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Friday, September 20, 2019

यह क्या हो रहा है सरस्वती के मंदिर में

यह क्या हो रहा है सरस्वती के मंदिर में?

जादवपुर विश्वविद्यालय में गुरुवार को केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के साथ कुछ छात्रों की हाथापाई हो गई। बाबुल सुप्रियो वहां अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की विचार गोष्ठी को संबोधित करने के लिए गए हुए थे। हमलावर छात्रों ने आरोप लगाया ,बाबुल सुप्रियो ने कुछ छात्रों को अपमानित किया है, महिला सहपाठियों अपशब्द कहे हैं और उन्हें धमकी दी हैं। बाबुल सुप्रियो के साथ हुई घटना के बाद राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बात की और तब मुख्य सचिव मलय कुमार डे से,  और उसके बाद विश्वविद्यालय रवाना हो गए। तृणमूल कांग्रेस ने हालांकि राज्यपाल की इस बात की आलोचना की है। यह बड़ा दुर्भाग्य जनक है कि भाजपा नेता को बचाने के लिए उन्हें जाना पड़ा। इस मामले को लेकर जितने मुंह उतनी बातें हो रहे हैं । गवर्नर ने  कहा बाबुल सुप्रियो  गुरुवार को लगभग 2.30 बजे  जादवपुर विश्वविद्यालय में गए। वहां उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा आयोजित एक विचार गोष्ठी को संबोधित करना था। लेकिन, वहां  विरोधियों ने उनका घेराव कर लिया। घेराव करने वाले  वामपंथी छात्र संगठन के छात्र थे। वे काले झंडे लिए हुए थे और "वापस जाओ - वापस जाओ " के नारे लगा रहे थे। सुप्रियो ने लौटने से इंकार कर दिया और छात्रों से बहस करने लगे। विश्वविद्यालय के कुलपति सुरंजन दास ने बीच-बचाव की कोशिश की और सुप्रिया से कहा वह विचार गोष्ठी के प्रेक्षागृह में चले जाएं।  लेकिन, ऐसा नहीं होने दिया गया। सुप्रियो को घंटे भर तक रोका गया। जब सुप्रियो प्रेक्षागृह में प्रवेश कर गये तब भी बाहर विरोधी नारे लगते रहे। इसके बाद छात्रों में 5 घंटे तक घेराव किया और उन्हें विश्वविद्यालय परिसर से बाहर जाने से रोके रखा। इसपर कुछ छात्रों का कहना है कि सुप्रियो ने  हाथ से बहुत ही खराब इशारे किए। अब हम उन्हें तब तक नहीं जाने देंगे जब तक वो माफ़ी ना मांगे। कुलपति सुरंजंदास ने सुप्रियो से कहा वे प्रेक्षा गृह में जाएं इस पर भाजपा नेता ने कहा कि "अगवानी के समय वह वहां क्यों नहीं थे? एक राजनीतिज्ञ होने के अलावा उनकी एक अलग पहचान भी है। वह एक निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, एक मंत्री हैं।  कुलपति उनकी अगवानी के लिए क्यों नहीं उपस्थित थे।" सुरंजन दास ने कहा उनको आमंत्रित नहीं किया गया था। इस पर मंत्री ने कहा "मैं तो आपके यहां आमंत्रित था। आपको  आना चाहिए था। मुझे पूरा भरोसा है कि आप वामपंथी हैं।  एक केंद्रीय मंत्री आपके परिसर में आ रहा है और आप चाहते हैं यह सब हो।" सुप्रियो ने कुलपति से कहा कि वह पुलिस बुला लें। किंतु कुलपति ने ऐसा नहीं किया। धक्का मुक्की के बाद बाबुल सुप्रीयो कथित रूप से बीमार पड़ गए। उन्हें समीप के अस्पताल में दाखिल कराया गया। सुप्रियो का आरोप है कि "उन पर हमले हुए ,उनका केश  पकड़कर खींचा गया, लात - घूसों से मारा गया। यह जादवपुर विश्वविद्यालय छात्रों से उम्मीद नहीं की जाती थी। अगर उन्हें मेरे आने से कोई समस्या से तो हमसे बात कर सकते थे।" उन्होंने कहा कि "पश्चिम बंगाल में शिक्षा की यही हालत है। उन्होंने मुझे मारा मैं क्यों माफी मांगू। कुछ गुंडे गड़बड़ी पैदा कर रहे हैं उन्हें निकाला जाना चाहिए।"
          अब यहां एक बात आती है कि राज्यपाल को  हस्तक्षेप की क्या जरूरत थी? क्योंकि घेराव दोपहर में भी चलता रहा और राज्यपाल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पहले फोन किया और उसके बाद मुख्य सचिव इसके बाद वे लगभग 7.00 बजे विश्वविद्यालय परिसर पहुंचे। उन्होंने अपनी गाड़ी में सुप्रियो को बिठाया। लेकिन , छात्रों ने उनका रास्ता रोक दिया। यही घंटे भर तक चलता रहा और राज्यपाल धनखड़ तथा सुप्रियो गाड़ी के भीतर बैठे रहे । लगभग 8.00 बजे जब एक पुलिस टुकड़ी आई और दोनों को दूसरे गेट से बाहर निकाला गया।
राजभवन से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में राज्यपाल ने इसे बहुत गंभीर घटना बताया है।  कहा है कि " एक मंत्री को रोके रखा गया यह राज्य में कानून और व्यवस्था तथा  कानून लागू करने वाली  एजेंसी  के आचरण की स्थिति का प्रतिबिंब है।" इस घटना को लेकर भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने अलग-अलग प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा के राज्य अध्यक्ष दिलीप घोष ने इसकी तीव्र निंदा की है और कहा है कि बंगाल में  केंद्रीय मंत्री भी सुरक्षित नहीं हैं वरना राज्यपाल को हस्तक्षेप नहीं करना पड़ता। दूसरी तरफ तृणमूल के वरिष्ठ नेता तापस राय ने कहा कि हम ऐसी लोकतांत्रिक पद्धति का समर्थन नहीं करते। तृणमूल  नेता पार्थ चटर्जी ने  यद्यपि राज्यपाल की भी आलोचना की और कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण और दहला देने वाली घटना है। हमारे संविधान के पालक को भाजपा नेता बाबुल सुप्रियो को बचाने के लिए जाना पड़ा।
       जो कुछ भी हुआ और उसका चाहे जो भी कारण हो लेकिन हिंसा की राजनीति कम से कम लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है  और वह भी शिक्षा के केंद्र में । राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बिल्कुल आम बात है लेकिन एक मंत्री के साथ वह भी शिक्षा संस्थान में मारपीट किया जाना सर्वथा अनुचित है। क्योंकि इससे लोकतंत्र की गरिमा और शिक्षा शालीनता दोनों नष्ट होती है। शिक्षा और लोकतंत्र दोनों हमें शालीन, गरिमा पूर्ण और धैर्यवान बनने की सीख देते हैं। हमारे समाज में  शिक्षा  संस्थान  सरस्वती का मंदिर माना जाता है। हमारे यहां एक बहुत पुरानी कहावत है "विद्या ददाति विनयम।" किंतु  यहां न शालीनता दिख रही है न विनय ना ही धैर्य। यह कैसी शिक्षा पा रहे हैं हमारे छात्र। अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी पर शारीरिक हमला कर गुस्से का इजहार अत्यंत गलत और निंदनीय है।

अब फिर राम जन्मभूमि !

अब फिर राम जन्मभूमि !

अब एक बार फिर अयोध्या विवाद पर बात चली है कई दिनों से इस पर मध्यस्थता की चर्चा चल रही थी। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने अस्वाभाविक तत्परता दिखाते हुए इस मामले को एक महीने के भीतर खत्म कर देने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद भूमि विवाद के जल्दी हल हो जाने की उम्मीद बढ़ गई है। 130 साल पुराने इस मामले में लगता है अब कुछ न कुछ फैसला होकर रहेगा। न्यायालय ने इस पर बुधवार को भी वही करने का प्रस्ताव रखा है।  साथ ही यह भी कहा है कि संबंधित पक्षकार यदि चाहें तो मध्यस्थता के माध्यम से इस विवाद का सर्वमान्य समाधान निकाल सकते हैं। इसके लिए वे स्वतंत्र हैं। अगर यह मामला सुनवाई के स्तर पर 18 अक्टूबर पर खत्म हो गया तो न्यायाधीशों को फैसला लिखने में  लगभग 1 महीना लगता है। और प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर कर रहे हैं यानी 18 अक्टूबर तक  सुनवाई पूरी हो जाती है तो उम्मीद है कि 17 नवंबर से पहले इस पर फैसला आ सकता है।
         कानून भी अपने आप में एक अजीब बात है। अचानक यह ऐसा रूप बदल देता है जिससे शक्तिशाली लोग  पसंद नहीं करते। क्योंकि इसके नतीजे वैसे नहीं होते जैसा वे चाहते हैं या कभी सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ न्यायाधीश समझ नहीं पाते इसका परिणाम क्या होगा? या, उसे नियंत्रित नहीं कर पाते। लेकिन फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों ने एक साथ मिलकर कुछ ऐसा किया है की उनकी राह में कोई अवरोध ना सके और यह विवादास्पद मामला जल्दी हल हो जाए। लेकिन अब तक जैसा देखा गया है कि यह फैसला या फिर मध्यस्था की अंतिम बातचीत भी इस मामले को नहीं सुलझा सकती। इस फैसले में जो सबसे प्रमुख तथ्य है वह है कि न्यायाधीशों को ऐसी कोई जगह नहीं छोड़नी चाहिए जहां खड़े होकर राजनीतिक दल राजनीति का खेल खेल सकें। यह विवाद बहुत दिनों से चल रहा है लेकिन इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है कि इसमें न जाने कितने लोगों की जानें गईं हैं और न जाने कितने लोगों का राजनीतिक भविष्य चौपट हो गया है। कोर्ट को यह  ध्यान रखना चाहिए फिर ऐसा ना हो।
            सोमवार को अयोध्या मध्यस्थता समिति ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हिंदू और मुसलमान दोनों इस मसले पर बातचीत करना चाहते हैं ताकि इसका सर्वमान्य हल खोजा जा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट यह जानता है कि इस मामले में जो विवाद है और उसके साथ जो लोग हैं वह पहले भी ऐसे ही मध्यस्था के लिए बैठे थे लेकिन कुछ परिणाम  हासिल नहीं हो सका। अब फिर सुप्रीम कोर्ट को इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। बहुतों का मानना है कि यह 2. 77 एकड़ जमीन पर विवाद का सिविल मामला है। लेकिन इसका जो मुख्य मुद्दा है वह धर्म है और यही धर्म दोनों तरफ के लोगों पर दबाव डालता रहता है। अब तो इसमें धर्म के साथ-साथ राजनीति भी घुल मिल गई है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में मध्यस्थता के लिए इंतजार नहीं करना चाहिए। मध्यस्थता समिति ने आवेदन किया है कि इस मामले की सुनवाई चूंकि संविधान पीठ कर रही है इसलिए समानांतर में  मध्यस्थता भी चल सकती है। लेकिन यदि ऐसा होता है तो यह सही नहीं होगा। वास्तविकता से अलग ऐसा भी लगता है कि मध्यस्था से कोई बात नहीं बनेगी। उल्टे सुप्रीम कोर्ट की आलोचना शुरू हो जाएगी। फिर कोई नई बात पैदा होगी तथा मामला लंबा खिंच जाएगा।
             अनाधिकृत रूप से या कहिए गैर सरकारी तौर पर इस मामले को बातचीत के जरिए सुलझाने और सर्वमान्य हल खोजने के के कई बार प्रयास हुए। पहली बार 2017 में भारत के प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर ने इस मामले को धर्म का मामला बताकर दोनों पक्षों के बातचीत करने का विचार प्रस्तुत किया था। लेकिन दोनों पक्षों में इसके प्रति कोई दिलचस्पी नहीं थी और इसलिए मामला शुरू ही नहीं हुआ। इस वर्ष मार्च में कोर्ट ने फिर मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा था और 8 हफ्ते का समय दिया था। लेकिन ,कुछ नहीं हो सका तथा प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने स्पष्ट संकेत दिए कि मध्यस्थता के प्रयास निष्फल हो गए।
            अब सवाल उठता है कि क्या मध्यस्थता कामयाब होगी? शायद नहीं। दोनों पक्षों के बीच मोर्चे खुल गए हैं और कोई भी पीछे लौटने को तैयार नहीं है। यदि इस मामले मदरसा से कोई हग निकल दी जाए दो इससे से जुड़े हिंदू पक्ष कुछ ले देकर फैसले को मानने को तैयार भी हो जाते हैं तो क्या भाजपा या संघ इसके लिए तैयार होगी? क्योंकि उन्होने इसी भावुकता पूर्ण मसले पर अपनी राजनीति की बुनियाद रखी है। उसी तरह ऐसा नहीं लगता कि मुसलमान भी मध्यस्थता के फैसले को  मानेंगे और परिणाम स्वरूप दोनों तरफ से दावे और प्रति दावे प्रस्तुत हो जाएंगे। पी वी नरसिंह राव तथा अटल बिहारी वाजपेई जैसे नेताओं ने मध्यस्थता की कोशिश की। लेकिन बुरी तरह पराजित हो गए। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस रास्ते को अपनाया लेकिन कोई नतीजा नहीं मिला। इसे सुलझाने का एकमात्र तरीका कानून है।  सुप्रीम कोर्ट को इस रास्ते को छोड़कर दूसरी राह नहीं अपनानी चाहिए। इस मामले में फैसला क्या होगा यह तो अभी से कहना मुश्किल है।  यह है फैसला चाहे जो जिसके भी पक्ष में हो इस पर एक बार फिर राजनीति शुरू होगी और जो शुरू होगा वह किस करवट बैठेगा यह भी जानना बड़ा कठिन है।
           

Wednesday, September 18, 2019

अबकी बार पीओके

अबकी बार पीओके

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को कहा कि अब बारी पीओके की है। हाल के वर्षों में पहली बार पीओके को दखल करने की बात सामने आई है और यह बात जम्मू कश्मीर पर 1994 के संकल्प के कि आगे तक जाती है। पाक अधिकृत कश्मीर पर दिल्ली के बदले रुख का संकेत देते हुए विदेश मंत्री ने कहा, भारत पीओके पर एक दिन कब्जा करने की उम्मीद करता है। जयशंकर  राजनयिक रह चुके हैं और अपनी बातों को बहुत  सोच समझकर कहने के लिए विख्यात हैं। हाल के वर्षों में यह पहला वाकया है कि किसी विदेश मंत्री ने पीओके पर कब्जे की बात कही है। मोदी सरकार के एक सौ दिनों के संबंध में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जयशंकर ने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि "अब आगे बात केवल पीओके पर होगी कश्मीर पर नहीं। हमारी स्थिति बिल्कुल साफ है कि पीओके भारत का हिस्सा है और हम चाहते हैं कि एक दिन इस पर कब्जा कर लें। उनके इस बयान के पहले सुरक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि  "बात पीओके पर होगी ना कि जम्मू और कश्मीर पर" । हरियाणा में एक रैली में राजनाथ सिंह ने यह बात उठाई थी। आतंकवाद के खिलाफ काम नहीं करने पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की आलोचना करते हुए जयशंकर ने दुनिया का ध्यान पाकिस्तान की ओर आकर्षित करने की कोशिश की। खास करके यह बात कह कर अब पीओके पर कब्जे की बात होगी।
           गृह मंत्री अमित शाह ने गत 6 अगस्त को लोकसभा में कहा कि जब मैं सदन में जम्मू कश्मीर की चर्चा करूंगा तो इसका अर्थ है इसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अक्साई चीन भी शामिल हैं। 22 फरवरी 1994 को संसद के एक संकल्प में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का एक अविभाज्य अंग रहा है और रहेगा तथा इसे अलग करने के किसी भी प्रयास का सभी आवश्यक उपायों से विरोध होगा। भारत  अपनी एकता और अखंडता को बनाए रखना की क्षमता रखता है। संकल्प में मांग की गई है की पाकिस्तान जम्मू कश्मीर के उन इलाकों  को खाली कर दें जिसे उसने कब्जा कर रखा है जयशंकर के बयान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के लिए मंच तैयार कर दिया है। समझा जाता है कि इस यात्रा के दौरान जम्मू-कश्मीर का मामला बहुत ज्यादा उठेगा भारत में पाकिस्तान की युद्ध की इच्छा का मुकाबला करने के लिए स्पष्ट आक्रामक कूटनीतिक रणनीति की घोषणा कर दी है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान में एक बयान में कहा था कि भारत से बात करने का कोई अर्थ नहीं है। जयशंकर ने कहा कि वह समझते हैं कि एक वास्तविक समस्या का उत्तर मीठे बोल नहीं हैं। मूल समस्या तो आतंकवाद को खत्म करना है। जिसे उन्होंने तैयार किया है। मुझे दुनिया में कोई एक देश दिखा दीजिए जो यह मंजूर कर ले कि उनका पड़ोसी आतंकवाद को बढ़ावा दे सकता है और वह अपने पड़ोसी से बात करने के लिए तैयार है । हमारा मानना है कि यह बिल्कुल सामान्य है और तर्कसंगत ही है कि इन लोगों का आचरण कई गलतियों से पूर्ण है और उनमें असामान्यता भी है।  विदेश मंत्री ने कहा कि धारा 370 हमारा आंतरिक मामला था। वास्तविक समस्या तो पाक समर्थित आतंकवाद है। मुझे दुनिया में कोई भी एक देश दिखा दीजिए जो अपनी विदेश नीति के हिस्से के रूप में खुल्लम खुल्ला आतंकवाद का इस्तेमाल करता है। जयशंकर ने कहा कि धारा 370 एक अस्थाई व्यवस्था थी जिसका उपयोग घटनाओं के विश्लेषण में भी नहीं होता था और यह प्रावधान वस्तुतः किसी काम का नहीं रह गया था।  संकीर्ण विचार के कुछ लोग इसका उपयोग करते थे और वह भी अपने लाभ के लिए ऐसा करते हुए पूरे क्षेत्र के विकास को बाधित करते थे और  अलगाववाद की भावना भरते थे । उस अलगाववाद का उपयोग सीमा के उस पार से पाकिस्तान किया करता था। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के लोग धारा 370 हटाए जाने के मतलब को समझते हैं। अब  इसमें कोई बदलाव नहीं आएगा। लोग कश्मीर पर बहुत कुछ कहते हैं लेकिन इस पर सोचने की जरूरत नहीं है। अंततोगत्वा यह हमारा मसला है और उस पर चमड़ी ही बात चलेगी कश्मीर पर एक अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य की बात का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा हम उनसे पूछते हैं उन्होंने आतंकवाद का मुकाबला किया है। अब आपका क्या उत्तर था। कैसे मुकाबला किया था। वैसी स्थिति में आप क्या करेंगे जब आपके देश का कानून देशभर में अमल में नहीं लाया जा सके। प्रधानमंत्री मोदी का हवाला देते हुए जयशंकर ने कहा कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के रूप में मशहूर हो चुका है जबकि भारत अपनी सूचना तकनीक के कारण मशहूर है ।
        एस जयशंकर की बात से  पाकिस्तान की  हवा बिगड़ गई  और उसने  कुछ ही घंटों के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष घिघियाते   हुए कहा कि नई दिल्ली की बात पर जरा गौर करें। वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को जबरन दखल करना चाहता है, तो फिर तनाव बढ़ेगा और क्षेत्र की शांति भंग होगी।
      पाकिस्तान चाहे जितना गिड़गिड़ा ले, चाहे जितनी आंखें दिखा ले लेकिन यह सही है कि पीओके पर उसने जबरदस्ती कब्जा किया हुआ है और आज नहीं तो कल उसे पी ओ के  खाली करना ही पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय दबाव के समक्ष भारत झुकने वाला नहीं है और ना ही ऐसी किसी गीदड़ भभकी से डरेगा ।

Monday, September 16, 2019

नौकरी की नहीं काबिल लोगों की कमी है

नौकरी की  नहीं काबिल लोगों की कमी है

केंद्रीय श्रम एवं रोजगार  राज्य मंत्री श्री संतोष गंगवार ने  कहा कि हमारे देश में नौकरियों की कमी नहीं है ,कमी है उत्तर भारत में योग्य उम्मीदवारों की। उन्होंने कहा कि उत्तर भारत से जो लोग रोजगार के लिए आते हैं उनके बारे में अक्सर शिकायत रहती है कि वे उस पद के लिए योग्य नहीं है जिसके लिए उन्हें बुलाया गया है । उन्होंने कहा कि ,मैं वही मंत्रालय देख रहा हूं और रोज प्राप्त आंकड़ों के आधार पर ऐसा कह रहा हूं। उनका यह बयान एक ऐसे वक्त में आया है जब अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है और रोजगार का अभाव होता जा रहा है। अर्थशास्त्री एवं राजनीतिज्ञ इसके लिए केंद्र सरकार की ओर उंगली उठा रहे हैं। सांख्यिकी  और  कार्यक्रम  क्रियान्वयन  मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार अर्थव्यवस्था में यह मंदी उत्पादन और कृषि क्षेत्रों में कम उत्पादन के कारण हो रही है। गंगवार का यह बयान नेशनल सैंपल सर्वे के बयान से ठीक विपरीत है। नेशनल सैंपल सर्वे के बयान में कहा गया था कि  देश में बेरोजगारी की दर विगत 45 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर है । 2019 के चुनाव के पूर्व यह रिपोर्ट लीक हो गई थी, तब सरकार ने इसे खारिज कर दिया था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दूसरी कैबिनेट के शपथ लेने के दूसरे दिन ही सरकार ने जो आंकड़े जारी किए उसमें बताया गया था कि बीते 4 दशकों में बेरोजगारी की दर सबसे खराब है। देश में रोजगार का संकट बढ़ा है। आर्थिक विकास की दर 5% पर आने से वाहन क्षेत्र ,कपड़ा क्षेत्र, चाय उद्योग इत्यादि क्षेत्रों में लगातार छटनी की खबर मिल रही है। ऐसे में केंद्रीय मंत्री गंगवार की बात काफी प्रतिक्रियाओं को आमंत्रित कर रही है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने सोशल मीडिया पर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि" 5 साल से ज्यादा आपकी सरकार है। नौकरियां पैदा हुई नहीं और जो नौकरियां थी वह आर्थिक मंदी के चलते खत्म हो गईं। " प्रियंका गांधी ने ट्वीट में यह भी लिखा कि "आप उत्तर भारतीयों का अपमान करके बच निकलना चाहते हैं लेकिन यह नहीं चलेगा।"
        संतोष गंगवार ने शनिवार को यह बयान दिया था और रविवार दोपहर आते-आते उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि जो बयान उन्होंने दिया था उसका संदर्भ दूसरा था। उन्होंने माना कि कौशल में कमी है और सरकार ने कौशल विकास इसीलिए शुरू किया है ताकि बच्चों को अनुरूप ट्रेनिंग दी जा सके। कुछ दिन पहले एक रिपोर्ट में बताया गया था कि हमारे देश में नौकरियां किस तरह लगातार घट रही हैं। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट में भी यह बताया गया है कि 2016 के बाद लगातार नौकरियां कम हुई हैं। संतोष गंगवार के बयान के बाद सोशल मीडिया पर यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि "कौशल विकास तो 2014 में आरंभ हुआ तो फिर उसका क्या हुआ, स्किल इंडिया क्या फेल कर गया?"
       दो हफ्तों में शायद यह तीसरा मौका है जब इसी केंद्रीय मंत्री ने अपने बयान से विवाद पैदा कर दिया और खुद उसमें घिर गए। गुरुवार को केंद्रीय रेल और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने 5 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था के बारे में कहा कि जो  आप टीवी पर देखते हैं  उस हिसाब किताब में मत पड़िए। "ऐसे गणित से आइंस्टीन को गुरुत्वाकर्षण की खोज में मदद नहीं मिली थी।" इसके पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑटो सेक्टर में मंदी का कारण नौजवानों की सोच में बदलाव को बताया। वित्त मंत्री ने कहा कि नौजवान वाहन खरीदने के बदले उबर- ओला का प्रयोग कर रहे हैं। संतोष गंगवार का यह बयान नौकरी खोजने वाले नौजवानों के जख्म पर नमक रगड़ने की तरह है। जिस मंत्रालय का काम ही नौजवानों को नौकरी दिलाना है उस मंत्रालय का ऐसा बयान देश के बेरोजगार युवकों पर क्या असर दिखाएगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन इस तरह के बयान निराशा ज्यादा उत्पन्न करते हैं और सरकार को खासकर एक कल्याणकारी सरकार को इससे बचना चाहिए।

Sunday, September 15, 2019

मोदी दो के 100 दिन में शाह सबसे ताकतवर होकर उभरे

मोदी दो के 100 दिन में शाह सबसे ताकतवर होकर उभरे

पिछले एक हफ्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत- नेपाल के बीच पाइपलाइन का उद्घाटन किया , स्वदेशी करण से परहेज करने वाले अपने पूर्व प्रिंसिपल सेक्रेट्री नृपेंद्र मिश्रा को बाय-बाय कहा ,प्लास्टिक अलग करने वाली महिलाओं के साथ बैठे, मथुरा में पशु आरोग्य मेला में पशुओं में मुंह और खुर रोग "मुंह पका" बीमारी के उन्मूलन  की विशाल परियोजना  का श्री गणेश करने के पहले  गायों को चारा खिलाया। उन्होंने कहा  कि कुछ लोग ऐसे हैं जो "ओम और गाय" का नाम सुनते ही ऐसा महसूस करते हैं जैसे उनके बिजली का करंट लग गया । मोदी जी ने इतना कुछ कहा, इतना कुछ किया लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिससे पता चले कि उनका मंत्रिमंडल अर्थव्यवस्था को सही करने के लिए कुछ कर रहा है।  अब जबकि गाय  और पशु की उपमा सामने आई तो मोदी जी कह सकते हैं उन्होंने बिगड़ैल भारतीय अर्थव्यवस्था सिंग पकड़कर पराजित किया और तेजी की ओर रुख किया। वस्तुतः भारतीय अर्थव्यवस्था की इस खराब दशा के बारे में कभी भी मनमोहन सिंह से बात नहीं की गई। मोदी जी ने अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए मनमोहन सिंह 5 सूत्री फार्मूले को अखबारों में जरूर पढ़ा होगा लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय से किसी ने भी उन्हें फोन नहीं किया । उल्टे भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीयों पर आरोप लगाया वे ओला -उबर में सफर करते हैं और गाड़ियां नहीं खरीद रहे हैं इसलिए ऑटोमोबाइल सेक्टर में मंदी आ गई है। यही नहीं वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने दिल्ली में व्यापारियों के बोर्ड को संबोधित करते हुए ट्वीट किया हे "गणित में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत खोजने के लिए आइंस्टीन को कोई मदद नहीं की।" सोशल मीडिया में बात बढ़ गयी और गोयल को बाद में स्पष्टीकरण देना पड़ा कि उन्हें गलत ढंग  से उद्धृत किया गया है ।
     मोदी जी की दूसरी पारी के 100 दिन पूरे हो गए और ऊपर जो कुछ भी कहा गया यह उनके मंत्रिमंडल की प्रतिभा के उदाहरण थे। अब यहां जो सबसे गड़बड़ है वह है कि मोदी जी खुद बहुत बड़े कम्युनिकेटर हैं जबकि उनके अधिकांश मंत्री प्रेस से बात करना नहीं चाहते है । अधिकांश मंत्रियों के अपने चहेते पत्रकार हैं जिसके माध्यम से वे सकारात्मक खबरें प्रसारित करते हैं।  जब वे बोलते हैं, ऐसा ही पीयूष गोयल ने किया, तो कहा जा सकता है कि टीवी वगैरह ना देखें।
            यह भी स्पष्ट है कि विगत 100 दिनों में जो सबसे ताकतवर इंसान  उभरा है वह है गृह  मंत्री अमित शाह। उन्होंने संसद में मोर्चा संभाला। धारा 370 और 35ए को खत्म करने की घोषणा की । नागरिकता अधिनियम को पेश किया जिससे 19 लाख लोगों के नाम अगर हटा दिए जाते हैं तो सभी हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता प्राप्त हो जाएगी। पिछले हफ्ते गुवाहाटी में उत्तर पूर्वी काउंसिल के  68 वें सत्र को संबोधित करते हुए अमित शाह ने घोषणा की कि हमारी सरकार धारा 371 का सम्मान करती है इसलिए वह इसमें कोई भी बदलाव नहीं करेगी। शाह इस बात को बखूबी जानते हैं फिर अगर भाजपा को उत्तर पूर्वी क्षेत्र में सत्ता में रहना है तो वह इससे खिलवाड़ नहीं कर सकते, दूसरी तरफ मुस्लिम बहुल कश्मीर में उनका दांव इतना कमजोर है तब भी उन्होंने पीडीपी से पल्ला झाड़ लिया और तब से राष्ट्रवादी एजेंडे पर काम करना शुरू कर दिया। निश्चित रूप से  कश्मीर और यू ए पी ए विधेयक तथा तीन तलाक को आपराधिक कार्य घोषित करने के मामले में यकीनन मोदी सामने थे लेकिन इन 100 दिनों में जो सबसे महत्वपूर्ण था वह था कि अमित शाह किस तरह से सामने आए । मोदी और उनके मामले में थोड़ा फर्क था। मोदी के बारे में सब जानते थे यही चुनाव जीत सकते हैं। अमित शाह सदा मोदी से एक कदम पीछे रहते थे और यह भी स्पष्ट हो गया कि मोदी के बाद पिछली कतार में शाह ही हैं।  बात यह है कि शाह ने धारा 370 और धारा 371 को अलग कर दिया है । धारा 370 के माध्यम से कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल था जब कि धारा 371 से उत्तर पूर्वी राज्यों को भी कुछ विशेष अधिकार हासिल हैं, खास करके जनजातीय समुदाय के लिए कानून बनाने का अधिकार   हासिल है । शाह ने पिछले हफ्ते गुवाहाटी में उत्तर पूर्व जनतांत्रिक गठबंधन को संबोधित करते हुए कहा कि  धारा 370 एक अस्थाई व्यवस्था थी जब कि धारा 371 संविधान में एक विशेष प्रावधान है। उन्होंने कहा यह नॉर्थ का अधिकार है इसे कोई नहीं छीन सकता।
            लेकिन यहां यह स्पष्ट नहीं हो सका की एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक पर शाह का जो जुझारूपन है वह मोदी की बातों से प्रतिध्वनित नहीं होता है।  जबकि मोदी को कश्मीर और असम के हालात के बारे में विदेशी समुदाय को स्पष्ट करना पड़ता है। शाह ने पिछले रविवार को उत्तर पूर्वी काउंसिल की मीटिंग में कहा कि वे असम या देश के किसी भी भाग में एक भी घुसपैठिए को नहीं आने देंगे उनकी इस भाषण के कुछ ही घंटों के बाद जिनेवा में राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग के आयुक्त मिशेल बेसलेट ने कहा की वे कश्मीर को लेकर ही चिंतित नहीं है बल्कि असम में एनआरसी पर भी उन्हें चिंता है। यहां सवाल उठता है कि क्या शाह मोदी जी के लिए कई मोर्चे खोल रहेगा हैं क्या प्रधानमंत्री को अपने गृह मंत्री से करना पड़ेगा कि वह थोड़ा कम बोलें और प्राथमिकता के तौर पर अर्थव्यवस्था को सुधारने दें। अब आगे क्या होगा यह कुछ ही हफ्तों में पता चल जाएगा।

Friday, September 13, 2019

हमारी भाषा हमारे आत्म अन्वेषण का आयुध है

हमारी भाषा हमारे आत्म अन्वेषण का आयुध है

आज हिंदी दिवस है। हिंदी दिवस से एक बात याद आती है कि दो दिन पहले राष्ट्रीय ग्रंथागार कहने पर एक विदुषी महिला ने हैरत जाहिर की कि यह क्या है? यह बताए जाने पर कि यह नेशनल लाइब्रेरी का हिंदी है वह चौंक गई। हिंदी को  नारों की भाषा  समझने  वाले ऐसे बौद्धिक वातावरण में हिंदी में बहस बड़ा ही अजीब लगता है ,और एक प्रश्न भी सामने खड़ा होता है कि ऐसे वातावरण में हिंदी के विकास के लिए इतना श्रम क्यों? क्योंकि हिंदी या कहें हमारी भाषा हमारे आत्म अन्वेषण का एक  आयुध है। उसी के माध्यम से हम अपने भीतर की बातों को बाहर प्रगट करते हैं। मातृभाषा मनुष्य की देह का एक का अदृष्य अंग है। अथवा, कह सकते हैं कि यह हमारी ज्ञानेंद्रिय है जो हमें आत्मदृष्टि देती है। चाहे आप कितने भी विद्वान हों, कितनी भी भाषाओं के पारंगत हो लेकिन आप का भाव बोध आपकी अपनी ही भाषा में होता है। मां को आप चाहे जो कहें लेकिन उसे आप अपनी भाषा में ही महसूस करते हैं। भाषा और आत्मबोध का यह संबंध मनुष्य को समस्त जीव जंतुओं से अलग कर देता है। अपने अधूरेपन को पहचान कर मनुष्य में संपूर्णता का स्वप्न में आता है और यही पहचानना आत्मबोध है, जो अपनी ही भाषा में होता है। किसी भी संस्कृति की पहचान केवल उसकी यथार्थता से नहीं होती बल्कि उसके सपनों से भी उसकी विशेषता उजागर होती है।  उन सपनों की बुनावट में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक संस्कृति के जो सपने हैं यह बहुत हद तक उसकी स्मृतियां निर्धारित करती हैं।  शब्द में उन्हीं सपनों का संकेत हुआ करता है और वे शब्द आपकी भाषा के मूल अक्षर हैं। इसीलिए कोई भी भाषा कभी मरती नहीं उसे मारने का चाहे जितना प्रयास किया जाए। वह संस्कृति के सपने में हमेशा जीवित रहती है। हमारे अवचेतन में लगातार प्रवाहित रहती है। यही कारण है कि हमारा एहसास, हमारी अनुभूतियां वगैरह हमारी अपनी भाषा में ही होती हैं। हम सीखी हुई  या थोपी हुई भाषा में उसे अनुभूत नहीं कर सकते। भले ही अभिव्यक्त कर सकते हैं। यही कारण था कि मैक्स मूलर जैसे भारतविद को सदा यह महसूस होता था कि "जब तक भारत में संस्कृत या उससे पैदा हुई भाषाएं परस्पर संवाद और आत्म चिंतन के लिए जीवित रहती हैं तब तक भारत की सांस्कृतिक अस्मिता बची रहेगी। उसके रहते भारतीय सभ्यता को मृत स्मारकों की तरह नहीं देखा जा सकता।" उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत की राष्ट्रीय चेतना इसी सांस्कृतिक अस्मिता के भीतर से प्रस्फुटित हुई। संस्कृत और भारतीय भाषाओं के भीतर जातीय स्मृतियों की एक ऐसी विपुल संपदा सुरक्षित थी जो एक संजीवनी की तरह अतीत से बहकर भारत की चेतना को आप्लावित करती थी। हमारी राष्ट्रीयता के बीज इसी चेतना में निहित थे। यही कारण था कि मेकाले ने चेतावनी दी थी कि "हम भारत में पश्चिमी संस्कृति का प्रभुत्व तब तक नहीं कायम कर सकेंगे जब तक भारतीय शिक्षा पद्धति में संस्कृत भाषा को पूरी तरह से निष्कासित नहीं कर लेते।" जिस वैचारिक स्वराज की बात भारतीय दार्शनिक के सी भट्टाचार्य ने उठाई थी उसका गहरा संबंध है एक जाति की भाषाई अस्मिता से है।  यही भाषाई अस्मिता हमारी संस्कृति का सत्य थी। सच तो यह है और कहिए सच तो यही है कि अन्य भाषा जिसे हम बहुत विकसित कहते हैं वह खिड़की से बाहर देखा गया एक बाह्य जगत है। किसी ऐतिहासिक दबाव और या दमन के कारण जब अपनी भाषा से उन्मूलित हो जाते हैं तो ठीक उसी अनुपात में अगर खिड़की से बाहर जाकर देखें तो बाहर देखा गया परिदृश्य धुंधला नजर आता है। भाषा भीतर के सच और बाहर की यथार्थ के बीच एक सेतु है और यह सच तथा यथार्थ दोनों एक दूसरे से अलग नहीं हैं। बस केवल वैचारिक सुविधा के लिए हम उसे दो अवधारणाओं के रूप में देखते हैं।
       यहां आकर भाषा के दो रूप हमारे सामने उभरते हैं या कहिए उनके दो चरित्र। एक जो हम बोलते हैं जिनमें हमारा संवाद होता है और दूसरा भाषा का तात्विक स्वरूप जो सतह के नीचे कायम रहता है लेकिन हमेशा सतह के ऊपर बोले गए शब्दों में प्रतिध्वनित होता है। भाषा के  इसी आंतरिक स्वरूप और उसके व्यवहारिक चरित्र के बीच एक संबंध होता है जो हमेशा गतिशील रहता है। यह मानव समाज के विकास के साथ चलता है और उसका स्वरूप निर्मित करता है। जहां तक हिंदी का प्रश्न है वह ऐतिहासिक काल से बदलती हुई आज की स्वरूप तक पहुंची है और कह सकते हैं यह आगे बढ़ती हुई हमारे सामूहिक अनुभव और अस्मिता के रूप में ढल गई है।आज हिंदी के विकास की आवश्यकता इसलिए है कि वह हमारी सामूहिक अस्मिता का एक बिंब बन गयी है और वह बिंब हमारी स्मृतियों के साथ जुड़ा है।  हमारे सपनों के साथ भी जुड़ा है। जब हम अपने विचारों को किसी दूसरी भाषा में व्यक्त करते हैं तो एक हद तक स्वयं हमारे विचार उस भाषा के प्रत्यय द्वारा अनुशासित होने लगते हैं । ऐसे में भाषा  माध्यम नहीं रह जाती है वह शक्ति का साधन बन जाती है। हम उस भाषा में अपने विचार को व्यक्त कर सकते हैं लेकिन ठीक उसी रूप में जिसमें वह करवाना चाहती है।  प्रश्न भाषा के प्रभुत्व के रूप में सामने आता है। क्योंकि दूसरी भाषा में हम कहना कुछ चाहते हैं लेकिन वह भाषा वही कहवाती है जो वह चाहती है। 19 वीं शताब्दी में राष्ट्रीय जनमानस को जिस राष्ट्रीय भावना ने आलोकित किया था उसमें हिंदी के रूपकात्मक बिंबों का महत्वपूर्ण योगदान था। आज जब भारत को कुछ भारतीय इतिहासकार ही महज एक संघ बताते हैं और भारत राष्ट्र को एक काल्पनिक उपज की संज्ञा देते हैं उस समय वे भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक पीठ को बिल्कुल भुला देते हैं। स्वतंत्रता प्राप्त करने की भारत की लालसा केवल राजनीतिक उद्देश्यों से उत्प्रेरित नहीं थी उसके पीछे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सबके समक्ष लाने की आकांक्षा भी थी। यही आकांक्षा हमारी भाषा को स्वरूप देती थी। आज हम उसी भाषा के लिए बार-बार प्रयास करते हैं और यह बताते हुए गर्व महसूस होता है कि हम लगातार विकसित हो रहे हैं। विख्यात भाषाविद जीएन देवी के अनुसार आज हिंदी दुनिया की सबसे तेज बढ़ती हुई भाषा है और इसका विकास उत्तरोत्तर हो रहा है। हिंदी दिवस के रूप में हम उसी विकास को अपनी ऊर्जा प्रदान करते हैं और हमें पूरा यकीन है कि हम वह लक्ष्य हासिल करके रहेंगे जिसके लिए हमने संकल्प किया है।

Thursday, September 12, 2019

जम्मू कश्मीर का परिसीमन और उसका प्रभाव

जम्मू कश्मीर का परिसीमन और उसका प्रभाव

अब से कोई 11 वर्ष पहले 2008 में चौथी बार परिसीमन हुआ था जिसमें कई राज्य छूट गए थे। उधर 2001 की जनगणना रिपोर्ट को गुवाहाटी हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी और इसलिए 2008 में उत्तर पूर्वी राज्यों का परिसीमन नहीं हो सका। मणिपुर के मामले में भी एक मुकदमा लंबित था। झारखंड का परिसीमन हुआ पर रांची हाई कोर्ट ने उसे लागू नहीं होने दिया।  कारण बताया कि अनुसूचित जनजातियों के लिए सुरक्षित विधानसभा सीटों यह संख्या पहले के मुकाबले कम कर दी गई हैं। जम्मू और कश्मीर का परिसीमन नहीं किया गया क्योंकि वहां अलग संविधान था और परिसीमन आयोग यह गठन का अधिकार राज्य सरकार के पास होता है अतएव राष्ट्रीय परिसीमन आयोग को जम्मू कश्मीर की सीमाओं छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। अब जबकि जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटा ली गई और वहां अलग संविधान नहीं रहा तो  यह तर्क दिया जा रहा है की जम्मू कश्मीर के परिसीमन की शुरुआत होनी चाहिए। लेकिन 2008 में जिन राज्यों का परिसीमन नहीं हो सका था वहां भी यह प्रक्रिया अभी लंबित है।  ऐसे में जम्मू कश्मीर के परिसीमन की मांग से कई सवाल उठते हैं। पहला सवाल कि अगर वहां परिसीमन किया जाता है तो राज्य पर क्या असर पड़ेगा? क्योंकि, जम्मू और कश्मीर आजादी के बाद से अभी तक भारत के लोकतांत्रिक राजनीति के मुख्यधारा में नहीं था और वहां की जनता का राजनीतिक आचरण वैसा नहीं है जैसा देश के अन्य भागों का है। लोकतंत्र या कहें आधुनिक लोकतंत्र के संदर्भ में जम्मू कश्मीर के राजनीतिक आचरण का समाज वैज्ञानिक अध्ययन अभी तक हुआ नहीं है। उसकी सोच कुछ दूसरे प्रकार की है। वैसे तो कहा जाता है की परिसीमन का उद्देश्य राज्य के सभी विधानसभाओं और लोकसभा क्षेत्रों का आकार एक समान होते हैं जिससे एक मतदाता और एक वोट कर समीकरण कायम रहे । परिसीमन का उद्देश्य संभवत संसदीय क्षेत्रों के आकार में समानता बनाए रखना है ताकि अचानक जनसंख्या में वृद्धि के कारण विभिन्न स्थानों पर अलग अलग कारणों से बढ़ी वोटरों की संख्या में असमानता ना रहे। शहरी क्षेत्रों में खासकर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्रों में जनसंख्या में वृद्धि हुआ करती है। यह वृद्धि जन्म और मृत्यु के समीकरण से कहीं ज्यादा होती है। जिसका कारण होता है शहरों में आजीविका के साधनों का जन्म मृत्यु दर से तालमेल नहीं होता। इसी तरह पहाड़ों से आजीविका की अनुपस्थिति के कारण जनसंख्या घटने लगती है । अब ऐसे में कुछ विधानसभाओं  या संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या असंतुलित हो जाती है। परिसीमन आयोग का काम है कि सभी विधानसभा क्षेत्रों और संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या को सामान बनाकर रखे। उनका आकार कमोबेश समान हो। जम्मू कश्मीर के परिसीमन से भी यही उम्मीद की जाती है। लेकिन प्रवास के सामान्य कारणों को देखा जाए तो यह पहले से ही कहा जा सकता है जम्मू कश्मीर विधानसभा क्षेत्रों की संख्याओं में काफी असंतुलन है। अब नए परिसीमन से जम्मू कश्मीर विधानसभा क्षेत्रों की संख्या में बदलाव आ सकता है।
            जम्मू और कश्मीर में कुल 87 विधानसभा क्षेत्र हैं । जिनमें 46 कश्मीर में 37 जम्मू में और लद्दाख में केवल चार सीटें हैं । फिलहाल कश्मीर में वोटरों की संख्या 87,778 है जबकि जम्मू में 91,593 यानी कश्मीर की तुलना में जम्मू में लगभग 5हजार से ज्यादा वोटर हैं। लद्दाख विधानसभा क्षेत्रों के आकार छोटे छोटे हैं और यहां तुलनात्मक तौर पर कम वोटर हैं। अब जब परसीमन होगा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं नए रूप में होंगी तो यकीनन जम्मू क्षेत्र में सीटों की संख्या बढ़ेगी। जबकि कश्मीर में सीटों की संख्या घटेगी। इन दोनों क्षेत्रों में भाजपा, पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के जनाधार अलग-अलग हैं। I इस परिसीमन का प्रभाव भी राजनीति पर और उन पार्टियों के जनाधार पर पड़ेगा। जम्मू में सीटें बढ़ने से प्रत्यक्ष तौर पर भाजपा को लाभ होगा । अगले कुछ सालों में उसका जनाधार वहां काफी मजबूत हो जाएगा। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 3 सीटें मिलीं और उसे 46.4% वोट प्राप्त हुए थे। भारत के चुनावी इतिहास में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा था इससे स्पष्ट हो जाता है कि कश्मीर में अपना जनाधार बढ़ाए बिना भी भाजपा राज्य की राजनीति में अपना मुख्य स्थान बना सकती है । उधर पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस कश्मीर की पार्टी हैं और उनका जनाधार कश्मीर में ही मजबूत है। कश्मीर में सीटों की संख्या घटने से राज्य में पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस की संभावनाओं पर सीधा आघात लगेगा।
       इस वर्ष के लोकसभा चुनाव में कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस को 3 सीटें मिली थी लेकिन जम्मू क्षेत्र में उसे केवल 7.9% वोट मिले थे 2014 में पीडीपी को जिन सीटों पर विजय मिली थी वह उसके हाथ से निकल गईं। इसका प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। उसे महज 2.4% वोट मिले । कांग्रेस का जनाधार भी घट सकता है। पिछले चुनाव में उसे 28.5% वोट मिले थे फिर भी जम्मू और कश्मीर दोनों क्षेत्रों में पार्टी का जनाधार लगभग समान है। लिहाजा परिसीमन के बाद जनसंख्या बदलेगी तब भी कांग्रेस के समीकरण पर कोई विशेष असर नहीं पड़ेगा। लेकिन यह तय है उसके सामने चुनौतियां आएंगी इसलिए उसे सावधान रहना होगा। धारा 370 हटाए जाने के बाद भाजपा के बढ़ते वर्चस्व के कारण वहां बाहरी ताकतों  के  हर प्रयास के बावजूद सामाजिक  परिवर्तन सकारात्मक होगा और यह स्थिति जम्मू के विकास में जहां सहायक होगी वहीं भारतीय जनता पार्टी के शक्तिशाली होने में भी मददगार होगी। अगर संक्षेप में कहें तो परिसीमन के बाद वहां उभरी नई स्थिति भारत देश के पक्ष में होगी और भाजपा उसका कारक कही जाएगी। यह ताजा समीकरण भारत के अन्य हिस्सों पर भी राजनीतिक बदलाव की प्रक्रिया को तीव्र करेगा।