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Wednesday, January 16, 2019

कानून तो बन गया पर विपक्ष का रुख आत्मघाती

कानून तो बन गया पर विपक्ष का रुख आत्मघाती

संसद में  एक सौ तीन वें   संविधान संशोधन विधेयक के पारित हो जाने पर सवर्णों को 10% आरक्षण देने का कानून बन गया।  उस पर राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई और  अधिसूचना भी जारी हो गयी।  अब इसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों और अल्पसंख्यकों के कुछ हिस्से को शिक्षा और रोजगार में आरक्षण मिलेगा । 8 जनवरी को यह बिल लोकसभा में कुछ ही घंटों की बहस के बाद पारित हुआ। इसमें 326 सदस्यों ने वोट डाले जिसने तीन ही विपक्ष में थे। दूसरे दिन राज्यसभा में भी  165 सदस्यों ने इसके पक्ष में वोट दिया और 7 विपक्ष में । लेकिन संसद के दोनों सदनों में विपक्ष का रुख देखकर ऐसा लगता था कि यह बिल पास नहीं हो पाएगा । लेकिन हां -हां ,ना- ना के बाद बिल पास हो गया। अब यहां प्रश्न उठता है कि क्या विपक्ष का यह रुख उसके लिए आगे चलकर घातक नहीं होगा? विपक्ष के बड़े-बड़े नेताओं ने इतनी बड़ी -बड़ी बातें कहीं कि सुनने वाला हैरान रह गया। जैसे कपिल सिब्बल ने कहा कि "आप 130 करोड़ की आबादी के देश में सिर्फ 4500 लोगों के फायदे के लिए विधेयक लाए हैं और वह भी बिना किसी आंकड़े के। मालूम है ,मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने में 10 साल लगे थे। " रामगोपाल यादव ने तो उसे सीधा 2019 के चुनाव को लक्ष्य में रख कर लाया गया विधेयक बताया । इसी तरह सतीश चंद्र मिश्रा ,डेरेक ओ ब्रायन, कनिमोई , प्रफुल पटेल आदि नेताओं ने भी लंबे-लंबे भाषण दिए । अगर चालू भाषा में कहें तो कह सकते हैं कि इन्होंने सरकार को जमकर धोया । ऐसा लगता था कि जब मत विभाजन होगा तो सरकार बुरी तरह हार जाएगी और विधेयक निरस्त हो जाएगा। लेकिन कुछ नेताओं को छोड़कर विपक्ष के सभी नेताओं ने दुम दबा लिया और विधायक भारी मतों से पारित हो गया । यहां तक कि राज्यसभा में भी जहां सरकारी पक्ष का बहुमत नहीं है वहां भी विधेयक दो तिहाई बहुमत से अधिक से पास हुआ। 
       पूरा देश राजनीति के तमाशे को देख कर रात के तीसरे पहर में हैरान था। सब को बराबरी का अधिकार देने वाले इस देश में सिर्फ कुछ ही घंटों में लोकतांत्रिक ढांचा बदल गया । जनता अवाक है। सांसदों को जनता की भावना का ध्यान रखना चाहिए था। जनता के बीच यह बात जा रही है कि यह विधेयक एक तरह से टेस्ट केस है। आगे चलकर देश को जातियों में बांटा जाएगा उसके बाद आर्थिक आरक्षण लग जाएगा। यह आर एस एस की चाल है । एक लंबी अवधि की योजना है। संविधान के जिन निर्माताओं ने जातिगत आरक्षण दिया था वे चाहते थे इसे स्थाई तौर पर नहीं रखा जाए लेकिन राजनीति ने पहली वोट के लोभ में इसे स्थाई कर दिया अब उसमें भी बदलाव किया जा रहा है। यही नहीं ,कुछ लोग यह मानते हैं कि 8 लाख रुपया साल की आमदनी का का मतलब 2100 रुपए रोज। जिस देश में 32 रुपए रोज गरीबी की रेखा है वहां 2100 रुपये रोज का क्या अर्थ होगा इसका अंदाजा सब कोई लगा सकता है। देश की 95% आबादी इसके दायरे में आ जाएगी। उधर जो 5 प्रतिशत लोग बचे हैं उन्हें लग रहा है उन्हें कुछ नहीं मिल रहा है। अगर इनमें से बेहद अमीर लोगों को हटा भी दें तो लगभग 5 करोड़ लोग मध्यम वर्ग के ऐसे हैं जिन्हें इस का आघात महसूस हो रहा है और एक भावना पनप रही है कि जिस देश में प्रतिभा की कद्र ना हो वहां क्यों रह जाए। बहस के दौरान  ना- ना कहकर हां कहने वाले नेता न जाने किस सोच से ऐसा कर गए । लेकिन ,शायद वह फायदे में नहीं रहेंगे और सारे विरोध के बावजूद मोदी मैदान मार ले जायेंगे। वह इसका विरोध कर मोदी की चाल को रोक सकते थे। लेकिन  इतनी दूर कि शायद सोच नहीं पाए या हो सकता है उनके मन में कोई नई रणनीति हो। यह तो चुनाव ही बताएगा । उनका यह कदम जनता को आत्मघाती महसूस हो रहा है।

Tuesday, January 15, 2019

खतरे भी हैं गठबंधन के

खतरे भी हैं गठबंधन के

हमारे देश में चुनाव की खबर इस समय चर्चा का विषय है और इस चर्चा के दौरान महागठबंधन पर जरूर बात होती है । यद्यपि राजनीतिक पंडित  गठबंधन की संभाव्यता पर बहुत लंबी बहस कर चुके हैं लेकिन उन्होंने यह नहीं परखा है कि यह कितना जरूरी है। दरअसल किसी भी पार्टी को गठबंधन में शामिल होने के तीन कारण हो सकते हैं। इनमें पहला और सब से साधारण कारण है कि वह पार्टी अपना मत आधार खोने के डर से गठबंधन में मिलती है।  आरंभ में हो सकता है कि परिणाम पक्ष में आएं लेकिन बाद में इससे पार्टी का कद छोटा होता जाता है। क्योंकि गठबंधन के अन्य घटक दल अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए उसके कद को चुनौती देने लगते हैं। यह संजोग ही कहेंगे कि जिन मतदाताओं का मोहभंग हो चुका है वह गठबंधन में एक उचित विकल्प देखने लगते हैं। जो बहुत कट्टर या कहें बहुत पक्के मतदाता है उन्हें भी लगता है कि इसमें उनके आदर्श की या विचारों की भविष्य में पूर्ति हो सकती है। इसका सबसे बेहतर उदाहरण कांग्रेस का तमिलनाडु में  द्रमुक के साथ और उत्तर प्रदेश में  बसपा के साथ गठबंधन था । जहां से बाद में वह एक तरह से समाप्त हो गई और दोनों क्षेत्रीय दल वहां स्थापित हो गए। यही नहीं शिवसेना और भाजपा का गठबंधन भी इसका उदाहरण है । अपने प्रभाव क्षेत्र में  शिवसेना ने भाजपा के विकास को रोक दिया।
      गठबंधन का दूसरा कारण होता है  सत्ता में आने की हड़बड़ी। अगर कोई छोटी पार्टी जिसमें उसे अपने अस्तित्व को खतरा देने लगता  है तो वह किसी मजबूत दल के साथ हाथ मिलाकर सत्ता में आ जाता है, ताकि खुद को स्थापित कर सके । ऐसे गठबंधन में वह छोटा दल बड़े दल की कृपा पर निर्भर रहता है। यही कारण है कि बिहार में जदयू और राजद के साथ गठबंधन कर कांग्रेस ने  अपना बंटाधार कर लिया। उत्तर प्रदेश में जहां भाजपा से अपना दल नामक एक बहुत ही मामूली राजनीतिक पार्टी का गठबंधन है वह इसी तरह की पीड़ा से ग्रस्त है । यही नहीं ,अगर गठबंधन करने वाली पार्टी प्रभावशाली है तो वह इसके माध्यम से अपना विरोधी उत्पन्न करती है।
          एक बहुत पुरानी कहावत है कि अवसर की कमी इंसान की क्षमता को समाप्त कर देती है । इसी तरह गठबंधन में पार्टी की क्षमता समाप्त हो जाती है। अगर गठबंधन करने वाली बड़ी पार्टी में क्षमता है ,उसके पास संगठित काडर आधार है तो वह गठबंधन के बाद अपने को स्थापित करने का मौका गंवा देती है। उड़ीसा में इसका उदाहरण स्पष्ट दिखता है । जहां पुराना गठबंधन घटक भाजपा बीजू जनता दल के लिए समस्या बन चुका है। कई बार  व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के कारण विद्रोह की  आशंकाएं भी होती हैं। जनता पार्टी इसका उदाहरण है। वह चरण सिंह की महत्वाकांक्षाओं के कारण टूट गई। इसी तरह बिहार में भी हुआ। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनने की गरज में गठबंधन से अलग होकर भाजपा से जा मिले।
             बेशक पार्टियां वोट पाने के लिए गठबंधन में शामिल होती हैं लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता है। वास्तविकता तो यह है कई बार नतीजे विपरीत भी आ जाते हैं। खासकर  ऐसी स्थिति में जब गठबंधन का दूसरा घटक दल समान उद्देश्य का ना हो। उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और मुलायम सिंह का गठबंधन सबको याद होगा । इसकी कीमत पराजय के रूप में मुलायम सिंह को चुकानी पड़ी थी। क्योंकि कल्याण सिंह मुस्लिम विरोधी थे। यही हाल बंगाल में कांग्रेस और माकपा गठबंधन का हुआ। वहां भारी पराजय का मुंह देखना पड़ा । क्योंकि दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं था। अतीत में दोनों पार्टियां हैं एक दूसरे की विरोधी थी और कई बार तो उन्हें टकराव भी हो चुका था। तेलंगाना में कांग्रेस और तेलुगू देशम पार्टी के गठबंधन का यही हश्र हुआ ।  तेलुगू देशम पार्टी की छवि तेलंगाना विरोधी थी।
         तीसरी शर्त होती है गठबंधन की कि किसी बड़ी पार्टी के विकास को रोकने के उद्देश्य से कई पार्टियां एकजुट हो जाती हैं। यह सबसे महत्वपूर्ण शर्त है । क्योंकि इस समय जो राजनीतिक हालात हैं उसमें यही शर्त लागू होती है।  जब एक ऐसे विरोधी से गठबंधन जीत जाता है तो उस पर अपने वायदे पूरे करने के लिए दबाव पड़ने लगते हैं।  अगर ऐसा नहीं होता है तो जनता का मोह भंग हो जाता है उसके प्रति  जनता फिर उससे पल्ला झाड़ लेती है । इस तरह की स्थिति का सबसे बड़ा उदाहरण इंदिरा गांधी का सत्ता में लौट आना है। जनता पार्टी कुछ नहीं कर सकी।
        आज की स्थिति में अगर विपक्षी दलों का महागठबंधन बनता भी है और वह भाजपा को पराजित भी कर देते हैं तब भी इस पर अपने वायदे पूरे करने के लिए बहुत ज्यादा दबाव पड़ेगा और अगर गठबंधन के राजनीतिक ए अपने बड़ी-बड़ी  बातें नहीं पूरी कर पाए तो जनता फिर भाजपा की ओर देखने लगेगी। इसलिए कहा जा सकता है गठबंधन न केवल अवांछित है बल्कि उचित भी नहीं है।

Monday, January 14, 2019

राहुल गांधी से बहस के लिए क्यों नहीं तैयार हुए मोदी जी

राहुल गांधी से बहस के लिए क्यों नहीं तैयार हुए मोदी जी

पिछले हफ्ते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राफेल सौदे पर खुली बहस की चुनौती दी । इसके पहले उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि वह एक विस्तृत संयुक्त बहस के लिए भी तैयार हैं।  मोदी जी ने यह चुनौती स्वीकार नहीं की। एक टेलीविजन चैनल में इस विषय पर एक बहस का आयोजन किया और भाजपा के प्रवक्ता से पूछा गया कि मोदी जी आखिर क्यों नहीं तैयार हैं? उसका कोई जवाब नहीं था। पाठकों को याद होगा कि 2013 में मोदी जी तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इसी तरह बहस की चुनौती दिया करते थे। अपनी भाषण कला से अत्यंत आश्वस्त नरेंद्र मोदी को यह विश्वास था कि वे मनमोहन सिंह को उखाड़ देंगे। 2014 में ऐसे तमाम मत मिले थे जिनको यकीन था कि मोदी जी का यह विश्वास बिल्कुल सही है। अचानक चुनाव प्रचार के दौरान यह एक अत्यंत आदर्श प्रचार का तरीका बन गया। हमारे देश के चुनाव में किसी भी प्रार्थी की योग्यता और साख इस बात पर निर्भर होती है कि टेलीविजन के मतदान में किसे कितना प्वाइंट मिला है । अंग्रेजी बोलने वाला शहरी मध्यवर्गीय समुदाय इस तरीके को आदर्श मानने लगा है और उन्हें भरोसा हो गया था कि मोदी - सिंह का जो शो होगा उससे मोदी जी को बहुत ज्यादा टीआरपी मिलेगी ।  बहस के मामले में एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर मिनटों में धराशाई हो जाएंगे । यह शो कुछ ऐसा ही होगा जैसा डब्लू डब्लू ई की कुश्ती का शो होता है।  धीमे-धीमे बोलने वाले मनमोहन सिंह के सामने माइक पर गरजने वाले मोदी को खड़ा कर दिया जाता तो यह तय था कि मतदाताओं की पसंद मोदी होते।  बहस नहीं हुई । परंतु मोदी जी के चुनाव अभियान का बंदोबस्त करने वालों ने टीवी पर दोनों के भाषणों से टुकड़े इस तरह दिखाने शुरू कर दिए जैसे बहस हो रही हो। इसमें मनमोहन सिंह का भाषण 15 अगस्त 2013  को लाल किले की प्राचीर से किया गया संबोधन था। टीवी के कुछ एंकरों ने निष्कर्ष भी दे दिए कि मनमोहन सिंह बड़े अजीब लग रहे थे और अटक अटक कर बोल रहे थे। इससे मोदी  बहादुर और बेहतरीन भाषण करने वाले एक ऐसे नेता के रूप में उभर कर आए जो सामने वाले को मिनटों में मटिया मेट  कर दे। देश के मध्य वर्ग के मन में यह बात बैठ गई कि मोदी शेर हैं और सिंह मेमना । कॉरपोरेट सेक्टर के एक्सक्यूटिव के मन में यह बात बैठ गयी कि मोदी अत्यंत साहसी सीईओ हैं जो देश को अमरीका की ऊंचाई तक ले जायेंगे तथा सुरक्षा परिषद में गरजेंगे  और भारत की छवि सुपर पावर की हो जाएगी। पिछले वर्ष तक यह विचार कायम रहा।  2014- 15 में अगर एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर फिल्म रिलीज हो गई होती तो हमारे देश के भोले भाले मध्य वर्ग को और प्रभावित कर दिया होता लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है । मध्यवर्ग  उनकी छवि का खोखला पन महसूस करने लग गया है। वाजपेई - आडवाणी काल में भी बाजपेई जी को मुखौटा कहा जाता था और आडवाणी जी को चेहरा । अब मोदी जी के जमाने में यह बदल कर  आदमी हो गया और उनकी छवि उनका होलोग्राम हो गई है। दोनों इस डिजिटल भारत में लेजर से चमकते हैं । यह खोखलापन खुद मोदी जी को और उनके चुनाव प्रबंधकों को महसूस होने लगा है और यही कारण है उन्होंने राहुल गांधी की चुनौती नहीं स्वीकार की । मीडिया ने तो राहुल गांधी की छवि पप्पू की तरह बना दी थी। उनको इस तरह वर्णित किया गया था मानो एक जोकर हैं। अचानक जोकर ने पलट कर हमला किया और लोगों को बचने का अवकाश नहीं मिला ।
       अमरीकी राष्ट्रपति स्टाइल की बहस हमेशा से भद्दी होती रही है। यहां तक कि अमरीका में भी इसे नहीं पसंद करते हैं लेकिन यह मतदाताओं की धारणाओं को कहीं न कहीं स्पर्श करती है । अतएव  जब राहुल गांधी ने मोदी जी को चुनौती दी तो जो अमरीकी सोच वाला वर्ग भारत में था और जो एन आर आई थे वह सब चुप हो गए और सोचने लगे अगर मोदी जवाब नहीं दे पाए तो क्या होगा ? क्या मोदी जी की टीआरपी गिर जाएगी ? यदि राहुल गांधी की रेटिंग बढ़ जाती है तो इसका मतलब होगा चुनाव के पहले ही चुनाव हार जाना। इसलिए अच्छा होगा कि मोदी जी को बढ़ावा देने वाले  को इंटरव्यू दे दिया जाए। जिसने मोदी जी का इंटरव्यू किया उसने राहुल का क्यों नहीं किया या मनमोहन सिंह का क्यों नहीं किया ?  अचानक उसे सभी निजी चैनलों ने  ऊंची कीमत देकर  दिखाया क्यों नहीं? कोई स्वतंत्र एजेंसी को यह इंटरव्यू क्यों नहीं दिया गया । अमरीका के राष्ट्रपति स्टाइल की बहस व्यर्थ होती है । मोदी पर आरोप लग सकते थे कि वह अमरिकी राष्ट्रपति की तरह शासन चला रहे हैं। लेकिन वे राहुल से बहस के लिए तैयार नहीं हुए।
        अब महत्वपूर्ण प्रश्न है 2019 में क्या होगा? क्या मोदी दोबारा बहुमत पाएंगे? हो सकता है उनका वोट प्रतिशत घट जाए। अगर बहुमत नहीं पाते हैं तो क्या चुनाव के पहले या बाद में विपक्ष एकजुट हो पाएगा? क्या मोदी जी को बहुदलीय सरकार बनाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा और क्या वह सरकार चला पाएंगे?  भाजपा और संघ के छोटे कार्यकर्ता मोदीजी से ऊब चुके हैं लेकिन क्या वे सचमुच मोदीजी के विरुद्ध वोट डाल सकेंगे? यह कुछ सवाल हैं जिसका कोई जवाब नहीं देता नाही इस पर कोई जनमत संग्रह होता है। सही चुनाव यह प्रदर्शित करेगा कि राजनीति की दुनिया में हमारे नेता कहां हैं। इसके बाद मीडिया और राजनीतिक पंडित यह बताने लगेंगे कि वह किस तरह सही हुए या चुपचाप चुनाव के परिणाम का विश्लेषण करते पाए जाएंगे और इसके बाद धरती का सबसे बड़ा राजनीतिक शो खत्म हो जाएगा।

फिंगरप्रिंट की जालसाजी से सीमावर्ती क्षेत्रों में फल फूल रहै हैं आतंकवाद के अड्डे 

फिंगरप्रिंट की जालसाजी से सीमावर्ती क्षेत्रों में फल फूल रहै हैं आतंकवाद के अड्डे 


हरिराम पाण्डेय

कोलकाता : अब तक तो सुना जाता था कि कुछ राज्यों के कई जिलों में जीवित लोग मृत घोषित कर दिए गए हैं। लेकिन अब इसका उल्टा हो रहा है। कई जगहों पर मृत लोग  सरकारी रिकार्ड में जीवित हैं।  यह सब चल रहा है फिंगरप्रिंट की जालसाजी से। अब तक फिंगरप्रिंट को सबसे विश्वसनीय सबूत माना जाता था अपराध विज्ञान की प्रयोगशाला से कोर्ट कचहरी और बैंकों तक में फिंगरप्रिंट के माध्यम से ही सारे कारोबार होते थे। यहां तक कि उसकी विश्वसनीयता के कारण ही कई जगहों पर फिंगरप्रिंट के माध्यम से काम करने वालों की हाजिरी बनती है। लेकिन अब जबकि फिंगरप्रिंट की जालसाजी हो रही है सबसे ज्यादा खतरा सीमावर्ती जिलों में पनपते आतंकवाद से हो रहा है। किसी भी मृत व्यक्ति या जीवित व्यक्ति की उंगली की छाप लेकर उसकी नकल बना ली जा रही है।  उसका इस्तेमाल किया जा रहा है। अगर कोई पकड़ा जाता है या तो वह मृत घोषित हो चुका रहता है या कहीं दूसरी जगह का आदमी पाया जाता है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीमांत क्षेत्रों में या गोरखधंधा बहुत जम कर चल रहा है। यहां तक कि उंगलियों की छाप से निर्धारित किए जाने वाले वोटर कार्ड भी अब सही नहीं रहे और यह छाप बनवाना इतना आसान हो गया है कोई भी कभी भी जाकर बनवा सकता है।  सन्मार्ग की खोज  के बाद पता चला कि उत्तर बिहार के सिवान से लेकर गोरखपुर तक और उधर नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में फिंगरप्रिंट बनाने के कई गृह उद्योग चल रहे हैं। नेपाल से आए लोग जिनमें पाकिस्तान से नेपाल के रास्ते या बांग्लादेश से नेपाल के रास्ते आए आतंकी भी शामिल हैं वह किसी भी मृत व्यक्ति का फिंगरप्रिंट बनवाकर और उसके माध्यम से भारतीय कागजात हासिल कर लेते हैं।  बैंकों में अकाउंट खुल जाता है और उसके बाद वह राष्ट्र विरोधी धंधे में लग जाते हैं। खबर तो यहां तक है की लोकसभा चुनाव में नकली फिंगर प्रिंट के आधार पर बड़ी संख्या में लोग वोट देने की तैयारी में हैं। अब यह मतदान कैसा होगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा । नेपाल से भारत में आकर और  किसी भारतीय  का फिंगरप्रिंट हासिल कर उसकी नकल बनवाकर और उंगलियों में पहन कर वह अपने को भारतीय प्रमाणित करने लगता है। 
कैसे बनते हैं ये फिंगर प्रिंट
फिंगरप्रिंट बनाने वाले किसी भी गरीब मरणासन्न व्यक्ति की छाप ले लेते हैं। यह छाप वाल पुट्टी या आर्टिफिशल क्ले की चकती पर ले लेते हैं और  उसके वोटर कार्ड इत्यादि मामूली रकम देकर खरीद लेते हैं। उंगलियों की छाप की नकल बना लिया जाता है। सारी चीज हिफाजत से रखी जाती है। अब जो मृत व्यक्ति की छाप चाहता है उसे ऊंची कीमत पर बेचा जाता है। एक उंगली की छाप की नकल हज़ार रुपये में मिलती है। 
जीवित लोगों की छाप बनाने का तरीका दूसरा है। किसी भी चिकनी सतह पर उंगलियों की छाप बहुत जल्दी आ जाती है । अब जिसकी उंगली की छाप लेनी है उसे एकदम नए चकाचक चिकनी सतह वाले कांच के गिलास में कोई पेय, मसलन चाय दी जाती है। वह गिलास को पकड़ता है और गिलास में उसकी उंगलियों की छाप आ जाते हैं। इसके बाद बहुत सफाई से उंगलियों की छाप का मोल्ड बना दिया जाता है और फिर उस पर जिलेटिन पाउडर का घोल ढाल कर उसकी नकल बना ली जाती है और जब वह जम जाता  है तो उसे सफाई से काटकर उंगलियों में पहना दिया जाता है। इसमें घंटे भर का समय लगता है। यह तरीका इतना कारगर होता जा रहा है कि जहां उंगलियों की छाप से हाजिरी बनती थी वहां अब रेटिना को पढ़ने वाले यंत्र लगाए जा रहे हैं । 
यही नहीं जब सन्मार्ग में नेपाल सीमा पर सशस्त्र सीमा  बल के अफसरों से इस संबंध में जानकारी चाही तो वे  सन्न रह गए । उन्हें अभी तक इस गोरखधंधे का पता नहीं था।
   इस धंधे से जुड़े लोगों के अनुसार इसमें लगभग रोज  400 से 500 उंगलियों की छाप बनती है । एक उंगली की छाप के लिए महज ₹250 लगते हैं और अगर पांच उंगलियों की छाप बनानी है तो ₹1000 में बन जाती है। । यह लगभग 20 से 25 बार प्रयोग में लाई जा सकती है। यह इतनी सफाई से बनाई जाती है कि उंगलियों की छाप के विशेषज्ञ भी  धोखा खा जाएंगे।
सूत्रों के मुताबिक इसका उपयोग बैंक धोखाधड़ी से लेकर मतदान केंद्र तक में आराम से होता है। आतंकवादी इसका उपयोग भारतीय कागजात तैयार करवाने में करते हैं।  इसके माध्यम से ही तैयार कागजों के कारण भारत नेपाल सीमा पर भिखनाथोरी के दोनों तरफ चितवन नेशनल पार्क से लेकर वाल्मीकि टाइगर रिजर्व तक ऐसे कई छोटे-छोटे गांव है जहां कि लोग अपनी उंगलियों के निशान बनवाकर भारत और नेपाल दोनों मुल्कों की राष्ट्रीयता का मजा ले रहे हैं। इसके लिए पहले उन इलाकों में लोगों की तलाश की जाती है जो अपनी उंगलियों की छाप बेच सकें।   उसकी नकल बनवाकर कुछ लोग भारतीय और नेपाली  राष्ट्रीयता के  अलग - अलग  कागजात तैयार करवा लेते हैं। क्योंकि   कागजात नकली है और अगर दुर्भाग्यवश उंगलियों की छाप के आधार पर किसी अपराध में उनकी शिनाख्त होने लगती है तो वह तत्काल छाप बदल देते हैं।  सब कुछ धरा रह जाता है ।खबर है कि बांग्लादेश में चुनाव के बाद यह नकली फिंगरप्रिंट की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है।  संदेह किया जाता है कि इसके माध्यम से जालसाजी कर भारत में प्रवेश करने की तैयारी चल रही है। यही नहीं फिंगरप्रिंट बनाने  वाले गिरोहों के करीबी सूत्रों  के अनुसार असम में  एन आर सी के कागजात की जो पड़ताल चल रही है उसमें भी शायद इसका उपयोग हो रहा है। हालांकि इस उपयोग के बारे में अभी तक कोई विश्वसनीय सूचना नहीं है।

Sunday, January 13, 2019

समरसता खिचड़ी ये क्या है प्रभु !

समरसता खिचड़ी ये क्या है प्रभु !

अपने देश में एक अजीब गोरख धंधा चल रहा है । कभी कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगता था, हाल तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी इस तरह के आरोप लगे। उसके बाद देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के वारिस राहुल गांधी जनेऊ धारी ब्राह्मण बन कर मंदिर - मंदिर घूमने लगे और "राष्ट्रभक्त " भारतीय जनता पार्टी मंदिर और विकास का मसला छोड़कर अब अचानक समरसता के मसले से जुड़ गई है और अब वह समरसता खिचड़ी बनाने लगी है। पिछले रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को आदेश दिया कि वे दलितों से जुड़ें। दलितों से जुड़ने का सबसे अभिनव तरीका निकाला गया कि  उनके साथ बैठकर खिचड़ी खाई जाए । पार्टी भक्त नेता इस मुहिम में जुड़ गए और गांव गांव से चावल दाल मांगकर खिचड़ी बनाने का अभियान चालू हुआ । यह महा नाटक की तरह लग रहा है । पार्टी के इस अभियान से दलित नेता भी असंतुष्ट हैं । उत्तर पश्चिम दिल्ली के भाजपा सांसद और वरिष्ठ नेता उदित राज के अनुसार "पहले तो वे दलितों के घर जाते हैं थोड़ा बहुत खाना खाते हैं और उसके बाद बाहर निकल कर मिनिरल वॉटर और बाहर का खाना मंगवा कर खाते हैं यह दलितों के लिए और अपमानजनक है। "पाठकों को याद होगा कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने भी इस तरह का कुछ प्रयोग किया था और ना केवल भाजपा ने उसकी बुरी तरह खिल्ली उड़ाई थी बल्कि यह अभियान पिट गया था।  अब भाजपा ने इसे शुरू किया है और पार्टी के दलित नेताओं के अनुसार इससे भारी नुकसान हो सकता है। गत जनवरी 2009 में राहुल गांधी ने  तत्कालीन ब्रिटिश विदेश सचिव डेविड मिलिबैंड के साथ अमेठी में एक दलित के घर में रात गुजारी थी और भाजपा ने यह कह कर उसकी खिल्ली उड़ाई थी कि यह "दरिद्र पर्यटन या पॉवर्टी टूरिज्म" है । अब दलित वोट बैंक के लिए भाजपा ने यही नीति अपनाई है। आंकड़े बताते हैं कि 2014 के आम चुनाव में पार्टी को दलितों का भारी समर्थन प्राप्त हुआ था। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में भी पार्टी को दलितों के वोट मिले थे । लेकिन हाल के चुनावों में दलितों ने भाजपा से पल्ला झाड़ लिया, क्योंकि भाजपा शासित कई राज्यों से दलितों पर भारी अत्याचार की खबरें आईं। अब इसी क्षति की पूर्ति के लिए पार्टी ने यह सब आरंभ किया है । यही नहीं , अनुसूचित जाति और जनजाति से संबंधित कानून पर 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भाजपा को और भी किनारे कर दिया। पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है और दावा भी किया है कि अगर अदालत में पूर्ववर्ती फैसले को जारी रखा तो वह कानून में संशोधन करेगी।  इससे दलित आश्वस्त नहीं हुए और 2 अप्रैल को राष्ट्रव्यापी हड़ताल हुई। जिसमें 12 लोग मारे गए । उत्तर प्रदेश में पांच दलित भाजपा सांसदों  ने खुल कर कहा कि मोदी सरकार ने दलित  समुदाय के लिए कुछ नहीं किया है। इस असंतोष से भाजपा को भय है कि वह दलित वोट खो देगी। इसीलिए यह महा नाटक आरंभ हुआ है। यह नाटक दरअसल पांच अप्रैल को उस समय आरंभ हुआ जब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह उड़ीसा के बोलांगीर में एक दलित के घर में भोजन करने गए। जब शाह भोजन कर रहे थे तो घर के बाहर गांव वाले  विरोधी नारे लगा रहे थे। 30 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के मंत्री सुरेश रैना अलीगढ़ जिले के एक दलित के घर में रात में चले गए। वहां बाहर से उनके लिए भोजन और मिनरल वाटर मनाया गया और वह खाना मंत्री महोदय ने उस दलित परिवार के साथ खाया। गृह स्वामी रजनीश कुमार ने कहां "उन्हें  कुछ मालूम नहीं था । सब कुछ पूर्व नियोजित था खाना बाहर से लाया गया और उनके परिवार को कहा गया उनके साथ बैठकर भोजन करें।'1 मई को उत्तर प्रदेश के एक और मंत्री राजेंद्र प्रताप सिंह ने एक दलित के घर में खाना खाकर  भगवान राम से अपनी तुलना की और कहा "राम और शबरी संवाद रामायण में है आज आज जब ज्ञान जी की मां ने मुझे रोटी परोसी तो उन्होंने कहा मेरा उधार हो गया ।" राजेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि" मैं क्षत्रिय हूं और धर्म की रक्षा करना मेरे रक्त में है। उन्हें लगता है कि उन्होंने अनमोल चीज दे दी है जिसे वह खरीद नहीं सकते।" दूसरी तरफ भाजपा के वरिष्ठ नेता और मंत्री उमा भारती ने राजेंद्र प्रताप के इस कथन का खंडन किया। उन्होंने कहा कि "मैं इस बात पर भरोसा नहीं करती कि दलित के  घर में जाकर भोजन किया जाए बल्कि होना यह चाहिए कि दलित को अपने घर में बुलाकर खाना परोसा जाए।" गत 6 जनवरी को रामलीला मैदान में भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने अपनी घोषणा में कई बार संशोधन किया "पहले उन्होंने कहा कि खिचड़ी बांटी जाएगी फिर उन्होंने कहा खिचड़ी परोसी जाएगी फिर उन्होंने अपने सुरीले अंदाज में भाजपा के नारे को गाकर सुनाया उसके बाद फिर कहा कि जब खिचड़ी परोसी जाएगी तो हम भी यहां उपस्थित लोगों के साथ बैठकर खाएंगे।"
       यह बात समझ में नहीं आती कि भाजपा- कांग्रेस जैसी पार्टी केवल इस भोजन राजनीति में क्यों जुटी हैं ? बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल ऐसा क्यों नहीं करती?  वही लोग जो दलितों को नीच समझते हैं वह इस में भाग ले रहे हैं । यहां दावा है कि भारतीय राजनीति के शीर्ष नेताओं  को किसी दलित भोजन के बारे में जानकारी नहीं होगी। दलितों के लगातार दमन के फलस्वरूप उनका खानपान भी समाप्त हो गया।   इस भोजन सियासत से कुछ नहीं होने वाला क्योंकि खिचड़ी चमचों से खाई और खिलाई जाएगी। इस पर गंभीरता से विचार करने पर पता चलेगा खिचड़ी में जो दाल है उसमें कुछ काला जरूर है।

Friday, January 11, 2019

भाजपा की मुश्किल बढ़ी

भाजपा की मुश्किल बढ़ी

5 विधानसभा चुनाव के नतीजों ने 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा को सतर्क कर दिया है। विधानसभा चुनाव में पराजय को देखते हुए भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार ने ग्रामीण- सामाजिक इंजीनियरिंग पर ध्यान देना शुरू कर दिया है और दोबारा सबका साथ सबका विकास का नारा देना शुरू कर दिया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कई बार कहा है कि भाजपा ने देश के 22 करोड़ परिवारों का भरोसा जीता है यह भरोसा नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित विभिन्न योजनाओं के कारण उत्पन्न हुआ था।  उम्मीद है कि अब यह भरोसा 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति को बदल दे, और पार्टी को 2014 से ज्यादा सीटें मिले। मध्य प्रदेश ,छत्तीसगढ़ और राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में मतों के तौर तरीकों को देख कर   ऐसा लगता है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में भाजपा की स्थिति कमजोर हो गई है। अब सत्तारूढ़ दल के लिए यह जरूरी है कि वह ग्रामीण मतदाताओं के लिए नई योजनाएं आरंभ करे या पुरानी योजनाओं का दायरा बढ़ाए। हिंदी भाषी क्षेत्रों के 3 राज्यों में चुनाव हुए और कांग्रेस ने किसान के कर्ज की बात उठाई तथा कर्ज माफी का आश्वासन दे दिया। चुनाव के तुरंत बाद कांग्रेस की सरकारों ने अपना वादा भी पूरा कर दिया और किसानों के कर्ज माफ किए। इस कदम से मोदी सरकार पर बहुत दबाव पड़ रहा है और यह समझा जा रहा है कि जल्दी ही मोदी सरकार कोई बड़ी कर्ज माफी योजना की घोषणा करेगी ताकि देश के 26.3 करोड़ किसानों को राहत मिल सके । चर्चा है कि 2019 के पहले मोदी सरकार चार लाख करोड़ के ऋण माफी की योजना पर काम कर रही है। जहां यह जिक्र कर देना प्रासंगिक होगा कि 2009 के आम चुनाव कि ठीक पहले तत्कालीन यूपीए सरकार ने 72 हजार करोड़ कृषि ऋण माफी की योजना घोषित की थी और इसका उसे बहुत लाभ मिला था। कांग्रेस ने चुनाव जीत लिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही कहा है कि मध्यम और कम आय वर्ग के लोगों को जीएसटी में भारी छूट मिलेगी । सरकार इसके तहत लगभग 99% वस्तुओं को लाना चाहती है और उन पर 18% से कम जीएसटी लगाने की योजना बन रही है। इससे 99% वस्तु की कीमत कम हो जाएगी और आम आदमी पर से दबाव घटेगा। जीएसटी काउंसिल की मीटिंग पिछले 22 दिसंबर को हुई थी और 23 वस्तुओं पर से जीएसटी घटाकर 12% कर दिया गया था कई में तो जीएसटी 5% कर दिया गया। इसके कारण कई वस्तुएं जैसे टेलीविजन, कंप्यूटर और मोटर गाड़ी के पुर्जे सस्ते हो गए और जिन वस्तुओं पर 5% जीएसटी लगता था उस पर से इसे हटा दिया गया । यही नहीं हो सकता है नरेंद्र मोदी सरकार सभी राशन कार्ड धारकों के लिए उज्जवला योजना लागू कर दे। इसके तहत गैस के कनेक्शन मुफ्त मिलेंगे । यह योजना 2016 में आरंभ की गई थी और गरीबी रेखा से नीचे की ग्रामीण महिलाओं को गैस कनेक्शन दिए गए थे। बाद में इसका दायरा बढ़ाकर इसके तहत अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को भी शामिल कर दिया गया। अब सभी गरीबों को यह कनेक्शन दिया जाएगा अभी अभी यह सब केवल गरीबों के लिए है। इस योजना के तहत सरकार गैस विक्रेताओं को प्रति कनेक्शन 16 सौ रुपए की सब्सिडी देती है ताकि वह गरीबों को मुफ्त गैस कनेक्शन दे सके। इस सब्सिडी में सिलेंडर की सिक्योरिटी फीस और इंस्टॉलेशन चार्ज शामिल होता है। प्रधानमंत्री मंत्री उज्जवला योजना 1 मई 2016 को आरंभ हुई थी और इसके तहत 3 वर्षों में 5 करोड़ लोगों को मुफ्त कनेक्शन दिए जा चुके हैं। इसका लक्ष्य 5 वर्षों में आठ करोड़ किया जाना है और नई योजना के तहत इस से एक करोड़ लोग और लाभान्वित होंगे। यही नहीं सरकार ने पेंशन की राशि में भी वृद्धि की है। राष्ट्रीय पेंशन योजना के तहत मूल वेतन के 14% पेंशन कर दिया गया है जो पहले 10% था । इसमें कर्मचारी का अवदान पहले की तरह 10% ही रहेगा। इससे उन करोड़ों लोगों को लाभ होगा जो पेंशन पर जीते हैं। सरकार निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को भी लाभ देने की योजना बना रही है । यह लाभ चुनाव के पहले ही घोषित कर दिए जाएंगे इसके तहत ग्रेच्युटी की सीमा 5 साल से घटाकर 3 साल की जानी है। मजदूर यूनियन इसके लिए लंबी अवधि से मांग कर रहे हैं । सरकार केंद्र सरकार में अनुबंध पर काम करने वाले कर्मचारियों की ग्रेच्युटी सीमा भी घटाने पर विचार कर रही है अगर यह मंजूर हो जाता है तो इससे लाखों कर्मचारियों को लाभ होगा खास करके उन्हें जो 5 साल की से पहले नौकरी छोड़ देते हैं।
           मोदी का सबसे बड़ा संकट है कि किसे आगे बढ़ाया जाए- हिंदुत्व या विकास। भाजपा में पार्टी के भीतर इस पर गंभीर बहस चल रही है और यह तय नहीं हो पा रहा है कि लोकसभा चुनाव में क्या नारे दिए जाएं। पार्टी इस गुत्थी को सुलझाने में लगी है। खास करके, विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद है ज्यादा कठिन हो गई है।  मोदी की छवि थोड़ी धुंधली होने लगी है।राजनीतिक विश्लेषकों ने फतवा दिया कि सरकार हिंदुत्व के एजेंडा को लागू करने में लगी है और विकास को नजरअंदाज कर रही है। हाल के चुनावों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि हिंदुत्व कार्ड की एक सीमा है। मध्य प्रदेश ,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हिंदुओं की बहुत बड़ी आबादी है लेकिन भाजपा और संघ ने जो हिंदुत्व का नारा दिया वह लगता है काम नहीं कर पाया। इस पराजय से सबक लेकर मोदी सरकार अपना रुख बदलने की कोशिश में है और एक बार फिर वह विकास का मसला सामने पेश कर उसे आगे बढ़ाएगी।

Thursday, January 10, 2019

गरीबों के लिए क्या है हुजूर ?

गरीबों के लिए क्या है हुजूर ?

इन दिनों सोशल मीडिया में मोदी जी के कुछ चित्र और कुछ टेंपलेट्स वायरल हो रहे हैं। उनमें मोदी जी को विश्व नेताओं के साथ दिखाया गया है । ब्रिटेन में एक सम्मेलन में उन्हें अध्यक्षता करते हुए दिखाया गया है। टेंपलेट्स में यह बताया गया है कि मोदी जी ने विजय माल्या को धर दबोचा, पाकिस्तान की कमर तोड़ दी ,चीन का घमंड चकनाचूर कर दिया वगैरह। लेकिन यह कहीं नहीं दिखता है कि भारतीय गरीबों के लिए उन्होंने क्या किया? उनके लिए क्या समाधान है उनके पास? लोगों में राय है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा आर्थिक मसलों के कारण हार गई । उन आर्थिक मसलों में किसानों का असंतोष और बेरोजगारी महत्वपूर्ण थे । बेशक यह महत्वपूर्ण है । क्योंकि देश के नौजवानों को अगर नौकरी मिल जाए तो खेती पर से दबाव हट जाए और  थोड़ी सी राहत सबको मिले हमारे ।देश में नौकरी के दो ही संगठित क्षेत्र हैं। दफ्तर और मिल - कारखाने। मिल -कारखानों में तो नौकरी मिलने से रही । वह धीरे- धीरे बंद हो रहे हैं । जैसे कलकत्ता की जूट मिलें लगभग बंद होने की कगार पर हैं और उन में काम करने वाले सैकड़ों या कहें हजारों मजदूर सड़कों पर आ गए हैं। उनमें से कुछ तो भीख मांग कर काम चला रहे हैं और कुछ अपने गांव लौट गए हैं। इससे खेतों पर दबाव बढ़ गया है। जहां तक ऑफिसों का सवाल है वहां तो अंग्रेजी बोलने वालों का राज है। जो हिंदी बोलता है उसे चपरासी तक की नौकरी नहीं मिलती। अंग्रेजी बोलना इस समय श्रेष्ठता की पहचान है और लोग अंग्रेजी बोल कर चाहे वह 90% गलत ही क्यों न हो अपना वर्चस्व प्रदर्शित करते हैं। रोजगार या नौकरी की तलाश में गांव छोड़कर शहर जाने वाला ही यह महसूस कर सकता है कि वहां जीवन कितना कठिन है। गांव छोड़कर शहर आने वाले लोगों में अधिकतर कम पढ़े लिखे या फिर अनपढ़ होते हैं। उन्हें केवल मजदूरी का काम मिलता  है। इसमें भी अच्छी मजदूरी वाला काम  जैसे राजमिस्त्री, फिटर, इलेक्ट्रिशियन इत्यादि का काम हुनरमंद या अनुभवी लोग ले जाते हैं। केवल मामूली तनख्वाह पर  सीमेंट -बालू ढोने वाले काम ही मिलते हैं या फिर दरबान इत्यादि का काम मिलता है। पेट की आग बुझाने के लिए पुरुष इन कामों को पकड़ लेते हैं और उनके साथ गई महिलाएं घरों में चौका- बर्तन करने लगती हैं। कई पुरुष एक कमरे में रह लेते हैं। बस का भाड़ा नहीं दे पाने या खर्च बचाने की गरज से पैदल काम पर जाते हैं । गांव में उनकी राह देख रहे परिवार को पैसे भेजने के लिए अपने ऊपर कम से कम खर्च करते हैं और कुपोषण का शिकार होकर बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं । किसी भी पुराने औद्योगिक शहर से अगर आप बाहर की तरफ यात्रा करें तो टीन और एस्बेस्टस की झुग्गियों वाले मकान कतार में दिख जाएंगे और उनमें जीवन जीने वाले लोग हमारे आपके बीच के ही हैं।  उनकी जिंदगी इतनी कठोर और दर्दनाक है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। कर्ज लेकर गांव की गिरवी जमीन छुड़ाने और फिर कर्ज लेकर शहर में झुग्गी खरीदने की किस्तों में जिंदगी तमाम हो जाती है । बहुत कम भाग्यशाली लोग होते हैं जो अपना पेट काटकर अपने बच्चों को शिक्षित कर हुनर मंद बनाकर थोड़ा ऊंचा रोजगार हासिल करने लायक बनाते हैं। क्योंकि वे बच्चे किसी एलीट स्कूल में नहीं पढ़े इसलिए अंग्रेजी नहीं बोल सकते और इससे उन में निराशा भरने लगती है। वे अक्सर अपने मालिकों की दया पर निर्भर करते हैं। उन्हें कोई सुरक्षा हासिल नहीं है। सरकार ने जो न्यूनतम वेतन तय किया है वह तो हमेशा सपना ही रहता है। उनका जीवन एक तरह  से बदहाल  और प्राय छोटा होता है। इसलिए सब सरकारी नौकरियों की ओर देखते हैं। लेकिन सरकारी नौकरियां कहां मिलती हैं। जिसको मिलती है वह खुशकिस्मत है जिसे नहीं मिलती वह अपने को कोसता हुआ निराशा में जीवन जीता रहता है ।
सोचा था उनके देश में महंगी है जिंदगी
पर जिंदगी का भाव वहां और भी खराब है
भारत संविधान के मुताबिक एक कल्याणकारी राज्य है लेकिन इन दिनों सरकार अनुबंध पर काम लेने लगी है। वह अनुबंध पर कर्मचारियों को रख लेती है और वर्षों तक वे कर्मचारी अस्थाई बने रहते है। उन्हें अपने साथ काम करने वाले स्थाई कर्मचारियों को देख कर भारी निराशा होती है यह कड़वी सच्चाई है।
जिंदगानी का कोई मकसद नहीं है 
एक भी कद आज आदम कद नहीं है
हमारे लोकतंत्र की यह विडंबना है और नेताओं ने इस मनोविज्ञान को समझ लिया है। वह इस हालात को बदलने का वादा करते हैं उस वादे के चक्कर में फंसकर आदमी उस नेता को वोट देता है । परंतु होता है ऐसा कहां ? अगर कभी मौका मिला भी नौकरियों में आरक्षण है। खास करके जाति के आधार पर या फिर उस आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन होता है। लोग उसमें शामिल होते हैं इस उम्मीद में कुछ तो बदल जाएगा । लेकिन कुछ नहीं होता। कोई पार्टी कर्जे माफ करने की बात करती है और वोट बटोर कर ले जाती है। खेती फायदेमंद रह नहीं गई और जो फसल हुई है उसकी  अच्छी कीमत की कोई गारंटी नहीं है।  नौजवान नौकरियों के लिए संघर्ष करते रहते हैं यह संघर्ष भीतर और बाहर दोनों तरफ चलता है । यह एक तरह का शहर के भीतर शहर है। शहर के बाहर वाला शहर तो सपनों का संसार है । शहर के भीतर वाले शहर में जाकर हमारे नौजवान क्या कर सकते हैं?
रोटी कितनी महंगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये कीमत चुकाई है
सामूहिक पहचान जीवन को ज्यादा मानीखेज बनाती है। एक निरर्थक जीवन किसी तरह सार्थक दिखने लगता है और यही कारण है नौजवान राजनीति की दुनिया है दाखिल होते हैं। वे यह नहीं समझ पाते यह राजनीतिज्ञ  मवेशियों के उन व्यापारियों की तरह हैं जो मवेशियों की टोह  में लगे रहते हैं। क्योंकि इसे धार्मिक मंजूरी मिली हुई है और जिन मवेशियों को पकड़ा है उससे पैसे भी बनते हैं। सुविधा भी पैदा होती है तथा उसे पीटकर मन का भड़ास निकालने का सुकून मिलता है।  राजनीति में हमारे नौजवानों के साथ यही होता है। लेकिन उन्हें मिलता क्या है। फकत एक पहचान।  एक झंडे के नीचे खड़े रहने का सामूहिक सुख इसके अलावा यह राजनीतिज्ञ हमारे नौजवानों को क्या दे पाते हैं । नौजवान इसे नहीं समझते। दुख उठाकर ,गले फाड़ कर, काम छोड़ कर झंडा लिए पीछे -पीछे घूमते हैं।राजनीतिज्ञ उन्हें जोड़े रखते हैं क्योंकि उनके बल पर वोट हासिल किया जा सकता है, लोगों को धमकाया जा सकता है और बड़े-बड़े जुलूस निकाले जा सकते हैं। यह स्थिति एक तरह से दर्द निवारक दवा का काम करती है स्थाई उपचार नहीं करती। इससे समाज  धीरे-धीरे निराशा से भरता जाएगा और राजनीतिज्ञों की ताकत बढ़ती जाएगी। चाहे वह राफेल की तू तू मैं मैं हो या 56 इंच का सीना दिखा कर विदेशों में फोटो खिंचवाने का प्रचार हो लेकिन आम जनता को ,भारत के करोड़ों गरीब  लोगों को क्या मिलता है?
आंख पर पट्टी रहे अक्ल पर ताला रहे 
अपने शाहे वक्त का यूं ही मर्तबा आला रहे

यहां तक कि पीने का अच्छा पानी नहीं मिल पाता है हवा जहर भरी हुई है खाने को अन्न नहीं है। क्या एक ऐसे ही देश की कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी।
एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छह चमचे रहें माइक  रहे माला रहे