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Sunday, July 26, 2020

युद्ध को चीन की धरती पर ले जाना जरूरी



युद्ध को चीन की धरती पर ले जाना जरूरी





अब से हजारों वर्ष पहले महाभारत का युद्ध हुआ था और उसमें कितनी जान हानि हुई थी इसके बारे में कोई गिनती नहीं है बस उस दिन से युद्ध हमारा गौरव का विषय हो गया। हमारे नेता हमारे सैनिकों को सीमा पर भेज के शहीद करते हैं और इसे देश की शान तथा लज्जा से जोड़ देते हैं।


जो आप तो लड़ता नहीं


कटवा किशोरों को मगर


आश्वस्त होकर सोचता है


शोणित बहा , लेकिन,


गई बच लाज सारे देश की


और तब सम्मान से जाते गिने


नाम उनके, देशमुख की लालिमा


है बची जिनके लुटे सिंदूर से


देश की इज्जत बचाने के लिए


या चढ़ा दिए जिसने निज लाल हैं


आज भारत का याद आ रहा है। लेकिन तब के युद्ध में और आज के युद्ध में बहुत बड़ा अंतर है। पिछले दिनों भारतीय सेना और चीन की सेना में पूर्वी लद्दाख में झड़प हो गई। हमारे 20 सैनिक शहीद हो गए। इसके बाद कूटनीतिक एवं सैन्य स्तरीय वार्ताएं चली और दोनों पक्ष उस इलाके से पीछे हटने पर सहमत हो गए। पर, चीन ने उस सहमति का सम्मान नहीं किया और बड़ी संख्या में उसकी फौज वहां कायम रही। ऐसे हालात में मीडिया को एक व्यवस्थित तरीके से उस क्षेत्र के कथानक मुहैया कराने के स्रोत भी मौन हो गए। जो खबरें पहले पन्ने पर होती थी वह भी चली गईं। यह स्थिति चीनी सेना के दक्षिणी शिंजियांग सैन्य क्षेत्र के कमांडर मेजर जनरल लियू लिन के कठोर और अड़ियल रवैया के कारण उत्पन्न हुई सी लगती है। लिन देपसांग से किसी भी तरह से पीछे हटने को तैयार नहीं है। उन्होंने इसे चीनी भू भाग होने का दावा करते हैं। हॉट स्प्रिंग के उत्तर कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां से चीन थोड़ा पीछे हटा है बेशक सीमित स्तर पर ही , लेकिन वह पीछे हटना समझौते के अनुरूप नहीं हैं। चीन उस क्षेत्र को लेकर बड़ा ही सक्रिय है क्योंकि वहीं से गलवान नदी के ऊपरी क्षेत्र की राह निकलती है। गोगरा इलाके में भी बात है इसलिए जो समझौता हुआ वह पूरी तरह पालन नहीं किया जा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक हफ्ते पहले लद्दाख में सेना को संबोधित करते हुए कहा था कि वास्तविक नियंत्रण रेखा उपरोक्त स्थिति पर खुलकर बातचीत हुई और अभी भी बातचीत चल रही है लेकिन कितना समाधान हो पाएगा यह कहना मुश्किल है। इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती है लेकिन दुनिया की कोई भी ताकत हमारी 1 इंच जमीन नहीं ले सकता। मई में चीनी अतिक्रमण के बाद या पहली बार अधिकृत तौर पर कहा गया है कि चीन जहां तक घुस आया है उस इलाके को खाली नहीं करना चाहता है।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विपक्ष में आरोप लगाया है कि सख्त नेता की छवि को कायम रखने के लिए इस मुद्दे पर भ्रम का सहारा लिया जा रहा है। चीन की हठधर्मिता और अड़ियल रवैये के सामने भारत के पास दो ही विकल्प और वह हैं चीन द्वारा आरंभ किया गया युद्ध और दूसरा भारत द्वारा छेड़ी गयी जंग। अगर चीन युद्ध आरंभ करता है तो उसका परिदृश्य पाकिस्तान की तरह एटमी आराम तक भी खिंच सकता है। चीन ऐसा कई बार इशारा भी कर चुका है।यदि भारत ने आगे बढ़कर चीनी कार्रवाई के चलते वर्तमान स्थिति को स्वीकार करने हो तैयार नहीं होता है संभव है कि चीन की शेरा इस स्थिति को अनिश्चित काल तक के लिए खींचेगी या फिर या फिर अपनी बात मनवाने के लिए भारत को पूरी तरह से उस क्षेत्र में पराजित करने के बारे में सोचे। भारत के मुख्य रक्षा पंक्ति बहुत ऊंचाई पर है और जो वास्तविक नियंत्रण रेखा पर है 10 से 80 किलोमीटर दूर है। अब अगर युद्ध होता है तो संभावना है कि भारत के मुख्य रक्षा पंक्ति से आगे वह लड़ेगा। ऐसी स्थिति में हमारा मुख्य उद्देश्य चीन की सेना को रोकने के साथ उससे अधिक या बराबर की जमीन पर अधिकार का होना चाहिए ताकि सौदेबाजी की जा सके। शत्रु को पीछे धकेलने के लिए हमारे पास सेना की कमी नहीं है। अगर ऐसा होता है तो यह भारत के लिए फायदेमंद होगा क्योंकि चीनी सेना को भारतीय सेना की टुकड़ियों से दो दो हाथ करना होगा जो उसके सामने भी वर्चस्व वाली स्थिति में है।





अब अगर चीन बढ़त बनाकर रखना चाहता है यह हमारे ऊपर होगा कि उसे ऐसा करने से रोकें और इसके लिए जरूरी है कि हम सीधे घुसपैठ वाले बिंदुओं पर हमला करें। हमारे लिए एक और विकल्प है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर वह हमला करें जहां उसकी मोर्चाबंदी कमजोर है और फिर सौदेबाजी हो। अगर हमें अपने देश का सम्मान बचाना है तो इसे युद्ध को दुश्मन के खेमे मेले जाना ही होगा। इसके बाद ही सौदेबाजी हो सकती है।

ममता और पवार का अनुकरण क्यों नहीं किया पायलट ने



ममता और पवार का अनुकरण क्यों नहीं किया पायलट ने


ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट एकदम नौजवान नेता हैं और यकीनन एक नई पार्टी बनाकर कांग्रेस और भाजपा के विकल्प के रूप में एक राजनीतिक संगठन प्रस्तुत कर सकते थे। जैसा कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस से टूटकर किया था। हालांकि, सिंधिया ने तो भाजपा का दामन पकड़ दिया है लेकिन पायलट कहां जाएंगे यह अभी तक साफ नहीं हुआ है और ना ही उनकी तरफ से कोई ऐसा संकेत मिला है जिससे पता चले किधर जा रहे हैं या फिर कोई नई पार्टी बनाना चाह रहे हैं। पायलट ममता बनर्जी नहीं हैं की उम्र में ममता जी की तरह संघर्ष की क्षमता हो और आम मतदाताओं को यह विश्वास दिला सकें कि उनमें लड़ने की ताकत है। ममता जी ने अपनी इसी क्षमता के कारण कामयाबी पाई और आज प्रदेश की गद्दी पर हैं। पायलट ने आखिर यह साहस क्यों नहीं दिखाया जबकि उनका दावा है राजस्थान की जनता उन्हें पसंद करती है। संभवतः उनकी तरह धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील विचारों वाले नेता बहुसंख्यक वादी राजस्थान में कितना सफल हो पाएंगे इसकी गणना उनके पास भी नहीं है। पायलट पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वह अपने समर्थकों को लेकर भाजपा में जा रहे हैं। यह आरोप ही अपने आप में उत्तर है। इससे पता चलता है पायलट मेहनत करने की बजाय मौजूदा समय में स्थापित पार्टी में शामिल हो जाना सही समझते हैं। जिन लोगों ने ममता बनर्जी को पार्टी खड़ी करते देखा है वह उनकी मेहनत से वाकिफ होंगे। सचमुच एक नई पार्टी खड़ी करने में जो जटिलताएं सामने आती हैं और जितनी मेहनत करनी पड़ती है वह सोचा जा सकता है। एक नई पार्टी बनाने के लिए एक व्यापक जनाधार, समय, शक्ति, धनबल और बाहुबल के साथ-साथ व्यापक तजुर्बे की भी जरूरत होती है। ऐसे विचार को करने की आवश्यकता होती है जो बाध्यकारी हो साथ ही नरेंद्र मोदी के चुनाव जीतने की क्षमता के बीच वोटरों का मनोभाव समझने का भी आत्मविश्वास होना चाहिए। या तो आज के समय में नई पार्टी बनाने वाले को अरविंद केजरीवाल की तरह होना चाहिए जो भयानक विद्रोहियों तथा मान्य व्यवस्थाओं को मटियामेट करने की क्षमता रखता हो। अथवा, ममता बनर्जी की तरह युद्ध के मैदान में केवल अपने समर्थकों के बल पर निहत्थे खड़ा होने का साहस होना चाहिए। जिन्होंने सीपीआईएम के काल में ममता बनर्जी के साथ हुए सितम को देखा होगा और महसूस किया होगा वही इसे समझ सकते हैं। पायलट में ऐसा साहस और गुण नहीं है।


किसी भी नई पार्टी के राष्ट्रीय विकल्प के रूप में खड़े होने के लिए राजनीतिक व्यवस्था की कमजोरियों के कारण एक उपयुक्त राजनीतिक वातावरण का होना जरूरी है। संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान इंदिरा जी के आपातकाल और राजीव गांधी के काल में बोफोर्स दलाली से लेकर आज के अरविंद केजरीवाल द्वारा भ्रष्टाचार के नारों ने यह वातावरण मुहैया कराया। लेकिन आज हालात दूसरे हैं। मोदी और अमित शाह किसी भी मूल्य पर किसी भी विपक्षी विकल्प को भरने का मौका नहीं देते। इसलिए पायलट या सिंधिया के लिए नए सिरे से शुरुआत करने का कोई स्कोप नहीं है। यहां तक कि अरविंद केजरीवाल ने भी मोदी शाह के युग के पहले यह सब किया था। सिंधिया और पायलट एक बात समान है वह कि दोनों को यह मुगालता था कि चुनाव जीतने के बाद उन्हें अपने-अपने राज्यों का मुख्यमंत्री बनाया जाएगा लेकिन जो उनसे सीनियर थे उनके इगो के आगे उनकी एक नहीं चली। पायलट अपने 18 समर्थक विधायकों को लेकर अलग हुए और अगर उनमें इतना ही साहस था उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए तो उन्हें अपनी अलग पार्टी बनानी चाहिए थी। हालांकि पायलट ने मुख्यमंत्री बनने का अपना सपना कभी किसी से गोपनीय नहीं रखा और सदा शिकायत करते हैं कि उन्हें गलत तरीके से मुख्यमंत्री पद से अलग रखा गया है। उनका मानना था यह गलत है और ज्यादा थी भरा है। कांग्रेस के नौजवान नेताओं के साथ हर जगह यानी हर राज्य में ऐसा ही हो रहा है और अगर पायलट में इतनी क्षमता थी तो उन्हें सभी राज्यों के ऐसे नेताओं को जोड़ने के लिए कदम आगे बढ़ाना चाहिए था। पायलट को यह मालूम है एक स्थापित मंच पर जगह बनाना आसान है स्टार्टअप के मुकाबले। अगर आनन फानन में ताकत एकत्र करनी है तो नई पार्टी नहीं चलेगी। वोट बैंक बनाने के लिए कठोर मेहनत की जरूरत पड़ती है और लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहना पड़ता है तथा इस अवधि में धैर्य जरूरी है। यही नहीं इसके लिए धन जुटाना भी बहुत कठिन काम है।


शरद पवार ने 1999 में सोनिया गांधी से नाता तोड़ लिया था और कांग्रेस छोड़ दीजिए तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया था। इन 21 वर्षों में उन्होंने महाराष्ट्र के बिग बॉस का मुकाम हासिल किया। ममता बनर्जी 1997 में कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाई और पश्चिम बंगाल में अपनी राजनीतिक जड़े जमाने की कोशिश करने लगीं।लेकिन इलीट गाइडेड पश्चिम बंगाल की राजनीति में किसी नई पार्टी को जड़े जमाना बड़ा कठिन है। यही नहीं पश्चिम बंगाल की राजनीति वामपंथियों के कारण बेहद हिंसक और और स्पष्ट थी। लेकिन उन्होंने वाम मोर्चे की सत्ता को उखाड़ फेंका। आज पायलट के बारे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न है या फिर चाहते क्या हैं? अगर आसानी से जगह बनानी है तो भाजपा मुफीद है और अगर एक पहचान कायम करनी है तो उन्हें एक नई राजनीतिक विरासत की नींव रखनी होगी और खुद को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में पेश करना होगा। उनका कंफ्यूजन भारतीय राजनीति को नुकसान पहुंचाएगा।





राजस्थान की जंगः कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना



राजस्थान की जंगः कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना


राजस्थान में सियासी घमासान मचा हुआ है। वैसे राजस्थान का इतिहास भितरघातों और खुली जंग के जिक्र से भरा पड़ा है। आज भी वहां एक नया घमासान चल रहा है। इसमें भितरघात भी है और खुली लड़ाई भी है। राजस्थान के मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ उन्हीं की पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया और पायलट की पीठ पर भाजपा के हाथ हैं यह किसी से छिपा नहीं है। यह पूरा का पूरा प्लॉट कुछ वैसा ही है जैसा पिछले 70 वर्षों से भारत और पाकिस्तान के बीच के युद्ध का है। इस युद्ध से जिस तरह से लोग ऊब चुके हैं और आर पार का फैसला चाहते हैं ठीक वैसे ही आज के राजस्थान में चल रही सियासी जंग से लोग उठ गए हैं। खरीद-फरोख्त का वही पुराना रवैया के एक और महत्वाकांक्षी कांग्रेस नेता बगावत करता है, विधायकों की खरीद बिक्री का बाजार खुल जाता है तथा एक गैर भाजपाई सरकार गिरने के कगार पर आ जाती है। यह पूरी की पूरी फिल्म देखी देखी सी लगती है। भारत की जनता आखिर इसे कितनी बार देखेगी। लेकिन यहां कुछ उप कथाएं भी इस स्क्रिप्ट में जुड़ गईं हैं। जैसे दो सिंधियाओं की जंग छिड़ गई है। उधर, वसुंधरा राजे सिंधिया भाजपा आलाकमान की बात नहीं मानते हुए गहलोत पायलट की रस्साकशी से अलग हैं। वह अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं और पूरी तरह वाकिफ है ऐसा करने से आलाकमान नाराज हो जाएगा। वसुंधरा राजे सिंधिया लगभग चुप हैं। उन्होंने 3 दिन पहले एक ट्वीट किया था और कहा था कि जनता के बारे में सोचिए। यह उनकी अपनी ही पार्टी को दी गई झिड़की की मानिंद थी या कह सकते हैं कि कोरोना के संकट के दौरान राजस्थान सरकार को गिराने की भाजपा की कोशिशों की आलोचना जैसी थी। राजस्थान में जो जंग चल रही है उसके पहले वाले प्लॉट पर भी नजर डालें यानी दो सिंधियाओं की जंग पर। ग्वालियर के पूर्व राजघराने वंशज जायदाद के विवाद में पहले से फंसे हुए हैं, लेकिन चुनाव के दौरान कभी भी एक दूसरे के चुनाव प्रचार नहीं करते। पहली बार वे दो हजार अट्ठारह में मध्य प्रदेश के कोलारस में हुए उपचुनाव में एक दूसरे के सामने आ गये थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया वहां कांग्रेस उम्मीदवार के लिए प्रचार कर रहे थे और यशोधरा राजे सिंधिया वहां भाजपा के लिए प्रचार करने के दिए मैदान में उतर गईे। यशोधरा ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ हैं। दोनों में थोड़ा फासला हो गया। मार्च में जब ज्योतिरादित्य भाजपा में शामिल हुए तो यशोधरा राजे इसका यह कहते हैं स्वागत किया कि राजमाता के खून ने राष्ट्र हित में फैसला किया है और अब दूरी खत्म हो गई। फिर जरा राजस्थान इसमें एक और है ज्योतिरादित्य कांग्रेस में अपने पुराने साथी सचिन पायलट की पर्दे के पीछे से मदद कर रहे हैं दूसरी हैं वसुंधरा राजे जिन का राजनीतिक भविष्य पायलट के जीतने और हारने पर निर्भर है। अगर पायलट जीत जाते हैं तो बेशक वसुंधरा राजे के भविष्य पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। आप अगर पायलट किसी भी तरह से मुख्यमंत्री बन गए वसुंधरा राजे की राजनीतिक डगर पर गड्ढे जरूर आ जाएंगे। पिछले दो दशकों से वे और गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। अब अगर एक और विकल्प सामने आ जाए जिसके पीछे आलाकमान खुद खड़ा हो तो वसुंधरा राजे के लिए मामला बिगड़ जाएगा। सिंधिया घराने के इन दो धड़ों के बीच कितनी मिल्लत है यह बात किसी से छिपी नहीं है लेकिन तब भी किसी मोड़ पर दोनों आमने-सामने आ जाते हैं एक दूसरे के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। लुटियंस में होने वाली पार्टियों में भी दोनों शाखाओं के सदस्यों को एक साथ कभी नहीं देखा गया। जाहिर है ज्योतिरादित्य राजस्थान में वही कर रहे हैं जो उनकी पार्टी चाहती है और अब इससे उनकी बुआ को हानि होगी तो क्या किया जा सकता है। राजघरानों का इतिहास एक दूसरे की पीठ में छुरा घोंपने के उदाहरणों से भरा पड़ा है। यहां यह जाहिर हो रहा है कि गहलोत और पायलट जोर आजमाइश का नतीजा चाहे जो हो जय और विजय तो बुआ और भतीजे में किसी एक की होगी ।





वैसे भाजपा आलाकमान से वसुंधरा राजे के संबंध बहुत ही गर्म नहीं है और यह बात किसी से छुपी नहीं है। भाजपा आलाकमान लंबे समय से वसुंधरा के विरोधियों को आगे बढ़ा रहा है उनमें से एक केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत जो ज्योतिरादित्य के साथ मिलकर वसुंधरा की राजनीतिक कश्ती डुबोने में लगे हैं। लेकिन वसुंधरा इस क्षेत्र की पुरानी खिलाड़ी हैं और उन्हें कम करके आंकना भूल होगी, उनके विरोधी यही भूल कर रहे हैं।वसुंधरा का कद राजस्थान में बहुत बड़ा है खास करके एक जन नेता के रूप में प्रदेश भाजपा में उनकी टक्कर का कोई नहीं है। अब आलाकमान गजेंद्र सिंह शेखावत को उनके विकल्प के रूप में आगे बढ़ा रहा है तो शायद यह उसकी गलती है। शेखावत मोदी लहर में दोनों बार चुनाव जीते और जोधपुर के बाहर शायद उनकी बहुत ज्यादा पहचान नहीं है। दिल्ली में बैठे लोगों को वसुंधरा के कद के बारे में बहुत अंदाजा नहीं है। पहली बार जब वसुंधरा राजे भाजपा की प्रदेश अध्यक्ष बनकर आई तो लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं होती थीं लेकिन कुछ ही महीनों में उस काल के सबसे कद्दावर नेता भैरों सिंह शेखावत से आगे बढ़कर दिखा दिया। आज राजस्थान में वसुंधरा राजे का राजनीतिक कद सबसे ऊंचा है और उनके खिलाफ अगर कोई योजना शुरू होती है तो जरूरी नहीं कि उन्हें पराजित किया जा सके। अलबत्ता, हाईकमान अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग कर उनकी राह में रोड़े जरूर अटका सकता है। उधर, सचिन पायलट पर ज्यादा निर्भर होना राज्य भाजपा के लिए बहुत उपयोगी नहीं होगा क्योंकि भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के करिश्मे और गृहमंत्री अमित शाह की रणनीतियों के बल पर चुनाव जीतती रही है। नए लोग शायद ही इस मामले में कोई सहयोग कर सकते हैं।

ओली की समस्या कैसे सुलझाए भारत



ओली की समस्या कैसे सुलझाए भारत


नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली लगातार भारत के सामने समस्याएं खड़ी कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि वह ऐसा चीन के इशारे पर कर रहे हैं। भारत को शर्मशार करने के लिए उन्होंने राम का मसला उठा दिया। प्रधानमंत्री ओली ने दावा किया राम का जन्म ठोरी गांव में हुआ। त्रेता युग से अब तक किसी ने इस पर बात नहीं की थी और मानस में प्रसंग है जिसमें मिथिला और अवध की संस्कृतियों के बारे में राम और सीता के विवाह को लेकर व्याख्या की गई है। इसके अलावा भारत में कई ऐसे स्थल हैं जहां राम के सांस्कृतिक उद्भव के निशान मिलते हैं। यही नहीं, भगवान राम का वन गमन, हनुमान ,बालि, सुग्रीव इत्यादि से मुलाकात और फिर लंका अभियान एवं वहां से वापसी के रोड मैप पर अवधी संस्कृति का स्पष्ट उल्लेख है। ओली ने इन सारी व्याख्या तथा व्यंजनाओं को गलत बताते हुए राम को नेपाल का बाशिंदा बताया। यही नहीं, राम का राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम में बदलने के हालात के बारे में भी जो व्याख्या भारतीय वांग्मयों में उपलब्ध है उन्हें भी ओली ने स्वीकार नहीं किया और ऐसे मौके पर यह विवाद पैदा किया जब भारत में राम मंदिर के निर्माण की तैयारी हो रही है। इस इलाके में और आसपास के क्षेत्रों में कई मस्जिदें हैं जहां बांग्लादेश और पाकिस्तान के कट्टरपंथी तत्वों का बोलबाला है। डर है कि भविष्य में राम मंदिर को लेकर एक नया आंदोलन आरंभ हो जाय। बात यहीं खत्म हो जाए तब भी गनीमत है। ओली ने वर्षों से कायम भारत- नेपाल सीमा को भी अमान्य करते हुए भारत के 3 गांव पर अपना हक जताया है।शनिवार को भारतीय सीमांत पर स्थित गांव भिखना ठोरी में उनके आगमन के पूर्व काफी तोड़फोड़ हुई। नेपाल प्रशासन के हुक्म से सीमा स्तंभ 436 को उखाड़ दिया गया। इतना ही नहीं सीमा के पंडई नदी का पानी भी भारत में आने से रोक दिया गया। मामला बिगड़े नहीं इसलिए भारतीय सीमा सुरक्षा बल सब जान कर भी अंजान बनी हुई है। उधर, ओली के इस क्षेत्र में आने का उद्देश्य ही है राम को लेकर भारत में आंदोलन शुरू करवाना। ठोरी बीरगंज जिले में एक छोटा सा गांव है और उसी से सटे हुए भारतीय सीमा आरंभ होती है। नेपाल के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस क्षेत्र में धनुषा नदी के किनारों बारा और चितवन के जंगलों में राम के जन्म के सबूत खोजने शुरू कर दिये हैं। आरंभ में तो इस संस्था में साफ कहा था ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे राम के जन्म का प्रमाण माना सके। लेकिन आप उन्होंने प्रधानमंत्री ओली के बयान का समर्थन हो सके। ओली के बयान से भारत में बहुत बड़ी संख्या में लोग क्षुब्ध हैं। यही नहीं ओली ने भारत पर आरोप लगाया है सांस्कृतिक आक्रमण कर रहा है और ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ मरोड़ रहा है।


ओली के कुछ सहायकों ने इसे मनगढ़ंत बताया है यहां तक कि कुछ विद्वानों ने तो इसे एक विकृत मस्तिष्क की कसरत बताया है। ओली भारत और नेपाल आपसी रिश्तों को बिगाड़ने में लगे हैं। उन्होंने इन संबंधों को पहले ही बहुत बिगाड़ दिया है। यहां तक कि नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि प्रधानमंत्री की बात राम और रामायण के बारे में और अधिक तथ्य जुटाने के प्रयास स्वरूप यह बात कही है। अगर ऐसा है तो ओली ने भारत पर सांस्कृतिक आक्रमण का आरोप क्यों लगाया? ओली के बॉडी लैंग्वेज, मनोविज्ञान और उनकी कोशिशों देखने से यह पता चलता है वे अपनी कुर्सी बचाने में जी जान से लगे हैं। हालांकि ओली धीरे- धीरे अब मत में आ गए हैं ।अब तक और दहल में 8 बार बातें हो चुकी हैं। ओली फिलहाल पार्टी के अध्यक्ष और प्रधानमंत्री हैं। वह दोनों में से किसी भी पद को छोड़ना नहीं चाहते। 17 जुलाई को वार्ता के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों को भड़का दिया तथा वह वार्ता स्थल पर प्रदर्शन करने लगे। इससे, पार्टी के अन्य नेता काफी नाराज हो गए। ओली का संसद में बहुमत नहीं है और इसलिए वे राष्ट्रपति का सहयोग चाहते हैं ताकि राष्ट्रपति संसद को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दें। 25 अगस्त को सेंट्रल कमिटी की मीटिंग होने वाली है और अगर संसद को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया तो ओली को इन विरोधियों से थोड़ी निजात मिल जाएगी। वहां कई ऐसे हैं जो चाहते हैं कि महामारी को बेकाबू होने के कारण देश में स्वास्थ्य आपात व्यवस्था लागू हो जाए।





ओली के पक्ष में तीन मामले हैं। पहला की दहल और अन्य सदस्य चाहते हैं कि पार्टी में किसी कीमत पर विभाजन नहीं हो। दूसरा कि, देश के राष्ट्रपति पाऊस में पूर्ण समर्थन है। तीसरा कि चीन से मिलने वाला संकेत जिसमें साथ आ गया है पार्टी को किसी भी कीमत पर टूटने से बचाना होगा। चीन से संबंध बनाए रखना उसकी मजबूरी है क्योंकि भारत से उसके रिश्ते बिगड़ चुके हैं। जो खबरें मिल रही हैं उससे लगता है कि संभवतः सेंट्रल कमेटी की मीटिंग अगस्त में नहीं होगी और ओली को थोड़ा वक्त मिल जाएगा। इसमें एक अच्छी बात दिख रही है कि सभी तरह के उकसावे के बावजूद भारत कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त कर रहा है। भारत को इंतजार करना चाहिए और किसी भी किस्म की प्रतिक्रिया से बचना चाहिए। ओली की समस्या को सुलझाने का एक मात्र यही विकल्प है।

अब एक और अयोध्या विवाद



अब एक और अयोध्या विवाद


नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने दावा किया है कि भारत ने सच्चाई को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है और राम को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद की अयोध्या का राजा बताया है जबकि सच है किराम आज के नेपाल के किसी स्थान से आए थे। नेपाल के राष्ट्रकवि भानुभक्त आचार्य 206वीं जन्म जयंती पर आयोजित एक समारोह में ओली ने कहां की अयोध्या बिहार की सीमा बीरगंज के पश्चिमी क्षेत्र में थी। यहां यह बता देना प्रासंगिक होगा कि भानुभक्त ने बाल्मीकि रामायण का नेपाली में अनुवाद किया था। ओली ने कहा कि उत्तर प्रदेश से आकर राम ने अयोध्या में शादी की यह सही नहीं है। “ हमें सांस्कृतिक रूप में चला गया है और भारत ने वास्तविकता को तोड़ा मरोड़ा है।” ओली ने कहा कि उत्तर प्रदेश के फैजाबाद के अयोध्या का उदय बाद में हुआ और वह वास्तविक राम की राजधानी नहीं थी। उन्होंने कहा कि राम नेपाल के थे और सीता भी नेपाल की थीं। उन्होंने बारे में बताया कि बिहार की सीमा पर ठोरी एक जगह है वहीं अयोध्या थी। पुराणों में कहा गया है कि जब राम ने सीता का त्याग कर दिया तो वह अपने पुत्रों लव और कुश के साथ महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहती थीं। यह नारायणी( आज के गंडक) के तट पर था। यह नेपाल और बिहार की सीमा पर है और आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आ जाते हैं। ओली ने दावा किया कि जिन पंडितों ने राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था नेपाल के रिदी क्षेत्र से गए थे।


नेपाल के प्रधानमंत्री का यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब भारत और नेपाल में पहले से ही तनाव कायम है। नेपाल में कुछ लोग इस टिप्पणी का समर्थन भी कर रहे हैं और ज्यादा लोग इसका मजाक उड़ा रहे हैं। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने ओली के बयान पर तंज किया और ट्वीट किया कि “ होली द्वारा रचित कल युग रामायण सुनिए और सीधे बैकुंठ की यात्रा कीजिए।” नेपाल के पूर्व उपप्रधानमंत्री कमल थापा ने कहा किसी भी प्रधानमंत्री के इस तरह का आधारहीन बयान देना उचित नहीं है। प्रधानमंत्री के इस बयान पर नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार अमित ढकाल ने भी चुटकी ली और कहा कि “श्रीलंका काशी के पास है और वहां हनुमान नगर विजय जिसका निर्माण वानर सेना ने तब किया होगा जब वे पुल बनाने के लिए वहां एकत्र हुए होंगे।”


राजनीति और कूटनीति से ऊपर है धर्म और बड़ा ही भावनात्मक मामला है। इस तरह की बयानबाजी से शर्मिंदगी के अलावा कुछ नहीं है क्योंकि अगर अयोध्या नेपाल में है और थी तो सरयू कहां है। लगता है कि ओली भारतीय मीडिया को मसाला दे रहे हैं। इस तरह की अनर्गल बातें खास करके पौराणिक तथ्यों के बारे में कहना और कह कर खुद को विद्वान महसूस करना बड़ा हास्यास्पद है। नेपाल के प्रधानमंत्री की बात को सुनकर ऐसा लगता है कि वे भारत को उकसाने के लिए उसने कुछ करते रहना चाहते हैं। नेपाल में अभी हाल में सीमा को लेकर जो कुछ बयानबाजी की है उसे कायम कटुता अभी खत्म नहीं हुई और केपी शर्मा ओली एक नया बयान देकर कटुता को बढ़ाने की कोशिश की है। राम और अयोध्या का संबंध एक ऐसा मसला है जो सदियों से भारत में विवाद का विषय बना है और इसे लेकर कई बार खून खराबे भी हुए हैं। बड़ी मुश्किल से अदालत के हस्तक्षेप के बाद मामला है और भगवान राम का मंदिर बनने की तैयारी चल रही है। ओली के इस बयान से इस स्थिति में कटुता पैदा हो सकती है। ओली जिस पार्टी के हैं उसका नाम है नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी । नाम में ही कम्युनिस्ट लगा है और कम्युनिज्म धर्म को नहीं मानता। ओली के प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो उन्होंने भगवान का नाम लेने से इनकार कर दिया था और जब भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने जनकपुर में पूजा की थी ओली उससे अलग ही थे। आश्चर्यजनक बात यह है कि इस मौके पर जब राजनीतिक पैंतरा बदलना है तो ओली को राम की याद आ गई।


विगत कुछ महीनों से भारत और नेपाल में नक्शे को लेकर तनाव चल रहा है। नेपाल ने अपने नए नक्शे में लिपुलेख, लिंपियाधुरा और काला पानी पर दावा किया है। यह तीनों इलाके फिलहाल भारत में हैं। इस नए नक्शे के बाद दोनों देशों में तनाव बढ़ता गया। पिछले साल जम्मू कश्मीर को 2 केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद भारत ने अपना नक्शा अपडेट किया उस समय यह तीनों इलाके भारत के थे। लेकिन नेपाल में चीनी राजदूत होउ यांकी की मुलाकात के बाद तनाव बढ़ने लगा। कहा तो यह भी गया कि ओली को हनी ट्रैप में फंसा कर यह सब करवाया जा रहा है। इस पर ओली ने बहुत कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की। भारतीय मीडिया के कई चैनलों पर रोक लगा दी गई। वैसे चीन के राजदूत की नेपाल में सक्रियता को देखकर वहां के लोगों ने भी इस पर आपत्ति की है।





धीरे धीरे भारत और नेपाल में तनाव बढ़ता जा रहा है। नेपाल को अपनी सीमाएं और भारत पर आर्थिक निर्भरता के बारे में सोचना चाहिए। नेपाली अर्थव्यवस्था भारत पर बहुत कुछ टिकी है। नेपाल चुकी लैंडलॉक्ड है इसलिए वह भारतीय गोदियों को अपने व्यापार के लिए इस्तेमाल करता है और लगभग 60 लाख नेपाली भारत में काम करते हैं। नेपाल को अपनी गलतियों से सीखना चाहिए मलहम वह भारत से वार्ता के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। सीमा विवाद एक गंभीर परिणाम हो सकते हैं भारत और नेपाल दोनों देशों को समझना चाहिए।

Friday, July 17, 2020

चीन की आक्रामक रणनीति का भारत द्वारा जवाब



चीन की आक्रामक रणनीति का भारत द्वारा जवाब


चीन को भारत यह समझाने में लगा है कि अगर दोनों देशों में युद्ध होता है तो ज्यादा नुकसान चीन का होगा और भारत ने उस पर आर्थिक वार करना आरंभ कर दिया है। बुधवार को भारत में 5जी नेटवर्क तैयार करने और उसके अनुरूप टेलीफोन या कहें स्मार्ट फोन बनाने के लिए जहां भारत के जिओ नेटवर्क ने गूगल से हाथ मिलाया है वहीं भारत सरकार ने तीनों सेनाओं को रक्षा खरीद की खुली छूट दे दी है और साथ ही कूटनीतिक एवं सैन्य वार्ताओं के माध्यम से भी उसे बताने में लगा है कि जंग ना हो उसी में भलाई है। भारत में 5जी नेटवर्क के लिए गूगल ने 33,737 करोड़ रुपए के निवेश की मंजूरी दे दी है। वहीं भारत चीन गतिरोध के मद्देनजर भारत सरकार ने सेना के तीनों अंगों को 300 करोड़ रुपए तक की पूंजीगत खरीद की मंजूरी दी है। इन सबके बावजूद यहां एक प्रश्न उभरता है क्या यह वास्तविक नियंत्रण रेखा से पीछे हटने संबंधी समझौता सचमुच शांति के लिए है या यह नए तरह का युद्ध है। जहां तक वास्तविक नियंत्रण रेखा से पीछे हटने संबंधी समझौते की बात है तो उस पर ज्यादा भरोसा करना उचित नहीं होगा क्योंकि पीछे हटने की प्रक्रिया बहुत धीमी है और इसी बीच वार्ताएं भी हो रही हैं। वार्ताओं के बीच चीन ने साफ कर दिया है कि वह फिंगर क्षेत्र को खाली नहीं करेगा। हालांकि वह फिंगर 4 से थोड़ा पीछे हटा है लेकिन वह पूरे फिंगर क्षेत्र को खाली करने को तैयार नहीं है। भारत और चीन में बुधवार को 15 घंटे तक बातचीत चली और 21 या 22 जुलाई को भारत और चीन पीछे हटने की प्रक्रिया को वेरीफाई करेंगे। भारत और चीन के बीच जो वार्ताएं उस का मुख्य आधार था कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव कम किया जाए। इसके अलावा मीटिंग में पैंगोंग त्सोऔर देपसॉन्ग पर भी वार्ताएं हुई । लेकिन चीन की गतिविधि लगता है कि वार्ता के पर्दे में एक नए तरह का युद्ध चला रहा है। गलवान में जो मुठभेड़ हुआ वह चीन की अगली रणनीति की ओर इशारा करता है तथा भारत को भी यह संदेश देता है कि वह आदेश की प्रतीक्षा ना करें और तारक कदम उठाएं।





वैसे आज युद्ध का स्वरूप बदल गया हैऔर अब वह केवल मैदान में ही सीमित नहीं रहा जाता वहां से निकलकर तरह-तरह के रूप बदलकर हमें या कहिए लड़ने वालों को प्रभावित करता है। जहां तक, भारत चीन समरनीतिक रिश्ते हैं हमें उनकी जटिलताओं आकलन करना होगा । अभी जो सैनिक हैं ,हथियार हैं और वार्ताएं हैं वह सब तात्कालिक हैं क्योंकि यह सब चलता रहता है और युद्ध भी स्वरूप बदल कर कायम रहता है जैसे आतंकवाद, कूटनीति गुटबाजी, आर्थिक प्रहार इत्यादि इत्यादि। यह सब युद्ध के बदले हुए स्वरूप हैं। जब से भारत आजाद हुआ चीन से हमारा नरम गरम रिश्ता कायम रहा है। इन सबके बीच चीन हमले भी कर लेता है और मोर्चेबंदियां भी। यह कहने का मतलब है कोई भी समझौता और इस तरह की चीजें ब्रह्मवाद नहीं हैं इन सब का इस्तेमाल बहुत सोच समझ कर किया जाना चाहिए। जैसे हमने चीनी आयात पर प्रतिबंध की बात की है तो हमें देखना पड़ेगा कि वर्तमान में चीन और भारत के आर्थिक रिश्ते कितनी दूर तक जुड़े हुए हैं और यदि उन पर प्रहार होता है तो ज्यादा हानि किसकी होगी? हमारे यहां आत्मनिर्भर भारत जबरदस्त चर्चा है लेकिन हमें यह देखना होगा हमारी आत्मनिर्भरता कितनी दूर तक परनिर्भरता से जुड़ी है और हम उससे क्या-क्या लाभ उठा सकते हैं। चीन ने इस तथ्य को अच्छी तरह समझा है। वह यूरोप पर निर्भर रहते हुए आत्मनिर्भर हो गया और फिर उसके पल्ला झाड़ लिया। भारत को भी इस गणित का लाभ उठाना चाहिए। जहां तक कूटनीतिक पैंतरेबाजी का सवाल है तो इसका दिलचस्प उदाहरण हांगकांग है। अभी हाल में चीन ने हांगकांग पर एक नया कानून थोपा जिसके अंतर्गत चीन का विरोध करने वाले प्रदर्शनों में शामिल लोगों को जेल भेजा जा सकता है। अमेरिका में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई और अमेरिका ने भी एक नया कानून पारित कर दिया। देखने की बात है दोनों देशों ने जो कानून बनाए हैं वह एक्स्ट्रा टेरिटोरियल है। ना यह कानून चीनी सीमा के भीतर लागू है और ना अमेरिकी सीमा के। यहां एक दिलचस्प मसला सामने आता है हांगकांग पर नई स्थिति का क्या असर होगा और उसका भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा क्योंकि हांगकांग के रास्ते भारत में आयात ज्यादा है। पिछले कुछ वर्षों से चीन से आयात कम हो रहा है और हांगकांग से बढ़ रहा है। इस बीच हमारे देश में आत्मनिर्भरता की बात उठ रही है। आत्मनिर्भरता के लिए सबसे जरूरी है अपने देश के उद्योग धंधों को वैश्विक स्तर पर प्रतियोगितामूलक बनाना। अगर कोई देश हमारे उद्योगों से ज्यादा सस्ता माल बनाता है तो वह हमारे देश में आएगा ही चाहे जिस रास्ते से आए। अगर हमें आत्मनिर्भर बनना है तो अपने देश में बिकने वाले माल को दूसरे देशों से आने वाले उसी माल से सस्ता देना होगा। अगर ऐसा हम नहीं कर पाते हैं तो आत्मनिर्भरता के नारे सिर्फ नारे बनकर रह जाएंगे। अभी चीन के साथ जो कुछ भी चल रहा है वह एक युद्ध है और हमें उस में चीन को पछाड़ने की बात सोचनी चाहिए। हम युद्ध नहीं चाहते हैं लेकिन अपनी भूमि नहीं छोड़ेंगे। अगर हम चीन की योजनाओं के शिकार होते हैं तो हमारा भविष्य हमें नहीं माफ करेगा। हमें हर मोर्चे पर दृढ़ता से अपनी मातृभूमि की रक्षा करनी होगी चाहे वह प्रत्यक्ष युद्ध का मैदान हो या परोक्ष मोर्चाबंदी।

राजस्थान का सियासी तापमान



राजस्थान का सियासी तापमान


राजस्थान के कांग्रेसी सियासत में अब पायलट सीट नहीं रही। बगावती सचिन पायलट को 72 घंटे तक मनुहार किया जाता रहा लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ उसके बाद उन पर कार्रवाई की गई। उन्हें उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया। हालांकि अभी उन्हें पार्टी से निकाला नहीं गया है। झगड़ा तब शुरू हुआ जब सचिन पायलट मुख्यमंत्री पद से नीचे के लिए तैयार नहीं थे और कांग्रेस हाईकमान गहलोत से पल्ला झाड़ने के पक्ष में नहीं है। 72 घंटे तक बात चली पायलट ने राहुल गांधी से भी मुलाकात की और उनकी बात से भी इंकार कर दिया। पायलट ने सिर्फ कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष 4 शर्तें रखी थी लेकिन बात नहीं बनी और अंततः पायलट को हटा दिया गया। अब बात उठती है कि आगे क्या होगा? राजस्थान में 2018 में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को पराजित कर कांग्रेस ने गद्दी अपनायी थी। इसके पहले कांग्रेस की करारी हार हो गई थी। सचिन पायलट वाले मामले से पहले मध्यप्रदेश में ऐसा हो चुका है और वहां कांग्रेस को सत्ता खोनी पड़ी है। इसके बाद आया है मामला राजस्थान और इस मामले ने कांग्रेस के भीतर की समस्त व्यवस्था को झकझोर दिया है। मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान में ऐसा हुआ है और इससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता हुआ है, पार्टी के भीतर खलबली मच गई है। वैसे सियासी गलियारों में यह चर्चा है बगावत की शुरुआत तो मार्च में ही हो गई थी लेकिन हाईकमान को इसका पता नहीं चला और जब पता चला तो परंपरागत इलाज के अलावा कुछ नहीं था, कोई रास्ता ही नहीं बचा। कांग्रेस पार्टी 2014 के पराजय के बाद से भीतरी चुनौतियों का सामना कर रही है। आंतरिक विद्रोह के कारण यह चारों खाने चित नजर आ रही है। आखिर देश की सबसे पुरानी पार्टी का इतना बुरा हाल क्यों हुआ? लोग पार्टी छोड़ कर क्यों जा रहे हैं? कांग्रेस के चरित्र और उसके आचरण को देखते हुए यह कहा जा सकता है की जो कुछ हो रहा है उसकी वजह गांधी परिवार है खास कर वर्तमान में सोनिया गांधी। अगर कांग्रेस का इतिहास देखें तो हर पार्टी के भीतर टूटन के लिए पार्टी हाईकमान का जिद्दी रवैया ही जिम्मेदार रहा है। सुभाष चंद्र बोस की घटना हो या फिर पटेल की या भारत के विभाजन की सब जगह पार्टी नेतृत्व का जिद्दी रवैया दोषी रहा है। इस बार भी चाहे वह सचिन पायलट का मामला हो या सिंधिया का सोनिया गांधी का मनोविज्ञान साफ दिख रहा है कि वह नहीं चाहतीं कोई भी ऐसा नेता उभरे जो राहुल गांधी की चुनौती बन सके। यहां तक कि उन्होंने प्रियंका गांधी के भी आगे नहीं बढ़ने दिया। पार्टी के कार्यकर्ताओं का कहना है कि बेटे के करियर को आगे बढ़ाने के लिए सोनिया गांधी ने सिद्धांतों और मेरिट को भी कुर्बान कर दिया। आम धारणा है कि भारतीय जनता पार्टी इन नेताओं को कांग्रेस से निकलने के लिए ना केवल उकसा रही है बल्कि बाध्य भी कर रही है। परंतु भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि उन्होंने कभी इनको बुलाया नहीं आए। इनका मानना है पार्टी में मेरिट को नजरअंदाज कर दिया जा रहा है और राहुल गांधी में राजनीति की समझ शून्य है । भाजपा का दावा है उसकी पार्टी में आने वाले कांग्रेसियों की लाइन लगी हुई है लेकिन जिनमें कुछ मेरिट है उन्हें ही पार्टी में लिया जा रहा है।


दूसरी तरफ कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी से किसी को कोई समस्या नहीं है। कुछ कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार को सोशल मीडिया पर लगातार बदनाम किया जा रहा है। एक साथ गिरोह बन गया है जिसमें सोशल मीडिया के लोग, बिकी हुई मीडिया और कुछ फिल्म स्टार शामिल हैं। उन्हें देशद्रोही की तरह पेश किया जाता है। यह हिटलर का जमाना याद दिलाता है। यह एक बड़ा संघर्ष है जिससे हम मुकाबले की कोशिश में लगे हुए हैं। लेकिन पार्टी के चरित्र को निश्चित किए जाने के बाद निष्कर्ष निकलता है के कांग्रेस पार्टी समय के अनुसार खुद को नहीं बदल पा रही है और उसने अब तक भीतर से आत्म निरीक्षण नहीं किया। कांग्रेस में राजनीतिक और वैचारिक कायाकल्प का कभी गंभीर प्रयास नहीं किया गया। बेशक, कांग्रेस पार्टी आंदोलन के आधार पर खड़ी हुई और वहीं से उसका सियासी सफर शुरू हुआ जिसके कारण पार्टी में काडर नहीं बल्कि कार्यकर्ता हैं। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी काडर आधारित पार्टी है। यहां गौर करने की चीज है कि काडर विचारधारा से बनता है जबकि पार्टी वर्कर से बनती है। वैसे बाजार में एक चर्चा है इन दिनों राजनीति मनी, मसल और मीडिया से न केवल संचालित रहती है बल्कि इसी से प्रभावित भी होती है। कांग्रेस के साथ सबसे बड़ी मजबूरी है इससे निपटने का तरीका उसको मालूम नहीं है।





इन सब मजबूरियों के बावजूद सचिन पायलट ने कांग्रेस नहीं छोड़ने का फैसला किया है और आगे के कदमों पर विचार कर रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी के भीतर उनकी छवि खराब करने के लिए यह लगातार बात फैलाई जा रही है वह भाजपा के साथ खड़े हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे भाजपा में शामिल नहीं हो रहे हैं।उनका कहना है कि वह अभी भी कांग्रेस पार्टी में है और आगे क्या करना है इस पर फैसला कर रहे हैं। वह राजस्थान के लोगों की सेवा करते रहेंगे। राजनीति में अटकलबाजियां बहुत होती हैं और इनके आधार पर कोई भी निर्णय बड़ा कठिन होता है। इसलिए यहां यह कहना ही पर्याप्त है कि सब कुछ आने वाला समय बताएगा। कांग्रेस पार्टी ने भी पायलट के लिए एक खिड़की खुली रखी है और वह है अभी उन्हें पार्टी से निकाला नहीं गया है केवल पद से हटाया गया है। इसका मतलब है पायलट अभी भी कांग्रेस में हैं और कुछ भी हो सकता है। कोविड-19 के इस दौर में दो चीजों का आकलन बड़ा कठिन है पहला शारीरिक तापमान और सांस लेने की प्रक्रिया। राजस्थान की सियासत में कुछ ऐसा ही दिख रहा है, वहां के सियासी तापमान को मापना बड़ा कठिन है।