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Thursday, March 23, 2017

बिन पानी सब सून

बिन पानी सब सून 
पानी पर और जल स्रोतों के विकास पर बहुत कुछ कहा जा चुका है। कई लोगों ने तो यह भी कहा है कि अगला विश्व युद्ध जल के लिए ही होगा। लेकिन यह सुन कर हैरत होगी की देश 12 पंचवर्षीय योजनाएं गुजर गयीं और विकास के बड़े- बड़े दावे किए गए पर आज भी देश के गांवों में लगभग साढ़े 6 करोड़ आबादी को पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता है।" वाइल्ड वाटर, स्टेट ऑफ़ थे वर्ल्ड वाटर 2017 " की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 6.34 करोड़ आबादी को पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता। यह सुन कर हैरत हो सकती है कि पंजाब , हरियाणा, उत्तराखंड की समग्र आबादी आस्ट्रेलिया, स्वीडन , श्रीलंका और बुल्गारिया की कुल  आबादी से ज्यादा है। "वाटर एड इंडिया " के अनुसार देश के 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 27 ऐसे राज्य हैं जो महाविपदा प्रवृत्त हैं जहां हाशिये पर रहने वाले लोग घनघोर मौसमी दुर्घटनाओं या भरी मौसमी बदलाव के सबसे ज्यादा शिकार हो सकते हैं, उनके लिए इसे झेलना बहुत कठिन हो सकता है। क्या दुर्भाग्य ही कि " शस्य श्यामलां मातरम " का गीत गाने वाले इस देश की 67 प्रतिशत आबादी गाँव में रहती है और जिसमें 7 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिन्हें पीने का साफ़ पानी नहीं मिलता। देश के ये सात प्रतिशत भयानक मौसमी दुर्घटनाओं के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। वैसे आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के गरीब लोग ही मौसमी कोप के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। 6 फरवारी 2017 को राज्यसभा में प्रस्तुत पेय जल स्वच्छता मंत्रेअले की रिपोर्ट में कहा गया है कि  ग्रामीण भारत के 16 करोड़ 78 लाख घरों में से महज 2 करोड़ 69 लाख घरों में ही पीने का पानी पाइप के माध्यम से उपलब्ध है। रिपोर्ट के अनुसार 17 लाख घरों को राष्ट्रीय ग्रामीण योजना के तहत पेय जल मुहैय्या कराया जाता है। इनमें से 13 लाख घरों प्रचुर जल दिया जाता यानि उन्हें एक दिन में 40 लीटर पानी दिया जाता है। सरकार के प्रचुर पेय जल की माप है प्रति घर को रोजाना 40 लीटर , यानी दो बड़ी बाल्टी , पीने का पानी। 3 ला\कह 30 हज़ार 86 घरों को इससे काम पानी मिलता है और 64094 घरों को साफ़ पानी नहीं मिलता है।  20 मार्च 2017 को राज्य सभा में यह जानकारी दी गयी है। लोक सभा में 16 मार्च 2017 को दिए गए उत्तर के अनुसार 19720 ग्रामीण घरों में जो पानी उपयोग में लाया जाता है उसमें बहुत ज्यादा आयरन है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पेय जल में आयरन की ज्यादा उपस्थिति स्वांस प्रणाली की खराबियों को जन्म देती हैं। पेय जल में आर्सेनिक की मौजूदगी से कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं। देश के गाँव में 30 प्रतिशत घरों में उपयोग में लाया जाने वाले  पानी  में आर्सेनिक पाया गया है। ग्रामीण आवासों की बात दूर हमारे महानगर कोलकाता तथा आस पास के इलाकों मानें पानी में आर्सेनिक पाए जाने की रपटें आ चुकी हैं। 
सरकार की योजना है कि चालू वर्ष के अंत तक देश के आधे ग्रामीण घरों में पाइप के जरिये पीने के पानी की व्यवस्था कर दी जायेगी और 35% घरों में तो नल लगवा दिए जाएंगे। 2022 तक 90% घरों में पाइप के जरिये पानी आपूर्ति की योजना है। वैसे भी देश में आबादी बढ़ने के कारण जल की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घटती जा रही है। एक आंकड़े के मुताबिक 2001 में देश में प्रति व्यक्ति जल की वार्षिक उपलब्धता 1820 घन मीटर थी  जो 2011 में घाट कर 1545 घन मीटर हो गयी। इस अवधि में भारत की आबादी में 17.6% वृद्धि हुई। आबादी 2001 के 102 करोड़ से बढ़ कर 2011 में 121 करोड़ हो गयी। पर्यावरण मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 2022 में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता  1341 घन मीटर हो जाने की आशंका है। यानी जल्दी ही जल की आपूर्ति और मांग में भारी अंतर आने की आशंका है।  काम वर्षा के कारण देश के बड़े जलागारों में पानी कम होता जा रहा है। देश जल संकट की ओर बढ़ रहा है और सरकार निरुपाय सी दिख रही है। इसके साथ ही पर्यावरण परिवर्तन की मार को झेलने के अपर्याप्त साधन इस पीड़ा को और बढ़ा देंगे।

Wednesday, March 22, 2017

अयोधया विवाद अब कोर्ट से बहार

अयोध्या विवाद अब कोर्ट के बाहर 

सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जे एस खेहर की पीठ ने विचार व्यक्त किया है कि बाबरी मस्जिद - राम मंदिर का विवाद अदालत के बहार सुलझालिया जाय और इसके लिए अदालत ने मध्यस्थता करने की पेश काश भी की है। अदालत के इस विचार से एक नया विवाद पैदा हो गया है। अयोध्या या बाहर के जो लोग चाहते थे कि यह मसला सुलझ जाय उनमे एक नयी आशा जगी है क्योंकि यह विवाद अतीत में कई दंगों का कारण भी बन चुका है। भा ज पा सांसद सुब्रमनियम स्वामी की दलील पर सुनवाई  करते हुए अदालत ने यह विचार ज़ाहिर किया। इस पीठ में  प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति खेहर के अतिरिक्त न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और एस के कौल भी शामिल थे। सुब्रमिनियं स्वामी ने दलील दी थी कि इस मसले पर तुरंत सुनवाई की जाय। अदालत ने कहा कि " यह मसला धर्म और भावनाओं से जुड़ा है । यह ऐसा मसला है जिस पर सभी पक्ष बैठ कर सह्माती से कोई निर्णय कर सकते हैं। ऐसे मसले साझा तौर पर बेहतर ढंग से सुलझाए जा सकते हैं। सभी एक साथ बैठ कर आपस में विचार कर लें।" 2010 में इस मसले को अदालत के बाहर सुलझाने की पेशकश की गयी थी जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने ठुकरा दिया था और उच्च न्यायालय  को आदेश दिया था कि वह इसपर निर्णय दे। सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि दोनों पक्षों में विश्वास का अभाव है और भारी मतान्तर है। यह पहला मौका नहीं है जब इस तरह के समाधान पर बात हो रही है। अब यह कितना दिलचस्प है कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने आपसी समझौते से मामला सुलझाने का सुझाव दिया है जबकि दोनों पक्ष कोर्ट का फैसला मानने का वादा कर चुके हैं । यहां अदालत के कथन का वक्त और इस समस्या के समाधान पर जिस तरह से इसने बहस की शुरुआत कर दी है वह बड़ा महत्वपूर्ण है। भ ज पा की यू पी में भारी विजय के बाद अभी गोरखपुर के गोरखनाथ मठ के महंत योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ही ली है । आदित्य नाथ तो अर्से से कहते आ रहे हैं कि " मंदिर वहीं बनाएंगे। " कहा तो यह जाता है कि गोरख नाथ पीठ के पूर्व महंत योगी दिग्विजयनाथ ने 1949 में जिस जगह पर विवाद है वहाँ एक धार्मिक कार्यक्रम करवाया था और उस कार्यक्रम में चमत्कारिक रूप से रामलला की प्रतिमा प्रकट हुई थी। कहते तो लोग यह हैं कि उस समय खुद रामलला प्रगट हो गए थे। 1990 में आडवाणी जी की रथ यात्रा से मोदी जी बहुत करीब से जुड़े हुए थे , इसके बाद कई दंगे हुए और आखिर में 6 दिसंबर 1992 को वह ढांचा ही ध्वस्त हो गया। 
जैसी की उम्मीद थी, भा ज पा के नेता, केंद्र के मंत्री और यू पी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन का स्वागत किया है। केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने कहा है कि यह अवलोकन राष्ट्र के हित में है। हम तो राम मंदिर का मसला सदा संविधान के माध्यम से सुलझाने के तरफदार रहे हैं और अदालत का यह अवलोक स्वागत के योग्य है।" मुख्य मंत्री आदित्य नाथ ने भी इसका स्वागत किया है और सहयोग की पेशकश की है। उन्होंने कहा है कि " यदि दोनों पक्ष बैठने का निर्णय करें और किसी सहमति पर पहुंचे तो समाधान हो सकता है। राज्य सरकार जो जरूरी होगा करेगी। " इधर अब तो दिल्ली में और लखनऊ में  बहा ज पा की सरकारें हैं और अब इसके समर्थक राम मंदिर बनाने के लिए भारी दबाव दे रहे हैं। इन सब के बावजूद यहाँ एक शब्द है " सहमति " उसी के ही  आधार पर शान्ति पूर्ण समझौता हो सकता है।   अब जहां तक सहमति का सवाल है उसकी मुखालफत शुरू हो चुकी है।बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के जफरयाब जिलानी का कहना है कि कोतबा ने सिर्फ कहा ही तो है फैसला थोड़े ही दिया है। भा ज पा ढोल पीते ही जा रही है। जिलानी ने कहेगा कि कई बार कोशिशें हुई हैं पर कामयाब नहीं हो सकीं। जिलानी ने ब्यौरा दिया की 1986 में कांची काम कोटि के शंकराचार्य ने मौलाना अली मियाँ से मुलाकात की थी , इसी सिलसिले में 1990 में चंद्रशेखर ने भी मुख्यमंत्रियों के एक कमिटी बनायी थी। 1992 में नरसिंह राव नेभी कोशिशें की थीं। जिलानी ने कहा कि 2003 में अयोध्या , मथुरा और वाराणसी की मस्जिदों को छोड़ देने की मांग की गयी थी। जिलानी ने कहा कि "हम्मस्जिद कैसे छोड़ सकते हैं।" हालांकि अन्य मुस्लिम नेताओं का रुख सकारात्मक दिख रहा है। मलाणा कल्बे सादिक ने कहा कीकोई ऐसी राह निकाली जय जिससे दो नो पक्षों को आघात ना लगे, खून खराबा न हो। मौलाना खालिद रशीद फिरंगीमहली का कहना है कि " कोई मुसलमान नहीं चाहता कि राम मंदिर ना बने लेकिन बाबरी मस्जीद भी तो बनानी चाहिए।"  अयोध्या में भी लोग अदालत के बहार फैसले का समर्थन कर रहे हैं। महंत ज्ञान दस ने कहा कि हम पहले से ही ऐसा चाहते हैं। अब सवाल है कि दोनों पक्ष बैठें और सहमति  हो तो कुछ बात बने।

Tuesday, March 21, 2017

योगी और मोदी : संघ के दो चेहरे

योगी और मोदी : संघ के दो चहरे 
कई साल पहले महानगर के साल्ट लेक इलाके में योगी आदित्य नाथ से मुलाकात का ब्यौरा सन्मार्ग में प्रकाशित  हुआ था। वे हिंदुत्व के कट्टर योद्धा के तौर पर ख्याति प्राप्त कर चुके थे और दिल्ली के तखत पर नरमपंथी अटल बिहारी वाजपेयी थे। वे सबको साथ लेकर चलना चाहतेथे जबकि गेरुआ वस्त्र धारी योगी इस खाके में कहीं फिट नहीं बैठते थे। भारतीय राजनीति में उनकी भूमिका के बारे में पूछे गए सवाल के बारे में उन्होंने कहा था कि " हिन्दू धर्म की रक्षा और राम मंदिर बनेगा और अयोध्या में ही बनेगा।" अब वे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री हैं लेकिन दिल्ली दरबार की नीरसता और " गोरखपुर" की कट्टरता अभी भी बानी हुई है । उत्तर प्रदेश की भारी विजय के दूसरे दिन प्रधान मंत्री ने कहा था कि " सरकार बहुमत से बनती है पर सहमत से चलती है।" इसके बाद उन्होंने अपना वही नारा दोहराया जो चुनाव बार लगाते रहे हैं- " सबका साथ सबका विकास।" यह एक नेता की टिपण्णी थी। इसके लागभे हफ्ते भी बाद जब योगी को मुख्य मंत्री नियुक्त किया गया तो लखनऊ में नारे लगे कि " यू पी में रहना होगा तो योगी-योगी कहना होगा।" दिल्ली के मोदी मन्त्र और लखनऊ के " गोरख पुर मॉडल " के बीच की खाई बहुत चौड़ी नहीं है।" प्रकारांतर से दोनों ने बहुमत की ही बात कही है और इसमें राज्य की आबादी के " 18 प्रतिशत" के हिस्से को पूरी तरह नज़रंदाज़ कर दिया गया है। यू पी में विजय मोडियो ब्रांड के कारण मिली। यह एक ऐसा ब्रांड है उम्मीद और विकास का आश्वासन देता है लेकिन इस ब्रांड का विश्लेषण " अच्छे दिन" वाले नारे के सन्दर्भ में किया जाना जरूरी है खासकर जो लोग विपक्षियों के  भ्रष्ट और  बुद्धिहीन कामकाज से ऊब चुके थे।" यू पी में जो हुआ वह केवल परिवर्तन के  लिए नहीं हुआ बल्कि यह हिंदुत्व सोच की ताकत की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी।" संघ का आदर्श भी तो यही है। इस सन्दर्भ में ज़रा उस अंदाज़ को तो याद करें जिस अंदाज में प्रधानमन्त्री जी ने " श्मशान - कब्रिस्तान" की बात की थी यह अमित शाह का अंदाज़ देखें जिस अंदाज में उन्होंने"कसाब" का ज़िक्र किया था। कुछ लोग दलील दे सकते हैं कि कांग्रेस और सपा गठबंधन या बसपा ने भी तो मुसलमानों या कहें अल्पसंख्यकों सर वोट मांगे थे पर उस सन्दर्भमें यह देखने की ज़रुरत है कि तब हिन्दू प्रतिध्रुवीकरण  भी तो चल रहा था- इसके साथ इसके साथ यादवों और जाटवों के वोट भी तो जुड़ रहे थे। एक तरह से इस चुनाव में हिन्दू एकजुटता और जादव , मुस्लिम और जाटवों  के ध्रुव केबीच का मुकाबला था। यह एक बदरंग हकीकत है जो विकास के परदे में छिपी है। इसमें मोदी मन्त्र का वह अर्थ कहाँ  है जो सबको बराबर अवसर प्रदान कर नए भारत का निर्माण करना चाहता है। कहा तो यह जा रहा है कि प्रधान मंत्री पहली पसंद मनोज सिन्हा थे , जिन्होंने केंद्रीय मंत्री के तौर पर अपनी प्रशाशनिक क्षमता को सिद्ध भी किया है, लेकिन इस कथन की पुष्टि संभव नहीं है। चर्चा गर्म तो इस बात की है कि आर एस एस ने प्रधान मंत्री के फैसले को अमान्य कर दिया और घुड़की दी कि तीन सौ से ज्यादा सीटें पाने के बाद भी यदि पार्टी अपनी वैचारिक विशिष्टा नहीं कायम रख सकती है तो कब ऐसा करेगी? इस विचार धारा का योगी से बेहतर कौन प्रतिनिधित्व कर सकता है ? ये तो बताने की ज़रुरत नहीं है कि यू पी में भा  ज पा - संघ के अत्यन्त मशहूर काडरों में से योगी एक हैं। हो सकता है मोदी- योगी का द्वैतवाद संघ को रास आता हो कि एक आदमी दिल्ली में बैठ कर सबके विकास की बात करता है तो दूसरा लखनऊ में हिंदुत्व की सांडी में अपनी खिचड़ी अलग पकाता है। योगी का चयन कर संघ ने एक बड़ा जोखिम तो लिया ही है, लेकिन यह जोखिम पूरा साधा सधाया है। योगी के चयन के घंटे भर के भीतर ही मोदी टी वी पर दिखे। कड़क कुर्ता और जैकेट में वे एकदम स्मार्ट लाग रहे थे। वे अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिना रहे थे । इसी दौरान  यहां कोलकता में जब यू पी के एक वरिष्ठ विद्वान् से मोदी के चयन के बारे में राय मांगी गयी तो उसने कहा कि यह गलत हुआ है और जब वोट दिया गया था तो ऐसा सोचा भी नहीं गया था। उत्तर प्रदेश में इस टिपण्णी का कोई मूल्य नहीं है । यू पी में भा ज पा को वोट देने वाले खुश हैं क्योंकि पार्टी ने उन्हें हिदुत्व की सियासत की घुट्टी पिलाई है। लेकिन बहुतों को याद होगा कि मोदी ने 2014 में जो भारी विजय हासिल की थी उसका कारण हिन्दू कट्टर वोटों से उनका आगे निकल जाना। 2002 के कट्टर हिन्दू की छवि के ऊपर सुशासन की छवि गढ़ने वाले नरेंद्र मोदी ने नौजवानों के जिस समुदाय में आशा जगायी  वह तबका जाति वगैरह नहीं  मानता था। नौजवान गुजरात के दंगे को भूल चुके हैं पर जिस अंदाज में योगी बोलते हैं वह अंदाज़ लोगों को याद है।नौ जवानों का वह समुदाय रोजगार चाहता है, विकास चाहता है , शांति चाहता है। वह लव जिहाद नहीं चाहता, भड़काऊ भाषण नहीं चाहता है । देश के सबसे महत्वपूर्ण प्रान्त के मुख्य मंत्री के रूप में योगी की नियुक्ति से 2002 के जिन्न को जगा दिया गया है। क्या यही पार्टी का भाविष्य है या बहुलतावादियो का उन्माद पुरानी खुन्नस को मिटाना चाहता है और हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाहता है। योगी के पद संभालने के बाद बाज़ार में उनके विवादास्पद भाषणों के कई वीडियो आये । योगी समर्थकों का कहना है कि उन्हें एक अवसर मिलना चाहिए क्योंकि उन्होंने चार चार बार संसदीय चुनाव जीते हैं। लेकिन क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि योगी जी ने अपने भड़काऊ भाषणों के आधार पर ही चुनाव जीता है और देश के सबसे बड़े राज्य की कमान के लिए उनका चयन जोखिम भरा है। लेकिन इस जोखिम में रख चालाकी ज़रूर है। भा ज पा नें योगी के माध्यम से 2019 में खुद को मीडिया में स्थापित कर लिया। अगर वे कुछ भड़काऊ करते हैं तो मीडिया में भा ज पा छा जायेगी, और विकास की दिशा में वे कुछ कर बैठते हैं तो यह पार्टी के लिए बोनस होगा।

Monday, March 20, 2017

योगी के सामने चुनौतियाँ

योगी के सामने चुनौतियाँ 
योगी आदित्य नाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए।उत्तर प्रदेश जितना विशाल है वहां की समस्याएं भी उतनी जटिल हैं। आबादी के मामले में यहां की 20 करोड़ की आबादी ब्राज़ील से ज्यादा है और अर्थ व्यवस्था के तौर पर यह क़तर से पीछे है जिसकी आबादी महज 24 लाख है। योगी जी को कई जटिल समस्यायों का मुकाबला करना होगा। उत्तर प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद ( जी डी पी ) कीनिया के समतुल्य है और बाल मृत्यु दर मॉरीटानिया के समतुल्य है। ये दोनों पश्चिम अफ्रिका के बेहद गरीब मुल्क हैं। भा ज पा को यहां 403 में से 312 सीटें मिली हैं। लेकिन यहां विकास के मानक बेहद खराब हैं और इसे सुधारने के लिए सरकार को बहुत कुछ करना होगा। भा ज पा का लोककल्याण संकल्प पत्र - 2017 में जो वायदे किये गए हैं उसके मुक़ाबिल सरकार के सामने 6 प्रमुख समस्याएं हैं। यहां की सबसे बड़ी समस्या है प्रसव के दौरान महिलाओं की  मृत्यु दर और बाल विकास दर। यहां प्रसव के दौरान मारने वाली महिलाओं की तादाद देश में सबसे ज्यादा है और जनम लेने वाले आधे बच्चों का विकास अवरुद्ध है।देश के सबसे बड़ी आबादी वाले इस प्रदेश में स्वास्थ्य पर प्रेअति व्यक्ति खर्च फकत 452 रूपए है जो देश के सामान्य औसत से 70 % काम है। राष्ट्रिय परिवार स्वस्थ सर्वेक्षण 2015-16 के मुताबिक आधे बच्चों को सारे टीके नहीं लगते , प्रसव के दौरान हर एक लाख महिलाओं में से 258 की मृत्यु हो जाती है और 1000 में 64 बच्चे जन्मते ही मरे जाते हैं।राज्य में जितने विशेषज्ञ डाक्टरों की ज़रुरत है 84 प्रतिशत डॉक्टर वहाँ काम हैं और स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या ज़रुरत के मात्र 19.9 % है।उत्तर प्रदेश के 46.3 प्रतिशत बच्चों का विकास अवरुद्ध है। 17.9 प्रतिशत बच्चों का वज़न ऊंचाई से कम है। 39.5% बच्चे वजन सामान्य से कम है। पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में कहा है कि हर गाँव में प्राथमिक उप केंद्र खोले जाएंगे।उन उओ केंद्रों में सभी आधुनिक औज़ार और तकनीक रखे जाएंगे। राज्य में 25 मेडिकल कालेज और हर 6 प्रखंडों पर स्पेशलिटी अस्पताल खोले जाएंगे जो एम्स के समतुल्य होंगे। राज्य को पांच वर्षों में कुपोषण मुक्त राज्य बना दिया जायेगा। यह तो आने वाला समय बतायेगा की योगी जी और मोदी जी मिल कर इन वायदों को कितना कामयाब कर पाते हैं।
जहां तक शिक्षा का प्रश्न है प्रान्त में शिक्षा के एकीकृत जिला सूचना प्रणाली के अनुसार 83.1% प्रतिशत बच्चों के नाम प्राइमरी कक्षाओं में लिखे गए हैं , यह देश में सर्वाधिक है लेकिन कक्षाओं में उपस्थिति सबसे कम है। सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या है शिक्षा का लाभ और छठे क्लास से ऊपर नामांकन के घटती संख्या। 2016 में किये गए सर्वेक्षण के अनुसार राज्य के 49.7 प्रतिशत बच्चे अक्षर नहीं पहचान पाते हैं। सर्वे के मुताबिक आधे से ज्यादा बच्चे क्लास में हाज़िर नहीं होते हैं। संकल्प पात्र में " शिक्षा क्षेत्र की गुणवत्ता में विकास " शीर्षक में कहा गया है कि शिक्षा, पुस्तकें, यूनिफॉर्म इत्यादि मुफ्त मुहैय्या कराये जाएंगे और शिक्षक छात्र तथा कक्षा छात्र अनुपात सही ठीक किया जाएगा। यही नहीं कालेजों में छात्रों को लैपटॉप दिए जाएंगे और मुफ्त इन्टरनेट दिया जाएगा।
शिक्षा के प्रतिफल में कमी के कारण राज्य में बेरोजगारी बढ़ रही है2015 -16 के आंकड़े बताते हैं कि प्रति 1000 में 58 नौजवान बेरोजगार थे जबकि राष्ट्रीय औसत 37 है। 18 से 29 वर्ष के आयु वर्ग में तो बेरोजगारी सबसे ज्यादा है। इस आयु वर्ग में राज्य में प्रति 1000 में 148 बेकार हैं। श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार राष्ट्रीय औसत 102 है। 2001 से 2011 के बीच 20 से 29 साल की आयु के 58 लाख नौजवान रोजगार की तलाश में राज्य से बाहर  गए पर डिग्री के अनुरूप योग्यता में कमी के कारण अनौपचारिक क्षेत्र में छोटी मोटी नौकरी पर गुजारा करने लगे। चुनाव के दौरान वोटरों ने रोजगार को सबसे बड़ी समस्या बताया था। चुनाव घोषणा पत्र में भा  ज पा ने  70 लाख रोजगार या  काम के अवसर प्रदान किया जाएगा। पार्टी ने स्टार्ट अप पूँजी के तौर पर 1000 करोड़ रूपए का कोष बनाने का वादा किया था। कोढ़ में खाज की मानिंद बेरोजगारी को और दर्दनाक बना दिया है आद्योगिक विकास की धीमी गति ने। यहां आद्यौगिक विकास की दर देश में सबसे धीमी है। नीति आयोग के मुताबिक 2013-14 और 2014-15 में औद्योगिक विकास की दर क्रमशः 1.95% और 1.93% थी। यह दर देश में सबसे नीचे के पांच राज्यों में से एक है। यही नहीं राज्य में जो उद्योग पारंपरिक रूप से आगे थे वे भी संकट में हैं। मसलन कानपूर का चमड़ा उद्योग बेहद कठिनाई के दौर से गुजर रहा  है। एक आंकड़े के मुताबिक यहां विगत दस वर्षों में 400 में से 140 टेनेरीज बंद हो गईं। पूँजी निवेश के मामले में देश के 21 राज्यों में उत्तर प्रदेश का स्थान 20 वां है। यही हाल श्रम, इन्फ्रास्ट्रक्चर, आर्थिक परिवेश, राजनीतिक स्थायित्व और शासन के मामले में है। नेशनल कौंसिल ऑफ़ अप्लायड इकनोमिक रिसर्च के मुताबिक यहां बिजली का अभाव और प्रशिक्षित लोगों की कमी मुख्य कारण है। चुनाव घोषणा पत्र में भा ज पा ने वादा किया है कि वह विनिवेश बोर्ड का गठन कर राज्य में निवेश की धारा में तितरफा विकास करेगी।उद्योगों के लिए मुख्य मंत्री की देख रेख एक विभाग का गधं करेगी जहां एक ही जगह। उद्योग बैठाने की साड़ी औपचारिकता पूरी हो जायेगी। घोषणा पत्र में यह भी वादा किया गया है कि राज्य में 6 आई टी पार्क बनाएंगे, एक औषधि निर्माण पार्क बनाएंगे और एक ड्राई पोर्ट बनाएंगे ताकि राज्य से निर्यात का विकास हो। ये तो वायदे हैं , अगर इन्हें पूरा कर लिया गया तो उत्तर प्रदेश सचमुच उत्तम प्रदेश हो जाएगा।
हमारा देश कृषि प्रधान देश है और 2012-13 तक उत्तर प्रदेश में करीब 1 करोड़ 85 लाख परिवार खेती पर निर्भर थे।यह देश में कृषि पर निर्भर कुल परिवारों के 20 प्रतिशत के बराबर है। यू पी में तो हर चौथा परिवार खेती पर निर्भर है। अतएव देश के सर्वाधिक उर्वर क्षेत्र में कृषि विकास मुख्य एजेंडा हो जाता है। 2004-05  से 12-13 तक यू पी का समग्र वार्षिक विकास दर देश में सबसे कम रहा। यह देश के 3.7 प्रतिशत औसत विकास दर 2.9 था। 2004-05 के स्थाई मूल्य के आधार पर यू पी का विकास दर उत्तर खंड से भी धीमा था। सन 2000 में यू पी से काट कर अलग बने उत्तराखंड से भी इसका कृषि विकास धीमा था। 2014-15 में स्थायी मूल्य के आधार पर जहां कृषि विकास की दर उत्तराखंड में 5.12% थी जबकि यू पी में यह केवल 4.25 रही। 15 मार्च 2017 की एक रपट के मुताबिक यू पी में किसानों पर बकाया कर्ज 75000 करोड़ था महज 8000 करोड़ रूपए यानि 10 प्रतिशत से थोड़ी ज्यादा रकम राज्य सहकारिता बैंकों या प्राइमरी कृषि क्रेडिट सोसाइटीज द्वारा दिया गया कर्ज है, जिए सर्कार माफ़ कर सकती है। बाकी रकम सरकारी बैंकों की है और यह छोटे किसानों पर ही नहीं लगभग सभी किसानों पर है। जबकि पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में  वादा किया है कि यह सभी प्रकार के कृषि       कर्ज माफ कर देगी और नए कर्ज व्याज मुक्त होंगे। सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की योजना बनायेगी। यही नहीं 14 दिनों में भुगतान करने का वादा भी किया गया है साथ ही पुराने बकायों को सरकार गठन के 120 दिनों के भीतर भुगतान करवाने का वादा किया है। राज्य के आधे घरों में बिजली नहीं है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 51.85% प्रतिशत घरों में बिजली नहीं है साथ ही अफसर शाही में  भ्रष्टाचार के कारण विकास की गति अत्यन्त धीमी है। पार्टी ने वादा किया था कि अगर उनकी सर्कार बनती है तो 24 घंटे बिजली रहेगी और गरीबों को जहां मुफ्त कनेक्शन दिए जाएंगे वहीँ हर महीने 100 यूनिट बिजली 3 रूपए प्रति यूनिट की रियायती दर से दी जायेगी। वायदों और हकीकत में बड़ा अंतर है। सरकार बदली है , सियासी फिजा बदल गयी है, काले बादलों के पर से सुनहरी किरण यू पी जमीन पर पड़ रही है और सब्ज़ बाग़ लहरा रहे हैं, देखना है कि सपनो के उस पार की हकीकत कैसी है?