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Tuesday, April 9, 2019

भाजपा की घोषणा नहीं , उसका संकल्प

भाजपा की घोषणा नहीं , उसका संकल्प

जब चुनाव आते हैं तो तरह-तरह के अजूबे भी सामने आते हैं। तरह-तरह की बातें भी सुनने में आती हैं।  इस बार भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा पत्र का नाम संकल्प पत्र दिया है। नाम से ही ऐसा लगता है कि वह कुछ वादे नहीं प्रतिज्ञा कर रही है। यह संकल्प पत्र तब आया जब मतदान के पहले चरण में महज 3 दिन बाकी रह गये।  अब  इस घोषणा पत्र को या कहें संकल्प पत्र पर जनता कब विचार बनाएगी और उसे कैसे इतने बड़े देश में इतनी जल्दी पहुंचाए जा सकता है । पार्टी के संकल्पों को देश के कोने कोने तक पहुंचाने में महज 3 दिन का समय थोड़ा कम लगता है। संकल्प पत्र के माध्यम से जो प्रतिज्ञा की गई है उस प्रतिज्ञा में शामिल है कि किसानों को ₹6000 दिया जाएगा, छोटे काश्तकारों, खेतिहर मजदूरों और छोटे दुकानदारों को पेंशन दी जाएगी।  जैसा कि बताया गया है कि यह संकल्प पत्र पहली बार जनभागीदारी से सैकड़ों सुझावों के आधार पर तैयार किया गया है। सुझाव प्राप्त करने के लिए मन की बात अभियान में 4000 कार्यक्रम किए गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ,गृह मंत्री एवं संकल्प पत्र समिति के अध्यक्ष राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री अरुण जेटली एवं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा सोमवार को जारी इस संकल्प पत्र को कांग्रेस ने झूठ का गुब्बारा करार देते हुए दावा किया कि अब इनके हथकंडे चलने वाले नहीं हैं। देश की जनता इन्हें पहचान चुकी है। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि मोदी जी का मूल मंत्र है "झांसे से फांसो" यह " घोषणा पत्र नहीं झांसा पत्र है।"
        संकल्प पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि सरकार आतंकवाद और वामपंथी उग्रवाद को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी । इस मामले में  जीरो टॉलरेंस होगा। पार्टी ने अगले 5 वर्षों में अधिक प्रभावी कदम उठाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। पार्टी ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के विरुद्ध एक मंच बनाने का प्रयास किया जाएगा तथा संविधान में जम्मू कश्मीर से संबंधित अनुच्छेद 370 एवं 35 ए को समाप्त कर दिया जाएगा। घोषणा पत्र में कहा गया है कि ऐसा लगता है कि धारा 35 ए  कश्मीर के विकास में अवरोध पैदा कर रहा है और इसलिए कश्मीर के सभी लोगों के विकास और सुरक्षा के देश सभी प्रकार के कदम उठाए जाएंगे । इसमें कहा गया है कि "हम  पूरी कोशिश करेंगे  कश्मीरी पंडित  लौट आएं  और पश्चिमी पाकिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर और छम्ब  से आए शरणार्थियों को  पुनर्वास के लिए  आर्थिक सहायता दी जाएगी।" 370 के संबंध में संकल्प पत्र में कहा गया है की इसके संबंध में जो जनसंघ का मानना था हम उसे आज भी मानते हैं। लेकिन पार्टी यह स्पष्ट नहीं कर सकी उसने कश्मीर में पीडीपी के साथ क्यों हाथ मिलाया ?  पीडीपी सदा यह धमकियां देती रहती है की अगर धारा 370 को हटाया जाता है या उसमें बदलाव किया जाता है तो खतरनाक परिणाम होंगे।
         भाजपा ने हालांकि राम मंदिर बनाने का वादा जरूर किया लेकिन स्वर बदला हुआ था। इस बार "मंदिर वहीं बनाएंगे" नहीं कहा गया, बल्कि यह कहा गया कि "शांतिपूर्ण वातावरण में मंदिर बनाने के लिए सभी विकल्पों पर विचार किया जाएगा।" ऐसा लगता है कि भाजपा ने यह माना है कि भारत लोग शांति पूर्ण वातावरण के लिए ज्यादा इच्छुक हैं जिसमें उद्योग और व्यापार पनप सकें।
         प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर कहा, एयर कंडीशन कमरे में बैठे लोग गरीबी नहीं हटा सकते। गरीब ही गरीबी को  परास्त कर सकता है। संकल्प पत्र में गरीबों के सशक्तिकरण पर बल दिया गया है।
          भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में कृषि क्षेत्र में 25 लाख करोड़ के निवेश का वादा किया है ताकि खेतों की उत्पादकता बढ़ाई जा सके । पार्टी ने किसान क्रेडिट कार्ड पर मुफ्त कर्जे की घोषणा की है। पार्टी ने कहा है की  वह 1 साल से 5 साल तक की अवधि के दिए 1 लाख रुपये तक का ब्याज मुक्त कर्ज मुहैया कराएगी। शर्त होगा कि मूल राशि को जल्दी वापस किया जाए । यद्यपि खेतों और खेती की दुर्दशा को देखते हुए यह बहुत महत्वपूर्ण वादा है । अब देखना है क्या मतदाता कांग्रेस के 72 हजार रुपए के वादे के मुकाबले इसे पसंद करते हैं या नहीं।
भाजपा ने महिलाओं से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण संकल्प को व्यक्त किया है । पार्टी ने प्रतिज्ञा की है कि संसद और राज्य विधानसभाओं में 33% महिलाओं के लिए आरक्षण की दिशा में वह काम करेगी। इसके लिए संविधान संशोधन किया जाएगा। लेकिन पार्टी के इस वादे पर विचार करने से कुछ दूसरा ही निष्कर्ष निकलता है। पार्टी ने इस बार चुनाव में 33% महिलाओं को टिकट नहीं दिया है। जबकि बीजू जनता दल ने ऐसा किया है। यही नहीं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में 42 लोकसभा सीटों  में 40 प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिया है।
      संकल्प पत्र में रोजगार पर अलग से कोई सेक्शन नहीं दिया गया है। रोजगार का मुद्दा ऐसे ही गुम हो गया है जैसे देश में राष्ट्रवाद के हल्ले में बेरोजगारी का मामला दब जाता है। घोषणा पत्र में रोजगार का जिक्र इस तरह किया गया है कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेंगे इससे रोजगार बढ़ेगा, घुसपैठियों के कारण स्थानीय लोगों का रोजगार छिन गया है इसलिए घुसपैठियों को रोकेंगे, पीपीपी के जरिये  रोज़गार बढ़ाएंगे और अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए 22 सेक्टरों की पहचान करेंगे इससे रोजगार भी बढ़ेगा। हैरत होती है कि  5 साल पहले हर साल एक करोड़ नौकरियां देने का वादा करने वाली भाजपा आज तक रोजगार देने वाले हैं सेक्टरों की पहचान तक नहीं कर पाई है।
         इस घोषणा पत्र या कहें संकल्प पत्र को मतदाताओं ने कितना स्वीकार किया है यह तो आने वाला समय बताएगा ,लेकिन यह तय कि भाजपा का प्रचार तंत्र इसे कुछ इस तरह प्रचारित करेगा कि इसका मतदाताओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़े और प्रभाव का असर वोटों पर भी दिखाई पड़े । अस्तु परिणाम का अंदाजा खुद लगा सकते हैं।
       

Monday, April 8, 2019

आम चुनाव और नौजवान मतदाता

आम चुनाव और नौजवान मतदाता

देश में चुनाव का माहौल गर्म हो चुका है और पहले चरण की चुनाव में महज दो दिनो  की देरी है । चारों तरफ चुनावी वादों की बरसात हो रही है और अधिकांश वादे नौजवान मतदाताओं को लुभाने के लिए किए जा रहे हैं। प्रश्न है कि यह वादे कितने हद तक पूरे किए जा सकेंगे? इसका उत्तर अभी नहीं मिल सकता। लेकिन चुनावी विमर्श में सबसे ज्यादा फोकस नौजवानों पर ही है। जैसे नौजवानों को चुनाव में एक अच्छा शगुन मान लिया गया है। पिछले कुछ चुनाव में जिन मतदाताओं ने पहली या दूसरी बार मतदान किया था उन्हीं मतदाताओं का वर्ग निर्णायक भी था। अभी तक प्राप्त सारे आंकड़े यही बताते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में लगभग 10 करोड़ नए मतदाता थे इनमें से  ढाई करोड़ के आसपास मतदाता 20 वर्ष की उम्र के थे और पहली बार मतदान करने जा रहे थे । इसके पहले वाले चुनाव में कुल निबंधित मतदाताओं की संख्या लगभग 81.45 करोड़ थी उनमें 52% मतदाता 40 वर्ष से कम उम्र के थे। यह कहने की जरूरत नहीं है कि  हमारे समाज का यह हिस्सा देश का भविष्य बनाने की जिम्मेदारी को वहन कर रहा है । इस हिस्से को सही दिशा निर्देश और समर्थन की जरूरत है, वरना यह हिस्सा देश के लिए समस्या भी बन सकता है। आज तक जितनी क्रांतियां हुई हैं उनमें सबसे ज्यादा हिस्सा इसी उम्र वर्ग का रहा है। यह एक ऐसा समूह है जिसे अगर ठीक से मार्गदर्शन मिला तो वह समाज को शिखर पर पहुंचा सकता है वरना विनाश तो बहुत कुछ हो सकता है।
         ढुलमुल शिक्षा व्यवस्था ने अत्यंत कमजोर व्यक्तित्व तथा चरित्र की नीव बन गयी  और अब सामाजिक सुधार की बातें तथा प्रयास एनजीओ की जिम्मेदारी बन गई। यह स्पष्ट है कि नौजवानों को दिशा निर्देश देने वाले प्रकाश स्तंभ अब समाप्त हो चुके हैं। यह वक्त सोशल मीडिया का है और इसके माध्यम से जो सूचनाएं आती हैं उसने हमारे समाज में ज्ञान के आदर को समाप्त कर दिया है। आजकल पढ़ना - लिखना पुराने जमाने की बात बन गई है। शिक्षा का माध्यम सोशल मीडिया है और वह कितना सही है यह समझना मुश्किल है । हर दिन किसी नेता, ऐतिहासिक व्यक्तित्व या भारतीय संस्कृति के बारे में हास्यास्पद बातें कही जाती हैं। पूरे वातावरण में वैचारिक प्रदूषण भर गया है।
           हांगकांग की संस्था "काउंटरप्वाइंट रिसर्च " के मुताबिक "भारत में 43 करोड़ स्मार्टफोन के उपयोगकर्ता हैं। यह लोग अपने स्मार्टफोन के जरिए व्हाट्सएप का इस्तेमाल करते हैं। " व्हाट्सएप का दावा है "भारत में 20 करोड़ लोग मैसेंजर सेवा का उपयोग करते हैं। यहां 87 हजार सक्रिय ग्रुप से जो लगातार संदेशों को प्रसारित करते रहते हैं, इधर से उधर भेजते रहते हैं।" यह चुनावी योद्धाओं के लिए सर्वोत्तम माध्यम है लोगों तक पहुंचने का और जनता तक अपने विचार पहुंचाने का। इस तरह से हम रात -दिन बहुत सी बातें सुनते हैं देखते हैं और पढ़ते हैं । इन संदेशों में किसी के चरित्र और किसी के कुकृत्य का विवरण होता है। भारतीय जनता में एक खूबी है कि मुफ्त में मिली सूचना को बहुत जल्दी ग्रहण करती है लेकिन महंगा पड़ रहा है।  हमारी नौजवान पीढ़ी  का अर्ध सत्य या  पूर्ण असत्य के माध्यम से ब्रेनवाश किया जा रहा है। हर राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए इसका इस्तेमाल कर रहा है। सामाजिक समरसता बलि चढ़ा दी जाती है । ऐसे में युवा मतदाताओं को जागरूक होना और अपने अधिकारों को समझना जरूरी है। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है सब के सब या कहें अधिकांश नौजवान गुमराह हैं।
               अब सवाल है कि यह खतरा कितना व्यापक है। छोटा सा नमूना प्रस्तुत है। इस साल चुनाव में लगभग 90 करोड़ मतदाता निबंधित हैं । इनमें डेढ़ करोड़ ऐसे मतदाता है जिनकी उम्र 18 से 20 वर्ष है और वह पहली बार वोट देने जा रहे हैं । इनमें से अधिकांश  उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र के हैं। इन 5 प्रांतों में लोकसभा की 235 सीटें हैं इसका मतलब है कि केंद्र में सरकार बनाने में यह राज्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। क्योंकि 43 प्रतिशत लोकसभा सदस्य इन्हीं राज्यों से चुने जाएंगे। इन राज्यों की जमीनी हकीकत दुखद है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं, महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं और चारों तरफ भारी बेकारी है। यहां सामाजिक  असमानता भी है और उसका असर चारों तरफ दिखाइ पड़ता है। अब जरा इस विरोधाभास को देखिए कि देश के अधिकांश प्रधानमंत्री इन्हीं राज्यों से आए हैं फिर भी इन राज्यों में दुर्दशा है ,ऐसा क्यों ? अगर हम इसका उत्तर  तलाशते हैं तो पूरा ग्रंथ तैयार करना होगा। लेकिन सच तो यह है इन राज्यों के नवजवान ही नए सरकार के चुनाव के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इस वर्ग को सरकार से बहुत उम्मीदें हैं ।यह लोग अपनी दशा से असंतुष्ट हैं और इस उम्मीद में वोट डालेंगे कि अगले 5 वर्षों में उनकी स्थिति सुधर जाएगी और उनकी समस्याएं हल हो जाएंगी । क्या उनकी उम्मीद पूरी होंगी? वादों की बरसात को देख कर लगता तो नहीं है। नेताओं के लिए वोटों की झड़ी लग जाएगी  तथा सोशल मीडिया की अदृश्य कीमियागिरी मतदाताओं को गुमराह करने में सफल होगी ,लेकिन मतदाता चुनाव के बाद और कुंठित होंगे।

Sunday, April 7, 2019

तबादले की सियासत

तबादले की सियासत

पश्चिम बंगाल के कई पुलिस अधिकारियों के तबादले चुनाव आयोग ने कर दिए हैं। खासकर कोलकाता पुलिस के कमिश्नर अनुज शर्मा और विधाननगर पुलिस के कमिश्नर ज्ञानवंत सिंह तथा बीरभूम और डायमंड हार्बर के पुलिस अधीक्षकों के तबादले को लेकर पश्चिम बंगाल का राजनीतिक माहौल गरमा चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि चुनाव आयोग द्वारा अफसरों के तबादले की क्रिया मनमानी भरी  और अत्यंत अभिप्रेरित है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि यह मानने के कई पुख्ता कारण है कि यह तबादले केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार के इशारे पर किए गए हैं। मुख्यमंत्री ने इस आशय का पत्र  भी चुनाव आयोग को भेजा है और कहा है कि वह अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। अपने पत्र में ममता बनर्जी ने यह भी कहा है कि भाजपा नेताओं ने प्रेस बयान जारी कर कहा था कि बंगाल में अभी और अधिकारियों के तबादले किए जाएंगे । उन्होंने कोलकाता और विधाननगर के नए पुलिस कमिश्नर की क्षमता को कम आंकते हुए कहा कि क्षेत्र और क्षेत्र के लोगों के बारे में उन्हें  बहुत कम जानकारी है इसलिए राज्य में किसी भी प्रकार की कानून व्यवस्था की समस्या की जिम्मेदारी क्या  चुनाव आयोग स्वीकार करेगा? उन्होंने कहा कि कानून और व्यवस्था राज्य का विषय है और फिर भी उनकी सरकार से किसी तरह का परामर्श नहीं किया गया।
       उधर भाजपा के  कई नेता  यह कह रहे हैं  कि ऐसे कई मौकों पर देखा गया है कि चुनाव के पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की तीखी आलोचना की है। इस बार भी उन्होंने कहा है कि यह भाजपा के इशारे पर हुआ है। लेकिन उनकी बातों के विपरीत , हाल में जब यह निर्णय  किया गया कि बंगाल में चुनाव केंद्रीय बालों की देखरेख में होगा तो  ममता बनर्जी ने अपने भाषणों इसका स्वागत किया और कहा  कि "मुझे उम्मीद है केंद्रीय बल राज्य पुलिस के साथ मिलकर काम  करेंगे।" ममता जी ने अपने कई भाषणों में कहा है कि अगर भाजपा दुबारा सत्ता में आ गई तो आम जनता अपनी आजादी खो देगी यह  संविधान में बदलाव करेगी।
           यह पहला अवसर नहीं है जब चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल सरकार के प्रति कदम उठाए हैं। इसके पहले भी मई 2016 चुनाव आयोग ने बंगाल सरकार निर्देश दिया था कि वह आश्वस्त करे कि आईपीएस अधिकारी भारतीय घोष चुनाव खत्म होने तक अपने कार्यस्थल से इधर उधर ना जाएं । इसके पूर्व 2016 के अप्रैल में विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग ने राजीव कुमार का तबादला कर दिया था। मार्च 2016 में चुनाव आयोग में हुगली के जिलाधीश संजय बंसल , बर्दवान के पुलिस अधीक्षक कुणाल अग्रवाल, मालदह के पुलिस अधीक्षक प्रसून बंदोपाध्याय, नदिया के पुलिस अधीक्षक भास्कर मुखर्जी तथा दक्षिण दिनाजपुर के पुलिस अधीक्षक अर्णव घोष एवं अन्य 37 पुलिस अधिकारियों का तबादला किया था। इसके भी पहले अप्रैल 2014 में लोकसभा चुनाव के पूर्व भारती घोष को पश्चिम मेदिनीपुर जिले से हटा दिया गया था। चुनाव आयोग का ताजा निर्णय उस समय घोषित हुआ जब राज्य के विपक्षी दलों के कई नेताओं ने आशंका जाहिर की कि इन अधिकारियों की देखरेख  में  शायद ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हो सकें।
      ममता बनर्जी का आरोप कि पुलिस अधिकारियों के तबादले भाजपा के इशारे पर किए गए हैं संभवत गलत नहीं लगता है। क्योंकि बंगाल के भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने शनिवार को मुख्यमंत्री का उपहास करते हुए कहा था कि "यह तो अभी शुरुआत है कई और अधिकारियों के तबादले होंगे। मुख्यमंत्री क्यों इतने नाराज हो रहे हैं यह तबादले इसलिए किए जा रहे हैं कि वह चुनाव में पुलिस का उपयोग करना चाहती हैं । उन्होंने आरोप लगाया की पश्चिम बंगाल में कई पुलिस अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की तरफ आचरण करते हैं।" अब यहां एक सवाल उठता है चुनाव आयोग ने बंगाल के पुलिस अफसरों पर जो कार्रवाई की उस कार्रवाई का आधार क्या था और अगर किसी किस्म की सूचना ही उसका आधार थी क्यों नहीं उन नेताओं पर कार्रवाई की जाती है जो लोग खुल्लम खुल्ला ऐसी बातें कहते हैं जो चुनाव आयोग द्वारा आदर्श आचार संहिता के बिल्कुल विपरीत है।  उनके लिए तो रिपोर्ट मांगी जाती है और भी कई तरह की कार्रवाई होती है । जबकि उनके बयान सार्वजनिक रूप से सुने गए हैं ,उन्हें टेलीविजन कैमरों में फिल्माया गया है और उसके बाद डिजिटल मीडिया में भी चलाया गया है। क्यों नहीं उन पर कार्रवाई होती है?  यह केवल पहली बार नहीं हो रहा है हर बार होता है। शायद चुनाव आयोग इन सब बातों को संभवत जानता ही नहीं है या जानबूझकर नजर अंदाज करता है।
             वैसे देश के पहले चुनाव में भी बाहुबल से उसे प्रभावित करने की कोशिश की गई थी और इसके सबूत भी हैं। आधुनिक भारत में चुनाव  में बाहुबल का उपयोग बिना पुलिस बल कि मदद के नहीं हो सकता। लेकिन प्रश्न उठता है कि इन सब संभावनाओं पर पहले क्यों नहीं विचार कर लिया जाता।इस तरह की कार्रवाई का एक और भाव हो सकता है यह कि जानबूझकर राजनीति के लिहाज से होती है। इसका उद्देश्य सरकार राज्य सरकारों को नैतिक रूप से थोड़ा नीचा दिखाना है। इसका असर विपक्षी वोट  पर खुद को बलशाली साबित करने वाला होता है और पुलिस बल को नीचा दिखाने वाला। जहां तक पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान केंद्रीय बलों के उपयोग का सवाल है तो क्या केंद्रीय बलों की शक्ति इतनी नहीं होती कि वह स्थानीय पुलिस को नाजायज करने से रोक सके। इससे स्पष्ट जाहिर होता है की इस तरह के हथकंडे आमतौर पर नैतिक आघात पहुंचाने के लिए अपनाए जाते हैं।

Friday, April 5, 2019

"विरोधी विचार वाले दुश्मन नहीं हैं "

"विरोधी विचार वाले दुश्मन नहीं हैं "

भारतीय जनता पार्टी के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी को नसीहत दी है वह विरोधियों को दुश्मन ना माने। उन्होंने कहा है की राष्ट्रवाद से सियासी असहमति जताने वाले को राष्ट्र विरोधी नहीं माना जाए। वह राष्ट्र विरोधी नहीं हैं। भारतीय लोकतंत्र का मतलब है विविधता और अभिव्यक्ति का सम्मान। पार्टी किसी भी स्तर पर चाहे वो व्यक्तिगत हो या राजनीतिक हर नागरिक को अपने पसंद या नापसंद जाहिर करने की आजादी की तरफदार है और हम उस आजादी को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। भाजपा शुरू से ही मीडिया और अन्य सभी लोकतांत्रिक संस्थानों की स्वतंत्रता और अखंडता की मांग करने में आगे रही है । आडवाणी जी ने एक ब्लॉग में लिखे अपने लेख में कहा है कि "पहले देश है तभी पार्टी है और आखिर में मैं।" यह मेरे जीवन का सिद्धांत है और मैं आजीवन इस सिद्धांत का पालन करने की कोशिश में रहूंगा। आडवाणी जी का यह बयान संजोग वश उस समय आया है जब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तराखंड में एक रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र को देशद्रोही कहा है। उन्होंने कहा कि "राहुल बाबा और राष्ट्र विरोधियों की उनकी टीम बालाकोट हमले के कारण विचलित हो गई है।"
         6अप्रैल को भाजपा का स्थापना दिवस है और इस अवसर पर उन्होंने लिखा है कि स्थापना दिवस के दिन हमें यह मौका मिलता है कि हम पीछे देखें और अपने भीतर देखें। उन्होंने कहा है कि वे  भाजपा के संस्थापक सदस्य  हैं इसलिए इस अवसर पर उन्होंने देश के लोगों से अपने अनुभव को साझा करना अपना कर्तव्य माना है।
       आडवाणी जी के इस ब्लॉग के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया कि उन्होंने  पार्टी का सच्चे अर्थों में मतलब बताया है। प्रधानमंत्री ने अपने ट्वीट में लिखा है कि आडवाणी जी ने भाजपा की मूल भावना को सही तरीके से पेश किया है। सबसे गौर करने लायक वह मंत्र जिस पर पार्टी चलती है , "नेशन फर्स्ट पार्टी नेक्स्ट सेल्फ लास्ट।" प्रधानमंत्री ने लिखा है कि भाजपा का कार्यकर्ता होने पर मुझे गर्व है और इस बात का गर्व है कि आडवाणी जी जैसे महान व्यक्तित्व ने इसे मजबूती प्रदान की है।
        आडवाणी जी का यह लेख खासकर पार्टी स्थापना दिवस के पूर्व एक तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सबक है ।क्योंकि नरेंद्र मोदी अक्सर यह कहते चलते हैं कि राष्ट्र विरोधी और देश के दुश्मन चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी चुनाव ना जीतें।  वे चुनाव सभाओं में कहते हैं कि आतंकवादी और पाकिस्तान चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी इलेक्शन हार जाएं। उन्होंने कहा है कि कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र पाकिस्तान की साजिश है। यही नहीं पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी अक्सर विपक्ष पर आरोप लगाते हैं कि वह पाकिस्तान के पक्ष में काम करता है।  दूसरा अवसर है जब पार्टी के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सार्वजनिक बयान जारी किया है जिसे पार्टी के नेतृत्व के लिए एक संदेश माना जा सकता है। मोदी अमित शाह  के गुट से  आडवाणी  जी का  रिश्ता  उस समय से  अच्छा नहीं रहा जब पार्टी  सत्ता में आई ।   मुरली मनोहर जोशी  तथा  स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेई  सहित उन्हें  पार्टी के  मार्गदर्शक मंडल का सदस्य बनाया गया ।  2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी की भारी पराजय के बाद पार्टी के मार्गदर्शक मंडल ने एक बयान जारी किया था ।इसे  इतना महत्त्व नहीं दिया गया । हालांकि  उस बयान में  कहा गया था कि दिल्ली के बाद बिहार में भारी पराजय मोदी- शाह के नेतृत्व के कारण मिली है। उस समय आडवाणी जी मार्गदर्शक मंडल के प्रमुख थे। उन्होंने कहा था कि, कहने के लिए तो बिहार में पराजय के लिए सभी जिम्मेदार हैं लेकिन यह सही है की हर कोई जिम्मेदार नहीं है। पार्टी की विजय के श्रेय जिन लोगों को मिलता वही इस की पराजय के भी जिम्मेदार हैं। आडवाणी जी के इस बयान पर यशवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी और शांता कुमार के हस्ताक्षर थे। बयान में यह कहा गया था इस पराजय की समीक्षा की जाए। आडवाणी जी के नए बयान पर भाजपा नेता सुधींद्र कुलकर्णी ने कहा है यह 2019 के चुनाव में अब तक का सबसे बड़ा हस्तक्षेप है आडवाणी जी का बयान मोदी और शाह पर एक प्रतिघात है।

गांधीनगर से 6 बार सांसद रहे लालकृष्ण आडवाणी भाजपा के सबसे लंबी अवधि वाले अध्यक्ष थे पार्टी के कई नेताओं ने उन्हें इस बार टिकट नहीं दिए जाने का कारण उनसे उम्र को बताया है। इस बार जब अमित शाह गांधीनगर से अपना परिचय भर रहे थे तो उस समय विशिष्ट रूप से आडवाणी जी के पोस्टर लगे थे शाह बताया कि उनकी उम्मीदवारी आडवाणी जी की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए है।
       आडवाणी जी के नए बयान से संभवत विपक्ष को भाजपा पर हमला करने का एक मसाला मिल गया । क्योंकि इसमें उन विषयों पर भी प्रकाश डाला गया है जिससे भाजपा को आलोचना सुननी पड़ती है ,जैसे लोकतंत्र का सम्मान, लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान और चुनावी कोष की पारदर्शिता तथा बोलने एवं अभिव्यक्ति की आजादी। आडवाणी जी ने आपात स्थिति में भाजपा के संघर्ष का उदाहरण देते हुए कहा है कि लोकतंत्र लोकतांत्रिक परंपराओं सुरक्षा की भावना पार्टी की पहचान हैं ।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक ट्वीट जारी कर कहा है कि यह बयान बहुत महत्वपूर्ण है यकीनन जो विपक्षी   विरोध में बोलते हैं देशद्रोही नहीं है। हम इस  बयान का स्वागत करते हैं।
      यहां एक बात ध्यान देने की है भारतीय राजनीतिक समुदाय में एकता का जो बंधन है जिसके कारण   भारतीय जनता एक होती है वह कहीं से मिलता नहीं है उसे सावधानीपूर्वक तैयार करना होता है और कुछ विरासत,  कुछ आस्था और कुछ स्मृतियां इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह भी ध्यान रखना चाहिए यही विरासत, आस्था और स्मृति जनता को विभाजित भी करती है। आडवाणी जी का यह पत्र लोकतंत्र में उसी विभाजन की प्रक्रिया को अवरुद्ध करने का एक प्रयास कहा जा सकता है।

Thursday, April 4, 2019

बंग भूमि में प्रचार का बवंडर

बंग भूमि में प्रचार का बवंडर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में भारी भीड़ को संबोधित किया। "आपनी केमोन आछेन" के बांग्ला  वाक्य से आरंभ अपने भाषण में उन्होंने कहा कि बंगाल के विकास में स्पीड ब्रेकर लगे हैं इसलिए पूरे देश में जिस गति से विकास हुआ उस गति से बंगाल में नहीं हुआ और बंगाल पीछे रह गया ।   यहां के विकास में भी राजनीति की गई है। प्रधान मंत्री ने कांग्रेस घोषणा पत्र को ढकोसला पत्र बताया। उन्होंने कहा कि बंगाल में दीदी की नैया डूब चुकी है और दीदी तथा कांग्रेस बंगाल में गरीबी खत्म करने का काम कभी नहीं करेंगे।  गरीबी खत्म होते ही इनकी राजनीति खत्म हो जाएगी।  वे विकास पर स्पीड ब्रेकर भी लगाते रहते हैं ।प्रधानमंत्री ने कहा कि दीदी ने बंगाल के सत्तर लाख किसानों को भी  पीएम किसान सम्मान योजना का लाभ नहीं लेने दिया। उनके सामने स्पीड ब्रेकर लगाया। प्रधानमंत्री ने विभिन्न योजनाओं के नाम ले लेकर बताया कि बंगाल में इन योजनाओं को लागू नहीं किया गया है जिसके चलते जनता को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि बंगाल में अब हम नेतागिरी और गुंडागिरी नहीं चलने देंगे, एक ऐसा बंगाल देंगे जो वाम और तृणमूल की गुंडागिरी से मुक्त हो। उन्होंने कहा कि तृणमूल ने वामपंथियों की संस्कृति उधार ली है अब उनको परास्त करने का मौका आया है। इस बार बंगाल में कमल खिल कर रहेगा।
         उधर दिनहटा में अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा और मोदी पर जमकर हमला बोला। ममता जी ने मोदी के निशानों पर ही तंज किया और  बंगाल में किए गए विकास कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने दावा किया कि बंगाल में पिछले 7 वर्षों में तृणमूल सरकार ने जितना विकास किया है उसका भाजपा सरकार को अंदाजा तक नहीं है। ममता बनर्जी ने कहा कि उनके नेतृत्व में पश्चिम बंगाल की किसानों की आज तीन गुना बढ़ी है लेकिन मोदी सरकार के 5 साल में 12000 किसानों ने आत्महत्या की है। इसके साथ ही ममता बनर्जी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा पिछले हफ्ते दिए गए बयान "मोदी जी की सेना" पर भी तंज कसा और कहा हम स्वामी विवेकानंद और रविंद्र नाथ टैगोर की धरती पर पैदा हुए हैं हमें किसी दूसरे से राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। दिल्ली बदलने वाली है और जिस में सबसे बड़ी भूमिका बंगाल की होगी। मोदी चाहे जो भी धमका लें जितना भी धमका लें अब अब वोटर स्ट्राइक होगी जिसमें एक्सपायरी मोदी की विदाई पक्की है।
        प्रचार के इस दौर मैं क्या होगा यह कहना बड़ा मुश्किल है क्योंकि एक ही जगह एक ही बात पर इतने दावे -प्रति दावे, आरोप-प्रत्यारोप आ रहे  हैं कि जनता को समझना मुश्किल है कि इसमें क्या सही है और क्या गलत। सही गलत का विश्लेषण करना बड़ा ही कठिन हो जाता है ।आंकड़ों की बाजीगरी और उन आंकड़ों का अपने तरह से पेश किया जाना अजीब सा लगता है। फिर भी भीड़ जमा होती है और उसके अपने विशेष कारण है तथा हथकंडे हैं । भीड़ देखकर यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता यह सारे के सारे लोग किसी खास नेता की रैली में स्वेच्छा से या स्वान्तःसुखाय  आए हैं । मतदाताओं के विचार और फैसले वोट दिए जाने के क्रांतिक पल पर बदलते हैं। बंगाल में क्या होगा यह तो मतगणना के बाद ही खुलकर सामने आएगा लेकिन जहां तक विशेषज्ञों का मानना है कि  बंगाल में पहले वाली स्थिति शायद नहीं रह जाएगी । लेकिन वर्तमान जमीनी हकीकत को देख कर लगता है की बहुत बड़ा परिवर्तन शायद नहीं हो पाए।

Wednesday, April 3, 2019

कांग्रेस का घोषणा पत्र

कांग्रेस का घोषणा पत्र

कांग्रेस ने मतदाताओं को लुभाने के लिए घोषणा पत्र जारी कर दिया है और इस घोषणापत्र में 52 विषयों पर 487 वादे किए गए हैं। साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने वादा किया है इन सभी वादों को पूरा किया जाएगा। यदि यह घोषणाएं सचमुच पूरी की जाती है तो इससे सबसे ज्यादा लाभ देश के उन 5 करोड़ से ज्यादा गरीब परिवारों को मिलेगा जिन्हें हर साल 72000 रुपए दिए जाने की घोषणा की गई है। इसमें ग्रामीण स्तर पर लाखों नौजवानों को रोजगार देने, राफेल एवं भ्रष्टाचार के मामलों जांच कराने और अनुसूचित जाति-जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों  एवं महिलाओं के विकास के लिए कई कदम उठाने के आश्वासन दिए गए हैं। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि जम्मू कश्मीर में धारा 370 सहित उसकी संवैधानिक कोई बदलाव नहीं होने दिया जाएगा और देशद्रोह कानून खत्म कर दिया जाएगा।
       घोषणा पत्र पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने कहा कि घोषणा पत्र देश को तोड़ने का एजेंडा है। इसमें  नासमझी से ऐसे वादे किए गए हैं जिन्हें लागू नहीं किया जा सकता और "कुछ विचार" तो बेहद खतरनाक है जो देश को "बाल्कनीकरण" की ओर धकेल देगा। 
       कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र को जन आवाज़ का नाम दिया है । कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने घोषणा पत्र जारी किए जाने के बाद कहा कि केंद्र सरकार में 22 लाख पद खाली पड़े हैं अगर कांग्रेस सत्ता में आई 31 मार्च 2020 तक इन पदों में बहाली कर दी जाएगी। इसके अलावा देश की सभी ग्राम पंचायतों में 10 लाख नौजवानों को रोजगार मिलेगा। राहुल गांधी ने इस घोषणापत्र में देश के सभी वर्गों को साधने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि "मेक इन इंडिया" के तहत जो भी नौजवान उद्यमी बनना चाहते हैं उसे वर्तमान में कई विभागों से मंजूरी लेनी पड़ती है लेकिन कांग्रेस जब सत्ता में आएगी तो कारोबार करने की चाहत रखने वाले नौजवानों को 3 वर्षों तक किसी भी तरह की कोई मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होगी। राहुल गांधी ने मनरेगा को 100 दिन से बढ़ाकर डेढ़ सौ दिन तक रोजगार देने का वादा किया है। उन्होंने वादा किया है कि शिक्षा के क्षेत्र में छह प्रतिशत खर्च किया जाएगा। इसके अलावा बड़े अस्पतालों में गरीबों के लिए कार्य योजना बनी है। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई तो किसानों के लिए अलग से बजट बनेगा और  कर्ज नहीं चुका पाने वाले किसानों को अपराध की श्रेणी से बाहर लाया जाएगा।
     कांग्रेस की सरकार बनने पर क्या प्रधानमंत्री राहुल गांधी होंगे इस सवाल का उत्तर देते हुए राहुल गांधी ने कहा यह देश की जनता तय करेगी। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की ओर प्रश्न का रुख करने पर राहुल का जवाब था कि देश में सभी हिंदू हैं और  बात हिंदू और मुसलमान पर नहीं बात बेरोजगारी ,राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति जैसे मामलों पर  होनी चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहस की चुनौती दी और कहा कि पीएम प्रेस से सीधी बात करने में कतराते हैं। केरल के वायनाड से चुनाव लड़ने का औचित्य बताते हुए राहुल गांधी ने कहा कि दक्षिण भारत में लोग सोचते हैं नरेंद्र मोदी सरकार में उनकी कोई हिस्सेदारी नहीं है इसलिए उन्होंने  तय किया कि वे उनका हिस्सा बनकर उनके साथ खड़े रहेंगे। जहां तक जहां तक कानून को खत्म करने की बात है उसके लिए जो संविधानिक आवश्यकताएं होती हैं, क्या कांग्रेस को चुनाव के बाद वह सब हासिल होगी?
        कांग्रेस घोषणा पत्र को ध्यान से देखा जाए तो कुछ घोषणाएं ऐसी हैं जैसे लगता है कि वह भी इंदिरा गांधी वाले हथकंडे अपना रहे हैं ,खासकर वह जिसे इंदिरा जी ने  इमरजेंसी के बाद अपनाया था- "गरीबी हटाओ" का नारा। बेशक पार्टी ने अपने घोषणापत्र में मुख्य रूप से देश की गरीबी को केंद्र बनाया है लेकिन एक प्रश्न है कि पार्टी ने उस समय यह सब क्यों नहीं किया जब वह सत्ता में थी। अच्छा होता कि पार्टी यह बताती कि वह अतीत में गरीबों को क्यों नहीं मदद कर सकी और भविष्य में ऐसी गलती नहीं होगी इसके लिए देश को आश्वस्त करती। लेकिन चुनाव घोषणा पत्र तो इस तरह के वादों के  दस्तावेज हैं और अपने देश की जनता कई सालों से बड़े-बड़े वादों को देख- सुन कर ऊब चुकी है। 

Tuesday, April 2, 2019

अंतरिक्ष में भारतीय जासूस

अंतरिक्ष में भारतीय जासूस

भारत ने सोमवार को अंतरिक्ष में एक भारतीय जासूस को प्रक्षेपित किया। यह "मिशन शक्ति" के बाद भारत की यह सबसे बड़ी सफलता थी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने पीएसएलवी सी 45 से पहली बार तीन विभिन्न कक्षाओं में उपग्रहों को स्थापित किया। स्थापित किए जाने का यह कार्य लगभग तीन घंटे में पूरा हो गया। इन 3 उपग्रहों में सबसे महत्वपूर्ण था भारत का खास जासूस उपग्रह एमीसेट और उसके साथ विदेशों के 28 नैनो उपग्रह भी थे। यह डीआरडीओ का इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस उपग्रह है और उसके साथ जो स्थाई नैनो थे वह लिथुआनिया स्पेन स्विट्जरलैंड तरीका के हैं । इनका  प्रक्षेपण वाणिज्य कार्यक्रम के तहत किया गया। इसरो ने एक साथ तीन अलग-अलग कक्षाओं में सेटेलाइट को स्थापित करने का इस बार इतिहास रचा है । इतिहास इसलिए कहा जा रहा है कि अब तक प्राइमरी सैटेलाइट को कक्षाओं में ले जाया जाता था और उनसे जुड़े अन्य उपग्रहों को बाहर दाग दिया जाता था। अब ऐसा नहीं किया गया है। इस सेटेलाइट ने 504 किलोमीटर की ऊंचाई से पृथ्वी का पूरा एक चक्कर लगाया है इसमें दोनों ध्रुव भी शामिल हैं। इस सेटेलाइट की सबसे बड़ी खूबी है कि इसका जो रॉकेट है वह तीन विभिन्न दिशाओं में सैटलाइट को दाग सकते हैं। दूसरी बात है कि इसके रॉकेट का दूसरा   ,चौथा और  अंतिम स्टेज खुद-ब-खुद उपग्रह की तरह थोड़ी देर तक काम करेंगे तब कहीं जाकर बेकार होंगे। इस रॉकेट में 4 स्ट्रैप ऑन मोटर लगे हैं जो मूल राकेट का वजन तो बढ़ाते नहीं है लेकिन उसकी क्षमता जरूर बढ़ा देते हैं।
          रॉकेट आमतौर पर एक तरह से वाहक की तरह होता है। एक बार यह अपने उपग्रहों को कक्षा में स्थापित कर देता है तो उसके बाद इसका कोई उपयोग नहीं रह जाता और अंतरिक्ष में कूड़े की तरह पड़ा रहता है। विगत कुछ वर्षों से इसरो इस बात पर विचार कर रहा था कि रॉकेट में कुछ जान डाल दी जाए, खास करके इसके सबसे ऊपर वाले हिस्से में या फिर निम्नतम हिस्से में जो उपग्रहों के दागे जाने तक कायम रहे। रॉकेट के चौथे स्टेज में 3 तरह के इक्विपमेंट लगे होते हैं। इन में से कुछ माप तोल और प्रयोग भी किए जा सकते हैं। रॉकेट में लगा सोलर पैनल इन्हें ऊर्जा देता है और इसके माध्यम से जमीनी केंद्र से संचार चलता रहता है। इसका उपयोग जल पोतों से भेजे गए संदेशों को सुनने में भी किया जा सकता है। लेकिन सबसे बड़ी मजबूरी है कि चौथे स्टेज  का जीवन बहुत लंबा नहीं होता। यह कुछ महीनों तक ही चलता  है। हो सकता है आगे चलकर इस प्रकार के कक्षाओं में स्थापित प्लेटफार्म छोटे-छोटे उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने का काम कर सकते हैं।
         एमीसेट सैटेलाइट कई मायनों में भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है । यह दुश्मन देशों पर नजर रखने में अहम भूमिका निभाएगा। भारत जुलाई-अगस्त में अपने नए स्मॉल सैटलाइट लॉन्च व्हीकल (एस एस एल वी) रॉकेट से दो या ज्यादा रक्षा उपग्रहों को भी प्रक्षेपित करेगा । रक्षा सूत्रों के मुताबिक भारत लगभग 6 या 7 रक्षा उपग्रह बना सकता है।
      भारत का यह इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सेटेलाइट हमारी सीमा पर इलेक्ट्रॉनिक या किसी भी तरह की मानवीय गतिविधियों पर नजर रखेगा । यह सीमा पर सेटेलाइट रडार और सेंसर की मदद से हर हरकत पर नजर रखेगा। यही नहीं यह सैटेलाइट रात के अंधेरे में भी तस्वीर भी खींचता है।  देश में विकसित 436 किलोग्राम के इस सेटेलाइट से भारतीय निगरानी मजबूत होगी और पृथ्वी की 749 किलोमीटर ऊंची कक्षा में स्थापित होने के कारण यह रडार नेटवर्क की भी निगरानी कर सकेगा। यह सैटेलाइट अंतरिक्ष में विद्युत चुंबकीय तरंगों की जांच कर सकता है। इससे दुश्मन के हथियारों और सैन्य पूंजी के बारे में भी पता लगाया जा सकेगा। बदलते जिओ स्ट्रैटेजिक परिवेश में भारत की उपलब्धि सचमुच महत्वपूर्ण है। कम से कम भारत अपने को अपने दुश्मनों और रात में चलने वाले विरोधी सैनिक कार्रवाई पर नजर रखने में सक्षम तो हो सकता है । जिन वैज्ञानिकों ने इसे बनाया उन्हें साधुवाद । कम से कम राष्ट्र की सुरक्षा के लिए उन्होंने अंतरिक्ष में  ऐसा जासूस तो स्थापित कर दिया जिसे पकड़े जाने का कोई खतरा नहीं है और ना ही जिस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद पैदा करने के अवसर मिल सकते हैं।