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Monday, October 16, 2017

अब ज्ञान पुरानी बात हो गयी

अब ज्ञान पुरानी बात हो गयी 

पुराने जमाने में कहा जाता था कि “ स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान: सर्वत्र पूज्यते. ” यह सुभाषित शिक्षकगण छात्रों को सुना कर उन्हें ज्ञान अर्जित करने के लिए प्रेरित करते थे. पार आज के  जमाने ज्ञान पुरानी बात हो गयी और दुनिया यह मानती है कि सूचना सबसे प्रबल है  और ज्ञान दोयम दर्जे की बात है और भाषा कामकाजी यंत्र है , एक डिवाइस है. इतिहास की उम्र फकत 10 साल होती है. ग्यानी लोगों को लोग अब बेवकूफ समझने लगे हैं और वे अनुपयोगी हो गए हैं. दुनिया यह जानती है कि नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप राजनीति के नाम पर लंतरानियाँ हांकते हैं. छात्रों को यह बताया जाता है कि इतिहास केवल 10 साल पहले से शुरू होता है. अब बात है कि क्या यह ज्ञान का समाज (नालेज सोसाइटी ) है. जहां तक सूचना का प्रश्न है यह सुनाने वालों और उसे संप्रेषित करने वालों के ज्ञान और प्रतिबद्धताओं पर निर्भर करता है. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हेनरिक गोयबल्स ने मिथ्या सूचनाओं को सही साबित करने का नुस्खा बताया था और इन दिनों सोशल मीडिया में पोस्ट ट्रुथ या आवांतर सत्य से परिपोषित सूचनाओं की जंग चल रही है. मनोशास्त्री विक्टर फ्रान्कल के अनुसार “ हमारी आज़ादी उकसावे और उसके बीच में कायम दूरी पर निर्भर है.” मनुष्य का जीवन संकुचित होता जा रहा है और हमारा मन सस्ती उत्तेजनाओं की चाह और खतरे के पूर्वगृह से आक्रान्त है. विश्वास का विनाश हो रहा है. बहुत कम लोग हैं जो एक दूसरे पर भरोसा करते हैं. ऐसा महसूस हो रहा है कि हम किसी विषयासक्त युग में जी रहे हैं जहां विचार का कोई महत्त्व नहीं है , बहस के लिए कोई जगह नहीं है. यह सोचना कि विचार एक समुदाय को जन्म देता है और विवेचनात्मक ज्ञान जीवन को सुखी बनाता है. आज के किसी नौजवान छात्र से हन्ना अरेंट के राजनितिक दर्शन की बात करें या फासीवाद की चर्चा करी या स्टालिनवाद की विवेचना करें तो वह आप पर हंसेगा. आज का नौजवान समाज केवल सूचना पर निर्भर है. कांट  के सिद्धांत से ज्यादा प्यारा उसके लिए मोबाइल फोन है. यही कारण कि गांधी के हत्यारे के दस्तावेज दुबारा खोले जा रहे हैं. उनसे भारत विभाजन की बात करें तो वे बातें नहीं करेंगे. ऐसा नहीं कि वे पुरानी बातों को कुरेदना नहीं चाहते बल्कि दुखद तो यह है कि उन्हें इसकी मालूमात नहीं है. भाषा                                       संकुचित होती जा रही है. अच्छे पढ़े लिखे लोग किसी भी भाषा में 10 लाइन शुद्ध नहीं लिख पाते. बच्चे उपन्यास नहीं पढ़ते क्योंकि वे एंट्रेस की परीक्षा की तैयारी में लगे रहते हैं. ऐसे ही लोगों के बीच मोदी जी की इज्ज़त है क्योंकि वे ज्ञान को तरजीह नहीं देते. उनके लिए और उनके जैसे कई अन्य लोगों के लिए विश्वविद्यालय सर्टिफिकेट जारी करने का केंद्र है. आज तक किसी भी सरकार ने विश्वविद्यालयों की इतनी अवमानना नहीं की जितनी वर्तमान  भा ज पा सरकार कर रही है. वर्तमान सरकार या इस काल में विशेषज्ञ वहीँ तक महत्वपूर्ण हैं जहां तक नीतियों का प्रश्न है.  आज विज्ञान और मानविकी पर लोग हँसते हैं और सवाल पूछना फैशन से बाहर हो गया है तथा विवेचनात्मक प्रश्न तो राष्ट्र विरोधी हो गए  हैं. अगर यह कहा जाय कि ज्ञान के संह में यह युग दोयम दर्जे का है तो गलत नहीं होगा. इसका कारन है कि मोदी औत्रंप जैसे लोग विचारों पर बंदिश  लगना चाहते हैं. मिया चाट हो रही है, अखबार ख़त्म हो रहे हैं , इसलिए नहीं कि तकनिकी तौर पर पिछड़ रहे हैं बल्कि इसलिए कि समाचार  के रूप में उनमें विचारों का अभाव होता जा रहा है.विचार समाप्त हो रहे हैं. समाज में सुरक्षा, विकास , देशभक्ति, कालाधन  जैसे चंद सरकारी शब्दों का ही बोलबाला है . मोदी जी विदेशों में जाकर बड़ी - बड़ी बातें करते हैं और बेचैन रहते हैं बात में असर के लिए , चाहते हैं कि कोई उन्ह उर उनके देश को गंभीरता से ले पर देश में विचारशून्यता को बढ़ावा देते हैं. हमारिन दिनों सी ट्रेजेडी है कि हम अज्ञानता के उपभोक्ता हो गए हैं विचारों के रचयिता नहीं. वाम पंथ और दक्षिणपंथ की बौद्धिक बहस ख़त्म होती जा रही है यह बड़ी बात नहीं है दुखद तो यह है कि बौधिक बहसों की ज़मीन पर विचारशून्यता का कब्जा होता जा रहा है.  

Sunday, October 15, 2017

पटाखे छोड़ने का प्रदूषण से कोई लेना देना नहीं

पटाखे छोड़ने का प्रदूषण से कोई लेना देना नहीं

आतिशबाजी का उपयोग धर्म से नहीं  रिवाज़ जुडा है

हरिराम पाण्डेय

कोलकता :  सुप्रीम कोर्ट ने  दिल्ली में दिवाली के दौरान पटाखों पर रोक लगा दी है. जबसे अदालत का यह आदेश आया है तबसे देश की जनता दो हिस्सों में बाँट गयी है. एक हिस्सा कोर्ट के आदेश के पक्ष में है और दूसरा इसके खिलाफ. जो आदेश के खिलाफ हैं उनका मानना है कि यह हिन्दू धर्म के उत्सवों में स्पष्ट दखलंदाजी है.जो लोग उसके पक्ष में हैं वे यह कह कर समर्थन कर रहे हैं कि इससे वायु में प्रदूषण बढ़ता है. देश की जनता की तरह अदालत भी इसमें एकमत नहीं है. अदालत में गत 12 सितम्बर को दिए गए एक आदेश में साफ़ कहा गया है कि “ उसके पास इस बात कोई साक्ष्य नहीं है कि पटाखों के इस्तेमाल से कितना प्रदूषण होता है.अतएव इसपर पाबंदी एक चरम उपाय है.अदालत ने आगे कहा है कि समाज में इसपर पाबन्दी की परोक्ष सहमति है  ” हालांकि  जज साहब को इस सहमती का अंदाजा कैसे लगा इस बात का कोई ज़िक्र नहीं है. मान भी लेते हैं कि       दिवाली       के    दो    दिनों में     पटाखों       के  प्रयोग से इतना प्रदूषण बढ़ जाता है कि उसपर रोक लगाना ज़रूरी है. लेकिन साल के बाकी 363 दिनों का क्या है इसपर आदरणीय अदालत प्रकाश तो डाले. वैज्ञानिक आंकड़ों से भी पता चलता है कि पटाखों के इस्तेमाल से प्रदूषण पर कोई असर पड़ता है या इतना असर पड़ता है कि इससे भारी हानि हो. प्रदूषण फैलाने वाले कार्यों के बारे में आई आई टी कानपुर द्वारा तैयार किये गए आंकड़ों में कहीं भी पटाखों का ज़िक्र नहीं है और ना ही प्रदूषण कम करने के उपायों में भी कही पटाखों पर रोक का उल्लेख नहीं है. इससे जाहिर होता है कि पटाखों के उपयोग का प्रदूषण से कोई लेना देना नहीं है.

यहाँ एक सवाल है कि क्या इस तरह का महत्वपूर्ण फैसला इतनी जल्दीबाजी  में लिया जाना चाहिए?इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला गलत समय में आया है क्योंकि उसमें यह नहीं बताया गया है कि उसे कैसे लागू किया जाएगा और इसका समाज पर  क्या प्रभाव पडेगा? इस उद्योग से जुड़े हज़ारों लोगों का क्या होगा? यह फैसला पहले लिया जाना चाहिए था और इसे लागू  करने के तरीकों और उसके प्रभाव पर विचार कर लेने चाहिए खास कर इससे जुड़े श्रमिकों और उस उद्योग के निवेशकों के भविष्य तथा इसका एक इलाके की अर्थव्यवस्था पर होने वाले प्रभावों का आकलन कर लेना चाहिए. अदालत ने जनता, कार्यपालिका और विधायिका पर होने वाले प्रभाओं पर विचा किये बगैर एक लोकप्रिय उत्सव की राह में रोड़े बिछा दिए.

यही नहीं अदालत ने रस्म- रिवाज पर ध्यान ही नहीं दिया. दिवाली में पटाखे  बेशक हिन्दू धर्म  से नहीं जुड़े  है और ना उसका अंग हैं पर सैकड़ों वर्षों से यह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया है और धार्मिक रिवाजो से जुड़ गया है.विख्यात जर्मन भारतविद डा. गुस्ताव ओपर्ट ने लिखा है कि प्राचीन भारतमें बारूद का उपयोग हुआ करता था.“ गन पावडर , एक्सप्लोसिव एंड द स्टेट : द टेक्नोलोजिकल हिस्ट्री “ में बी जे बुकानन ने वैश्यम्पायन की नितिप्रकशिका को उधृत करते हुए “अग्नि चूर्णं” का उल्लेख किया है,जिसे बारूद बताया है. लेकिन नाओपर्ट  और ना बुकानन ने उस काल खंड का उल्लेख किया है जिसमें बारूद का उपयोग होता था. जबकि दोनों उत्तर 19वीं शताब्दी के लोग थे.कौटिल्य के अर्थशास्त्रम ( लगभग300 वर्ष ईसा पूर्व ) में भी अग्नि चूर्ण का उल्लेख है. लेकिन कहीं भी दिवाली या किसी भी सनातनधर्मी पर्व में इसके उपयोग का उल्लेख नहीं है. बारूद के उपयोग का सबसे पहला उल्लेख  चीन में 7 वीं सदी में पाया जाता है. इसके बाद वह मुस्लिम हमलावरों द्वारा भारत में लाया गया.ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार आदिल शाह ने अपनी शादी में आतिशबाजियों पर 80हज़ार रूपए खर्च किये थे. उसके बाद किसी भी  उत्सव में रजवाड़ों के लिए यह फैशन बन गया. लेकिन दिवाली में दीपक के अलावा आतिशबाजियों  का उपयोग कबसे शुरू हुआ इसका कहीऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है. 22नवम्बर 1665 को औरंगजेब ने गुजरात के सूबेदार को आदेश दिया कि शहर में दिवाली को दिए ना जलाये जाएँ. उसने भी अपने हुक्म में आतिशबाजिओं का जिक्र नहीं किया, जबकि 9 अप्रैल 1667 को उसने किसी मुस्लिम त्यौहार ( शायद शब -ए – बरात) पर आतिशबाजियों पर रोक लगाने के लिए मुनादी   करने   का हुक्म दिया था. यानी उत्तर 17 वीं  शताब्दी के बाद से रजवाड़ों की देखादेखी उत्सव में इसका उपयोग शुरू हुआ होगा पर लगभग  400 साल से यह हमारे दिवाली के उत्सव का अंग बन गया है. इसकी मौजूदगी रिवाज़ के रूप में स्थापित हो गयी . 
  अदालत ने आदेश दे दिया पर यह नहीं बताया कि आखिर उसे यह कैसे पता चला कि पटाखों से प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है. पिछले साल जब यह मसला कोर्ट के सामने आया था तो उसने केन्द्रीय पर्यावरण बोर्ड से तीन महीने के भीतर रिपोर्ट दी को कहा था  पर  उसने कुछ नहीं किया इस साल जब मामला सामने आया तो उसने यह कहते हुए पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव अर्गानाइजशन के मत्थे मढ दिया कि इस तरह की जांच उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है. यह कर्त्तत्त्त्व पालन करने में कोताही का स्पष्ट मामला है. लेकिन उनपर कोई कार्रवाई नहीं की गयी. सरकारी अफसर जब यह समझने लगते हैं कि देश की सर्वोच्च अदालत की भी वे हुक्मउदूली कर सकते हैं तो जनता का क्या होगा यह भगवान् ही बता सकता है.इन सारी बातों को ध्यान में रख कर यह कहा जा सकता है की यह अदालती तदर्थ वाद है. इस पूरे आदेश में एक अजीब बात आर दिखती है कि पटाखों की बिक्री पर रोक है पर उपयोग पर नहीं. शायद अदालत ने यह  होगा कि जब पटाखे बिकेंगे ही नहीं तो छोड़े कैसे जायेंगे! अदालत के इस आदेश से भ्रष्टाचार का एक नया रास्ता खोल दिया इसक नाजायज़ उत्पादन और बिक्री का.  अदालत की फैसला लेने की तदर्थता और इसकी वैज्ञानिक नाजानकारी का यह भी सबूत है कि कोलकता सहित देश के कई शहर उतने ही प्रदूषित हैं जितनी दिल्ली है. फिर दिल्ली के लिए ही यह क्यों हुआ? शायद जज साहेबान भूल गए होंगे कि वे देश की सबसे बड़ी अदालत  के जज हैं.  अगर इस आदेश की अपराधशास्त्रीय व्याख्या करें तो इसकी अवमानना की भरपूर आशंका है. वेस्टर्न क्रिमिनोलोजिकल रिव्यू के अनुसार “ त्योहारों से जुडी मौज मस्ती में क़ानून की अवमानना होने को रोका  नहीं जा सकता है. विख्यात अपराध शस्त्री स्कॉट के मुताबिक़ उत्सव मनोवैज्ञानिक तौर पर क़ानून तोड़ने के लिए उकसाते हैं.”      

खस्ता माली हालत और उछलते शेयर बाज़ार

खस्ता माली हालत और उछलते शेयर बाज़ार

इन दिनों आमतौर पर शेयर बाज़ार में रौनक देखी जा रही जबकि देश की अर्थ व्यवस्था में गिरावट और खस्ताहाली दिख रहे हैं. हालत इतनी बिगडती जा रही है कि हमारे देश में भूखों की संख्या बढ़ रही है दूसरी चुनिन्दा अमीर लोग तेजी से अमीर होते जा रहे हैं. भूख का आलम यह है कि देश में 100 बच्चे लम्बाई के अनुसार कम वजन के हो रहे हैं और ग्लोबल हंगर इंडेक्स के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 119 देशों की सूची मे भारत  का स्थान 100 वां है. जबकि गत वर्ष भारत का स्थान 97 वां था. एक तरफ जहां देश के 9.6 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त पोषक भोजन मिलता है और हर तीन में से एक बच्चे का वजन लम्बाई के अनुपात में कम है वहीँ देश के 100 अमीरों की दौलत में पिच्च्ले साल के मुकाबले एक चौथाई से ज्यादा  वृद्धि हुई है. यह सब ऐसे समय में हो रहा है कि अर्थ व्यवस्था लुढ़कती जा रही है मध्य वर्ग गैस की बढती कीमतों से जोझ रहा है और छोटे व्यापारी तथा गरीब लोग अभी भी नोट बंदी  के आघात से  उबरे नहीं हैं. विपक्षी दल सरकार की आर्थिक नीतियों में भारी खामियां खोज रहे हैं , सत्तारूढ़ दल के भीतर से भी विरोध की आवाज़ सुनाई पड रही है. वित्त वर्ष 2017-18 की पहली छमाही में विकास दर तीन साल में सबसे निचले स्तर पर पहुँच गयी . तिमाही विकास दर 6.1 प्रतिशत से घट कर 5.7 पर पहुँच गयी. विरोधी दलों का कहना है कि अर्थ व्यवस्था गर्त में गिरती जा रही है. लेकिन इस बीच हमारे देश में कारोबारी दुनिया का एक हिस्सा शेयर बाज़ार चमक रहा है. यह एक ऐसी विडम्बना है जो आम आदमी की समझ से बाहर है. अमरीका और यूरोप में अर्त्ढ़ व्यवस्था में हल्का झोंका आते ही वहाँ के शेयर बाज़ार डगमगाने लगते हैं जबकि देश की अर्थ व्यवस्था से हमारे शेयर बाज़ार बेपरवाह हैं. ऐसा क्यों हो रहा है? शेयर विशेषज्ञ श्रीनाथ कपूर के अनुसार “ बाज़ार की चमक अस्थायी है और इसका कारण है म्युचुअल  फंड का पैसा शेयर बाज़ार में लग रहा है और यह चमक अस्थायी है क्योंकि जिस दिन म्यूच्यूअलफंड के शेयर्स में लगा पैसा जैसे ही वापस लिया जाएगा बाज़ार क्रैश कर जाएगा.इससमय म्युचुअल फंड में बहुत निवेशकों  का पैसा लगा है इसलिए शेयर बाज़ार में चमक है. अगर शेयर बाज़ार के आंकड़े देखें तो इस वर्ष म्युचुअल फंड की सबसे ज्यादा खरीददारी सितम्बर महीने में हुई है. अबतक कुल खरीदारी 65 हज़ार 917 करोड़ रूपए है. “ मसलन वित्त वर्ष के पहले छमाही के अंत में 26 जुलाई को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 10,000 अंक के पार चला गया था और सेंसेक्स 32,000 का आंकडा पार गया था, यह अपने आप में एक रिकार्ड है.  दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था का आलम यह है कि व्यवसायियों को बैंको द्वारा दिया जाने वाला क़र्ज़ की गति घाट रही है. स्टेट बैंक के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि चालू वर्ष में अबतक कार्पोरेट क़र्ज़ केवल 5.1 प्रतिशत है जो 1951 के बाद सबसे कम है. श्री नाथ कपूर के अनुसार “ बाज़ार और अर्थ व्यवस्था का सह सम्बन्ध नहीं है. शेयर बाज़ार को अर्थ व्यवस्था के आईने में नहीं देखा जाना चाहिये. “ अगर ऐसा है तो अधिकाँश लोगों की यह धारणा सही नहीं मानी जा सकती है कि भारतीय बाज़ार की उछाल विदेशी निवेशकों के बूते है. हालांकि विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इस साल भी बाज़ार में निवेश किया है. वैसे कई लोगों का यह भी मानना है कि राजनितिक स्थिरता और आर्थिक सुधारों की रफ़्तार के कारण बाज़ार चाध रहा है पर यह कथन तर्क सांगत नहीं लग रहा है क्योंकि अर्थव्यस्था की खराब हालत पर होने वाली आलोचनाओं से बेपरवाह मोदी सितम्बर के बाद से बचाव  करते हुए नज़र आ रहे हैं. पिछले दिनों कंपनी सेक्रेटरीज की बैठक में उन्हें तीखे सवालों का ज़वाब देते नहीं बन रहा था. जी एस टी को ढीला करना  इसी का         संकेत है. नेल्सन एलिओत के सिधान्तों के अनुसार शेयर बाज़ार पैसा लगाने वालों का मनोविज्ञान अक्सर आशावाद से निराशावाद की तरफ बढ़ता दिखता  है और इसी से कीमतें तय होती हैं लेकिन भारत के बाज़ार में  इस वर्ष उलटा रूख दिख रहा है जो स्वाभाविक नहीं है. उधर विदेशी निवेशकों का म्युचुअल फंड में पैसा लगाना कई स्याह- सफ़ेद संभावनाओं की ओर इशारा करता है. 

Friday, October 13, 2017

शिक्षा में क्षरण

शिक्षा में क्षरण

फ्रांसिस बेकन ने एक बार कहा था कि “ शिक्षा ही ताकत है.” 21 वीं सदी में यह और प्रासंगिक है खास कर जब दुनिया के सामने सूचना प्रोद्यौगिकी के नए आयाम खुलने लगे. इसके बाद हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की यह घोषणा कि सरकार विश्वविद्यालयों की शिक्षा और शोध के स्तर को बढ़ाएगी ताकि हमारे भी  शिक्षण संस्थानों का  ग्लोबल संस्थानों में शुमार हो सके. यह घोषणा भारतीय शिक्षा के प्रति सरकार की  सकारात्मक प्रवृति की ओर इशारा करती है.  लेकिन दुर्भाग्यवश यह घोषणा केवल घोषणा बन कर रह गयी. यू पी ए सरकार ने शिक्षा के अधिकार सम्बन्धी क़ानून बनाया ताकि प्राथमिक शिक्षा सबकी पहुँच में हो. सरकार इस बात को भी  समझती थी कि यदि नयी पीढ़ी की आकान्क्षाओं को पूरा करना है तो उच्च शिक्षा संस्थानों में सीटें बढानी होंगी. इसी के अनुरूप कई नए उच्च  शिक्षा संस्थान खोले गए. केन्द्रीय विश्व विद्यालयों की स्थापना हुई. उसके लिए धन की व्यवस्था की गयी. शिक्षकों को अनुबध या अतिथि के तौर पर बुलाने का बंदोबस्त किया गया. शिक्षा की गुणवत्ता को बढाने की कोशिशे भी शुरू की गयीं. शिक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाले संस्थान मसलन विश्व विद्यालय अनुदान आयोग और तकनकी शिक्षा परिषद् को मज़बूत बनाने के प्रयास किया गया.

   लेकिन एन दी ए की सरकार के बाद शिक्षा की प्राथमिकताएं बदलने लगीं, एक तरफ विद्यार्थियों और छात्रों का नैतिक बल घटने लगा दूसरी तरफ सरकार ने उच्च शिक्षा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. यू जी सी के अनुदान में 55 प्रतिशत की कटौती कर दी गयी. सभी नए पाठ्यक्रम स्ववित्त पोषित कर दिए गए. इसका मतलब सरकार बच्चों की पढाई ढांचागत समर्थन देने से कतराने लगी है. नतीजा हुआ कि कॉलेजों में यह बोझ बच्चों पर डाला जाने लगा. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की फीस अनाप शनाप बधाई जाने लगी. सुनकर हैरत होती है कि पंजाब विश्वविद्यालय की फीस 1110 प्रतिशत बढ़ाई गयी, आई आई टी बॉम्बे की फीस 55 प्रतिशत बढ़ाई गयी और होस्टल के शुल्क में 300 प्रतिशत वृद्धि कर दी गयी. केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में एम फिल की सीटों में कटौती कर दी गयी.सरकार का शिक्षा में दूसरा अवदान है कि उसने उच्च शिक्षा को छात्रों की पहुँच से बहार कर दिया. एम् फिल और पीएच डी के लिए चुने गए छात्रों को छात्रवृति की राशि 5000 और 8000 रूपए में बुरी तरह कटौती कर दी गयी. दलितों और आदिवासियों को मैट्रिकुलेशन के बाद मिलने वाली छात्रवृति की कुल राशि को जान बूझ कर रोक दिया गया है. जब छात्रों ने इसका विरोध किया तो उन्हें आधिकारिक तौर पर या ए बी वी पी के माध्यम से तंग किया जाने लगा. छात्र हितों  पर इस अनवरत प्रहार ने शिक्षा पद्धति के मूल उद्देश्य चेतना – चिंतन को ही चौपट कर दिया. इसके  उपउत्पादन के तौर पर संस्थानों में जाती पांति का भेद दिखाई पड़ने लगा. पहले केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के 35 केन्द्रों में “ सोशल इन्क्लुजन और सोशल पालिसी पढ़ाया  था उसे बंद कर दिया गया. दुर्भाग्यवश इन केन्द्रों की अनदेखी होने लगी. लाखों दलित छात्र जो छात्रवृतियों पर निर्भर थे वे अब अधर में हैं. यही नहीं शिक्षा संस्थानों में रिक्तियां नहीं भरी जा रहीं हैं उच्च शिक्षा में शिक्षकों की 43 प्रतिशत जगहें खाली हैं. मूलतः संस्कृत का शब्द है यह सिक्ष धातु में अ प्रत्यय लगाने से बना है जिसका अर्थ हैं सीखना , शिक्षा  संस्थानों का खुलापन , उदारता और भेद हीनता छात्रों को सीखने तथा शिक्षा के मूल उद्देश्य चिंतन और चेतना को  प्राप्त करने में मददगार होता है. सरकार की नीतियों ने न शिक्षा संस्थानों को ऊँचाई हासिल करने दे रही है और ना छात्रों विचारशीलता पनपने दे रही है. विश्वविद्यालय मनुष्यता, सहिष्णुता और विचार को बढ़ावा देते हैं इससे सत्य का संधान होता है. लेकिन इन दिनोएँ विश्वविद्यालयों की स्थोती चिंताजनक होती जा रही है. कीज़ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति( चांसलर) श्री अच्युत सामंत ने एक बार कहा था कि “ किसी देश का भविष्य उसके शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है. शिक्षा में विकृति धीरे धीरे देश की संस्कृति को नष्ट कर देती है.” अगर सरकार शीघ्र नहीं चेतती है तो देश का ख़ास कर भारत का विचार क्षतिग्रस्त हो जाएगा और आनेवाली संतति हमे माफ़ नहीं करेगी.

Thursday, October 12, 2017

पुलिस सुधार की ज़रुरत?

पुलिस सुधार की ज़रुरत?

पुलिस शब्द पूरी दुनिया में आतंक और भय का पर्याय है. विख्यात लेखक अर्थर कानन डायल ने कहा है की “ दुनिया में पुलिस सबसे वीभत्स है.” लेकिन साथ ही अल्फ्रेड हिचकॉक ने कहा है कि “ सभ्य  समाज को पुलिस की ज़रुरत है केवल अपराधी और असभ्य समाज ही पुलिस के बिना पनप सकते हैं.” भारत में पुलिस व्यवस्था पर अशोभनीय टिपण्णी करना कुछ लोगों का शगल है बगैर यह जाने कि  पुलिस के एक सिपाही से लेकर सर्वोच्च अधिकारी तक किस मानसिक, शारीरिक और सामाजिक दबाव में अपना काम करता है ? इस बार केंद्र सरकार ने पुलिस में सुधार के लिए 25 हज़ार करोड़ रूपए की मंज़ूरी दी  है. दरअसल यह देश में अबतक का सबसे बड़ा पुलिस आधुनिकीकरण का प्रयास है. यह राशि पुलिस व्यवस्था के लिए है यानी वहां , संचार सुविधा, हथियार , फोरेंसिक सपोर्ट  इत्यादि के लिए है. सुधार की इस योजना का कोई दस्तावेज सर्वंजिक नहीं किया गया है अतेव जनता में इसे लेकर दुविधा है. इसपर कई सवाल उठ रहे हैं.यहाँ सबसे जरूरी है कि सुधार की बड़ी बड़ी बातों से अलग पुलिस का गंभीरता से लोकतंत्रीकरण हो. राजनितिक आकाओं के हुक्म मानने वाले एक तंत्र के रूप में कुख्यात इस व्यवस्था को रूल ऑफ़ लॉ के प्रति जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए लेकिन इस और कदम बढाने से  केंद्र और राज्य दोनों हिचकते पाए जाते हैं. जबकि इन दिनों अपराध और अपराध करने वालों के स्वरुप में भारी बदलाव आ रहा है. कुछ साल पहले तक मार पीट या फसाद या चोरी- डकैती – खून वगैरह ही अपराध थे और उनकी गवेषणा के तरीके खोजे गए थे. पर अब तो वित्तीय धोखाधडी से लेकर साइबर अपराध जैसे अपराध रोज अपने स्वरुप बदल रहे हैं. भ्रष्टाचार मिटाने की जितनी बात हो रही है वह रक्तबीज की तरह उतनी ही तेजी से फ़ैल रहा है तथा समाज के हर वर्ग को आक्रान्त कर रहा है. सात५ह ही उच्च स्तर पर अधिकारों का दुरूपयोग एक बड़ी समस्या है. डी जी और कमिश्नर स्तर के अफसरों के तबादले और तैनाती मुख्यमंत्रियों की मर्जी से होती है. जो अफसर जी हुजूरी नहीं करता उसे पद पर रहते हुए भी अधिकार हीन बना दिया जाता है. इसके लिए नए पद तक गढ़ दिए जाते हैं. ईमानदार आई पी एस अफसरों को पुलिस व्यवस्था के लिए किराए पर लिए जाने वाले वाहनों के हिसाब किताब के लिए तैनात कर दिया जाता है. इसके चलते पूरी व्यवस्था की प्रवृति ही कुछ अजीब हो गयी है. इसलिए व्यवस्था में सुधार की दिशा कुछ ऐसी होनी चाहिए जो इस प्रवृति में सकारात्मक परिवर्तन लका सके.  पुलिस एक ऐसा तंत्र है जिसका आम जनता से सीधा संपर्क है. उसे एक ही समय में समाज की विसंगतियों, राजनितिक तंत्र की अकड़ और क़ानून की पेचोखम वाली अँधेरी गलियों से गुजरना होता है. राजनितिक नेताओं की गलत्कारियों पर ऊँगली रखने वाले पुलिस अफसर को दण्डित होने की कहानियां तो इतनी आम हो गयीं हैं कि उसे लोगों ने कहना सुनना बंद कर दिया है. कई बार अपराधियों के साथ निर्दोष भी पकडे जाते है और उनके साथ भी वही होता है जो अपराधियों के साथ होता है. अब इसका लाभ वे भी उठाते हैं जो राजनितिक दुश्मानी को साधने की कोशिश में रहते हैं. यही नहीं शाट बहुत कम राज्यों में पुलिस प्रमुख के नियुक्ति और तैनाती का एक समय तय है. उस समय के पहले उस अफसर का तबादला नहीं हो सकता है वरना तो कई ऐसे हैं जो सदा बोरिया बिस्तर बांधे ही रहते हैं. इसके कारन वे स्वभावातः बदल जाते हैं और वह करने लगते हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए. पोलसे सुधारों के पक्ष में राय रखने वाले या पुलिस के बारे में सकारात्मक राय रखने वाले कम ही मिलेंगे. जो जितने बड़े बौधिक हैं वे उतनी ही कमियाँ निकालेंगे. उनका मानना है कि अबतक जितना कुछ भी हुआ वह कागजों पर ही हुआ. पुलिस सुधार में सबसे बड़ी अड़चन है राजनीतिक स्वार्थ. लेकिन लोकतंत्र में इसे ख़त्म नहीं किया जा सकता है. लोकतान्त्रिक पुलिस सुधार का क्रियाशील आधार एक सशक्त समाज हो सकता है समाज निरपेक्ष पुलिस स्वायतत्ता नहीं. इसके लिए ज़रूरी है एक संवेदी और लोकोन्मुखी क़ानून तंत्र का निर्माण. यह प्रशासनिक सुधारों से संभव नहीं है. यह शुरुवात नियुक्ति के स्तर पर करनी होगी. पुलिस का एक आदमी पहले हमारे ही बीच से आया हुआ आदमी है. अतेव उसकी ज़रूरतों , संवेदनाओं और ड्राइव्स के बारे में समाजशास्त्र के उन्ही नियमों का पालन करना होगा जो आम मनुष्य के बारे में होता है. लेकिन होता क्या है कि सुधार के नाम पर उसे औज़ार और साधन तो दे दिए जाते हैं साथ ही पुलिस को सत्ता प्रतिष्ठानों से मुक्त कराने की कोशिश है. कोई इसे नागरिक संवेदी बनाने की बात नहीं करता. पुलिस सुधार के लिए यह सबसे ज़रूरी है. अतः पुलिस सुधारों में सामाजिक कल्याण को जोड़ना ज़रूरी है.