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Friday, September 22, 2017

शिक्षा की दुरावस्था

शिक्षा की दुरावस्था

शिक्षा के विकास के नाम पर भारत में दो असंतुलित कार्य हो रहे हैं. एक तो बच्चों को दनादन स्कूल भेजा जा रहा है , जिससे स्कूलों  में छात्रों की बाढ़ आ गयी है और उनका बोझ संभाले नहीं संभल रहा है और दूसरा की शिक्षा एक धंधा बनता जा रहा ही. उस धंधे में प्रतियोगता को बढ़ावा मिल रहा है. बड़े पैमाने पर महंगे स्कूल खुल रहे हैं. बच्चों की देख बाल नहीं हो पा रही है लिहाजा अप्रिय घटनाएं घट रहीं हैं. शिक्षा का मूल उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा हैं. शिक्षा, शिक्षक और शिक्षण की श्रृंखलाबद्ध प्रतिरिया के अंतर्गत अच्छे शिक्षकों  का बड़े पैमाने पर अभाव होता जा रहा है और इस अभाव के कारण शिक्षण प्रभावित हो रहा है जिससे शिक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है. ख़ास कर भाषा को लेकर.

 एक वैश्विक अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक़ देश में जितने छात्र अभी हैं , खास कर सेकेंडरी कक्षाओं में उतने पहले कभी नहीं रहे पर उन्हें पढ़ाया नहीं जा पा रहा है. जो कमजोर वर्गों के छात्र  हैं उनकी हालत तो और खराब है. तेलंगना और आन्ध्र प्रेअदेश जैसे अपेक्षाकृत एडवांस राज्यों की भी स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं है.

    ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा चार देशों में किये गए इस अध्ययन के अनुसार भारत में दो ही बातें  सकारात्मक हैं पहली कि क्लास 9 में छात्रों की सामान्य उम्र 15 पायी गयी है यानी ये बच्चे पहली क्लास में 5 वर्ष की उम्र में आ चुके थे. इधर अंग्रेजी माध्यम से बच्चों को पढ़ाने का लोभ और शिक्षण में अच्छे शिक्षकों का अभाव के कारन बच्चे ना हिंदी सीख पाते हैं और ना अंग्रेजी. 2009  ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के आकलन कार्यक्रम ( प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल  स्टूडेंट असेसमेंट , पीसा) में अंग्रेजी , हिंदी और बोलचाल की भाषा के पाठ में औसत से भी खराब प्रदर्शन किया था. दूसरे देशों ने हमारे छात्रों से बहुत अच्छा किया था. इसका मुख्य कारण हमारे देश में शिक्षा की गुणवत्ता का अभाव. हमारे छात्रों की हालत यह है की ना वे अच्छी  अंग्रेजी जानते हैं ना अच्छी  हिंदी. औसत छात्र दोनों में से किसी भाषा में पांच सुसंगत पंक्तियाँ नहीं लिख सकते. अंग्रेजी के जानकार होने का दवा करने वाले हिंदी के शब्दों का सही उच्चारण नहीं कर पाते. मसलन दत्त को दत्ता , बुद्ध को बुद्धा , अशोक को अशोका कहना आम बात है. अभी हाल में एक आयोजन में एक बड़े लेखक और विद्वान को “ शिव को शिवा ”  कहते सुना गया , जबकि वे महाशय पौराणिक विषयों पर लिख कर करोड़ों कमाते हैं. अब उन्हें कैसे बताया जय कि शिव और शिवा के अर्थ पुराण में भिन्न हैं.

  इसका मुख्य कारण है कि हिंदी माध्यम के स्कूलों में सही शिक्षण का अभाव . अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के प्रति मोह इसी गुणवत्ता का लोभ है. इस लोभ के कारन समाज में मनोवैज्ञानिक परिवर्तन देखने को मिल रहा है. अगर कोई हिंदी में या अपनी क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा ग्रहण करता है तो उसे निम्न स्तर का माना जाता है. इससे सामाजिक प्रतिष्ठा के जुड़ जाने के कारण अब लोगों के सामने कोई चारा नहीं रह जाता कि वे बच्चों को अनिवार्य रूप से अंग्रेजी की शिक्षा दें. लेकिन वास्तविकता तो यह है कि अधिकाँश अंग्रेजी स्कूलों में भी वही हाल है. अंग्रेजी पढ़े ऐसे नौजवान मिलेंगे जो अखबारों की ख़बरों को भी ठीक से नहीं समझ पाते. इस हालत में उन्हें अंग्रेजी हिंदी और अपनी भाषा की खिचड़ी के अलावा कुछ हाथ नहीं लगता. अंग्रेजी की गम्भीर पुस्तकों को पढ़ने की बात छोड़ दें तो भी वे अंग्रेजी से जूझने में अपनी सारी शक्ति खर्च करते हैं और मजबूरन अपनी भाषा या हिंदी के ज्ञान के प्रति लापरवाही बरतते हैं.और इस प्रक्रिया में उन्हेंभाषा  की भ्रमित खिचड़ी के अलावा कुछ हाथ नहीं लगता. इसी के साथ उनकी विचार क्षमता पर भी गंभीरप्रभाव पड़ता है क्योंकि भाषा शब्दों को समझने,विचारों को तौलने  और संवाद के प्रयोग का प्राथमिक साधन इसका मतलब यह भी है कि हमारी राजनीति में उन लोगों का प्रभुत्व हो चुका है जो गुणवत्तापरक शिक्षा नहीं प्राप्त कर पाये हैं.इसीलिए शिक्षा स्तरहीन होटी जा रही है. 
   

Thursday, September 21, 2017

असमानता ही समस्याओं का मूल

असमानता ही समस्याओं का मूल

19 शताब्दी के आरम्भ में हीगल ने लिखा था कि गरीबी लोगों में अनैतिकता को जन्म देती है. हीगल का मानना था कि गरीबी की अवस्था कोई दोष नहीं है यह औद्योगिक समाज की देन  है. अति उत्पादन तथा  कम खपत  के फलस्वरूप समाज व्यवस्था में बदलाव आता है. इस बदलाव के बाद खुद समाज अपने सदस्यों को ऊपर आने से रोकने लगता है.उन्हें सिविल सोसाइटी की एकजुटता के लाभ से वंचित कर दिया जाता है और तदन्तर वे गरीब लोग समाज के कचरे के रूप में तब्दील हो जाते हैं. हीगल के अनुसार जब एक बड़े समूह का जीवन स्तर एक ख़ास स्टार से नीचे आ जाता है तो वह अच्छ और बुरे का ज्ञान खो देता है, इमानदारी और आत्म सम्मान का भाव खो देता है.  हमारे वांग्मय में भी लिखा है कि “ बुभुक्षितः किम ना करोति पापं .” गरीबी एक सामाजिक फिनोमिना है. समाज गरीबी की उत्पति में शामिल रहता है और गरीबी दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियां पैदा करती है, पीड़ा को बढ़ाती हैं और इसके बाद इंसान गंभीर तौर पर अनैतिक हो जाता है. इसके गरीबों की बड़ी संख्या स्थानीय सामाजिक व्यवस्था के लिए ख़तरा  बन जाती है क्योकि गरीब समाज के लाभ नहीं हासिल होने की कारण दुखी और  गुस्से में रहते है . इससे साफ़ लगता है कि समाज ने अपने लोगों पर जो गरीबी का जो बोझ रख दिया है वह साड़ी समस्याओं का मूल है. भारत की ही स्थिति देखें, आंकड़े बताते हैं कि यहाँ 1922 तक आय की असमानता चरम पर थी. समाज के एक प्र्तातिशत लोग 22 प्रतिशत आय पर कब्ज़ा किये बैठे थे. ये आंकड़े सत्ता में बैठे उन लोगों को संकेत दे रहे हैं बुनियादी मानवीय स्वतन्त्रता में कटौती कर रहे हैं, जात्ती पांति की सियासत कर रहे हैं और विरोध को निर्ममता से दबा दे रहे हैं. आज भी हज़ारों भारतीय की गरीबी मन को बेहद दुखी कर देने वाली है. देश में आज भी ऐसे गरीब हैं जिस की स्त्र्हित्री पर भरोसा नहीं हो सकता है. फ़र्ज़ करें कि कोई गरीब है यानि वह उन संसाधनों को हासिल नहीं कर सकता जो अन्य हासिल कर सकते हैं. यानि गरीबी असमानता की पहचान है.

  अब गरीबी केवल आंकड़ों की बात नहीं है यह उस समाज का बिम्ब भी है जिसमें हम जी रहे हैं. अगर समाज की अर्थ व्यवस्था इसका कारण है तो उस व्यवस्था को दूर करने की मांग की जा सकती है, वंचित समूह को इसका हक है. लेकिन अगर उन्हें न्याय नहीं मिला तो यही गरीबी धीरे धीरे जड़ पकड़ने लगती है और यह उनका मुकद्दर बन जाता है.वे अच्छा जीवन नहीं जी न सकते समाज उन्हें नज़रंदाज़ कर देता है, गरीब चुनाव को छोड़ कर राजनीती के लिए भी व्यर्थ  हो जाते हैं. वे समाज में उस स्तर पर सुविधाओं का उपभोग नहीं कर सकते ना समाज की गतिविधियों में हिस्सेदार हो सकते हैं जिस तरह से अन्य  लोग होते हैं, हालांकि वे भी उसी समाज का हिस्सा है. असमानता का सबसे ज्यादा प्रभाव बुनियादी लोकतान्त्रिक नियमों पर पड़ता है. अत्यंत गरीब मजबूरी के कारन लोकतान्त्रिक नियमों को भंग करते हैं और अत्यंत आमिर अपनी अमीरी बढाने के लिए समानता के नियम जैसे लोकतान्त्रिक नियमों को भंग करते  हैं. एक आधार पर खड़े लोगों में दूसरे की तुलना में कुछ ना कुछ समानता होती है. जैसे की इतिहास बनाने की क्षमता. हर आब्द्मी दूसरे की तुलना  में अपना इतिहास बना सकता है. लेकिन यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण है कि हर आदमी को अपनी क्षमता पर भरोसा रहता है. बराबरी का सिद्धांत नैतिकता जैसे लोकतान्त्रिक सिधान्तों को जन्म देता है.किसी भी आदमी के साथ जाती, नस्ल या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता लेकिन गरीबी इस भेदभाव को बढ़ा देती है. समाज में असमानता बढ़ने  लगती  है और इसी के साथ बढ़ने लगती हैं विभिन्न तरह की समास्याएं.इनका सीधा राजनितिक प्रभाव पड़ता है. इससे समाज का सामूहिक जीवन प्रभावित होने लगता है. इसके फलस्वरूप अशुभ का अवघटन  आरम्भ होता है.  वह राजनीती के रूप में दिखने लगता है. कुछ लोग समानता हासिल करने के लिए सत्ता के साथ हो जाते हैं कुछ उसके विरुद्ध खड़े हो जाते हैं. गायों की हिफाज़त के नाम पर गौकुशी करने वालों को कटा जाने लगता है , विरोध में बोइलने के लिए पत्रकार को गोली मार दी जाती है. ये सब असमानता से उतपन्न दुर्गुण हैं. यह देश में कई सौ वर्षों की सामाजिक असमानता का परिणाम है. इसी असमानता को समाप्त करने की आशा में  कम्युनिज्म के नाम पर जितने लोग मारे गए उतने आज तक दुनिया के किसी युद्ध में नहीं मारे गए.इससे ज़ाहिर होता है की आर्थिक खुशहाली सामाजिक  समानता का प्रमुख कारण है. अब आर्थिक समानता हासिल करने के लिए खून खराबा होना शुरू होता है, अपराध बढ़ने लगते हैं और लोकत्रांत्रिक नैतिकता घटने लगती है. इसे रोकना होगा और इसके लिए ज़रूरी है की देश में सत्ता आर्थिक न्याय की और प्रवृत हो.       

Wednesday, September 20, 2017

ट्रंप की चेतावनी

ट्रंप की चेतावनी

किसी फ़िल्मी गाने की पंक्ति है ,

एटम बमों के जोर पर ऐंठी है दुनिया

बारूद के एक ढेर पर बैठी है दुनिया

आज अगर हम चारो तरफ देखें तो लगता कुछ ऐसा है. मंगल वर को ही अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्राम ने राष्ट्रसंघ के अपने पहले भाषण में कहा कि वे उत्तर कोएइअ को नेस्तनाबूद कर देंगें. उन्होंने देशों की संप्रभुता पर बल दिया और कहा कि उनके लिए “ अमरीका सर्वप्रथम है.” ट्रंप ने फ़्रांस के राष्टपति एमनुअल मैकरोन से भी मुकाकात की और मैकरोन ने राष्ट्रसंघ में भाषण दिया. ट्रंप ने उत्तर कोरिया की परमाणु चुनौती के सन्दर्भ में कहा कि अमरीका के पास ताक़त के साथ साथ धैर्य है पर यदि उसे या उसके साथियों को तंग करने की कोशिश की गयी  तो वे उसे मिटा देंगे. ट्रंप ने कहा कि उत्तर कोरिया के शासक आत्मघाती कदम उठा रहे हैं. उनकी इस बात से वहाँ फुसफुसाहट होने लगी. उन्होंने इरान को भी चेताया कि पिछले राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा किये गए परमाणु समझौते संशोधन करेंगे. उन्होंने कहा कि ईरान सरकार ने लोकतंत्र के मुखौटे के पीछे तानाशाही का चेहरा छिपा रखा है. ट्रंप की इस बात से दुनिया में तनाव छ गया है. इरान के विदेश मंत्री ने ट्वीट  किया कि ट्रंप  को शायद मालूम नहीं है इस तरह के नफरत भरे भाषण मध्य युग की बातें हो चुकी हैं, 21 सदी में इसका कोई मूल्य नहीं है.ट्रंप की बात तो काबिल- ए – जवाब भी नहीं है ट्रंप ने कहा कि  वे कट्टरपंथी इस्लाम को अपने देश में पनपने नहीं देंगे. उन्होने कहा की यह वक़्त है अल कायदा और तालिबान जैसे कट्टरपंथी संगठनों की पोल खोलने की. उन्होंने सीरिया की सरकार की भी आलोचना की. हालांकि ट्राम ने रोहिंग्या संकट की कोई चर्चा नहीं की.

इधर अमरीका और जोआन के साथ त्रिपक्षीय बैठक में भारत की विदेश मंत्री शुसमा स्वराज ने कहा कि परमाणु तकनीक उत्तर क्लोरिया तक कैसे पहुंची इस बात की जांच हो. उत्तर कोरिया ने राष्ट्र संघ और ज्यादातर देशों के विरोध के बावजूद हैद्रिजन बम का टेस्ट किया था और जापान के ऊपर से मिसाइल दागी थी थी.

    उत्तर कोरिया को नेस्तनाबूद  कर देने की धमकी देने वाले ये ट्रंप वही हैं जिन्होंने जून 2013 में सीरिया पर केमिकल बम से हमले को अमरीका की सबसे बड़ी गलती कहा था और कहा था की कई और अशुभ होने वाले हैं. आज जो उन्होंने कहा उससे तो यही ध्वनि निकलती है कि सचमुच कुछ अशुभ होने वाला है. वैसे अपनी जिद या अपना वर्चस्व कायम  करने के लिए अमरीका ने कई बार ऐसा किया है , अभी कुछ साल पहले ही इराक को उसने बुरी तरह ध्वस्त कर दिया था. राष्ट्रसंघ में जो ट्रंप ने कहा उसके विश्लेषण से यही पता चलता है कि कुछ भी अशुभ हो सकता है.  क्योंकि आज की हमारी दुनिया युद्ध के ढाई दशक की दें है और इसमें मध्यपूर्व में अमरीकी हस्तक्षेप की घटना तो सब जानते है. बात इतनी ही होती तो गनीमत है. दर असल अमरीकी प्रशासन के अंदरूनी हिस्से में वैश्विक कम्मुनिस्टो का जत्था प्रवेश कर चुका है और वह अमरीकी व्यवस्था को भारी  तनावपूर्ण बना रहा है जिससे वैश्विक शान्ति भंगुर बनती जा रही है. ट्रंप का यह रुख नया नहीं है लगभग एक माह पहले उत्तर कोरिया के प्रति ट्रंप के रुख को देख्टर हुए अमरीकी ग्राश्त्रिय गुप्तचर संस्था के पूर्व प्रमुख जेम्स क्लैपर ने कहा कि “ ट्रंप का कथन तीसरे विश्व युद्ध में बदल सकता है. ट्रंप को बयान देने के मामले में बहुत सावधानी से काम लेना चाहिए.”

   हर युद्ध के पहले द्विधा लडती उबलते क्रोध से,

  हर युद्ध के पहले मनुज सोचता, क्या शास्त्र ही

  उपचार एक अमोघ है

अन्याय का अपकर्ष का, विष का, गरलमय द्रोह का.

ट्रंप के अबतक के  भाषणों की शब्दावालियों पर अगर गौर करें तो महसूस होगा की वे “ दुष्परिणाम, क्रोध, आग , हमला, हथियार “ जैसे शब्दों भरपूर प्रयोग करते हैं. ऐसे शब्द उत्तेजित मानसिकता के परिचायक हैं और इससे स्थिति अनियंत्रित हो सकती है. अनियंत्रण की सूरत में पूरा विश्व खतरे में पद जाएगा. जहां तक इरान की बात है अमरीका खास कर डोनाल्ड ट्रंप को उससे ख़ास चिढ है. हकीक़त यह है की इरान की रक्षा व्यवस्था अमरीका या कई यूरोपीय देशों से बहुत कमजोर है फिर भी उसे ही दोषी बताया जाता है. इगत महीने विख्यात अमरीकी विचारक नोम चोमोसकी ने भी कहा था की अमरीका विश्व शान्ति के लिए ख़तरा है.

अब चाहे जो हो हिंसा जन और धन दोनों की बलि लेती है. 2012 के उपलब्ध आंकड़े के मुताबिक़ उस वर्ष हिंसा पर काबू पाने के लिए वैश्विक लागत 9.5 ख़रब डॉलर थी. यह राशि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के 11 प्रतिशत है. यह वैश्विक कृषि क्षेत्र के लगत के दोगुने से ज्यादा है. किसी भी युद्ध के बाद चारो तरफ दरिद्रता , भुखमरी फ़ैल जाती है. मनुष्य दूसरे युद्ध से लड़ने लगता है.

 लड़ना उसे पड़ता मगर जीतने के बाद भी

रणभूमि में वह देखता सत्य को रोता हुआ.    

दशहरा में शस्त्रप्रदर्शन परम्परा को विकृत करने का प्रयास

दशहरा में शस्त्रप्रदर्शन परम्परा को विकृत करने का प्रयास

मर्यादा पुरुषोत्तम और भगवती की ओट में प्रपंच

हरिराम पाण्डेय

कोलकाता : पुरवाई की तरंगों में झूमते कास के फूल और पोखरों में खिलते कमल के बीच शंखध्वनि की तरंगों से ऊपर आती आवाज़ “ या देवी सर्वभूतेषु.....”  नवरात्री के आरम्भ की घोषणा है और इसी के साथ शुरू होता है बुराई से अच्छाई का युद्ध. अंततः बुराई पराजित होती है. यह सब जानते हैं लेकिन इस वर्ष हमारे शहर में हर्ष के साथ भय की हल्की छाया भी कहीं कहीं दिख रही है. उसका कारण है इसबार विजयादशमी को कुछ संगठनों द्वारा हथियारों के साथ जुलूस निकाले जाने की तैयारी की खबर. न जाने समय की किन गलतफहमियों के तहत शस्त्र पूजा को शस्त्र प्रदर्शन समझ लिया गया और राष्ट्रवादी संगठनो ने शस्त्र के साथ जुलूस निकालने की शुरुआत कर दी. इस तरह का विचार कभी अचानक या बेलौस या अर्थहीन नहीं होता. इसके पीछे एक लंबा प्रयास होता है अपने आतीत को झुठलाने का.क्योंकि ऐसे विचारों में चुनने का विकल्प शामिल रहता है और ऐसे लोग अपनी परम्पराओं को झुठलाने का विकल्प चुनते है. वरना हज़ारों वर्ष के लंकाविजय के तदन्तर दशहरा का के उत्सव में अचानक कुछ वर्षों से शस्त्रप्रदर्शन की जिद कैसे आ गयी. शस्त्रपूजन का उल्लेख तो शास्त्रों  में मिलता है पर उनके खुलेआम प्रदर्शन  का नहीं.हाँ,मध्यकालीन इतिहास में कहीं कहीं विजयादशमी के दिन युद्ध के लिए सेना के प्रयाण का प्रसंग है पर वह सोद्देश्य प्रयाण है प्रदर्शन नहीं.

  आज के युग में राजव्यवस्था तलवारों से नहीं चलती, हथियारों से नहीं निर्देशित होती बल्कि जनसेवा से चलती है. रामराज्य का उद्देश्य था समता  ,सौहार्द और समृद्धि. आज के युग में लोकतंत्र का भी यही उद्देश्य है. इसमें शस्त्रों की भूमिका अत्यंत सीमित है.

   जो लोग  राम जी का भक्त होने का दम भरते हैं उन्हें यह भी जानना होगा कि  उस राम ने कभी शस्त्र का प्रदर्शन नहीं किया. शस्त्र का प्रदर्शन देखने वालों में  भय का संचार करने के लिए होता है. इस तरह का प्रदर्शन मनोवैज्ञानिक रूप में  संचारी भाव है जो एक भयभीत आदमी दूसरों को भयाक्रांत करने के लिए करता है. गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है कि “ रामः शस्त्रभृतामहम् .” यानी शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ. प्रश्न है कि रावण  के हाथ में तो अनेक शस्त्र थे , वातावरण भी युद्ध का था और काल भी अर्जुन के मोह का था पर कृष्ण ने रावण का नाम नहीं लिया. उन्होने राम का ही नाम लिया. क्यों? क्योंकि राम के पास शस्त्र की मर्यादा थी वह प्रदर्शन की वस्तु नहीं था. शस्त्र का उपयोग केवल रक्षा के लिए है, कर्तव्य पालन के लिए है .  बाल्मीकि ने भी कहा है , “ यत् कर्तव्यं मनुष्येण धर्षणां प्रमिर्जता, तत् कृतं रावणं हत्वा मयेदं मानकांक्षिणा . ”  अर्थात्, “ हे सीता,अपने अपमान का बदला लेने के लिए एक मनुष्य का जो कर्तव्य होता है, रावण को मारकर मैंने वही किया है. बिना इसके मेरा सम्मान पुनः प्राप्त नहीं हो पाता. “ यानी राम ने केवल कर्तव्य पालन के लिए युद्ध किया था,किसी हिंसा के लिए नहीं , किसी ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नहीं. इसलिए शस्त्र का प्रयोग वही कर सकता है या  शस्त्र की मर्यादा वही कायम रख सकता है जो राम हो. दूसरा व्यक्ति यदि उपयोग करेगा तो हो सकता है वह जीत जाये तब भी उसके भीतर रावण कायम रहेगा. क्योंकि रावण के शस्त्र भय उत्पादक थे. रावण की पराजय यही थी की वह राम को अपने जैसा नहीं बना सका. राम तो राम ही रहे. जो लोग हथियारों को लेकर जुलूस निकालना चाहते हैं उन्हें शायद दूसरे विश्वयुद्ध का इतिहास मालूम होगा. इस युद्ध में हिटलर हारा था पर फासीवाद का जहर उसने दुनिया  में भर दिया. नतीजा हुआ कि हिटलर  परमाणु बम बनाने में हिचकता रह गया  और दुनिया ने बना लिया. हिटलर परास्त हो गया पर आज भी परमाणु बम के आतंक के रूप में वह ज़िंदा है. आज भी पूरा विश्व उस हथियार से आतंकित है. क्या मिला मानवता को उस युद्ध से.

      जो लोग भारत को राष्ट्र और स्वयं को राष्ट्र भक्त बताते हैं वे कितने भ्रम में हैं. वे शक्ति पूजा को शक्ति प्रदर्शन मानने लगे हैं और लोगों से मनवाने को उतारू हैं.. जिस देवी की पूजा करने की बात करते हैं और जिसके स्वरुप से भारत माता को चित्रित करते हैं उस देवी मन्त्र ही है "या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता..."और ऋग्वेद में कहा गया है - '' शुचिभ्राजा उषसो नवेद, यशस्वतीरपस्युवो नसत्याः ।'' अब शास्त्रों का प्रदर्शन किसके लिए? अगर इन देश भक्तों को अपनी उपस्थिति, अपना अस्तित्व ही प्रमाणित करना है तो राष्ट्र की पीड़ित मानवता की सेवा करे. जो लोग हथियारों के साथ यहाँ जुलूस निकाल कर आतंक की रचना करना चाहते हैं वे उसी हथियार को पिघला कर खेती के औज़ार और मानवीय कल्याण के लिए अन्य  उपस्कर तैयार कर लें  तथा देशवासियों की पीड़ा को समाप्त करने की चेष्टा करें. राम का वन जाना भी महलों से निकल कर मानवता की पीड़ा को महसूस करने का उपक्रम है. सीता हल के फाल से खेतों में निकली थी और राम ने उस सीता का वरण  किया यानी हमारी  कृषि संस्कृति जो आम जन के लिये साधन भी थी और साध्य भी. राम ने उसी संस्कृति का वरण किया और उसे एक राक्षस के चंगुल से वापस  लाने के लिए  अपने प्राणों को भी दाँव पर लगा दिया.

  हमारी संस्कृति में आज भी शास्त्रों की पूजा का प्रावधान इसी के लिए है कि हम उनका सही सम्मान कर सकें. जिनकी हम पूजा करते उनका अपमान हम बर्दाश्त नहीं कर सकते. माँ दुर्गा का जुलूस केवल उस भौतिक प्रतिमा के विसर्जन के लिए होता है. वह विसर्जन महिषासुर के वध के बाद होता है. यानी असुर के विनाश के बाद सुर समूह और मानव समूह को निर्माण एवं सृजन की जिम्मेदारी दी जाती है.    जिन्होंने देखा होगा उन्हें मालूम होगा कि महिलायें और कन्याएं उस विदाई को देख कर रो पड़ती हैं. उस भावुक तथा जिम्मेदारी भरे वातावरण में जो लोग हथियार लेकर जुलूस निकालना चाहते हैं वे इस राष्ट्र के भक्त तो कहे नहीं जा सकते क्योकि वे देवी की आश्वस्ति से आह्लादित समुदाय में आतंक का सृजन करना चाहते हैं. सेतुबंधन का वह प्रसंग सबको याद होगा जब राम ने तीन दिन  तक समुद्र की पूजा की थी और विनयपूर्वक राह मांगी थी इसके बाद उन्होंने सराशन का विकल्प चुना था. राम ने भी शक्ति की पूजा की थी. भारत मातृशक्तिआराधक राष्ट्र है. यहां गंगा माता है... गाय माता है... सिंधु माता है... वाणी माता है... नदियां माता है... नीम का पेड़ माता है... सृष्टि का कण-कण यहां माताहै – "या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता।"और माँ के सामने हथियारों का प्रदर्शन. कैसे भक्त हैं ये लोग?

 यही नहीं जो लोग यह कहते हैं की दशहरा के आयोजन से हिंदूवादी संगठनो का जोर बढेगा तो वे भी भ्रम में हैं . सच्चा सनातनी और रामभक्त तो वही है जो अपने भीतर के अहंकार को मार दे. न कि राम के प्रति आयोजनों को अवसर बनाकर जन को भ्रमित करने के लिए उसका उपयोग करे. यह तो छल है और बाली वध में एक मामूली सा छल करके राम शर्मिन्दा हो गए थे. दशहरा के आयोजन के आड़ में छल यह तो घोर पाप है. त्रेता में अयोध्या में “ भरत सम  भाई”  और द्वापर में हस्तिनापुर में “ दुर्योधन सम  भाई”  दो कालखंडों में दो आचरणों के बिम्ब हैं और दोनों के परिणाम सबके सामने हैं. जो अहंकारी है, जो छली  है  वह राम का भक्त हो ही नहीं सकता. जो ऐसा समझते हैं कि दशहरा के आयोजन से हिंदुत्ववादी ताकतों को प्रोत्साहन मिलेगा वे भ्रम में हैं या भावनाओं के साथ प्रपंच कर रहे है.