CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Friday, August 25, 2017

ट्रंप ने पाकिस्तान को चेतया

ट्रंप ने पाकिस्तान को चेतया

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण एशियाई देशों के लिए अमरीकी रणनीति के तहत पकिस्तान को कठोर कार्रवाई की  चेतावनी दी है. ट्रंप ने अपने भाषण के दौरान कहा कि पकिस्तान में आतंकी संगठनों, तालिबान और अन्य संगठनो की  पनाहगाह के मसले पर चुप नहीं रह सकते क्योंकि इससे उस क्षेत्र और उसके आगे के भूभाग पर ख़तरा बढ़ता जा रहा है. उन्होंने कहा कि हम उसे  करोडो डॉलर दे रहे हैं  और वह उन आतंकियों को पनाह दे रहा है जिनसे हम लड़ रहे हैं. 9/11 की  घटना के बाद अमरीका ने अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया और पकिस्तान ने आतंकियों को जड़ से उखाड़ फेकने के लिए आगे बढ़ कर अमरीका की  मदद की. लेकिन साथ ही दुनिया जानती है कि अल कायदा और आई एस आई एस (खोरासन गुट) सहित  दुनिया के सबसे खतरनाक इस्लामी आतंकी गिरोहों को पकिस्तान ने पनाह दे रखी है. अमरीका ने बार बार कहा कि इन आतंकी गिरोहों को उखाड़ फेंको पर पकिस्तान सुनता ही नहीं. उसकी इस आदत से अमरीका बात उठ रही है कि पकिस्तान को दोस्त माना जाय या दुश्मन. अमरीका और पकिस्तान ऐतिहासिक तौर पर दोस्त रहे हैं पर पकिस्तान उन आतंकियों को पनाह देने से बाज़ नहीं आ रहा है जो लोग अमरीकी फौज पर हमले कि योजना बनाते हैं. ट्रंप पकिस्तान कि इसी आदत से चिढ़े हुए हैं. ट्रंप के मूड का सूत्र पकड़ते हुए अमरीकी विदेश सचिव रेक्स टिलरसन ने मंगलवार को पकिस्तान को  चेतावनी दी कि “ यदि उसने अपना रवैय्या बदला तो हम उसके साथ काम करने को तैयार हैं और आतंकी संगठनों के हमलों से उसकी हिफाज़त भी करेंगे. इसके पहले ज़रूरी है कि वह शान्ति के हमारे प्रयासों को असफल करने में लगे संगठनों को ख़त्म करना शुरू करे.” आतंकियों को पनाह देने वाले अन्य राष्ट्रों को भी टिलरसन ने चेतवानी दी कि “ वे भी इससे बाज आ जाएँ, पकिस्तान तो हमारे निशाने पर है ही.” लेकिन अमरीका में पकिस्तान राजदूत एजाज अहमद चौधरी ने बुधवार को मीडिया से कहा कि राष्ट्रपति का यह कहना सही नहीं है. उन्होंने कहा कि “दरअसल पकिस्तान ने तालिबान और हक्कानी गुट के खिलाफ जम कर कार्रवाई की है और उनके पैर उखड चुके हैं. पाकिस्तान ने उन आतंकियों के पनाहगाहों को भी नेस्तनाबूद किया है.” लेकिन जो ज़मीनी हकीक़त जानते हैं उन्हें मालोपोम है कि जो एजाज अहमद कह रहे हैं वह फ़क़त उत्तरपश्चिम पकिस्तान के पर्वतीय क्षेत्र   फाटा ( फेडरली  ऐडमिनीस्टरड ट्राइबल एरिया) में हो रहा है. यहाँ तालिबान के कुछ महफूज़ पनाहगाह हैं. ट्रंप कि बात से ज़ाहिर था कि अमरीका पकिस्तान कि खुफिया एजेंसी आई एस आई से भी नाराज़ है. उसने वर्षों से अपने क्षेत्रीय अजेंडा  को जारी रखा हुआ है. वह इस बात को स्थापित करना चाहता है कि काबुल में जो कुछ भी होता है वह भारत के इशारे पर होता है. यहाँ तक कि , आई एस आई का कहना है कि , अफगानिस्तान कि सरकार भी भारत के इशारे पर चलती है. अब विशेषज्ञों का मानना है कि आई एस आई दर असल उन सभी आतंकी गिरोहों, मसलन तालिबान , हक्कानी गुट , लश्करे तैयबा इत्यादि,  की  मदद करता है जिन्हें  अमरीका ने घोषित कर रखा है ताकि अफगानिस्तान और कश्मीर में उपद्रव कायम रहे. फिर भी अफगानिस्तान - पाकिस्तानी क्षेत्र तालिबान पर कार्रवाई के लिए इंटेलिजेंस हासिल करने के लिए अमरीका आई एस आई पर ही निर्भर है. वार्ता के लिए तालिबान को टेबल तक लेन के लिए भी अमरीका को आयो एस आई कि ही मदद लेनी होती है. यही नहीं आई एस आई की मदद अमरीका के लिए अपरिहार्य है. इसके माध्यम से वह पकिस्तान के परमाणु कार्यक्रमों पर नज़र रखता है. इसके अलावा रेडिओ सक्रीय वस्तुओं को आतंकियों के हाथों पड़ने से रोकने के लिए भी वाशिंगटन को आई एस आई की मदद चाहिए. ट्रंप के भाषण में एक और महत्वपूर्ण बात थी कि “ अब अफगानिस्तान में भारत की भूमिका बढ़ेगी खास कर आर्थिक क्षेत्र में.” पकिस्तान भारत को अपना नैतिक दुश्मन मानता है अतएव अफ्गानिस्तान  में भारत की  किसी  भी भूमिका  को पाकिस्तान अपने लिए ख़तरा मानेगा और बड़ी से बड़ी   आतंकवादी करवाई  कर सकता है. अफगानिस्तान में भारत कि भूमिका बढाने कि बात का पकिस्तान ने जम कर विरोध किया. अमरीका ने पाकिस्तान के खिलाफ बहुत बड़ी - बड़ी बात कही पर यह नहीं  बताया कि वह कारवाई क्या होगी , कैसे होगी या अमरीका किस तरह उसके आचरण को बदलेगा.

Thursday, August 24, 2017

भारत की ट्रेन दुर्घटनाएं

भारत की ट्रेन दुर्घटनाएं

शनिवार को मुज़फ्फर नगर के खतौली में कलिंग एक्सप्रेस की दुर्घटना के बाद रेलवे मंत्रालय पर प्रश्नों कि बौछार आरम्भ हो गयी. ऐसा होना उचित भी है. इस घटना में 23 लोग मारे गए और 153 आहत हो गए. विगत तीन वर्षों में हुईं लगभग 350 रेल दुर्घटनाओं यह भयानकतम है. वर्तमान रेल मंत्री सुरेश प्रभु के मंत्रित्व काल की  इसे सर्वाधिक बड़ी घटना कही जा सकती है.  घटना के दो दिनों के बाद कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि सरकार में नाम मात्र को भी नैतिकता नहीं है. उन्होंने कहा कि सरकार “ इवेंट मनेजमेंट और मीडिया मनेजमेंट का मिला जुला संगठन है .” जब प्रभु ने मंत्री पद सम्भाला तो आई आर सी टी सी के तहत खान पान व्यवस्थाओइन में कई सुधार किये जिसकी तारीफ होने लगी. बाद में खाने कि क्वालिटी को लेकर लोग इसकी आलोचना करने लगे. हालाँकि इसकी अर्थ व्यवस्था को बहुत कम लोग जानते हैं. पहली बात कि यह रेलवे कि संस्था नहीं है बल्कि यह रेलवे मंत्रालय और निजी भागीदारी के आधार पर चलता है. यह ना पूरी तरह रेलवे की है और ना निजी है यह एक मिली जुली व्यवस्था है, यह किसी को जवाबदेह नहीं हैं. लेकिन इसी के जरिये खान पान में सुधार कर सरकार ने वाहवाही तो लूट ली पर यात्रियों की सुरक्षा को नज़रंदाज़ कर दिया. 2012 मेविन गठित काकोडकर कमिटी ने पटरियों के सुधार और वैकेंसीज भरने की आवश्यकता पर बल दिया था. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. 2015 में भी विवेक देबराय कमिटी ने कुछ ऐसा ही सुझाव दिया था पर कुछ नहीं हो सका. रेलवे के पास धन का आभाव है. धन के लिए सरकार ने राज्यों से अनुरोध किया कि वे सब्सीडी में हिस्सा दें पर ऐसा कुछ नहीं हो सका. 29 राज्यों में से केवल 9 राज्यों ने ही इस पर हस्ताक्षर किये. अंततोगत्वा कमिटी ने निजी क्षेत्र के प्रवेश कि अनुशंसा की. इसका जमकर विरोध हुआ. राजनितिक दबाव के कारन ऐसा नहीं हो सका जबकि सच यह है कि र्तेल्वेय को हर साल लगभग 6 अरब डॉलर का घाटा होता है. इस वर्ष अप्रैल के आखिरी दिनों में रेल मंत्री ने घोषणा की कि 23 स्टेशनों को छोड़ कर अब इसका निजीकरण नहीं किया जाएगा.  देब्राय कमिटी की तीन अनुशंसाओं में से डो को तो निरस्त कर दिया गया, जबकि ये सब रेल के सुरक्षित परिचालन में कारगर थीं. अब रेलवे ने सुरक्षा से ध्यान हटा कर लग्ज़री पर लगाना शुरू कर दिया. या यों कहें कि जो भारतीय अभिजात्य वर्ग को अच्छा लगता है उसने वही करना शुरू किया. अब ऐसे हालात में रेलवे की नाकामयाबी के लिए सरकार कि आलोचना गलत कही जायेगी. ऐसी आलोचनाएं अक्सर जनता को अर्थव्यवस्था से अनजान रखने के लिए की जातीं हैं. अब रेलवे पर आपराधिक लापरवाही का आरोप एक देश कि सामूहिक चेतना को नज़रंदाज़ करना कहा जाएगा. दरअसल इस देश में ऐसे मामलों में राजनीति ही सचमुच हत्यारिन है. प्रशसनिक और निगरानी के अभाव के आरोप एक तरह से आर्थिक  और  राजनितिक भावशून्यता को छिपाना है. कांग्रेस और मनीष तिवारी ने एक बहस छेड़ दी है कि कैसे एक दुर्घटना के मामले में 1956 में लाल बहादुर शास्त्री  और  एक विमान दुर्घटना को लेकर माधव राव सिंधिया ने 1993 में अप्नेव अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था. जिन्होंने उस वक्त का इतिहास पढ़ा होगा उन्ह्गे मालूम होगा कि  शास्त्री जी का इस्तीफा प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु ने स्वीकार किया था और दोनों कि सहमति से इसे दबा कर रखा गया था. 1988 में एक ट्रेन के नदी में गिर जाने के कारण 100 यात्री मरे थे. उस समय माधव राव सिंधिया रेल मंत्री थे , उन्होंने इस्तीफा भी दिया था पर तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने उसे  मंजूर नहीं किया था. बाद में जब वे उड्डयन मंत्री थे तब इम्फाल में भारतीय वायु सेना का विमान दुर्घटना ग्रस्त हुआ था. जिसमें 100 से ज्यादा लोग मरे थे. इस मामले में उन्होंने इस्तीफा दिया था . अब तिवारी इन मामलों कि मिसाल पेश कर रहे हैं. अब इस समय उन मामलों कि मिसाल देना गैर जिम्मेदारी है. रेलवे कि क्षति और जान माल कि हानि को रोकने के लिए रेलवे को सरकार और सियासत से मुक्त रखा जय. उसे स्वायतता प्रदान की जाय. ये ना हो सके तो कम से कम पूंजीवादी बुद्धिहीन आलोचनाएँ ना की जाएँ. पहले सुधार हो तब बात हो वरना लाशों पर सियासत ना की जाय.

 

Wednesday, August 23, 2017

बैंकों की  हड़ताल क्यों

बैंकों की  हड़ताल क्यों

देश के बैंकों कि लगभग 10,300 शाखाओं के 12 लाख से कर्मचारी मंगलवार को हड़ताल पर रहे. यह हड़ताल बैंकों के प्रति सरकार की नीतियों के विरोध में थी .इस हड़ताल से अनुमानतः 7300 करोड़ रूपए के वित्तीय साधन संपादित नहीं किये जा सके. इस हड़ताल का आह्वान यूनाइटेड फोरम ऑफ़ बैंक यूनियन ने किया था. इनकी 17 सूत्री मांगों में प्रमुख थी सार्वजानिक क्षेत्र के बैंकों पर्याप्त पूँजी नहीं दिया जाना जिससे बैंको के  निजीकरण के हालात पैदा हो जाएँ . ऑल इंडिया बैंक एम्प्लाइज असोसियेशन ने अपने एक बयान में कहा है कि “ बैंकों के निजीकरण का मतलब है बैंकों में जक्मा आम आदमी के 80 लाख करोड़ रुपयों का निजीकरण.यह देश और आम जनता के लिए खतरनाक है. निजीकरण का अर्थ  है कृषि, ग्रामीण विकास और शिक्षा जैसे प्राथमिक क्षेत्र  के लिए ऋण से इनकार . ”  इनकी अन्य  मांगों में शामिल थी कार्पोरेट ऋण के एन पी ए के मामले में उसे बट्टे खाते में डाले जाने कि नीति को ख़त्म करने, ऋण लेकर जान बूझ कर नहीं लौटाने को फौजदारी अपराध घोषित किया जाय और एन पी ए की  वसूली के लिए  संसदीय समिति कि अनुशंषाओं को लागू किये जाने की  मांग शामिल थी. यह पहला मौक़ा नहीं था जब बैंक के कर्मचारी हड़ताल पर गए थे. पिछले साल भी जब पूरा देश जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय  में सहिष्णुता पर बहस  में उलझा था उसी समय महत्वपूर्ण बदलाव आया जिसके दूरगामी परिणाम होंगे और यह बदलाव उस वक़्त अनदेखा रह गया. इस दौरान सरकार ने सार्वजानिक क्षेत्र के  बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बहुत कम कर दी. हिस्सेदारी घटा  कर 51 प्रतिशत कर दी गयी. सरकार की इस घोषणा का देश भर के बैंक कर्मचारियों ने विरोध किया. इस हिस्सेदारी के मामले को बारीकी से समझना होगा यह केवल बैंकों का मामला नहीं है . विमुद्रीकरण की घोषणा के ऐन पहले भारत संचार निगम लिमिटेड के निजीकरण को लेकर बात उठी थी और उस निगम के कर्मचारियों ने इसका प्रचंड विरोध किया था. जब वे हड़ताल पर  थे उसी समय सरकार ने घाटा उठा रही सरकारी कंपनियों , सहयोगी कंपनियों और चुनिन्दा उत्पादन संयंत्रों को बेचने की महत्वाकांक्षी योजना को मंजूरी दी.  यह लगभग एक दशक के बाद निजीकरण के दौर में लौटने की तैयारी थी.

   जहाँ  तक बैंकों के ऋण का सवाल है तो क्रेडिट सुईस की अक्तूबर 2015 में प्रकाशित एक रपट के मुताबिक़ उनका 3.04 लाख रुपया ऐसे कर्जों में फंसा  है  जिन्हें एन पी ए घोषित किया जा चुका है. यानी जिन कंपनियों ने यह कर्ज लिया है वे इसे लौटा नहीं पाएंगीं. अब इन्हें वसूला नहीं जा सकता है. यह कर्ज अब बट्टे खाते चला गया. लेकिन कितनी हैरत कि बात है कि कर्ज़दार कम्पनियां जमकर मुनाफ़ा कमा रहीं हैं लेकिन क़र्ज़ लौटाने कि हैसियत नहीं है उनकी. भारत के सी  ए जी  शशि कान्त शर्मा के अनुसार इस तरह के कर्जे ना केवल बैंकों के खातों में ही अशुभ  दीखते हैं बल्कि देश कि अर्थ व्यवस्था के लिए भी अशुभ हैं. अब इसके लिए सरकार क्या कर रही है? वह फकत राजस्व परित्याग (रेवेन्यु फोरगोन)  शीर्ष के तहत बट्टे खाते में दाल देती है. इन दिनों इसके लिए नया फैशनबल शब्द खोजा गया है “ टैक्स इन्सेंटिव  राजस्व प्रभाव .” 2 अगस्त 2016 को राज्य सभा में प्रश्न काल में संतोष कुमार गंगवार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों में बताया गया था कि इस तरह राजस्व परित्याग में 2015 – 16 में 6.11 ख़राब रूपए डूब गए. राजस्व परित्याग विवरण के अनुसार कार्पोरेट कंपनियों को औसतन 7 करोड़ रूपए प्रति घंटे कि टैक्स छूट मिलती है. यानी हरसाल 5.32 लाख करोड़ रुपयों की टैक्स छूट. यह रकम 2 जी घोटाले में डूबी रकम से कहीं ज्यादा है. इसके अलावा 2005 -06 से 2013- 14 के बीच केवल कारपोरेट कर्जा माफ़ी कि रकम 36.5 लाख करोड़ थी यानी 36. 5 ख़रब रूपए. यही कारन है कि देश के 1 प्रतिशत सबसे अमीर लोगों के पास देश कि 58.4 % दौलत है. और अब कर्जों को बट्टे खाते डालने का नियम बहुत बड़ी धोखाधडी में बदल चुका है. यह लगातार चल रहा है और मजे की बात है कि रिजर्व बैंक को मालूम नहीं कि ये कर्ज़दार कहाँ गए. इसके लिए एकबार सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्व बैंक को डांट  भी लगाई थी.  अमरीकी वाणिज्य विभाग के मुताबिक़ एक अरब डॉलर के व्यापारिक घटे से अमरीका में 13 हज़ार से 19 हज़ार लोगों के रोज़गार खतरे में पड़ जाते हैं. अब सोचें कि भारत से 1 अरब निकला तो अमरीका में कम से कम 13 हज़ार लोगों के रोज़गार सुनिश्चित हो जातें हैं तो 36.5 ख़रब से क्या होगा? यानी सरकार जो यह रकम बट्टे खाते में डालती है उससे लगभग 80 लाख लोगों को रोजगार मिलता है अर्थात उससे  अमरीकी अर्थ व्यवस्था कायम है. यानी इन दिनों जनता की दौलत  निजी हाथों में सौंपने कि चाल चली जा रही है और यह अपने तरह कि विश्व इतिहास की  पहली घटना है. 

राजनाथ की  टिपण्णी से बौखलाया चीन

राजनाथ की  टिपण्णी से बौखलाया चीन

अभी पिछले हफ्ते कि भारत कि टिपण्णी से चीन कि बौखलाहट कायम ही थी कि गृह मंत्री राजनाथ सिंग कि टिपण्णी ने उसे और भड़का दिया. राजनाथ सिंह ने सोमवार को कहा कि चीन से जो डोकलम में त्यानातानी चल रही है वह जल्द ही ख़त्म हो जायेगी. इसके पहले रविवार को नयी दिल्ली में सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया था कि 15 अगस्त को  चीनी सेना कि एक टुकड़ी अनाधिकृत  तौर पर लद्दाख क्षेत्र में  पैन्गोंग झील के समीप भारतीय सीमा में प्रवेश कर गयी थी और भारत कि ओर से इसका जम कर मुकाबला हुआ. कई स्थानों पर तो दोनों पक्षों में हाथापाई  तक हो गयी. इससे दोनों पक्षों के सैनिकों को मामूली चोटें भी आयीं. इस घटना पर चीनी विदेश विभाग कि प्रवक्ता हुआ चुन्यिंग ने कहा कि पैन्गोंग झील के समीप वास्तविक नियंत्रण रेखा के चीनी क्षेत्र में चीनी सेना अपनी सामान्य गश्त पर थी कि भारत की  फ़ौज ने उसे  रोका और इस क्रम में मारपीट भी हुई. इससे चीनी सेना के कुछ जवान भी घायल हो गए. प्रवक्ता ने कहा कि जो भारत ने किया उससे दोनों पक्षों में शांति के लिए हुई सहमति पर आघात लगेगा. भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस बात कि पुष्टि की है कि झगडा हुआ था पर कोई व्योरा नहीं दिया. इस मार पीट का विडियो भी जारी किया गया है जिसमें चीनी सैनिकों को मार खाते दिखाया गया है.

उधर सोमवार को भारत तिब्बत सीमा बल के एक जलसे में गृह मंत्री ने कहा कि अब भारत चीन समस्या जल्दी ही सुलझा ली जायेगी. जबकि यह दूर दूर तक नहीं दिख रहा है कि दोनों देश किसी गंभीर वार्ता में लगे हैं. उलटे दोनों में तनाव बढ़ रहा है.अभी मारपीट वाली बात दबी भी नहीं थी कि भारतात के वरिस्थ मंत्री के इस कथन से चीन बुरी तरह बौखला गया है. जबसे डोकलाम में हालात बिगड़े थे तबसे मोदी सरकार के किसी मंत्री या अफसर ने ऐसी बात नहीं कही थी. चीन कि बौखलाहट इस बात को लेकर और है कि पिछले दो  हफ़्तों से तनाव और कटुता बढ़ रही है और भारत का एक मंत्री ऐसा आखिर किस बिना पर कह रहा है? पैन्गोंग कि घटना बिलकुल विचित्र थी और इससे निष्कर्ष निकलता है कि दोनों तरफ शांति नहीं है और इस बारे में जो दावे किये जा रहे हैं वह बिलकुल सच नहीं है. इसके अलावा यह जो कहा जाता है कि परमाणु युग के बाद पत्ता युग आएगा. अगर पैन्गोंग कि घटना का विडियो देखें तो दोनों परमाणु शस्त्र संपन्न राष्ट्र  फौजें लाद्दख की  बर्फ ढंकी चोटियों  पर एक दूसरे पर पथराव करतीं दिख रहीं  हैं. ऐसे मौके पर जब डोकलाम मे तनाव  बना हुआ है , लद्दाख में दोनों तरफ कि फौजें हाथापाई कर रहीं हैं और तब एक कैबिनेट मंत्री का यह कि मामला ज़ल्द सुलझ जाएगा, काफी महत्वपूर्ण है और इसी से चीन कि बौखलाहट बढ़ गयी है. दोनों तरफ की फौजें तानी हुई हैं कोई भी अपनी तरफ से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. दोनों तरफ से प्रतिष्ठा का प्रश्न है. खास कर चीन कि तो नाक ही फँसी हुई है. किसी भी देश ने चीन के सामने ऐसा करने कजी हिम्मत नहीं दिखाई जैसा कि भारत फिलहाल कर रहा है. वियतनाम , जापान, अमरीका सबने चीन के भुजाएं फड़काने का विरोध किया था पर किसी ने आँख में आँख डालकर बातें नकारने का दम ख़म नहीं दिखाया था पर विगत  16 जून से भारत न केवल उसकी आँखों में आँखें डाल  कर बात कर रहा है बल्कि खुल्लम खुला ताल ठोंक रहा है . जबकि डोकलाम का भारत चीन सीमा से कुछ लेना देना नहीं है यह एकदम चीन भूटान सीमा का मामला है. चीन ने कई चेतावनियाँ  दीं , धमकियां दीं पर भारत पर कोई असर नहीं हुआ इससे दुनिया में उसकी जमकर आलोचना हुई. साथ ही दुनिया देख रही है कि भारत अपने लिए नहीं एक छोटे से अन्य देश कि तरफदारी में खडा है. ऐसे  में आखिर वह कौन  सा संकल्प है जिसके बारे में राजनाथ सिंह कह रहे हैं. चीन कि बौखलाहट का यही कारण है. हालांकि कूटनीतिक तौर पर उनकी इस सकारात्मक बात का स्वागत किया जाना चाहिए. 

Monday, August 21, 2017

आतंक बनते ऑन लाइन गेम्स

आतंक बनते ऑन लाइन गेम्स

इन दिनों समाज में एक नए किस्म के ऑन लाइन गेम की चर्चा है , वह है ब्लू व्हेल. सुना जा रहा है कि इस गेम कि अंतिम परिणति आत्म ह्त्या तक है या खेलने वाले बच्चों कि मौत तक है. अगर कहा जाय कि यह भी एक ड्रग कि श्रेणी में है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. इसका नशा और इसकी लत ठीक वैसी ही है जैसी किसी ड्रग  का होता है. मनोशास्त्रियों के अनुसार इसका असर मानसिक कोशिकाओं पर ठीक वैसा ही हो रहा है जैसा किसी ड्रग का होता है. भारत में इसे खेलने वाले तीन बच्चों के आत्म ह्त्या और डो को ऐन मौके पर बचा लिए जाने कि सूचना है , हो सकता अनधिकृत आंकड़े इससे ज्यादा  हों. कुछ लोग अभी भी मान रहे हैं कि यह एक साहसी खेल है. इसकी इजाद रशिया में कुछ साल पहले हुई थी और वहाँ अबतक सौ से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं उनमें अधिकाँश बच्चे हैं. लेकिन अब यह खेल खतरनाक आकार ले चुका है क्योकि अब ना केवल इसमें भाग लेने वाले यानी इसे खेलने वालों कि संख्या बढती जा रही है साथ ही इसका क्षेत्र भी विस्तृत होता जा रहा है. इसे खेलने वाले ना केवल अपने बर्बाद करने पर आमादा हैं बल्कि खुद को मिटा देने के लिए भी तैयार हैं. सवाल उठता है कि एक पीढ़ी क्यों इस तरह के ऑनलाइन गेम कि व्यसनी हो रही है और एक मैसी आभासी दुनिया में प्रवेश कर रही है जहां से निकलना मुमकिन नहीं है. ऐसी स्थिति में अगर हम केवल तमाशबीन बने रहे तो अच्छा नहीं कहा जाएगा. कई खेल  सैडिस्ट होते हैं जिसमें शारीरिक यातना से आनंद आता है.ब्लू व्हेल नाम के इस खेल में भी कुछ ऐसा ही है. इसमें शरीक होने वाला एक अज्ञात खतरे के साथ आनद अनुभव करता है और जैसे जैसे ख़तरा बढ़ता जाता है आनंद कि अनुभूति और बढती जाती है. इसमी शरीक होने वाले  लोग पहले घर के सामान तोड़ते हैं फिर अपने शारीर को काटते हैं, गर्म सलाखों से दागते हैं , इस तरह से बर्बादी कि शुरुआत होती है जो अंत में आत्म हत्या और वह भी जैसे किसी  बहुमंजिली इमारत की सबसे ऊंची मंजिल से छलांग लगालेना इत्यादि होती है. हमारे भारतीय समाज में जहां रोजगार का भरी अभाव है, शिक्षा प्रणाली कुछ ऐसी है कि बच्चों के मन पर भरी बोझ सा पैदा कर रही है. इसके अलावा छात्र जीवन में भरी प्रतियोगिता और यह भाव कि समाज में सामान्यता के लिए कोई जगह नहीं है , बच्चों – किशोरों और नौजवानों के मन में भारी हीन भाव पैदा कर रहा है. जिससे उनमें भारी कुंठा बढती जा रही है.  इस लिए वे  कोई ऐसा शगल चाहते हैं जिससे वे समाज से बदला ले सकें. और वैसा नहीं कर पाने के कारन वे खुद को दण्डित कर आनद महसूस करते हैं. अब ज़रा सोचें कि एक असुरक्षित किशोर या कुंठित किशोर जो समाज में हर जगह पराजित और अपमानित हो रहा है उस वक्त कितनी ख़ुशी महसूस करता होगा जब वह इस गेम के डो तीन राउंड जीत जाता होगा. यह गेम कुछ इसी तरह का है ही कई आरंभिक राउंड आसानी सर जीता जा सकता है. अब यहीं से नशा चढना शुरू होता है. अभी यह अपने देश में महानगरों के बेकार किशोरों में या ऐसे किशोरों में जो परिवार में रह कर भी अकेले रहते हैं और वंचना का जीवन जीते हैं उन्हीं के बीच फ़ैल रहा है और धीरे जब यह छोटे शहरों तथा कस्बों में प्रवेश  करेगा तो एक भरी समस्या का रूप ले लेगा. मध्य पूर्व एशिया के कई देशों में यह फ़ैल चुका है और वहाँ की पुलिस ने अभिभावकों को सचेत करना शुरू कर दिया है. भारत में यह अभी शुरू ही हुआ है.

   इसी तरह पिछले महीने एक गेम आया था “ मरियम” , जिसमें एक खोई लड़की को जंगल में रास्ता बताना था. देखने में यह सादा  से इस खेल से  दरअसल कई ऐसे एप्स जुड़े थे जो इसे खेलने वालों की तसवीरें , उसके आसपास के हालत और अन्य  विवरण देते थे और उन विवरणों  का दुरूपयोग होना शुरू हो गया था. बाद में पता चला कि यह किसी आतंकी संगठन ने शुरू किया है.  पुलिस ने तत्काल इसके बारे में लोगों को सचेत करना शुरू कर दिया कि नौ जवानों को लुभाने के लिए आतंकी संगठन ऑन लाइन गेम्स का उपयोग कर रहे हैं.

आज बड़े स्कूलों में जहां बच्चों को टेबलेट्स और लैप टॉप्स पर पढ़ाना और होमवर्क  ई-मेल करने के लिए कहा जाना शुरू हुआ तबसे इस तरह के खतरे और बढ़ गए हैं. एक भोले भाले बच्चे या एक कुंठित किशोर का ब्रेनवाश करने में बहुत मामूली समय लगता है. अगर एक अभिभावक के तौर पर हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे तो अपने बच्चों को खो देने का भारी न्कह्त्रा है. अब वह समय नहीं है कि माँ बाप दोनों काम करें और बच्चे दाईओं के भरोसे पल जाएँ और होस्टल में रह कर पढ़ लिख लें. बच्चों में हीनभाव पैदा हो रहा है तो यह अभिभावकों के लिए चेतावनी है. अवसाद , चिडचिडापन और हारमोंस मुख्य मनोवैज्ञानिक मसले हैं. जब कॉलेज में एडमिशन के लिए 99 प्रतिशत कट मार्क हो जाएगा तो हमें एक बार फिर अपनी प्राथमिकताओं के बारे में सोचना होगा. यहाँ परिवार को खडा होना पडेगा अपने बच्चों का सर्थन करना होगा. लेकिन क्या हम तैयार हैं. आभासी सोशल प्लेटफार्म के माध्यम से बच्चों के दुरूपयोग कि खबरों और लगातार चेतावनियों के बाद भी फेसबुक कि टाइम लाइन बच्चों और किशोरों से भरी पाई जाती है.     इसका पहला इलाज है कि हम खुद को सुधारें , खुद सचेत रहे तब ही बच्चों को सुधार सकेंगे.