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Friday, May 18, 2018

कर्नाटक में  नाटक 

कर्नाटक में  नाटक 

बुधवार को कांग्रेस विधायक दल की बैठक में सदस्यों से पूछा गया कि क्या उन्हें बीजेपी शिविर से जुड़े किसी से भी कोई " प्रलोभन " मिल रहा है?  उनमें से 12 ने अपने हाथ उठाए। प्रत्येक व्यक्ति को अपने मोबाइल फोन पर वॉयस रिकॉर्डिंग ऐप्स इंस्टॉल करने की सलाह दी गई थी ताकि भविष्य की बातचीत रिकॉर्ड की जा सके।यदि कांग्रेस खेमे पर भरोसा किया जा सकता है तो उनके अनुसार बीजेपी नेता श्रीरामुलु के एक आदमी ने गुरुवार को विधायकों में से एक को फोन किया था  लेकिन बातचीत ज्यादा नहीं हुई क्योंकि उसे संदेह था कि उनकी बात रिकार्ड  की जा रही है। उसने फोन काट दिया। कांग्रेस से सम्पर्क का जिममा बल्लारी सममूह को सौंपा गया था और इस तरह के फंदों ससे वाकिफ है। इस तरह के जाल से वाकिफ है अतएव उसने विधायकों को नहीं उसके रिश्तेदारों ओर दोस्तों को फोन करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि कांग्रेस-जेडी (एस) शिविर छोड़ने और बीजेपी में जाने के लिए उनके विधायकों के  परिजनों  पर दबाव डाला जा रहा है।इस समय कर्नाटक की सियासत में चूहे- बिल्ली का खेल चल रहा है। कांग्रेस की बेचैनी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बिदाड़ी में एक रिज़ॉर्ट से सुरक्षा वापस ले ली गई। यही वह जगह है जहां सभी कांग्रेस विधायकों को रखा गया है।  बी एस येदुरप्पा ने रामनगर जिले के एसपी को स्थानांतरित कर दिया जहां  रिज़ॉर्ट स्थित है और अपनी पसंद के एक नए अधिकारी को तैनात किया गया है। यही कारण है कि कांग्रेस ने अपने विधायकों को बदलने का फैसला किया। मूल योजना विधायकों को विमान से कोच्चि  ले जाना था। 

लेकिन कांग्रेस शिविर का दावा है कि चार्टर्ड उड़ानों को  अनुमति देने से इंकार कर  गया था। उधर, नागर विमानन मंत्री जयंत सिन्हा ने ट्वीट कर के बताया कि  घरेलू चार्टर उड़ानों के लिए डीजीसीए की अनुमति की आवश्यकता नहीं है, लेकिन बेगलुरू में  स्थानीय एटीसी से पूर्व अनुमोदन की जरूरत है। आधी रात के कुछ पहले ही कुछ बसें ईगलटन रिसॉर्ट गेट्स से बाहर निकलीं। विधायकों को निर्देश दिया गया था कि मीडिया वालों को अपने  गंतव्य के बारे में कुछ ना बतायें। लेकिन जब बस  बेंगलुरु-हैदराबाद हाई वे पर आयी तो बात साफ हो गयी कि उस कांग्रेस - जे डी (एस) जमात ने  550 किलोमीटर दूर तेलंगाना की राजधानी को अस्थायी तौर पर चुना है।

उधर कांग्रेस- जद (से)  का नाटक चल ही रहा था कि गवर्नर ने घोड़े के व्यापार (हार्स ट्रेडिंग ) के लिए बीजेपी को छूट दे दी ,उन्होंने अगली सुबह मुख्यमंत्री के लिए शपथ ग्रहण करने का भी आदेश दिया।येदुरपपा धन्यवाद दे रहे थे पर ऐसा लग रहा था कि वे खुश होने का नाटक कर रहे हैं। लगता थ कि उन्हें अहसास हो रहा था कि उन्हें इसके लिये जनादेश नहीं मिला है। 

अजीब स्थिति हो गयी है। जिसे सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं उसके पास बहुमत नहीं है और जो दल कट्टर विरोधी  थे वे चुनाव के नतीजों की घोषणा के कुछ ही घंटों में एक जुट हो गये। इससे भी अलग , जिसे मुख्य मंत्री बनाये जाने की बात थी उस पार्टी के पास सबसे कम सीटें थीं। अब इसके बाद विवाद कि राज्यपाल किसे बुलाएं सरकार बनाने के लिये। इस पूरे नाटक में नैतिकता कहीं दिख नहीं रही थी। आम चुनावल में एक साल से भी कम समय बचा है और कर्नाटक के नाटक ने कई अंतदृष्टि प्रदान की है। पहली कि किसी भी तरह जीतने का मोदी - शाह का गठबंधन अभी भी सक्रिय है। जाति प्रथा का अभी भी बोलबाला है। यही नहीं, इससे कांग्रेस कों सीखना होगा कि जहां भी ततरफा मुकाबला हो वहां अपना महानता का भाव त्याग कर  उसे क्षेत्रीय पार्टी से पहले ही गठबंधन कर लेना चाहिये। यही नहीं इस चुनाव ने बताया है कि अगर सभी दल एकजुट हो जाएं तो भाजपा को धूल चटाई जा सकती है। 

 भारतीय राजनीति में नैतिकता के लिये कोई जगह नहीं हे। टगर कोइं जीत जाता है तो भ्रष्टाचार कोई मामला नहीं है। अब इस चुनाव से और उसके बाद होने वाले नाटक से किसने क्या सीखा यह तो समय ही बतायेगा, लेकिन इस नाटक के झटके अभी कई दिनों तक महसूस होंगे।  

Thursday, May 17, 2018

अच्छे दिन की धुंधलाती चमक

अच्छे दिन की धुंधलाती चमक
भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी अनिश्चित है। उदाहरण के लिए, उपभोक्ताओं के लिए ज्यादा दिनों तक उपयोग में आने वाली  वस्तुओं के मामले में औद्योगिक क्षेत्र (उपयोग-आधारित) का प्रदर्शन 2015-16 में 3.4 प्रतिशत से घटकर 2016-17 में 2.9 प्रतिशत हो गया। दूसरी तरफ, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति मार्च 2017 में 3.9 प्रतिशत से बढ़कर मार्च 2018 में 4.3 प्रतिशत हो गई। मार्च 2017 में विदेशी व्यापार घाटा  10.7 अरब डॉलर से बढ़कर मार्च 2018 में 13.7 अरब डॉलर हो गया। वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान सकल निर्यात 9.8 प्रतिशत बढ़कर 302.8 अरब डॉलर हो गया और आयात पिछले वर्ष की समान अवधि में 275.9 अरब डॉलर और 3.84 अरब डॉलर की तुलना में 20 प्रतिशत घटकर 45 9 .7 अरब डॉलर हो गया। तो पिछले वित्तीय वर्ष के सापेक्ष, विदेशी व्यापार घाटे में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मार्च 2018 में आयात में  7.2 प्रतिशत वृद्धि हुई  है। वित्तीय वर्ष 2017-18 में, आयात में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 13.7 अरब डॉलर के मौजूदा व्यापार घाटे के साथ आयात और निर्यात के बीच  अंतर काफी कम है इससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि भारत में निर्यात की तुलना में आयात में वृद्धि हो रही  है। दूसरे शब्दों में, भारत अपेक्षाकृत उच्च आयात और काफी कम निर्यात कर रहा है। इससे  भारतीय अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्फीति का  प्रभाव होना तय है। यह भी वैसे समय में जब तेल  की लागत 75 डॉलर प्रति बैरेल है। पेट्रोलियम मंत्री ने स्वीकार किया है कि उपभोक्ता पेट्रोल और डीजल पर लागत मूल्य से 153%से160% ज्यादा कीमत चुका रहे हैं और इस स्थिति के लिए इरमा और हार्वे जैसे तूफान दोषी हैं।

लेकिन यह सच का छोटा सा हिस्सा है। वृहद एवं कटु सत्य यह है कि पिछले तीन वर्षों में डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में 380 फीसदी की वृद्धि हुई है जबकि पेट्रोल पर यह 120 फीसदी से ज्यादा बढ़ गया है।डीजल पर उत्पाद शुल्क तीन साल में 3.56 रुपये से बढ़कर 17.33 रुपये हो गया और पेट्रोल पर यह इसी अवधि में 9.48 रुपये प्रति लीटर से 21.48 रुपये प्रति लीटर हो गया।   केवल केंद्र सरकार  ही नहीं   राज्य सरकारों ने  भी पिछले तीन वर्षों में पेट्रोल और डीजल पर वैट तथा बिक्री कर बढ़ा दिया है।
अप्रैल 2014 में केवल 10 राज्यों में डीजल पर वैट 20 प्रतिशत से अधिक था। मार्च 2017 तक, 16 विभिन्न राज्यों में डीजल पर वैट 20 प्रतिशत से अधिक है। मध्य प्रदेश में डीजल पर सबसे ज्यादा वैट मार्च 2017 तक 31.31 प्रतिशत और पेट्रोल के लिए 39.75 प्रतिशत है।
यहां  हम एक पल के लिए अंकगणित को अनदेखा कर रहे हैं। पहली बात कि हम किसके लिए भुगतान कर रहे हैं? जाहिर है  रेलवे आधुनिकीकरण और विस्तार, राजमार्ग और सड़क विकास योजना, पीने योग्य पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा जैसे बुनियादी ढांचे के लिए।
सरकार ने इन सभी मदों में   आवंटन में उल्लेखनीय वृद्धि की है और संसाधनों को उत्पन्न करने का कोई और तरीका नहीं है। नवंबर 2014 और जनवरी 2016 के बीच, सरकार ने उत्पाद शुल्क को नौ गुना बढ़ा दिया है  हालांकि वास्तव में हर बार कच्चे तेल की कीमतें गिरी थीं। 
उत्पाद शुल्क संग्रह में सुधार हुआ। पेट्रोलियम उत्पादों से  जो 2,01,935 करोड़ रुपये (आंकड़े 2016-17 के पहले 11 महीनों के लिए उपलब्ध आंकड़े) तक पहुंच गया जो 2015 में 75,441 करोड़ रुपये था। 
जीएसटी के दौरान हमारे वित्त मंत्रालय ने एक तर्क विकसित  किया  कि परोक्ष कराधान कराधान का सबसे खराब रूप है। परांतज सीधे खिड़की से बाहर चला जाता है और तथ्य यह है कि बैकस्लैपिंग के बावजूद, भारत का कर आधार बहुत कम है।संयोग से, जब धर्मेंद्र प्रधान ने बुधवार (13 सितंबर) कीमत के संदर्भ में उच्चतम पेट्रोल की कीमतों में सुधार किया, तो उन्होंने सही आंकड़े उद्धृत किए - वे सितंबर 2013 से थे - लेकिन क्या यह एक अलग युग था?

Wednesday, May 16, 2018

महाराणा पर बहस के बहाने

महाराणा पर बहस के बहाने

पिछले हफ्ते महाराणा प्रताप का जन्मदिन था।उन्हें लेकर शहर कोलकता और कई नगरों में बहस चल रही है। बहस के कई कोण हैं और सभी कोणों पर अलग-अलग तर्कों की बल्लियाँ और तख्तियां उठाये लोग भी खड़े हैं। महाराणा इतिहास की वीथियों में पुख्ता मील पत्थर हैं।इतिहास के एक प्रमाणिक दस्तावेज। लेकिन, बकौल जॉर्ज बर्नार्ड शा “ इतिहास से हम यही सीखते कि उससे कुछ नहीं सीखते।´इन पंक्तियों को झुठलाया नहीं जा सकता क्योंकि हम, हमारा समाज और हमारी सरकारें इसे सच बनाने की कोशिश में लगी रहती हैं। हम आप या हमारी तरह हमारे देश के अन्य लोग अब तक पढ़ते आये हैं कि अंग्रेज़ फूट डालो और राज करो की नीति पर चलते थे और चाहते थे कि भारत हिन्दुओं और मुसलमानों में बंट जाय सो भारत बंट गया- हिन्दुस्तान और पकिस्तान में।आंसुओं के दरिया खून के समंदर में बिला गए। अंग्रेज़ भी चले गए।बंटवारे की घटना इतिहास में समा गयी। बंटवारे का घाव भर गया।

ये ज़ब्र भी देखा है तारीख की नज़रों ने

लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पायी

 लेकिन,  हम इतिहास से सीख नहीं पाए। जो काम अँगरेज़ नहीं कर पाए वह हमारे चंद नेता कर रहे हैं। अंग्रेजों ने तो देश बांटा , सियासत बांटी। दिल नहीं बंटे एउर अगर बंटे भी अपने-अपने देश में पड़े रहे। लेकिन , हमारे कुछ नेता तो हमारे विभूतियों को बाँट रहे हैं और कुछ हद तक कामयाब भी हो गए हैं।बिलकुल उसी तर्ज़ में

नफरतों का असर देखो जानवरों का बँटवारा हो गया

गाय हिन्दू हो गयी और बकरा मुसलमान हो गया

हाँ, बात चली थी महाराणा के जन्मदिन की। इसबार जन्मदिन अलग तर्ज़ पर मनाया गया। इसबार उस महाराणा का जन्मदिन नहीं मनाया जा रहा है जो हल्दी घटी के युद्ध के लिए विख्यात हैं।जिन्होंने अकबर से पराजय स्वीकार करने की बजाय अरावली के जंगलों में रहना स्वीकार किया। जिन्हें अपनी धरती से प्यार था और जो उसके लिए जान भी दे सकते थे।

सन्देश यही उपदेश यही

कहता है अपना देश यही

वीरो दिखला दो आत्म-त्याग

राणा का है आदेश यही

लेकिन अब कुछ लोगों के लिए महाराणा आत्म त्याग के प्रतीक नहीं हैं।वे हारे ही नहीं तो त्याग कैसा? अचानक कुछ इतिहासकार पैदा हो गए हैं महाराणा हल्दी घाटी का युद्ध हार ही नहीं सकते थे। वे तो विजयी हुए थे।यहीं पर इन इतिहासकारों ने अंग्रेजों के विभाजन के अजेंडे को एक कदम आगे बढ़ा दिया। इसमें एक बहुत बारीक चाल है कि “ एक मुसलमान एक राजपूत राजा को कैसे पराजित कर सकता है? बस यहीं से शुरू हो गयी सदियों के इतिहास को बदल डालने की साजिश।“ यहाँ इतिहास के बिम्ब अपने अर्थों से स्खलित हो रहे हैं। हमारे लिए महाराणा हिन्दू- मुसलमान से अलग भारतवर्ष की शान थे, आन थे , प्रेरणा के स्रोत थे। प्रताप के लिए देशवासियों को किसी किताब, भाषण या बहस की ज़रुरत नहीं थी।अदम्य वीरता के प्रतीक थे। स्कूलों में इमरान हों या ईश्वरचंद या एडवर्ड वे आपसी बहस में कहा करते थे कि मेरी ये कलम है वह मराना प्रताप की तलवार है। अब प्रताप बंट गए। गाय - बकरे वाले बंटवारे में फँस गए। इन दिनों देश में प्रतीकों का एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है। एक पक्ष को सगा बनाने के चक्कर में लोग दूसरे पक्ष को दुश्मन साबित कर रहे हैं। यह ट्रेंड भगवान् राम से शुरू हुआ था।भगवान राम को सगा साबित करने के लिए यह बवंडर खडा किया गया कि उनके घर दूसरी जाति के लोगों ने कब्ज़ा किया हुआ है। इसके बाद यह बढ़ता हुआ अन्य बिम्बों तक चला गया। अब महाराणा भी इस ट्रेंड सेटिंग के शिकार हो गए। इस सारी कवायद का धेय्य है महाराणा को एक ख़ास जाति , एक ख़ास धर्म का घोषित कर दूसरे को दुश्मन बनाना। अभी भी समय है इतिहास के प्रतीकों का राजनीतिकरण होने से बचाया जा सकता है।       

My story in sanmarg Ravivariy

Tuesday, May 15, 2018

हकीकत के खिलाफ जंग

हकीकत के खिलाफ जंग

कर्नाटक चुनाव के कई मायने लगातार खुल रहे हैं। इसका राजनीतिक नतीजा क्या होगा और क्या होना चाहिये यह यहां बहस का मुद्दा नहीं है बल्कि बात है उस चुनाव के लिए  प्रचार में प्रधानमंत्री के भाषणों का समाज ओर उनके भक्तों के सोच पर प्रभाव का। बेशक प्रधानमंत्री देश का ओर उस देश में गुजर रहे वक्त का वह अगआ होता है। इसलिये उसकी हरबात का समाज पर प्रभाव पड़ता है। अब जरा कर्नाटक चुनाव के प्रचार अबियान में प्रदाानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों का विश्लेषण करें तो दंग रह जायेंगे तथा यह सोचने लग जायेंगे कि हम किस काल में सांस ले रहे हैं। आप सोचेंगे कि क्या यह 2018 है या फिर 1957 के नेहरू काल में। क्या हमसे उम्मीद की जाती है कि उस काल में जो हुआ उस आधार पर हम वोट डालें या फिपर सोंचें कि क्यों नहीं डालें। क्या हम इस बात पर सोचें कि नेहरू ने भगत सिंह से मुलाकात की थी या नहीं या नेहरू ने जनरल करियप्पा को बेइज्जत किया था अथवा नहीं। ... ओर क्या हम उस काल की घटनाओं पर यह फैसला करें कि वोट ​किसे देंगे या आज के हालात के आधार पर? हकीकत के आधार पर या हकीकत के आभास के आधार पर वोट डालें।वक्त के हाकिम द्वारा देश की निवासियों पर सच्चाई के खिलाफ एक जंग थोपने की कोशिश इसे माना जायेगा। पिछली सदी में एक फ्रांसीसी दार्शनिक हुआ था ज्यां बॉदरी उसने एक सिद्धांत प्रतिपादित किया था - साइमुलक्रा एंड साइमुलेशन। इस सिद्धांत में बॉदरी ने सच्चाई, प्रतीक और समाज के सम्बंधों की व्याख्या की है। बॉदरी ने इसके लिये एक आख्यान पेश किया हे कि एक राजा ने अपने साम्राज्य का एक विशाल नक्शा बनवाया। बेहद विशाल था वह। इतना विशाल कि एक बार कोई उसे देख ही नहीं सकता था। नतीजा यह हुआ कि जनता उसी नक्शे के ख्याल में डूबी रहती थी और साम्राज्य डूब गया। आज पूरी दुनिया में यही चल रहा है कि शासक वर्ग गढ़े हुये बिम्बों , विकृत हकीकतों, सोचे समझे गये फौजी हमले तथा अन्य मनोवैज्ञानिक कार्रवाइयों के जरिये एक नये छद्द विश्व में जीने के लिये और उस दुतिनया के रिवाजों को मानने के लिये बाध्य किया जाता है। इसका सब्से सटीक उदाहरण रामायण में सीताहरण का आख्यान है जिसका अंत एक संस्कृति के विनाश से होता है। जंगल का वातावरण, सीता की सुरक्षा ओर इसमें सोने का हिरण। राम तय नहीं कर पाये कि हिरण सोने का नहीं हो सकता ओर वे उसके भ्रम में फंस गये। यहां मौलिक कारण है कि लोगों के सोचने समझने की क्षमता को नियंत्रित करना ओर फिर उन्हें अपने लक्ष्य की ओर प्रवृत करना। यह वैश्विक फिनोमिना है। आज के जमाने में इसका औजार ​मीडिया है। जो एक आभासी सत्य का सृजन करता है। अच्छे दिन आयेंगे के वायदे से आरंभ हुआ यह प्रयास आज देश में हकीकत के खिलाफ एक जंग के रूप में बदल गया है। इसमें जनता का पहला कर्तव्य है कि वह सच के संधान का प्रयास करे। क्योंकि अपने देश की सम्प्रभुता , एकता , अखंडता और स्वतंत्रता को कायम रखने के लिये यह जरूरी है। 

Monday, May 14, 2018

मोदी जी के नेपाल यात्रा 

मोदी जी के नेपाल यात्रा 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि भारत और विदेशों में भी एक निर्णायक व्यक्ति की है। प्रधानमंत्री जी दो दिवसीय नेपाल यात्रा कल समाप्त हुई। भारत के किसी भी नेता का नेपाल जाना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि सैकड़ों वर्षों से सभ्यता और संस्कृति का दोनों देशों में प्रगाढ़ सम्बंध रहा है। इस यात्रा में भी कई चीजें महत्वपूर्ण दिखीं। पहली तो मोदी जी की यह यात्रा घोषित तौर पर  राजनीतिक नहीं थी, इसे " धार्मिक और सांस्कृतिक " यात्रा कहा गया था। एक तरफ नेपाल की​ सरकार मालेदी जी को खुश रखने में जुटी थी दूसरी तरफ वहां की जनता इसका विरोध कर रही थी। हालांकि नेपाली मीडिया में ऐसा कुछ नहीं दिखा पर सोशल मीडिया में इसकी बाढ़ आयी हुई थी। वहां फेसबुक और ट्वीटर में अक्सर देखा जाता था कि लोगों ने लिखा कि "  ब्लॉकेड वाज क्राइम मि.मोदी " तथा " मोदी नॉट वेलकम। "  जनता चाहती थी कि मोदी 2015-16 की आर्थिक नाकेबंदी के लिये माफी मांगें। इस विरोध कने भी रंग थे। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के झत्र 36 घंटे की भूख हड़ताल पर बैठे थे। बाकी नौजवानों ने ने रात 8 बजे काठमांडू की बत्रियां गुल करने की मांग कर रहे थे ता​कि मोदी जी देख सकें कि नाकेबंदी के दौरान काठमांडू दिखता कैसा था। विरोधकरने वाले छात्रों की एक विज्ञप्ती में कहा गया था कि" 2015 के भारी भूकम्प में 9000 लोग्का मारे गये थे और यहां की जनतता को उम्मीद थी कि भारत मदद करेगा , इसके बदले भारत ने 3 महीने की आर्थिक नाकेबंदी लगा दी। हम भारत के प्रधानमंत्री सेस्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमने इस नाकेबंदी को भूला नहीं है। " इसी तरह, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी(क्रांतिकारी माओवादी ) सहित कुछ राजनीतिक दलों ने  उनकी यात्रा के खिलाफ काठमांडू भर में विरोध का आयोजन किया था। हालांकि लोगों का विरोध मोदी जी के खिलाफ था पर उनका गुस्साा अपनी सरकार पर भी था। यह गुस्सा प्रधानमंत्री के पी ओली के चुनाव अभियान में भारत विरोधी बड़बोलेपन का नतीजा था। उन्होंने अपने भाषणों में जनता से बार बार अपील की थी कि भारत की आर्थिक नाकेबंदी को भूलेंगे नहीं। उन्होंने खुद नो ऐसा दिखाया था कि " हमेशा टांग अड़ाने वाले भारत के खिलाफ वे अपना पद तक त्याग सकते हैं।"पहली बार जब वे प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने भारत से बदला लेने के लिये चीन से सीमा समझौता किया। अब नेपाल की जनता इस तरह का विरोध प्रदर्शन कर अपने प्रधानमंत्री को ही अपमानित करना चाहती थी। 

  वैसे भी नेपाल की जनता के लिये मोदी केवल भारत के प्रधानमंत्री ही नहीं हैं बल्कि हिंदू प्रतीक चिन्ह भी हैं। इसलिये नेपाल की जनता मोदी जी को अपने देश के अलोकतांत्रिक अतीत से भी वाकिफ कराना चाहती थी। नेपाल के नौजवानों ने राजतंत्र के दौरान बहुत पीड़ा सही​ है। शाासन ने उनकी पढ़ाई लिखाई , जीवन यापन इत्यादि पर भी रोक लगा दी थी। कई पीढ़ियों तक नेपाल के नौजवान विदेशों में मज्9ादूर या भाड़े के सैनिक के तौर पर जीवन बिताये हैं। अपवादों को छोड़ दें तो कहा जा सकता है कि नेपाल के हर परिवार के एक या दो सदस्य रोजाना विदेशों में नौकरी के लिये घर छोड़ते थे और यह सिलसिला पीढ़ियों तक चला। औसतन रोज तीन नेपाली विदेशों में मरते थे।

1996 में नौजवानों का गुस्सा माओवाद राजशाही के खिलाफ भड़का। दस वर्षों में 250 साल पुरानी राजशाही ध्वस्त हो गयी। मोदी जी का आना कुछ ऐसा लग रहा था उन नौजवानों को कि नये धर्मनिरपेक्ष नेपाल में कोई हिंदुत्व का प्रचार करने आया है। नेपाली युवा चिंतित हो उठे थे। वे मोदी जी को अतीत के बिम्ब के तौर पर देख रहे थे। यही नहीं, मोदी जी की सरकार की क्षेत्रीय नीतियों की नाकामयाबी का भी यह सबूत  था। पहली बार 2014 में जब मोदी जी नेपाल गये थे उन्होंन वहां की सांविधानिक सभा की प्रशंसा में नेपाली में भाषण दिया था। भारत के किसी भी प्रधानमंत्री की यह 17 साल में पहली यात्रा थी। यहां तक कि उन्होंने मधहेसियों से भी सहयोग की अपील की थी। इसके बाद धीरे- धीरे  वे प​श्चिम की ओर झुकने लगे। वे दक्षिण एशिया को एक जुट रखने में असफल हो गये। रोहिंग्या संकट में उन्हें नैतिक नेतृत्व नहीं दे सके ओर डोकलाम में बिनावजह टांग अड़ा कर खुद को असफल साबित कर दिया। 

  मोदी जी  की वर्तमान यात्रा कम से कम एक पड़ोसी को साथ रखने की चिंता से भरी यात्रा कही जायेगी। लेकिन शुरूआम में ही एक ही धर्म की बात उठाकर उन्होंने अच्छा नहीं किया। इससे नेपाल को मित्र बनाने के बदले उन्होंने उसे अपने से अलग कर दिया।     

Sunday, May 13, 2018

भारत में खुशहाली बढ़ी है पर ख़ुशी नहीं

भारत में खुशहाली बढ़ी है पर ख़ुशी नहीं

 राष्ट्र संघ के वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट 2018 के अनुसार विश्व के 156 देशों में भारत का स्थान 133 वां है। यह रैंकिंग 2015 से 15 अंक नीचे है। यह हालत तब है जब भारत की जी डी पी और स्वस्थ जीवन तथा उम्र सीमा में भी सुधार हुआ है। यह सम्पन्नता की पहचान है। यानि कुल मिलाकर पिछले तीन वर्षों में हालत सुधारे हैं। लेकिन इस रिपोर्ट के लिए जब 2017 में सर्वेक्षण चल रहा था उसमें शामिल लोगों ने काफी इत्मीनान और संतोष ज़ाहिर किया। खास कर के यह संतोष व्यक्तिगत आज़ादी को लेकर ज़ाहिर किया गया। व्यक्तिगत आज़ादी से यहां मतलब है जीवन के बारे में चुनाव से। लोगों ने सरकार के प्रति भी ज्या भरोसा जाहिर किया। लेकिन तब आज वह कौन सी बात है जो भारतियों को पिछले तीन साल के मुकाबले कम ख़ुशी दी है? भारतीय इस उपमहाद्वीप में सबसे कम खुश लोग हैं क्यों ? भारतीय उपमहाद्वीप में जितने भी देश हैं उनमें ख़ुशी के मामले में हमारा स्थान सबसे नीचे क्यों है? रिपोर्ट के मुताबिक़ म्यांमार (130), श्रीलंका (116), बंगलादेश(115), नेपाल (101), भूटान (97), चीन (86) और पकिस्तान (75) । सबके सब भारत से ज्यादा खुश मुल्क हैं। हम भारतीय  कमज़ोर सामाजिक समर्थन, उदार समाज के अभाव और और हरदम चिंतित तथा गुस्से में रहने वाले लोग हैं। हम भारत के लोग सकारात्मक भाव को महसूस नहीं करते, खुल कर हंसने - हंसाने से कतराते हैं । यही नहीं, समाज विज्ञानियों के अनुसार सामाजिक –आर्थिक असमानता प्रति व्यक्ति जी डी पी के विकास  की राह में रोड़े अटकाता है और लोगों में ख़ुशी के अवसर कम करता है। दरअसल जी डी पी स्वभावतः एक सूचकांक है और यह लोगों की खुशहाली तथा ख़ुशी को प्रक्षेपित करने के उद्देश्य से बनाया गया है और न यह पर्याप्त रूप में ऐसा कर सकता है। यही कारण है कि 2011 में राष्ट्र संघ महा सभा ने सदस्य राष्ट्रों से कहा था कि वे कोई ऐसी विधि विकसित करें जो मनुष्य के आनंद  की खोज और खुशहाली को निर्देशित करने वाली सार्वजनिक नीति बन सके। 2012 से राष्ट्रसंघ दुनिया के देशों में ख़ुशी के भाव पट एक रिपोर्ट जारी करता है। इसमें ख़ुशी के कारण और दुःख के सबब की व्याख्या रहती है। भारत ने 2014-15 में जी डी पी में रिकार्ड विकास दर दर्ज किया।आंकड़े बताते हैं कि 2016-17 में भी उसने ऐसा ही किया। प्रति व्यक्ति जी डी पी जीवन स्तर के सूचकांक के तौर पर अक्सर इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यह उसी समाज में होता है जहां आय और सम्पति का समानता से वितरण हुआ हो। भारत में आय , धन और मानवीय पूँजी में असमानता साफ़- साफ़ दिखती है। यहाँ किसी का भविष्य इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह किस परिवार में जन्मा है। यही नहीं जो ढाँचे लोगों में सक्रियता जैसे प्राथमिक शिक्षा का अधिकार या सार्वजनिक स्वास्थ्य रोजना इत्यादि तेजी से ख़त्म हो रहे हैं। मनुष्य में सामाजिक और आथिक सक्रियता तेजी से घघट रही है। अब जबकि प्रति व्यक्ति आय  बढ़ रही है तो असमानता भी। 2014 में भारत की जी डी पी बढ़ी थी तो सामाजिक आर्थिक असमानता भी उतनी तेजी से बढ़ी थी। 2013 में भारत में 39 करोड़ लोग देश के कमाने वाले लोगों में से आधे थे जो शीर्ष एक प्रतिशत लोगों की आय का 67 प्रतिशत कमाते थे। इन एक प्रतिशत लोगों की संख्या 78 लाख थी। जबकि 1980 में देश के निचले 50 प्रतिशत लोग देश सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों की आय से 319 प्रतिशत ज्यादा कमाते थे। सामाजिक असमानता ख़ुशी को ख़त्म कर देती है। अमरीकी अर्थशास्त्री रिचर्ड इस्टरलिंग ने 1970 में अपने शोध में दिखाया है कि 1946 और 1970 की आय के अनुपात ने किस तरह ख़ुशी को भी प्रभावित किया है।

विगत तीन साल में भारतीय नागरिकों ने सकारात्मक भाओं को कम अनुभव किया है। उनमें नकारात्मक भाव ज्यादा दिखें हैं। आप खुद में झांक कर देखें कि पूरे दिन खुश रहने के अवसर विगत एक हफ्ते में कितनी बार प्राप्त हुए हैं। ख़ुशी के सूचकांक को तैयार करने के दौरान जब सर्वेक्षण में शामिल लोगों से पूछा गया कि पिछले दिन आप कितने गनते हँसे और खुश महसूस किया तो सबका नकारत्मक उत्तर था। भारत में ख़ुशी के मौके घट रहे हैं और सकारात्मकता के अवसर कम हो रहे हैं। वे ज्यादातर गुस्से में या चिंतित रहते हैं। ख़ुशी विषयनिष्ठ अहसास है और सरकार को चाहिए कि इसका ध्यान रखे क्योंकि हर आदमी के जीवन का लक्ष्य ख़ुशी हासिल करना ही है।