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Tuesday, June 27, 2017

मोदी- ट्रम्प की मुलाकात

मोदी – ट्रम्प की मुलाकात

पधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सोमावार को वाइट हाउस में मुलाकात हुई। ट्रम्प ने खुद को भारत का सच्चा दोस्त बताया आहैर कहा कि दानाहें में समरनीतिक भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है। वायदों और आश्वासनों के बड़े – बड़े वायदा- आश्वासनों के बल पर सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे दोनो नेताओं की वार्ता का मुख्य विषय संभवत: समझौता-सौदा था और मुलाकात के बाद घोषणा पत्र में आतंकवाद से जंग और उसके खात्मे को मुख्य विषय बनाया गया। घोषणा पत्र में आतंकियों को सूचीबद्ध किये जाने के लिये ‘नयी परामर्श तकनीक ’ स्वागत योय है और इसका लम्बे समय से इंताजार था। इस प्रस्ताव के क्रियान्वित होने के पूर्व और भी बहुत कुछ किये जाने की जरूरत है। पाकिस्तान से सम्बंधित तथ्य का जिस जगह जिक्र का जिस जगह जिक्र आया है वहां यह सही है कि अमरीका भारत की इस बात को मानता है कि पाकिसतान की और से कई बार भारत पर हमले हुये। वे हमले पाकिस्तानी आतंकी गिरोहों ने किये। दोनों नेताओं ने सहमति जाहिर की कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर राष्ट्रसंघ में विस्तृत सम्मेलन का आयोजन किया जाना चाहिये। ओबामा प्रशासन इस प्रस्ताव पर लगातार ना नुकुर करता रहा था। दोनों नेताओं ने कहा कि यह एक सशक्त संयुक्त घेषणा पत्र है जो भारत अमरीका सुरक्षा सहयोग का पाथ प्रशस्त करेगा। यह दोनों की पहली मुलाकात थी और इसमें संकेत मिले कि यह चालू रहेगा।  साथ ही अमरीका ने चीन के बॉर्डर बेल्ट रोड के प्रति भारत के रुख का अनुमोदन किया। वाइट हाउस के रोज गार्डन में चमकते सूरज की रोशनी में दोनों नेताऔ ने अमरीका वरिष्ठ अफसरों तथा पत्रकारों को सम्बोधित किया। पूरी वार्ता में दोनों ओर से एक दूसरे की प्रशंसा के पुल बांधे जा रहे थे। अमरीकी पक्ष ने पत्रकारों से सिफारिश की ​कि एक आदमी एक ही प्रश्न पूछेगा। पत्रकारों के सवाल के जवाब देने के प्रति मोदी जी की अनमयस्कता को देखते हुये उन्हें इस बात की​ ताकीद कर दी गयी कि प्रश्न केवल दानों नेताओं की वार्ता से ही सम्बंधित हों। ट्रम्प ने कहा कि ‘मैं भारत के लोगों का अभिवादन कर के रोमांचित महसूस करता हूं।’ लेकिन ट्रम्प अपनी आदत से बाज नहीं आये ओर उनहोंने विशेष तौर पर इस बात का जिक्र किया कि ‘दोनो देशों में साफ् सुथरा और बराबरी का कारोबार होना चाहिये और व्यारिक अवरोध हटाये जाने चाहिये तथा भारत के साथ जो अमरीका का व्यापार घाटा है उसे पूरा करने का प्रयास किया जाना चाहिये।’ भारत के साथ अमरीका का व्यापार घाटा 30 अरब डालर का है जो चीन की तुलना में बहुत कम है। सोमवार को उस प्रेम प्रदर्शन से भरे वातावरण में एकमात्र यही एक तीखी बात थी पर उसे ट्रम्प ने यह कर ततकाल संभाल किया कि इंडियन एअर लाइंस ने 100 विमानों का आर्डर दिया है इससे हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा। अब तक अमरीका के हर राष्ट्रपति ने भारत के प्रति मीठी वाणी का ही इस्तमाल किया है पर शायद पहली बार किसी ने खुल कर भारत के समर्थन में कहा कि आतंकवाद का खात्मा दोनो देशों में सबंधों का महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण कारक है। हम दोनों ‘कट्टर इस्लामी आतंकवाद को खत्म करलने के प्रति कृतसंकल्प हैं।’ ट्रम्प ने मंच से जब यह घोषणा की तो मोदी उन्हें एकटक देख रहे थे। अमरीका ने यहां अपनी सत्ता का प्रदर्शन किया। प्रथम पंक्ति में उपराष्ट्रपति माइक पेंस और अमरीका की प्रथम महिला मेलानिया ट्रम्प तथा उनके मंत्रिमंडल के सबी सहयोगी उपस्थित थे। इस पुरी मुलाकात का सबसे हैरतअंगेज हिस्सा वह घोषणा थी जिसमें कहा गया कि भहारलत में आयोजित होने वाली ग्लोबल इंटरप्रेनियरशिप समिट में ट्रम्प की पु1ा इवांका ट्रम्प शरीक होंगी। मोदी ने कहा कि वे इवांका की आगवानी के लिये उत्सुक हैं।

ट्रम्प के बाद उतने ही विशेषण भरे शब्दों से मोदी ने बी उनकी बात का जवाब दिया। उन्होने कहा कि दोनों की मुलाकात द्विपक्षी सम्बंधों के इतिहास में दर्ज होगी। उन्होंने इसके कारण गिनाये कि यह वार्ता आपसी भरोसे के आधार पर हुई। दोनों देश मूल्यों, भय और त्रासदी के समान भागीदार हैं। दोनों देश वैश्विक विकास के प्रमुख वाहक हैं। मोदी ने कहा कि दोनो देशों की समरनीतिक भागीदारी एक नयी ऊंचाई को स्पर्श करेगी। उन्होंने यकीन है कि ताकतवर अमरीका भारत के लिये लाभदायी होगा। मोदी ने ट्रम्प और उनके परिवार को भारत आने का न्यौता दिया। सारे विशेषणों और प्रशंसाओं के बावजूद इसे कायम रखने के लिये बहुत कुछ करना होगा।

    

Monday, June 26, 2017

कोई हंगामा करो ऐसे गुजर होगी नहीं

कोई हंगामा करो ऐसे गुजर होगी नहीं

 

 भारत एक ऐसा देश है जहां सदा खेतिहर या किसान का इस्तेमाल किया गया चाहे वह भावनाऔं को भड़काने के लिये किया गया हो या फिर राजनीति की सुलगती आग की आंच को बढाने के लिये।

जरा सा तौर तरीकों में हेरफेर करो

तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं

 

पौराणिक काल में राजा जनक का हल चलाना इसी भावावेग को त्वरित करने की कथा थी। दूर जाने की जरूरत नहीं है लगभग 30-40 साल पहले 19601970 में भारतीय किसान यूनियन ने हजारों किसानों से दिल्ली को भकभोर दिया था। इसके बाद 1988 में दिलली का बोट क्लब एक बार फिर किसानों के नारों से गूंज उठा था। 60 के दशक में चौधरी चरण सिंह किसान नेता के ऱ्प में उभरे थे जिनकी यात्रा प्रधानमंत्री के पद तक हुई। सियासत की चालाकी ने उस किसान आंदोलन को जाति आंदोलन में बदल दिया और वह हिंदुत्व के रूप में ढल गया। लेकिन हाल में किसान आंदोलन फिर से उभर गया। यह आंदोलन 1991के उत्तरकाल में विकास की जो दिशा है उसी का सामाजिक आर्थिक प्रतिफल है। इस विकास की दौड़ में ग्रामीण भारत पिछड़ गया और शहरी भारत आगे निकल गया। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रपट के मुताबिक 1993-94 में भारतीय गांव में प्रतिव्यक्ति मासिक खर्च 281 रुपये थे जबकि उसी अवधि में शहर में प्रति व्यक्ति मासिक खर्च 458 रुपये थे। 2007-2008 में यह अंतर और बड़ गया। इस अवधि में ग्रामीण भारत में प्रतिव्यक्ति मासिक खर्च बढ़कर 772 रुपये हो गया जबकि शहरी भारत में यह 1472 रुपये हो गया। 2011-12 आते आते यह अंतर और बढ़ गया। इस अवधि में ग्रामीण भारत में प्रतिव्यक्ति खर्च 1430 रुपया था। सरकार या हमारे नेता कहते हैं कि यह 1430 रुपया 2007-2008 के 772 रुपये से 85 प्रतिशत ज्यादा है। जबकि इसी अवधि में शहरी बारत का प्रतिव्यक्ति मासिक खर्च 2630 रुपये हो गया। जो कि 2007-2008 की तुलना में 79 प्रतिशत बड़ी। हमारे राजनीतिज्ञ कहते हैं कि आलोच्य अवधि में शहरी भारत की खर्च करने की औकात ग्रामीण भारत से कम हुई है। इसी आंकड़े के बल पर गांवों के विकासे की सुनहरी तस्वीर खींचते हैं।

तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है

मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है

यह अंतर कृषि के धीमते विकास के कारण हुआ। 2005-06 और 2011-12 में 2004-05 की स्थिर कीमतों पर औद्योगिक विकास दर 7.5 प्रतिशत था, सेवा क्षेत्र में यह दर 9.95 प्रतिशत थी, लेकिन इसी अवधि में कृषि के विकास की दर महज 3.8 प्रतिश थी। यह कृषि की तरफ से सरकार की उदासीनता का सबूत है। कहने के लिये सरकार ने गांवो में रोजगार के लिये मनरेगा लागू किया था जिसमें पैसा ही नहीं था।  2017 के बजट के बाद उसकी हालत थोड़ी सुधरी है। मनरेगा गरीब किसानों के लिये था पर वे गरीब इसका लाभ नहीं उठा सके उल्टे लगातार दो वर्ष तक सूखे का प्रहार झेलते रहे। नोटबंदी ने इस प्रहार को और भी मारक बना दिया। नगदी के लिये बेहाल किसान अपने उत्पादनों को औने पौने दाम में बेचने लगे। इससे भी नहीं काम चला तो कर्ज लेने लगे और कर्जे से दब गये। कई बार तो 20 प्रतिशत मासिक व्याज के दर पर भी कर्ज लेने की घटना सुनने में आयी है। हालात इतने नहीं बिगड़े होते अगर सरकार ने निम्नतम समर्थन मूल्य सही रखा होता। यही नहीं खाद पर सब्सीडी कम हो गयी और बिजली की दर बढ़ गयी। किसान और संकट में फंस गया।

देखे हैं हमने दौर कई अब खबर नहीं

पैरों तले जमीन है या आसमान है

उसे इस संकट से निकालने के लिये सरकार ने अबतक केवल एक आयोग का गठन किया जबकि कर्मचारियों के लिये सात- सात आयोग बने। किसानों के लिये गठित आयोग की सिफारिशें अभी तक लागू नहीं हो सकी है।

 

जो उलझ कर रह गयी है फाइलों जाल में

गांव तक वो रोशनी आयेगी कितने साल में

 

हर दल किसानों को अपना वोट बैंक माना और उनसे चुनाव के दौरान मीठे और झूठे वायदे किये। कुछ पूरा नहीं किया जा सका और पीड़ा बढ़ती गयी। नतीजा यह हुआ कि किसानों मेंआत्म हत्या की प्रवृति बढ़ने लगी। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2014के मुकाबले किसानों की आत्म हत्या में 42 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

सोचा था उनके देश में महंगी है जिंदगी

पर जिंदगी का भाव यहां और भी खराब है

किसानों के झूठे पैरोकार झूठे वायदों के बल पर संसद में जाते हैं, किसानों की पीड़ा का सर्वे करवाते हैं, उन्हें तराजू पर तौलते हैं, राहत के नाम पर कुछ सिक्के उछाल दिये जाते हैं जो वर्षों बाद आते हैं और नया घाव दे जाते हैं। पूरे देश का पेट पालने वाले किसान कर्ज, व्याज, कर्ज माफी , न्यूनतम समर्थन मूल्य, योजनाऔं , घोषणाओं और खैरातों की भूलभुलैय्या में फंस जाते हैं। कोई राह नहीं दिखती तो आत्महत्या कर डालते हैं। हमारे नेता इन हत्याओं का रिकार्ड तथा ज डी पी के आंकड़े देखते हैं। नयी घोषणा करते हैं।   

पक गयी​ हैं ये आदतें बातों से सर होंगी​ नहीं

कोई हंगामा करो ऐसे गुजर होगी नहीं             

Sunday, June 25, 2017

चलो सुहाना भरम तो टूटा

चलो सुहाना भरम तो टूटा

देश में जहां मोदी की कीर्तनपार्टी उनके खिलाफ लिखने बोलने वालें को क्रा क्या नहीं कह रहे हैं। यहां तक अश्लील गालियां तक दे रहे हैं वहीं विदेशों जहां प्रचारित था मोदी जी के नाम का डंका बज रहा है वहीं एक तरफ रूस के राष्ट्रपति पुतीन भारत सरकार को चेतावनी दे रहे हैं कि भारत की स्वायत्तता को खतरा है जरा संभल कर रहें ।  दूसरी ओर इन दिनों विदेशी अखबार दुनिया की इस  ‘सबसे तेज अर्थ व्यवस्था’ पर तीखे आलेख लिख रहे हैं। न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट ने तो कुछ दिन पहले भारत की अर्थ व्यवस्था और उससे प्रभावित हो रही समाज व्यवस्था की काफी आलोचना की थी। विख्यात पत्रिका इकॉनोमिस्ट ने अपने ताजा अंक में लिखा है कि ‘भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुधारक नहीं हैं’ , ‘मोदी कट्टर राष्ट्रवादी हैं’ और ‘कभी का रोता हुआ गणतंत्र इन दिनों दमित महसूस कर रहा है।’इकॉनोमिस्ट का जो सबसे नाजुक हमला है वह कि इन दिनों जो हिंदंत्व वैरायटी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित किया है वह देश की अर्थ व्यवस्था में प्रगति के त्वरण से मंद कर दिया है और साथ ही एक परिपक्व लोकतंत्र के ग्लोबल सॉफ्ट पावर के तौर पर भी इसे अलग कर दिया है।

इन सबसे अलग अगर मोदी जी उपलब्धियों की बात करें तो दिवालिया कानून 2016 तथा 1 जुलाई से लागू होने वाले ज एस टी का उल्लेख कर सकते हैं। लेकिन जहां सुधार और त्वरा की आवश्यकता थी वहां मोदी जी के सुधार का भरम टूट गया। जहां 2013 के 6.7 प्रतिशत आर्थिक विकास तेजी से 2015-16 के वित्तीय वर्ष में 7.9 प्रतिशत हो गया था और दुनिया को लगने लगा था कि भारत एक तेजी से उभरती हुई अर्थवयवस्था है। इससे लगने लगा था कि मोदी जी सचमुच महान आर्थिक सुधारक हैं और हिंदू राष्ट्रवादी की उनकी छवि केवल चुनावी हथकंडा थी। लेकिन, जैसे ही यह वित्तीय वर्ष 2016-17 में प्रवेश किया कि अर्थ व्यवस्था लड़खड़ाने लगी। 2016-17 की तीसरी तिमाही में अर्थ व्यवस्था के विकास की दर लुढ़क कर 6.1 प्रतिशत हो गयी​। 8 नवम्बर 2016 को 56 इंच के सीने को और वृहदाकार बनाते हुये मोदी जी ने नोटबंदी की ोषण करते हुये कहा कि इससे आतंकवादियों धन मिलना बंद हो जायेगा और काला धन समाप्त हो जायेगा। पर कुछ नहीं हो सका। लेकिन कुछ नहीं हो सका उल्टे कितने लोगों की रोजी रोटी खत्म हो गयी। अब जीएस टी लाया जा रहा है। इसमें कर सीमा की भारी भूल भुलैया है। सन्मार्ग के एक पाटक पंकज कुमार ने जीएस टी पर अपनी अफनी प्रतिक्रिया में लिख भेजा कि ‘जिस देश में कहां शौच करना है यह भी टी वी में विज्ञापन देकर बताना पड़ता है उस देश में जी एस टी का फायदा कौन समझा सकता है।’ सचमुच जीएसटी के लागू होने से जहां अफसरी अड़चने बढ़ जायेगी वहीं ​निवेश भी सिकुड़ जायेगा। औद्योगिक ऋण का भुगतान रुक गया है ओर ढांचागत परियोजनाएं नगदी के अभाव में ठप हो गयीं हैं। देश का कारपोरेट क्षेत्र दुविधा में है। भूमि और श्रमिक समीकरण टूटते जा रहे हैं। भूमि सुधार के अभाव में उद्योगों जमीन नहीं मिल रही और जमीन की कमी कारण आद्यौगिक विकास थमता जा रहा है। कुल मिला कर वे सुधारक नहीं हैं जौसे कि गाया बाजाया जा रहा है। बेशक उनमें पूर्ववर्ती प्रदानमंत्री मनमोहन सिंह से ज्यादा ऊर्जा है और उन्होंने उद्योग से लेकर शौचालय तक के हर क्षेत्र में पहल की। लेकिन कुछ भी सफल नहीं हुआ। इधर समाज व्यवस्था का समन्वय ​बिगड़ता जा रहा है। मोदी जी के शासनकाल में कट्टर राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के तत्व छुट्टा चर रहे हैं। देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात चल रही है। ‘काउ और क्रिकेट’ की जुगलबंदी में देश के 14 प्रितिशत अल्पसंख्यक प्राड़ित हो रहे हैं। उनहें मानसिक और शारीरिक यातना दी जा रही​ है। ऐसा लग रहा है कि जनता और निवेशकों ने जो मोदी जी पर भरोसा किया था वह खत्म होता जा रहा है। मोदी जी ने देश की जनता से वादा किया था कि अगर वे सत्ता में आये तो ‘कम से कम नियंत्रण और ज्यादा से ज्यादा शासन।’ लेकिन आज तो लग रहा है कि आज ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण है और नागरिक अधिकारों, बेतरह पीट कर मार डालने की घटनाओं वगैरह से लगता है कि शासन है ही नहीं। हाल तक ग्लोबल मीडिया मोदी जी की वाहवाही करता था और आज वही नुक्ताचीं करने में लग गया। इन दिनों तो लग रहा है कि मोदी जी ‘मेक इन इंडिया’ और अन्य प्रमुख कार्यक्रम मंद लोकतंत्र के भार से दब गये हैं और हिंसक हिंदुत्व का आतंक भड़क उठा है। मोदी जी के बारे में पूरी दुनिया में व्याप्त एक सुहाना सा भरम धीरे धीरे टूटने लगा है।        

Saturday, June 24, 2017

देश की स्वायत्तता को भारी खतरा

देश की स्वायत्तता को भारी खतरा
अंतरराष्ट्रीय मंच से मोदी जी को सतर्क रहने की सलाह

 हरिराम पाण्डेय

कोलकात्ता : अभी अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में के जी बी की भूमिका पर बहस खत्म भी नहीं हुई थी कि रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतीन ने यह कह कर देश की खुफिया बिरादरी को चौंका दिया कि भारतीय स्वायत्तता को खतरा है। 21वें पीटर्सबर्ग अंतरराष्ट्रीय फोरम की हाल की बैठक में बगल में बेठे मोदी से कहा कि भारत की​ स्वायत्तता को खतरा महसूस हो रहा है। उनकी इस बात से अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक बिरादरी में बेचैनी बढ़ गयी।

अभी हाल में भारत में पैर जमाने के लिये आई एस आई एस को मदद दिये जाने पर सन्मार्ग की खोज के दौरान यह पता चला था कि अमरीका की नेशनल सिक्यूरिटी एजेंसी (एन एस ए) ने भारत में खुफिया नेटवर्क बनाने की योजना बनायी है। इस योजना के तहत महत्वपूर्ण स्थानों में होने वाली वातर्नाओं को सुनने वाले यंत्र बठाया जाना था। विदेशी कूटनीतिक सूत्रों ने सन्मार्ग को बताया कि एस सी एस के नाम से चलने वाली ग्लोबल निगरानी योजना का कोडनेम स्टेटरूम था। इसका काम अंतरराष्ट्रीय रेडियो तरंगो, दूरसंचार वार्ताओं और इंटरनेट ट्राफिक को इंटरसेप्ट करने की व्यवस्था है। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार इस तंत्र ने जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल की मोबाइल फोन पर निजी बात चीत लगातार दस साल तक रिकार्ड की। इसमें कई दक्षिण अमरीकी, यूरोपीय और अन्य लोगों की महत्वपूर्ण निजी वार्ताएं भी शामिल हैं। हम अपने देश की सूचना तकनीक के अग्रणी होने के बारे में लाख बड़ी बड़ी बातें कहें लेकिन जो पता चला है उसके मुताबिक अमरीकी दूतावास के भीतर अभी यह नेटवर्क चल रहा है। दरअसल संचार क्षेत्र सूचनाओं के आदान प्रदान जिसमें ध्वनि, डाटा, वीडियो और इंटरनेट नेटवर्क की सहूलियतें मुहय्या कराता है। यही नहीं सूचना क्षेत्र राष्ट्रीय सुरक्षा और आपात तैयारी का अंग है। अतएव वह संचार और राष्ट्रीय महत्व के सुरक्षा ढांचों के अंतस्संबंधों की व्याख्या है। जैसे जैसे तकनीकी विकास हो रहा है वैसे वैसे इस क्षेत्र से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां भी बढ़ती जा रहीं हैं। अमरीका की इस कार्रवाई के फलस्वरूप और रूस के राष्ट्रपति की चेतावनी के फलस्वरूप भारतीय खुफिया तंत्र में हड़कम्प हो गया है। क्योंकि सूचना प्राविधिकी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के उपयोग से इन दिनों सूचना समरनीति का विकास हो रहा है। गलत और गड़ी हुई सूचनाओं को विश्वसनीय तंत्रहों के मादयम से फैला कर किसी भी राष्ट्र का व्यापक अहित आसानी से किया जा सकता है। विस्तृत सुरक्षा सिद्धांतों के अभाव में इस तरह की साजिशें यकीनन किसी भी देश की स्वायत्तता के लिये खतरनाक हो सकती हैं।        

Friday, June 23, 2017

मोदीजी ध्यान दें

मोदी जी ध्यान दें

रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिये उम्मीदवार बनाने कहा जाने लगा कि भाजपा ने 2019 का चुनाव फतह कर लिया। कोविंद दलित बिरादरी से हैं और उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात के डेरापुर तहसील के किसान परिवार से हैं अतएव सियासत के लिये खास कर चुनाव जीतने के लिये जो अर्हताएं चाहिये वे सब उनमें हैं। वे दलित हैं, किसान हैं और उत्तर प्रदेश के हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोविंद को वोट देने का फैला किया है। अन्य दल भी हो सकता है ऐसा ही करें केवल कांग्रेस, वामपंथी ,तृणमूल कांग्रेस और राजद को छोड़कर।इसबीच भाजपा उत्तरपूर्व , पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत में भी पैर फैला रही है। हिंदू दलों का ध्रुवीकरण भी एक हकीकत है। गरीब समुदाय तो भाजपा के साथ है ही। कोविंद की चमकविहीन पृष्ठभूमि तो एक अतिरिक्त पूंजी है।यदि सवर्ण हिंदू, दलित, अन्य पिछड़ी जाति के लोग , किसान और गरीब वर्ग के लोग किसी को समर्थन करें तो वह कैसे चुनाव हार सकता है? उत्तर है कि पराजय मिल सकती है य​दि मोहभंग हो गया तो। फिलहाल भाजपा का जादू अर्द्ध उदारवादी अभिजात वर्ग और मध्य वर्ग के एक हिस्से में उतर रहा है। वे हर मोड़ पर दारने वाले टैक्स कानूनों तथा सुस्त अफसरशाही , पाकिस्तान और चीन के बारे में ढुलमुल नीति , बीफ पर तरह तरह के सरकारी तमाशे, गौरक्षकवाद इत्यादि से ऊब चुके हैं। लेकिन ये सब ऐसे मामलात नहीं है जिससे चुनाव का परिणाम तय होता है या कहें हार जीत का फैसला होता है। परंतु एक बात है कि मोदी जी को अपने अतिआत्मविश्वास के प्रदर्शन से बचाना होगा। उनमें ऐसा आत्म विश्वास दिखता है मानों वे जो करते हैं वही एकमात्र सही है। तीन साल से मोदी जी की सरकार है। उनके साथ 281 सांसद हैं। लेकिन भाजपा की जो दिशा है वह चिंताजनक है। जहां इसे दृढ़ होना चाहिये वहां यह नहीं होती है और जहां रुख लचीला होना चाहिये वहां कठोर दिखती है। जब मोदी जी ने सत्ता संभाली है तो उन्होंने कहा था कि वे प्रधानमंत्री नहीं प्रधान सेवक हैं। संसद के सदस्य वी आई पी नहीं हैं वे जनता के सेवक हैं। लेकिन मोदी जी के साथी सांसद लगता है उनकी बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। वे तो शाहों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। शिवसेना के रवींद्र गायकवाड़ और तेलुगू देशम पार्टी दिवाकर रेड्डी का हवाई कम्पनियों के साथ अश्लील व्यवहार से यह पता चलता है कि उन्होंने कैसे अपनी भूमिका को समझा है। एक आम आदमी  हवाई यात्रा के लिये पैसे देता है जबकि एक सांसद उसके लिये भुगतान नहीं करता है। उसे सांसद को मिलने वाली सुविधाओं के तहत यह सुविदा मिलती है। यह जानकर हैरत होगी कि भारत के सांसद सबसे कम उत्पादक हैं और सबसे ज्यादा दिखाऊ हैं। ब्रिटिश सांसदों को अपने आवास का जुगाड़ करना होता है और उसके लिये भुगतान करता है। फोकट में घर नहीं मिलता। जबकि भारत के सांसदों को लुटियन जोन में विशाल बंगले मिलते हैं जिनका बाजार दर लगभग 15 से 20 लाख रुपया महीना है। राज्य सभा को छोड़कर और लोकसभा के 800 सांसदों में से अगर 500 सांसद भी ऐसे बगले में रहते हैं करदाताओं के 1200 करोड़ रुपयों का सिर्फ आवास में सतयानाश हो जाता है। हलक में हाथ टाल कर टैक्स के पैसे वसूलने वाली सरकार जनता के कथित सेवकों के आवास पर साल में 1200 करोड़ रुपये खर्च करती है। अब इस पर अन्य खर्चो तथा सुविधाओं को जोड़ दें तो राशि कितनी ज्यादा हो जायेगी इसका अंदाजा है क्या?जनता के इन कथित सेवकों को आवास के अलावा मुफ्त के गार्ड, मुफ्त टेलीफोन, मुफ्त बिजली , मुफ्त कार और मुफ्त पेट्रोल मिलता है। इसके अलावा हवाई यात्रा, रेल यात्रा और सेक्रेटरी भी मुफ्त मिलते हैं। अब ये बदले में देश को देते क्या हैं? देना तो दूर ये हवाई यात्रियों पर हमला करते हैं , स्टफ से गाली गलौज करते हैं आम जनता काहे कीड़ा मकोड़ा समझते हैं। इसकाह कोई समाधान है? समाधान है अगर गलती या गलत आचरण करने वाले सांसद की पार्टी उनपर कठोर कार्रवाई करती है तो बात बन सकती है। लेकिन ऐसा होता है क्या। हर सरकारी पक्ष को संसद के दोनों सदनों में समर्थन चाहिये और अगर वह अन्य पार्टियों के सांसदों पर दंडात्मक कार्रैवाई करता है तो सदन में कठिनायी बड़ सकती है। हर सरकार के सत्ताकाल में एक मोड़ जरूर आता है। जैसे यू पी ए सरकार के काल में निर्भया कांड हुआ। इसके पहले से घोटाले वगैरह तो चल ही रहे थे। अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने उसे और कमजोर कर दिया। निर्भया कांड के 17 महीनों के बाद यू पी ए सरकार गिर गयी।

अभी मोदी सरकार के से लिये ऐसा कोई मोड़ नहीं आया दिख रहा है। उल्टे राष्ट्रपति चुनाव उनके वोट आधार को और मजबूत कर देगा। लेकिन चिंताजनक संकेत मिलने लगे हैं। इन संकेतों को नजर अंदाज नहीं किया जाना चाहिये। उत्तर प्रदेश की भारी विजय ने उसे थोड़ा आत्म संतुष्ट कर दिया है। भाजपा को यह याद रखना चाहिये कि चुनाव में लहर अचानक आयेगी और सब कुछ बहा कर ले जायेगी।असहिष्णुता का झूठा अभियान जानबूझ कर गढ़ा जाता है। अतीत में भी इसका असर मेखा गया है और वर्तमान में भी हो सकता है। अगर प्रधानमंत्री ने अपने सांसदों को सचमुच जनता का सेवक नहीं बनाया और यही हाल रहा तो बात बिगड़ सकती है।