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Tuesday, November 13, 2018

नागरिकता विधेयक पर असमी समुदाय का  विभाजन

नागरिकता विधेयक पर असमी समुदाय का  विभाजन


नागरिकता बिल ने असम के  दो प्रमुख समुदायों के बीच पारंपरिक दरार  का खुलासा कर दिया है। यह दरार ब्रिटिश राज के समय से कायम  है।
असम एक बार फिर उबल रहा है। विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 पर बराक और ब्रह्मपुत्र घाटियों के लोगों के बीच विचारों को लेकर   विभाजित हो गया है   साथ ही राज्य अब सामाजिक और भौगोलिक दृष्टि से भी उबल रहा है। ब्रह्मपुत्र घाटी  बंगाली और असमिया समुदाय बघनखे छिपा रखे हैं। जब से विधेयक सामने आया है राज्य में गहरे भाषाई ध्रुवीकरण देखा जा रहा है। यह ध्रुवीकरण उस समय और गंभीर हो गया जब  संयुक्त संसदीय समिति के सदस्यों ने इस साल की शुरुआत में राज्य का दौरा किया और बाद में अपनी रिपोर्ट जमा कर दी। यह स्थिति विदेशी-विरोधी आंदोलन के दिनों  (1 979-19 85) की याद दिलाती है।  सभी खेमे से उत्तेजक वक्तव्य आ रहे हैं और राज्य की मीडिया (ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक) का एक बड़े वर्ग के साथ सांप्रदायिक जुनून को उत्तेजित करने में लगी है।  असम स्पष्ट रूप से एक बार फिर उसी अराजक राह पर चल पड़ा है जिसपर 1979 से 6 वर्ष चलता रहा था।राज्य सरकार  रहस्यमय मौन साधे हुए है। विधेयक का विरोध करने वाले लोगों और  गैर-जिम्मेदार वक्तव्यों  से उत्पन्न होने वाले  खतरों और धमकियों के बावजूद, सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं का  एक वर्ग गैर जिम्मेदार बयान दे रहा है। दिसपुर ने स्थिति से निपटने में बुरी तरह विफल प्रशासन का   कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। 
असल में, विधेयक अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से बौद्ध, ईसाई, हिंदू, जैन, पारसी और सिख समुदायों से संबंधित आप्रवासियों को नागरिकता प्रदान करना चाहता है। इस समुदाय के लोग  धार्मिक उत्पीड़न के बाद 31 दिसंबर, 2014 से पहले अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर गए थे । इस प्रकार, यह असम या बांग्लादेशी हिन्दू-विशिष्ट नहीं है।  इसके अलावा, बांग्लादेश से गारो, खासी, राभा, चक्र इत्यादि जैसी जनजातियों के कुछ सदस्य अवैध रूप से पूर्वोत्तर में रह रहे हैं। इस  बिल  से उनके लिए  भी  आसानी होने  की उम्मीद है।
लेकिन, सत्तारूढ़ दल के फैसले से कोई भी मतभेद नहीं होने के कारण,  राष्ट्रवादी समुदाय  दंगा कर  स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश में हैं। 
वे यह भी इंगित कर रहे हैं कि यह सर्वोच्च न्यायालय के तहत नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) के चालू पंजीकरण के अलावा गैरकानूनी बांग्लादेशियों की पहचान और निर्वासन के लिए 24 मार्च, 1 9 71 को तय किये गए असम समझौते को अस्वीकार कर देंगे।  हालांकि, बंगाली संगठनों का मानना ​​है कि आखिरकार बंगाली हिंदुओं के लिए न्याय किया जाएगा जो धार्मिक उत्पीड़न के कारण  पूर्वी पाकिस्तान से भाग आये थे और दशकों बाद उन्होंने इस राज्य में रहने की  जगह चुनी थी।
अखिल असम छात्र संघ (एएएसयू) जैसे प्रभावशाली संगठन अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों और यहां तक ​​कि राजनीतिक समूहों के बाहर भी अन्य जातीय समूहों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। 
वर्तमान स्थिति उस समय एक उत्तेजक विंदु पर पहुंच गई जब पिछले दिनों  तिनसुकिया जिले के ढोला में अज्ञात बंदूकधारियों (आतंकवादियों के लिए संदिग्ध) द्वारा पांच निर्दोष बंगालियों को गोली मार दी गई थी।   आतंकवादी संगठनों द्वारा लक्षित सामूहिक हत्याओं की पृष्ठभूमि में अन्य समुदायों द्वारा अतीत में ऐसे गिरोहों को बुलाये जाने की भी मिसाल है। 
नवीनतम प्रकरण ने स्पष्ट रूप से असमिया और बंगाली समुदायों के बीच अंतर्निहित उत्तेजनात्मक तनाव का खुलासा किया है। हत्या की व्यापक रूप से निंदा नहीं की गई थी। यहां तक ​​कि असमिया बुद्धिजीवियों ने भी मौन रहना  पसंद किया था।  
इन सभी ने राज्य में रहने वाले बंगालियों के एक बड़े हिस्से में विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र घाटी में असुरक्षा की भावना को बढ़ावा दिया है।
दोनों समुदायों
के  बीच वर्तमान तनाव से एक बार फिर पूर्वोत्तर की जटिल सामाजिक संरचना  सामने आ गयी है जो अपने राजनीतिक परिदृश्य को भी परिभाषित करती है। विशेष रूप से कई जातीय समुदायों के बीच असुरक्षा की अव्यवस्थित भावना को स्पष्ट देखा जा सकता है।  देश के बाकी हिस्सों के विपरीत, इस हिस्से में ध्रुवीकरण मुख्य रूप से जातीय और भाषाई रेखाओं के आरपार  होता है।  बंगाली या करबी असमिया या असमिया के साथ-साथ बंगाली आदि के साथ-साथ नागरिकता (संशोधन) विधेयक पर वर्तमान तनाव इस वास्तविकता को दर्शाता है।
हालांकि, यह व्यापक रूप से माना जाता है कि मौजूदा उत्तेजना से  आगे किसी  तरह की व्यापक संघर्ष की संभावना नहीं है। विदेशियों के विरोध में हुए अतीत के आंदोलन  का पुनर्मूल्यांकन कई कारकों के कारण संदिग्ध है। जिसमें बड़े असमिया समाज के निर्माण और "राष्ट्रवादी" भावनाओं के मजबूत अंतर्निहित  विरोधाभास शामिल हैं। आखिरकार, असम के आम आदमी को पिछले कुछ महीनों के लिए अत्यधिक उत्तेजना के मुकाबले अत्यधिक संयम का इस्तेमाल करने के लिए पूर्ण श्रेय दिया गया। सांप्रदायिक हिंसा की एक भी भयानक घटना नहीं हुई है। हालांकि, दिसपुर और दिल्ली दोनों ही इस स्थिति को संसद में आगे बढ़ने की बजाए विधेयक के बारे में अपनी गलतफहमी को स्पष्ट करने के लिए सभी हितधारकों के साथ आगे बढ़ने और सक्रिय रूप से संलग्न होने की अनुमति नहीं देंगे।

Monday, November 12, 2018

मोदी और पटेल आमने सामने

मोदी और पटेल आमने सामने

यद्यपि मोदी और पटेल के आमने सामने के मुकाबले की बात कहना तकनीकी रूप से बहुत सही नहीं है ,क्योंकि सरकार के हर फैसले के लिए प्रधानमंत्री ही जिम्मेदार होता है। लेकिन जहां तक नोटबंदी का प्रश्न है वह मोदी जी की व्यक्तिगत अस्मिता की तरह था। मोदी जी नवंबर और दिसंबर 2016 तक इसे जायज और कामयाब बताते रहे थे। उनके भगत लोग भी इसी को लेकर काफी प्रचार कर रहे थे। उसके बाद से ही मामला बिगड़ने लगा। 2 वर्ष के बाद अब जबकि रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर  रघुराम राजन  ने  कह दिया कि नोट बंदी से अर्थव्यवस्था को आघात पहुंचा है तो बात कुछ दूसरी हो गई । राजनीतिक फैसलों में अधिकार का ज्यादा केंद्रीकरण समस्या पैदा करता है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर  ने 11 नवंबर को वाशिंगटन में कहा की नोट बंदी और जीएसटी भारत की आर्थिक विकास के रास्ते में रुकावट बन रहे हैं और जिस 7% विकास दर की बात की जा रही है वह देश की मौजूदा समस्या को हल करने में कारगर नहीं है। यही नहीं, रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने एक तरह से सरकार पर तंज करते हुए कहा कि हमने दुनिया में सबसे बड़ी मूर्ति बनाई है। यह प्रदर्शित करती है कि जहां संकल्प होगा वहां सफलता मिलेगी, लेकिन क्या यह संकल्प "दूसरी जगह " नहीं दिख सकता है।
   हालांकि,   उर्जित पटेल ने इस बयान पर कोई टिप्पणी नहीं की । उनकी चुप्पी को उनकी स्वीकारोक्ति समझा जा रहा है। इसके बाद भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के बीच का विवाद अब चौराहे पर आ गया है । जब से यह विवाद उभरा है तब से तरह-तरह के बयान आ रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यह वर्चस्व की लड़ाई है और इसे टाल देना चाहिए। दोनों पक्ष अपने-अपने अपने स्थान से पीछे हट जाएं। क्योंकि, सार्वजनिक शासन के लिए व्यवस्था में तरलता ज्यादा जरूरी है। कुछ विश्लेषकों का मानना  है कि रिजर्व बैंक की जमा पूंजी पर हाथ डालना सही नहीं है। लेकिन एक प्रश्न है कि सरकार ने रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड अपने राजनीतिक समर्थकों को भर दिया है और तब इस तरह के फैसले करने की बात चल रही है । क्योंकि इस तरह के फैसले अक्सर प्रबंधन स्तर पर ही निपटा दिए जाते हैं।
         बोर्ड का काम मार्गदर्शन करना है ना कि पेशेवर प्रबंधन में दखल देना । तकनीकी मामलों में फैसले करने का काम पेशेवर प्रबंधन का है और उस पर ही छोड़ देना चाहिए। वैसे अब तक जो टिप्पणियां देखने को मिली हैं उनसे तो ऐसा लगता है कि बहुसंख्यक विश्लेषक रिजर्व बैंक के पक्ष में हैं।  बैंक को यह परामर्श भी दिया जा रहा है किवह अपना रवैया लचीला रखे और विचार विमर्श के रास्ते खुले रखे । सरकारी पक्ष का मानना है कि रिजर्व बैंक के पास जरूरत से ज्यादा पूंजी जमा हो गई है। उसे यह पूंजी सरकार को दे देनी चाहिए, ताकि उसका उपयोग आर्थिक विकास में हो सके ।  यह पूंजी तो आखिर सरकार की ही है । वैसे रिजर्व बैंक को उसकी बजाहिर नाकामियों के बावजूद जवाबदेह नहीं ठहराया गया है। रिजर्व बैंक को सरकार से विवाद में पड़ना ही नहीं चाहिए।  दोनों पक्षों को टकराव से बचने के लिए जो भी सलाह दी जा रही है उस पर अमल थोड़ा कठिन लगता है। अर्थव्यवस्था पर सच में दबाव है। इसके अलावा यह विवाद व्यक्तित्व का भी है। रिजर्व बैंक के गवर्नर वस्तुतः एक बड़े पदाधिकारी हैं। लेकिन निहायत सख्त और संवादहीन से लगते हैं। पिछले कई गवर्नर भी सख्त थे पर संवाद हीनता उनमें  नहीं थी। वह बातचीत को तैयार रहते थे। पिछले कुछ गवर्नर्स को जिस तरह अपने पद से जाना पड़ा वह शोभनीय नहीं था। वर्तमान गवर्नर का कार्यकाल अभी बाकी है और सरकार भी उन्हें समय से पहले चलता करने के मूड में नहीं दिखती। इधर रिजर्व बैंक के दो डिप्टी गवर्नर के हालिया बयान से पता चलता है कि उसके आला अफसर सख्त रुख अपनाए हुए हैं । अगर केंद्रीय बोर्ड की अगली बैठक में सरकार ने इनके हाथ बांधने की कोशिश की तो हो सकता है वे इस्तीफा दे दें।  इसका बड़ा ही नकारात्मक राजनीतिक असर होगा। आर्थिक मामलों में सरकार की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है । हालात यह हैं कि उसे अभी तक कोई मुख्य आर्थिक सलाहकार तक नहीं मिल पाया है। अगर रिजर्व बैंक के गवर्नर और डिप्टी गवर्नर ने इस्तीफा दे दिया तो सरकार को इन पदों के लिए उच्चस्तरीय अर्थशास्त्री मिलना मुहाल हो जाएगा। अगर वह विदेश से ला कर किसी को इन पदों पर बैठाती है तो राजनीतिक हलकों में इतनी आलोचना होगी सरकार के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो जाएगा।
        ऐसी स्थिति में चतुराई से काम लेना ही सरकार के लिए मुफीद होगा। सरकार ने अगर अड़ियल रुख अपनाया उसका असर आने वाले चुनाव में दिख सकता है।  राजनीतिक हालात अभी से यह संकेत दे रहे हैं कि सरकार  जोखिम नहीं उठा सकती।

Sunday, November 11, 2018

केवल टोपी से क्या होगा?

केवल टोपी से क्या होगा?

यद्यपि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब सार्वजनिक अवसरों पर भाषण देने जाते हैं तो फहराती हुई पगड़ी में देखे जाते हैं। पिछले एक पखवाड़े से उन्हें तरह-तरह की टोपियां में देखा जा रहा है। कभी वे आजाद हिंद फौज की टोपी पहन लेते हैं तो कभी पनडुब्बी के सिपाहियों वाली टोपी पहन लेते हैं। दिवाली में वे आई टी बी पी के जवानों के साथ  मैरून रंग की टोपी पहने दिखे। जिस पर पीएम शब्द कढ़ाई से लिखा हुआ था। आजाद हिंद फौज की 75 वीं वर्षगांठ पर उन्होंने सुभाष चंद्र बोस वाली टोपी पहनकर लाल किले की प्राचीर पर ध्वजारोहण किया । जब उन्होंने आईएएनस अरिहंत नाम की पनडुब्बी के काम पूरे होने पर राष्ट्र को संबोधित किया तो उन्होंने परमाणु त्रिशूल की घोषणा की और उस समय उन्होंने पनडुब्बी के जवानों जैसी टोपी पहन रखी थी ।  उस टोपी पर साफ-साफ अक्षरों में प्रधानमंत्री शब्द लिखा हुआ था। लेकिन जब वे अपनी पार्टी या अपने प्रधानमंत्रित्व के प्रथम काल को बचाने के लिए सियासी जंग में उतरते हैं तो देश के नागरिक उनसे यह सवाल पूछना चाहते हैं कि जिन टोपियों को उन्होंने पहना क्या वे उनको माफिक आती हैं।
    प्रधानमंत्री की हाल की टिप्पणियों के चार महत्वपूर्ण पहलू थे। पहला कि, उन्होंने देश की सुरक्षा पर बल दिया और ऐसे मौके पर उन्होंने इंदिरा जी के प्रमुख मुहावरे को नहीं दोहराया। इंदिरा जी को हमेशा विदेशी हाथ का खतरा बना रहता था।  मोदी जी ने ऐसा कुछ नहीं कहा, पर जो उन्होंने कहा उसका अर्थ वही था। उन्होंने कहा कि यह परमाणु त्रिशूल बाहरी दुश्मनों से हमारी सीमा की सुरक्षा करेगा । हमारी सीमा को बाहरी खतरे हैं। दूसरी बात उन्होंने कही कि केवल भाजपा ने ही भारत को शक्तिशाली बनाया। अरिहंत वाले जलसे में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी और पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के नाम लिए। भारत के परमाणु और मिसाइल विकास में उनकी भूमिका की प्रशंसा की।  उन्होंने नेहरू, इंदिरा गांधी ,राजीव गांधी , इंद्र कुमार गुजराल, देवेगौड़ा अथवा चंद्रशेखर तथा चरण सिंह के नाम नहीं लिये।  यहां सवाल यह है कि अगर इन लोगों ने भारत के परमाणु कार्यक्रम की हिफाजत नहीं की होती ,खासकर के पश्चिमी निगरानी से ,तो क्या बाजपेई 1998 में सफल परमाणु परीक्षण कर पाए होते? तीसरी बात कि बेशक नेहरू गांधी परिवार भारत में अपने नाम का प्रसार कर रहे हैं और करते रहे हैं पर मोदी जी की प्रवृत्ति तो ऐसी लग रही है कि वह अपनी विरासत तैयार करने में लगे हैं । सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे लोगों की मूर्तियां लगाना इसलिए वे उचित समझते हैं कि पटेल नेहरू के व्यक्तित्व और राजनीति के विरोधी थे। ऐसा सचमुच था या नहीं लेकिन मोदी जी या मानते हैं और वे ऐतिहासिक भूलों को सही करने में लगे हैं ।  इसी क्रम में शहरों के नाम बदले जा रहे हैं ।चौथी बात या चौथा पहलू जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है कि मोदी जी को यकीन है कि सुरक्षा के मामलों को उठाने  से लोगों का ध्यान महत्वपूर्ण मसलों से हट जाएगा। वह महत्वपूर्ण मसला देश की आर्थिक स्थिति है। विगत कुछ हफ्तों से भारतीय रिजर्व बैंक अपनी स्वायत्तता के लिए लड़ रहा है। सब  लोग जानते हैं कि 2 साल पहले की नोट बंदी के बारे में रिजर्व बैंक ने मंजूरी नहीं दी थी। पिछले 2 वर्षों से मोदी जी लगातार विश्वास दिलाने में लगे हैं कि करेंसी की कमी कभी नहीं हुई । लेकिन 2 वर्ष से मोदी जी के तरफ से इस मामले पर एक भी ट्वीट नहीं आया। अलबत्ता वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने फेसबुक पर इस संबंध में जरूर कुछ लिखा था और कहा जा सकता है प्रधानमंत्री जी ने नोटबंदी  के कारण आई विपत्ति को पूरी तरह से नजर अंदाज कर दिया।
         क्या हम भूल सकते हैं इसे आसानी से? 22 नवंबर 2016 को संसदीय भारतीय जनता पार्टी ने एक प्रस्ताव पास कर प्रधानमंत्री मोदीजी  के इस प्रयास की प्रशंसा की थी। इस प्रस्ताव को राजनाथ सिंह और तत्कालीन  सूचना और प्रसारण मंत्री  वेंकैया नायडू ने प्रस्तुत किया था। भाजपा ने " इस पहल को व्यवस्था की सफाई की परियोजना  के रूप में स्वीकार किया और कहा था कि यह सामान्य और राजनीतिक जीवन में ईमानदारी को बढ़ावा देगा। इससे  सामान्य जन और गरीबों को लाभ होगा।" लेकिन, इस वर्ष ना राजनाथ सिंह ना वेंकैया नायडू और ना विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस पर एक शब्द भी कहा। अमित  शाह ने जेटली के संदेश को ट्वीट किया ।इससे लोगों के बीच यह भ्रम पैदा हुआ कि इस सारे काम के लिए जेटली ही दोषी हैं।
        यहां सवाल उठता है कि कुछ राज्यों में  होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे मोदी जी के आर्थिक व्यवहार के लिए जनादेश होंगे क्या?
    

Friday, November 9, 2018

जेटली को गुस्सा क्यों आया?

जेटली को गुस्सा क्यों आया?

इन दिनों वित्त मंत्री अरुण जेटली साहब और उनकी पार्टी की सरकार बड़ी सांसत में पड़ी हुई है। रिजर्व बैंक से रस्साकशी चल रही है, सुप्रीम कोर्ट से भी गड़बड़ है और सीबीआई को लेकर मामला ही उल्टा पड़ गया है। ऐसे में बड़ा अजीब लगता है जब अरुण जेटली सत्ता के पृथक्करण पर बोल रहे हों। उन्होंने हाल में अटल बिहारी वाजपेई स्मृति व्याख्यानमाला में निर्वाचन से प्राप्त अधिकारों को कमजोर करने और गैर जिम्मेदार संस्थानों को अधिकार देने का समर्थन करने का विरोध किया। तब से स्वदेशी जागरण मंच ने जेटली की इस बात का समर्थन शुरू कर दिया । स्वदेशी जागरण मंच आर एस एस की आर्थिक इकाई है। एक अकादमिक ने भी इसका समर्थन किया है। इमानदारी से कहें तो वर्तमान की भारतीय जनता पार्टी की सरकार पहली नहीं है जिस पर इस तरह की बातें करने  के आरोप हैं और ना अरुण जेटली ही पहले ऐसे मंत्री हैं जिन्होंने निर्वाचित संस्थाओं के अत्याचार की बात कही है। उनका कहना है की जो लोग निर्वाचित होकर नहीं आते हैं वे उन संस्थाओं पर हुकुम चलाते हैं जिन्हें हर 5 साल पर जनता की अदालत से अधिकार प्राप्त होता है । जब राजनीतिक दल और राजनीतिज्ञ निशाने पर होते हैं तो वे अधिकारों के दायरे को  लांघने की दलील देते हैं ।  यहां उनके कहने का अर्थ है कि लोकतंत्र में जवाबदेही का मूल तंत्र चुनाव है और जो लोग चुनाव नहीं लड़ते हैं वह बुनियादी तौर पर जवाबदेह नहीं हैं । सामने वाले दल को सार्वजनिक महत्व के विषयों पर निर्वाचित प्रतिनिधियों से प्रश्न करने का अधिकार नहीं है । बिना किसी पार्टी को सामने रखे जेटली के इस तर्क की समीक्षा जरूरी है। पहली  बात कि सरकार की विभिन्न शाखाओं के बीच खींचतान का मतलब केवल वर्चस्व की लड़ाई नहीं है यह वास्तविक स्थितियों को लेकर की हो सकती है, खास करके ऐसे समय में तनाव की संभावना अधिक हो जाती है जब मानवीय प्रयासों के सभी क्षेत्रों में नए-नए विचार सामने आते हैं और तकनीक तेजी से विकसित हो रही हो। दूसरे शब्दों में अधिकारों के विभाजन के सिद्धांत पर उस समय सवाल उठ सकते हैं जब संस्थानों को किसी भी कार्य के लिए तत्पर रहने को कहा जाए। ऐसी स्थिति में  उस समय यह और जरूरी हो जाती है जब संकीर्ण विचारों के कारण या कानून के शासन में उस कार्य का जिक्र नहीं होने के कारण कोई संस्थान किसी कार्य से या सरकारी आदेश इंकार करता है।
       देश में हाल में जो विवाद उत्पन्न हुआ अगर उसके कारणों की परीक्षा करें तो भ्रष्टाचार के सामान्य कारणों के अलावा दो बातें सामने आती हैं और वह है सब जगह  सर्वशक्तिमान सरकार की मौजूदगी तथा  प्रसामान्यता को फिर से संयोजित करने के प्रयासों को चुनौती देने वाले मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता जैसे बुनियादी तथ्यों से  मुकाबले के दरवाजे बंद होने के बाद हर विवाद, ऐसा लगता है कि, निर्वाचित सरकार के खिलाफ एक षड्यंत्र है। लेकिन यह सही नहीं भी हो सकता है । दूसरी बात कि चुनाव लोकतंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और साथ ही जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण तंत्र भी है । लेकिन व्यवहारिक तौर पर  मतदान के समय मतदाताओं के पास बहुत सीमित विकल्प होते हैं ।खासकर सारी चीजें घूम फिर कर भ्रष्टाचार और व्यक्ति पर केंद्रित हो जाती है।  अक्सर ऐसा होता है कि जिस व्यक्ति को चुना जाता है वह आदर्श नहीं भी हो सकता है या उस ग्रुप का भी हो सकता है जो किसी विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्र में वर्चस्व रखता है। इस तरह से निर्वाचित व्यक्ति अपने चुनाव क्षेत्र के लिए जवाबदेह होता है। इसके विपरीत घटक दलों के पारस्परिक संबंधों के साथ सत्ता के शतरंज को खत्म करने के विभिन्न तरीकों का अगर इसमें इस्तेमाल किया जाए तो लाभ हो सकता है लेकिन जब इन्हें एक साथ उपयोग में लाया जाता है तो यहां भ्रष्टाचार और विघटन का विवाद शुरू हो जाता है । यह विवाद या इससे मिलते जुलते विवाद नए नहीं हैं। इस तरह के विवाद से भारतीय जनता अच्छी तरह परिचित है। चुनावों के बीच की अवधि में निर्वाचित व्यक्तियों पर अत्याचार बातें उठने लगती हैं और इसी दरम्यान ऐसी भी बात निकलती है कि  कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को संविधान से  अधिकार प्राप्त हैं  । 
       जब निर्वाचित लोगों द्वारा प्राथमिकताओं को लागू करने और  जो कानून उन्होंने बनाए हैं उनकी  व्याख्या की उम्मीद की जाती है तो कार्यपालिका और न्यायपालिका की अपनी जिम्मेदारी के पालन की उम्मीद की जाती है कि जो उन्हें दायित्व संविधान की तरफ से मिली है। वह उस जिम्मेदारी को पूरा करने में कहीं चूकती नहीं है। सरकार की विभिन्न शाखाओं में मौन और टिकाऊ संबंध ना संभव है और ना अपेक्षित हैं। क्योंकि यह सत्ता के संतुलन बिगड़ने या फिर जड़ता के कारण ही संभव होता है। निर्वाचित और अनिर्वाचित  दोनों के लिए आवश्यक है धैर्य से बातों को सुनें , ताकि लोकप्रिय अपेक्षाओं और मसलों को सही प्राथमिकता प्राप्त हो सके। इस प्रक्रिया में बातचीत जरूरी है। प्रश्न उठता है कि यह कितनी उत्पादक है । यह वार्ता करने वालों  की सोच पर निर्भर करता है। लेकिन जेटली साहब बिना यह सोचे आपे से बाहर हो गए। उन्होंने अनिर्वाचित संस्थान के कार्यों को एक तरफ से अधिकार के दायरे का अतिक्रमण कह दिया। उनकी नाराजगी कितनी वाजिब है यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

Thursday, November 8, 2018

कोलकाता में बढ़ते प्रदूषण के साथ बढ़ते अपराध

कोलकाता में बढ़ते प्रदूषण के साथ बढ़ते अपराध

हाल में प्रदूषण और अपराध के संबंध में शोध से पता चलता है शहरों में बढ़ते प्रदूषण के साथ अपराध बढ़ रहे हैं। वायु प्रदूषण से सेहत को कितना नुकसान होता है यह तो सभी जानते हैं लेकिन इससे व्यवहार पर भी असर पड़ता है यह बात अभी बहुत लोग नहीं जानते। 70 के दशक में अमरीका में पेट्रोल से सीसा निकाला गया और बच्चों के  व्यवहार पर  इसका दूरगामी परिणाम हुआ। बच्चों में आवेग और आक्रामकता ,जो बहुत तेजी से बढ़ रही थी ,वह कम हो गई । सीसे के संपर्क से बच्चों में जहां आवेग और आक्रामकता बढ़ती है वहीं उनका आईक्यू घट जाता है। घटे आई क्यू के  बच्चे अपराध की ओर जल्दी प्रवृत्त होते हैं। शंघाई में किये गए शोध से पता चला कि लघु अवधि के लिए भी वायु प्रदूषण, खासकर सल्फर डाइऑक्साइड के संपर्क में आने, से मानसिक व्याधि बढ़ जाती है। यही नहीं लॉस एंजेलिस में भी एक शोध से पता चला की हवा में पार्टिकुलेट की मात्रा बढ़ने से किशोर समुदाय में आक्रामक मानसिकता बढ़ जाती है। यह अब सर्व मान्य हो गया है कि बढ़ते प्रदूषण के साथ व्यवहार में नकारात्मक परिवर्तन आता है और साथ ही यह मस्तिष्क को भी नुकसान करता है। इससे निर्णय लेने की क्षमता घट जाती है। अभी तक जो भी आंकड़े प्राप्त हुए हैं उनसे यह पता चलता है कि प्रदूषण गलत व्यवहार को बढ़ावा देता है। खासकर नौजवानों में। अमरीका के 9360 शहरों में अध्ययन से  पता चला कि वायु प्रदूषण से अपराध बहुत तेजी से बढ़ते हैं। इससे गहरी चिंता और अवसाद बढ़ता है जिसके कारण आपराधिक और अनैतिक व्यवहार में वृद्धि देखने को मिलती है। निष्कर्ष यह है के जिस शहर की हवा मैं जितना ज्यादा प्रदूषण होगा उस शहर के नौजवानों में आपराधिक प्रवृत्ति उतनी ज्यादा होगी।
अब बात आती है हमारे शहर कोलकाता की।  कोलकाता बहुत तेजी से प्रदूषण के गिरफ्त में फंसता जा रहा है ।यहां हवा की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। 2010 से 13 के बीच के आंकड़ों में देखा गया है की हवा में तैरते कणों की मात्रा में 61% की वृद्धि हुई है। खासतौर पर नाइट्रोजन की मात्रा लगभग दुगनी हो गई है ।आंकड़े बताते हैं कि   औसत कोलकाता वासी 2 से 3 गुना ज्यादा प्रदूषित हवा रोज अपने फेफड़े में भरता है ।सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट द्वारा  30 जनवरी 2016 को सम्पन्नकिए गए एक अध्ययन के मुताबिक हर कोलकाता वासी प्रदूषण की चपेट में है। गाड़ियों से निकलता ज़हरीला धुआं  एक नई चुनौती है और इससे निपटने के लिए कलकत्ते को बहुत कुछ करना होगा ।अगर कोलकाता में पिछले 2 वर्षों के अपराध के आंकड़े देखें तो पता चलेगा 31 जनवरी 2016 से अब तक यहां अपराधों की दर बढ़ी है और लगातार बढ़ रही है। खासतौर पर नौजवानों में आक्रामकता में वृद्धि पाई गई है। इसके चलते वे अपने साथियों या आसपास के लोगों पर हमले करते देखे जा रहे हैं। खासतौर पर जब जब प्रदूषण बढ़ता है तब तक महानगर में हमलों की घटना भी बढ़ती हुई देखी गई है। दुर्गापूजा,दीपावली या इसतरह के अन्य अवसरों के दौरान दर्ज अपराधों के आंकड़े इसके सबूत हैं। यह केवल मध्यवर्ग ही नहीं गरीब और अमीर दोनों वर्गों में होता देखा गया है। डॉक्टरों का मानना है कि खराब गुणवत्ता वाली हवा में सांस लेने से तनाव पैदा करने वाले हार्मोन या कॉर्टिसोल में वृद्धि होती है। इससे इंसान में जोखिम उठाने की क्षमता बढ़ जाती है। इस वजह से प्रदूषित हवा में सांस लेने से अपराध के मामले बढ़ने लगते हैं। इससे साफ जाहिर है कि अगर प्रदूषण को नियंत्रित किया जाए तो अपराध को भी किसी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो अपराध की वृद्धि का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाएगा और नगर वासियों पर जोखिम बढ़ता जाएगा। ब्रोकन विंडो थ्योरी के अनुसार अव्यवस्था और आपराधिक व्यवहार और भी अव्यवस्था और आपराधिक व्यवहार जन्म देने का कारण बनते हैं। इस से साफ पता चलता है कि प्रदूषण से सिर्फ स्वास्थ ही नहीं खराब होता या पर्यावरण पर ही उसका असर नहीं होता है बल्कि यह अपराध के रूप में एक सामाजिक समस्या भी पैदा करता है । विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के हर 10 आदमी मे से 9 लोग जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर हैं ।अभी इस बात पर शोध नहीं हो सका है प्रदूषक स्वास्थ्य को किस किस तरह से प्रभावित करते हैं। अभी अध्ययन किया जाना बाकी है कि प्रदूषण का असर लिंग, आयु ,आय वर्ग और भौगोलिक स्थिति पर क्या होता है । प्रदूषण का असर हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है ।  भविष्य में अपने समाज को अपराध या अन्य दुर्गुणों से मुक्त करना है तो हमें प्रदूषण को रोकने के लिए अपनी तरफ से पहल करनी होगी वरना आने वाले दिन खतरनाक हो सकते हैं।

Wednesday, November 7, 2018

काहे इतनी चुप्पी है भाई 

काहे इतनी चुप्पी है भाई 

अब से लगभग 2 वर्ष पहले भारत की सरजमीं पर एक सर्जिकल स्ट्राइक हुआ था । इसके लिए कहीं जश्न नहीं मनाया गया। 8 नवंबर 2016 का दिन भारतीय मौद्रिक इतिहास मैं कभी नहीं भुलाया जाने वाला दिन होगा। 8 नवंबर 2016 की शाम प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश में  घोषणा की कि 10 तारीख  से 500 रुपयों और 1000 रुपयों  के नोट रद्दी के टुकड़ों में तब्दील हो जाएंगे। इन 2 वर्षों से नोट बंदी और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं से भारत की अर्थव्यवस्था और संस्थान लगातार नकारात्मक प्रभाव से ग्रस्त रहे हैं। उदाहरण स्वरुप केंद्र सरकार का  रिजर्व बैंक और उसके गवर्नर उर्जित पटेल पर लगातार दबाव कि वह अर्थव्यवस्था में कुछ चमत्कार करें। नोट बंदी कितनी जायज है इस मामले में सरकार अधिकृत रूप से कुछ नहीं कह रही है।  यहां यह चर्चा करना उचित है कि नोट बंदी के पीछे क्या कारण थे । प्रधानमंत्री ने अपनी घोषणा में 3 लक्ष्यों का जिक्र किया । पहला था, भ्रष्टाचार तथा काले धन की कमर तोड़ देना, दूसरा था जाली नोटों के चलन को खत्म कर देना और तीसरा था आतंकवाद को मिलने वाले धन का स्रोत समाप्त कर देना। 9 नवंबर को गजट में यही 3 लक्ष्य बताए गए थे । लेकिन उसमें भ्रष्टाचार का जिक्र नहीं था। सरकार ने नोट बंदी को बहुत महत्त्व दिया और उसे कुछ इस तरह पेश किया कि लगता था भारतीय अर्थव्यवस्था में चमत्कार हो जाएगा। अब जैसे यह सुनकर हैरत होती है कि प्रधानमंत्री ने कहा  कि इसका  उद्देश्य जाली नोटों के चलन को समाप्त करना और आतंकवाद को मिलने वाले धन के स्रोत को बंद कर देना है। लेकिन अब कौन बताए कि काला धन समाप्त होने के साथ यह दोनों खुद ब खुद समाप्त हो जायेंगे। यानी उपरोक्त दो लक्ष्य काले धन की समाप्ति से ही जुड़े हैं। यही नहीं, सरकार का कहना था कि  500 रुपयों और हजार रुपयों के जाली नोट खत्म हो जाएंगे ,लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। साथ ही ₹2000  रुपयों  के नए नोट जो छपे उनमें  भी कुछ ऐसा नहीं था कि उनकी नकल न बनाई जा सके। 2000 रुपयों के  जाली नोट बहुत बड़ी संख्या में पिछले साल ही  पकड़े गए और उसके बाद से जाली नोट लगातार पकड़े जा रहे हैं। जहां तक आतंकवाद के खात्मे का प्रश्न है तो वह सिर्फ एक जुमला है ।  विशेषज्ञ जानते हैं कि आतंकवाद बहुत सीमित संसाधनों के बल पर चलता है और 2016 से अब तक इसमें कमी नहीं आई है।
        अब इसका मुख्य उद्देश्य ही बचता है कि बाजार चलने वाले 86% 1000 रुपयों और 500 रुपयों के नोटों का चलन बंद कर देने से काला धन समाप्त हो जाएगा। सरकार के महाधिवक्ता ने नोटबन्दी पर दायर एक मुकदमें में सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी थी कि  इस सरकार का मानना था कि एक तिहाई नोट बैंक में नहीं लौटेंगे परिमाणतः  नोट के बंद करने से काला धन खुद ब खुद समाप्त हो जाएगा। लेकिन जितने नोट छापे गए थे उनका 99.2% बैंकों में लौट आया। हां, यह स्पष्ट है कि ईमानदार लोग जो नोट लौटाने की कतार में खड़े थे उनसे ज्यादा बेईमान लोग थे। उन्होंने अपनी रकम जमा कराने की कई विधि खोज ली थी।  रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने सरकार को सलाह दी थी कि नोट बंदी से कोई उपलब्धि नहीं होगी और कर चोरों का गिरोह अपनी रकम को जमा करने तरीके खोज लेगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने उनकी सलाह नहीं मानी और प्रधानमंत्री कार्यालय ने खुद यह फैसला किया। परिणाम यह हुआ कि काले धन का पूरा भंडार सफेद हो गया। 
केवल काला धन सफेद नहीं हुआ  बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी इसके दुष्प्रभाव हुए। 2016 के नवंबर में तो हर आदमी जो सरकार का समर्थक था वह नोट बंदी के बारे में सुनने को तैयार नहीं था। लेकिन अब  हर कोई मान रहा है कि विकास दर पर इसके नकारात्मक प्रभाव पड़े हैं। विपक्ष का दावा है कि इससे विकास दर लगभग 2% कम हो गई है लेकिन सरकार का कहना है कि यह गलत है । विकास दर में गिरावट जरूर हुई है पर वह तात्कालिक है और जल्दी ही उसे ठीक कर लिया जाएगा।  विशेषज्ञों  का मानना है कि 2016 में जनवरी से सितंबर के बीच लगभग विकास दर 7.9% थी जो कि नोटबंदी के बाद घटकर 5.7% हो गई। अगर इस आंकड़े को मानें तो इस साल लगभग अर्थव्यवस्था में 2.55 लाख करोड़ की कम वृद्धि हुई है। यही नहीं, नोट बंदी से सबसे ज्यादा प्रभाव रोजगार पर पड़ा है निवेशकों के पास धन नहीं था और बैंक खाली थे इससे असंगठित क्षेत्र में भारी छटनी हुई।  बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो गए । सबसे ज्यादा प्रभाव निर्माण क्षेत्र पर पड़ा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर टूट गई। क्योंकि यह पूरी अर्थव्यवस्था खेती पर आधारित है और खेती के लिए धन नहीं मिल सका । लघु और मझोले उद्योग भी प्रभावित हुए। रियल एस्टेट क्षेत्र में भी अच्छा खासा प्रभाव पड़ा। क्योंकि, इनमें अधिकतर काम नगदी के बल पर होता है लिहाजा पूंजी के अभाव में बड़ी संख्या में कारोबार बंद हो गए। आंकड़ों को अगर मानें तो लगभग 15 लाख रोजगार खत्म हो गए और यह सब सामान्य होने में कई वर्ष लग जाएंगे।
    यही नहीं नोट बंदी से सरकार की आमदनी पर भी असर पड़ा । हालांकि रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में बताया गया है कि नोटबंदी के बाद सरकार को 16000 करोड़ का लाभ हुआ। लेकिन नोटों की छपाई और बैंकों के एटीएम को ठीक करने में हुए खर्च से सरकार को भारी हानि हुई ।बैंक अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते  हैं।  सरकार ने नोट बंदी के दौरान कहा था कि इससे बैंकों की दशा सुधरेगी लेकिन उसके बाद बैंकों की हालत खस्ता हो गई। नहीं लौटाए  जाने वाले कर्ज में वृद्धि हुई है और ब्याज बढ़ने से कारोबारी कर्ज लेने में दिलचस्पी  नहीं दिखा  रहे हैं । दूसरी तरफ, जो नोट बैंक में लौट आए उन पर बैंकों को ब्याज देना पड़ता है , इससे बैंकों का खर्च बढ़ गया है। यही  कारण है कि बैंक अपना खर्च पूरा करने के लिए ग्राहकों पर तरह -तरह के शुल्क लगा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बैंकों की दशा सुधरने में अभी समय लगेगा। यही नहीं, सरकार का दावा है कि नोटबंदी के बाद महंगाई कम हुई है लेकिन लेकिन बाजार के अनुसार महंगाई घटी नहीं है। उल्टे कर्ज माफी के कारण सरकार पर जो आर्थिक दबाव पड़ा है उससे महंगाई और बढ़ने की आशंका है।
    अलबत्ता नोटबंदी के कारण डिजिटाइजेशन एक बड़ी उपलब्धि हुई ।  नोटबंदी की इस उपलब्धि को प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश शामिल नहीं किया। यह तो उन्हें राह चलते मिल गई ।जिन उपलब्धियों को उन्होंने लक्ष्य बनाया था वह प्राप्त नहीं हो सकी। अब सरकार की तरफ से इस बारे में किसी प्रकार का उत्तर नहीं दिया जा रहा है । चारों तरफ चुप्पी है।

Tuesday, November 6, 2018

आत्म का विस्तार है दीपावली

आत्म का विस्तार है दीपावली


वैदिक काल से मनुष्य के भीतर अंधकार का भय व्याप्त है और इसलिये वेदों में सबसे ज्यादा प्रकाश का ही उल्लेख है। सर्वादिाक प्राचीन ऋग्वेद में सबसे अधिक प्रकाश पर ही लिखा गया है। यथा, सा व्युच्छ सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसुनृते (अ.19,खंड3 श्लोक6 ) अर्थात हे, उषा आप हमें भरपूर धन और हमारे अंधेरे (प्राकृतिक और अज्ञान रूप दौनों) को नष्ट करने की कृपा करें। ऋग्वेद में ही उल्लेख है कि महर्षि भृगु ने अग्नि का संधान किया - इद्रं ज्योति: अमृतं मर्तेषु। यही नहीं, "सूर्यांश संभवो दीप:" यानी दीप सूर्य का अंश है।  इससे ऐसा प्रतीत होता है कि ज्योतिर्मयता  हमारी चिरंतन प्यास है इसी की तुष्टि के लिये दीप की व्यवस्था हुई। दीपावली इन्हीं दीपों की पंक्तिबद्ध संरचना है , समूहबद्धता का लालित्य है और पंक्तिबद्धता में जो लय है वही तो धरा की उजास है। दीपावली की पौराणिक कथा है कि लंका विजय के बाद जब श्रीराम अयोध्या लौटे तो नगरवासियों ने दीपों की माला सजा दी। लेकिन यहां भी एक दर्शन है। दीपावली समाज और व्यक्ति के कुरूप पक्षों का नवीन रुपांकन है। अयोध्या के वासियों- चाहे वह किसी भी वर्ग का हो- ने दीप जलाये। यहां दीपों की भीड़ नहीं एक ज्यामिति थी और इसमें प्रकृति के अनेक रूप , रस , रंग ओर नाद थे। छांदोग्य उपनिशद में कहा गया है कि प्रकृति सर्वोत्तम प्रकाशरूपा है। हमारी राष्ट्रीय संस्कृति प्रकाशोन्मुख है। यही कारण है कि हमारे ऋषियों अंधकार से प्रकाश में जाने की बात कही है।हमारे देव प्रकाशवाची हैं इसलिये सूरज देव हैं और चांद की भी पूजा होती है क्योकि वह भी अंधकार से संघर्ष करता है।कहा जाता है कि शरीर पंचमहाभूतों- क्षिति, जल ,पावक, गगन, समीरा, - से निर्मित है और भी इसी से रचा गया है। दीपक पिंड से ब्रह्मांड के संयोजन का प्रतीक है। 


    यही नहीं अमावस की रात दीपावली का भी एक विशिष्ट वैदिक महत्व है। आरंभ में दीपक अंधकार को पराजित करता है उसी दिन से प्रकाश बड़ने लगता है और अंधेरा हारने लगता है। यह क्रम पूर्शिमा तक पूर्णिमा तक चलता रहता है और उसके बाद अंधकार से संघर्ष और उसे पराजित करने की प्रेरणा देकर चांद चला जाता है एक पखवाड़े के लिये। हर वर्ष दीपावली हमारी सफलता का पर्व है। सफलता ही लक्ष्मी है। लक्ष्मी का आसन कमल है और पंक में रहते हुये भी उससे अछूता रहता है यानी अकर्मण्यता से ऊपर उठकर कर्म करने वाले के यहां ही लक्ष्मी विराजती है।   


 प्रश्न है कि राम के आगमन पर दीपक ही क्यों जलाये गये? क्योंकि प्रकाश हमारे भीतर एक विशेष अनुभूति देता है। कृष्ण के विराट रूप को देखकर अर्जुन के मुंह से निकला था, दिव्य सूर्य सहस्त्रांणि। भारतीय संस्कृति का विराट प्रकाशरूपा है प्रकाश स्वयं में दिव्यता है और भगवान राम के आगमन पर यह दिव्य अभिव्यक्ति हुई थी। यहां एक तथ्य गौण है और वह है छाया, अंधकार का पारभासक अस्थाई स्वरूप। छाया बुराई की नीविड़ता नहीं है। राम ने जब नगर में प्रवेश किया होगा तो झिलमिलाती दीपमालिकाओं के प्रकाश में उनकी छाया तो जरूर बनी होगी जो उनके साथ - साथ चल रही होगी। उसपर किसी ने ध्यान नहीं दिया।छाया यानी प्रकाश में अंधकार की उपस्थिति। यह प्रकाश के मार्ग आयी बाधा का निरुपण है।यह तबतक नहीं समाप्त हो सकता जब तक वहा भौतिक अस्तित्व प्रकाश के केंद्र में ना अवस्थित हो जाय। हमारे ऋषियों ने तमसो मा ज्यातिर्गमय: तो अवश्य कहा लेकिन छाया से मुक्त होने की साधना नहीं बतायी। यद्यपि इसमें ज्योति ज्ञान का प्रतीक है। छांदोग्य उपनिषद में इस छाया को सामाजिक समस्या के रूप में निरूपित किया गया है। सामाजिक समस्या के तीन कारण बताये गये हैं वे हैं, अज्ञान ,अन्याय और अभाव। किसी भी देश और काल में ये उपस्थित रहेंगे और इनका शमन केवल ज्ञान से ही हो सकता है।   


 दीपावली मानव के प्रकाश अभीप्सु संस्कृति के लघु और विराट का समन्वयन है। दिया लघु है और दीपावली  लघुता का सम्मान है। दीपक मनुष्य की कर्मशक्ति का तेजोमय प्रतीक है। हमारे भावों का द्योतक और अनागत का संकेत है। 


    रूक्षेर्लक्ष्मी विनाश: स्यात श्वेतेरन्नक्ष्यो भवेत 


   अति रक्तेशु युद्धानि मृत्यु: कृष्ण शिखीशु च


 दीपावली अंधेश्रे पर विजय का असीम उल्लास है, पराजित अमावस का उच्छावास है और मनुष्य के चिर आलोक पिपासा के लिये आलोक वर्षा है। प्रकृति में प्राश और अंदाकार का संतुलन है। इसीलिये कहते हैं कि " जड़ - चेतन गुण - दोष मय विश्व कीन्ही करतार। " प्रकृति के इस द्वैत गुण को दुनिया के लगभग सबी पाणियों ने स्वीकार कर लिया परंतु केवल मनुष्य एक ऐसा प्राणि है जिसने प्रकृति के अंधकार को चुनौती दी और और उजाले की सृष्टि का प्रयास किया। उजाला यानी आलोक चेतना है , कर्मण्यता है और इसीकारण आलोक वरेण्य है।यही कारण है कि प्रकाश की इच्छा मनुष्य में आरंभ् ा से रही है और पत्थर रगड़ कर अग्नि स्फुलिंग उत्पन्न करने से लेकर आज परमाणु प्रदीप तक मनुष्य की प्रकाशयात्रा का प्रमाण है। 


     दिपावली से संलग्न भौतिक तत्वों के उपयोग की परम्परागत शैली अब समाप्त हो चुकी है तथा यह त्योहार चूंकि लक्ष्मी के पूजन से आरंभ होता है इसलिये बाजार इसपर हावी हो गया। यद्यपि बाजार का असर लगभग सबी त्योहारों पर पड़ा है परंतु दीवाली कुछ ज्यादा ही प्रभावित हो गयी है। इससे अपने देश के बाजार को ही नहीं विदेशी बाजारों को भी लाभ हो रहा है। उदाहरणस्वरूप चीन के बाजार। वहां की बनी लक्ष्मी गणेश की लघु प्रतिमाये इन दिनों आम हो गयीं हैं। बधाई संदेशों के लिये मोबाइल - स्मार्टफोन से से संदेश के चलते उनकी वहाक कम्पनियों को प्रचुर लाभ होता है। लक्ष्मी अर्थात धन और दीपावली लक्ष्मी का पूजन है परंतु ज्ञाान की आलोक यात्रा का श्रीगणेश भी है और यही कारण है कि लक्ष्मी के साथ गणेश भी पूजे जाते हैं। दीपावली का देश के सभी भागों में आयोजन और लक्ष्मी गणेश का पूजन यह संकेत तेता है कि   धन ही सब कुछ नहीं है बल्कि इसकी रक्षा के लिये साहस और मानसिक दृ्ढ़ता के साथ - साथ सामाजिक एकता भी जरूरी है। दीपावली यह बताती है कि मनुष्य के मन कामनाओं के साथ- साथ ज्ञान का वास होना भी आवश्यक है ताकि हम अपब्नी संवेदना से दूसरों के दुख जान सकें। इसीलिये ईश्वर ने मनुष्य को धन के साथ विचार भी दिया है। मनुष्य दुनिया का सर्वादिाक विचारशील प्राणी है अतएव दिवाली बताती है कि मनुष्य आत्मुग्धता के अंधियारे से बाहर निकले और सम्वेदना का दीपक प्रज्वलित करे।