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Thursday, January 9, 2020

श्रमिक आंदोलन से उभरती आवाज

श्रमिक आंदोलन से उभरती आवाज 

बुधवार को जो भारत बंद था वह किसी सीएए और एनआरसी वगैरह के खिलाफ नहीं था। यह भारत बंद श्रमिकों के विरुद्ध सरकार की नीतियों के खिलाफ था। इस भारत बंद का आह्वान गत वर्ष सितंबर में ही किया गया था। इस हड़ताल का आह्वान 10 श्रमिक संगठनों ने किया था। देशभर में संगठित और असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों ने इसमें भाग लिया। उनकी मांग थी बेहतर वेतन, सामाजिक सुरक्षा, बेहतर कामकाज के हालात और श्रमिक हित वाले कानून।
      देश के कई भागों में इस हड़ताल से परिवहन सेवाएं बाधित हुईं, दुकानें बंद हुई और कई जगहों पर सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ हुई। बंगाल में कई जगह तोड़फोड़ की गई, बसों में आग लगाई गई। इस सिलसिले में  लगभग 90 लोगों को हिरासत में  लिया गया। प्रदर्शनकारी सड़कों के बीच में मोटर गाड़ियों का टायर जलाकर सड़कें रोक रहे थे। कूचबिहार ,पूर्वी बर्दवान इत्यादि जिलों में कई स्थानों पर तोड़फोड़ हुई। पूर्वी मेदनीपुर में पुलिस और प्रदर्शनकारियों में भिड़ंत हुई । प्रदर्शन में शामिल लोगों ने सेंट्रल एवेन्यू में अवरोध हटाने की कोशिश की और पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ताकत का प्रयोग किया। लेक टाउन, दम दम क्षेत्र में वामपंथी समर्थकों और तृणमूल कार्यकर्ताओं में भिड़ंत हो गई। जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्र संघ के कई छात्रों ने इसमें हिस्सा लिया। इस हड़ताल से हावड़ा ,सियालदह और खड़गपुर क्षेत्र में ट्रेनें प्रभावित हुईं और लगभग सियालदह और हावड़ा डिविजन की 175 लोकल ट्रेनों को रद्द करना पड़ा। सूत्रों के अनुसार देशभर में लगभग 30 करोड़ लोगों ने इस हड़ताल में हिस्सा लिया।
      श्रमिक संगठनों की सबसे बड़ी शिकायत प्रस्तावित औद्योगिक संबंध संहिता है। सरकार ने कहा है कि इस संहिता से पुराने और जटिल श्रमिक कानून सरल हो जाएंगे और इससे व्यापार को बढ़ावा मिलेगा तथा रोजगार बनेंगे। लेकिन श्रमिक संगठनों में विधेयक को श्रमिक विरोधी कहा है।  इसमें श्रमिकों को नियोजित करने और उन्हें बर्खास्त करने की सरलता है। श्रमिक संगठनों का कहना है उन्हें सुरक्षा चाहिए। नियोजक से वेतन तथा अन्य बातों पर वार्ता की सुविधा चाहिए। औद्योगिक संबंध विधेयक वेतन से जुड़ा है। सबसे बड़ी बात है कि हमारे देश में श्रमिकों की रोजगार सुरक्षा नहीं है। रोजगार  घटता जा रहा है और इसका मुख्य कारण है कि कौशल विकास की योजना अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकी। इसके साथ ही जो कल्याणकारी कार्यक्रम आरंभ किए गए हैं वह असंगठित क्षेत्र या गरीब ग्रामीण क्षेत्रों के रोजगार पर बहुत सीमित प्रभाव वाले हैं। सरकार के लिए श्रमिक और रोजगार नीतियां ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई हैं। 7 जनवरी को जारी आंकड़े बताते हैं कि 2019 - 20 में आर्थिक विकास 5% होगा जो 2018 19 से 1.8% कम है। इससे रोजगार घटेंगे।  इससे कामकाजी जनसंख्या में से लगभग 68.20 लोग अलग हो जाएंगे। हड़ताली श्रमिक संगठनों ने ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम तथा कृषि के लिए ज्यादा बजट की मांग की है। रोजगार का सृजन देश के विकास तथा श्रमिकों के कल्याण के लिए आवश्यक है। 2017- 18 से अब तक की अवधि से पूर्व के 7 वर्षों में लगभग 4 करोड़ लोगों को रोजगार मिले यह भारत के इतिहास में पहली बार हुआ। वर्तमान सरकार ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का सूत्रपात किया। इसका उद्देश्य था 2020 तक लगभग एक करोड़ नौजवानों को कुशलता प्रदान करना है। लेकिन ,कौशल विकास मंत्रालय केवल इसका आधा ही कर सका।  लोकसभा स्थाई समिति की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 तक जिन्हें कुशल बनाया गया। उनमें से एक चौथाई ही रोजगार पा सके।
         हमारे देश की दूसरी बड़ी समस्या है स्तरीय शिक्षा। कौशल योजना की नींव में ही दोष है। जिन नौजवानों को प्रशिक्षण दिया जाता है वह स्कूली शिक्षा में कमजोर होते हैं। दूसरी बात है कि नौजवानों को इस कार्यक्रम के तहत 3 महीने का प्रशिक्षण दिया जाता है जो कि बहुत अपर्याप्त है और नियोजक इन कथित कुशल नौजवानों के लिए ज्यादा पैसा नहीं दे सकते। सरकार अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की कोशिश कर रही है। इसके तहत लगभग 31 लाख श्रमिकों की सूची बनाई गई है और इन्हें प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना के तहत  ₹15000 तक का पेंशन दिया जाएगा। यह योजना मार्च 2019 में आरंभ की गई। लेकिन इसका बहुत ही सीमित प्रभाव है। असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को जो कुछ दिया जा रहा है वह कानून के तहत दिया जाए। उसे स्वेच्छा से दिए जाने की व्यवस्था ना हो।
     बेशक बुधवार को जो आंदोलन हुआ उसका कोई रचनात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। हां यह हो सकता है कि उसका राजनीतिक दुरुपयोग हो और इससे हालात और बिगड़ेंगे। सरकार के खिलाफ यह एक और हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और इससे कुछ नहीं होने वाला। श्रमिक संगठनों को एक तरह से सरकार के विरुद्ध औजार के रूप में यह राजनीतिक दल उपयोग में ला सकते हैं। श्रमिकों को अपने अभाव को दूर करने के लिए राजनीतिक दलों की हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं होने देना चाहिए और इसकी सुरक्षा के लिए श्रमिक संगठनों को कोई बंदोबस्त करना होगा, वरना एक बड़ी अव्यवस्था का सृजन हो सकता है।
       


Wednesday, January 8, 2020

कहां गए वह गुमशुदा बच्चे

कहां गए वह गुमशुदा बच्चे 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो एनसीआरबी ने 2016 में जब पहली बार गुमशुदा बच्चों के आंकड़े जारी किए थे। उन आंकड़ों के अनुसार 1,11,559 बच्चे हमारे देश में गायब थे जिनमें सबसे ज्यादा संख्या पश्चिम बंगाल की थी। पश्चिम बंगाल से 16,881 बच्चे गुम  हुए थे। कुल गुम हुए बच्चों में से केवल 55,944 बच्चे ही तलाश किये जा सके। 2019 में प्रकाशित 2017 के आंकड़े बताते हैं की आलोच्य वर्ष में 65,349 बच्चे गायब हुए और इनमें से 59.2% को खोजा जा सका, बाकी कहां गए? यह एक अजीब गड़बड़ी है और इसकी जांच आवश्यक है। इसमें स्पष्टता जरूरी है। अभी जो तलाश का तरीका है वह बहुत पुराना है और इसके लिए की जाने वाली पहल बहुत मामूली है। सपनों का शहर मुंबई भी बच्चों के गायब होने का मुख्य कारण है। यहां शहर के चारों तरफ जो आश्रय गृह हैं वहां बच्चे शरण प्राप्त करते हैं। इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने  एक वाकया था कि कश्मीर में माताएं पूछ रही हैं कि क्या चुनाव के बाद हमारे बच्चे जो गायब हो चुके हैं मिल जाएंगे?
       गुमशुदा बच्चों की तलाश के जो तरीके हैं वह पर्याप्त नहीं है और उसकी तकनीक बहुत ही लचर है । इन बच्चों की तलाश और फिर उन्हें पुनर्वासित करने का काम बुनियादी तौर पर उन लोगों का है जो इसके लिए प्रशिक्षित और नियुक्त किए गए हैं। यह बुनियादी स्तर पर परिवार का काम नहीं है। यह बच्चे अगर खोज भी लिए जाते हैं तो आश्रय गृहों में पड़े रहते हैं। बीमार पड़ जाते हैं। धीरे धीरे उनका घर और उनका परिवार उनके दिमाग से निकल जाता है।  इसके बाद  ख़ुद परिवार भी उन्हें तलाश नहीं पाता क्योंकि उनकी पहचान धूमिल पड़ चुकी होती है।
अब सवाल उठता है कि  गुम हो गए इन बच्चों का क्या होता है? जब कोई बच्चा कहीं फंस जाता है यL गया है की गुम होने के बाद जिन बच्चों को खोज लिया गया उन्हें खोजे जाने के 24 घंटे के भीतर बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया जाए। यद्यपि ऐसा अक्सर होता है लेकिन बच्चे को बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किए जाएं। संस्था यह तय करती है कि बच्चों को कैसे और कहां रखा जाए।
       यह बच्चे देश के अलग-अलग भागों के होते हैं और अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं। लेकिन उन्हें उनकी भाषा के राज्यों में बने आश्रय गृहों में रखने का कोई प्रयास नहीं किया जाता । जब  समझदार होते हैं तब तक अपनी भाषा भूल जाते हैं और यह भी भूल जाते हैं कि कहां के रहने वाले हैं । अगर कोई इन बच्चों को ही पता भी है तो उन्हें मालूम नहीं  कहां के रहने वाले हैं, उनके मां बाप कौन हैं या उनका पता क्या है?   फिर उन्हें बाल कल्याण समिति के पास भेज दिया जाता है और फिर वही चक्र शुरू हो जाता है। बाल कल्याण समिति के प्रोबेशन ऑफिसर इन बच्चों से बातचीत करते हैं। बातचीत बिल्कुल औपचारिक होती है । बस उनका राशन तय हो जाता है और उनकी मामूली जरूरतों के लिए इंतजाम हो जाता है और बच्चे उसी आश्रय गृह में पड़े पड़े बड़े होते हैं। उनके विकास के साथ ही उनके मां-बाप की तलाश की पूरी कोशिश ताक पर रख दी जाती है। ऐसे बच्चे जब बड़े होते हैं तो उन्हें अपने खेलकूद की धुंधली सी याद तो होती है पर स्कूल भूल जाते हैं, अपने मां-बाप या पड़ोसी का नाम भूल जाते हैं।
           यह एक ऐसा वक्त है जब इन बच्चों को सही जगह पहुंचाने का तंत्र विकसित किया जाना जरूरी है। क्योंकि सोशल मीडिया से तरह-तरह के समाचार जिसमें कई अत्यंत भ्रामक भी होते हैं इन बच्चों को बुरी तरह बरगला देते हैं। बच्चे आगे चलकर विभिन्न तरह के अपराधों में लिप्त हो जाते हैं। बचपन से प्रेम नहीं देखा, दोस्ती नहीं देखी ना उसकी तड़प जो भीतर में होती है। इसलिए यह बर्बर अपराधी बन जाते हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है जिस देश में लगभग 30000 बच्चे हर वर्ष लापता हो जाते हैं और वह कहां गए इस बात की कोई जानकारी किसी के पास नहीं है तो इन बच्चों की जवान होने तक कितनी बड़ी संख्या में ऐसे बर्बर अपराधियों की जमात खड़ी हो जाएगी जिसे नियंत्रित करना  मुश्किल होगा । आज के गुमशुदा बच्चे कल कुछ भी हो सकते हैं । इन बच्चों को खोजने और खोज की व्यवस्था को अपडेट करने के लिए उनके बारे में जानकारियां दर्ज करने के कई साधन हैं हमें देखना होगा कि उन जानकारियों में कहां चूक हो रही है। हमें अगर अपने देश को बचाना है और एक सभ्य समाज की रचना करनी है तो इन बच्चों की तलाश कर इन्हें पुनर्वासित करना होगा वरना एक बहुत ही अनिश्चित भविष्य हमारे सामने खड़ा होगा।


Tuesday, January 7, 2020

अब खतरा शिक्षा को है

अब खतरा शिक्षा को है 

रविवार की रात कुछ असामाजिक तत्त्वों द्वारा नकाब बांधकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में हिंसा को अंजाम दिया जाना एक ऐसी घटना है जिसका राजनीतिक पक्ष चाहे जो हो लेकिन हमारे भविष्य के लिए शिक्षा को खतरा पहुंचाने वाला भी है। यह रोजाना विश्वविद्यालय उसके कर्मचारियों और प्रोफेसरों पर हमले को चाहे जिस राजनीतिक चश्मे से देखें लेकिन उसका असर देश के नौजवान पीढ़ी पर जरूर पड़ेगा। यह जो कुछ भी हुआ वह एक दिन में नहीं हुआ है। जब से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय व्यवस्था विरोध का परिसर बना तब से यह कोशिशें रही हैं। उसे राष्ट्र विरोधी घोषित किया जा रहा है और इसलिए उसे दंडित किया जाना चाहिए,  ऐसी हवा बह रही है। भाजपा इन सब कार्यों के लिए टुकड़े-टुकड़े गैंग और शहरी नक्सल  जिम्मेदार बता रही है। जबकि विपक्ष का कहना है कि यह सब सत्तारूढ़ दल के संगठन द्वारा किया जा रहा है। लगातार तू तू मैं मैं हो रही है । लेकिन इससे देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षा का वातावरण बहुत तेजी से खराब हो रहा है:
इस बरस हमने जमीनों में धुंआ बोया है
फल नहीं आएंगे अब शाखों पर बम आएंगे

खबरें बताती है की लगभग 30 नकाबपोश लाठी डंडे लेकर रविवार की शाम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय  परिसर में  घुस आए। उन्होंने तोड़फोड़ की तथा छात्रों को पीटा। कई घंटे तक चले इस तोड़फोड़ में छात्राओं के साथ भी मारपीट की गई । छात्राओं का आरोप है गेट पर मौजूद पुलिस मदद मांगने के बावजूद अंदर नहीं आई।  पुलिस ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। जबकि पुलिस का कहना है कि इस मामले में वह वाइस चांसलर से अनुमति मिलने का इंतजार कर रही थी। इसलिए परिसर में  नहीं आ रही थी। हालांकि, पुलिस का यह जवाब भी माकूल नहीं था, क्योंकि ,जामिया मिलिया में सीएए के  विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने छात्रों को लाठियों से पीटा और कई छात्रों पर तोड़फोड़ के आरोप भी लगे। पुलिस का कहना है इस घटना पर प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है और जांच चल रही है।
     इस मामले पर कई पुलिस अधिकारियों की राय कुछ अलग है। उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह का मानना है कि यदि परिसर में पुलिस घुस जाती तब भी उसकी आलोचना होती। बिना अनुमति के वह कैसे भीतर आई? आपातकाल की एक बात याद आती है कि जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर छात्रों के आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने विश्वविद्यालय और कॉलेज परिसरों में घुसकर कार्रवाई की थी और इसके बाद इसका भयानक परिणाम हुआ था। इसके बाद सरकारी आदेश हो गया था किT रिप्लेस प्राचार्य या कुलपति के अनुमति के बगैर परिसर में नहीं प्रवेश कर सकती है और अगर परिसर में प्रवेश करना बहुत आवश्यक हुआ तो पुलिस का इक्का-दुक्का अधिकारी भी बावर्दी भीतर नहीं जा सकता। उसे नागरिक लिबासों में ही भीतर जाना होगा। जेएनयू की इस घटना में भी लगभग यही समीकरण काम कर रहा है। प्रश्न यह है कि विश्वविद्यालय  प्रशासन ने कितने बजे पुलिस को बुलाया, पुलिस कब पहुंची।  छात्र संघ का कोई पदाधिकारी अगर पुलिस को भीतर बुलाता है तो पुलिस नहीं आ सकती। क्योंकि इसके बाद सवाल उठेंगे कि बिना बुलाए पुलिस अंदर क्यों आई? हालांकि इस थ्योरी में एक दोष है कि अगर पुलिस घटनास्थल पर खास करके विश्वविद्यालय परिसर में इसी तरह अनुमति का इंतजार करती रही तो बहुत कुछ हो सकता है। इस परंपरा को तोड़ना होगा। क्योंकि, आजकल के हमलावर खासकर के नौजवान लड़के पिस्तौल, छुरी लेकर ,बम लेकर परिसर में घुसते हैं ।  अगर पुलिस  को सूचना प्राप्त होती है तो उसे कैंपस में जाकर तुरंत घटना को रोकना चाहिए। वाइस चांसलर की अनुमति का इंतजार नहीं करना चाहिए। लेकिन इस स्थिति को हमारे समाज को भी स्वीकार करना होगा। समाज और मीडिया अपने हिसाब से चीजों को देखती है । जहां सुलभ है या उनका नजरिया मिलता है वहां तो वह कह देते हैं कि पुलिस को अंदर जाना चाहिए और जहां उनका नजरिया नहीं मिलता है वह इसका विरोध करते हैं। इस नजरिए को बदलना होगा क्योंकि आजकल लगभग हर बड़े विश्वविद्यालय के परिसर में हिंसक घटनाएं हो रही हैं। जेएनयू से जादवपुर तक हाल के दिनों में हुई हिंसक घटनाओं को देखा जा सकता है। अगर पुलिस हर बात पर अनुमति मांगती रही तो हो सकता है परिसर के भीतर कुछ छात्रों की हत्या भी हो जाए। यहां एक सवाल उठता है कि क्या पुलिस के क्या सूत्रों के पास ऐसी घटनाओं की जानकारी नहीं थी और अगर थी तो उस पर एक्शन क्यों नहीं लिया गया। इससे पुलिस पर से भरोसा घटता है।
      दूसरी तरफ विश्वविद्यालय परिसर में हुई घटना को लेकर छात्र संघ के पदाधिकारी और सदस्य एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। ऐसी स्थिति किसी भी पुलिस के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। दिल्ली की इन घटनाओं को अगर उदाहरण स्वरुप लें तो ऐसा लगता है यह पुलिस ने अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभाई। दिल्ली की एक अदालत के में घुसकर कर पुलिस ने वकीलों से मारपीटJ की जामिया मिलिया में सीए ए का विरोध करने वाले छात्रों को परिसर में घुसकर पुलिस ने पीटा और जेएनयू में आंख के सामने छात्र  पिटते रहे पुलिस से मदद की गुहार लगाकर रहे लेकिन प्लेस परिसर में नहीं आई। दिल्ली पुलिस लीडरशिप में यह एक भयानक चूक है। या, प्रशिक्षण में मौजूदगी में और इंटेलिजेंस में कचू ही न कही है या फिर तीनों जगह है इस घटना के लगभग 24 घंटे से ज्यादा हो गए लेकिन अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हो सकी। घायल छात्रों को ट्रामा सेंटर पहुंचाया गया।पुलिस का कहना है कि इस घटना की क्राइम ब्रांच जांच करेगी और सारे सीसीटीवी फुटेज इकट्ठे किए जा रहे हैं। जांच शुरू कर दी गई है हालांकि कई भूतपूर्व पुलिस अधिकारियों का मानना है कि हमारे देश   में पुलिस स्वतंत्र नहीं है। जो भी सरकार सत्ता में होती है उसका असर उस पर होता है। इस सियासत को चाहे आप जिस नजरिए से देखें
      उसको मजहब कहो या सियासत कहो
       खुदकुशी का हुनर तुम सिखा तो चले

ऐसा चाहे जो कुछ भी हो लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है कि जिस उद्देश्य के लिए किसी विश्वविद्यालय की स्थापना होती है वह उद्देश्य पूरा होता  नजर नहीं आ रहा है। किसी भी विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य वहां पढ़ाई होती है अभी जो कुछ भी हुआ उसमें चाहे जो समीकरण काम करता हो लेकिन सबसे ज्यादा आघात शिक्षा को लगा है। यह एक अजीब नियति है हमारे छात्रों नौजवान छात्र ऐसी उत्तेजित स्थितियों में कूद पड़ते हैं और फिर सियासत के औजार बन जाते हैं। इन आंदोलनों में भी वही हो रहा है:
     जिस तरह चाहो बजाओ तुम हमें
      हम नहीं हैं आदमी ,हम झुनझुने हैं


Monday, January 6, 2020

सीएए : भाजपा घर-घर जाकर बताएगी

सीएए : भाजपा घर-घर जाकर बताएगी 

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देशभर में तरह-तरह के मत विमत फैले हुए हैं। भारी बवाल मचा हुआ है। हजारों लोग इसके खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। लेकिन दुखद यह है कि हमारे देश में जो लोग भी इस तरह के प्रदर्शन या बवाल करते हैं उनमें से अधिकांश को मालूम नहीं कि यह है क्या? इसका असर देश की जनता पर कैसा पड़ेगा और क्यों पड़ेगा? लोग बस एकजुट होकर इसका विरोध कर रहे हैं। पहली बात कि सी ए ए को हमारे देश में जनता की डेमोग्राफिक स्थिति तैयार करने के लिए बनाया गया एक कानून है। छोटी सी बात है कि ,हमारा देश संविधान के अनुसार एक कल्याणकारी राज्य है, वेलफेयर स्टेट है। ऐसे में देश की जनता के कल्याण का जिम्मा हर वक्त सरकार पर होता है। लेकिन हमारी सरकार चाहे वर्तमान हो चाहे इसके पहले वाली हो उसे यह नहीं मालूम कि हमारे देश की जनता क्या स्टेटस  है ? कैसे लोग हैं? शिक्षा की क्या स्थिति है ?रोजगार कितना है और कितने लोगों को चाहिए ? जिन को रोजगार नहीं मिला है उन्हें  जीविका का साधन क्या मुहैया कराया जाए वगैरह। इस कानून के खिलाफ अचानक कुछ निहित स्वार्थी राजनीतिक दल सड़क पर आ गए।  उन्हें अपनी राजनीति की रोटी सेकनी है इसलिए वे इसका न केवल विरोध करने लगे बल्कि लोगों में यह भावना भर दी कि इस से उनको भारी हानि होगी। देश में जो संप्रदाय सदियों से रहते आ रहे थे और जिनमें काफी मिल्लत थी उन्हें भी आपस में बांट दिया। जरा सोचिए कि किसी परिवार के मुखिया को यह नहीं मालूम है कि हमारे परिवार की जरूरतें क्या हैं तो वह कैसे उन्हें खुश रखेगा। कैसे उनकी जरूरतों को पूरा कर पाएगा ? नतीजतन असंतोष बना रहेगा । भाजपा इसी उद्देश्य के लिए आज से घर-घर जाकर लोगों को बताएगी कि आखिर क्या है  सी ए ए इससे क्या लाभ और क्या हानि है? भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने घर-घर जाकर लोगों को यह बताने का जिम्मा उठाया है। उनके साथ पार्टी के और लोग रहेंगे । भारतीय नागरिकता कानून के आने के बाद यह अब तक का सबसे बड़ा जन जागरण अभियान है। इस अभियान के तहत एक ही दिन में देश के 42 स्थानों में पार्टी के 42 बड़े नेता मौजूद रहेंगे और घर घर जा जाकर लोगों को बताएंगे कि इसका सच क्या है। 10 दिन के इस अभियान में देश के तीन करोड़ लोगों को इसके बारे में जानकारी दे दी जाएगी।
          नागरिकता संशोधन कानून को लेकर मचे बवाल के बीच अमित शाह ने विपक्ष पर जमकर हमला किया। उनका कहना है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा जनता को गुमराह कर रहे हैं। इन लोगों ने दंगे करवाने का काम किया है। गौर करें कि पिछले 70 वर्षों से हम एक सवाल से जूझ रहे हैं वह कि हमारे देश को नियम बनाने वाला बनना होगा या नियम पालन करने वाला। अब तक हमारी स्थिति नियम पालन करने वाले की है। वरना ऐसा क्या था की असम से तीन बार लोकसभा पहुंचे एम के सुब्बा क्या चुनाव लड़ पाते।  जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई ने उनके दस्तावेजों की जांच की तो पता चला सारे दस्तावेज फर्जी हैं। एक देश जो नागरिकता कानून का इतना गंभीर विरोध कर रहा है वह देश शायद यह नहीं समझ पा रहा है कि यह नागरिकता कानून से एमके सुब्बा जैसे लोग नियम बनाने वालों जमात से अलग हो जाएंगे । नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर सबसे बड़ा दुष्प्रचार तो यह किया जा रहा है इससे मुसलमानों को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा। इसे लेकर  हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। मुस्लिम समुदाय को लगता है ऐसा सचमुच हो जाएगा। यह स्वतःस्फूर्त पनपा हुआ गुस्सा नहीं है। क्यों फिर लोगों को यह नहीं बताया जा रहा है  नागरिकता का यह कानून अल्पसंख्यकों को भारत से निकाल दे के बारे में नहीं है सरकार ने संसद में साफ कहा है कि  किसी भी मुसलमान को यहां से निकाला नहीं जाएगा। इसके प्रावधानों से नागरिकों को अवगत कराने की जरूरत है और इसके लिए विस्तृत प्रचार प्रसार करना होगा। जैसा कि  ऊपर भी कहा जा चुका है  कि नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रीय नागरिक पंजी के मुद्दों को लेकर राजनीतिक दलों और संगठनों के आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे लोगों में से अधिकांश को उन मुद्दों की जानकारी ही नहीं है। कहीं कुछ लोग कह रहे हैं इस सरकार ने मुसलमानों को वापस भेजने का कानून बनाया है तो कहीं आंदोलनकारी नौजवान यह कहते सुने जा रहे हैं कि लालू यादव को छुड़ाना है तो तानाशाही नहीं चलेगी। यह किस की तानाशाही यह उन्हें मालूम नहीं है। बेशक जो नई पंजी बन रही है जनता के लिए उसमें 2021 में होने वाली जनगणना कार्यक्रम के प्रारूप में कुछ फेरबदल किया जाए और हर नागरिक के लिए अलग से कुछ जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य हो जाए। इस समय यद्यपि 3 देशों से 31 दिसंबर 2014 तक आए हिंदू , सिख  , बौद्ध, पारसी, ईसाइयों, जैन शरणार्थियों को भारत की नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान करने संबंधी नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में जबरदस्त आंदोलन चल रहा है। लेकिन इसमें किसी भी भारतीय को देश से बाहर निकाले जाने की बात तो है ही नहीं। इसमें श्रीलंका से आए तमिल शरणार्थी या फिर नेपाल से आने वाली हिंदुओं को भी भारत की नागरिकता देने का कोई प्रावधान नहीं है। असम में जो राष्ट्रीय नागरिक पंजी तैयार की गई उसका काम उच्चतम न्यायालय के निर्देश और उसकी ही देखरेख में संपन्न हुआ। लेकिन पंजी के प्रकाशन के साथ ही विवादों का पिटारा खुल गया। अलबत्ता लाखों लोग इस वजह से बाहर हो गए। इसकी वजह चाहे जो भी रही हो लेकिन पहली नजर में ही लगता है की तैयार करने की प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण थी इसमें पारदर्शिता का अभाव था। नागरिकता के मसले की अपनी-अपनी तरह से व्याख्या करके राजनीतिक दल और कुछ संगठन कुछ समय के लिए समाज के एक वर्ग वर्ग या समुदाय को उद्वेलित और आंदोलित करने में सफल हो सकते हैं, लेकिन उन्हें ध्यान रखना होगा इसकी आड़ में हो रही हिंसा से जहां देश की संपत्ति को नुकसान पहुंच रहा है वहीं सरकार की ओर से की जाने वाली कार्रवाई के शिकार कोई नेता नहीं बल्कि आम आदमी हो रहा है। इसलिए जरूरी है इस मामले में संयम बरता जाए। हिंसा ना हो और सरकारी संपत्ति को नुकसान ना पहुंचे इसके लिए ही भारतीय जनता पार्टी ने घर-घर जाकर लोगों को इस कानून की सच्चाई बताने की शुरुआत की है यह एक अच्छी शुरुआत है, बशर्ते इसके बावजूद लोगों को गुमराह कर राजनीतिक की रोटी ना सेकी जाए।


Sunday, January 5, 2020

विश्व युद्ध के बादल उमड़ने लगे हैं

विश्व युद्ध के बादल उमड़ने लगे हैं 

युद्ध की अमेरिकी राष्ट्रपति की क्षमता विगत दो दशकों में काफी बढ़ गई है । 11 सितंबर के हमले के बाद ऐसा लगता है कि अमेरिकी सरकार एक अनंत युद्ध की शुरुआत कर चुकी है। आज क्षमता एक ऐसे राष्ट्रपति के हाथ में है जो अत्यंत उत्तेजनाशील है राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी सेना प्रमुख को मार डालने  इजाजत देकर इस अनंत युद्ध का शंख फूंका। डोनाल्ड ट्रंप ने  को चेतावनी दी है अमेरिका इरान के बावन ठिकानों पर हमला करने की योजना बना रहा है अगर ईरान ने किसी  अमेरिकी नागरिक या संपत्ति पर हमला किया उस पर बहुत ही मजबूती से हमला किया जाएगा अमेरिका ने ईरान के शीर्ष कमांडर कासिम सुलेमानी की शुक्रवार को हत्या कर दी कासिम सुलेमानी अमरीका के एक हवाई हमले में मारे गए जनरल सुलेमानी की मौत के बाद ईरान की बातों से अमेरिकी राष्ट्रपति चुने गए और उनका मानना है कि ईरान अमेरिकी ठिकानों और अमेरिकी लोगों पर   हमला करेगा। सुलेमानी की हत्या अमेरिका का ईरान के खिलाफ़ युद्ध की घोषणा से कम नहीं है। सुलेमानी की मौत ईरान के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है उसके महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जैसे ही सुलेमानी ने दम तोड़ा उसके फौरन बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रीय झंडे की तस्वीर ट्वीट की।
दूसरी तरफ इस मौत के बाद ईरान में 3 दिन का शोक घोषित किया गया और ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खोमेनी ने इस हमले के अपराधियों से गंभीर बदला लेने की बात की और कहां की इस अवसर की प्रतीक्षा की जाएगी। ईरान सरकार के प्रवक्ता ने कहा की रणनीति तैयार की जा रही है ईरानी विदेश मंत्री  ने इसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की संज्ञा दी। अमेरिकी हमले में जनरल  की मौत के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हड़कंप मचा हुआ है और सब को शक है कि कहीं यह मसला गंभीर रूप ना ले ले। यहां तक कि कुछ लोगों को शक है कि यह विश्वयुद्ध की शुरुआत की भूमिका हो सकती है । जबकि अमेरिका के लिए जनरल सुलेमानी की मौत बहुत बड़ी बात नहीं है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे राष्ट्रीय गौरव की तरह पेश कर रहे हैं। ऐसे में एक सवाल उठता है कि आखिर जनरल स
सुलमानी में ऐसा क्या था कि इस तरह की बातें उठ रही हैं और अमेरिका ने उनको घेर कर ठिकाने लगाया। ऐसा क्या था जनरल सुलेमानी में? जहां तक खबर है जनरल सुलेमानी ईरानी पावर स्ट्रक्चर में बहुत महत्वपूर्ण थे, और  खोमैनी के बाद वह ईरान में दूसरे सबसे ताकतवर इंसान थे। जनरल सुलेमानी ईरान की एलीट सेना क़ुद्स फोर्स के प्रमुख थे।  यह फोर्स विदेश में ईरानी हितों के हिसाब से किसी का साथ किसी का विरोध करती थी।
        इस मौत पर अमेरिकी रक्षा विभाग ने एक बयान जारी कर कहा है कि राष्ट्रपति के निर्देश पर विदेश में रह रहे अमरीकी सैन्य कर्मियों की रक्षा के लिए सुलेमानी को मारने का यह कदम उठाया गया। अमेरिका ने उसे आतंकवादी घोषित कर रखा था। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा जनरल कासिम सुलेमानी को बहुत पहले ही मार दिया जाना चाहिए था। इसराइल ने भी अमेरिकी कदम का स्वागत किया है और इसराइल के प्रधानमंत्री नेतनयाहू ने कहा कि अमेरिका अपनी आत्मरक्षा का अधिकार रखता है। लेकिन, अमेरिकी संसद के अध्यक्ष नैंसी पेलोसी ने कहा अमेरिका के हमले से हिंसा में इजाफा होगा। रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के अनुसार इससे इस क्षेत्र की हालत और भी खराब होंगे।
         हाल के वर्षों में अमेरिका ने कई लोगों की हत्या के लिए जोखिम भरे मिलिट्री ऑपरेशंस किए। उसका मानना है कि ये लोग अमेरिका के लिए खतरा थे। जिन पर हमले किए गए उनमें सबसे प्रमुख थे अलकायदा के अध्यक्ष ओसामा बिन लादेन इत्यादि। लेकिन शुक्रवार का यह हमला बिल्कुल अलग था। सुलेमानी के मोटर काफिले पर हमला करके उसे मार डाला गया।  अमेरिका ने अपने नागरिकों कहा है कि वे इरान छोड़ दें। ईरान के पास तेल का विशाल भंडार है और इस हमले से तेल की कीमतों पर प्रभाव पड़ेगा। या कल्पना से बाहर है की इरान इसका कोई जवाब नहीं देगा या इस पर कोई आक्रमक टिकरिया नहीं होगी। इराक में तैनात 5000 सैनिक संभवत इराक के लक्ष्य पर होंगे ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि अतीत में ईरान और उसके समर्थकों से जवाबी कार्रवाई के तौर पर ऐसा ही किया है। मौजूदा स्थिति में यह भी आशंका है कि ईरान सुलेमानी के बनाए गए और फंड किए गए घुटनों से व्यापक समर्थन हासिल करने का प्रयास करे और यह प्रयास युद्ध को भड़का सकता है आने वाले दिनों में दुनिया को सचेत रहना पड़ेगा क्योंकि इसकी असंयमित प्रतिक्रिया जरूर होगी और उस प्रक्रिया का स्वरूप क्या होगा यह अभी से कहना मुश्किल है।


Friday, January 3, 2020

संसद का विरोध छोड़िए जरा पाकिस्तान के बारे में भी तो बोलिए

संसद का विरोध छोड़िए जरा पाकिस्तान के बारे में भी तो बोलिए 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को कांग्रेस पर तंज करते हुए कहा कि संसद का विरोध छोड़िए पाकिस्तान की कारस्तानियों का खुलासा कीजिए। उन्होंने नागरिकता संशोधन विधेयक पर चल रहे विरोध का नेतृत्व करने के कारण कांग्रेस को आड़े हाथों लिया। मोदी ने कहा पाकिस्तान धर्म के आधार पर बना राष्ट्र है  और वहां धार्मिक अल्पसंख्यकों पर जुल्म होते हैं। जो सताए हुए लोग हैं वह शरणार्थियों की तरह या कहें अपनी और अपने परिजनों की जान बचाने के लिए भारत  आने के लिए बाध्य हो जाते हैं। क्योंकि उनकी निगाह में भारत ही उनके लिए सुरक्षित देश है। लेकिन कांग्रेस और इसके साथी  पाकिस्तान के बारे में कुछ नहीं बोलते। उल्टे उन शरणार्थियों के बारे में जुलूस निकालते हैं। इन गतिविधियों पर उन शरणार्थियों के भीतर क्या गुजरती होगी यह कभी उन्होंने सोचा नहीं । उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूं कि पाकिस्तान की गतिविधियों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्दाफाश किया जाए। अगर आप आंदोलन करते हैं तो विगत 70 वर्षों में पाकिस्तान की कारस्तानियों के खिलाफ आवाज उठाइए। पाकिस्तान वहां के अल्पसंख्यकों पर जुल्म कर रहा है वहां धीरे-धीरे अल्पसंख्यकों की संख्या घटती जा रही है।  यहां अपने देश में कांग्रेस तथा उसके साथी संसद के खिलाफ आवाज उठाते हैं। मोदी जी ने कहा कि भारत पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को उनके भाग्य पर छोड़ नहीं सकता। उनकी हिफाजत करना भारत की जिम्मेदारी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भाजपा की सरकार लोक कल्याण के लिए काम करती है।
        दूसरी तरफ प्रधानमंत्री पर बेबुनियाद छींटाकशी करते हुए कांग्रेस के नेताओं ने कहा कि जब भी प्रधानमंत्री पराजित हो रहे होते हैं तो वह पाकिस्तान का शिगूफा उठा देते हैं, सबको पाकिस्तानी कहने लगते हैं। कांग्रेस के नेताओं ने सफाई देते हुए कहा की यह संसद का विरोध नहीं है, बल्कि सरकार के एजेंडे का विरोध है। कांग्रेस ने कहा कि प्रधानमंत्री के मन में संसद की कोई प्रतिष्ठा नहीं है। संसदीय लोकतंत्र में आप केवल एक विचार या पार्टी या आदर्श को लेकर नहीं चल सकते। विधेयकों के खिलाफ बात होती है यह कोई नई बात नहीं है। कांग्रेस ने इसे चुनौती दी है तो प्रधानमंत्री कैसे कह सकते हैं कि हम अथवा कांग्रेस संसद के खिलाफ हैं। कांग्रेस ने कहा कि नए साल में भारत सरकार से कुछ नया चाहता था।  लेकिन प्रधानमंत्री वही घिसीपिटी बातें कर रहे हैं वही पाकिस्तान, वही नकली राष्ट्रीयता। कांग्रेस ने यहां तक बेतुकी बात कह दी कि प्रधानमंत्री द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत लागू करना चाहते थे लेकिन कर नहीं पाए। कांग्रेस ने कहा कि आजादी के समय से ही भारत और पाकिस्तान एक दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं। वे क्यों नहीं बोलते? चीन आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर की बात उठाता है। लेकिन प्रधानमंत्री ने कभी भी एक शब्द उसके विरुद्ध नहीं कहा।  अधिकृत कश्मीर के  रास्ते चीन एक सड़क बना रहा है प्रधानमंत्री क्यों चुप है?  वे पाकिस्तान पर आगबबूला हुए जा रहे हैं इसलिए उनमें   चीन के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं है।
        प्रधानमंत्री का यह कथन कई मायनों में सही भी है। क्योंकि पाकिस्तान अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहा है। पाकिस्तान की आतंकवादी गतिविधियों की मदद और उनका संरक्षण जग जाहिर होता जा रहा है। अभी गुरुवार को ही  अमेरिकी विमानन नियामक प्राधिकरण (एफ ए ए) ने चेतावनी दी है कि पाकिस्तान के वायु मार्ग से जब गुजरे तो सावधानीपूर्वक गुजरें। अमेरिकी उड़ान सेवाओं को पाकिस्तान के आतंकियों से खतरा है। इस चेतावनी में एयरपोर्ट पर मौजूद हवाई कंपनियों के स्टाफ को भी चेतावनी दी गई है।
         कुल मिलाकर प्रधानमंत्री ने जो पाकिस्तान का मसला उठाया है वह गलत नहीं है।  सचमुच उस  देश से आए अल्पसंख्यकों की हिफाजत करना भारत के लिए  एक जिम्मेदारी है। बेशक विरोधी दल किसी भी बात को चाहे जिस दृष्टिकोण से देखें लेकिन मानवीयता का अपना एक  दृष्टिकोण होता है
, जिसमें सहानुभूति और सहृदयता बड़ी बात है। जहां तक सीएए की बात है उसमें कुछ ऐसा है ही नहीं कि जिस पर राजनीति की जाए। लेकिन विपक्षी दल सीएएए और मुस्लिम समुदाय को जोड़कर कुछ न कुछ राजनीतिक तमाशा कर ही रहे हैं। देश के लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए और गुमराह नहीं होना चाहिए।


Thursday, January 2, 2020

मौलिक नागरिकता! काश ऐसा होता!!!

मौलिक नागरिकता! काश ऐसा होता!!! 

2014 में जब नरेंद्र मोदी ने एक नारा दिया था "मैक्सिमम गवर्नेंस मिनिमम गवर्नमेंट" तो मतदाता मुग्ध हो गए थे । क्योंकि सारे मतदाता याकहें कि मतदाताओं का भी बहुत बड़ा भाग यह सोचता है कि सरकार हमारी जिंदगी में बहुत ज्यादा दखलंदाजी करती है और हमें प्राप्त बहुत कम होता है।  कम सरकार और अधिकाधिक शासन के बीच एक अंतर्विरोध है। अंतर्विरोध को कौन कम कर सकता है लोग उस तरफ देखते हैं, जिसे सरकार प्रभावशाली ढंग से सुलझा सकती है। यह सोचने योग्य तथ्य है कि फिलहाल नागरिकता संशोधन विधेयक और नागरिकता रजिस्टर को इस विचार के चश्मे से देखें। जो लोग आंकड़ों को जमा करते और उनका विश्लेषण करते हुए जवान से बूढ़े हो गए वे जानते हैं की यह कितना कठिन काम है कि कोई आदमी पूरी तरह सही बात कह दे जो उसके मन में है। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने हाल में अपने एक लेख में लिखा कि "उन्होंने पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना 20 महिलाओं से यह पूछा कि उनका जन्म कहां हुआ किसी ने नहीं बताया कि उसी गांव में हुआ है। किसी ने कहा कि फलां जगह हुआ है तो उस जगह हुआ है ,वह यहां से घंटा -2 घंटे की दूरी पर है और  अनिश्चित दिशा में हाथ उठाकर उन्होंने उस जगह की ओर इशारा किया। आखिर मिला क्या कुछ भी सही नहीं।" उसी तरह इस शहर कोलकाता में या अन्य बड़े शहरों में बहुत से लोग ऐसे होंगे जिन्हें इतना तो मालूम है कि उनका जन्म इसी शहर में हुआ है लेकिन उनके माता पिता या दादा का जन्म कहां हुआ है और अगर मालूम भी है तो कोई  निश्चित नहीं है कि वह जगह कहां है। अगर वे अपनी नागरिकता नहीं बता सकते हैं तो दोषी हैं और विदेशी हैं।  उन्हें किसी भी राज्य का नागरिक होने का अधिकार नहीं है, या फिर कुछ अफसरों की दया पर उनका पूरा का पूरा भविष्य निर्भर करता है। वह अफसर यह तय करेंगे की उन्हें किस दर्जे में रखा जाए । यह बड़ा जोखिम भरा काम है। यह "कम से कम सरकार और ज्यादा से ज्यादा शासन का उदाहरण नहीं है। यह अफसरशाही को बढ़ावा देता है और जिंदगी के बुनियादी हक में अफसरशाही को दखल देने का मौका देता है।" अगर आप उस देश के नहीं हैं जहां आप पैदा हुए हैं और अपनी जिंदगी गुजारी है कुछ लोग यह नहीं जानना चाहेंगे कि आप कहां के हैं और किस देश के वासी हैं। आज बहुत से नौजवानों के साथ ऐसा ही हो रहा है। एक अजीब किस्म की अपमानित और एक बेगान ए पन के बीच वे जी रहे हैं।
              लेकिन तभी कुछ ऐसा है जिस पर सरकार को सोचना चाहिए। इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है कि पूरी प्रक्रिया यह इशारा करती है की प्रवासी एक समस्या हैं। । यहां तक कहा जा रहा है कि सभी प्रवासी चाहे वह जिस धर्म के भी क्यों ना हो एक समस्या हैं। यही कारण है की सी ए ए वहां एक अभिशाप है और एनआरसी इसीलिए  अलोकप्रिय है। इससे पर्याप्त विदेशियों की पड़ताल नहीं हो सकती।  अभिजीत बनर्जी ने अपनी हाल की पुस्तक गुड इकोनॉमिक्स फॉर हार्ड टाइम्स में लिखा है कि " किसी भी कुशन या न्यूनतम कुशल व्यक्ति केअर्ध कुशल के लिए कोई अर्थव्यवस्था नहीं है। सभी सबूत यह बताते हैं की न्यूनतम कुशल व्यक्ति की बड़ी संख्या किसी भी अर्थव्यवस्था पर प्रभावशाली नहीं है। यही कारण है कि रोजगार की तलाश में आए लोग अवसर की ताक में रहते हैं और छोटी-छोटी नौकरियों में छोटे-छोटे रोजगार में लग जाते हैं।
        मध्यवर्गीय समाज के लिए वास्तविक समस्या यही है। चिंता का कारण यह है कि बाहर से आए लोग इन छोटी-छोटी नौकरियों को हासिल कर लेते हैं या कहें आय के इन   छोटे-छोटे साधनों खासकर  सरकारी नौकरियों को हथिया लेते हैं जिस पर आज तक उनका अधिकार था। लेकिन यह हमारे अच्छे शासन की पहचान नहीं है। छोटी-छोटी नौकरियों के लिए घमासान होता रहता है। 2019 के आंकड़े बताते हैं इस वर्ष रेलवे के 63,000 छोटे पदों  के लिए 19 लाख लोगों ने आवेदन किया था। यह स्थिति बताती है कहीं ना कहीं बहुत बड़ी गलती या बहुत बड़ा धोखा हमारे साथ हो रहा है। इसके साथ ही जो बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न  है कि स्थानीय आबादी के लिए आर्थिक न्याय क्या है? अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। तो निकट भविष्य में यह प्रश्न उठने वाला है। सवाल होगा की बंगाली हिंदू परिवार के तमिल भाषी लोगों को वहां राज्य सरकार में नौकरी मिलेगी  या फिर बिहार के  मराठी भाषी युवकों को महाराष्ट्र में सरकारी नौकरी दी जाएगी? इस बात की क्या चिंता करते हैं कि निजी क्षेत्र में अच्छी नौकरी क्या है? सबसे महत्वपूर्ण है इस बात का उत्तर मिलना कि  ऐसी सूरत में सरकार की भूमिका क्या होगी? क्या मुंबई शहर केवल मुंबईकरों के लिए है? अगर अनेकता का यह जिन्न जितनी जल्दी बोतल में बंद कर दिया जाए उतना ही अच्छा है।  ऐसी स्थिति में सबसे अच्छा तरीका है कि हम भारत माता के संतान -वफादार संतान बने रहें और वसुधैव कुटुंबकम के अपने वैदिक नारे का अनुपालन करते रहें। हम भारत के मौलिक नागरिक बने। हमारे देश की आबादी 1.3 अरब है और अभी जो कुछ हो रहा है उसमें कुछ लाख अचानक गायब हो जाएंगे जाएंगे और वस्तुतः हम दुनिया के ध्रुव तारा बन जाएंगे क्योंकि इसी मार्ग का हो सकता है अन्य देश भी अनुसरण करें।