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Friday, July 13, 2018

सुशासन बाबू भाजपा में ही रहेंगे

सुशासन बाबू भाजपा में ही रहेंगे
बिहार में नीतीश कुमार उर्फ सुशासन बाबू और भाजपा के गठबंधन को लेकर अटकलें लगाई जा रही थी कि गठबंधन टूट जाएगा लेकिन गुरुवार को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पटना आने और नीतीश कुमार से मुलाकात के बाद भाजपा अध्यक्ष ने घोषणा की कि नीतीश कुमार कहीं जाने वाले नहीं है। उन्होंने बड़े ही चालाकी भरे स्वर में कहा कि नीतीश कुमार भ्रष्टाचारियों को छोड़कर एनडीए में आए थे और अब वह भ्रष्टाचारियों के साथ नहीं रह सकते। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सीट को लेकर कोई मसला नहीं है। जैसे - जैसे अमित शाह के आने में विलंब हो रहा था वैसे- वैसे बिहार में अटकलें बढ़ती जा रही थीं। नितीश कुमार का भाव कुछ ऐसा था जैसे वह निश्चित नहीं कर पा रहे हो कहां जाएंगे अथवा ऐसा लग रहा था कि मुख्यमंत्री  नीतीश कुमार के पास  भाजपा में रहने के अलावा  कोई ऑप्शन नहीं  है। वैसे राजनीतिक हालात ऐसा ही बता रहे हैं कि नीतीश के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। क्योंकि, लालू के घर पर तो उनके लिए प्रवेश निषेध का बोर्ड लगा हुआ है और कांग्रेस लालू को छोड़कर जाएगी नहीं । इसलिए वह भाजपा को छोड़कर कहां जाएंगे? शाह ने सीटों को लेकर कुछ इतने हल्के ढंग से कहा कि सीटों का बंटवारा कोई मसला है ही नहीं।  यानी , उस पर अभी बात नहीं होगी । नीतीश कुमार और अमित शाह के बॉडी लैंग्वेज को देखकर ऐसा लग रहा था कि उनमें गर्मजोशी की कमी है। नीतीश कुमार कभी बिहार के सुपरस्टार थे और उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार समझा जाता था। लेकिन दल बदलने के साथ ही उनका रुतबा भी बदल गया। यही नीतीश कुमार थे जिन्होंने 2015 के चुनाव में भाजपा को पटकनी दी थी और उसके विजय रथ को रोका था। हालांकि इसमें लालू का भी योगदान था लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा तो उन्हीं का था। आज इस स्तर के नेता को सीटों को लेकर भाजपा का यानी अपने सहयोगी दल का मुंह जोहना पड़ रहा है। अजीब-अजीब अटकलें लगाई जा रहीं हैं कि नीतीश कुमार अपने दम पर अब 16-17 प्रतिशत वोट भी नहीं पा सकते हैं। सेकुलर वे अब रहे नहीं । क्योंकि भाजपा के साथ जाने पर उनकी छवि को दाग लग गया है। इस दौर में उनके सुशासन बाबू का तमगा भी छिन गया क्योंकि उनके शासनकाल में कई दंगे हुए महादलितों को सताया गया। अति पिछड़ों पर भाजपा की नजर पहले से ही है।  उनका वोट बैंक खिसक गया है । लेकिन उनकी कोशिश है कि ज्यादा सीटों पर तो लड़ना ही होगा । क्योंकि अगर कम सीटों पर लड़ते हैं तो कम सीट ही मिलेगी और इसके बाद विधानसभा चुनाव में भी कम सीट पर ही लड़ना होगा तो क्या यह सुनहरी कुर्सी कायम रहेगी?
वैसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का शासनकाल देखें तो ऐसा लगेगा यह हालात आने ही वाले थे । क्योंकि उन्होंने अपने किसी वायदे को पूरा नहीं किया। हर फैसले में अवसरवाद से काम लिया और उन्होंने इतनी बार पाला बदला कि लोगों का भरोसा ही खत्म हो गया। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि  वह कहां हैं और किसके साथ खड़े हैं और कल कहां रहेंगे?
     बिहार में उनके शासनकाल में विकास हुआ ही नहीं और रोजगार की हालत सबसे ज्यादा खराब रही। यहां तक कि कानून और व्यवस्था  बिगड़ती गई । भ्रष्टाचार चरम सीमा पर पहुंच गया। ऐसे में शासन का क्या कहा जा सकता है । नीतीश कुमार खुद अपने उच्च स्तर से उतरकर नीचे के आसन पर बैठ गए हैं । अब भाजपा के मोहताज हैं । अब सुशासन बाबू  भाजपा में ही रहेंगे उनके पास कोई और चारा नहीं है।

Thursday, July 12, 2018

जीना एक अनिश्चित समय में

जीना एक अनिश्चित समय में
आज का समय, जिस में हम जी रहे हैं इसमें किसी भी चीज या किसी भी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता। दुनिया का अधिकांश भाग हैरतनाक दुविधा में जी रहा है। कहीं लोग मिथ्या सुख में नाच रहे हैं तो कहीं गुस्सा और दुविधा से पीड़ित हैं।  बहुत से लोग यह सोचना भी नहीं चाहते कि आगे क्या होने वाला है।  आगे बहुत खतरे दिखाई पड़ रहे हैं लेकिन लोग अभी नहीं जानना चाहते आगे कौन सा खतरा है ? आज के जमाने में अव्यवस्था मुख्य भाव है और  यही बड़ी राजनीतिक बाधा भी है । इससे हिंसा को बढ़ावा मिल रहा है और टेक्नोलॉजी इसमें सबसे बड़ी अव्यवस्था कारक है। अब इस बात को कैसे देखेंगे या इसका अनुमान कैसे लगाएंगे कि अमरीका का राष्ट्रपति उत्तर कोरिया के नेता से मिलता है। हाल तक उत्तर कोरिया और अमरीका आपस में दुश्मन हुआ करते थे, लेकिन सिंगापुर  में मुलाकात के बाद जब अमरीका के राष्ट्रपति यह घोषणा करते हैं कि उत्तर कोरिया के पास कोई भी महाविनाश की शस्त्र नहीं है या उससे किसी किस्म का परमाण्विक खतरा नहीं है। सबसे ज्यादा आश्चर्य होता है कि इस बैठक को लेकर ना कोई संयुक्त विज्ञप्ति जारी हुई ना ही कोई घोषणा हुई ,बस एक स्वीकृति जनता के समक्ष आ गई और कहा गया कि उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियारों को खत्म कर देगा और यही पर्याप्त मान लिया गया।
       दुनिया , इस बीच, विभिन्न तरह की अव्यवस्थाओं से जूझ रही है । रूस के व्लादिमीर पुतिन लगभग पूरी पश्चिमी दुनिया के खिलाफ खड़े हैं और आरोप लगाया जा रहा है कि यह मानवाधिकार का भयंकर उल्लंघन है । एशिया के कई क्षेत्र विस्फोट करने को तैयार हैं। अफगानिस्तान लगभग रोज आतंकी हमलों से दहल उठता है । पश्चिमी एशिया कई तरह के जंगों में मुब्तला है । इससे सबसे ज्यादा ग्रस्त है सीरिया। ईरान और सऊदी अरब में भयंकर तनाव है। इसराइल और मुस्लिम विश्व एक दूसरे खिलाफ तने हुए हैं। सऊदी अरब के नेतृत्व में अरब देश यमन के खिलाफ जंग की तैयारी कर रहे हैं । दक्षिण एशिया में भी मालदीव जैसा मामूली देश भारत जैसे बड़े पड़ोसी राष्ट्र को चुनौती दे रहा है। यूरोप में भी हिंसा और राजनीतिक अव्यवस्था की यही स्थिति है। जर्मनी जो हाल तक बहुत स्थाई राष्ट्र माना जाता था वह गंभीर राजनीतिक संकट से जूझ रहा है । पूरे यूरोप में बहुत ही अनिश्चित राजनीति की स्थिति है।
      इस अनिश्चय पूर्ण दुनिया में जहां तानाशाही है वहां ज्यादा स्थायित्व है।  हालांकि  यह तानाशाही दिखती नहीं है। उदाहरण के लिए चीन में शी जिनपिंग का शासन है । यहां कभी- कभी आर्थिक संकट के बावजूद पूरी व्यवस्था खासकर अर्थव्यवस्था विकसित हो रही है। पार्टी कठोर नियंत्रण में है। कहीं भी कोई बाधा नजर नहीं आ रही है। दूसरी तरफ अधिकांश लोकतंत्र बाधाओं से गुजर रहे हैं। पक्ष और विपक्ष मामूली बातों पर अड़ जाते हैं। यही नहीं अधिकांश लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के भीतर अपने भी संकट हैं। भारत में ही देखिए, भाजपा खुद को एक मजबूत केंद्रीकृत पार्टी के रूप में प्रदर्शित करती है जबकि दूसरी पार्टी घोर आंतरिक झगड़ों में उलझी हुई है और भाजपा भी संसद के सुचारु रुप से चलने की गारंटी नहीं दे सकती है । संसद में बहस नहीं होना राजकाज पर प्रभाव डालता है।
      इसके बिना किसी बड़े राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र से संबंध रखना कठिन हो जाता है। अमरीका और भारत के बीच लंबे अरसे से अच्छे रिश्ते रहे हैं लेकिन अब उनमें गिरावट आ रही है। अभी हाल में अमरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को सैनिक सहायता रोकने और पाकिस्तान पर आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया तब कहीं जाकर भारत के साथ उसके रिश्ते थोड़े सुधरे। वरना हाल तक तो रूस से सैनिक संबंध रखने के कारण अमरीका भारत को हड़काता रहा है । यही नहीं चीन से भारत के संबंध भी कुछ ऐसे ही हैं।
   संसद में बहस से यह पता नहीं चल पाता है कि भारत से रूस के संबंध कैसे हैं। ऊपर- ऊपर तो भारत रूस संबंध अप्रभावित  हैं लेकिन भीतर से देखें तो कई तरह के बदलाव दिखाई पड़ रहे हैं। आज यह जरूरी है भारत अपनी विदेश नीति दोबारा गढ़े और संसद में स्थाई बहस के बगैर ऐसा नहीं हो सकता। इसलिए अब समय है कि सरकार विपक्षी दलों को बहस के लिए तैयार करे ताकि कम से कम विदेश नीति पर बात की जा सके। अगर ऐसा नहीं किया गया तो एक दूसरे को काटने वाली पार्टी राजनीति राष्ट्र की विदेश नीति का बंटाधार कर देगी और देश अनिश्चय की हालत में झूलता रहेगा।

Wednesday, July 11, 2018

भारत अब अत्यंत दरिद्रों का सबसे बड़ा देश नहीं रहा

भारत अब अत्यंत दरिद्रों का सबसे बड़ा देश नहीं रहा
हमारा देश न जाने कब से दरिद्रों का देश रहा है। इसीलिए उनकी भावनाओं को आघात न लगे भगवान के भी ऐसे नाम गढ़े गए हैं जो दरिद्रों के हक में हों जैसे, दरिद्र नारायण, दीनबंधु इत्यादि। लेकिन पिछले महीने एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अब अत्यंत दरिद्रों का देश नहीं रहा। लेकिन इस खबर की  को लेकर खुशी जाहिर करने की बजाए इसे बहुत ज्यादा तरजीह नहीं दी गई। यह नहीं देखा गया हमने गरीबी मिटाने की 70 वर्ष पुरानी जंग का कुछ हिस्सा जीत लिया है। एक अमेरिकी थिंक टैंक ब्रूकिंग्स के अनुसार अब भारत से इस मामले में नाइजीरिया आगे हो गया है।ब्रूकिंग्स के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 7 करोड़ 30 लाख बेहद दरिद्र लोग हैं जबकि नाइजीरिया में आठ करोड़ 70 लाख ऐसे लोग हैं। यह वृद्धि अचानक नहीं हुई है बल्कि धीरे-धीरे हुई है। 1997 में देश के 42% लोग अत्यंत गरीबी में जी रहे थे अभी हाल में हान्स रोजलिंग के शोध के अनुसार 2017 तक यह अनुपात घटकर 12% हो गया यानी महज 20 वर्षों में 2 करोड़ 70 लाख लोग अत्यंत दरिद्रता से उभर कर बाहर आ गए। भारत के पड़ोसी देश जैसे बांग्लादेश ,पाकिस्तान और नेपाल भी इसी लीक पर चल रहे हैं।  यहां भी विकास हुआ है और यह भी 2030 तक अत्यंत दरिद्रता से उबर जाएंगे। चीन में अत्यंत दरिद्र लोग बिल्कुल नहीं हैं। वहां गरीबी महज 3% हैं।  ब्राजील भी 2030 तक उबर जाएगा और गरीबी से ऊपर उठ जाएगा। एक गरीब तब अत्यंत दरिद्र कहा जाता है जब वह डेढ़ सौ रुपए रोजाना से काम कमाता है। भारत में गरीबी मिटाने की नीतियों  की आलोचना होती रही है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि उनसे लाभ हुआ है और लोग बेहद गरीबी से ऊपर उठ गए हैं।
       काम के बदले अनाज कार्यक्रम जिसे बाद में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना का नाम दिया गया उससे लाभ हुआ है और ग्रामीण क्षेत्रों में अनाज उपलब्ध होने लगा है। अपर्याप्त भंडार और विलंब से भुगतान के साथ साथ राशन की दुकानों की बहुतायत से यह कार्यक्रम नाकाम काम हो गया। 1983 में ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी योजना की शुरुआत हुई जिसके तहत हर भूमिहीन व्यक्ति को साल में सौ दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई। इसके साथ-साथ और भी कई कार्यक्रम तैयार किए गए जिससे अनुसूचित जाति, जनजाति तथा बंधुआ मजदूरी से मुक्ति को बल मिला । 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम बना जिसमें 2009 में संशोधन कर उसका नाम महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम रखा गया। इसके अलावा बहुचर्चित कृषि ऋण माफी ने भी गरीबी दूर करने में अपनी भूमिका निभाई। यह सारी योजनाएं राज्य स्तर पर कारगर साबित हुईं। लेकिन भयंकर प्रचार और चुनाव पूर्व वर्ष होने के कारण कुछ ऐसा प्रदर्शित किया गया यह सब भारतीय जनता पार्टी के काल में हुआ है और नरेंद्र मोदी द्वारा दी गई योजना का यह परिणाम है।  यह सही नहीं है। क्योंकि भारत जैसे विशाल देश में बहुत कम समय में जादुई तरीके से गरीबी दूर नहीं की जा सकती। मोदी जी अपने पूर्ववर्ती नेताओं के किए का लाभ उठा रहे हैं । उन्होंने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम को जारी रखा है । उसके साथ ही आधार को जोड़कर उन्हें आर्थिक मुख्यधारा में शामिल कर लिया । उदाहरण के लिए कह सकते हैं कि मोदी जी ने मनमोहन सिंह की योजना को अपनाकर अपनी पीठ ठोक ली।
    अब मोदी जी के बाद जो लोग आएंगे वह भी इसी पथ का अनुसरण करेंगे कोई दूसरा रास्ता नहीं है। भारत ने जो लाभ हासिल किया वह आर्थिक विकास का परिणाम था। जैसे- जैसे विकास हुआ गरीबी घटती गई । 1993- 94 और 2009- 10 के बीच गरीबी घटी है। 2013 में अरविंद पनगरिया और मेघा मुकीम ने अपने शोध पत्र में इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। उन्होंने कहा है कि 2004 -5 तथा 2009- 10 के बीच हुए विकास से गरीबी घटी है। यद्यपि हमें बहुत दूर चलना है ।अभी भी  हम कई देशों से पीछे हैं । अभी भी हमारे देश में 7 करोड़ 30 लाख लोग दरिद्रता में जी रहे हैं। यानी हमारे देश के गरीबों की आबादी थाईलैंड, फ्रांस और इंग्लैंड से ज्यादा है। फिर भी, गरीबी घट रही है लेकिन मंजिल अभी बहुत दूर है।
   गरीबी को आंकने के पैमाने विशेषज्ञों के साथ बदलते रहे हैं। गरीबी को मापने के तरीके नए-नए उपाय सुझाते रहे हैं और साथ ही दूर करने के उपाय भी । भारत में गरीबी दूर हो रही है लेकिन दोषदर्शी अभी भी गरीबी को लेकर ही पड़े हुए हैं। अच्छा हो ,उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया जाए।

Tuesday, July 10, 2018

सामाजिक  आंदोलन सामाजिक बदलाव में विफल क्यों

सामाजिक  आंदोलन सामाजिक बदलाव में विफल क्यों

मिशेल फूको ने कहा है कि,
"जहां वहाँ शक्ति है, वहाँ है प्रतिरोध।" - 
प्रतिरोध आंदोलन हाशिए पर रहने वालों और वंचित समुदायों के पक्ष  में सामाजिक परिवर्तन  की वकालत करने के  उपकरण  हैं। यह वास्तव में समाजिक पारस्परिकता  के लिए आवश्यक है।  लेकिन, आज के बाजार उन्मुख समाज में   प्रतिरोध के तत्व या तो कमजोर हो गए हैं या आहिस्ता - आहिस्ता  मर रहे हैं। हाल ही में, यहां यानि अपने देश में कई सामाजिक आंदोलन हुए पर उनका फल क्या मिला? उनका असर   निरंतर कमजोर होता हुआ मिट जाने के कगार पर है। सामाजिक आंदोलनों। यहीं नहीं अब, प्रतिरोध आंदोलन पूरी दुनिया में नाकाम होते दिखाई पड़ रहे हैं। वे अपनी ताकत खो रहे हैं  और उनके परिवर्तनकारी प्रभाव या तो दिखते नहीं या अपनी शक्ति खो चुके हैं।    प्रख्यात मानव विज्ञानी जेम्स स्कॉट के अनुसार  सामाजिक आंदोलनों की शक्ति  कम हो गई है और अब यह रोजाना के प्रतिरोध के रूप में बदल गयी है।  कभी कभी यह सिविल सोसाइटी की  के रूप में या  अल्पकालिक प्रतिरोध के रूप में दिखती है। 
   समकालीन  प्रतिरोध आंदोलन  खुद को परिवर्तनकारी आंदोलनों के रूप में  बनाए रखने विफल हो जाते हैं या सत्ता अथवा अन्य प्रमुख बलों के साथ समायोजित हो जाते हैं या उनमें विलीन हो जाते हैं। हालांकि आरम्भ में वे उन्हीं के विरुद्ध शुरू हुए थे। 
कांशी राम का बहुजन आंदोलन धीरे धीरे  एक राजनीतिक पार्टी के रूप में तब्दील हो गया।  यह सच हो सकता है कि दलित, आदिवासी, श्रम और अन्य आंदोलनों में दक्षिण एशियाई समाज  दुनिया भर में सबसे जागरूक है। पर इसके  साथ समस्या है कि इनमें से कई प्रतिरोध आंदोलन कुछ समय के बाद उन्हीं मूल्यों का अनुकरण करने लग जाते हैं  जिनके खिलाफ वे लड़ रहे थे। उनके  स्वर   धीरे-धीरे प्रमुख वर्ग की हां में हां मिलाने लगते हैं।  हममें से बहुतों  देखा होगा कि नेता और उनके समर्थक  समूह अंततः अपनी राजनीतिक संस्कृति और व्यवहार में   मुख्य धारा दलों और नेताओं का अनुकरण करने लगते हैं। मुम्बई या कोलकाता में  अधिकांश श्रमिक आंदोलन बेकार साबित हुए।  उनकी यूनियन के नेताओं ने अपनाया बाबुओं या  प्रबंधन "व्यवहार" को अपना लिया। प्रबंधन।  कुछ आदिवासी नेता धीरे-धीरे ऊपर चले गये और तब मुख्य धारा के राजनीतिक दलों में समाहित हो गए और अपनी क्षमता तथा  संस्कृति का अंतर नहीं कायम रख सके। इनमें से अधिकांश प्रतिरोध आंदोलन के लिए एक वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति और भाषा और  पहचान, अधिकार और मूल्यों के लिए दावा  करने लगे।लेकिन धीरे धीरे वे मुख्य धारा की राजनीति  के प्रभाव के तहत आ जाते हैं और  अंत में उसे स्वीकार करने लग जाते हैं ।  जब कांशी राम ने उत्तर प्रदेश में बहुजन आंदोलन शुरू किया था तो वह  यह था एक एक वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति के तौर पर उभरा। लेकिन धीरे धीरे व्यवहार में  प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के रूप में बदल गया। अवसरवाद, भ्रष्टाचार और स्वार्थ  उन नेताओं के जीवन में प्रवेश कर गया  उस मिशन की रीढ़ की हड्डी थे। शुरुआत में, यह   एक आंदोलन और एक मिशन  के रूप में शुरू हुआ लेकिन यह धीरे-धीरे राजनीतिक पार्टी में तब्दील हो गया। आम आदमी पार्टी (आप) भी  एक बड़े पैमाने पर आंदोलन के रूप में प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में  उभरा लेकिन बाद में  नीचे दबे समकालीन राजनीतिक संस्कृति के रूप में ढल गया। अधिकांश आंदोलनों में एक वैकल्पिक भाषा के साथ संवाद आरम्भ हुआ और आगे चल सब   मुख्य धारा भाषा बोलने लगे। 
    अतीत में कुछ प्रतिरोध आंदोलनों में  नेतृत्व करने वाले राजनीतिक दलों और नेता स्वतंत्र राजनीति विकसित करने में विफल रहे हैं।   दलित आंदोलन के मामले में कांशी राम चमचा युग के रूप में निदान किया।  अपनी प्रसिद्ध पुस्तक  "चमचा युग" में  टिप्पणी की है कि ज्यादातर दलित नेता भारत में किसी भी वैकल्पिक दलित राजनीति के नाम पर बड़ी राजनीतिक दलों के चमचे के रूप में काम किया। उन्होंने यह विश्लेषण   अम्बेडकर की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) परिप्रेक्ष्य में किया।  एक और संकट दिखा कि विभिन्न प्रतिरोध आंदोलनों समर्थक समूहों    के साथ मध्यम वर्ग के विकास के साथ  बीच उनके जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और श्रमिकों में उपभोक्तावादी संस्कृति भी बढ़ रही है। हालांकि,  प्रतिरोध आंदोलन की प्रगतिशील भूमिकाओं में विभिन्न क्रांतियों का मध्यम वर्ग  पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। लेकिन यह उदय नए मध्यम वर्ग का है। लेकिन झुकाव इन आंदोलनों  में समझौता, वार्ता, समायोजन की ओर  है ।  उपभोक्तावाद का लोभ धीरे से खिसक कर हमारे लचीलेपन और  प्रतिरोध को कमजोर कर रहा है। मार्क्स, लेनिन और अम्बेडकर ने  कई जगह मध्य वर्ग के जीवन में विलासिता और  आत्मकेन्द्रीयता की आलोचना की है। फिर भी, राज्य के सहयोग से बाज़ारवाद विकसित हो रहा है। सत्ता किसी भी आंदोलन को ज्यादा समय तक चलने नहीं देती। वह इसे नियंत्रित और कुंद करने की हर तकनीक का उपयोग करती है।  प्रख्यात इतिहासकार एरिक होब्सबवन ने कहा है कि  "पूंजीवाद सवाल है जवाब नहीं है"। हमने बाज़ारवाद के शिकंजे में फंस कर जवाब की तलाश  बंद कर दी है। जरूरी है इस तलाश को शुरू करने की।

Monday, July 9, 2018

सोशल मीडिया पर यकीन करना बंद करें

सोशल मीडिया पर यकीन करना बंद करें
कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के धुले में बच्चा चोर के अफवाह  पर पांच लोगों को पीट-पीटकर मार डाला गया। ऐसी घटनाएं देश भर में हो रही हैं और एक तरह से हमारा देश हत्याओं का देश बन गया है। इसका कारण लोगों का अफवाहों पर भरोसा करना है। यह अफवाहें एक तरह से आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक हो गई हैं। भीड़ का गुस्सा   काबू के बाहर हो जाता है। जब एक भीड़ पागल हो जाती है तो पुलिस भी उसे नियंत्रित नहीं कर पाती। जब तक सामान्य होती है तब तक बहुत कुछ विनाश हो चुका होता है। विगत 2 महीने में तमिलनाडु, त्रिपुरा ,महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक ,पश्चिम बंगाल और उड़ीसा सहित देशभर में कई स्थानों से पीट-पीटकर मार डालने की घटनाओं की खबर मिली है।
अफवाह फैलाने वाले किसी भी घटना को खतरनाक बनाकर फैला सकते हैं । एक बार अगर तीर निकल गया तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता। यह जंगल की आग की तरह फैलता है और जब तक अधिकारी सावधान हो और इससे मुकाबले के लिए तैयार हों तब तक बहुत कुछ बर्बाद हो चुका रहता है।
   मुंबई पुलिस के साथ काम करने वाले एक मनोचिकित्सक के अनुसार इस तरह की अफवाहें फैलाने वाले लोग नफरत और नकारात्मकता से भरे होते हैं । एक बार नफरत को हवा दे दी गई तो उसकी आग भड़क उठती  है और उससे जो बर्बादी होती है उस पर ऐसे लोग जश्न मनाते हैं। वह ऐसा सिर्फ मजाक करने की गरज से करते हैं । ऐसे सभी मामलों में जो अफवाहें फैलाते हैं वह हमेशा पर्दे के पीछे रहते हैं । 
    आज इंटरनेट आसानी से उपलब्ध है और इसे बड़े सस्ते में मोबाइल फोन से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका मतलब है कि अफवाह फैलाने की मशीन सबके हाथ में और खतरनाक संदेश तैयार करने में कुछ मिनट लगते हैं तथा उसे सैकड़ों लोगों के समूह में एक बार डाल दिया जाता है । वहां से वह कई गुना ताकतवर बन कर कई समूहों में चला जाता है। कुछ साल पहले तक वाट्स एप में सिर्फ सौ लोग ही एक ग्रुप में शामिल हो सकते थे अब वह बढ़कर 256 हो गया है। ऐसे भी  लोग हैं जो प्रमाणित समाचारों के बदले वाट्स एप की खबरों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। कुछ लोग तो टी वी या अखबारों की खबरों को वाटस ऐप की खबरों के आगे गलत बता देते हैं, और कहते हैं कि यह असत्य समाचार है। सच तो फलां जगह है । अब ऐसी स्थिति को देखते हुए नियम बना है कि अफवाह फैलाने वाले व्हाट्सप्प ग्रुप एडमिन को सजा  दी जा सकती है। अगर एक बार किसी भी ग्रुप में कोई संदेश ऐसा आया जो खतरनाक हो सकता है अगर उस ग्रुप के एडमिन ने उसे नहीं हटाया उसे आईटी कानून के तहत सजा दी जाएगी । यद्यपि उस अधिकारी ने यह स्वीकार किया कि किसी भी वाट्स एप मैसेज के स्रोत को खोज पाना बड़ा कठिन है, और इस तरह के संदेश को फैलाकर कोई भी बड़े आराम से अपना काम कर सकता है । अफवाहें किसी भी विषय पर फैलाई जा सकती हैं और उसके परिणाम घातक होंगे । अभी कुछ दिन पहले एक मैसेज आया कि नमक का अभाव होने वाला है  और उसकी कीमत ₹500 किलो तक जा सकती है । लोग दुकानों पर टूट पड़े । कई जगह तो दुकानें है लूट ली गयीं और कई दुकानदारों ने तो नमक ब्लैक में बेचना शुरू कर दिया था। 
महाराष्ट्र में गणेश उत्सव के दौरान अफवाह फैली कि एक विशेष समूह द्वारा गणेश की मूर्ति क्षतिग्रस्त कर दिया गया है ।  इसके बाद पूरे राज्य में तनाव फैल गया ।कई जगह पर भारी पुलिस तैनाती करनी पड़ी।
बच्चा चोर की अफवाहें सबसे घातक होती हैं। लोगों को इसे लेकर काफी सावधान रहना चाहिए और अपने बच्चों के प्रति सावधानी बरतनी चाहिए । उनके साथ ऐसा कुछ ना होने दें। मुंबई में एक साल पहले एक ऐसी ही अफवाह उड़ी थी और लोगों ने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया था। कुछ लोगों ने स्कूल बस का उपयोग बंद कर दिया था और खुद ही बच्चों को लेकर जाते थे । इस तरह की खबरें जंगल की आग की तरह हैं और सोशल मीडिया उनका प्लेटफॉर्म है।
    90 के दशक की गणेश के दूध पीने वाली घटना कौन भूल सकता है। लोगों ने सैकड़ों लीटर दूध गणेश को पिलाने में बर्बाद कर दिया। यहां तक की विदेशों में भी ऐसा किया गया। इससे यह साफ जाहिर होता है कि अफवाहों की कोई सीमा नहीं है और इन हवाओं को मीडिया में भी कवर किया जाता है।
    अफवाह फैलाने वाले मूलतः लोगों की भावनाओं का उपयोग करते हैं । इसका एकमात्र समाधान है कि लोग डरे नहीं और भावनाओं के वश में ना आएं । अपने आंख कान और बुद्धि पर भरोसा करें ना कि इस तरह के समाचारों पर। अगर ऐसे कोई समाचार मिलते हैं तो उन्हें आगे नहीं बढ़ाएं और सीधा स्थानीय पुलिस को इत्तिला करें और वह इसकी जांच कर आपको संतोषजनक उत्तर दे सकती है।   इसका कोई अन्य समाधान नहीं है और ना ही अफवाह फैलाने वालों को रोका जा सकता है इसलिए सावधान रहना जरूरी है। अफवाह फैलाने वाले चुपचाप अपना काम करते हैं और छिप जाते हैं तथा निर्दोष लोग उसका शिकार बनते हैं। हमारा समाज कई तरह के विकृतियों और कुंठाओं से भरा है।यह छुपकर कर कुछ भी कहने की इजाजत देता है। कमियां माध्यम में नहीं हैं कमियां इसके उपयोग करने वालों में हैं। नए माध्यम का मजा लीजिए लेकिन दूसरे के हाथों इस्तमाल होने से बचें।