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Thursday, February 22, 2018

व्यापक बदलाव की ओर बढ़ता समाज

व्यापक बदलाव की ओर बढ़ता समाज

इन दिनों हमारे देश में खासकर  मध्यवर्गीय समाज में राजनीति की सरगर्मियां बहुत तेज हैं। तरह- तरह के नारों और वायदों से समाज आप्लावित है। खासकर  पकौड़ा विमर्श और घोटाला आख्यान चरम पर है। यह राजनीतिक समाज विज्ञान और मनोविज्ञान के नजरिए से एक परिवर्तनकारी स्थिति है। यह बात सुनकर सहसा कई ज्ञानगुमानी लोग नाराज हो जाएंगे और कई लोगों को यह तो बहुत कड़वी लगेगी। लेकिन, यह मानना होगा कि आज हमारे देश के सबसे बड़े समुदाय मध्यवर्ग वैचारिक आंदोलनों से दूर होता जा रहा है। उसकी सोच  , उसका रोल मॉडल बहुत तेजी से नकारात्मक होता जा रहा है। हम अपने नागरिक कर्तव्य से विमुख हो रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण चुनाव के समय दिखता है जब मतदान केंद्रों पर गरीब और साधनहीन  लोगों की लंबी कतार लगी रहती है और कुछ प्रभावशाली अमीर लोग वोट डाल कर निकल जाते हैं। यही नहीं देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में वस्तुतः शहरी मध्यवर्ग ही भाग लेता है गांव के लोग खासकर गरीब तो केवल वोट डालते हैं। इससे समाज में खास किस्म का हीन और उच्च भाव का निर्माण होता है।  उच्च भाव ग्रस्त लोग अपनी शिक्षा , प्रभाव और कभी-कभी दौलत के बल पर आगे बढ़ते जाते हैं। गरीब अपनी गुरबत और हीन भाव के साथ इस एहसास में  पड़े रहते हैं कि वे ससरकार बनाने तथा गिराने का दम रखते हैं। धीरे- धीरे इस मध्यवर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा अनजाने में अधिनायकवादी सत्ता के ढांचे का समर्थक बन जाता है। इसमें शामिल चुनिंदा लोग आम आदमी के सामाजिक न्याय के रास्ते में रोड़े अटकाते हैं ताकि उनका वर्चस्व कायम रहे। क्योंकि ऐसे मध्यवर्गीय समाज के ज्यादातर लोग बौद्धिक रूप से क्लांत और सियासत में निष्क्रिय रहते हैं। अतएव, अपने बचाव के लिए ऐसे ताकतवर नेता की तलाश करते हैं जो अनियंत्रित भीड़ को भरमा कर काबू में रख सके। यहीं से तानाशाही की शाखा फूटती है। यह अक्सर देखा जाता है कि उच्च मध्यवर्गीय समाज के खर्चे उनकी आय के ज्ञात स्रोतों से ज्यादा होते हैं। यह अक्सर गैर कानूनी और भ्रष्ट स्त्रोतो से आया हुआ धन होता है। हमारे भारतीय समाज में  भ्रष्टाचार गहराई  तक फैला हुआ है।  यहां मध्यवर्ग उपभोक्तावाद और भ्रष्टाचार की सांठगांठ में भागीदार होता है। जो सरकार संसाधन और धन के पुनर्वितरण के लिए अमीरों पर टैक्स लगाती है उन्हें उनकी खिल्ली उड़ाई जाती है और वही लोग ऐसी सरकार को अपदस्थ कर अधिनायकवादी व्यवस्था को स्थापित करते हैं। वह व्यवस्था गरीब करदाताओं से वसूले हुये पैसे अत्यंत अमीरों को प्रदान करती है।  यही कारण है कि भारतीय व्यवसाय और कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए लोग नव उदारवादी आर्थिक एजेंडे को समर्थन देते हैं। नव उदारवादी आर्थिक एजेंडा   कई ऐसे उपायों को आगे बढ़ाता है जिससे अमीर वर्ग लाभ उठा सकता है। मसलन, ट्रेड यूनियन का खात्मा, व्यापार प्रतिबंधों को कम किया जाना. अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका का कम होना, कल्याणकारी कार्यों पर खर्च में भारी कटौती , सरकारी क्षेत्र का निजीकरण, करों में  रियायत इत्यादि। इससे विदेशी और देसी अमीरों को  लाभ पहुंचता है। विगत 20 वर्षों में नव उदारवादी अर्थव्यवस्था लागू करने में, दोनों मुख्य राजनीतिक दल चाहे वह  कांग्रेस हो चाहे वह बीजेपी, सक्रिय रहे। यह बात प्रचारित की गई कि देश का  मध्य वर्ग विकसित हो रहा है। लेकिन वस्तुतः ऐसा नहीं है। इससे केवल अमीरों और कारपोरेट क्षेत्रों का हित ही सधा है। फर्क केवल मूड का है।  नव उदारवादी अर्थव्यवस्था को लागू करने की नारेबाजी का है। पिछली सरकार "इंक्लूसिव ग्रोथ" का नारा देकर आई थी और यह राष्ट्रभक्ति जैसे नारों के बीच " स्किल डेवेलपमेंट " और पकौड़े बेचने की बात करने लग गई। अक्सर यह बताया जाता है कि हमारे देश में मध्यवर्ग बहुत ताकतवर है और वर्चस्वशाली है। लेकिन यह सही नहीं है। कुछ दिन पहले दो फ्रांसीसी अर्थशास्त्रियों थॉमस पिकेटी और लुकास चांसिन ने एक रिपोर्ट तैयार की थी। रिपोर्ट का  शीर्षक था " इंडियन इनकम इनइक्वलिटी 1922 टू 2014 -  फ्रॉम ब्रिटिशराज टू बीलिनियर राज", उसमें कहा गया है कि इस अवधि में केवल 10% लोगों को आर्थिक उदारवाद से लाभ हुआ है। उनमें  भी 1% लोग और ज्यादा अमीर हो गए हैं। इस रिपोर्ट से यह समझा जा सकता है कि आर्थिक उदारवाद का भारतीय मध्यवर्ग पर क्या असर हुआ। इसके आंकड़े बताते हैं शाइनिंग इंडिया केवल 10% लोगों के लिए था यानी 130 करोड़ भारतीयों में से केवल 10-12 करोड़  लोगों के लिए था, जबकि भारत में मध्यवर्ग की आबादी लगभग 40% है।  इस रिपोर्ट में इसे 49% माना गया है। यही नहीं, जरा उन हालातों को भी देखें जिनमें लोग काम कर रहे हैं। उनकी वास्तविक स्थिति क्या है?  औपचारिक क्षेत्र में मात्र आठ प्रतिशत लोग कार्यरत हैं बाकी के 92 प्रतिशत (यदि सबको रोजगार में लगे मान लें तो ) अनौपचारिक क्षेत्रों में लगे हुए हैं। 2011 के आंकड़े बताते हैं सरकारी क्षेत्र में एक करोड़ 73 लाख लोग हैं जबकि आईटी क्षेत्र में केवल दो करोड़ 80 लाख लोग लगे थे।  यह कुल रोजगार की जरूरत का मात्र 0.6 प्रतिशत है। बिजनेस सर्विसेज 0.9 प्रतिशत की दर से बढ़ा और 1993- 94 में 1.5% लोग इसमें रोजगार पा सके हैं। जो 2011 -12 में बढ़ कर 2.6 प्रतिशत हो गया। इससे स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि भारत की  कुल कार्य शक्ति का केवल 10% ही सारे आर्थिक कारोबार में जुड़ा है। इस संख्या का भी एक ​दिलचस्प रहस्य है।  भारत की सिर्फ 5% आबादी जो लगभग 6.3 करोड़ होती है  वह वह यूरोप के कई देशों की आबादी से ज्यादा है और सिर्फ 10% लोग यानी 12.5 करोड़ आबादी यूरोप के किसी भी देश से ज्यादा है।  यही लोग भारतीय समाज माने जाते हैं। क्योंकि विदेशी बाजार केवल इसी वर्ग पर आधारित है। लेकिन ये  12.30 करोड़ लोग भारतीय समाज के लिए औसत नहीं माने जा सकते। यानी एक बहुत बड़ा भाग है जो रोजगार विहीन है तथा कुछ कर पाने में सक्षम नहीं है। लेकिन वोट डालने में बड़ी भूमिका निभाता है।  आज का पकौड़ा विमर्श इन्हीं भूखे-नंगे लोगों को लुभाने का एक प्रयास है। यहां एक गंभीर समाज वैज्ञानिक परिवर्तन दिखाई पड़ रहा है भारत जिसके मध्यम वर्ग का उदय 1858 के आसपास हुआ था और 1950 के आसपास या परवान चढ़ा उसका आज स्वरूप बदलता जा रहा है।  धीरे-धीरे वह मजदूर वर्ग में परिणित होता जा रहा है।  हो सकता है भविष्य में इसका स्वरूप विकराल हो जाए लेकिन आज गनीमत है कि इस परिवर्तन के कारण समाज के पास खोने के लिए कुछ नहीं है।

Wednesday, February 21, 2018

अगली बार क्या गठबंधन सरकार

अगली बार क्या गठबंधन सरकार

इन दिनों फुसफुसाहट सुनने में आ रही है कि अगली बार नरेंद्र मोदी नहीं तो कौन? " विशेषज्ञों" ने चेतावनी भी देनी शुरू कर दी है अगर हम नरेंद्र मोदी को दोबारा बहुमत से नहीं ला सके तो  अस्थिर राजनीति का दौर शुरू होगा। क्या यह चेतावनी हमें चौंकाती नहीं है? उल्टे अगर नरेंद्र मोदी 2019 में दोबारा नहीं आ सके तो भारतीय लोकतंत्र के लिए महान घड़ी होगी। क्योंकि एक सरकार जो कोई  काम कर ही ना पाये उसे दोबारा क्यों लाया जाए?  कोई भविष्यवाणी नहीं है बल्कि एक तर्क है। हमें मोदी जी और उनकी सरकार के बारे में एक बार फिर से सोचना चाहिए।  उनको उनके चुने जाने में भारतीय समाज से  कहां गलती हुई इसकी समीक्षा होनी चाहिये। मोदी जी दरअसल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की देन हैं। जिसमें संघ के उत्साही स्वयं सेवकों की बड़ी भूमिका है। यही नहीं पार्टी के कार्यकर्ताओं का सोशल मीडिया पर अथक परिश्रम ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अगर ध्यान से देखें कि नरेंद्र मोदी ने भारत को क्या दिया तो पता चलेगा कि मोदी जी ने देश को एक ऐसी दृष्टि प्रदान की जिसमें विदेशी का खौफ है और विकास के प्रतीक हैं। 2014 में मोदी जी के चुनाव के आसपास जो कुछ चल रहा था वह एक तरह से पैदा की हुई बहस थी।   या कहें कि तुलना थी सरकार के नेतृत्व वाली वाले विकास बनाम निजी नेतृत्व वाले तेज गति के विकास की।  सबसे पहले तो कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां सरकार का होना जरूरी है मसलन सामाजिक सुरक्षा, बुनियादी स्वास्थ्य और प्राथमिक शिक्षा। इन क्षेत्रों में  सरकार ने अबतक ना कोई नीति बनायी और ना पुरानी नीतियों को सही ढंग से लागू किया।  जिसका नतीजा बहुत खराब हुआ। इस बीच सरकार ने आधार कार्ड के माध्यम से अपनी मौजूदगी सब जगह बना ली।  इंसानी  आजादी खतरे में पड़ गई है। "कम से कम शासन( मिनीमम गवर्नमेंट ) " तो एक मजाक बनकर रह गया। इधर राफेल, जीएसपीसी और व्यापम- इसे लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि मोदी जी के शासन में भ्रष्टचार नहीं है।दूसरी तरफ गुजरात मॉडल के नाम से निजी विकास को बढ़ावा मिल रहा है।य नहीं देखा जा रहा है कि इंसानी हक और पर्यावरण दांव पर चढ़ रहे हैं।झूठे प्रचार के लिए सोशल मीडिया का जमकर उपयोग हो रहा है और ऐसा वातावरण तैयार करने की कोशिश की जा रही है कि आर्थिक और सामाजिक तौर पर सब कुछ ठीक-ठाक है।मोदी जी सुशासन के तरफदार हैं और  विगत चार साल से समाज और समुदाय पिछड़ते जा रहे हैं और  सत्ता का लाभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा उससे जुड़ी संस्थाओं को मिल रहा है।पिछले 4 वर्षों में अर्थव्यवस्था मुंह के बल गिरी है हाला

इतने खराब फकत इसलिए नहीं लग रहे हैं कि तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत गिरी हुई है इन सबके बावजूद अब वातावरण में एक खास किस्म का प्रचार  चल रहा है कि भारत  गठबंधन की सरकार की योग्य नहीं है।यहां एक बहुमत वाली सरकार आवश्यक है।लेकिन पिछले 4 साल में सभी दिशाओं में हालात इतने खराब हो गया कि मोदी जी के कट्टर समर्थक भी शंकित नजर आने लगे हैं और  इनसे पहले की  अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को वे ज्यादा सफल बताने लगे हैं। अभी  संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कीएक टिप्पणी में  उनका गुस्सा स्पष्ट झलक रहा था। ये संकेत हैं सत्तारूढृ दल की बेचैनी के।  चलो मान लेते हैं किअर्थ व्यवस्था  में उतार चढ़ाव होता रहता है लेकिन पिछले 4 वर्षों में नफरत पैदा करने की कोशिश है।जो भी है अगर उसके आंकड़े देखें उन लोगों का माथा घूम जायेगा। यह तो सही है कि जब तक सरकार ऐसे कामों में शामिल नहीं होगी यह काम नहीं हो सकते। सरकार के इस कार्यकाल में  सबसे खराब जो हुआ वह है संप्रदायवाद की भावना का विकास।   कई ऐसी घटनाएं हुई जो आतंकवाद के दर्जे की थी।क्या यही बहुमत का फल मिला भारत को।गठबंधन की सरकारइस मामले में अच्छा किया होता क्योंकि घटक दलों का दबाव सरकार को कुछ गलत नहीं करने देता।  जो लोकसे खेल नहीं सके  अच्छी लोकतांत्रिक सरकार उसे ही

 कहा जाता है।जो सरकार बहुत बड़े जनमत को स्वीकार हो और जिसमें आबादी के लगभग सभी धागों का प्रतिनिधित्व हो उसे ही अच्छी सरकार कहते हैं।

 2019 का चुनाव जवाबदेही की मांग करने वाला होगा।भारत को एक अच्छी और काम करने वाली सरकार की जरूरत है।हमें प्रचारकों और चेतावनी देने वालों से घबराना नहीं होगा। सोचनाहोगा क्या देश और जनता के हित में है। गठबंधन सरकार कीकमियों से डराने वालों के झांसे में नहीं आना है।

Tuesday, February 20, 2018

मोहन भागवत जी स्पष्ट करें ?

मोहन भागवत जी स्पष्ट करें ?

अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है कि सोशल मीडिया पर एक लहूलुहान फौजी की तस्वीर आती थी और लोगों से अपील की जाती थी इसे लाइक करें और सलाम करें। लोग भावुक होकर ऐसा करते थे। इस तरह की तस्वीरें बनाने और लगाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  या मोदी जी के कीर्तन ब्रिगेड के लोग थे। इसका उद्देश्य था राष्ट्रीय भावुकता  के हथियार से देशवासियों का ध्यान राष्ट्रीय समस्याओं से हटाना। वह समय था नोटबंदी से उपजे गुस्से का। 
   अचानक एक एक दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत जी का बयान आता है कि संघ 3 दिन में फौज खड़ी कर सकता है जबकि भारतीय सेना को ऐसा करने में 6 महीने लगते हैं। यह  एक संयोग ही है कि बयान ठीक उस दिन आया जिस दिन जम्मू के शुंजवान में आतंकी हमलों के बाद भारतीय सेना के जवान अपने मृत  साथियों की लाशें गिन रहे थे  और आसपास छिपे आतंकियों को ढूंढने का जोखम से दो- दो रहे थे। ऐसे वक्त में संघ प्रमुख का यह संवेदनहीन बयान   सीमा के रक्षकों  और देश की प्रभुसत्ता को सुरक्षित रखने वाली संस्था को नीचा दिखा रहा है। आखिर मोहन भागवत जी ने ऐसा क्यों कहा? उनसे  स्पष्टीकरण मांगा जाना चाहिए।
    यह सब जानते हैं कि संघ का दर्शन उसे एक विघटनकारी ताकत बनाता है । उसका नजरिया "हम " और "वह" वाला है। यह जानकर हैरत हो रही है कि सेना अभी उनके "हम" में शामिल नहीं है। बेशक मोहन भागवत जी बहुत बड़े नेता हैं और देश की एक बहुत बड़ी आबादी बड़े ध्यान से उनको सुनती है, उनका बहुत ज्यादा सम्मान करती है। लेकिन अब लगता है कि मोहन भागवत जी को कुछ फौजी प्रशिक्षण केंद्र में भेजा जाना चाहिए ताकि वे समझ सकें कि  एक सैनिक को तैयार करने में कितनी मेहनत और कितना समय लगता है। हालांकि उन्होंने कहा था कि हमारी हमारा संगठन सैनिक या अर्धसैनिक बल नहीं है। यहां यह बताना जरूरी है की फकत 4:00 बजे सुबह उठकर लाठी भांजना और खाकी निकर  पहनकर शाखा में शामिल होना किसी भी तरह की फौजी ट्रेनिंग नहीं है। ऐसे लोग 3 दिन में इतने प्रशिक्षित नहीं किए जा सकते कि शून्य से कई डिग्री नीचे सियाचिन में 2 मिनट भी खड़े रह सकें या 3 दिन में हठात तापमान 50 डिग्री सेल्सियस जहां पहुंचता है वहां खड़े होकर देश की हिफाजत कर सकें। अब यहां प्रश्न उठता है कि आदरणीय मोहन भागवत जी, जो यकीनन सच्चाई को जानते होंगे , ने ऐसा क्यों कहा?
       शायद इसलिए कि हथियार लेकर सड़कों पर बेहिचक घूमने वाले नौजवानों और एक फौजी में वे  फर्क नहीं देख पाते हैं। एक  दयनीय हालत है। भारत जैसे बहुसंस्कृति वाले देश के लिए बेशक मोहन भागवत जी का यह बयान चिंताजनक है।  यहां यह कहा जा सकता है कि क्या संघ ने ब्रिगेड तैयार किए हैं जो युद्ध के लिए प्रशिक्षित हों या फिर उनका यह बयान यह भी बताता है संघ सांस्कृतिक संगठन नहीं निजी सेना है। जिस आत्मविश्वास से मोहन भागवत जी बोल रहे थे , जो उनका बॉडी लैंग्वेज था उसे देख कर पूछा जा सकता  है कि क्या सचमुच संघ में  फौजी ट्रेनिंग दी जा रही है?  आज के युग में संगठित हिंसा सिर्फ सरकार कर सकती है और वह भी बहुत सोच समझकर या बहुत जरूरी होने पर। मोहन भागवत जी का इस तरह से कहना तो बहुत बड़ी विपत्ति का संकेत है। क्योंकि, किसी भी तरह की संगठित हिंसा जो पहले संकेत रूप  में ही रहती  है आगे चलकर पहचान और आदर्श या सिद्धांत के बड़े युद्ध में बदल सकती है।  ऐसे कामों में इस्तेमाल करने के लिए नौजवान उस संगठन के पास उपलब्ध होते हैं। नक्सलियों और बिहार की रणवीर सेना का उदाहरण देश के सामने है। अगर इस तरह के संगठन को पर्दे के पीछे से सत्ता का समर्थन मिलता रहे तो बेरोजगारी  और कुंठा से  भरे नौजवान समाज के लिए और खतरनाक हो सकते हैं । यही कारण है कि सरकार की तरफ से मोहन भागवत जी के बयान पर लीपापोती शुरू हो गई। गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने ट्वीट किया "भारतीय सेना हमारा गौरव है और हर भारतीय को इसका समर्थन करना चाहिए।"
     मोहन भागवत जी के इस बयान के परिप्रेक्ष्य  में विजयादशमी और रामनवमी को हथियार लेकर जुलूस निकालने वाले अनुशासनहीन नौजवानों की करतूतों को याद करें। राष्ट्र के बहुलतावादी समाज की मान्यताओं तथा परंपराओं  को ताक  पर रखकर  वे समाज पर नियंत्रण करना चाहते हैं। भागवत जी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी बात का अर्थ क्या है? कितने लोग इस तरह की ट्रेनिंग पा चुके हैं और कितनों को इस तरह की ट्रेनिंग दी जा रही है? भागवत जी को ़यह भी बताना चाहिए कि वह कौन सी जरूरत पड़ गई है कि भारत को संघ की सेना की आवश्यकता हो गई है या फिर संघ किसके खिलाफ युद्ध के लिए तैयार हो रहा है? क्या संघ का फौज पर से विश्वास उठ गया है या उसके पास इतनी ताकत हो गई है कि फौज पर काबू पा सकते हैं ?मोहन भागवत जी से राष्ट्र इन सवालों के जवाब चाहता  है, क्योंकि इन सवालों के समानांतर हमारी फौज की क्षमता पर कायम सवाल  भी है।

Monday, February 19, 2018

ये हंसने वाली तीन महिलाएं

ये हंसने वाली तीन महिलाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ना केवल अक्रामक बोलते हैं बल्कि कोई उसमें टोका टाकी करता है  या फब्ती कसता है तो उसकी खिल्ली उड़ाने में भी सिद्धहस्त हैं। लेकिन पिछले हफ्ते जो लोकसभा में हुआ वह एक चिढ़े हुये आदमी की बात थी जिसने चिढ़ाने वाली  महिला की बोलती बंद करानें की कोशिश की। मोदी जी ने उस हंसने वाली महिला को रामायण सीरीयल की शूर्पनखा से परोक्षल तुलना कर दी। उनकी इस बात से सत्ता पक्ष में ठहके लगने लगे और सदस्यों ने मेजें थपथपा कर हर्ष जाहिर किया। इसके बाद , गृह राज्य मंत्री किरण ​रिजिजू की वीडियो क्लिप ने इस मामले में रही सही कमी पूरी कर दी। उन्होंने सदन की सदस्य श्रीमती रेणुका चौधरी की हंसी की पृष्ठभूमि में उसी टी वी सिरीयल की शूर्पनखा की हंसी की वीडियो क्लिप वायरल कर प्रधानमंत्री के " मंतव्य " को स्पष्ट कर दिया। इस टिप्पणी के बारे में जो भी कहा जाय पर इसका मनोविज्ञान कुछ लगता है जैसे एक भड़का हुया आदमी हंसने वाली एक महिला को सबक सिखाना चाहता हो। आखिर विपक्ष और सदस्य  तो आपत्ति कर रहे थे और अध्यक्ष से गुजारिश कर रहे थे कि उन्हें व्यव​स्थित करें लेकिन प्रधानमंत्री अड़े हुये थे उस महिला की बोलती बंद कराने में। मनोविज्ञान की शब्दावलि में इसे एक आत्मविश्वाी महिला की हंसी से नारीद्वेषी आतंक कहा जा सकता है। पितृसत्तात्मक समाज में नारीद्वेष एक स्वाभाविक मनोस्थिति है जो केवल पुरूषों तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि समाज की महिलाओं में व्याप जाती है। इसीलिये भाजपा की महिला सदस्य भ​ी मोदी जी की टिप्पणी पर हंस रहीं थीं। पौराणिक कथाएं सांस्कृतिक स्मृतियों का भंडार होती हैं और सामाजिक प्रवृतियों एवं आचणों को विशिष्ट रूप से प्रभावित करती हैं। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि पौराणिक कथाएं और आख्यान सच से भी अधिक हुआ करते हैं। ये कथाएं और आख्यान नारीद्वेष के विरुद्ध संघर्ष में एक महत्च्पूर्ण मैदान तैयार करते हैं। इन्हें इनके समस्त गूढ़ार्थों सहित समझने की जरूरत है और  इसकी संवेदनशील व्याख्या की आवश्यकता है। शूर्पनखा हकीकत से कुछ ज्यादा ही आवरण में आवृत है। कुछ लोगों के लिये वह सीमा को लांघने  वाली महिला है और उस पर हमला एक तरह से उसे दंडित करने की प्रक्रिया है।स्मरण होगा कि राजस्थान की करणी सेना ने भी धमकी दी थी कि पद्मावती की भूमिका करने वाली की नाक काट लेंगे। इस धमकी में कहीं निर्देशक या नायक या यहां तक कि खिलजी का अभिनय करने वाले को ऐसी धमकी नहीं दी गयी। चाहे वह परदे में ही कही गयी हो पर सदन शूर्पनखा  के संदर्भ में मानसिक धरातल पर विचार करें तो हैरत होगी। 

   अब इस संदर्भ में द्रौपदी की हंसी पर विचार करें। क्या सचमुच द्रौपदी दुर्योधन पर इस लिये हंसी थी कि वह अंधे राजा की औलाद था? अगर ऐसा है तो द्रौपदी एक निष्ठुर महिला के रूप में दिखायी पड़ती है। अगर आप महाभारत का प्रणयन करें तो पायेंगे कि महर्षि व्यास ने "सभा पर्व " में दो परिच्छेदों में इस घटना का वर्णन किया है खैर उसमें दुर्योधन पर हंसनेवालों में भीम , अर्जुन , नकुल और सहदेव हैं, उनके सेवक हैं ना कि युधिष्ठिर और द्रौपदी। लेकिन दुर्योधन अपने पिता से इस घटना का वर्णन करता है तो बात बदल गयी होती है क्याोंकि इसके पहले वह मामा शकुनी से परामर्श कर चुका होता है। अतएव द्रौपदी की हंसी की बात " राजा को दी गयी एक गलत रिपोंर्ट है। "  इस रिपोर्ट का उद्देश्य राजा को भड़काना है। यह आख्यान भी यही बताता है कि एक अहंकारी आदमी अगवानी में खड़े लोगों से अपमानित महसूस करता है ना कि किसी महिला की हंसी से।  सच्चाई अगर धोखे में बिंधी हो तो सच्चाई नहीं कही जा सकती। 

Sunday, February 18, 2018

कांग्रेस को मिला झुनझुना

कांग्रेस को मिला झुनझुना

मुंबई की पंजाब नेशनल बैंक की एक शाखा से 11,308  करोड़ रुपयों की धोखाधड़ी ने देश को सकते में डाल दिया है। यह देश की अब तक की सबसे बड़ी बैंक धोखाधड़ी है । साथ ही  यह बताती है कि हीरा उद्योग में कितनी बड़ी गड़बड़ी चल रही है। जबकि, भारत विश्व हीरा उद्योग का एक छोटा सा हिस्सा है । यह बड़ा अजीब लगता है कि भारत में हीरे पर जो टैक्स लगाया जाता है वह पॉलिश किए हुए हीरे पर होता है और कारोबार पर होता है न कि मुनाफे पर । अब ये शातिर व्यापारी   निर्यात को बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं  और इससे जो लाभ होता है वह दूसरे उद्योगों या कारोबार   में डाल देते हैं ।  खासकर रियल स्टेट में यह रुपया चला जाता है, हीरा व्यापार में रहता नहीं है कि कारोबार में दिखे। 

  यू पी ए -2 सरकार ने 2011 में इस पर नकेल कसने की कोशिश की थी।  शातिर भारतीय हीरा व्यापारियों ने उस वर्ष   28. 22 अरब डॉलर का दिखाया था जबकि दुनिया भर में 2010 में हीरो का कारोबार 18.2 अरब डॉलर था । सरकार ने 2011 में इस पर 2% छूट की योजना लागू कर दी । नतीजा हुआ इससे ड्यूटी प्रभावित हुई और हीरा का कारोबार खासकर के निर्यात कारोबार गिरने लगा। यह 20 अरब डालर से घटकर 5.8 अरब डॉलर हो गया।    

  इस तरह के कारोबार  में निर्यात के नाम पर लाभ की राउंड ट्रिपिंग होती है। यहां राउंड ट्रिपिंग को समझना थोड़ा जरूरी है । यह विदेशों में कमाया धन होता है और भारतीय कंपनियों में और भारतीय कारोबार में लगाए जाने के नाम पर विदेश से आता है । पंजाब नेशनल बैंक  वाले मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा। अभी यह तो जांच का विषय है । यह मसला पिछले 5 वर्षों से चल रहा था और अब जाकर फूटा है । इस घोटाले को देख कर लगता है भारतीय बैंकिंग प्रणाली में जो सड़न  वर्षो से कायम थी वह अभी भी कायम है और बड़े लोग इसका लाभ उठा रहे हैं। विजय माल्या का मामला अभी लोगों के मन में ताजा ही था  कि पंजाब नेशनल बैंक  का यह भांडा फूट गया। यह सोचने वाली बात है कि देश में होने वाले जितने भी बैंक घोटाले हैं उनका 83 प्रतिशत सरकारी बैंकों में है होता है।  सरकार इस पर नकेल कसने के लिए कुछ नहीं कर पाती है । गरीब करदाताओं का पैसा इसी तरह लुटता रहता है। जब बैंक घाटे में आते हैं तुम के लिए अलग से कोष  बनाए जाते हैं । आज के  इन बैंक घोटालेबाजों ने हर्षद मेहता से सबक सीखी है। लगभग 20 वर्ष पहले हर्षद मेहता ने  इसी तरह का घोटाला किया था लेकिन पकड़ा गया क्योंकि वह देश में ही था, जबकि विजय माल्या जैसे घोटालेबाज हाल के पंजाब नेशनल बैंक मामले का हीरो नीरव मोदी विदेश में आराम कर रहे हैं और सरकार की पकड़ से बाहर है।     

     यह जो घोटाला हुआ है उसे देखकर यह प्रबल संभावना है कि  पंजाब नेशनल बैंक  की अन्य शाखाओं में  भी कुछ हुआ होगा जिसकी अभी खबर आनी बाकी है सरकार ने सभी बैंकों से कहा है इस मामले से संबंधित रिपोर्ट इस हफ्ते के अंत तक भेजें। इसका मतलब है कि कहीं ना कहीं सड़ांध की दुर्गंध आ रही है। बैंक अधिकारियों  की मिलीभगत से कारोबारी इस तरह के घोटाले बड़े आराम से कर सकते हैं। यह लघु अवधि के क्रेडिट के नाम पर पहला कदम आगे बढ़ाते हैं जैसे  नीरव मोदी ने शुरू किया। मोदी ने  लेटर ऑफ अंडरटेकिंग के आधार पर यह शुरू किया। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग किसी भी अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय बैंक द्वारा जारी किया जा सकता है। इस लेटर के आधार पर बैंक 90 से 120 दिन के लिए कंपनियों को कर्ज देता है और यह रुपया कंपनियां दुनिया के किसी भाग से निकाल सकती हैं। इस तरह के धंधे आमतौर पर निर्यात  आधारित कंपनियां करती हैं। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग स्थानीय बैंक द्वारा लेटर ऑफ कंफर्ट के आधार पर जारी होता है। यह लेटर ऑफ कंफर्ट स्थानीय बैंक देते हैं। 2001 में केतन पारेख ने माधवपुरा मर्केंटाइल को ऑपरेटिव  बैंक से इंटर बैंक क्रेडिट ऑर्डर लिया था और इसे मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के बैंक ऑफ इंडिया शाखा भुना लिया था। सीबीआई की एफ आई आर के अनुसार नीरव मोदी के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। क्योंकि, मोदी को जिन कंपनियों को लेटर ऑफ अंडरटेकिंग दिया गया था उन कंपनियों के खाते खाली हैं। इस मामले में जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य दिखाई पड़ रहा है वह है समय का।  लेटर ऑफ अंडरटेकिंग के जरिए जारी कर्ज  लघु अवधि के लिए होता है लेकिन पंजाब नेशनल बैंक के अधिकारी नहीं बता पा रहे हैं या फिर उन्होंने एक अज्ञात अवधि तक इस मामले को क्यों लटका कर रखा था। यही नहीं   नीरव मोदी ने लघु अवधि के इंटरबैंक इतने चैनल्स कैसे खोले हैं। 

 दरअसल आम आदमी इस तरह के घोटालों ताने बाने को समझता नहीं है। केवल सुनी सुनाई बात पर निर्णय करता है और उसी पर कहानी आगे बढ़ती है । अब यह मसला मोदी सरकार के लिए भी वैसा ही हो सकता है। चुनाव सिर पर हैं और नीरव मोदी के इस मामले को कांग्रेस बखूबी भुना सकती है। इस घोटाले का राजनीतिक प्रभाव पता नहीं क्या होगा। लेकिन भारत जैसे देश में जहां सुनी सुनाई बातों पर 2जी घोटाले में अदालतें फैसले दे सकती हैं और लोगों को जेल भेजा जा सकता है वहां इतना बड़ा घोटाला क्या राजनीतिक रंग लाएगा यह तो आने वाला समय बताएगा।