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Thursday, September 20, 2018

राफेल सौदा और सियासी तिरंदाजी

राफेल सौदा और सियासी तिरंदाजी
भारत में यह सिलसिला तीन दशक पहले बोफोर्स की खरीद के समय से शुरू हुआ है। जब कभी सेना के आधुनिकीकरण के लिए हथियार का सौदा होता है तो राजनीति घुस आती है और शुरू हो जाती है तिरंदाजी। इसके पहले की सरकारों ने एक के बाद एक रक्षा सौदे रद्द किए थे। लेकिन कोई भी दोषी सामने नहीं आ सका।  इसके बावजूद कई कंपनियों को ब्लैक लिस्ट कर दिया गया। एक बार तो दुनिया के एक मशहूर उत्पादक की तोपों का सौदा 30 वर्ष तक झूलता  रहा था। यही हाल वायुसेना के साथ भी हुआ। हमलावर विमान का ठेका तय हुआ था। निविदाएं मंगाई गई थी। उन्हें 20 11 में खोला गया और जब राफेल सौदे पर भारत और फ्रांस के बीच हस्ताक्षर हुआ तो 2016 आ गया।जब हस्ताक्षर हो गया तो सेना ने राहत की सांस ली। क्योंकि जहां भारतीय वायु सेना को 42 स्क्वाड्रन्स की जरूरत है तो उसके पास महज 31 स्क्वाड्रन्स हैं। 2019 में विमानों की आपूर्ति होनी थी लेकिन बीच में राजनीति शुरु हो गई । चारों तरफ से सियासी तीर चलने लगे और उस तीरंदाजी में सौदा गुम हो गया।
        यहां जो सबसे पहली चीज है और उसे समझना जरूरी है वह है कि राफेल सौदा कोई साधारण व्यापारिक सौदा नहीं है । यह दो सरकारों के बीच में हुआ है और चूंकि इस सौदे में दो सरकारें जुड़ी है तो यह पूर्णतः सुरक्षित है।  रिश्वत की कोई गुंजाइश नहीं है। भारत जब अपने लिए लड़ाकू विमान तलाश रहा था तो राफेल के अलावा बोइंग एफ-18 सुपर हार नेट ,यूरो फाइटर टाइफून और स्वीडन की साब कंपनी के फाइटर भी दौड़ में थे। यही वजह है कि विपक्षी दल कीमतों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। राफेल चौथी पीढ़ी का बेहतरीन विमान है। हां इससे सस्ते में रूसी मिग 29 या मिग 35 और सुखोई 35 विमान खरीदे जा सकते थे ।लेकिन, इन विकल्पों को आजमाया नहीं गया।
      राजनीतिज्ञों की तरफ से पहला आरोप कीमत को लेकर लगाया  गया।  कहा गया कि हम फ्रांस से सिर्फ विमान पा रहे हैं उसमें हथियार और अन्य साजोसामान नहीं हैं। भारत को इसके रखरखाव और मरम्मत के लिए सौदे  में ही तय कर लेना चाहिए था।  केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बयान दिया कि  2007 में जो सौदा तय हुआ था उसमें एक विमान का मूल्य 79.3 मिलियन यूरो था। बाद में मूल्य बढ़ा यह सौदे की शर्तों में शामिल था। 2011 में इसकी कीमत 100.85  मिलियन यूरो हो गई जबकि जब सौदा हुआ तो 91.75 मिलियन यूरो पर तय हुआ लगभग 9% की बचत हुई । इसके अलावा भारत को 13 और वस्तुएं चाहिए थी। जिसकी कीमत 9,855 करोड़ रुपए थी और यह स्थाई मूल्य था। यानी कुल सौदे के बाद भी यह इतना ही रहेगा। इसके अलावा भी कई और हथियार चाहिए थे जैसे हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें हैं, हवा से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल हैं इत्यादि । यह मिसाइल सौदे का हिस्सा नहीं थी।  रखरखाव के लिए जो डील हुई थी उसके मुताबिक 5 साल तक 75% कीमत में पुर्जे दिए जाएंगे। पांच वर्ष तक इसके रखरखाव का जिम्मा भी उत्पादक कंपनी को ही दिया गया था। यह एक अच्छा सौदा था। यहां यह सोचना जरूरी है यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है। देश की सुरक्षा का प्रश्न है। कांग्रेस इस पर इसलिए बवाल मचा रही है कि भाजपा ने अगस्ता वेस्टलैंड सौदे पर कांग्रेस को घेर रखा है।
       सौदे के विरुद्ध आरोप सही नहीं  हैं और आरोप में जो कीमतें बताई जा रहीं हैं वह बहुत ज्यादा बढ़ाकर बताई जा रही हैं।
जब बात जरूरत से ज्यादा बढ़ गई तो वायुसेना अध्यक्ष और उपाध्यक्ष ने आरोप की मुखालफत करते हुए बयान जारी किया और इसके बाद सच्चाई बताने के लिए सेमिनार भी किए । यह एक स्वागत योग्य कदम था , क्योंकि राजनीतिज्ञों के आतंक से अबतक फौजी खुलकर सामने नहीं आते थे।
  आज हमारे राजनीतिक दलों में नई प्रवृत्ति देखी जा रही है। वह कि कोई भी मामला जो जनता का ध्यान आकर्षित करे  उसे ले कर सड़क पर उतर आते हैं । यह नहीं देखते कि इससे सैनिक तैयारी में कितनी कमी आ रही है। आशा है कि वर्तमान सरकार इन राजनीतिज्ञों की चाल में नहीं आएगी । क्योंकि, यह आधुनिक भारतीय राजनीतिक परंपरा का हिस्सा बन गई है।

Wednesday, September 19, 2018

देश की शासन प्रणाली में बदलाव जरूरी है?

देश की शासन प्रणाली में बदलाव जरूरी है?

पिछले दो दशक में क्षेत्रीय पार्टियां देश में जो कमाल दिखा रहीं हैं और केंद्र में उनकी जो भूमिका देखने को मिल रही है उससे ऐसा लगता है देश शासन प्रणाली में परिवर्तन के बारे में सोचना जरूरी है। यद्यपि 2014 के बाद क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व केंद्र में घटा  है, लेकिन 2019 के बाद फिर वही नजारा देखने को मिल सकता है। क्योंकि, इस बार फिर क्षेत्रीय पार्टियां उभार पर हैं और गठबंधन के लिए कोशिश में लगी हैं । केंद्र में भाजपा की सरकार है और काफी शक्तिशाली है लेकिन इसके बावजूद केंद्र और राज्य के संबंधों में बदलाव स्पष्ट देखने को मिल रहा है । भारतीय शासन व्यवस्था मजबूत केंद्र की धुरी पर टिकी है लेकिन फिलहाल जो हालात हैं उनमें केंद्र पर बढ़ता हुआ प्रभाव साफ दिख रहा है। प्रश्न है कि किन क्षेत्रों में केंद्र को मजबूत होना चाहिए, कहां समझौता होना चाहिए तथा कहां बदलाव आने चाहिए। तीन चीजें, जैसे रक्षा संचार और करेंसी इसमें तो इसी प्रकार का समझौता हो ही नहीं सकता। इसके अलावा संविधान में कुछ और भी चीजें हैं जिनके संदर्भ बदल चुके हैं और वह व्यर्थ हो चुके हैं।उन्हें हटा दिया जाना चाहिए या इन चीजों को राज्यों के सूची में डाल दिया चाहिए।
    राज्यों को आर्थिक मामलों में फैसले का अधिकार नहीं दिया गया है। जब संविधान बना था तो एक मामूली सा डर था राज्य स्वतंत्र होने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन अभी यह आशंका नहीं है। क्योंकि केंद्र के साथ बने रहने से जो आर्थिक लाभ मिलते हैं वह अलग होने पर नामुमकिन है। अब केंद्र से मिलने वाली मलाई कोई नहीं छोड़ना चाहता। ताजा स्थिति के मद्देनजर इस बात की समीक्षा होनी चाहिए कि केंद्र को कितना मजबूत होना चाहिए और आज मजबूत यानी पावरफुल होने का अर्थ क्या होता है? अर्थ की खोज के लिए कानूनी -आर्थिक विशेषज्ञों और राजनीतिज्ञों की समिति बननी चाहिए जो इस स्थिति की समीक्षा करे। इस समिति में पूर्व नौकरशाहों को नहीं रखा जाना चाहिए क्योंकि वह हर बदलाव को रोकने की कोशिश करते हैं।
     यह जो बात कही जा रही है इस तरह के विचार 1968 के दशक में सुप्रीम कोर्ट ने भी रखे थे । उसने कहा था कि भारत अमरीका की तरह कोई फेडरल स्टेट नहीं है बल्कि वह राज्यों का एक संघ है "इंडियन यूनियन"। देश आजाद हुआ  तो यह माना जाता  था कि राज्यों अधिक का आजादी देना खतरनाक है और उन्हें अनुशासित रखना केंद्र का काम है। इसी आशय का एक पत्र पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखा था। जिसमें उन्होंने बताया था की शासन किस तरह से होना चाहिए।
      हालात बदल गए हैं जो कल छोटे वे बड़े हो गए। कर्नाटक के मुख्यमंत्री देवगौड़ा और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन चुके हैं। केंद्र में कुर्सी हासिल करने के लिए कई और मुख्यमंत्री दौड़ में हैं। इसका एक एक अर्थ यह भी है कि मुख्यमंत्रियों में परिपक्वता आ रही है और राज्य भी परिपक्व हो गए हैं। परिपक्वता की हकीकत संविधान में भी दिखनी चाहिए वरना केंद्र अप्रासंगिक हो जाएगा । 
   जीएसटी के साथ देश ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। राजनीतिक तौर पर भी देश शासन के सामान्य तौर तरीकों की तरफ लौटता दिख रहा है। आज का शासन एक खास किस्म की मनसबदारी है जो पैसे वाले विधायक को अहमियत देता है। संविधान इस ओर भी नहीं देख रहा है। हमारे देश का संविधान दुनिया का ऐसा अकेला संविधान है जिसमें प्रोसेस पर बहुत जोर दिया जाता है।कई बार प्रोसेस एवं पावर में कंफ्यूजन हो जाता है । जब संविधान बन रहा था तब ऐसा होना जरूरी था लेकिन अब इस तरह की कोई बात नहीं है और इसकी समीक्षा बहुत जरूरी है।

Tuesday, September 18, 2018

एक क्रूर विरोधाभास

एक क्रूर विरोधाभास
विख्यात विचारक गैटी ने कहा है कि "दौलत खाद की तरह होती है अगर इसे फैलाएंगे नहीं तो बदबू आने लगेगी। " रघुराम राजन ने कहा था कि" भारत आज भी  प्रति व्यक्ति के आधार पर दुनिया का सबसे गरीब और बड़ा देश है  और हर नागरिक के दुखों एवं  चिंताओं को दूर करने  के लिए हमें बहुत लंबी यात्रा करनी पड़ेगी।" भारत में उस समय बहुत हर्ष  महसूस होता है जब कोई विदेशी स्रोत से यह  लुभावना बयान आता है कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है। हाल में प्राइस वाटर हाउस कूपर्स की यह रिपोर्ट "2050 में दुनिया" में कहा गया है क्रय शक्ति के मामले में भारत 2040 तक अमरीका से आगे बढ़ जाएगा। इस आधार पर भारत चीन के बाद सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति हो जाएगा। रिपोर्ट मे यह भी कहा गया है कि भारत 2040 तक अमरीकी अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ जाएगा।
     ऐसी लुभाने बातें ज्योतिषीय भविष्य वाणियों की तरह होती है और यह  समाज के उच्च वर्ग के लोगों में व्याप्त राष्ट्रवाद  के पागलपन को शायद ही कम करती हैं। जहां तक अति राष्ट्रवाद का प्रश्न है हम हमेशा यह कहते रहते हैं ऐसे  देश में हम रह रहे हैं की अंततोगत्वा दुनिया ने हमारा लोहा माना और हमें सम्मान देना शुरू कर दिया। इस तरह का ताल ठोकना बड़ा अजीब लगता है। क्या आत्मछल नहीं है?  इस तरह आत्मप्रवंचना लगातार चलते रहने से हम उस पर भरोसा भी करने लगते हैं। यह कितना अजीब है एक तरफ हम और हमारे नेता यह कहते चल रहे हैं कि भारत एक तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है और हम जल्दी ही महाशक्ति बनने वाले हैं, और दूसरी तरफ हमारा सामाजिक विकास का सूचकांक लगातार कम होता जा रहा है एक तरफ तो हम सकल घरेलू  उत्पाद के लिहाज से आगे बढ़ रहे हैं दूसरी तरफ समाज के बहुत बड़े समुदाय की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है इससे ज्यादा बड़ा सबूत क्या मिलेगा कि जब आप महानगर कोलकाता या किसी भी अन्य महानगर की गगनचुंबी इमारतों के छत पर खड़े हो जाएं और चारों तरफ नजर दौड़ाएं है तो वहां कीड़े मकोड़े की तरह लोग और झोपड़ियां नजर आएंगी। इन झोपड़ियों में विभिन्न स्तर के लोग निवास करते हैं जो ना केवल  किसी गड्ढे में जमे हुए पानी में कपड़े धोते हैं बल्कि स्नान भी करते हैं । यही नहीं जनगणना के आंकड़े भी गरीबी की कठोर सच्चाई बताते हैं । जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि देश के आधे  बच्चों की  आबादी का वजन चिकित्सा विज्ञान के मानदंडों से  कम है। अमर्त्य सेन और ज्यां ड्रेज  के अनुसार देश में साक्षरता बढ़ी है लेकिन देश के बच्चों की बहुत बड़ी आबादी स्कूल में बहुत पढ़  पाती है। लगभग सभी भारतीय निजी सेवा प्रदाता या डॉक्टरों से इलाज करवाते हैं। जो निजी डॉक्टरों  की फीस नहीं दे पाते  वह  झोलाछाप  डॉक्टरों के चंगुल में फंस जाते हैं और कर्ज में डूबते जाते हैं। गैरबराबरी हर क्षेत्र में बढ़ी है और सबसे ज्यादा  चिंता का विषय है कि पर्याप्त शिक्षा और  सार्वजनिक स्वास्थ्य के बगैर इसे कम भी नहीं किया जा सकता। बेशक भारत में गरीबी कम हो रही है लेकिन कम होने की दर बहुत धीमी है। गरीब अच्छा खाना नहीं खा पाते। यहां अच्छे खाने से तात्पर्य कि वे अपने भोजन में उचित मात्रा में प्रोटीन और कैलशियम नहीं ले पाते। इससे भी ज्यादा हैरतअंगेज है कि अबतक की सभी सरकारों द्वारा आर्थिक उदारवाद के बावजूद गरीबों को या कहें बड़ी संख्या में लोगों को आर्थिक रूप में  सशक्त नहीं किया जा सका। वस्तुतः भारत में आर्थिक उदारीकरण से सिर्फ 10% आबादी को लाभ हुआ है। खासतौर पर, विशेष आय वर्ग के 1% लोग हैं उनको लाभ हुआ है। शाइनिंग इंडिया की आवधारणा सिर्फ 10% आबादी से जुड़ी है। विख्यात अर्थशास्त्री कौशिक बसु के अनुसार "भारत के कुल विकास का मतलब आनुपातिक नहीं है यह केवल समाज के अमीरों से जुड़ा है।" लेकिन ये शुष्क आंकड़े सारी बात नहीं कह सकते, सारी पीड़ा का बयान नहीं कर सकते। जैसा कि अमर्त्य सेन और ज्यां ड्रेज ने अपनी पुस्तक "अनसर्टेन  ग्लोरी: इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शन" में कहा है कि गैरबराबरी उस समय और दुखदाई हो जाती जब कम आय वर्ग के लोग अपनी बुनियादी जरूरतों की चीजें नहीं खरीद सकते । ऐसी स्थिति में अमीर और गरीब के बीच की खाई और बड़ी हो जाती है। हमारे सामाजिक सूचकांक अभिव्यक्त नहीं कर सकते कि गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाओं को धन नहीं दिए जाने का मुख्य कारण यह है कि इसे बड़े लोगों के लाभ के लिए लगाया जाता है। एक आंकड़े के मुताबिक 2005-06 से 2013-14 के बीच कारपोरेट घरानों को 36.5 खराब रुपए दिए गए। इस राशि से  लगभग 105 वर्ष तक महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना को चलाया जा सकता था और साथ ही 31 वर्ष तक तक राशन की दुकानों में राशन मुहैया कराया जा सकता था। मोटी रकम कारपोरेट घरानों को देकर बैंक न केवल अपना घाटा बढाते  हैं बल्कि उन्हें बट्टे खाते में डाल देते हैं। भारत अपने जीडीपी का केवल 4.4 प्रतिशत स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च करता है जबकि अफ्रीका जैसे देश में 6.3% खर्च होता है। मोदी जी की जब से सरकार बनी हालात और बिगड़ने लगे । आधार के झंझट ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कठिनाई पैदा कर दी और इसके सबसे ज्यादा शिकार गरीब हुए ।आधार से गरीबों को होने वाली कठिनाइयों को देखें। यह गरीब लोगों को राशन व्यवस्था से दूर रखने का उपक्रम है। भारत की विकास कथा में एक खलनायक भी है जो इस  गैरबराबर समाज में सदा कायम रहता है और उसे हुकूमत का समर्थन हासिल है। वह यहां का 1 प्रतिशत अमीर समुदाय।

Monday, September 17, 2018

गठबंधन की सरकारों से अर्थव्यवस्था को हानि

गठबंधन की सरकारों से अर्थव्यवस्था को हानि

इन दिनों कई जनमत संग्रह सामने आए हैं जिसमें यह बताया गया है की देश में व्यवस्था विरोधी भावनाएं उभर रही हैं और यह स्थिति भारतीय जनता पार्टी इस सरकार के लिए हानिकारक हो सकती है। हाल में एक सर्वे के अनुसार 2019 में भाजपा को 30% वोट मिल सकते हैं और वह 245 सीटों को हासिल कर सकती है यानी, संसद में बहुमत के लिए उसके पास 27 सीटें कम रहेंगी। इसके पहले एक  सर्वेक्षण में पाया गया था कि भाजपा की लोकप्रियता घट रही है फिर भी यह देश की सबसे लोकप्रिय पार्टी बनी रहेगी। सर्वेक्षणों से ऐसा लग रहा है कि एक बड़ा गठबंधन आने वाले दिनों में बन सकता है। जब तक यह बन नहीं जाता और इसके बनने के बाद जन भावनाओं के नतीजे सामने नहीं आ जाते तब तक इसके बारे में कुछ भी कहना सही नहीं है। अगर गठबंधन की सरकार बनती है इसका मतलब है कि उसकी आलोचनाएं भी होंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो पहले ही कहा है सर्दी है के कांग्रेस का प्रस्तावित महागठबंधन एक नाकाम विचार है। आलोचकों का मत है कि गठबंधन अस्थाई होते हैं और नीतिगत तौर पर अवरोधक पैदा करते हैं जिससे विकास धीमा हो जाता है।
    लेकिन क्या यह सही है? गठबंधन की सरकार सरकारें भारत या और भी कहीं अर्थव्यवस्था को हानि नहीं पहुंचाती हैं। 1980 के दशक में गठबंधन की सरकार बनी थी। इस  से भारत के विकास को कोई हानि नहीं पहुंची उल्टे आर्थिक सुधार की गति तीव्र हो गई। क्योंकि 1980 के दशक के आखिरी दिनों में देश की  राजनीति विभाजित हो चुकी थी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन( यूपीए )और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) दोनों के शासनकाल में भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा विकास हुआ। जबकि आरंभ से पांच लोकसभा सभाओं में जब कांग्रेस का वर्चस्व था उस समय विकास दर बहुत कम थी। विकास ही नहीं गठबंधन की सरकारों के शासनकाल में अर्थव्यवस्था में भी स्थायित्व देखा गया था। विकास में स्तरीय विचलन 1989 से 2014 के बीच कम पाया गया। अन्य आर्थिक सूचकांकों में बहुत ज्यादा अंतर नहीं था। मसलन गठबंधन की सरकारों के काल में चालू खाता घाटा उतना ही था जितना पहले हुआ करता था।
     दुनिया में जहां भी गठबंधन की सरकार बनी है वहां विकास को आघात के बहुत कम सबूत मिलते हैं। अमीर देशों में, खासकर यूरोप में  जहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली
समाज में विखंडन पैदा करती है , वहां विकास को बल मिला है।  बर्न विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों के अनुसार जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड ,ऑस्ट्रिया और फिनलैंड में विगत 20 वर्षों से गठबंधन की सरकारें हैं। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन में शामिल देशों में से आधे देशों में और यूरोपीय देशों में  2016 में गठबंधन की सरकार बनी थी और 1996 से 2016 के बीच गठबंधन की सरकारें  हैं और बिना गठबंधन वाली सरकारों के शासनकाल में अर्थव्यवस्था के विकास में कोई एक पैटर्न नहीं था। परंतु जो तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है वहां गठबंधन की सरकारों के काल में विकास काफी फूला - फूला।
     कुछ राजनीति विज्ञानियों का तर्क है गठबंधन के साल में विकास के दर में वृद्धि हुई है। क्योंकि , गठबंधन की सरकारों में कई समूह और समुदाय शामिल होते हैं। राजनीतिशास्त्री इरफान नूरुद्दीन ने बताया है कि गठबंधन की सरकारों में कई समूह होते हैं जो सरकार को अचानक या मर्जी के अनुरूप नीतियां बदल दे से रोकते हैं। इससे नीतियों में स्थायित्व आता है और निवेशकों बढ़ावा मिलता है। लेकिन, साथ ही गठबंधन सरकारों के समय संसद में बहुत रुकावटें पैदा होती हैं। उदाहरणस्वरूप ,1952 से 57 के बीच पहली लोकसभा में 360 विधेयक पास हुए जबकि 2009 से 2014 के बीच जब यूपीए सरकार  की दूसरी पारी थी तो संसद मे केवल 179 विधेयक पारित हो सके। आर्थिक प्रबंधन में गठबंधन की सरकारों के बड़े ठोस रिकॉर्ड रहे हैं।

Sunday, September 16, 2018

भाजपा का बढ़ा आत्मविश्वास

भाजपा का बढ़ा आत्मविश्वास
2019 के लोकसभा चुनाव का चाहे जो हो या उसके बाद के चुनाव का भी चाहे जो लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने आत्मविश्वास और अपनी अकड़ से यह जंग जीत ली है। उन्होंने 2022 की योजनाओं का भी खुलासा किया है जबकि अभी उसकी पहली पारी भी अभी खत्म नहीं हुई है । पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अध्यक्ष अमित शाह ने अगले 50 साल तक सत्ता में कायम रहना कि अपनी मंशा की घोषणा की है बेशक उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष को 2019 एक अवसर मिल सकता है। भाजपा की आंतरिक संरचना कुछ ऐसी है कि वह बुरे समय में भी विश्वास को कायम रख सके । लेकिन वर्तमान का जो जुझारू पना है जो लड़ने की क्षमता दिख रही है उसके कई कारण  हैं। भाजपा ने देश में ध्रुवीकरण की सियासत शुरू कर दी है। इससे पार्टी के समक्ष एक नई चुनौती उत्पन्न हो गई है। यहां मोदी सरकार के कामकाज की समीक्षा करना उद्देश्य नहीं है। लेकिन ,आम आदमी के नजरिए से तो यह लगता है कि सरकार ने कुछ किया नहीं । खासकर गरीबों और छोटे व्यापारियों के लिए। नोटबंदी , जीएसटी  , तेल की बढ़ती कीमत  और रुपए का घटता मूल्य  इत्यादि के रूप में  सरकार ने जो किया उससे हानि ही पहुंची है।
        इन सबसे अलग सामाजिक क्षेत्र में भी बहुत मुश्किलें  हैं और तीव्र हिंदुत्ववाद से समाज में कुछ ऐसा भी विघटन आ गया है कि शायद ही उसे खत्म किया जा सके। क्योंकि इस नई स्थिति से हिंसा का एक नया स्तर देखने को मिल रहा है । यहां अभी  और मिल पत्थर हैं जैसे सांप्रदायिक हिंसा। अब यह कभी कभार की बात नहीं रह गई बल्कि यह नहीं खत्म होने वाली अनवरतता हो गई है।  जब हिंसा शुरू होती है तो उसे हर कोण से फिल्माया जाता है। यहां जो सबसे विचित्र बात है वह कि यह अपराध गोपनीय नहीं रहता, इससे तमगे की तरह धारण करके अपराधी खुला घूमते हैं । यही नहीं,  इस हिंसा को न केवल सोशल मीडिया द्वारा समर्थन मिलता है बल्कि इसे मंत्रियों और सांसदों का भी समर्थन प्राप्त है। बेशक प्रधानमंत्री जी ने कभी-कभार इसकी आलोचना जरूर की है । लेकिन ,उस आलोचना से जयंत सिन्हा जैसे मंत्री को नहीं रोका जा सका है। यही नहीं पीट-पीटकर कर मार डालने घटना ने हमें झकझोरा तक नहीं उल्टे उस पर नई बहस शुरू हो गई। जैसे अखलाक की हत्या इस हत्या ने हमें विचलित नहीं किया बल्कि हम एक नई बहस मैं उलझ गए कि उसके घर में खाना बनाने के बर्तन में गौ मांस था या साधारण मांस। इसके बाद तो कई और घटनाएं घटीं। मानवाधिकारवादियों को नीचा दिखाना अब आम बात हो गई है । चूकि अपराधियों को आजादी मिल गई है तो अपराध एक नई ऊंचाई तक पहुंच गया है ऐसा नहीं की इस नए अंधेरे की भयावहता से लोग चिंतित नहीं है जो समझते हैं वह स्पष्ट कहते हैं कि भविष्य में भीड़ की तानाशाही का भय है। इसे खत्म किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी लिंचिंग के लिए कानून बनाने की सिफारिश की है और हैरत जाहिर किया है फिर क्या शाही अब सामान्य हो गई है ।भीड़ को कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती। हाल में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी ने भीड़तंत्र को एक नया रूप दे दिया। बात यहां तक बिगड़ी कि सुप्रीम कोर्ट को भी हस्तक्षेप करना पड़ा।
अब आते हैं मूल बात पर कि भाजपा भरोसे से इतनी लबालब क्यों है? क्योंकि, पार्टी का आकलन है के जो विधि विहीनता दिख रही है वह उसकी उपलब्धि है। क्योंकि इसे हिंदू भारत के रूप में देखा जा रहा है और भारतीय मध्यवर्ग जो जन चेतना पैदा करने में मुख्य भूमिका निभाता है वह धीरे धीरे निष्क्रिय होता जा रहा है। क्योंकि मध्यवर्ग कई समस्याओं के कारण क्रमिक रूप से श्रमिक वर्ग में परिवर्तित होता जा रहा है । यही नहीं ,भाजपा यह भी फैला रही है कि सामाजिक न्याय के समर्थक असल में हिंदू अल्पसंख्यक वाद का विरोध कर रहे हैं। इससे भाजपा को अन्य पिछड़ा वर्ग में समर्थन मिलने लगा है ।विपक्ष  हिंदू वोट के डर से भाजपा की आक्रमकता का मुंहतोड़ जवाब नहीं दे पा रहा है। वह केवल तेल की कीमत को लेकर बैठा हुआ है। वह बता नहीं पा रहा है की एक दल और उसकी सरकार से लोकतंत्र को खतरा है। विपक्ष केवल राज्य स्तरीय गठबंधन बनाने तक ही रह गई है कोई वैचारिक चुनौती नहीं दे पा रहा है । भाजपा के लिए विपक्ष का एक ही नेता आंख की किरकिरी बना हुआ है वह है राहुल गांधी। राहुल गांधी की कैलाश मानसरोवर यात्रा से भाजपा में बेचैनी है। लेकिन ,वह चिंतित नहीं है।  क्योंकि राहुल गांधी का उद्देश्य यह बताना था कि वह एक अच्छे हिंदू हैं। यह एक ऐसा दांव है जो  नियंत्रण से बाहर भी हो सकता है। इसका मतलब यह भी तो हो सकता है कि कांग्रेस ब्राह्मणवाद की घोषणा करने जा रही हो और उसके भीतर भी गौ रक्षा यह वह भाव कायम है । भाजपा को यदि खतरा है तो अपने भीतर से ही है।  वह खतरा है दलितों के प्रति पार्टी के रुख का।