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Monday, September 30, 2019

शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती तादाद

शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती तादाद

अंतरिक्ष में विजय पताका फहराने  से लेकर हाउडी मोदी के जश्न तक हम भारतीय अपने कारनामों का बखान करने में मगन थे उसी बीच दो जरूरी रपट सामने आयी लेकिन उन्हें देखा नहीं गया या देखा भी गया तो उस पर  ध्यान नहीं दिया गया। वह रपट थी शिक्षा पर केंद्रित   आठवां वार्षिक सर्वेक्षण 2018- 19। यह रपट मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जारी किया।  इसी के आसपास एक और रिपोर्ट "सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी- ए स्टैटिसटिकल प्रोफाइल ,मई अगस्त 2019।" यह रपट हर साल तीन बार प्रकाशित होती है। अगर इन दोनों रपटों को एक साथ रख कर देखें तो हमारे देश की एक अलग तस्वीर उभरती है। उस तस्वीर में हमारे शिक्षित बेरोजगार नौजवानों का बड़ा विकराल रूप दिखता है। बेरोजगारी का यह रूप आर्थिक मंदी का एक संकेत है और आने वाले दिनों में सरकार के लिए एक विशेष चुनौती बन सकता है। यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है लेकिन हकीकत है कि उच्च शिक्षा के जो आंकड़े उपलब्ध है वह अपनी गुणवत्ता में स्कूली शिक्षा के मौजूदा आंकड़ों से भी कमतर हैं । इस बात को भांपकर केंद्र सरकार ने 2011- 12 में "ए आई एस एच डी" स्थापना की थी। आज हमारे पास आंकड़े हैं जिनसे पता चल सकता है कि इस देश में उच्च शिक्षा के कितने और किस प्रकार के संस्थान हैं। प्रत्येक संस्थान में कितने लोगों का नामांकन होता है और उसमें से उत्तीर्ण होने वाले छात्र की संख्या कितनी है। यही नहीं यह आंकड़े बताते हैं कि इन संस्थानों में अध्यापकों और शिक्षण कार्य से जुड़े लोगों की संख्या कितनी है। लेकिन यह भी पढ़ने- पढ़ाने और शोध की गुणवत्ता के बारे में कोई जानकारी नहीं देते। "प्रथम" नाम की गैर सरकारी संस्था "असर" की रिपोर्ट या फिर एनसीईआरटी से प्रकाशित होने वाला ऑल इंडिया स्कूल सर्वे हमारे पास आधार है। यह जानने का कि हमारे पढ़े-लिखे किशोर या नौजवान कितने कुशल हैं हाल में प्रकाशित ए आई एस एच डी 2018 19 की रिपोर्ट में आंकड़ों के पर्दे में हकीकत को पोशीदा करने का एक बड़ा दिलचस्प नमूना सामने आया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि  देश में विश्वविद्यालयों की संख्या 993 तक हो गई है, जबकि 2011- 12 में यह संख्या 642 थी। यानी 8 वर्षों में देश में विश्वविद्यालयों की संख्या में 50% का इजाफा हुआ है। लेकिन अगर गंभीरता से इसे देखें तो पता चलेगा यह 50% निजी विश्वविद्यालय हैं। आलोच्य अवधि के भीतर जो 351 विश्वविद्यालय बने हैं उनमें से 119 को राज्य सरकारों की मान्यता प्राप्त है और यह निजी विश्वविद्यालय हैं। इन निजी विश्वविद्यालयों में शिक्षा की क्वालिटी क्या है इसके बारे में कहीं कोई जिक्र नहीं है। वैसे यह तो साफ पता चलता है कि यह निजी विश्वविद्यालय शिक्षा की दुकानदारी है और शिक्षा इससे  कलंकित होती है। इसलिए इन विश्वविद्यालयों की वृद्धि कोई अच्छी बात नहीं है।
        जहां तक उच्च शिक्षा के संस्थानों में छात्रों के दाखिले का सवाल है आलोच्य अवधि में  कुल तीन करोड़ 74 लाख नौजवानों में इन संस्थानों में दाखिला लिया। और ऐसी पढ़ाई की जिस पढ़ाई की कोई उपयोगिता नहीं है। तीन करोड़ 74 लाख का यह आंकड़ा सुनने में तो बड़ा इंप्रेसिव लगता है लेकिन यह जानकर मन में उदासी भर जाती है कि हमारे देश में 18 साल से 23 साल की उम्र के नौजवानों की संख्या जितनी है उसका महज एक चौथाई हिस्सा ही उच्च शिक्षा के संस्थानों में दाखिला पा सका है। इसका मतलब है कि जिन तीन चौथाई भाग को संस्थानों में होना चाहिए वे वहां नहीं है और यूं ही बेकार बैठे हैं। यह बेकार की जमात जिंदा बम की तरह खतरनाक है। उच्च शिक्षा के हमारे संस्थान हर साल लगभग एक करोड़ छात्रों को डिग्रियां बांटते हैं। जिनमें 59 लाख स्नातक की डिग्री पाने वाले हैं और स्नातक स्तर पर डिग्री पाने वाले इन छात्रों में हुनर या रोजगार पा सकने लायक कौशल बहुत ही कम है। इसे देखते हुए यह साफ जाहिर होता है थे हमारे शिक्षा संस्थानों के सामने दोहरी चुनौती है- एक तो छात्रों की लगातार बढ़ती संख्या एक दूसरे शिक्षा की क्वालिटी।
      अब इन आंकड़ों के बरक्स अगर हम बेरोजगारी पर केंद्रित सीएमआईई की ताजा रिपोर्ट देखते हैं तो संकेत मिलता है कि बेरोजगारी की दर लगातार बढ़ती हुई मई 7.03 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 8.19 प्रतिशत जा पहुंची। बेरोजगारी का आकलन  जिस पद्धति से किया गया है वह नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के तौर-तरीकों से थोड़ा अलग है, और इन आंकड़ों को अगर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारत में बेरोजगारों की संख्या सबसे ज्यादा है। जैसे- जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ता जाता है बेरोजगारी बढ़ती जा रही है अशिक्षित लोगों में बेरोजगारी बहुत कम है। बेरोजगारी की यह बढ़ती संख्या देश में खौलते ज्वालामुखी की तरह है।यह ज्वालामुखी किसी भी दिन फट सकती  है। बेरोजगारी के बढ़ते हुए मंजर पर जरा आर्थिक मंदी का रंग देखिए तो साफ दिखेगा कि देश एक बहुत बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है । ऐसी स्थिति में कई देशों में दंगे हुए, तनाव हुआ है। बेरोजगारी के मोर्चे पर खराब हो सकती है। देश की स्थिति से बेखबर  हाउडी बोलने में जुटे हमारे नौजवान और हमारी सरकार इसे दूर करने के लिए कोई उपक्रम नहीं कर रही है और अगर कर भी रही है तो यह जनता को दिख नहीं रहा है।

Sunday, September 29, 2019

पाकिस्तानी हुकूमत तैयार रहे

पाकिस्तानी हुकूमत तैयार रहे

भारत में देवी पक्ष की शुरुआत होने वाली थी और उधर संयुक्त राष्ट्र में मोदी जी तथा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भाषण देने वाले थे। मोदी जी ने स्पष्ट कहा कि "हमारे देश ने युद्ध नहीं बुद्ध दिया है।" यानी शांति का संदेश दिया। शांति के इसी संदेश के आलोक में दुर्गतिनाशिनी महिषासुर  संहारिणी  मां दुर्गा के पद चाप साफ सुनाई पड़ रहे थे। इसके बाद इमरान खान ने जब बोलना शुरू किया तो वे एटम बम का ख्वाब दिखाने लगे। यह अकेले उन्हीं की बात नहीं है। कुछ दिन पहले पाकिस्तान के रेल मंत्री साहब ने पाव आधा पाव एटम बम की धमकी दी थी। एक जमाने में एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन एक डायलॉग मशहूर हुआ था कि" हमारे पास मां है, तुम्हारे पास क्या है ? " अब वह जमाना लद गया अब चल तो रहा है "मेरे पास  आधा पाव का एटम बम है  तुम्हारे पास क्या है?" वह नहीं समझ सके कि जिस देश का हर कंकर शंकर है जो अगर नीलकंठ है तो तांडव करता भी है इमरान खान कुछ ऐसा बोल रहे थे।  उन्हें शायद मालूम हो कि ना हो कि छोटे से देश पाकिस्तान में फिलहाल 10,000 लोग डेंगू से जूझ रहे हैं। यह सरकारी आंकड़ा है और आसानी से समझा जा सकता है डेंगू से आक्रांत लोगों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। अब वहां की सरकार कह रही है कि डेंगू से हालात अगर बिगड़े हैं तो इसमें उसकी क्या गलती है? अब आप ही बताएं कि किसकी गलती हो सकती है? इमरान खान ने ही लोगों को बताया कि  जब काम ठीक से ना हो रहा हो तो समझ जाइए कि इसके लिए भ्रष्ट नेता दोषी हैं। वही तो चुनाव से पहले नवाज शरीफ और शाहबाज शरीफ को डेंगू ब्रदर्स करते थे लेकिन उन्हें 2017 में जब पख्तूनख्वा में डेंगू फैला तो इमरान साहब के पास इसका बहुत उम्दा इलाज था "बरसात खत्म डेंगू खत्म।" आजकल इमरान खान "मिशन कश्मीर" पर लगे हैं और डेंगू शब्द का उच्चारण करने वाले को भारत का समर्थक मानते हैं। क्योंकि एक तरफ वे राष्ट्र संघ में भाषण देने जा रहे हैं और कुछ जाहिल लोग डेंगू -डेंगू चिल्ला रहे हैं तो यह साजिश नहीं है तो और क्या है। वहां की मीडिया  देश के भीतर जो कुछ भी हो रहा है उसके बारे में पॉजिटिव रिपोर्ट करती है- "आल इज वेल" की तर्ज में। इसलिए पिछले वर्ष 10.49  प्रतिशत हो गई मुद्रास्फीति और 10 लाख बेरोजगार हो गए । फिर भी "आल इज वेल।" हमेशा ऐसा नहीं था । जब इमरान खान विपक्ष में थे तो सब गड़बड़ था। अब अचानक सब कुछ रास्ते पर आ गया और कुछ ऐसा लगने लगा है की वजीर ए आजम साहब फिलहाल पाकिस्तान से ज्यादा हिंदुस्तान की फिक्र करते हैं।
        इमरान खान केवल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नहीं कश्मीर के दूत भी हैं।  वे कश्मीर को लेकर सऊदी अरब ,ईरान और अमेरिका के बीच के झगड़े के सुलह कराने वाले भी हैं। उनके समर्थक कहते हैं की इमरान खान राष्ट्र संघ में कश्मीर का मसला इस तरह उठा रहे हैं या जिस तरह अब  इमरान खान एक ऐसे नेता के रूप में खड़े हैं जो नया पाकिस्तान बनाने के बाद  विश्व नेता बनने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं । इन दिनों एटम बम छुपाने की चीज नहीं रह गई। एक नया फैशन चला है आपके पास हथियार है तो उसका प्रदर्शन करें या फिर बन पड़े तो दुश्मन को धमकी दें। इमरान खान परमाणु शक्ति संपन्न देश का शासक होने का दम भरने के बाद उनके  रेल मंत्री पाव भर का एटम बम दिखाते चल रहे हैं। एक जमाने में परमाणु सिद्धांत बड़ा गंभीर विषय था पर आज की सियासत में खासकर पाकिस्तानी सियासत में एटम बम का जिक्र तो ऐसे किया जा रहा है जैसे अब बच्चों के खेलने के पटाखे हो। इस साल  फरवरी में पुलवामा हमले के बाद भारत में पाकिस्तान को टमाटरों  के निर्यात पर पाबंदी लगा दी। वहां के टीवी पत्रकार ने जवाबी हमले का आगाज किया और नारा दिया टमाटर का जवाब एटम बम से देंगे।
        दरअसल, पाकिस्तानी नेता पगला गए हैं । मोदी के कश्मीर बम के बाद अब पाकिस्तानी नेताओं को बड़ा अजीब लगने लगा है। सच कहें तो क्रिकेट में अगर पाकिस्तान भारत के हाथों पिट जाता है तो वहां जो प्रतिक्रिया होती है वह कश्मीर मसले से भी ज्यादा गंभीर होती है । इसका एक मुफीद कारण है कि कश्मीर की हुकूमत पेट्रोल से नहीं कश्मीर कॉज से चलती है। पाकिस्तानी शासन के अभिजात्य वर्ग में हर किसी को यह भ्रम है कि " कश्मीर बनेगा पाकिस्तान" और नेता इसी का फायदा उठाते हैं। पाकिस्तानियों को हर साल कश्मीर को आजाद कराने के लिए 5 फरवरी को छुट्टी मिलती है। इसमें कई तरह की झांकियां निकाली जाती हैं । कश्मीर दिवस का यह मकसद अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है लेकिन भारत की इस नई पहल से यह बात स्पष्ट होने लगी है कि नियंत्रण रेखा एक स्थाई सीमा रेखा बनने जा रही है।  पाकिस्तानी हुकूमत वह दिन देखने के लिए तैयार रहे।

Thursday, September 26, 2019

बातों के सही मायने

बातों के सही मायने 

अरस्तु का मानना था कि "तर्क के जरिए बातों के सही अर्थ तक पहुंचा जा सकता है और यही कारण है कि सदा सत्य की जीत होती है।" लेकिन अब शायद ऐसा नहीं है। अगर हम अपने आसपास से लेकर दूरदराज की दुनिया भर में हो रही घटनाओं को देखें तो इस cvबात का अंदाजा लगाया जा सकता है। आज हमारे नेता लोगों के भीतर की भावनाओं को उभार कर अपना उद्देश्य पूरा कर लेते हैं। जो सत्य, तथ्य  और तर्कों से परे है। दुनिया की ताजा स्थिति यूरोपियन नवजागरण के तार्किक विचारों को कमजोर करने वाली है। उदाहरण के लिए देखें ,ह्यूस्टन में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एक नारा दिया "अबकी बार ट्रंप सरकार।" सुनने में यह साधारण तौर पर ट्रंप के लिए वोट मांगने का नारा है लेकिन इस नारे का अर्थ और इसकी डायनामिक्स का मोदी जी ने अपने लिए उपयोग किया। यह नारा "हाउडी मोदी" कार्यक्रम में मोदी जी ने दिया लेकिन इरादा अपने लिए उपयोग करने का था। बेशक उन्होंने खुद को 130 करोड़ भारतीयों का प्रतिनिधि बताया। जब उन्होंने कश्मीर से धारा 370 हटाने की बात की तो उसके साथ यह भी कहा कि यह जनता की आकांक्षा थी। इस कार्यक्रम में ज्यादातर लोग यह कह सकते हैं कि  लगभग सभी  भारतीय थे। अब यह पूछा जा सकता है यह मोदी विदेशों में बसे भारतीयों के लिए क्या कर सकते हैं ? अब इस बात को थोड़ा दूसरी तरफ से देखें और पूछें कि यह प्रवासी भारतीय मोदी जी के लिए क्या कर सकते हैं? मोदी जी अपने मतदाताओं को अच्छी तरह जानते हैं ,समझते हैं । उन्हें मालूम है कि समस्त भारतीयों को प्रभावित करने के लिए प्रवासी भारतीयों को भी प्रभावित करना पड़ेगा। प्रवासी  भारतीयों के दिलों में उतरना होगा। एक फिल्म का डायलॉग याद आता है जिसमें हीरो कहता है कि" मैं समझ में नहीं दिल में आता हूं।" एक बार मोदी जी ने न्यूयॉर्क को अपना दूसरा घर बताया था। मोदी जी जब 2014 में सत्तासीन में बहुत से प्रवासी भारतीयों ने उनका समर्थन किया था और उनके लिए प्रचार भी किया था। वह प्रवासी भारतीयों की शक्ति को जानते हैं। यही कारण है कि नरेंद्र मोदी जब भी विदेश  आते हैं तो वहां बसे भारतीयों से मिलना नहीं भूलते। प्रवासी भारतीयों के मन में है चिंता का एक भाव होता है और मोदी जी इस भाव को अपने लिए कैश कराते हैं। आंकड़े बताते हैं कि मोदी जी अपने पहले कार्यकाल में 48 विदेश दौरे पर गए थे जिनमें उन्होंने 93 देशों यात्रा की थी। प्रवासी भारतीय विदेश के चाहे जिस देश में हों उनके मन में अपनी संस्कृति को लेकर एक तड़प होती है। हालांकि भारत में जो कुछ हो रहा है उसको देख -सुनकर वे बहुत खुश नहीं होते लेकिन अपनी संस्कृति की तड़प उन्हें मोदी जी के साथ जोड़ती है। यही कारण है कि बहुत से प्रवासी भारतीयों ने इस चुनाव में मोदी जी प्रचार किया था। मोदी खुद को एक काम करने वाले नेता के रूप से ज्यादा सक्रिय प्रधानमंत्री के तौर पर प्रस्तुत करते हैं।  विदेशों में रहने वाले भारतीयों को भ्रष्टाचार, भारत की गरीबी ,शहरों की अराजकता इत्यादि से बहुत मतलब नहीं है इसलिए वह अपनी संपत्ति और भारतीयों से मिलने वाले इर्ष्यापूर्ण  सम्मान को नहीं छोड़ना चाहते हैं । उन्हें यह मालूम है कि भारत में उन्हें धनवान माना जाता है लेकिन वे भारत नहीं लौटना चाहते। इसके चलते एक मनोवैज्ञानिक विभाजन पैदा हो जाता है। आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में 45 लाख भारतीय और उन्हें इस   प्रवास बे भारतीय पहचान हैं। इस प्रवास ने उन्हें भारत से दूर कर दिया है। नरेंद्र मोदी में उन्हें एक शानदार विकल्प नजर आया। इसी कारणवश वे मोदी जी के कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए कहीं भी चले जाते हैं।मोदी जी के रूप में उन्हें एक ऐसा नेता दिखा जो भारत को सम्मान दिला रहा है तथा भारत को सम्मान का मतलब है उनका सम्मान। इससे भारत से उनके जुड़ाव सरलता होती है। विदेशों में बसे भारतीयों के लिए नरेंद्र मोदी एक शानदार भ्रम हैं।  इस भ्रम को बनाए रखने के लिए मोदी जी से चाहे जो बन पड़ता  करते हैं । क्योंकि उन्हीं के चलते अमेरिका में या अन्य दूसरे देशों में उनकी जयजयकार होती है।  इस जय जयकार से भारत में बसे भारतीयों को  गर्व का अनुभव होता है और यही भारतीय उनके असली मतदाता है और यह गर्व चुनाव आने पर वोट में बदल जाता है।

Wednesday, September 25, 2019

हाउडी मोदी : पीएम ने जो चाहा वह पाया

हाउडी मोदी : पीएम ने जो चाहा वह पाया

अमेरिका के ह्यूस्टन शहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उसमें शामिल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हो इतनी शोहरत मिली कि उसके आगे दुनिया के सभी राजनेता  फीके पड़ गए हैं। इमरान खान तो बेभाव के हो गए। उन्हें कई मौके पर कश्मीर को लेकर ट्रंप की मीठी झिड़की भी सुननी पड़ी।  पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की है संयुक्त उपस्थिति एक तरह से भारत अमेरिका संबंधों  की सशक्त अभिव्यक्ति थी और लोगों तक यह संदेश गया कि दोनों  देशों के संबंध काफी मजबूत हैं और आने वाले दिनों में और भी मजबूत होंगे। ट्रंप और मोदी की एक साथ मौजूदगी ने यह भी संकेत दिया कि कश्मीर के बारे में भारत के निर्णय से अमरीका  को मतभेद नहीं है । यही नहीं उस दिन से आज तक आतंकवाद पर जो बात हुई उससे साफ जाहिर होता है कि दोनों देश के मध्य आतंकवाद एक ऐसा धागा है जो दोनों को उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए जोड़ता है। ट्रंप ने अपने भाषण में कहा कि "आपने कभी भी राष्ट्रपति के रूप में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बढ़िया मित्र नहीं देखा होगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस हकीकत को जानते हैं।" इसके बाद बड़े सोचे समझे गए जुमले के रूप में ट्रंप ने " रेडिकल इस्लामी आतंकवाद " शब्द का प्रयोग किया और साफ कहा कि वे भारत को रेडिकल इस्लामी आतंकवाद से बचाने के लिए सब कुछ करेंगे। जबकि इस बात से बिल्कुल साफ संदेश जाता है कि भारत हमला करे। उधर नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में पाकिस्तान की तरफ इशारा करते हुए 9/11  और 26/11 की बात कही और कहा वह अब इसके खिलाफ भारत की सुरक्षा करेंगे इससे साफ संकेत जाता है कि वे अब निशाने पर वार करेंगे।
         हाउडी मोदी चीन और पाकिस्तान के लिए भी एक इशारा था। ट्रंप और मोदी हाथों में हाथ डाल घूम रहे हैं ,प्रशंसा बटोर रहे हैं। यह खुद एक कहानी कहता है । इस तरह के  तमाशें का आयोजन  में मोदी के लोगों खास करके राजनीतिक प्रबंधकों को महारत  हासिल है। लेकिन इस बार मोदी जी कई कदम आगे चले गए और अमेरिकी सियासत को अपना बनाकर उन्होंने भारतीयों की भावनाओं का उपयोग किया। जब के वहां 2020 में चुनाव होने वाले हैं। अब अमेरिका में रह रहे भारतीय एवं जो डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं वे अब कितना रिपब्लिकंस की तरफ जाएंगे यह तो समय बताएगा लेकिन यह साफ दिख रहा है अमेरिका भारतीय समुदाय बदल रहा है। ट्रम्प ने अमेरिका के 44 लाख भारतीयों को एक मॉडल बनाया है। एक ऐसा मॉडल जो अमरीकी अर्थव्यवस्था वृद्धि सहयोग करता है। भारत अमेरिका संबंध अभी तक कभी भी इतने घुले मिले नही थे। ट्रम्प ने 2016 में कहा था "अबकी बार मोदी सरकार।" मोदी जी ने 2020 के चुनाव के लिए यही नारा दिया अबकी बार ट्रैम्प सरकार।" सवाल  यह नहीं है कि कश्मीर में जो मोदी सरकार ने किया उसे देखकर अमेरिकी डेमोक्रेट्स को कोई दिक्कत आ रही है। कुछ लोगों ने हिंदू अमेरिकी फाउंडेशन के आक्रामक कार्यों का भी जिक्र किया है । इसमें भारतीय मूल के एक अमेरिकी कांग्रेस सदस्य आर ओ खन्ना का भी जिक्र आया है ।जिसमें उन्हें 230 भारत अमेरिकी संगठनों ने दबाव दिया है कि वह पाकिस्तानी गुट को छोड़ दें। मोदी और ट्रंप आने वाले दिनों में कुछ ठोस विकास को स्वरूप देंगे। यह विकास चाहे सुरक्षा हो या  आतंकवाद विरोधी सहयोग हो और इसे भारत अमेरिकी समुदाय देखेगा तथा इसका असर पड़ेगा।
     

Monday, September 23, 2019

आतंकवाद समर्थक पाकिस्तान पर एक और प्रहार

आतंकवाद समर्थक पाकिस्तान पर एक और प्रहार

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमरीका की धरती पर रविवार को भारतीय संदर्भ में एक नया इतिहास रच दिया। ह्यूस्टन शहर के एनआरजी स्टेडियम मैं रविवार  रात  9.40 बजे जैसे ही मोदी और ट्रंप मंच पर पहुंचे वहां उपस्थित लोगों ने मोदी- मोदी के नारे लगाए। हाउडी मोदी कार्यक्रम में उपस्थित जन समुदाय  और उसके सामूहिक रिस्पांस ने अपने आपमें एक कहानी गढ़ दी। कार्यक्रम की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "हाउडी माय फ्रेंड्स।  यह  जो  माहौल है  उसकी कल्पना नहीं की जा सकती।  आज हम  नए इतिहास के साथ  नई केमिस्ट्री देख रहे हैं । यह  भारत और अमरीका  की बढ़ती सिनर्जी का सबूत है। उन्होंने कहा कि वह अपने इस कार्यक्रम का नाम  हाउडी मोदी है लेकिन मोदी अकेले कुछ नहीं है। मैं 130 करोड़ भारतीयों के हुक्म का पालन करता हूं। जब भीड़ ने कहा हाउडी मोदी उनका का जवाब था, भारत में सब अच्छा है। नरेंद्र मोदी ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पूरी दुनिया ट्रंप के हर शब्द को फॉलो करती है। उन्होंने कहा कि मुझे उनमें  हमेशा अपनापन दिखता है। इसके साथ ही, उन्होंने एक नया स्लोगन दिया, "अबकी बार ,ट्रंप सरकार।" ट्रंप ने नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की बधाई दी और कहा कि हम यहां साझा सपना और बेहतर भविष्य का उत्सव मनाने आए हैं। उन्होंने अमरीका में भारतीय का भी शुक्रिया अदा किया और कहा कि उन्होंने अमरीका के लिए बहुत कुछ किया है । डोनाल्ड ट्रंप ने कहा ट्रंप से अच्छा राष्ट्रपति कोई नहीं हुआ और भारत के लिए मोदी से अच्छा प्रधानमंत्री कोई नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि भारत और अमरीका लालफीताशाही खत्म कर रहे है। ट्रंप ने कहा कि ,मेरे शासनकाल में 60 लाख नई नौकरियों का सृजन हुआ है और 51 वर्षों में अमरीका में बेरोजगारी सबसे निचले स्तर पर आ गयी है। ट्रंप ने कहा सीमा सुरक्षा के लिए दोनों देश साथ-साथ  काम करेंगे। अमरीका और भारत में नई रक्षा साझेदारी होगी । उन्होंने कहा ,इस्लामिक आतंकवाद से हम एकजुट होकर लड़ेंगे।
नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान पर निशाना साधा और कहा कि अशांति के माहौल को चाहने  वाली ताकतें आतंकवाद को पालती हैं। उनका नाम लेने की जरूरत नहीं है। दुनिया उन्हें जानती है। मोदी ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा है कि आज आतंकवाद के खिलाफ एक निर्णायक जंग की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अमरीका में 11 सितंबर और मुंबई में 26 नवंबर का भूगोल चाहे जो हो लेकिन दोनों में समानता काफी है।  उसके साजिश करने वाले लोग कहां हैं यह सारी दुनिया जानती है। मोदी ने कहा भारत समस्याओं के पूर्ण समाधान की ओर कदम उठा चुका है। नरेंद्र मोदी ने कहा आज बहुत कुछ बदल रहा है ।  ग्रोथ का दौर आया है और भारत में बहुत कुछ हो रहा है। हमने नई चुनौतियां तय करने और उन चुनौतियों को पूरा करने की ज़िद पकड़ ली है। उन्होंने कहा कि हम  विकास की कोशिश में है और इसके लिए नागरिकों के पक्ष में कल्याणकारी योजनाओं की बहुत जरूरत है। उन्होंने धारा 370 को हटाए जाने की वकालत करते हैं कहा कि वेलफेयर के लिए बहुत कुछ को फेयरवेल देना पड़ता है । हमने कश्मीर में धारा 370 को फेयरवेल दे दिया यही नहीं हमने कई टैक्सेज को भी वेलफेयर दे दिया और और उसकी जगह जीएसटी ला दिया।
         अमरीका में जो कुछ भी हुआ उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अमरीका के संबंध सामरिक स्तर पर पहुंच चुके हैं। यह संबंधों की प्रगाढ़ता ही है कि 2016 में चुनाव से पूर्व अमरीका के राष्ट्रपति ने अपने देश में कहा था भारत का चुनाव परिणाम चाहे जो हो लेकिन अमरीका के साथ संबंध हो पर उसका कोई असर नहीं पड़ेगा। अमरीका इन संबंधों को चलाए रखने के लिए सक्षम है। हाउडी मोदी कार्यक्रम में ट्रंप की मौजूदगी यकीनन भारत अमरीका की प्रगाढ़ मैत्री का सबूत है और इससे दुनिया को एक संदेश जाएगा ही। चंद मुद्दों पर मतभेद के बावजूद भारत अमरीका अपने सामरिक साझेदारी लेकर एकजुट हैं।

Sunday, September 22, 2019

जादवपुर विश्वविद्यालय : वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा

जादवपुर विश्वविद्यालय : वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा

विख्यात दार्शनिक बट्रेंड रसल ने लिखा है कि "किसी भी आदमी या फिर किसी भी भीड़ पर तब तक विश्वास किया जा सकता जा सकता कि वह माननीय ढंग से काम करेगा जब तक  उसके भीतर भय ना हो।"
         रसल की इस उक्ति के संदर्भ में अगर जादवपुर विश्वविद्यालय की घटना को देखें तो बात बिल्कुल सही लगती है। मामला यह था कि  केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एक मीटिंग में शामिल होने के लिए जादवपुर विश्वविद्यालय पहुंचे। उनके साथ हथियारबंद अंगरक्षक भी थे और घंटे भर के बाद नतीजा सामने आया टूटे हुए शीशे बहते हुए खून के रूप में।  हालत यहां तक बिगड़ गई थी कि राज्यपाल को जाकर बाबुल सुप्रियो को छुड़ाना पड़ा। राज्यपाल श्री जगदीश धनखड़ ने बंगाल के इतिहास की गौरव गाथा का जिक्र करते हुए कहा कि वे यहां के सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं और हुए शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्रियों ने   अलग प्रतिक्रिया व्यक्त की है। एक तरफ जहां राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी इस घटना में घायल विश्वविद्यालय के कुलपति सुरंजन दास और प्रति कुलपति प्रदीप घोष का हाल चाल पूछने अस्पताल पहुंचे वहीं राज्य के पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने कुलपति की आलोचना करते हुए कहा वे पुलिस बुला सकते थे। राज्यपाल महोदय वे जादवपुर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी हैं और खुद जाने के बजाय वहां पुलिस भी भेज सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
        इस घटना के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कुछ छात्रों ने वामपंथी  छात्र  संगठन  के लोग विश्व विद्यालय परिसर में  आये और  तोड़फोड़ तथा गुंडागर्दी आरंभ कर दी।  जिससे कई छात्र घायल हो गए। कला संघ कक्ष में जमकर मारपीट हुई और कई छात्र घायल हो गए। जादवपुर विश्वविद्यालय में जो कुछ भी हुआ वह कोई नई घटना नहीं है। तृणमूल कांग्रेस वामपंथी दलों के बीच संघर्ष का लंबा इतिहास है। लोक सभा चुनाव प्रचार के दौरान विद्यासागर कॉलेज  के बाहर अमित शाह की रैली पर तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों ने हमला किया और विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी। 1980 में अलीमुद्दीन स्ट्रीट का लाल हथोड़ा कलकत्ता विश्वविद्यालय पर भी पड़ा था। प्रोफेसर संतोष भट्टाचार्य अपनी किताब " रेड हैमर ओवर कलकत्ता यूनिवर्सिटी" में  वहां के  अपने कार्यकाल का उल्लेख किया है और बताया है कि कैसे लगातार घेराव और मारपीट हुआ करती थी। यही रहस्यमय लाल हथोड़ा जादवपुर विश्वविद्यालय पर भी गिरा है । वाम पंथी दल राज्य में राजनीति को कब्जा करना चाहते हैं और तृणमूल छात्र परिषद ने ऐसा नहीं होने दिया। एक-एक करके सारे विश्वविद्यालय वामपंथियों के हाथ से निकल गए। परंतु जादवपुर विश्वविद्यालय पर तृणमूल छात्र कांग्रेस अपना झंडा नहीं लहरा सका। जो काम तृणमूल छात्र संघ नहीं कर सकता वही अब भाजपा छात्र संगठन करना चाहता है। विगत 5 वर्षों में जादवपुर विश्वविद्यालय में कई बार हिंसक घटनाएं हुईं। 2016 में इसी तरह की घटना घटी थी जब बाहर के कुछ लोग विश्वविद्यालय में “बुद्ध इन  ट्रैफिक जाम" नाम की एक फिल्म दिखाना चाहते थे। शुक्रवार की घटना के बाद 4 प्राथमिकी दर्ज हुई और कोलकाता पुलिस द्वारा स्वप्रेरण मुकदमा भी आरंभ कर दिया गया। घटना के बाद जादवपुर विश्वविद्यालय टीचर्स यूनियन के अध्यक्ष प्रोफेसर पार्थ प्रतिम विश्वास ने लिखा कि जिस कार्यक्रम में बाबुल सुप्रियो को आमंत्रित किया गया था उस में छात्रों की संख्या बहुत कम थी तो फिर यह घटना क्यों घटी समझ में नहीं आता।  क्यों नहीं सत्तारूढ़ दल के मंत्री सामने आकर इस घटना की निंदा कर रहे हैं। छात्र संघ के सदस्य सत्तारूढ़ संगठन के विरुद्ध रहे हैं। बार-बार तृणमूल छात्र संघ इस पर कब्जा करना चाहता था और अब भाजपा ने शुरू किया है । इस बीच राजनीतिक दलों में आरोप-प्रत्यारोप का खेल शुरू हो गया है राज्यपाल धनखड़ जादवपुर विश्वविद्यालय जाने के पहले मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से बात कर चुके थे। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बाद कोलकाता ऐसा वामपंथी गढ़ बन गया है जिस पर सभी कब्जा करना चाहते हैं । यह पूरी घटना कब की लड़ाई की घटना है और एक दूसरे में भय पैदा करने की कोशिश है, ताकि उन्हें अपने अनुरूप इस्तेमाल किया जा सके। विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे करीब आ रहे हैं और ऐसे में यह सब लगातार होता रहेगा।

Friday, September 20, 2019

यह क्या हो रहा है सरस्वती के मंदिर में

यह क्या हो रहा है सरस्वती के मंदिर में?

जादवपुर विश्वविद्यालय में गुरुवार को केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के साथ कुछ छात्रों की हाथापाई हो गई। बाबुल सुप्रियो वहां अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की विचार गोष्ठी को संबोधित करने के लिए गए हुए थे। हमलावर छात्रों ने आरोप लगाया ,बाबुल सुप्रियो ने कुछ छात्रों को अपमानित किया है, महिला सहपाठियों अपशब्द कहे हैं और उन्हें धमकी दी हैं। बाबुल सुप्रियो के साथ हुई घटना के बाद राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बात की और तब मुख्य सचिव मलय कुमार डे से,  और उसके बाद विश्वविद्यालय रवाना हो गए। तृणमूल कांग्रेस ने हालांकि राज्यपाल की इस बात की आलोचना की है। यह बड़ा दुर्भाग्य जनक है कि भाजपा नेता को बचाने के लिए उन्हें जाना पड़ा। इस मामले को लेकर जितने मुंह उतनी बातें हो रहे हैं । गवर्नर ने  कहा बाबुल सुप्रियो  गुरुवार को लगभग 2.30 बजे  जादवपुर विश्वविद्यालय में गए। वहां उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा आयोजित एक विचार गोष्ठी को संबोधित करना था। लेकिन, वहां  विरोधियों ने उनका घेराव कर लिया। घेराव करने वाले  वामपंथी छात्र संगठन के छात्र थे। वे काले झंडे लिए हुए थे और "वापस जाओ - वापस जाओ " के नारे लगा रहे थे। सुप्रियो ने लौटने से इंकार कर दिया और छात्रों से बहस करने लगे। विश्वविद्यालय के कुलपति सुरंजन दास ने बीच-बचाव की कोशिश की और सुप्रिया से कहा वह विचार गोष्ठी के प्रेक्षागृह में चले जाएं।  लेकिन, ऐसा नहीं होने दिया गया। सुप्रियो को घंटे भर तक रोका गया। जब सुप्रियो प्रेक्षागृह में प्रवेश कर गये तब भी बाहर विरोधी नारे लगते रहे। इसके बाद छात्रों में 5 घंटे तक घेराव किया और उन्हें विश्वविद्यालय परिसर से बाहर जाने से रोके रखा। इसपर कुछ छात्रों का कहना है कि सुप्रियो ने  हाथ से बहुत ही खराब इशारे किए। अब हम उन्हें तब तक नहीं जाने देंगे जब तक वो माफ़ी ना मांगे। कुलपति सुरंजंदास ने सुप्रियो से कहा वे प्रेक्षा गृह में जाएं इस पर भाजपा नेता ने कहा कि "अगवानी के समय वह वहां क्यों नहीं थे? एक राजनीतिज्ञ होने के अलावा उनकी एक अलग पहचान भी है। वह एक निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, एक मंत्री हैं।  कुलपति उनकी अगवानी के लिए क्यों नहीं उपस्थित थे।" सुरंजन दास ने कहा उनको आमंत्रित नहीं किया गया था। इस पर मंत्री ने कहा "मैं तो आपके यहां आमंत्रित था। आपको  आना चाहिए था। मुझे पूरा भरोसा है कि आप वामपंथी हैं।  एक केंद्रीय मंत्री आपके परिसर में आ रहा है और आप चाहते हैं यह सब हो।" सुप्रियो ने कुलपति से कहा कि वह पुलिस बुला लें। किंतु कुलपति ने ऐसा नहीं किया। धक्का मुक्की के बाद बाबुल सुप्रीयो कथित रूप से बीमार पड़ गए। उन्हें समीप के अस्पताल में दाखिल कराया गया। सुप्रियो का आरोप है कि "उन पर हमले हुए ,उनका केश  पकड़कर खींचा गया, लात - घूसों से मारा गया। यह जादवपुर विश्वविद्यालय छात्रों से उम्मीद नहीं की जाती थी। अगर उन्हें मेरे आने से कोई समस्या से तो हमसे बात कर सकते थे।" उन्होंने कहा कि "पश्चिम बंगाल में शिक्षा की यही हालत है। उन्होंने मुझे मारा मैं क्यों माफी मांगू। कुछ गुंडे गड़बड़ी पैदा कर रहे हैं उन्हें निकाला जाना चाहिए।"
          अब यहां एक बात आती है कि राज्यपाल को  हस्तक्षेप की क्या जरूरत थी? क्योंकि घेराव दोपहर में भी चलता रहा और राज्यपाल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पहले फोन किया और उसके बाद मुख्य सचिव इसके बाद वे लगभग 7.00 बजे विश्वविद्यालय परिसर पहुंचे। उन्होंने अपनी गाड़ी में सुप्रियो को बिठाया। लेकिन , छात्रों ने उनका रास्ता रोक दिया। यही घंटे भर तक चलता रहा और राज्यपाल धनखड़ तथा सुप्रियो गाड़ी के भीतर बैठे रहे । लगभग 8.00 बजे जब एक पुलिस टुकड़ी आई और दोनों को दूसरे गेट से बाहर निकाला गया।
राजभवन से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में राज्यपाल ने इसे बहुत गंभीर घटना बताया है।  कहा है कि " एक मंत्री को रोके रखा गया यह राज्य में कानून और व्यवस्था तथा  कानून लागू करने वाली  एजेंसी  के आचरण की स्थिति का प्रतिबिंब है।" इस घटना को लेकर भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने अलग-अलग प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा के राज्य अध्यक्ष दिलीप घोष ने इसकी तीव्र निंदा की है और कहा है कि बंगाल में  केंद्रीय मंत्री भी सुरक्षित नहीं हैं वरना राज्यपाल को हस्तक्षेप नहीं करना पड़ता। दूसरी तरफ तृणमूल के वरिष्ठ नेता तापस राय ने कहा कि हम ऐसी लोकतांत्रिक पद्धति का समर्थन नहीं करते। तृणमूल  नेता पार्थ चटर्जी ने  यद्यपि राज्यपाल की भी आलोचना की और कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण और दहला देने वाली घटना है। हमारे संविधान के पालक को भाजपा नेता बाबुल सुप्रियो को बचाने के लिए जाना पड़ा।
       जो कुछ भी हुआ और उसका चाहे जो भी कारण हो लेकिन हिंसा की राजनीति कम से कम लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है  और वह भी शिक्षा के केंद्र में । राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बिल्कुल आम बात है लेकिन एक मंत्री के साथ वह भी शिक्षा संस्थान में मारपीट किया जाना सर्वथा अनुचित है। क्योंकि इससे लोकतंत्र की गरिमा और शिक्षा शालीनता दोनों नष्ट होती है। शिक्षा और लोकतंत्र दोनों हमें शालीन, गरिमा पूर्ण और धैर्यवान बनने की सीख देते हैं। हमारे समाज में  शिक्षा  संस्थान  सरस्वती का मंदिर माना जाता है। हमारे यहां एक बहुत पुरानी कहावत है "विद्या ददाति विनयम।" किंतु  यहां न शालीनता दिख रही है न विनय ना ही धैर्य। यह कैसी शिक्षा पा रहे हैं हमारे छात्र। अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी पर शारीरिक हमला कर गुस्से का इजहार अत्यंत गलत और निंदनीय है।