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Friday, June 22, 2018

अराजक स्थिति की ओर बढ़ता लोकतंत्र

अराजक स्थिति की ओर बढ़ता लोकतंत्र

पिछले कुछ दिनों से सबने गौर किया होगा हमारा लोकतंत्र एक अजीब से दौर से गुजर रहा है । हर आदमी चाहे वह जैसा भी हो राजनैतिक बनता जा रहा है, विचार शून्यता बढ़ती जा रही है। हम हम और हमारा समाज अपनी जरूरतों को पूरा करने के साधनों के बदले तरीकों पर ध्यान दे रहा है। बहुत सारी जरूरतें होती ही नहीं है हम विज्ञापन देखते हैं और आपने को  छोटा महसूस करने लगते हैं तथा उन विज्ञापनों के कारण हमारी जरूरतें पैदा हो जाती हैं। हमारे अंदर एक स्पर्धा भाव आ जाता है और हम जरूरतें गढ़ने लगते हैं। बाजार व्यवस्था का इन दिनों व्यवहार से देख कर विचार तक धर्म से लेकर सियासत और हमारी रोज की जिंदगी से लेकर अर्थव्यवस्था तक बोल बाला है। दरअसल यह सब जरूरतें गढ़ने और उन्हें पूरा करने पर आधारित हैं। इसी के साथ हमारा मध्यवर्ग भी फैल रहा है। उस मध्यवर्ग में करोड़ों ऐसे लोग शामिल होते जा रहे हैं जो मॉल की चमक, फास्ट फूड और पीठ पर बैग के लिए ही सारी जद्दोजहद करते हैं। छात्रों का काम बिना पाठ्यपुस्तक के चल जाता है और जो जरूरी है उसका काम कुंजी से चला दिया जाता है या फिर गूगल से। रोजमर्रा के सवाल बदल गए हैं। अब हम घर से निकलने के पहले यह जानना चाहते हैं क्या पूछते रहते हैं की क्या कीमत है या कितनी दूर है हम यह कभी नहीं पूछना चाहते कि हमारे समाज में क्या हो रहा है, हम कितने  विचारहीन होते जा रहे हैं। सभी देख रहे हैं कि दिल्ली में वहां के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने मंत्रिमंडल के कुछ साथियों के साथ उपराज्यपाल के यहां धरने पर बैठे हुए हैं और उनके बैठने का तरीका इतना विद्रूप है कि देखकर हर विचारशील आदमी को लज्जा आती है लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और ना इसे लेकर देश में कोई खलबली है। ये वो  लोग हैं जिन्हें  हमने चुना है।
जम्हूरियत वह तर्ज़े हुकूमत है
जहां बंदे गिने जाते हैं , तौले नहीं जाते।
हमने कभी खुद से नहीं पूछा कि हैम कौन हैं और हमने यह क्या किया। यही नहीं, हम यह भी नहीं सोचते कि कौन हमें कहां लिए जा रहा है जीवन का अर्थ क्या है दूसरे क्यों जरूरी हैं?
नोबेल पुरस्कार विजेता कवियत्री मार्था मेरिडोस ने लिखा है,
आप धीरे धीरे मरने लगते हैं 
अगर आप नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को 
वह जिनसे नम होती हैं आपकी आंखें 
और करती हो तेज आप की धड़कनों को
आप धीरे धीरे मरने लगते हैं 
अगर आप नहीं बदल सकते अपनी जिंदगी को

बहुत लोग ऐसे हैं जिन्हें जीवन की आपाधापी में ऐसे सवाल पूछने का वक्त ही नहीं मिलता। हर समाज को पहले प्रश्न पूछने का और विकल्प तलाश करने का अधिकार है। लेकिन, ऐसा कितने लोग करते हैं ? वैसे लोग हाशिए पर आते हैं और हाशिए से ही देखते समझते हैं। ज्यादातर लोगों का ध्यान नहीं जाता। यही कारण है कि अधिकांश आबादी जातियों और राजनीतिक गुट बंदियों में तक्सीम हो गई है। कोई इस राजनीतिक झंडे के नीचे खड़ा है तो कोई उस राजनीतिक झंडे का समर्थन कर रहा है। किसी के पास वक्त नहीं है की वैचारिक, बौद्धिक और रचनात्मक कार्य करें।

तुम शहर में हो तो हमें क्या गम, जब उठेंगे
ले आएंगे बाजार जाकर दिलोजान और

कभी कभी मन बहलाने के लिए या एकाकीपन को दूर करने के लिए कुछ मनोरंजन की जरूरत पड़ती है तो उस कुछ में साहित्य ,कलाएं और विचार इत्यादि हैं । पर कम से कम भारत में जैसा "संस्कृतिहीन और अल्प शिक्षित " वर्ग विकसित हुआ है और समाज पर अपनी धाक जमाए हुए हैं उससे लगता है कि उसे सृजन और विचार से कोई मेल नहीं रह गया । उसे बने-बनाए उत्तर  की जरूरत पड़ने पर कहीं बाहर से ले आएगा। उसे भाषा , संवाद नहीं जुमलेबाजी और झगड़े पसंद हैं। इलियट के शब्दों में कहें हम "आत्मतुष्टि के सूअरबाड़े " में रह हैं और अपने को नागरिक होने का और भारतीय होने का गर्व महसूस कर रहे हैं। हमारे लोकतंत्र की यह सबसे बड़ी चूक है कि वह हमें विचारशील या सवाल पूछने वाला नहीं बनाता । जो हालात हैं उससे तो ऐसा ही लग रहा है सवाल सिर्फ साहित्य में पूछे जा रहे हैं । हमारे लोकतांत्रिक समाज की यह विडंबना है कि हम एक ऐसे पथ पर बढ़ रहे हैं ,एक ऐसी व्यवस्था के साथ चल रहे हैं जो हमें विचार शून्य बना रहा है।
हो सकता है इस बात से बहुत से लोग इत्तफाक ना रखें और बेवजह दलीलें दें। लेकिन सोचिए पिछले लोकसभा के चुनाव के नतीजे क्या संकेत दे रहे थे ? यही न, कि पिछली सरकार के सारे दावे और प्रगति की बातें देश के एक बहुत बड़े वर्ग को पसंद नहीं थी। लेकिन उनकी अपेक्षाएं क्या थी इसके बारे में  उस समय कोई तस्वीर साफ नहीं थी ना आज है । जो भी चित्र दिमाग में आता है वह दूसरों का बनाया हुआ है ।या, हमें बताया जाता है कि क्या हो रहा है। सच क्या है हमने कभी पूछा ही नहीं । आज फिर क्या स्थिति है? देखिए संसदीय लोकतंत्र को चारों तरफ से ललकारा जा रहा है। लोकतंत्र के बुनियादी लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता है। मानवाधिकार के रक्षक के रूप में लोकतंत्र उतना ताकतवर और सफल नहीं हो सका जितनी उम्मीद थी। आज हमारे लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती है न्याय और अधिकार की डिलीवरी । इंसानी मूल्य और पोषक के रूप में उसकी उपयोगिता। लोकतंत्र की स्थापना में संस्थाओं का बहुत बड़ा योगदान है लेकिन संस्थाओं को टिकाऊ बनाने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं? आज किसी न किसी खेमे द्वारा हर संस्था पर उंगली उठाई जा रही है । लोकतंत्र की संस्कृति को संस्थागत स्वरूप में बदलने की कोशिश कहीं नहीं दिख रही है लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत इंसानी हिफाजत है।  चुनाव के बाद जो सरकार बनाई जाती है उसे जनता इसी हिफाजत के लिए ताकत प्रदान करती है। लेकिन उस शक्ति में कुछ विसंगति आ गई है। लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होती जा रही हैं ।एक तरफ लोकतंत्र की यह कमजोरी है और दूसरी तरफ जनता की विचार शून्यता। पूरा का पूरा समाज राजनीतिक बनता जा रहा है । इसे रोका नहीं गया तो भविष्य में एक   अराजक स्थिति पैदा हो सकती है।

Thursday, June 21, 2018

कश्मीर के लिए नयी समर नीति की जरूरत

कश्मीर के लिए नयी समर नीति की जरूरत

कश्मीर फिर से अशांत हो रहा है। सरकार ने वहां  रमजान के दौरान युद्ध विराम की घोषणा की थी और आतंकवादियों तथा उपद्रवियों के खिलाफ कार्रवाई रोक दी गई थी। उसका कोई खास असर नहीं हुआ । रमजान खत्म होते-होते कश्मीर में फिर से उपद्रव शुरू हो गए। सुरक्षाबलों पर पथराव होने लगे । जब तक युद्धविराम चल रहा था अब तक शायद उपद्रवी और आतंकवादी तैयारियों में जुटे थे और जैसे ही रमजान खत्म हुआ उन्होंने हमले आरंभ कर दिए। इसी दौरान पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या भी हुई। एक तरह से युद्ध विराम की अवधि का उनके द्वारा अपने अड्डे बदलने की सुविधा के रूप में उपयोग किया गया। 
    युद्ध विराम को अगर सैन्य शास्त्र की दृष्टि से देखा जाए तो यह रणनीति के मुकाबले बहुत ही मामूली बात थी। क्योंकि कश्मीर में आतंकवाद का स्वरुप बदल रहा है। वहां स्थानीय नौजवानों को भर्ती किया जा रहा है। उनसे निपटने के लिए जितनी फौज की जरूरत है उससे ज्यादा आतंकी वहां मौजूद हैं। यह नए आतंकी स्थानीय नौजवान हैं और काफी प्रभावशाली हैं तथा भावना के आवेग में आतंकियों के हत्थे चढ़ जा रहे हैं। खासकर एक आतंकी की अंतेष्टि या फौज से मुकाबले के दौरान यह उनसे जुड़ जा रहे हैं। अधिकारी परेशान हैं कि हालात से कैसे निपटें।  क्योंकि नागरिक प्रदर्शन अचानक पथराव करती भीड़ में बदल जाता है। इस तरह से भावनाओं के आवेग में जो नौजवान आतंकी बनते हैं वह ज्यादा दिनों तक जीवित भी नहीं रह पाते। क्योंकि , उन्हें कोई प्रशिक्षण नहीं होता और ना ही उनके पास कोई अच्छा हथियार होता है। उन्हें सुरक्षा बलों से छीने  गये हथियार ही दिए जाते हैं।
      कश्मीर में आतंकियों की दूसरी श्रेणी भी है। यह है पाकिस्तान से आए आतंकी और ये निशाना लगाकर या टारगेट बनाकर हमले करते हैं।  चाहे वह सुरक्षाबलों पर हमले हो या शुजात बुखारी की तरह किसी आदमी पर। सरकार चाहती है कि आतंकियों को खत्म कर दें और घाटी से भर्ती किए गए अप्रशिक्षित नौजवान भी कोई खास समस्या नहीं है। दूसरी तरफ, जो पाकिस्तान से आए आतंकी हैं वह ज्यादा ट्रेंड हैं और किसी भी अभियान का मुकाबला करने की उन में योग्यता है। सेना और सुरक्षा तंत्र को इस बिंदु को समझना होगा कि वह जिस विद्रोह को दबा रहे हैं वह दूसरी तरह का है। 2010 में रैंड के एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में विद्रोह के विरोध में जो अभियान चलाए गए हैं उनमें 30 में से आठ ही सफल हुए हैं। इससे पता चलता है किसी विद्रोह को दबाने से या दंडित करने से अस्थाई राहत मिलती है। लेकिन, यह उस तथ्य  को नहीं कर पाता है जिसके तहत पड़ोसी देश से इसे मदद मिलती है । क्योंकि ,इस तरह की मदद से किसी भी विद्रोह की सफलता असफलता प्रभावित होती है। 
     अब इस मोड़ पर पाकिस्तान से निपटना एक आवश्यकता है। इसके साथ ही एक और समस्या है जो मोदी सरकार ने पैदा की है। मोदी जी शासनकाल में   आतंकवाद और मिलिटेंसी दोनों आपस में गुत्थमगुत्था हो गये  हैं। जबकि दोनों अलग-अलग हैं। हो सकता है इससे मोदी भक्तों को लाभ मिले लेकिन सरकार इससे घाटे में है। सन 2000 में अटल बिहारी वाजपेई ने  मिलिटेंट्स से बातचीत करने में सफलता हासिल की थी। जैसा कि, खुद मोदी जी ने नगा विद्रोहियों के साथ किया है।  आप आतंकियों से बातचीत नहीं कर सकते । सरकार को चाहिए कि वह नागरिक विरोध या यूं कहें पथराव करते भीड़ की समस्या पर ध्यान दे। फौजी कार्रवाई का खास करके नागरिक क्षेत्र में ऐसी कार्रवाई का सीधा मतलब होता है कि जब जानो माल पर खतरा हो तभी बल का इस्तेमाल किया जाए और वह भी अनुपातिक रूप में । उद्देश्य होता है या कहें चुनौतियां होती हैं कि भीड़ को तितर बितर कर दिया जाए ना कि उसे खत्म ही कर दिया जाए। दुनिया भर की दंगा विरोधी पुलिस को ऐसी स्थिति से दो चार होना पड़ता है। ऐसी स्थितियां आतीं हैं जिसमें कुछ लोग पत्थर फेंकते हैं, कुछ लोग पेट्रोल बम या मोलोतोव फेंकते हैं। सबसे निपटने के अपने अपने उपाय होते हैं। चुनौतियों से निपटने के लिए घटनास्थल पर ज्यादा पुलिस बल की जरूरत होती है और बचाव के औजार भी ज्यादा चाहिए। साथ ही उचित प्रशिक्षण भी जरूरी है।  यदि घटनास्थल पर पुलिस के जवान जरूरत से कम होंगे और उनके पास साजो-सामान भी कम होंगे तो इससे समस्या बढ़ेगी और सुरक्षा बल खुद को असुरक्षित महसूस करने लगेंगे  अपनी सुरक्षा के लिए फायरिंग शुरू कर देंगे।
   इसराइल के सैन्य इतिहासकार मार्टिन वेन ने कई विद्रोह विरोध अभियानों का विश्लेषण किया है और उनका निष्कर्ष है कि उत्तरी आयरलैंड में ब्रिटिश ने जिस उपाय का उपयोग किया था वह सर्वोत्तम है। उन्होंने जो उपाय किए थे यह जो रणनीति अपनाई थी वह था कि कानून के दायरे में काम करें और प्रताड़ना या उत्पीड़न कम से कम हो , गैरकानूनी मौत से भी ना हो । हालांकि वहां भी ज्यादतियां हुईं  लेकिन अपनी नीतियों  पर अड़े रहे और उसका लाभ यह मिला क्षेत्र में स्थाई शांति हो गयी। मार्टिन वेन  ने इस्राइली फौज की रणनीति का जमकर विरोध किया है। यह बात दूसरी है कि भारत में कूटनीति के समर्थक हैं। भारतीय सुरक्षा बल सैकड़ों लोगों को मार डालते हैं , बेशुमार लोगों को गिरफ्तार करते हैं घर उड़ा देते हैं, केवल आतंकवादियों के संदेह में । लेकिन यह भी सच है उस क्षेत्र में अभी तक शांति नहीं हुई । हमें यह समझना होगा कि वहां हम अपने राष्ट्र के लोगों के साथ निपट रहे हैं इसलिए यह जरूरी है कि कानून के दायरे में रहें और आनुपातिक बल का प्रयोग करें । व्यवहारिकता यह बताती है कि पाकिस्तान को इस बात के लिए तैयार किया जाए कि वह आतंकियों को समर्थन देना बंद करे। लेकिन ऐसा रातोरात नहीं हो सकता । पर हमारे पास इस तरह की रणनीति होनी चाहिए जिस पर हम आगे काम करें । हमारे पास वैसी रणनीति का घोर अभाव है।

Wednesday, June 20, 2018

कश्मीर में मोदी - महबूबा गठबंधन टूटा 

कश्मीर में मोदी - महबूबा गठबंधन टूटा 

भाजपा-पीडीपी गठबंधन का अंत निकट था, लेकिन नई दिल्ली में मंगलवार दोपहर को इतनी अचानक ऐसी उम्मीद नहीं थी। रमजान के दौरान युद्धविराम की विफलता और गृह मंत्री राजनाथ सिंह से वार्ता की पेशकश की प्रतिकूल प्रतिक्रिया के साथ, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर विघटन बढ़ रहा था। जम्मू-कश्मीर में इसका सबसे साहसी दांव विफल हो रहा था  और इसने इसके मूल समर्थन आधार को परेशान कर दिया गया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की तेज चाल ने पीडीपी को मात दे दिया। पीडीपी के प्रवक्ता रफी अहमद मीर ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में स्वीकार किया कि गठबंधन को तोड़ना "अप्रत्याशित नहीं था", लेकिन यह भी स्वीकार किया  कि पीडीपी अनजान थी और भाजपा हाई कमान के फैसले के बारे में अंदाजा नहीं था। शाह की चाल ने महबूबा मुफ्ती को कोई मौका नहीं दिया और उसे अपमान का सामना करना पड़ा। वैसे को चुनावी राजनीति के तौर पर खोने को बहुत कम है।  

इसकी बाजी तीन संसदीय सीटों , जम्मू में दो और लद्दाख में एक, पर है। यदि भाजपा सभी तीन सीटों को खो देती है, तो इससे 2019 में बड़े चुनावी खेल में कोई बड़ा अंतर नहीं आएगा। हालांकि, गठबंधन में रहना आगामी चुनावों में भाजपा के खिलाफ वातावरण सकता है। शायद यही कारण है कि भाजपा ने अपने खिलाफ होने वाली बाताहें  को नियंत्रित करने और  नैतिक आधार को ऊंचा का फैसला किया।  इस कदम का परिणाम जम्मू-कश्मीर राज्य से बहुत दूर तक महसूस किया जाएगा। दूसरी ओर, गठबंधन की विफलता ने पीडीपी के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा पैदा कर दिया था। पीडीपी-भाजपा सरकार का ट्रैक रिकॉर्ड भयानक रहा है। पीडीपी विकास के मुद्दों के साथ मतदाताओं के पास वापस नहीं जा सकती है। राज्य में अब पी डी पी के पास खोने के लिये बहुत कुछ है।  जिस दिन पार्टी ने भाजपा के साथ हाथ मिलाने का फैसला किया था, उसी दिन उसके अलगाव वाद के मुलायम रुख  समाप्त हो गया।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, अपने तीन साल शासन में लोगों ने यही देखा कि पी डी पी भाजपा के एजेंडे का ही समर्थन कर रही है।  यहां तक ​​कि जमात-ए-इस्लामी के साथ प्रॉक्सी ताहलमेल भी नए चुनावों के मामले में कारगर नहीं हो सकती है। जब गुलाम मोहम्मद शाह ने 1984 में अपने दामाद फारूक अब्दुल्ला के गठबंधन को अनजाने में गिरा दिया, तो राज्य में व्यापक रूप से  हिंसा भड़क गयी थी। राज्य के लोगों ने फारूक को लोकतंत्र के विश्वासघाती के रूप में खारिज कर दिया। गुलाम मोहम्मद शाह को हिंसा पर काबू पाने के लिये हफ्तों तक कर्फ्यू लगा देना पड़ा। फारूक अब्दुल्ला के बहिष्कार ने एक राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया था जिसने अंततः मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ) के गठन के लिये मौका दिया। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि एमयूएफ के निर्माण ने जम्मू-कश्मीर में इतिहास की धारा प को कैसे बदल दिया। हालांकि , ताजा स्थिति 1984 से काफी अलग है, पीडीपी के पास बहुत कम विकल्प  हैं। अस्तित्व बचाने के लिए, पार्टी एक बार फिर से  अलगाववादी रुख अपना सकती है। अलगाववादी मतदाताओं को खुश करने के लिये   सड़कों पर अपने काडर उतार सकती है । पार्टी को तोड़ने का कोई भी प्रयास 1984 के परिदृश्य को दोहराएगा। पीडीपी फिर से  गिलानी और मिरवाइज के  अलगाववाद का सामना कर सकती है। पीडीपी-भाजपा गठबंधन को "उत्तरी ध्रुव और दक्षिण ध्रुव" के मिलन के रूप में बताया गया था। जम्मू के हिंदू बहुसंख्यक क्षेत्र और कश्मीर के मुस्लिम मतदताओं  के बीच दरार  इस गठबंधन के गठन के बाद बढ़ गया। अब जब गठबंधन टूट गया है, राज्य के भीतर ध्रुवीकरण होगा और   सुरक्षा की स्थिति के लिए परेशानी का एक और सबब साबित हो सकता है। 

   अमित शाह के त्वरित कदम ने जम्मू-कश्मीर में  अनिश्चितता को बढ़ा दिया है। यदि घाटी की स्थिति और खराब हो जाती है, तो वह और उनकी पार्टी पूरी तरह उत्तरदायी होगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पीडीपी के साथ संबंधों को तोड़ना आसान हो सकता था - हालांकि, असली खेल तो अब शुरू होता है, और यह विनाशकारी साबित हो सकता है। 

राज्यपाल के शासन को लागू करने से केंद्र सरकार राज्य के मामलों के प्रभारी बन जाएगी और इस क्षेत्र में होने वाली हर चीज नई दिल्ली में स्थानांतरित हो। वर्तमान गवर्नर एन एन वोहरा अपने विशाल प्रशासनिक अपने अनुभव और एक गैर-पक्षपातपूर्ण छवि के लिये विख्यात हैं और  बहुत प्रभावी साबित हुए हैं। अब वोहरा की सेवाव​धि बढ़ा दी गयी है, केंद्र सरकार के पास नए गवर्नर का चयन करने के लिए पर्याप्त समय होगा। जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर नए गवर्नर का असर होगा।  अगर भारत सरकार ने वैचारिक प्रतिबिम्ब नियुक्त करने का फैसला किया, तो निश्चित रूप से गंभीर प्रतिक्रिया होगी।  राज्य में सुरक्षा की स्थिति हर दिन खराब हो रही है, शांति और सामान्य स्थिति के लिये ज़िम्मेदारी पूरी तरह से केंद्र सरकार की होगी। सरकार की कश्मीर नीति जम्मू-कश्मीर की समस्या की स्पष्ट और अंतर्निहित समझ की मांग करती है। भाजपा ने पहले, चुनावी लाभ के लिए कश्मीर का उपयोग करने के लिए एक नाटक दिखाया था। अगले कुछ महीनों में कश्मीर की स्थिति का निपटारा कैसे किया जाएगा यह निर्धारित करेगा कि भविष्य में हिंसा का रुख क्या होगा। 2019 में राज्य में चुनाव कराने के लिए जमीन तैयार के उद्देश्य से आने वाले दिनों  में स्थिति को संभालना जरूरी है।

Tuesday, June 19, 2018

एक नया चलन : अपराध की तरफदारी करते लोग

एक नया चलन : अपराध की तरफदारी करते लोग

​हिंदी सिनेमा का एक दृश्य बहुत मशहूर है और यकीनन बहुतों को याद भी होगा कि जब एक अपराधी पकड़ा जाता है तो पान चबाता हुआ एक पॉलिटिशियन थाने में आता है और एक दो बड़े अफसरों को फोन करता है और उस अपराधी को छुड़ा ले जाता है। गिरफ्तार करने वाला अफसर कुछ नहीं कर पाता। लेकिन सोचिये एक नये दृश्य के बारे में जब कोई अपराधी पकड़ा जाता है तो जनता उसे छुड़ाने के लिये थाने पर दबाव डालने लगती है क्योंकि वह अपराधी किसी खास पार्टी अथवा किसी खास धर्म से ताल्लुक रखता है। यहां अपराध प्रमुख या महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि खास यह है कि अपराध करने वाला किस पार्टी या किस धर्म से सम्बंध रखता है। आज हमारा समाज इस विंदु पर पहुंच गया है। एक सिाल लें, गौरी लंकेश की हत्या का। विशेष जांच दल द्वारा गिरफ्तार व्यक्ति परशु वागमारे ने कबूल किया और बताया कि उसने कैसे गौरी को मारा। अब पुलिस उस हथियार की तलाश में जिससे हत्या की गयी है तथा उन लोगों को भी खोज रही है ज्न्हिोंने हथियार ​दिये और मदद की। इस मामले में तीन चार लोग पकड़े भी गये हैं और सब महाराष्ट्र के हिंदू जागृति समिति  के सदस्य हैं।

यही नहीं कठुआ बलात्कार और हत्या कांड में हिंदुत्व वेब साइट " शंखनाद " द्वारा सी बी आई जांच की मांग की जा रही है। इन सबमें एक बात समान है कि अपराध करने वालें की तरफदारी हो रही है बिना इस बात पर ध्यान दिये कि अपराध क्या है? लोग सोशल मीडिया में लगातार पोस्ट कर रहे हैं कि नाथू राम सही था , परशुराम धर्म रक्षक थे इत्यादि। टीवी के एंकरों को लेकर बंटवारा हो गया। एक एंकर उनके मन की बात कह कर उनका हो गया और दूसरा उनकी आलोचना कर उनका दुश्मान हो गया। हर बात में धर्म घुसता जा रहा है। नफरतों का असर देखो, जानवरों का बटवारा हो गया, 

गाय हिंदू और बकरा मुसलमान हो गया।

सूखे मेवे भी ये देखकर परेशान हो गए।

ना जाने कब नारियल हिंदु और खजूर मुसलमान हो गया।

दरअसल, सियासत से जुड़े अपराध एक तरह से परा संदर्भ हैं। एक बहुत बड़ा आपराधिक- राजनीतिक सोच का वातावरण है। हम उन सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं कर सकते जिसने ऐसी स्थिति पैदा की है। हम अपने सामूहिक भय से उन स्थितियों से आंखें चुराते हैं जिसने सामूहिकन हितों का ऐसा केंद्रीकरण किया हैजिैसा पहले कभी नहीं था। अजीब हालात पैदा हो गये हैं जहां आम नागरिक अपराध का समर्थन करता हुआ खुश होता है।    

आप दिल्ली से किसी भी तरफ का रुख करें एक गाड़ा अंदोरा फैलता हुआ दिखता है। इस अंदोरे में कुछ लोग सोशल मीडिया में यह कहते सुने जाते हैं कि पहले भी ऐसा होता था , अब हो रहा है तो क्या खास बात है? यह समझने के लिये कोई तैयार नहीं है कि एक गलत बात की तुलना दूसरी गलत बात से नहीं की जा सकती है। भारत की बदकिस्मती है कि यहां सत्ता की सियासत होती है और इस तरह से सत्ता हमें विचारशील नहीं बल्कि स्वार्थी बनाती जा रही है। 90 के दशक में शुरू हुआ उदारीकरण से एक नयी ​िस्थति अभिभूत हुई। अब सकल घरेलू उत्पाद को चमकाने के कारण कई बेशुमारियां पैदा हो गयीं। मॉलवादी उपभोक्ता संस्कृति ने शहर के भीतर शहर खड़े कर दिये। आदमी ने सोचना बंद कर दिया। अगर कारों में अ्ययाश जोड़े हैं तो सड़कों पर धर्म तथा सम्प्रदाय के झंडे उठयी भीड़। इसी विकास जनित हिंसा के समांतर आज की हिंसा का नया और घिनौना रूप, कथित राष्ट्रवादी हिंसा का है। इसकी छत्रछाया में अन्य हिंसाएं फलफूल रही हैं। अगर राजनीतिक हिंसा के लिये सत्ता प्रतिष्ठान जिम्मेदार हैं तो समाज में फैलती इस नयी तरह की जातीय और धार्मिकहिंसा के लिये  समाज और उसकी नैतिकता जिम्मेदार है।  याद रहे कि कि अपराधों की तरफदारी करे वालों का विरोध ना कर हम एक डरे हुये समाज का निर्माण कर रहे हैं और डरा हुआ समाज हरदम अपराध को ही बढ़ावा देता है। 

हमने माना कि ये पत्थर का शहर है 

पर जरूरी नहीं कि खुद को बना लें पत्थर