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Thursday, July 4, 2019

राहुल गांधी का इस्तीफा

राहुल गांधी का इस्तीफा

राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। उन्हें ऐसा नहीं करने के लिए कांग्रेसियों ने बहुत दबाव डाला यहां तक कि एक कार्यकर्ता ने आत्मदाह की धमकी दे डाली, पर राहुल अपनी बात पर कायम रहे।  अंततोगत्वा बुधवार की दोपहर उन्होंने औपचारिक तौर पर पद त्याग दिया। इसके बाद उन्होंने त्यागपत्र को ट्वीट किया । उनके त्यागपत्र को पढ़ने से उनके फैसले के बारे में बहुत कुछ समझ में आता है। सबसे पहले ऐसा लगता है कि विपक्ष का एक असहाय नेता चारों तरफ से ठगा हुआ महसूस कर रहा है। राहुल गांधी के पत्र से यह स्पष्ट होता है कि वे अपने पार्टी कार्यकर्ताओं, चुनाव आयोग, अन्य संस्थानों तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सर्वव्यापी प्रभाव से आतंकित है ।
         राहुल गांधी के त्यागपत्र को पढ़ने से  ऐसा  लगता है  कि वह  महसूस करते हैं  कि यह पद त्याग उनके परिवार द्वारा दी गई एक और कुर्बानी है। पहले इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने देश के लिए स्वयं का जीवन कुर्बान कर दिया था। यही नहीं उनकी मां  सोनिया गांधी ने 2014 में प्रधानमंत्री नहीं बनने का फैसला कर एक तरह की कुर्बानी ही दी थी। कुर्बानी का यह भाव उनके चार पृष्ठ के पत्र की अंतिम कुछ पंक्तियों में साफ झलकता है। उन्होंने लिखा है कि है "भारत की आदत है कि जो शक्तिशाली है वह सत्ता पर काबिज रहेगा। कोई भी व्यक्ति सत्ता को त्यागना नहीं चाहता।" हमने भी  कुर्बानी दी है। अपने विपक्षी को पराजित नहीं कर सकते । मैं एक कांग्रेसी की तरह पैदा लिया हूं और पार्टी मेरे खून में है तथा हमेशा कायम रहेगी।
         अन्य विपक्षी नेताओं की तरह राहुल गांधी ने ईवीएम मशीन पर सवाल नहीं उठाया है बल्कि चुनाव में निष्पक्षता के संबंध में अपने संदेह को स्पष्ट किए हैं। उन्होंने कहा है कि कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ नहीं लड़ा बल्कि उसने भारतीय शासन के संपूर्ण तंत्र से मुकाबला किया है। यही नहीं राहुल गांधी ने समस्त पैरोकारों, जैसे स्वतंत्र प्रेस, स्वतंत्र न्यायपालिका और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाया है। उन्होंने लिखा है अब से यह एक खतरा है कि चुनाव भारत के भविष्य का निर्णय नहीं करेगा यह एक रस्म बनकर रह जाएगा। राहुल गांधी ने लिखा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य संस्थानों के खिलाफ जोर आजमाया और ऐसे मौके पर मैंने खुद को अकेला पाया और मैं इसके लिए गौरवान्वित हूं। उन्होंने लिखा है कि उनके साथियों ने इस जंग में उनका साथ नहीं दिया। इस चुनाव में पराजय के लिए कई लोग जिम्मेदार हैं।
         राहुल गांधी ने अपने पत्र में इतना कुछ लिखा है, कई लोगों को जिम्मेदार बनाया है लेकिन उन्होंने इसमें कहीं भी यह नहीं लिखा कि उनकी तरफ से भी कुछ ग़लतियां हुई हैं। राहुल गांधी ने अपनी पार्टी के लोगों पर दोष लगाए हैं, संघ, प्रधानमंत्री ,भाजपा के आर्थिक संसाधनों और विभिन्न संस्थानों को दोषी बताया है। लेकिन   कहीं भी यह नहीं बताया कि उनकी क्या गलती थी।  हो सकता है कि राफेल सौदे को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया जाना गलत रहा हो ,लेकिन राहुल ने इसे नहीं स्वीकारा है। पार्टी के जो नेता यह चाहते हैं कि राहुल गांधी इस इस्तीफे को वापस ले लें उन्हें इन पंक्तियों का अर्थ समझना चाहिए। राहुल ने कहा है कि वे  कांग्रेस के आदर्श के लिए पूरी ताकत से अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। उन्होंने यह भी  लिखा है की वे पार्टी के मामलों में सक्रियता से जुड़े रहेंगे ,"मैं हमेशा उपलब्ध हूं जब पार्टी को मेरी सेवा की जरूरत पड़ेगी।" राहुल गांधी का त्यागपत्र बताता है कि भविष्य में कई कठोर निर्णय लेने होंगे।
          सब कुछ मिला कर ऐसा लगता है राहुल गांधी में  तनाव के साथ साथ  उम्मीदें भी कायम हैं।

Wednesday, July 3, 2019

नहीं चलेगी दबंगई

नहीं चलेगी दबंगई

भाजपा संसदीय दल को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने आकाश विजयवर्गीय की घटना का परोक्ष उल्लेख किया और उस पर अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि बेटा चाहे जिस किसी का भी हो दबंगई नहीं बर्दाश्त की जाएगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि हमला बिलकुल अमान्य और अनुचित है । उन्होंने कहा कि जिन्होंने भी इस घटना के दौरान या जेल से छूटने पर आकाश विजयवर्गीय का  स्वागत किया है उन्हें भाजपा से तत्काल बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए।
        यह घटना इंदौर की है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र एवं विधायक आकाश विजयवर्गीय ने इंदौर में एक मकान तोड़े जाने की घटना को रोकने के लिए एक पालिका अधिकारी पर हमला कर दिया और क्रिकेट के बल्ले से उसकी जमकर धुनाई की। बाद में उन्होंने ट्वीट किया कि किसी भी सूरत में भ्रष्टाचार नहीं चलने दिया जाएगा और इसे रोकने के लिए  आवेदन,  निवेदन और दनादन होगा। आकाश विजयवर्गीय की इस करतूत को टीवी कैमरे में कैद कर लिया गया था और उसे जम कर दिखाया गया। बात का बतंगड़ बन गया। आकाश विजयवर्गीय ने कहा कि वह पहली बार जेल गए थे लेकिन जेल में सब कुछ  ठीक था जेल अच्छी थी और तजुर्बा भी अच्छा रहा। उन्होंने कहा कि वह भगवान से प्रार्थना करते हैं कि दोबारा ऐसा ना हो। हम गांधीजी के बताए रास्ते पर चलने की कोशिश करेंगे।
        इस घटना पर प्रधानमंत्री ने कहा कि इस तरह के आचरण बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे और जो लोग इसकी प्रशंसा कर रहे हैं उन्हें भी सजा दी जाएगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कौन किसका लड़का है और आकाश किसका लड़का है। ऐसे लोगों को पार्टी से निकाला जाएगा। उन्होंने आकाश विजयवर्गीय की जेल से रिहाई पर स्वागत में फायरिंग घटना पर भी रोष जाहिर किया।
           भाजपा के महासचिव और आकाश विजयवर्गीय के पिता कैलाश विजयवर्गीय ने सोमवार को इस घटना दुर्भाग्यजनक बताया और कहा की उनके पुत्र ने एक गरीब परिवार के समर्थन में यह कदम उठाया था ना कि एक बिल्डर के समर्थन में। उन्होंने कहा कि उनका पुत्र और पालिका अधिकारी दोनों ही नए खिलाड़ी थे । हालांकि, इस घटना को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया गया और प्रचारित किया गया।
         यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि यह पहला मौका नहीं है जब प्रधानमंत्री ने इस तरह की अनुशासनहीनता की घटना पर नाराजगी जाहिर की हो। इसके पहले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह पर भी प्रधानमंत्री और अमित शाह भड़के थे। गिरिराज सिंह ने 2014 के चुनाव अभियान के दौरान झारखंड के गोड्डा में कह दिया था कि जो नरेंद्र मोदी के आलोचक हैं वे पाकिस्तान चले जाएं । इस पर नरेंद्र मोदी ने बहुत रोष जाहिर किया था।  पिछले महीने भी गिरिराज सिंह ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बारे में इफ्तार पार्टी में शामिल होने को लेकर  कुछ अशोभनीय कहा था और उस पर भी मोदी जी ने नाराजगी जाहिर की थी। यही नहीं, 2015 में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा था कि मुसलमान है रह सकते हैं  इस देश में पर उन्हें गोमांस नहीं खाना होगा। यह कथन उत्तर प्रदेश में अखलाक की लिंचिंग के बाद का है। मोदी जी ने इस पर भी बहुत नाराजगी जाहिर की थी। साध्वी प्रज्ञा के एक बयान पर भी मोदी जी काफी आगबबूला हुए थे । इनके अलावा  अनंत हेगड़े, मेनका गांधी इत्यादि कई हैं जिनकी कथनी और करनी पर मोदी जी ने गुस्सा जाहिर किया था लेकिन किसी पर भी आज तक कोई करवाई नहीं हुई। मोदी जी के आलोचक खासकर कांग्रेस पार्टी इस गुस्से को दिखावा कह रही है।
        इसके बावजूद मोदी जी का यह कदम सराहनीय है। वरना भारत की संस्कृति उन्मुख राजनीति के परिप्रेक्ष्य में  सामाजिक विकास का आकलन करें तो  निष्कर्ष का प्राप्त होगा की ताकतवर लोगों द्वारा इस प्रकार की घटनाओं को अंजाम दिया जाना कोई बड़ी बात नहीं है। उल्टे इससे समाज में रुतबा बढ़ता है। ऐसी सोच के मध्य प्रधानमंत्री का नाराजगी जाहिर करना सकारात्मक संकेत है। ऐसे कदमों से निरंकुश राजनीति में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।

Tuesday, July 2, 2019

कश्मीर समस्या के हल की ओर सरकार का प्रयास

कश्मीर समस्या के हल की ओर सरकार का प्रयास

कश्मीर में अगले 6 महीने के लिए राष्ट्रपति शासन को संसद ने सोमवार को मंजूरी दे दी। इस दौरान सरकार ने कहा के यदि चुनाव आयोग कश्मीर में चुनाव कराने का निर्णय करेगा तो इस साल के अंत तक  चुनाव करा दिए जायेंगे। कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने का यह प्रस्ताव लोकसभा में 28 जून को ही पारित हो गया था। कश्मीर में जून 2018 से ही राष्ट्रपति शासन है। यह उस समय लगाया गया था जब वहां महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ भारतीय जनता पार्टी ने अपना संबंध तोड़ लिया था और सरकार गिर गई थी। राज्यसभा में जम्मू कश्मीर आरक्षण विधेयक 2004 में संशोधन भी पारित हो गया।
         गृहमंत्री अमित शाह ने दिन भर की लंबी बहस का जवाब देते हुए कहा, सरकार जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ा कर  खुश नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार वहां रिमोट कंट्रोल से शासन करना नहीं चाहती है, लेकिन चंद मुश्किलों के कारण यह उपाय करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव एक साथ नहीं कराए जा सकते क्योंकि ऐसी स्थिति में  वहां  लगभग 1000  उम्मीदवार  खड़े होंगे  और सुरक्षाबलों ने  उम्मीदवारों को सुरक्षा देने में अक्षमता जाहिर की है । अमित शाह के मुताबिक देशभर में तनाव के कारण पहले से ही सुरक्षा बल काफी उबे हुए हैं। विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद पर प्रहार करते हुए श्री शाह ने कहा कि वे चुनाव का वक्त तय नहीं करते यह तो चुनाव आयोग करता है । उन्होंने कहा कि, "आप की तरह हम चुनाव का वक्त नहीं तय करते हैं। अगर हम ऐसा करेंगे तो आप ही कहेंगे कि हम चुनाव आयोग को भी नियंत्रित कर रहे हैं । "उन्होंने आगे कहा हमारे पास राज्य सरकारों की कमी नहीं है देशभर में हमारी सरकारें हैं। चुनाव नहीं कराने का केवल सुरक्षा ही एकमात्र कारण है । राज्य प्रशासन और सुरक्षाबलों ने ही अभी वहां चुनाव नहीं कराने की सलाह दी थी।
इसके पूर्व लोकसभा में 28 जून को अपने संबोधन में गृह मंत्री ने कहा कि जम्मू कश्मीर में कांग्रेस ने सभी पार्टियों से ज्यादा राष्ट्रपति शासन लगाया है और इसे लोकतंत्र के बारे में बात करने का अधिकार नहीं है। इसके पूर्व अमित शाह ने कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव पेश किया था।
       राज्यसभा में कांग्रेस की खिंचाई करते हुए अमित शाह ने कहा की मोदी सरकार जम्मू कश्मीर में ही नहीं देशभर में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की इच्छुक थी।  केवल आप लोग नहीं तैयार हो रहे हैं। अगर आप तैयार होते हैं तो मैं विधेयक कल ही पेश कर दूंगा। श्री शाह ने कहा यदि सदन के सभी सदस्य कश्मीर को देश का हिस्सा मानते हैं तो मुझे खुशी होगी। उन्होंने कहा कि कश्मीर को भारत से कभी अलग नहीं किया जा सकता। मोदी सरकार आतंकवाद को बरदाश्त बिल्कुल नहीं करेगी और वह जम्मू , कश्मीर और लद्दाख में समान विकास करने की इच्छुक है । उन्होंने कहा कि जन केंद्रित सभी योजनाएं चाहे व राज्य सरकार की हों या फिर केंद्र सरकार की जम्मू और कश्मीर के हर गांव में पहुंचती हैं, यहां तक कि राष्ट्रपति शासन के बाद भी । उन्होंने कहा इससे जम्हूरियत इंसानियत और कश्मीरियत का उद्देश्य जाहिर होता है। मोदी सरकार की जम्हूरियत इंसानियत और कश्मीरियत के प्रति प्रतिबद्धता से यह नहीं समझना चाहिए कि जो ताकतें भारत को विभाजित करना चाहती हैं उन ताकतों को बख्श दिया जाएगा, श्री शाह ने कहा उन्हें उनकी ही भाषा में उचित उत्तर दिया जाएगा।
          गृह मंत्री ने यह भी कहा कि कांग्रेस को अपने ऐतिहासिक गलतियों का उत्तर देना होगा। हम इतिहास से सीखते हैं और कांग्रेस को अपने ऐतिहासिक गलतियों का उत्तर देना ही होगा। उसे बताना होगा कि जवाहरलाल नेहरू कश्मीर के मामले को लेकर राष्ट्र संघ में क्यों गए जबकि कश्मीर भारत में मिलने को तैयार था? जवाहरलाल नेहरू जनमत संग्रह के लिए क्यों तैयार हुए? उन्होंने यह भी  कहा कि भारत में यह समस्या 70 वर्ष के बाद भी कायम है। इसलिए हमारे लिए जरूरी है कि हम इसकी समीक्षा करें और नया नजरिया अपनाएं हम विकास चाहते हैं। लेकिन, इसमें अलगाववादियों तथा आतंकवादियों के लिए कोई जगह नहीं है । गृहमंत्री ने जम्मू कश्मीर आरक्षण विधेयक 2004 में संशोधन विधेयक प्रस्तुत करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमा से 10 किलोमीटर की दूरी पर रहने वालों को शैक्षिक संस्थानों तथा सरकारी नौकरियों में 3% आरक्षण दिया जाए। इसके पूर्व यह सुविधा जम्मू कश्मीर में नियंत्रण रेखा के 6 किलोमीटर के भीतर रहने वालों युवकों के लिए थी। अब यह सुविधा अंतरराष्ट्रीय सीमा के समीप रहने वालों के लिए भी उपलब्ध होगी।
        इन सबके बावजूद कश्मीर की जमीनी हालात यह बताते हैं कि वहां कट्टर इस्लाम सिर उठा रहा है जिसका सरकार को कड़ाई से मुकाबला करना पड़ेगा। भारत बहुसंख्यक वादी देश नहीं है लेकिन जम्मू-कश्मीर बन चुका है और इसमें अलगाववाद एक गंभीर समस्या छिपी हुई है। सरकार का उद्देश्य उस समस्या का विश्लेषण कर उसका हल ढूंढना सबसे जरूरी है। बेशक आरक्षण विधेयक, राष्ट्रपति शासन की अवधि को बढ़ाया जाना इस समस्या के संधान के  उपाय जरूर हैं।

Monday, July 1, 2019

जल संरक्षण कर जीवन बचाएं , क्योंकि भव इत्यच्युते रूपं भवस्य परमात्मनः

जल संरक्षण कर जीवन बचाएं , क्योंकि

भव इत्यच्युते रूपं भवस्य परमात्मनः

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे दौर के कार्यकाल के पहले मन की बात में जल संरक्षण पर बल दिया और कहा कि मीडिया से लेकर धार्मिक संगठनों तक इसे जन आंदोलन का स्वरूप बनाएं।  उन्होंने इसी के साथ अपील की कि जल संरक्षण के पारंपरिक संगठन और  इस काम में जुटे लोगों , गैर सरकारी संगठनों के बारे में जानकारी साझा करें ताकि एक डेटाबेस तैयार किया जा सके। मन की बात में प्रधानमंत्री ने जल संरक्षण की महत्ता बताते हुए कहा कि हमारे देश में वर्षा का जल केवल 8% ही संरक्षित किया जाता है।
       कैसा संजोग है  कि रविवार को ही देवाधिदेव महादेव के दर्शन के लिए अमरनाथ की यात्रा का पहला जत्था "बम- बम भोले" के    उद्घोष के साथ रवाना हुआ। अगर जल संरक्षण के संदर्भ में इस यात्रा को देखें तो बड़ा अजीब संजोग दिखेगा। शिव पुराण में जल संरक्षण की महत्ता बताते हुए कहा गया है :
       संजीवनं समतस्य जगतः सलिलात्कम ।
       भव इत्यच्युते रूपं भवस्य परमात्मनः ।।
सचमुच सत्य है कि जल शिव स्वरूप है। जल हमारी प्रकृति की अनमोल धरोहर है । पानी के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। पीने के लिए शुद्ध जल हमारे लिए जरूरी है। आंकड़े बताते हैं की धरती का दो तिहाई भाग जल से भरा हुआ है लेकिन तब भी पीने का शुद्ध पानी नहीं है। 97% जल महासागर  है वह खारे पानी के रूप में है। 2% जल पहाड़ों पर जमी हुई है  के रूप में है। सिर्फ 1% जल मनुष्य जाति के लिए उपलब्ध है। इसलिए जरूरी है कि हम पानी का मूल्य समझें। पानी अगर नहीं बचाया जाएगा, उसका संरक्षण नहीं किया जाएगा तो भविष्य में महा संकट उत्पन्न  हो जाएगा। आज प्रधानमंत्री कोई अपील करनी पड़ रही है कि पानी की हिफाजत करें। अब तक हम ऐसा क्यों नहीं कर पाए? आजादी के बाद से अब तक सरकारों ने इस मसले को प्राथमिकता क्यों नहीं दी? आज लोगों को पीने के चुल्लू भर पानी के लिए भटकना पड़ रहा है या खरीदकर पीना पड़ रहा है। पानी के टैंकर से पानी हासिल करने के लिए घंटों कतार में खड़ा होना पड़ता है। चारों तरफ हाय हाय मची हुई है। तालाब- नदियां सूख रहीं है, पेड़ पौधे सूखते जा रहे हैं। जल की कमी से कृषि चौपट हो रही है। जो आने वाले दिनों में भयानक अन्न संकट के रूप में उपस्थित होगा न पानी मिलेगा न खाने को मिलेगा। कैसी होगी हमारी मातृभूमि? क्या स्वरूप होगा हमारी इस शस्य  श्यामला धरती का? यह भयानक सवाल हमारे सामने है। और जो कुछ भी हुआ है उसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
शतपवित्रा: स्वध्या मदंतीर्देवीदेवनामपि यन्ति पाथः
ता इन्द्रस्य न मिनन्ति व्रतानि सिंधुभ्यो हणयं घृतवज्जुहोत हण्यं 
जल का संकट हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहा है लेकिन लेकिन हम लापरवाह हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री को यह बताने की जरूरत पड़ रही है पानी बचाइए। उसकी हिफाजत कीजिए। यहां सबसे पहला सवाल है इस संकट के लिए जिम्मेदार कौन है? इसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। हमने अपनी विरासत को, हमने अपनी परंपरा को त्याग दिया और लापरवाही से जल को बर्बाद करने लगे। जल स्रोतों का दोहन करने लगे। जल का अपव्यय होने लगा। यह एक आदत बन गई। हमारे देश में बढ़ती जनसंख्या के साथ जब जल अपव्यय बढ़ता गया कुआं नलकूप और तालाबों जैसे जल स्रोतों का भयंकर दोहन होने लगा तो धरती का जलस्तर गिरने लगा। औद्योगिकरण के फलस्वरूप कल कारखानों से निकला दूषित जल हमारी नदियों और जल स्रोतों को दूषित करने लगा। जल स्रोत दूषित हुए तो पीने के पानी का अभाव होता गया। धीरे-धीरे वह संकट के रूप में हमारे सामने उपस्थित हुआ।
          हमारे पुरखे जल- नदी -पर्वत की पूजा करते थे। उन्हें यह सब विरासत में मिला था। लेकिन हम उस विरासत को संभाल नहीं पाए। जरा सोचिए हम अपने भविष्य को क्या दे रहे हैं ? पानी की दो बूंद के लिए तरसती जिंदगी! अभी भी समय है। गांव व शहरों में जिन जल स्रोतों की लंबे अरसे से अनदेखी करते आए हैं उसे संभालने की जरूरत है। सभी एकजुट होकर जल स्रोतों की चिंता में लगें तभी जल संकट से राहत मिल पाएगी। हमने अंधाधुंध विकास के नाम पर प्रकृति के साथ अन्याय किया। संसाधनों को समाप्त कर कंक्रीट के जंगल बिछा दिए गए। उधर, सरकारों ने कुछ ऐसी उम्मीद दिखाई कि जनता ने यह सारी जिम्मेदारी अपने कंधे से उतार कर सरकारों को दे दी। हमने इसे अधिकार मान लिया, जो कभी कर्तव्य हुआ करता था। प्रधानमंत्री ने लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपने धन्यवाद प्रस्ताव में एक बात बड़ी महत्व की कही थी कि हम अधिकार नहीं कर्तव्य को देखें। अपने कर्तव्य को पहचाने। मेरा कर्तव्य था सरकारों में उसे अधिकार में तब्दील कर दिया और सरकारें जब योजनाएं बनाती थी तो वहां भी लोगों के स्वार्थ आड़े आ जाते थे। अब जरूरत है हमारे पुराने जल स्रोतों का पुनरुद्धार किया जाए और इसके लिए हम सरकार का मुंह नहीं देखें। हम इसे अपना कर्तव्य समझकर मिलजुल कर यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लें। जल स्रोतों की हिफाजत के लिए भागीदारी सुनिश्चित किए जाने की बड़ी जरूरत है ।नारद पुराण में कहा गया है यदि मनुष्य परोपकारी ना हो तो वह मरे हुए के समान है । जल का संरक्षण ना केवल परोपकार है बल्कि हम अपने भविष्य के लिए, अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसी धरोहर की व्यवस्था कर रहे हैं जो उनके अस्तित्व के लिए ,उनकी प्राण रक्षा के लिए अनिवार्य है।
       वैश्वानरो यस्वग्निः प्रविष्टस्ता आपो देवीरिह मामवन्तु 
       

Sunday, June 30, 2019

शाह की कश्मीर यात्रा

शाह की कश्मीर यात्रा

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पिछले हफ्ते कश्मीर यात्रा पर गए थे और उनकी इस यात्रा से बड़े कठोर संकेत प्राप्त हो रहे हैं। खास करके, विभिन्न राजनीतिक दलों में अलगाववादियों और उनके मददगार तथा उनके समर्थकों के लिए दिल्ली लौटने से पहले शाह ने कश्मीर की पुलिस और वहां तैनात सुरक्षाबलों को निर्देश दिया कि आतंकवाद और आतंकवादियों  को बिल्कुल बर्दाश्त ना करें और कहा कि आतंकवादियों को धन मुहैया कराने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई जारी रहेगी। शाह ने पुलिस ,नागरिक प्रशासन , और  सुरक्षाबलों के  वरिष्ठ अधिकारियों के साथ सुरक्षा समीक्षा की। उस बैठक में स्पष्ट कहा कि कानून का शासन लागू किया जाना चाहिए। शाह की दो दिवसीय कश्मीर यात्रा के दौरान कश्मीर के दो बड़े व्यापारी परिवारों पर आयकर के छापे जारी रहे। इनमें एक परिवार नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ है और दूसरा कांग्रेस के साथ। इनमें से एक अब्दुल रहीम राठर परिवार के जम्मू और कश्मीर में 5 परिसरों पर छापे पड़े। अब्दुल रहीम और उनके रिश्तेदार शफी उड़ी नेशनल कॉन्फ्रेंस के बड़े नेता हैं और उन्हें फारुख अब्दुल्ला के बाद माना जाता है। यह दोनों 70 के बाद से कश्मीर के वित्त मंत्री भी रह चुके हैं।
            राठर 1977 में राजनीति में आए और तब से 2014 के बीच उसने 7 विधानसभा चुनाव जीते हैं। यहां तक कि हाल के लोकसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस के अब्दुल्ला ने जो सत्तर हजार मतों की बढ़त पाई है उनमें से दस हजार वोट राठर के चरार ए शरीफ क्षेत्र के हैं।
          दूसरे बड़े नेता है जनक राज गुप्ता। जनक राज की मृत्यु सितंबर 2015 में हुई। तब तक वे कांग्रेस के बहुत बड़े नेता रहे और कई बार लोकसभा तथा विधान सभा के सदस्य भी रहे। जब गुलाम नबी आजाद मुख्यमंत्री थे तो वे उनके सलाहकार हुआ करते थे। यही नहीं, हाल के दिनों में आयकर विभाग में जम्मू और कश्मीर में प्रभावशाली लोगों के व्यापारिक संस्थानों पर कई छापे मारे। जिन लोगों पर छापे मारे गए उनमें से कुछ पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के बड़े नेताओं के करीबी रिश्तेदार भी शामिल हैं। मजे की बात है कि पीपुल्स कॉन्फ्रेंस  महबूबा मुफ्ती की पार्टी है जो भाजपा के साथ कश्मीर में सरकार बना चुकी है।  अमित शाह  के लौटने के बाद नई दिल्ली से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह छापे सामान्य थे और इनका उद्देश्य आतंकवाद को दिए जाने वाले धन को रोकना था। वैसे राठर और गुप्ता के व्यापारिक परिसरों में छापे के दौरान अमित शाह की  कश्मीर में विभिन्न बैठकों में   यह बात सुनी गई कि लोग जानना चाहते थे कि अगला छापा कहां पड़ेगा।
           अमित शाह के इस दौरे ने मोदी के दूसरे दौर में चल रही अटकलों को विराम दे दिया। वरना , कहा जा रहा था कि कश्मीर समस्या को सुलझाने  के लिए सरकार मुख्यधारा के राजनीतिक दलों और जम्मू कश्मीर के अलगाववादियों से बातचीत करेगी। अमित शाह ने राजनीति दलों से मुलाकात को दरकिनार कर पंचो, सरपंच और गूजर समुदाय यह लोगों से मुलाकात की। उन्होंने गत 12 जून को अनंतनाग हमले में मारे गए पुलिस और सीआरपीएफ के अफसरों में से एक इंस्पेक्टर अरशद खान के परिजनों से भी मुलाकात की। उन्होंने आतंकवादियों के हाथों मारे गए भाजपा कार्यकर्ताओं के सम्मान में आयोजित समारोह की अध्यक्षता भी की।
           जैसा कि विगत दो दशकों से से चल रहा था उससे अलग पुलिस और खुफिया संगठनों को यह निर्देश नहीं दिए गए कि वह किसी विशेष अलगाववादी के संपर्क में रहें। यही नहीं सबसे महत्वपूर्ण तो यह था कि इस बार अमित शाह की यात्रा में घाटी में ना कोई बंद हुआ और ना ही टि्वटर की अफरा तफरी दिखाई पड़ी। वरना हर बार, लगभग 25 वर्षों से यही चला रहा है कि , जब भी कोई प्रधानमंत्री या गृह मंत्री घाटी दौरे पर होता है  तो अलगाववादी और आतंकवादी संगठन वहां बंद का आह्वान कर देते थे और पूरी घाटी सुनसान रहती थी। साथ ही, पिछले कुछ वर्षों से ट्विटर पर जमकर अफवाह फैलाई जाती रही है। लेकिन शाह अपने कार्यक्रम के अनुसार श्रीनगर और जम्मू गए तथा उस दौरान ,साथ साथ ही आयकर के छापे भी पड़ते रहे लेकिन कोई भी अलगाववादी संगठन या मुख्यधारा का राजनीतिक संगठन अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करने के लिए सामने नहीं आया। ट्विटर पर बात को बढ़ाने के लिए मशहूर उमर अब्दुल्ला, महबूबा , सज्जाद लोन शाह फैसल इत्यादि चुप बैठे रहे। यहां तक कि नेशनल कॉन्फ्रेंस या पीडीपी का कोई बड़ा नेता  अधिकृत रूप से कुछ कहने को तैयार हुआ। उमर अब्दुल्ला की पार्टी के एक नेता ने जरूर कहा कि शाह का राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति दिखावा के अलावा कुछ नहीं है। उसने कहा कि  श्री शाह को पूर्व जनसंघ के नेता टीका लाल टपलू याद हैं । लेकिन 1989 में गोलियों से भून डाले गए गुलाम हसन हलवाई से लेकर कर 2018 में मुस्ताक वानी और नाजिर वानी की हत्या के बीच मारे गए कई लोग याद नहीं रहे।
        कई अटकलों के विपरीत शाह की इस यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अलगाववादियों और आतंकवादियों पर चल रहे छापे और धर पकड़ कायम रहेगी तथा अलगाववादियों एवं मुख्यधारा के राजनीतिक दलों व उनके समर्थकों को चैन से नहीं बैठने दिया जाएगा। जम्मू कश्मीर में जल्दी ही विधान सभा चुनाव होने वाले हैं।  जो हालात बन रहे हैं उसे देख कर महसूस होता है कि शायद ही चुनाव हों।


Friday, June 28, 2019

अब तो जागे सरकार

अब तो जागे सरकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी 20 सम्मेलन में शरीक होने के लिए ओसाका पहुंचे हुए हैं वहां भी विश्व नेताओं की बड़ी जमघट है और बड़ी-बड़ी बातें होंगी जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप  और नरेंद्र मोदी की  मुलाकात होगी  और व्यापार प्रतिबंध से लेकर धार्मिक असहिष्णुता तक पर चर्चा भी होगी। इतनी चमक-दमक तथा इतना  प्रचार लेकिन    बिहार के चमकी बुखार से मरने वाले बच्चों को लेकर जिस गंभीर संवेदनशीलता की आवश्यकता थी वह नहीं दिखाई पड़ रही। मरने वाले बच्चों की तादाद बढ़ती जा रही है।  इन बच्चों की मौतों में संपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत क्या है इस पर लोकसभा में जो आंकड़े मिले वह पूरी व्यवस्था के तार-तार हो जाने की बात कहते हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन रिपोर्ट में फकत इतना कहा गया है जागरूकता और सही जानकारी के अभाव के कारण यह मौतें हुई हैं। अब सवाल उठता है कि जागरूकता और सही जानकारी कैसे मिलेगी उन बच्चों के गरीब मां बाप को। बिहार में दो तरह की चिकित्सा व्यवस्था है एक निजी और एक सरकारी। सरकारी चिकित्सा व्यवस्था की हालत यह है कि  कोई आदमी वहां इलाज के लिए तभी जाता है जब उसकी जेब बिल्कुल खाली रहती है और पेट में अन्न का दाना तक नहीं रहता। मतलब बेहद गरीब होता है और उसके साथ कैसा सलूक होता है यह कल्पना से बाहर है। साथ ही प्राथमिक सुविधा केंद्र और आंगनबाड़ी केवल नाम के लिए व्यवस्थाएं हैं।  चिकित्सा व्यवस्था का दूसरा प्रकार है निजी। वहां डॉक्टर्स मशीन की तरह लगे रहते हैं। उन्हें फुर्सत नहीं होती यह बताने की कि किसी रोगी को क्या हुआ है और उसकी रोकथाम हो सकती है। यही नहीं, कई बार ऐसा महसूस होता है की यह डॉक्टर किसी रोगी की बात सुन ही नहीं पाते हैं। एक-एक दिन में सैकड़ों रोगियों को देखा जाना। लगता है वहां बीमार लोगों का मेला लगा हुआ है। संसद में प्रश्नोत्तर के दौरान जो आंकड़े आए उसके अनुसार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 292 डॉक्टरों की कमी है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 518  विशेषज्ञों का अभाव है। प्राथमिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 1762 फार्मासिस्ट पद खाली हैं, 1438 पैरामेडिकल स्टाफ का अभाव है और 1738 नर्सों की कमी है । यह  गांव और कस्बे की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ है।  अगर सबको जोड़ दें तो बिहार में लगभग 6000 स्वास्थ्य कर्मियों का अभाव है। उधर आंगनबाड़ी को दरकिनार कर दिया गया है।
        नीति आयोग के आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य व्यवस्था में बिहार नीचे से दूसरे नंबर पर है। यानी प्रजनन दर, जन्म के समय वजन कम, लिंग अनुपात, संस्थागत प्रसव, टी बी के इलाज में सफलता जैसे तमाम पैमानों पर बिहार फेल हो चुका है।  यही नहीं, स्वास्थ्य के मामले में राज्य में लगातार गिरावट आ रही है। नेशनल हेल्थ मिशन से जुड़ी रकम तक समय से जरूरतमंदों के पास नहीं पहुंच पाती। आंगनबाड़ी के निष्क्रिय हो जाने के कारण गरीबों तक बीमारियों की जानकारी नहीं पहुंच पाती और गरीबों के परिवारों तक पहुंचने वाली  ग्लूकोज और अन्य जरूरत की चीजें भ्रष्टाचार के गाल में समा जाती है।
           सुरक्षित मातृत्व के लिए जननी सुरक्षा योजना है और यह नेशनल हेल्थ मिशन के अंतर्गत है। इस योजना का उद्देश्य नवजात शिशु की मृत्यु दर को कम करना है। इसके माध्यम से गरीबों को मदद पहुंचाई जाती है। बिहार में ग्रासरूट स्तर से इतना भ्रष्टाचार है कि ऐसी योजनाओं का बुरा हाल हो गया है।  दूसरी तरफ इसके लिए सरकार को मिला धन भी  खर्च नहीं हो पाया। आंकड़े बताते हैं कि 2016 -17 में राज्य को इस मद में 34339. 71 लाखों रुपए मिले लेकिन उसमें से केवल 27286.25 लाख ही खर्च हुए। 2017- 18 में 34414 . 71 लाख मिले उन्हें केवल 274 842 . 74 लाख खर्च हुए। यही हाल 2018 में भी था अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक   इस अवधि में बिहार को 34318 . 71 लाख मिले जिसमें से केवल 27504 4 दशमलव 59 लाख ही खर्च हुए। 
     अब अगर बच्चों की मौतों के कारण और इन पैसों का एक समीकरण बनाया जाए तो पता चलता है कि कितनी लापरवाही हुई है। बच्चे कुपोषण से मरे और उस कुपोषण को दूर करने के लिए जानकारी फैलाने के उद्देश्य से यह पैसे आए थे लेकिन खर्च नहीं हुए। इस लापरवाही का दंड किसे दिया जाना चाहिए यह अभी तय नहीं हुआ है।
          बिहार की बीमार पड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था का हल केवल बेहतर अस्पताल ही हो सकते हैं और इस मामले में भी हालात बड़े खराब हैं। पटना शहर में एक एम्स है जिस से उम्मीद की जाती है की यहां बहुत बढ़िया इलाज होगा लेकिन उससे बेहतर इलाज पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में होता है जिसकी स्थापना 1925 में हुई थी। बिहार में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के तहत डॉक्टरों की भारी कमी है जिसके कारण राज्य को मेडिकल कॉलेज या जिला अस्पतालों पर निर्भर होना पड़ता है और वहां भारी भीड़ हो जाती है। 2015 में बिहार में एक और एम्स बनने के लिए प्रस्ताव दिया गया था लेकिन 2019 तक वहां इसके लिए जमीन ही नहीं मिल पाई। जमीन की तलाश का काम राजनीतिक जाल में फंस कर रह गया । प्राथमिक स्तर पर 6000 लोगों की और एम्स में खाली पड़े 467 पदों को लेकर टूटी हुई कमर के साथ आंगनबाड़ी व्यवस्था तथा दूसरे एम्स के लिए जमीन नहीं मिल पाने इत्यादि को देखते हुए लगता है कि बिहार स्वास्थ्य व्यवस्था इंतजार में पथरा गई है। हाल में बच्चों की मौत सरकार के लिए खतरे की घंटी है जिससे सरकार को जाग जाना चाहिए । अगर नहीं जाग सकी सरकार तो बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था जो अभी बीमार है वह कल हो सकता है वेंटिलेटर पर चली जाए। लेकिन मामला दूसरा बिहार सरकार प्रदर्शन कर रहे पीड़ितों के परिवार के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने में जुटी है।

Thursday, June 27, 2019

ये सूरत बदलनी चाहिए

ये सूरत बदलनी चाहिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को लोकसभा में बिहार के चमकी बुखार पर कहा कि यह चिंता जनक है और इस पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए । उन्होंने झारखंड मॉब लिंचिंग पर भी चिंता जताई। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में इंसेफेलाइटिस से होने वाली मौतों के आंकड़ों पर बिहार सरकार को जमकर डांटा। इसने बिहार सरकार को निर्देश दिया कि वह 10 दिनों में बिहार में स्वास्थ्य सेवा की स्थिति ,पोषण, सफाई इत्यादि पर शपथ पत्र दाखिल करे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा ,यह बुनियादी अधिकार हैं। लेकिन मीडिया या समाज का जो मनोविज्ञान है उसके अनुसार  ऐसा लगता है इन 10 दिनों में हम उन बच्चों की मौत को भूल जाएंगे।  कुछ पत्रकार बंधु  इस बात को लेकर दौड़ पड़ेंगे कि बिहार सरकार ने शपथ पत्र दाखिल किया या नहीं, और अगर किया है तो उसने राज्य  में स्वास्थ्य सेवा  के बारे में क्या कहा है।  ऐसा लगता है कि उस समय तक समाचार कई और बन जाएंगे और संभवतः मामले में दूसरे होंगे।
        याद करें पिछले हफ्ते कोलकाता में डॉक्टरों के साथ मारपीट हुई। क्या उसका कुछ निदान हुआ ? क्या ऐसा हो सकता है कि दोबारा भारत में डॉक्टरों से मारपीट ना हो? अब तो ऐसा लगता है कि कुछ हुआ ही नहीं। डॉक्टर काम पर चले गए और सोशल मीडिया में किसी दूसरे मसले पर हाय तौबा मची हुई है। इस तरह की स्थितियां और उनकी अवधि ही बहुत छोटी होती है। समाज विज्ञान की भाषा में इसे "मोरल पैनिक" कह सकते हैं।  अभी तक समाज विज्ञानी यह नहीं स्थापित कर पाए हैं कि एक दूसरे से ऐसी घटनाओं का क्या संबंध होता है और यह जन नीति को कैसे प्रभावित करती हैं। राजनीतिज्ञ और अफसर उन मसलों पर ज्यादा तेजी दिखाते हैं जो बहुत तूल  पकड़ने वाले होते हैं और उनकी तरफ से आंख मूंद लेते हैं जो मामूली असरदार होते हैं। अभी हाल की कुछ घटनाओं पर ध्यान दें। मी टू से लेकर और मॉब लिंचिंग तक क्या बदला हमारे देश में? क्या इसके बाद  ज्यादा जागरूकता फैली या इसे रोकने के लिए सरकार ने कोई नई नीति बनाई ? बहुत ज्यादा प्रसारित होने और लोगों का ध्यान आकर्षित हो जाने के बावजूद कोई बदलाव नहीं होता है या फिर बहुत ही मामूली बदलाव होता है। अमर्त्य सेन के सिद्धांत के अनुसार नीतियों से परिवर्तन बहुत धीमा होता है लेकिन जनता का ध्यान बहुत तेजी से आकर्षित होता है।
        इस तरह की कई घटनाएं अपना स्वरूप बदल-बदल कर  सामने आती हैं। अभी झारखंड में मॉब लिंचिंग की घटना तेजी से उभरी है। यहां तक कि लोकसभा में प्रधानमंत्री ने भी इस पर चिंता जताई है। जून में इस तरह की कई घटनाएं हुईं। सही संख्या किसी को मालूम नहीं है। 25 जून को आर एस पी के कोल्लम से सांसद एन के रामचंद्रन के एक सवाल के जवाब में गृह राज्य मंत्री ने बताया कि "नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ऐसा कोई आंकड़ा नहीं संग्रहीत करता है इसलिए इस बारे में सही जानकारी मुश्किल है।" क्या विडंबना है? अल्प पर संख्या का हमला और केवल शक के आधार पर जान लिया जाना यानी सजा दे देना कहां तक मुनासिब है?  इन घटनाओं के आंकड़ों के बारे में सरकारों को कुछ मालूम नहीं है, ना राज्य सरकार को न केंद्र सरकार को और ना इसके लिए तैनात नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो को? एक हुड़दंगी  भीड़ आनन-फानन में फैसला कर देती है। 26 जून को भाजपा के एक बड़े नेता के सुपुत्र ने नगर निगम के अधिकारियों को बीच सड़क पर बल्ले से मारा उनके साथ उनके समर्थकों का एक बड़ा जत्था भी था सभी खामोश थे  और  परोक्ष रूप में उनकी मदद कर रहे थे। इस तरह की अदालतें  सिर्फ सड़क पर नहीं लगतीं। सोशल मीडिया पर वायरल होती खबरें आनन-फानन में झूठ और सच का फैसला कर देती हैं।
           कुछ लोग दलील दे सकते हैं डेढ़ अरब की आबादी वाले इस देश में ऐसी इक्का-दुक्का घटनाएं होती हैं तो इसके लिए पूरे देश या पूरी सरकार पर उंगली उठाना उचित नहीं है। लेकिन ,अगर इन घटनाओं का आप अपराध वैज्ञानिक विश्लेषण करेंगे तो इनमें एक कड़ी दिखाई पड़ती है।  अगर साफ कहा जाए तो इनके प्रभाव सियासी परिणामों को प्रभावित करते हैं। 26 जून को बिहार के चमकी बुखार पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इस बीमारी पर राजनीति नहीं होनी चाहिए । यह बयान प्रमाणित करता है कि ऐसी घटनाओं का राजनीतिक प्रतिफल भी हुआ करता है। इन घटनाओं में एक और बड़ी खूबी है। इन पर सत्ता की प्रतिक्रिया बहुत देर से आती है और ऐसा होना एक तरह से देर से मिले इंसाफ यह तरह होता है। जैसे देर से मिला इंसाफ अन्याय है उसी तरह से इस पर सत्ता के बयान में देरी भी बेअसर है । कट्टर राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिलना किसी भी देश के सामाजिक ताने-बाने पर आघात है।
          जिस देश ने दुनिया को धर्म और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया आज दुनिया उसी देश को धार्मिक आजादी के लिए लेक्चर दे रही है। हाल में अमरीका की सरकार ने  भारत में धार्मिक आजादी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ते हमलों पर एक रिपोर्ट निकाली थी और भारत सरकार ने उसका स्पष्ट खंडन कर दिया। लेकिन ऐसा करने से कुछ बदला नहीं । अमरीकी विदेश मंत्री पॉम्पियो बुधवार को भारत आए और वह अवांतर से वही राग अलाप रहे हैं। उन्होंने कहा, " भारत चार  धर्मों की जन्मस्थली है । आइए सब की धार्मिक आजादी के लिए एक साथ उठ खड़े होते हैं।" 26 जून को झारखंड में मॉब लिंचिंग के खिलाफ देश के कई शहरों में प्रदर्शन हुए।  क्या कोई सुन रहा था फिर भी यह प्रशंसनीय प्रयास है  कम से कम लोग एक साथ बोलने के लिए उठ तो खड़े हुए हैं
      खामोशी तेरी मेरी जान लिए लेती है
      अपनी तस्वीर से बाहर तुझे आना होगा