्षुब्ध हो जाता है। यह जरूरी नहीं कि वह गलत ही हो। असल में, यह एक तरह का अहम् है। और वह दूसरी तरह का अहम् है। यही सामाजिक अहम् है जो क्षुब्ध होता है और डर पैदा करता है।अपने चारो ओर ठीक से देखिये तो आप समझ लेंगे कि यहां यह कहने का अर्थ क्या है। राजनीतिज्ञ जनता को भयभीत कर अपनी बात मनवाते हैं और चुनाव जीतते हैं। आतंक , भय और संत्रास सभी प्रकार के चालबाजों का हथियार है। यह लोगों को कुछ भी करने को तैयार करा सकता है चाहे वह कार्य कितना भी अतर्कपूर्ण है। अब जैसे एक नेता ने कहा कि वह हमारे देश के हर खास ओ आमण् के खाते में 15 लाख रुपये जमा करवा देगा यह 15 लाख विदेशों जमा काले दान से लाया जायेगा। यह जुमला अत्यंत तर्कहीन था। लेकिन लेकिन गरीबी का भय और अमीरी के लाभ ने लोगों को वोट देने पर बाध्य किया। बट्रेंड रसल का कहता था कि दुनिया का कोई आदमी भय के प्रभाव में सही नहीं सोच सकता है। ऐसा इसलिये होता है कि हम बचपन से डर की अवधारणा अपने अचेतन में बैठा रखे हैं। अम्बोर्स बियर्सीं ने अपनी विख्यात पुस्तक डेविल्स डिक्शनरी में कहा है कि ‘इंसानी सोच जोखिम की अवधारणा को जन्म देती है। डर हमारे अवचेतन में रहता है और वह हमारी सोच की प्रक्रिया को निर्देशित करता रहता है और हम उस निर्देशन को जोखिम की अवधारणा के तहत परिगणित करते हैं।’  भय कोई बुरी चीज नहीं है यह हमें जीवित रखता है और सही काम करने के लिये तैयार करता है।  पर इसका एक साइड इफेक्ट है कि यह हमें सुरक्षा के मिथ्यालोभ की ओर ज्यादा ले जाता है। नोटबंदी का मामला हो या पाकिस्तानी हमले का इसमें एक खास किस्म का भय लोगों में भरा जाता है चाहे वह काले धन से बढ़ती महंगाई का हो या आतंकवाद का हो या राष्ट्रीय अखंडता का। समस्त कपट योजनाएं इस भीति की आड़ में स्वरूप ग्रहण करतीं हैं। यह आज का नहीं है और केवल भारत का नहीं है। समस्त विश्व में शासन का हथकंडा है।

Wednesday, November 23, 2016

इंदौर एक्सप्रेस दुर्घटना : एक पुनरावलोकन 

इंदौर एक्सप्रेस दुर्घटना : एक पुनरावलोकन 
रेल सुरक्षा जैसे कुछ विषय हैं जो सियासी कालाबाज़ियों के दायरे में नहीं आती. यानी उसके सहारे नाटकीय राजनीति नहीं की जा  सकती है. रवि वार को पटना इंदौर एक्सप्रेस की दुर्घटना का मामला ही देखें. डेढ सौ से ज़्यादा लोग मारे जा  चुके है और दो सौ से ज़्यादा घायल हैं. ये सब के सब लोग देश के ग़रीब वर्ग के लोग थे. ऐसे लोग इस घटना के बाद भी अपनी यात्रा के लिए  रेलवे पर ही  निर्भर रहेंगे, क्योंकि ये रेलें उन्हे वहाँ तक पहुँचाती हैं जहाँ रोटी मिलती है और गाँव  में छूट गये परिवार को निवाले  मिलते हैं. सरकार को यह मालूम है इसके बावजूद लुभावने भाषणों की फेहरिस्त में रेल सुरक्षा कहीं नहीं दिखती है. पहले भी ऐसा ही था और ईस्व सरकार में भी वेआसा ही है. यह दुर्घटना एक ऐसे वक्त में घाटी है जब प्रधान मंत्री नरेन्द्रा मोदी ने गरीबो  के नाम पर   एक ही झटके में देश की मुद्रा व्यवस्था को बदल दिया. यहाँ सवाल है कि सरकार ने जो संकल्प तथा दृढ़ता नोट बंदी के लिए दिखाई वही लाखों रेल यात्रियो की हिफ़ाज़त के लिए क्यों नहीं दिखा रही है. खास ऐसे समय में जब लाखों साधारण यात्रियों के लिए रेल यात्रा काफ़ी जोखिम भारी हो गयी है. हवाई यात्रा को सुरक्षित और आरामदेह बनाने के लिए विमानन क्षेत्रा को विकसित किया गया, परंतु इन वंचित रेल यात्रियो के लिए कुछ नहीं सोचा गया. जबकि कुछ माह पहले कुछ ट्रेनों में  खाली सीटों की कीमतें लगातार बढ़ाने की तकनीक शुरू की गयी. 21 नवंबर को वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा था कि "भारतीय रेल दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी रेल प्रणाली है इसके बावजूद इसमे आधुनिक सिग्नलिंग और संचार प्रणाली का अभाव है. अधिकांश दुर्घटनाओं का कारण खराब रख रखाव , पुराने पद गये औजार तथा उपस्कर एवं मानवीय ग़लतिया हैं." सरकार जानती है यह बात इसके बावजूद हर साल  हज़ारों लोग मरते हैं. 2012 की सरकारी रपट के मुताबिक उस साल दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या 15000 थी . इसके बाद भी सरकार की प्राथमिकताओं में कला धन है ना कि रेल सुरक्षा. सत्ता के गलियारों में ट्रेन यात्रियों की जान की हिफ़ाज़त की चर्चा क्यों नहीं होती है. इसके लिए केवल मोदी सरकार ही दोषी नहीं है, पहले की सरकारे भी बराबर की दोषी हैं. आजक सरकार के हर कदम को नाटकीय बना कर पेश किया जाता है. यह आज भी होता है और पहले भी होता था. इसका कारण है रेल सुरक्षा में वा नाटकीयता पैदा नहीं हो सकती है जितना काला धन या समान नागरिक क़ानून को लेकर हो सकती है. इंदौर दुर्घटना के बाद मोदी जी ने ट्वीट किया की वी इतने दुखी हक़िन जिसका बयान नहीं कर सकते. उन्होने रेलवे को आधुनिक बनाने का वादा किया है. अब यहाँ मोदी जी से एक सवाल पूछा जेया सकता है कि रेलवे क्यों उनकी प्राथमिकता सूची में इतना नीचे है. लेकिन इसी के साथ यह भी संशय है कि अगर इसमें नाटकीयता नही होगी या यह फोटो खिचवाने लायक नहीं होगी तो शायद ही इसपर काम हो और सरकार अपने आश्वशन को पूरा करे.

Tuesday, November 22, 2016

गरजे मोदी लेकिन क्यों

गरजे  मोदी लेकिन क्यों ?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  आगरा में  नोटबंदी का विरोध करने वालों पर जोरदार  हमला किया. वे वहां रविवार को परिवर्तन रैली को सम्बोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि ये कदम काले धन वालों के खिलाफ उठाया गया तो "आपको " तकलीफ क्यों हो रही है. पीएम ने कहा कि उन्होंने देश को भ्रष्टाचारियों, कालाबाजारियों और कालेधन से मुक्त कराने का बीड़ा उठाया है. उन्होंने कहा कि इसमे सबसे ज्यादा आशीर्वाद गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों ने दिया है जिन्हें मैं सिर झुकाकर नमन करता हूं.प्रधानमंत्री  ने बिना नाम लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बीएसपी अध्यक्ष मायावती पर भी हमला बोला. पीएम ने कहा ,ये खेल बंद होना चाहिए देश में . प्रधानमंत्री का तेवर बहुत अाक्रामक था. उनके  रोम रोम से रोष टपक रहा था. प्रधानमंत्री  ने कहा कि सीमा पार से आतंकवाद और जाली नोट घुसेड़े जाते हैं. हर तरह की तस्करी कैश में होती है. नोटबंदी से जालीनोटों के कारोबार को झटका लगा है. उन्होंने कहा कि ये पैसे आतंकियों तक पहुंचते थे, आतंकी जवानों को निशाना बनाते थे.आखिर कब तक चुप रहते. प्रधानमंत्री ने कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि समस्या के बारे में सबको पता था, वे चुप इसलिए रहे कि देश की चिंता कम थी, उन्हें कुर्सी की चिंता  ज्यादा थी.
प्रधानमंत्री का सम्पूर्ण भाषण देशवासियों के दिलोदिमाग में एक खास प्रकार का डर पैदा कर रहा था. पूरे भाषण में काला धन, आतंकवाद, चिट फंड के जरिये गरीबों का धन हड़पने, चुनाव का टिकट बेचने इत्यादि का आतंक पैदा किया गया है. अगर मनोवैज्ञानिक नजरिये से देखें तो राजनीति में डर भी एक हथियार है. लोगों के दिलोदिमाग में डर पैदा कर किसी भी प्रकार के काम को करवाया जा सकता है. विख्यात दार्शनिक बट्रेंड रसल का कहना था कि कोई भी समाज तार्किक अौर समझदारी भरा काम नहीं कर सकता जब तक वह डर या आतंक के प्रभाव में हो. जहां तक काला धन का सवाल है,जिसका ढोल मोदी जी पीट रहे हैं वह, भारतीय सांख्यिकी संस्थान के मुताबिक  हमारी अर्थव्यवस्था में महज चार सौ करोड़ का है. इतना कालाधन बहुत ज्यादा नहीं है.  वहीं जवाहरलाल नेहरू विश्वव़िद्यालय के प्रो.अरूण कुमार का अनुमान है कि केवल तीन फीसदी कालाधन नकदी में है शेष अवैध संपत्तियों के रूप में है.भारत के पहले सांख्यिकीविद ,योजना आयोग के पूर्व सलाहकार और भारत में अन्तररार्ष्ट्रीय विकास केन्द्र के निदेशक प्रणब सेन का मानना है कि देश के किसानों और ग़रीबों के लिए नोटबंदी का यह कदम विनाशकारी साबित होगा.सेन के अनुसार विमुद्रीकरण नगदी के 86 फीसदी हिस्से को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है. मतलब कि इस अर्थव्यवस्था में सभी तरह के लेन-देन के 65 फ़ीसदी हिस्से को पंगु बना रहा है जो कि मज़ाक नहीं है.नोटबंदी से नगदी के प्रति एक खास प्रकार का भय पनप रहा है.अगर बैंक से निकाली गई रकम कोई तुरंत खर्च कर देता है तो यह अर्थव्यवस्था के लिए कम नुकसानदायक है और अगर वह इसे दबा कर बैठ जाता है तो ज्यादा नुकसान होगा. प्रणब सेन  के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में विकास दर में 0.3 से 0.4 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है. अगर यह 7.6 से 7.7 की बजाय 7.1 से 7.2 के बीच रहती है तो बड़ा नुकसान होगा. इसका खमियाजा ज्यादातर गरीबों और कृषि क्षेत्र को उठाना पड़ेगा.देश में नई नकदी की भौतिक उपलब्धता और उसे सिस्टम में डालने की प्रक्रिया धीमी है. असली चिंता कृषि पर दूरगामी असर पड़ने की है. अगर रबी की बुआई प्रभावित हुई तो इसके दूरगामी घातक परिणाम होंगे. ऐसे में जब आपूर्ति सुचारू नहीं हो तो वस्तु विनिमय प्रणाली भी नहीं चल सकती.यह मानसून फेल होने से भी बदतर है. क्योंकि मानसून के धोखा दे जाने पर गरीब अगली फसल तक अपना काम चलाने के लिए औरों से उधार ले लेंगे लेकिन आज वे ऐसा नहीं कर सकते. रबी की बुआई बर्बाद होने की कीमत इंसान को चुकानी पड़ सकती है. किसान अवसाद में आकर खुदकशी कर सकते हैं.
इसमें कोई संदेह नहीं कि भाजपा विमुद्रीकरण को व्यापक समर्थन मिलने से बहुत खुश है. अगर कल चुनाव कराए जाते हैं तो यह उसके लिए अचूक अस्त्र साबित होगा लेकिन कुछ राज्यों में चुनाव तीन माह बाद होने वाले हैं. तब तक लोगों को काफी आघात पहुंच चुका होगा. अभी मिल रहा ऐसा जन समर्थन तब कहीं घातक न बन जाए!मोदी जी इस स्थिति को जानते हैं और इसलिये लोगों के भीतर डर पैदा कर रहे हैं.

Monday, November 21, 2016

प्रभु के भरोसे पटरियों पर दौड़ती मौत

प्रभु के भरोसे पटरियों पर दौड़ती मौत 
रविवार को पटना इंदौर एक्सप्रेस कानपुर से 60 किलो मीटर पहले दुर्घटना ग्रस्त हो गयी.  100 काइलामीटर की रफ़्तार से दौड़ती ट्रेन के 14  डब्बे पटरी से उतार गये और कुच्छ दूर तक घिसटते चले गये. प्रत्यक्ष दर्शियों का कहना है की डब्बे शुरू से ही काप रहे थे. इस दुर्घटना  में 127 लोग मारे गये और सैकड़ों घायल हुए. रेल मंत्री सुरेश प्रभु दुर्घटना स्थल पर गये मगरमच्छी आँसू बहाए , रहट तथा उधहार कार्य का मुयायना किया और लौट आए. दुर्घटना के कार्नो की जाँच के आदेश दिए गये हैं. रेल मंत्री ने तोड़फोड़ की संभावना से इनकार नहीं किया है और कहा है की इस तोड़ फोड़ के काम में जो लोग शामिल पाए जाएंगे उन्हे बख्शा नहीं जाएगा. विशेषगयों  का मानना है कि पटरियों में दरार आ जाने के कारण यह दुर्घटना हुई. रेलवे में यात्री सुरक्षा के लिए गठित काकोडकर समिति ने पिछले साल ही काहा था की रेलवे सुरक्षा बेहद ख़स्ता है. पूर्व रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने तो रेलवे सुरक्षा की एक स्वतन्त्र इकाई के गठन का सुझाव दिया था पर उनका सुझाव नहीं माना गया. कुल मिलकर रेलवे सुरक्षा " इमप्लिमेंटॅशन बग " से पीड़ीत है. आज तक यही देखा गया है कि जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है इसे कोई ना कोई कारण बता कर , मुआवज़े की घोषणा कर दी जाती है, आश्वासनो के चंद मीठे बोल बोल दिए जाते हैं और फिर सब कुछ वाहू होता रहता है जो हो रहा था. रेलवे की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती. ऐसा नहीं है कि भारत जैसे विशाल रेलवे नेटवर्क में दुर्घटना नहीं होगी पर रेलवे को एक सुरक्षा संस्कृति के मेकेनिज़्म को विकसित करना चाहिए. 2012 में परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में बनी एक समिति ने कहा था की रेलवे में " रेलवे में स्वतंत्र सुरक्षा नियमन" का अभाव है. रालेआ बोर्ड खुद ही क़ानून बनाता खुद ही लागू करता है. रेलवे सुरक्षा आयुक्त को इस पर नज़र रखनी चाहिए पर आपरेशनल स्तर पर उसकी भूमिका नगण्य है. चूँकि वा रेल विभाग का कर्मचारी है इस लिए रेलवे बोर्ड उसकी सलाह नहीणं मानता और रेलवे बोर्ड जो नियम बनता है वा आपरशनल नही हो पाता. पूर्वा रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने अपने बजट भाषण में सुरक्षा पर बहुत ज़ोर दिया था. त्रिवेदी ने कहा था की दुर्घटना के प्रति सख़्त होना होगा. जैसा कि काकोदकर समिति ने सिफारिश की थी उन्होने एक स्वतंत्र रेलवे सुरक्षा समिति का प्रस्ताव किया था जो सुरक्षा पर सतत अनुसंधान करता रहेगा. पिछले साल रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने संसद में एक प्रश्न के उत्तर में कहा था की काकोदकर कमिटी की सिफारिशों पर विचार चल रहा है. रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने भी कुछ ऐसा ही जवाब दिया था. काकोडकर कमिटी ने यह देख कर चीता जाहिर की थी कि रेल कर्मियों के घायल होने की संख्या भी बहुत ज़्यादा है. अक्तूबर 2011 तक 43 माह में पाया गया कि कार्यों के दौरान दुर्घटना से 1600 रेल कर्मी मारे गये थे और 8700 घायल हो गये थे. अनिल काकोडकर ने सॉफ कहा था कि कैसी सरकार है जो यह सब सहन कर रही है. रेल पटरियों पर काम करने वालों का जीवन सबसे ज़्यादा जोखिम में है. काकोडकर समिति के आँकड़े बताते हैं कि हर्साल 15000 लोग ट्रेनों की चपेट मे आकर मारे जाते हैं जिनमे केवल मुंबई में पटरी पार करते हुए 6000 लोग मार जाते हैं. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक इस साल अक्तूबर तक रेल पटरियों पर 20456 लोग जान गवाँ चुके हैं. रेलवे इन्हे अनाधिकृत निवासी या रेल की ज़मीन का अनाधिकृत  उपयोगकर्ता मानती है. बेशक वे हैं भी और इससे रेलवे की ज़िम्मेदारी ख़त्म हो जाती है पर क्या इन मौतों की जवाबदेही भी ख़त्म हो जाती है. खास कर वा सरकार जो ग़रीबों के लिए सोचने का दम भारती वह भी इन ग़रीबों के मामले में किनारा कर ले रही है. हमारी सरकार बुलेट ट्रेन चलाने का सपना बाँट रही है और काकोदकर कमिटी की रपट के मुताबिक जो डब्बे हैं उनकी डिजाइन  80 से 100 किलोमीटर की रफ़्तार से चलने की भी नहीं है. अब ऐसे में या तो वा परमाणु वैज्ञानिक अनाड़ी होगा या सरकार मदारी होगी. राजधानी के डब्बों में तेज रफ़्तार में गर्म होकर रोलर बियारिंग नाकाम हो जा रहे हैं तो दूसरों की बात क्या करते है. समिति ने कई सुरक्षा सुझाव दिए थे जैसे डब्बों में धूम्र संवेदी यंत्र लगाने के लिए. लेकिन वा भी हहीं लगा. आग बुझाने का जो यंत्र लगा है वह भी काम नहीं करता. हवाई जहाज़ में ऐसी व्यवस्था है की वक्त पड़ने पर 90 सेकेंड में यात्रियों को निकाला जा सकता है पर हमारी ट्रेनों में ऐसा कुच्छ नहीं है. सुरक्षा अवयवों की कोई मानक सूची नहीं है. पश्चिमी  रेलवे में यह 6 है और मध्य क्षेत्र में इसकी संख्या 993 है और पूर्व तथा उत्तर पश्चिम  में एक भी नहीं. बुलेट ट्रेन चलाने का सपना दिखाने वाली सरकार कहती है कि काकोदकर की सिफारिशें लागू करने के लिए पर्याप्त धन का अभाव है. बेशक ऐसा होगा पर सुरक्षा संस्कृति को विकसित करने में क्या कठिनाई है.

भई भक्तन की भीड़

भई भक्तन की भीड़
क्या आप नहीं महसूस कर रहे हैं कि इधर कुछ सालों से हमारे समाज में कुछ खास देवताओं के भक्तों की भीड़ लग गयी है। वे अपने देव के खिलाफ मामूली परोक्ष व्यंग्य भी नहीं सुनना चाहते। अगर बहुत सभ्य हैं तो आप कुछ भी कहें तो वे ‘यूं होता तो क्या होता ’ कह कर अपना विरोध तो जाहिर कर ही देते हैं। जबसे हजार - पांच सौ के नोट बाजार से हटे हैं तबसे उसे लेकर सोशल मीडिया में हाथापायी हो रही है। शनिवर की सुबह मेरे एक आदरणीय मित्र ए. शर्मा जी ने वाट्सएप पर एक पैरोडी भेजी, 

रहते थे कभी जिनके दिलों में हम जान से भी प्यारों की तरह

बैठे हैं उन्हीं की जेबों में हम आज गुनहगारों की तरह

रीयली इंटरेस्टिंग। यकीनन ये हजार -पांच सौ के नोटों का दर्द था। अब हमने  यह पैरोडी भा गयी और उसने सोशल मीडिया में उसे ठोक दिया। ठोकना क्या था जैसे बर्रे के  छत्ते को छेड़ दिया। भनभनाते हुये भक्तों ने मुझे लहूलुहान कर दिया। हमलावरों में देसी तो देसी , विदेशों में पढ़ाने वाले प्रोफेसर अौर विशेषज्ञ डाक्टर  भी शामिल थे। सबकी बातों का लब्बोलुवाब था ‘ उनके  देव पर व्यंग्य और ईशनिंदा समान है।’ सचमुच भक्तों की बढ़ती संख्या ​चिंता का विषय बन गयी है। ये भक्त कोई भी हो सकता या सकती है। मेरे आपके जैसे काॅमन मैन या सोशल मीडिया पर अनदेखे लोग या समूह। कोई भी। किसी भी पार्टी का समर्थक या विरोधी होना  कोई बड़ी बात नहीं है पर यह कैसे सही हो सकता है कि जिनके विचार आपसे ना मिलें वे गाली के पात्र हैं। अब उपरोक्त पैरोडी को ही लें, यह किसी पर व्यंग्य नहीं है शुद्ध हास्य है और इस पर अगर लोग आपकी थुक्का फजीहत इस लिये करें कि उनके देवाधिदेव को इस माध्यम से व्यंग्य का निशाना बनाया जा रहा है। हम तो भाई साहब यही मानते हैं कि हास्य तो हास्य है अगर उनके मायने निकाले जाएं और उसे फब्ती समझ लिया जाय तो फिर जै श्रीराम।  ऐसे लोग अहमक हैं और हमारे यहां सोशल मीडिया पर ऐसे अहमकों की हाट लगी हुई है। और वे सब मिल कर हमारे जैसे आदमी की वाट लगा रहे हैं। लोग ऊब रहे हैं पर यह नहीं समझ रहे हैं कि कैसे कुछ लोगों का एक समूह उनके विचारों को दबा रहा है और जबरन अपने पीछे आने को बाध्य कर रहा है। वे चीख कर कहते हैं कि देश प्रगति कर रहा है। जो जहां भी है जिस हाल में है वहां से प्रगति कर रहा है। भ्रष्टाचार , पाखंड, अभाव , जीवन जीने की स्थितियों के बगैर प्रगति कर रहा है। प्रगति इन भक्तों का चस्का है। अपना पेट भरते ही देश के सबी भूखों का पेट भर जाता है। अपना फ्लैट बनते ही देश में आवास की समस्या खत्म। सब कहते हैं, प्रगति करो। बिना प्रगति किये समस्याएं नहीं खत्म होंगी। नौकरी नहीं है तो नौकरी खोजो। रिश्वत दो। बिना रिश्वत दिये प्रगति नहीं हो सकती। भक्त चीख रहे हैं भ्रष्टाचार नहीं होने देंगे। बेशक जिस दिन वे रेल की यात्रा करें दलाल  कम पैसे लेकर या फोकट में उनका टिकट कन्फर्म करवा दे। बाकी नाम राम का। भ्रष्टाचार कहां है देश में। ये बातें सारे भक्त अकेले अकेले चीखते हैं और वह आपके पास कोरस बन कर पहुंचता है। हर आदमी जहां फंसा है वहां वह भ्रष्टाचारहीनता चाहता है। भक्त चाहते हैं कि वे जहां काम करते हैं वहां छोड़ कर सकल देश में भ्रष्टाचार खत्म हो जाय। अब अहमदाबाद से उठा नारा देश पर छा गया और नारे के बल पर सत्ता मिल गयी। अब नारों को कायम नहीं रखेंगे तो कैसे चलेगा। धन्य है संसार सागर। धन्य हैं प्रभु।