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Tuesday, February 20, 2018

मोहन भागवत जी स्पष्ट करें ?

मोहन भागवत जी स्पष्ट करें ?

अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है कि सोशल मीडिया पर एक लहूलुहान फौजी की तस्वीर आती थी और लोगों से अपील की जाती थी इसे लाइक करें और सलाम करें। लोग भावुक होकर ऐसा करते थे। इस तरह की तस्वीरें बनाने और लगाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  या मोदी जी के कीर्तन ब्रिगेड के लोग थे। इसका उद्देश्य था राष्ट्रीय भावुकता  के हथियार से देशवासियों का ध्यान राष्ट्रीय समस्याओं से हटाना। वह समय था नोटबंदी से उपजे गुस्से का। 
   अचानक एक एक दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत जी का बयान आता है कि संघ 3 दिन में फौज खड़ी कर सकता है जबकि भारतीय सेना को ऐसा करने में 6 महीने लगते हैं। यह  एक संयोग ही है कि बयान ठीक उस दिन आया जिस दिन जम्मू के शुंजवान में आतंकी हमलों के बाद भारतीय सेना के जवान अपने मृत  साथियों की लाशें गिन रहे थे  और आसपास छिपे आतंकियों को ढूंढने का जोखम से दो- दो रहे थे। ऐसे वक्त में संघ प्रमुख का यह संवेदनहीन बयान   सीमा के रक्षकों  और देश की प्रभुसत्ता को सुरक्षित रखने वाली संस्था को नीचा दिखा रहा है। आखिर मोहन भागवत जी ने ऐसा क्यों कहा? उनसे  स्पष्टीकरण मांगा जाना चाहिए।
    यह सब जानते हैं कि संघ का दर्शन उसे एक विघटनकारी ताकत बनाता है । उसका नजरिया "हम " और "वह" वाला है। यह जानकर हैरत हो रही है कि सेना अभी उनके "हम" में शामिल नहीं है। बेशक मोहन भागवत जी बहुत बड़े नेता हैं और देश की एक बहुत बड़ी आबादी बड़े ध्यान से उनको सुनती है, उनका बहुत ज्यादा सम्मान करती है। लेकिन अब लगता है कि मोहन भागवत जी को कुछ फौजी प्रशिक्षण केंद्र में भेजा जाना चाहिए ताकि वे समझ सकें कि  एक सैनिक को तैयार करने में कितनी मेहनत और कितना समय लगता है। हालांकि उन्होंने कहा था कि हमारी हमारा संगठन सैनिक या अर्धसैनिक बल नहीं है। यहां यह बताना जरूरी है की फकत 4:00 बजे सुबह उठकर लाठी भांजना और खाकी निकर  पहनकर शाखा में शामिल होना किसी भी तरह की फौजी ट्रेनिंग नहीं है। ऐसे लोग 3 दिन में इतने प्रशिक्षित नहीं किए जा सकते कि शून्य से कई डिग्री नीचे सियाचिन में 2 मिनट भी खड़े रह सकें या 3 दिन में हठात तापमान 50 डिग्री सेल्सियस जहां पहुंचता है वहां खड़े होकर देश की हिफाजत कर सकें। अब यहां प्रश्न उठता है कि आदरणीय मोहन भागवत जी, जो यकीनन सच्चाई को जानते होंगे , ने ऐसा क्यों कहा?
       शायद इसलिए कि हथियार लेकर सड़कों पर बेहिचक घूमने वाले नौजवानों और एक फौजी में वे  फर्क नहीं देख पाते हैं। एक  दयनीय हालत है। भारत जैसे बहुसंस्कृति वाले देश के लिए बेशक मोहन भागवत जी का यह बयान चिंताजनक है।  यहां यह कहा जा सकता है कि क्या संघ ने ब्रिगेड तैयार किए हैं जो युद्ध के लिए प्रशिक्षित हों या फिर उनका यह बयान यह भी बताता है संघ सांस्कृतिक संगठन नहीं निजी सेना है। जिस आत्मविश्वास से मोहन भागवत जी बोल रहे थे , जो उनका बॉडी लैंग्वेज था उसे देख कर पूछा जा सकता  है कि क्या सचमुच संघ में  फौजी ट्रेनिंग दी जा रही है?  आज के युग में संगठित हिंसा सिर्फ सरकार कर सकती है और वह भी बहुत सोच समझकर या बहुत जरूरी होने पर। मोहन भागवत जी का इस तरह से कहना तो बहुत बड़ी विपत्ति का संकेत है। क्योंकि, किसी भी तरह की संगठित हिंसा जो पहले संकेत रूप  में ही रहती  है आगे चलकर पहचान और आदर्श या सिद्धांत के बड़े युद्ध में बदल सकती है।  ऐसे कामों में इस्तेमाल करने के लिए नौजवान उस संगठन के पास उपलब्ध होते हैं। नक्सलियों और बिहार की रणवीर सेना का उदाहरण देश के सामने है। अगर इस तरह के संगठन को पर्दे के पीछे से सत्ता का समर्थन मिलता रहे तो बेरोजगारी  और कुंठा से  भरे नौजवान समाज के लिए और खतरनाक हो सकते हैं । यही कारण है कि सरकार की तरफ से मोहन भागवत जी के बयान पर लीपापोती शुरू हो गई। गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने ट्वीट किया "भारतीय सेना हमारा गौरव है और हर भारतीय को इसका समर्थन करना चाहिए।"
     मोहन भागवत जी के इस बयान के परिप्रेक्ष्य  में विजयादशमी और रामनवमी को हथियार लेकर जुलूस निकालने वाले अनुशासनहीन नौजवानों की करतूतों को याद करें। राष्ट्र के बहुलतावादी समाज की मान्यताओं तथा परंपराओं  को ताक  पर रखकर  वे समाज पर नियंत्रण करना चाहते हैं। भागवत जी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनकी बात का अर्थ क्या है? कितने लोग इस तरह की ट्रेनिंग पा चुके हैं और कितनों को इस तरह की ट्रेनिंग दी जा रही है? भागवत जी को ़यह भी बताना चाहिए कि वह कौन सी जरूरत पड़ गई है कि भारत को संघ की सेना की आवश्यकता हो गई है या फिर संघ किसके खिलाफ युद्ध के लिए तैयार हो रहा है? क्या संघ का फौज पर से विश्वास उठ गया है या उसके पास इतनी ताकत हो गई है कि फौज पर काबू पा सकते हैं ?मोहन भागवत जी से राष्ट्र इन सवालों के जवाब चाहता  है, क्योंकि इन सवालों के समानांतर हमारी फौज की क्षमता पर कायम सवाल  भी है।

Monday, February 19, 2018

ये हंसने वाली तीन महिलाएं

ये हंसने वाली तीन महिलाएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ना केवल अक्रामक बोलते हैं बल्कि कोई उसमें टोका टाकी करता है  या फब्ती कसता है तो उसकी खिल्ली उड़ाने में भी सिद्धहस्त हैं। लेकिन पिछले हफ्ते जो लोकसभा में हुआ वह एक चिढ़े हुये आदमी की बात थी जिसने चिढ़ाने वाली  महिला की बोलती बंद करानें की कोशिश की। मोदी जी ने उस हंसने वाली महिला को रामायण सीरीयल की शूर्पनखा से परोक्षल तुलना कर दी। उनकी इस बात से सत्ता पक्ष में ठहके लगने लगे और सदस्यों ने मेजें थपथपा कर हर्ष जाहिर किया। इसके बाद , गृह राज्य मंत्री किरण ​रिजिजू की वीडियो क्लिप ने इस मामले में रही सही कमी पूरी कर दी। उन्होंने सदन की सदस्य श्रीमती रेणुका चौधरी की हंसी की पृष्ठभूमि में उसी टी वी सिरीयल की शूर्पनखा की हंसी की वीडियो क्लिप वायरल कर प्रधानमंत्री के " मंतव्य " को स्पष्ट कर दिया। इस टिप्पणी के बारे में जो भी कहा जाय पर इसका मनोविज्ञान कुछ लगता है जैसे एक भड़का हुया आदमी हंसने वाली एक महिला को सबक सिखाना चाहता हो। आखिर विपक्ष और सदस्य  तो आपत्ति कर रहे थे और अध्यक्ष से गुजारिश कर रहे थे कि उन्हें व्यव​स्थित करें लेकिन प्रधानमंत्री अड़े हुये थे उस महिला की बोलती बंद कराने में। मनोविज्ञान की शब्दावलि में इसे एक आत्मविश्वाी महिला की हंसी से नारीद्वेषी आतंक कहा जा सकता है। पितृसत्तात्मक समाज में नारीद्वेष एक स्वाभाविक मनोस्थिति है जो केवल पुरूषों तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि समाज की महिलाओं में व्याप जाती है। इसीलिये भाजपा की महिला सदस्य भ​ी मोदी जी की टिप्पणी पर हंस रहीं थीं। पौराणिक कथाएं सांस्कृतिक स्मृतियों का भंडार होती हैं और सामाजिक प्रवृतियों एवं आचणों को विशिष्ट रूप से प्रभावित करती हैं। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि पौराणिक कथाएं और आख्यान सच से भी अधिक हुआ करते हैं। ये कथाएं और आख्यान नारीद्वेष के विरुद्ध संघर्ष में एक महत्च्पूर्ण मैदान तैयार करते हैं। इन्हें इनके समस्त गूढ़ार्थों सहित समझने की जरूरत है और  इसकी संवेदनशील व्याख्या की आवश्यकता है। शूर्पनखा हकीकत से कुछ ज्यादा ही आवरण में आवृत है। कुछ लोगों के लिये वह सीमा को लांघने  वाली महिला है और उस पर हमला एक तरह से उसे दंडित करने की प्रक्रिया है।स्मरण होगा कि राजस्थान की करणी सेना ने भी धमकी दी थी कि पद्मावती की भूमिका करने वाली की नाक काट लेंगे। इस धमकी में कहीं निर्देशक या नायक या यहां तक कि खिलजी का अभिनय करने वाले को ऐसी धमकी नहीं दी गयी। चाहे वह परदे में ही कही गयी हो पर सदन शूर्पनखा  के संदर्भ में मानसिक धरातल पर विचार करें तो हैरत होगी। 

   अब इस संदर्भ में द्रौपदी की हंसी पर विचार करें। क्या सचमुच द्रौपदी दुर्योधन पर इस लिये हंसी थी कि वह अंधे राजा की औलाद था? अगर ऐसा है तो द्रौपदी एक निष्ठुर महिला के रूप में दिखायी पड़ती है। अगर आप महाभारत का प्रणयन करें तो पायेंगे कि महर्षि व्यास ने "सभा पर्व " में दो परिच्छेदों में इस घटना का वर्णन किया है खैर उसमें दुर्योधन पर हंसनेवालों में भीम , अर्जुन , नकुल और सहदेव हैं, उनके सेवक हैं ना कि युधिष्ठिर और द्रौपदी। लेकिन दुर्योधन अपने पिता से इस घटना का वर्णन करता है तो बात बदल गयी होती है क्याोंकि इसके पहले वह मामा शकुनी से परामर्श कर चुका होता है। अतएव द्रौपदी की हंसी की बात " राजा को दी गयी एक गलत रिपोंर्ट है। "  इस रिपोर्ट का उद्देश्य राजा को भड़काना है। यह आख्यान भी यही बताता है कि एक अहंकारी आदमी अगवानी में खड़े लोगों से अपमानित महसूस करता है ना कि किसी महिला की हंसी से।  सच्चाई अगर धोखे में बिंधी हो तो सच्चाई नहीं कही जा सकती। 

Sunday, February 18, 2018

कांग्रेस को मिला झुनझुना

कांग्रेस को मिला झुनझुना

मुंबई की पंजाब नेशनल बैंक की एक शाखा से 11,308  करोड़ रुपयों की धोखाधड़ी ने देश को सकते में डाल दिया है। यह देश की अब तक की सबसे बड़ी बैंक धोखाधड़ी है । साथ ही  यह बताती है कि हीरा उद्योग में कितनी बड़ी गड़बड़ी चल रही है। जबकि, भारत विश्व हीरा उद्योग का एक छोटा सा हिस्सा है । यह बड़ा अजीब लगता है कि भारत में हीरे पर जो टैक्स लगाया जाता है वह पॉलिश किए हुए हीरे पर होता है और कारोबार पर होता है न कि मुनाफे पर । अब ये शातिर व्यापारी   निर्यात को बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं  और इससे जो लाभ होता है वह दूसरे उद्योगों या कारोबार   में डाल देते हैं ।  खासकर रियल स्टेट में यह रुपया चला जाता है, हीरा व्यापार में रहता नहीं है कि कारोबार में दिखे। 

  यू पी ए -2 सरकार ने 2011 में इस पर नकेल कसने की कोशिश की थी।  शातिर भारतीय हीरा व्यापारियों ने उस वर्ष   28. 22 अरब डॉलर का दिखाया था जबकि दुनिया भर में 2010 में हीरो का कारोबार 18.2 अरब डॉलर था । सरकार ने 2011 में इस पर 2% छूट की योजना लागू कर दी । नतीजा हुआ इससे ड्यूटी प्रभावित हुई और हीरा का कारोबार खासकर के निर्यात कारोबार गिरने लगा। यह 20 अरब डालर से घटकर 5.8 अरब डॉलर हो गया।    

  इस तरह के कारोबार  में निर्यात के नाम पर लाभ की राउंड ट्रिपिंग होती है। यहां राउंड ट्रिपिंग को समझना थोड़ा जरूरी है । यह विदेशों में कमाया धन होता है और भारतीय कंपनियों में और भारतीय कारोबार में लगाए जाने के नाम पर विदेश से आता है । पंजाब नेशनल बैंक  वाले मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा। अभी यह तो जांच का विषय है । यह मसला पिछले 5 वर्षों से चल रहा था और अब जाकर फूटा है । इस घोटाले को देख कर लगता है भारतीय बैंकिंग प्रणाली में जो सड़न  वर्षो से कायम थी वह अभी भी कायम है और बड़े लोग इसका लाभ उठा रहे हैं। विजय माल्या का मामला अभी लोगों के मन में ताजा ही था  कि पंजाब नेशनल बैंक  का यह भांडा फूट गया। यह सोचने वाली बात है कि देश में होने वाले जितने भी बैंक घोटाले हैं उनका 83 प्रतिशत सरकारी बैंकों में है होता है।  सरकार इस पर नकेल कसने के लिए कुछ नहीं कर पाती है । गरीब करदाताओं का पैसा इसी तरह लुटता रहता है। जब बैंक घाटे में आते हैं तुम के लिए अलग से कोष  बनाए जाते हैं । आज के  इन बैंक घोटालेबाजों ने हर्षद मेहता से सबक सीखी है। लगभग 20 वर्ष पहले हर्षद मेहता ने  इसी तरह का घोटाला किया था लेकिन पकड़ा गया क्योंकि वह देश में ही था, जबकि विजय माल्या जैसे घोटालेबाज हाल के पंजाब नेशनल बैंक मामले का हीरो नीरव मोदी विदेश में आराम कर रहे हैं और सरकार की पकड़ से बाहर है।     

     यह जो घोटाला हुआ है उसे देखकर यह प्रबल संभावना है कि  पंजाब नेशनल बैंक  की अन्य शाखाओं में  भी कुछ हुआ होगा जिसकी अभी खबर आनी बाकी है सरकार ने सभी बैंकों से कहा है इस मामले से संबंधित रिपोर्ट इस हफ्ते के अंत तक भेजें। इसका मतलब है कि कहीं ना कहीं सड़ांध की दुर्गंध आ रही है। बैंक अधिकारियों  की मिलीभगत से कारोबारी इस तरह के घोटाले बड़े आराम से कर सकते हैं। यह लघु अवधि के क्रेडिट के नाम पर पहला कदम आगे बढ़ाते हैं जैसे  नीरव मोदी ने शुरू किया। मोदी ने  लेटर ऑफ अंडरटेकिंग के आधार पर यह शुरू किया। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग किसी भी अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय बैंक द्वारा जारी किया जा सकता है। इस लेटर के आधार पर बैंक 90 से 120 दिन के लिए कंपनियों को कर्ज देता है और यह रुपया कंपनियां दुनिया के किसी भाग से निकाल सकती हैं। इस तरह के धंधे आमतौर पर निर्यात  आधारित कंपनियां करती हैं। लेटर ऑफ अंडरटेकिंग स्थानीय बैंक द्वारा लेटर ऑफ कंफर्ट के आधार पर जारी होता है। यह लेटर ऑफ कंफर्ट स्थानीय बैंक देते हैं। 2001 में केतन पारेख ने माधवपुरा मर्केंटाइल को ऑपरेटिव  बैंक से इंटर बैंक क्रेडिट ऑर्डर लिया था और इसे मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के बैंक ऑफ इंडिया शाखा भुना लिया था। सीबीआई की एफ आई आर के अनुसार नीरव मोदी के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। क्योंकि, मोदी को जिन कंपनियों को लेटर ऑफ अंडरटेकिंग दिया गया था उन कंपनियों के खाते खाली हैं। इस मामले में जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य दिखाई पड़ रहा है वह है समय का।  लेटर ऑफ अंडरटेकिंग के जरिए जारी कर्ज  लघु अवधि के लिए होता है लेकिन पंजाब नेशनल बैंक के अधिकारी नहीं बता पा रहे हैं या फिर उन्होंने एक अज्ञात अवधि तक इस मामले को क्यों लटका कर रखा था। यही नहीं   नीरव मोदी ने लघु अवधि के इंटरबैंक इतने चैनल्स कैसे खोले हैं। 

 दरअसल आम आदमी इस तरह के घोटालों ताने बाने को समझता नहीं है। केवल सुनी सुनाई बात पर निर्णय करता है और उसी पर कहानी आगे बढ़ती है । अब यह मसला मोदी सरकार के लिए भी वैसा ही हो सकता है। चुनाव सिर पर हैं और नीरव मोदी के इस मामले को कांग्रेस बखूबी भुना सकती है। इस घोटाले का राजनीतिक प्रभाव पता नहीं क्या होगा। लेकिन भारत जैसे देश में जहां सुनी सुनाई बातों पर 2जी घोटाले में अदालतें फैसले दे सकती हैं और लोगों को जेल भेजा जा सकता है वहां इतना बड़ा घोटाला क्या राजनीतिक रंग लाएगा यह तो आने वाला समय बताएगा।

Friday, February 16, 2018

नोटबंदी के बाद अब वोटबंदी की तैयारी

नोटबंदी के बाद अब वोटबंदी की तैयारी
अब से 68 साल पहले 26 जनवरी 1950 को बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था कि "हम अब आज से एक व्यक्ति एक वोट और एक वोट की एक कीमत के नए अध्याय में प्रवेश कर रहे हैं । " इस वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हमारे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा "हमारा गणतंत्र अपने लोगों से बना है। नागरिक सिर्फ एक गणराज्य को ही नहीं बनाते बल्कि उसके अंतिम हितधारक और खंभे हैं। " लेकिन, इसके विपरीत प्रधानमंत्री जी ने लोक सभा और विधानसभा चुनाव एक साथ  कराने को लेकर एक राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।  एक साथ चुनाव का मतलब लोगों को मताधिकार से वंचित रखना। मताधिकार लोकतंत्र का सबसे बड़ा मूल्य है । आखिर क्या कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ करा कर लोगों को अलग अलग समय पर होने वाले चुनाव से वंचित करना चाहते हैं ? 
आप भारत देश के निवासी हैं । आपने कई चुनाव देखे होंगे। चुनाव खुद में एक बेहद सशक्त  अनुभव है। लोग मतदान प्रक्रिया में भाग लेते हैं और जहां तक मालूम है भाग लेने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती । इसके बाद उनके अंदर एक एहसास पैदा होता  है कि वह 1 वोट से सरकार बना देते हैं या गिरा देते हैं। रोमन ऐतिहासिक कथाओं की तरह एक मामूली डेविड ताकतवर गोलीयथ को पराजित कर देता है । शायद यही कारण है कि मतदान के आसपास सबसे गरीब आदमी सबसे ज्यादा खुश दिखता है और सरकार को एक तरह से चेतावनी देता रहता है । यहां उन लोगों की बात नहीं की जा रही है जो मतदान प्रक्रिया में शामिल ही नहीं होते। कभी मतदान के बाद उंगली पर लगी स्याही के निशान दिखाते हुए लोगों के चेहरे देखने का मौका मिला होगा। उन्हें महसूस होता होगा कि जैसे लोग एक युद्ध जीत गए । इतनी खुशी जाहिर करते हैं लोग।
  अब हमारे प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि बार-बार मतदान कराने से सरकारी खजाने का नुकसान होता है और सक्षम अधिकारियों का दुरुपयोग होता है तथा शिक्षक इत्यादि जो इसमें नियुक्त किए जाते हैं उनका समय बर्बाद होता है। सही नहीं है। मौलिक अधिकारों के पालन- संरक्षण के लिए सार्वजनिक खर्च कोई दलील नहीं है। जिन्होंने राजनीतिक इतिहास पढ़ा होगा वे जानते होंगे इंदिरा गांधी को अपनी मनमानी का परिणाम केंद्र में ही नहीं राज्यों में भी भुगतना पड़ा था। 1970 में कांग्रेस की सरकार उत्तर प्रदेश और बिहार में बुरी तरह पराजित हो गई थी। इसका मतलब यह है इमरजेंसी के विपरीत लोगों ने इंदिरा जी को राज्यों में भी पराजित  करने के लिए लंबा इंतजार नहीं किया। मौजूदा समय में गुजरात , दिल्ली और बिहार विधानसभा के चुनाव इसके उदाहरण हैं। 2014 के चुनाव में भाजपा ने इन राज्यों में भारी विजय हासिल की थी। लेकिन दो ही वर्ष में इसी जनता ने इन राज्यों में उन्हें सबक सिखा दिया। गुजरात में बीजेपी हारते- हारते बची ।गुजरात में जहां 2014 में भाजपा ने सारी 26 सीटें जीती थी उसी राज्य में  3 वर्षों में उसके कई कट्टर समर्थक  खिलाफ हो गये। राज्यसभा में अभी भी भाजपा का बहुमत नहीं है। लोकसभा  चुनाव और विधानसभा चुनाव का अलग-अलग समय पर होना राज्यसभा को एक पृथक पहचान देता है । जो लोकसभा से अलग भी हो सकता है। दोनों सदनों में एक ही पार्टी का अंकुश रखना लोकतंत्र के लिए हानिकारक होता है । केंद्र और राज्यों में एक साथ मतदान कराने से दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकार बनने की प्रबल संभावना रहती है। खासकर 2014 जैसे लहर में। अगर लोकसभा और राज्यसभा एक ही पक्ष  वर्चस्व में आता है तो मनमानी तरीके से कानून को बदला जा सकता है। संविधान के बुनियादी ढांचे में बदलाव जैसे खतरनाक कदम भी उठाए जा सकते हैं। खासकर ऐसे मौके पर जब भाजपा के सांसद ताल ठोक कर कहते हैं कि संविधान बदलने के लिए ही पार्टी सत्ता में आई है। ऐसे में मतदाताओं को बार-बार अवसर नहीं मिलते तो उनके मौलिक मतदान अधिकार का हनन होता है।  अलग-अलग चुनाव के मामले में  हर चुनाव के साथ लोकतंत्र मजबूत और मतदाता ज्यादा समझदार खुद होता जाता है। उसे किसी नेता को उसकी गलती सजा देने के लिए 5 साल तक इंतजार करने की जरूरत नहीं रहती। जनता अपने मताधिकार का राज्य चुनाव में प्रयोग कर केंद्र के प्रति गुस्से का इजहार कर सकती है। मोदी जी ने गत वर्ष नोटबंदी कर दिया था। अब "एक देश एक बार मतदान " की व्यवस्था कर जनता के हक को 5 साल तक छीन लेने की साजिश की जा रही है। धन और समय की बचत के आड़ में इसे पेश करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लागू होने से लाखों-करोड़ों लोगों की हक प्रभावित होगा और यह एक तरह से लोकतंत्र पर आघात होगा। लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाले लोग इसके बारे में ठीक से सोचें।

Thursday, February 15, 2018

पाकिस्तान की जमकर ठुकाई की जरूरत

पाकिस्तान की जमकर ठुकाई की जरूरत

जम्मू के शुंजवान में पाकिस्तान के जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने सोमवार को भारतीय सेना के एक केंद्र और उनके पारिवारिक आवासों पर हमला कर 5 सैनिकों को मौत के घाट के उतार दिया और एक असैनिक को भी मार डाला। इस हमले पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि" इसका मुंहतोड़ उत्तर दिया जाएगा।" लेकिन क्या ऐसा होगा?
    नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जवाबी फायरिंग के बावजूद पाकिस्तान की गोलीबारी और मोर्टार  से गोले दागना यहां तक कि एंटी टैंक मिसाइल से फायर करने की कार्रवाई नहीं बंद हुई है। वह लगातार भारतीय सेना के शिविरों पर तथा उनके  आवासों पर गोलीबारी करने में  लगा  है साथ ही  जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों को भारत में घुसाने की कार्रवाई भी धीमी नहीं की है। पहले तो यह सब घाटी में हुआ करता था अब जम्मू में भी हो रहा है। अब जम्मू में भी भारतीय फौजी शिविर और उनके परिजन सुरक्षित नहीं हैं। भारत ने 29 सितंबर 2016 को पाकिस्तानी आतंकी शिविरों पर सर्जिकल स्ट्राइक किया था। लेकिन उसके बाद से ही पाकिस्तानी सेना ने  युद्ध विराम का लगातार उल्लंघन करना शुरू कर दिया। भारतीय स्पेशल फोर्स द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक किए जाने पर पाकिस्तान की दुनिया भर में जो किरकिरी हुई उसको उसे देखते हुए पाकिस्तानी जनरलों ने दोहरी रणनीति अपनानी शुरू कर दी है। पाकिस्तानी सेना और रेजंर्स ने नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी बढ़ा दी है। साथ ही उसने लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों को कश्मीर घाटी में घुसाने की प्रक्रिया भी तेज कर दी है। भारतीय सेना, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और जम्मू -कश्मीर पुलिस लगातार आतंकियों को मार रही है। पाकिस्तान के लिए ये मरे हुए आतंकी सस्ते माल हैं। आतंकियों के परिजनों को थोड़ा सा मुआवजा दे दिया जाता है और जमीन दे दी जाती है बस वे खुश हो जाते हैं। साथ में इस की देखादेखी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में नए लड़के भी मिल जाते हैं। उन्हें थोड़ी बहुत ट्रेनिंग देकर भारत में भेज दिया जाता है, तयशुदा टार्गेटस पर हमला करने के लिए। पाकिस्तान का आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्र दुनिया में सबसे बड़ा है और बड़े आराम से काम करता है। आतंकियों को मारे जाने से पाकिस्तान को कोई फर्क नहीं पड़ता बशर्ते पाकिस्तानी सेना ,रेंजर्स और बॉर्डर एक्शन टीम के लोग नहीं मारे जाते हैं। ये काफी बर्बर हैं।  ये भारतीय फौजियों को मारते हैं तो उनके सिर काट लेते हैं ,उनके शव को तहस नहस कर देते हैं । यही कारण है सर्जिकल स्ट्राइक से पाकिस्तान को बहुत आघात लगा। क्योंकि जिस शिविर पर हमला किया गया उसमे पाकिस्तानी सेना के जवान बड़े मजे में सो रहे थे। उस समय कुछ लोगों ने कहा था कि सर्जिकल स्ट्राइक गलत हुआ है ?  लेकिन वह बिल्कुल सही हुआ था। इसके अलावा भी कुछ होना चाहिये था जो नहीं हुआ। होना चाहिए था कि ठीक  इस हमले के बाद  कायम अस्थायी शांति  का लाभ उठाते हुये भारत को वार्ता शुरू कर दी जानी चाहिए थी। यहां यह बता देना जरूरी है कि पठानकोट हमले के बाद यानी 2 जनवरी 2016 के बाद से दोनों देशों के बीच वार्ता का क्रम बंद हो गया था। उस समय वार्ता की शुरुआत होती तो दोनों देशों के शांतिप्रिय लोग इसका स्वागत करते। पाकिस्तान की सरकार भी इसमें शामिल होती है क्योंकि वह तो चाहती है कि बातचीत भी चलती रहे और आतंकवाद चलता भी चलता रहे।  भारत से बातचीत को पाकिस्तान सम्मान का मुलम्मा लगा देता और पाकिस्तान की सियासत तथा समाज पर  सेना का वर्चस्व कायम रहता दूसरी तरफ वह आतंकवाद के लिए बढ़ावा देती रहती।  रावलपिंडी में बैठे जनरल चाहते हैं कि भारत से बातचीत चलती रहे और अगर वार्ता भंग होती है तो आतंकवाद चलता रहेगा।  रुक रुक कर चलती हुई बातचीत पाकिस्तान को माफिक आती है। भारत के पास एक और  विकल्प था कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत पाकिस्तान के आतंकी शिविरों पर जबरदस्त हमला करता और अपनी ताकत को स्थापित कर देता। लेकिन भारत सरकार इस विकल्प को भी नहीं अपना सकी। इसका  नतीजा सही नहीं हो सका। क्योंकि , पाकिस्तान चाहता है हल्की-फुल्की लड़ाई और भारतीय  सैन्य शिविर पर हमले और उसके परिणाम स्वरुप कुछ सैनिकों की मौत उसके लिए आसान जंग है और तदर्थ जवाबी कार्रवाई कुछ ऐसी है जिसकी बात अक्सर हमारे गृह मंत्री करते हैं उनको अक्सर सुना जाता है कि "पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देंगे " ,लेकिन यह  बेअसर होता जा रहा है ।  घोषित युद्ध ना होते हुए भी युद्ध पिछले 18 महीनों चल रहा है। इसमें पाकिस्तानी गोलीबारी और आतंकी हमलों में भारत के 80 जवान शहीद हुए है। अघोषित युद्ध प्रति कार्रवाई नहीं है। पाकिस्तान पर दबाव बनाने और हिंसा रोकने के लिये दिल्ली में पूर्णरूपेण पाकिस्तानी हाई कमीशन एक तरह से आईएसआई के एजेंटों का अड्डा है और यह भारतीय राजनीतिज्ञों ,अफसरों ,पत्रकारों तथा अवकाशप्राप्त सेना अधिकारियों को और एन जी ओ के कार्यकर्ताओं को भ्रष्ट करते हैं या फिर विभिन्न तरीकों से उन्हें  विचलित करते हैं। यही नहीं पाकिस्तान के साथ तिजारत ही बंद कर देनी चाहिए और उसको दिया हुआ "मोस्ट फेवर्ड नेशन" का दर्जा रद्द कर दिया जाना चाहिए । एक ऐसा देश जो  आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और भारत जैसा देश उसे बर्दाश्त कर रहा है तब भी कोई इसे गंभीरता से नहीं ले रहा है।  सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ भी लगाई जाए जिसमें बिजली दौड़ती रहे  तथा सेना के शिविर के आसपास सेंसर लगाए जाएं।  कंटीले तारों की बाड़ तो पठानकोट हमले के बाद ही यानी 2 साल पहले लगाई जाने वाली थी पर अब जाकर कहीं रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषणा की है कि 1,487 करोड़ रुपयों की लागत से बाड़ लगायी जायेगी। इस अघोषित युद्ध में भारतीय सेना के कई जवान शहीद हुए हैं। भारत को भी चाहिए कि पाकिस्तानी सैनिकों के ठिकानों पर हमला कर उन्हें तहस-नहस कर दे। ध्यान रहे, भारत के पास भी परमाणु बम है और पाकिस्तान के पास तो यह मात्र छद्म है ,मात्र छद्म। कुल मिलाकर जवाबी कार्रवाई काम नहीं कर रही है, बातचीत हो नहीं रही है क्योंकि वह  इसके अलावा आतंकवाद को भी बढ़ावा देना चाहता है इसलिए सीमा पर कटीले तारों की बाड़, जिसमें हाई वोल्टेज करंट दौड़ता रहे या जम कर उसकी ठुकाई की जाय , इसके सिवा और कोई विकल्प नहीं है भारत के पास।