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Sunday, July 21, 2019

तेज विकास का अर्थ अच्छे रोजगार नहीं

तेज विकास का अर्थ अच्छे रोजगार नहीं

तेज आर्थिक विकास का का अर्थ अच्छी नौकरियां या अच्छे रोजगार नहीं है और साथ ही जो राज्य ज्यादा लैंगिक समानता पर जोर देते हैं उनकी स्थिति नए रोजगार के मामले में ज्यादा अच्छी है। आंध्र प्रदेश- तेलंगाना, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ भारत में ऐसे राज्य हैं जहां लैंगिक समानता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है और लगभग इन्हीं राज्यों में रोजगार के अवसर और उनकी गुणवत्ता ज्यादा अच्छी है अन्य राज्यों के मुकाबले। जबकि इस सूची में बिहार ,उत्तर प्रदेश तथा उड़ीसा का स्थान सबसे नीचे है। अच्छे रोजगार या उत्पादन नहीं बल्कि नौकरियां जिनमें अच्छा वेतन मिलता है वह स्थाई विकास के लिए जरूरी है। पिछले महीने जारी एक शोध पत्र में कहा गया है कि आर्थिक विकास के बावजूद नौकरियों के अवसर धीमे हैं। भारत एक ऐसा देश है जहां बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है। देश के 71% मजदूर अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं।  देशभर में स्थाई  नौकरियों का अभाव है। लेबर फोर्स सर्वे 2019 के अनुसार 2017 -18 में ग्रामीण क्षेत्रों में 5.3% और शहरी क्षेत्रों में 7.8% बेरोजगारी रही है। गुजरात में स्थाई रूप से 10% विकास दर रही लेकिन यहां भी अच्छी नौकरियों का अभाव रहा है और शोध पत्र में तैयार की गई सूची में गुजरात का स्थान 18 था। जबकि , शीर्ष तीन स्थानों पर आंध्र प्रदेश महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ का नाम है। सूची में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना संयुक्त रूप से 57.3 अंक दिए गए हैं  महाराष्ट्र को 57.2 और छत्तीसगढ़ को 56.3 अंक दिए गए हैं जबकि उत्तर प्रदेश को 32 .04 बिहार को 37.28 एवं उड़ीसा को 37.70 अंक दिए गए हैं और इसका स्थान सर्व निम्न है। इस सूची को तैयार करते समय 2010 से 2018 के बीच की अवधि के आंकड़ों का औसत दिया गया है। यह आंकड़े विभिन्न सरकारी सूत्रों से हासिल किए गए हैं जैसे, नेशनल सैंपल सर्वे, श्रमिक ब्यूरो, उद्योगों का राष्ट्रीय सर्वेक्षण एवं भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े इत्यादि । सूची में पूर्वोत्तर के 7 राज्यों को शामिल नहीं किया गया है क्योंकि इनके आंकड़े पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।
           विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार  भारतीय कार्यबल में महिलाओं की उपस्थिति लगभग 24% है तथा इसका स्थान 131 देशों इस सूची में 124 है विश्व बैंक की 2018 से रिपोर्ट में बताया गया है यह जिन राज्यों में या देशों में लैंगिक समानता पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है उन क्षेत्रों की रोजगार में स्थिति बेहतर है लैंगिक समानता के मामले में गुजरात का स्थान सर्वोच्च है वहां यह अनुपात 72.9 है जबकि बिहार में यह सर्वनिम्न है ।रोजगार में लैंगिक भेदभाव खत्म करने के लिए राज्यों को सार्वजनिक स्थानों का निर्माण करना होगा, आवास और कार्यस्थल को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाना होगा ताकि महिलाएं गांव से आकर शहरों में काम कर सकें। इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के महासचिव दिलीप चिनॉय के अनुसार जब तक कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा नहीं रहेगी महिला शहरों में आकर काम नहीं कर सकती हैं। जिन राज्यों में काम पर रखे जाने वालों के साथ लिखित अनुबंध तैयार किया जाता है वैसे राज्य में गोवा का स्थान सर्वोच्च है। गोवा में काम पर रखे जाने वाले लोगों में से लगभग 87.59 प्रतिशत लोगों के साथ लिखित अनुबंध किया जाता है जबकि उत्तर प्रदेश में यह सबसे कम है। यहां सिर्फ 16.9 दो प्रतिशत लोगों के साथ ही  अनुबंध होता है। जिन राज्यों में काम पर रखे जाने वाले लोगों को नौकरी के बाद ज्यादा सुरक्षा  और लाभ प्राप्त होता है जैसे प्रोविडेंट फंड और पेंशन इत्यादि ऐसे राज्यों में जम्मू कश्मीर सबसे ऊपर के स्थान पर है। यहां काम पर रखे गए 55.4 7 लोगों को यह सुविधा प्राप्त है । जबकि गुजरात सबसे निचले स्थान पर है यहां काम करने वाले 12.57 प्रतिशत यह सुविधा हासिल है । जो आंकड़े सर्वे से प्राप्त किये गए हैं वह एक तरह से राज्य सरकारों को जिम्मेदार भी ठहराते हैं कि वह इसे सुधारने का प्रयास करें और देश के नौजवानों को ज्यादा कामकाज दे।  नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत के अनुसार शिक्षा में विकास के साथ-साथ अगर कौशल में भी विकास हो खास करके भविष्य के अनुरूप विकास हो तो देश में रोजगार बढ़ सकता है। और देश के नौजवान नौकरी मांगने वालों से नौकरी देने वालों में बदल सकते हैं।

Friday, July 19, 2019

दल बदालुओं के लिए फिर चुनाव लड़ना जरूरी हो 

दल बदालुओं के लिए फिर चुनाव लड़ना जरूरी हो 

हाल में कई राज्यों में जो हुआ। यहां तक कि   गोवा और तेलंगाना में भाजपा और टीआरएस के साथ के साथ कांग्रेस से विधायक टूट गए।  इसके अलावा तेलुगू देशम पार्टी के सांसदों का राज्यसभा में भाजपा के साथ मिलना एक तरह से दलबदल कानून को कसौटी पर ला दिया है। कानून के तहत इन सब मामलों में दल बदलने वाले विधायकों और सांसदों को एक खास संख्या के साथ बाहर आना होगा वरना उनकी सदस्यता रद्द हो  जाएगी। गोवा में कांग्रेस का एक विधायक भाजपा को पराजित कर आया था और  अभी साल भर भी नहीं गुजरा कि यह सब हो गया।  दलबदल विधेयक की रोशनी में इन सभी मामलों को देखने की जरूरत है। वस्तुतः  यह सब राजनीतिक और संविधानिक नैतिकता का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन है। भारत में राजनीतिक पार्टियों के चतुर्दिक ही संसदीय राजनीति घूमती है और निर्वाचन के बाद विभिन्न पार्टियों के विजयी उम्मीदवार ही इसके सदस्य तथा आम जनता के प्रतिनिधि बनते हैं । उन्हें अपनी पार्टी के विपरीत आवाज उठाने या खुद की स्थिति का निर्णय करने का अधिकार नहीं होता। एक उम्मीदवार की प्राथमिक पहचान राजनीतिक होती है वह पहचान पार्टी की  विचारधारा और उसके इतिहास के आधार पर सामने रहती है। मतदाताओं के लिए उम्मीदवार पार्टी की आवाज होता है। पार्टी का चुनाव चिन्ह ,चुनाव घोषणा पत्र झंडा इत्यादि उस उम्मीदवार या उस विधायक के दावे के पीछे कायम रहता है।  उसे इसी आधार पर जनता निर्वाचित करती है। ऐसा कई बार होता है कि कोई नेता किसी पार्टी का चेहरा बन जाता है और उसी के नाम पर वोट मांगे जाते हैं ,जैसा कि 2019 के चुनाव में देखने को मिला। अब अगर कोई विधायक दल बदल करता है तो सबसे पहले वह जनादेश के साथ दगाबाजी करता है। यह एक तरह से चुनाव के माध्यम से तैयार विश्वास को भंग किया जाना है। बेशक किसी भी विधायक को अपनी इच्छा अनुसार पार्टी में जाने की आजादी है लेकिन जैसे ही वह इस आजादी का इस्तेमाल करता है तो इसका अर्थ होता है कि उसे दूसरी पार्टी आदर्श उसकी विचारधारा और अन्य बातें ज्यादा आकर्षित कर रही हैं। लेकिन इस तरह का बदलाव बताता है की वह विशिष्ट उम्मीदवार जनादेश को अपमानित कर रहा है। राजनीतिक नैतिकता का यह तकाजा है कि वह उम्मीदवार अपनी सीट छोड़कर दोबारा चुनाव लड़े। उदाहरण के लिए जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को छोड़ा तो वे दोबारा चुनाव लड़े। रामकृष्ण हेगड़े ने 1984 में कर्नाटक के मुख्यमंत्री का पद त्याग किया। उस साल लोकसभा चुनाव में तत्कालीन जनता पार्टी को भारी विजय मिली थी और हेगड़े पर दोबारा चुनाव लड़ने का दबाव भी नहीं था परंतु उन्होंने नैतिकता के दवाब में चुनाव लड़ने का फैसला किया। विश्वनाथ प्रताप सिंह इलाहाबाद से विजई हुए और हेगडे दोबारा जीतकर मुख्यमंत्री बने। 2012 में सीपीआईएम के विधायक आर सेलवराज जब पार्टी छोड़कर कांग्रेस में गए तो उन्होंने दोबारा चुनाव लड़ा।
         गोवा और तेलंगाना में जो दलबदल हुए हैं उसका दोष कांग्रेस पर है कि वह पार्टी अपने विधायकों को रोक नहीं पाई । यहां रोक पाने का निहित अर्थ धन और पद से है। विधायकों ने भी विकास तथा सुशासन के अदृश्य परदे के पीछे खड़े होकर दलबदल करने का अपना औचित्य बताया। कारण चाहे जो हो, किसी विधायक को दल बदलने का कारण अपने  मतदाताओं को बताना जरूरी है और यह बताना चुनाव लड़ने के माध्यम से ही हो सकता है । अगर कोई सदस्य ऐसा नहीं करता है तो इसका मतलब है वह अपने निर्वाचकों  का सामना नहीं किया है। सियासी अर्थशास्त्र में परिवर्तन ने राजनीतिक दलों और राजनीतिक प्रक्रिया में भी बदलाव ला दिया है। चुनाव में भारी धन की जरूरत ने चुनाव को एक महंगा काम बना दिया।  अब चुनाव आस्था तथा विचारधारा के आधार पर नहीं होते हैं । उम्मीदवार भी राजनीतिक दलों का पल्ला  इसलिए पकड़ते हैं कि कानून उनसे दूर रहे और वे अपना हित साधते रहें। कभी कभी जनता इसे चुनौती भी दे देती है । इसके उदाहरण धुर वामपंथी दलों का उदय, वीपी सिंह के जनमोर्चा का ताकतवर होना तथा अन्ना हजारे का सरकार विरोधी आंदोलन का प्रसार इत्यादि हैं। यह एक तरह से संसदीय राजनीति में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता के क्रोध का इजहार भी था। यही नहीं, यही फिनोमिना भूमि ,आजीविका, पर्यावरण इत्यादि से संबद्ध नए आंदोलनों में लोगों का शामिल होना भी है। इन  सबमें एक तरह से कांग्रेस का हाथ है। क्योंकि आरंभ में संसदीय राजनीति में उसने ही अवक्षयण  पैदा किया। संपूर्ण प्रक्रिया को रोकने के लिए एकमात्र यही उपाय है कि दल बदलने वाले विधायकों - सांसदों को चुनाव लड़ने के लिए बाध्य किया जाए।

Thursday, July 18, 2019

भारत की शानदार विजय

भारत की शानदार विजय

कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय  में वियना समझौते की धारा 36 के तहत भारत की शानदार विजय हुई है। न्यायालय ने पाकिस्तान को इस धारा का उल्लंघन करने का दोषी पाया है। न्यायालय ने आदेश दिया है कि पाकिस्तान जाधव को फांसी दिए जाने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करे । जाधव को पाकिस्तान में जासूसी और आतंकवाद के अपराधों के आरोपों के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था। न्यायालय ने कहा कि जब तक पूरी न्याय प्रक्रिया समाप्त नहीं हो जाती तब तक जाधव की फांसी पर रोक अनिवार्य है। मई  2017 में न्यायालय ने आदेश दिया था कि "पाकिस्तान की सैनिक अदालत ने जाधव की फांसी के बारे में जो आदेश दिए थे   उस पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अंतिम फैसले तक सरकार  रोक लगाए।"
        प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय अदालत के इस फैसले का स्वागत किया है और कहा है कि पाकिस्तान अब न्याय के अनुरूप कदम बढ़ाएगा। दूसरी तरफ पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने ट्वीट किया है कि "यह पाकिस्तान की विजय है , कमांडर जाधव पाकिस्तान में रहेंगे और उनके साथ पाकिस्तानी कानून के तहत बर्ताव किया जाएगा।" 
पता नहीं पाकिस्तान क्यों इतना खुश है । अंतरराष्ट्रीय अदालत के इतिहास में किसी भी देश के बारे में इतना स्पष्ट फैसला नहीं दिया गया है । प्रत्येक दो-तीन पैराग्राफ के बाद पाकिस्तान को गलत ठहराया गया है और सम्मानजनक शब्दों का तो कहीं प्रयोग ही नहीं है । अब पाकिस्तान इस पर भी खुश है तब क्या कहा जा सकता है। इससे भी अलग यह फैसला दुनिया के अन्य देशों के लिए भी मानवाधिकार के हित में है।
         प्रसंग वश इस मामले में एक दिलचस्प अध्याय यह भी उस समय जुड़ जाता है जब भारत के वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने यह मुकदमा लड़ने के लिए फकत एक रुपए फीस ली है जबकि दूसरी तरफ पाकिस्तान ने जाधव को जासूस साबित करने के लिए वकीलों पर 20 करोड़ से ज्यादा रुपए खर्च किए हैं। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में  उपस्थित चीनी न्यायधीश ने बहुमत का पक्ष लिया है। इससे इस्लामाबाद को राजनीतिक और कूटनीतिक तौर पर भारी आघात पहुंचा है।
       भारत में खुशी इसलिए है की कुलभूषण जाधव अकेले नहीं हैं।हमिद अंसारी पिछले साल कई दिनों तक बिना किसी आरोप के पाकिस्तानी जेलों में सड़ रहे थे और बाद में भारत पर एहसान जता कर उसे रिहा किया गया। उससे पहले सरबजीत सिंह और चमेल सिंह का केस सब जानते हैं कि उन्हें कैसे मार दिया गया। पाकिस्तान धार्मिक लोगों को भी नहीं छोड़ता है। हजरत निजामुद्दीन दरगाह के प्रमुख मौलवी पाकिस्तान गए थे और उन्हें आई एस आई अपहृत करके न जाने कहां ले गई और काफी मारपीट करके तीन-चार दिनों के बाद उसे छोड़ा। जहां तक  कुलभूषण जाधव का मामला है उसे पाकिस्तान की आईएसआई ने किसी चरमपंथी गिरोह को पैसे देकर ईरान से अपहरण करवाया था। इसलिए भारत में खुशी है। यह सारा मामला भारतीय नागरिकों से जुड़ा है। पाकिस्तान ने प्रोपेगेंडा को हथियार बना दिया है। लेकिन उसके पास कोई भी ऐसा सबूत नहीं है जो कुलभूषण के खिलाफ जाता है। यह तो हर कोई शिकायत ही करता था अब तो सबूत मिल गए हैं कि पाकिस्तान सही रास्ता नहीं अपना रहा है।
           अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अध्यक्ष अब्दुल क्वाई अहमद युसूफ ने बुधवार को फैसला सुनाया। यद्यपि न्यायालय ने भारत के पक्ष में फैसला सुनाया लेकिन इसने भारत के उस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया जिसमें  पूरा केस खारिज कर देने के लिए कहा गया था। अदालत का मानना था कि पाकिस्तान ने कूटनीतिक संबंधों के मामले में वियना समझौते का उल्लंघन किया है अथवा नहीं यह विचारणीय था और पाया गया की धारा 36 के तहत इसने समझौते का उल्लंघन किया है । अब यहां प्रश्न उठता है क्या पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को मानने के लिए बाध्य है ? तकनीकी तौर पर पाकिस्तान इसे मानने के लिए बाध्य है।  यदि वह इसे नहीं मानता है तो इस मामले को लेकर राष्ट्र संघ के संबंधित निकाय में उठाया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को लागू करवाने के लिए सुरक्षा परिषद की मदद भी होती है । अमरीका ने एक बार अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले को मानने से इनकार कर दिया था । क्योंकि उसे मालूम था कि राष्ट्र संघ में बात रखने पर वह वीटो कर सकता है। लेकिन पाकिस्तान के साथ यह सुविधा नहीं है। इसलिए वह अदालत का हुक्म मानने के लिए बाध्य है
         इस आदेश के बाद भारत जाधव को कूटनीतिक सुविधाएं पहुंचा सकता है और यादव को बताया जा सकता है उसके अधिकार क्या हैं।  वह फांसी की सजा से कैसे बच सकता है। पाकिस्तान इस दिशा में लगाए गए सभी अवरोधों को हटा लेने के लिए बाध्य हो चुका है।  अब यदि पाकिस्तान कूटनीतिक पहुंच को मुहैया कराने में टालमटोल करता है या अनावश्यक विलंब करता है तो भारत इसके बारे में अंतरराष्ट्रीय अदालत को सूचित कर सकता है।  यही नहीं राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद को भी सूचना भेजी जा सकती है । पूरे मामले की समीक्षा में कुछ समय लग सकता है। क्योंकि सैनिक अदालत के फैसले की समीक्षा प्रक्रिया में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पास सीमित अधिकार हैं । अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने भी इसे माना है। लेकिन उसने यह भी सुझाव दिया है कि एक विधेयक लाकर इस विलंब को खत्म किया जा सकता है। अब इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण  है  फांसी पर रोक । इस संबंध में न्यायालय के आदेश को माना जा रहा है या नहीं । जाधव को फांसी दिए जाने के मामले में किसी भी कदम को अब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है और नया मामला चल सकता है। साथ ही इसे राष्ट्र संघ में भी उठाया जा सकता है । इन सब में सबसे खास बात है कि पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अपील नहीं कर सकता है। लेकिन इन सबके बावजूद अभी अब पाकिस्तान पर निर्भर करता है कि न्यायालय के फैसले को कैसे लागू कर रहा है और यह भारत पाकिस्तान के संबंध में एक सकारात्मक मोड़ बन सकता है। अभी से इस दिशा में पाकिस्तान द्वारा कदम बढ़ाए जाने के लक्षण दिखाई पड़ने लगे हैं । अंतरराष्ट्रीय समुदाय को खुश करने की गरज से उसने बुधवार को ही हाफिज सईद को गिरफ्तार कर लिया। मुख्य मसला है कि पाकिस्तान सरकार द्वारा समर्थित आतंकवाद के प्रति वह कैसा रुख अपनाता है।

Wednesday, July 17, 2019

कर्नाटक का झमेला

कर्नाटक का झमेला

कर्नाटक मसले में या कहें कि कर्नाटक में चल रहे राजनीतिक उठापटक के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय दे दिया है। अदालत ने कहा है कि यह मामला विधानसभा अध्यक्ष सुलझाएं । इसीके साथ गेंद फिर स्पीकर के पाले में आ गयी। कोर्ट ने कहा है कि बागी विधायकों पर व्हीप लागू नहीं होगी और ना ही उनपर  सदन में उपस्थित रहने की अनिवार्यता होगी। ऐसे में     अब सवाल उठता है कि क्या इस फैसले से अथवा  क्या अदालत के निर्णय से समाज में व्याप्त मूल भावनाएं खत्म हो  सकती हैं, और अगर ऐसा नहीं हो सकता है तो अदालत का फैसला दूरगामी ना होकर एक अस्थाई समाधान के रूप में कायम रहेगा।
       भारत का यह राजनीतिक सामाजिक चरित्र और अगर कर्नाटक के सियासत का इतिहास देखेंगे तो लगेगा कि इस राज्य के लिए ऐसा होना कोई नई बात नहीं है। दरअसल पिछले साल चुनाव खत्म होने के बाद इसी सत्तारूढ़ गठबंधन के नेताओं ने लगभग 14 महीने पहले कुछ ऐसा ही नाटक किया था। उन्होंने भी निर्वाचित प्रतिनिधियों को इसी तरह एक पक्ष से फोड़ कर एक सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया था। उन्होंने उन नेताओं को भारतीय जनता पार्टी से बचाने के लिए ऐसा किया था । भाजपा वहां खुद को बहुमत वाला दल बता कर सत्ता हासिल करना । पहले भी ऐसा हुआ था कहा जा सकता है। वहां  यह सब जनता के बीच कहावत बन चुका है। इस तरह के अलंकारिक कार्यकलाप अन्य राज्यों में भी हैं लेकिन कर्नाटक में इस तरह की विशेषज्ञता हासिल है। लेकिन, सवाल है कि इस तरह के हथकंडो का उद्देश्य क्या है? क्या जनता के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है? और क्या इस तरह के राजनीतिक हथकंडे लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत कर सकेंगे? कर्नाटक में फिलहाल गठबंधन की सरकार है और उस गठबंधन में कांग्रेस तथा जनता दल  शामिल हैं। मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी जनता दल सेकुलर के प्रतिनिधि हैं। 224 सदस्यों वाले सदन में जनता दल सेकुलर के 37 सदस्य हैं और कांग्रेस के 78 विधायक तथा दो निर्दलीय हैं। जबकि विपक्षी दल भाजपा के कुल 105 विधायक हैं । शुरू से ही गठबंधन के सदस्यों के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं थे और इसके टूट जाने की खबरें अक्सर आती रहती थीं। भाजपा ने कुछ सदस्यों को तोड़ देने की लगातार कोशिशें की और इसे ऑपरेशन कमल के नाम से पुकारा जाता था। लोकसभा चुनाव के बाद जब भाजपा को कर्नाटक की 28 सीटों में से 25 सीटें हासिल हुई हैं तो गठबंधन में चरमराहट सुनाई पड़ने लगी थी।
         कुछ दिन पहले कांग्रेस के 10 और जनता दल सेकुलर के तीन सदस्यों ने  सदन की अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।  उन्हें वहां से उठाकर मुंबई के लग्जरी होटल में ले जाया गया। सारा मामला सुप्रीम कोर्ट में गया उधर भाजपा पर आरोप लगने लगे उसने एक निर्वाचित सरकार को गिराने के लिए अवैध हथकंडे अपनाए हैं । लेकिन यह सारा क्यों हुआ ? इसके पीछे एक नई कथा है। इस समूचे मामले के पीछे कई छोटे-छोटे कारक तत्व हैं, जैसे विलासिता पूर्ण रहन सहन, निजी विमान से आवागमन इत्यादि। हालांकि सरकार और गठबंधन के दल तोड़फोड़ के लिए भाजपा को दोषी बता रहे हैं लेकिन प्रश्न है कि सरकार ने पहले गठबंधन के भीतर असंतोष को फैलने का मौका क्यों दिया? जो दिख रहा है उसका पहला कारण है कि कांग्रेस ने खुद उत्तरी कर्नाटक के सबसे महत्वपूर्ण नेता को महीनों तक सरकार से बाहर रखा। वोक्कालिगा समुदाय के एक छोटे से समूह ने वहां के राजनीतिक हालात हो दिशा दिखाने की कोशिश शुरू कर दी। उधर लिंगायत गुट ने अपनी गतिविधि भी आरंभ कर दी। यही नहीं राज्य के दक्षिणी भाग में कांग्रेस और जनता दल सेकुलर शुरू से प्रतिद्वंदी रहे हैं और वहां के वोक्कालिगा समुदाय से उसके रिश्ते मधुर रहे हैं। आंकड़े बताते हैं के 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा कांग्रेस और जनता दल सेकुलर के मतों का प्रतिशत क्रमशः 36.34 प्रतिशत ,30.14% और 18.3% रहा है। ऐसे में कांग्रेस के महत्वाकांक्षी सदस्यों में गठबंधन के मूल पर सवाल उठाया जाने लगा और जब कुछ हासिल नहीं हुआ तो उन्होंने पाला बदलने की कोशिश शुरू कर दी। उधर भाजपा ने उनकी तरफ हाथ बढ़ाया और वायदों की झड़ी लगा दी।
          आज भी हमारे देश में निर्वाचित सदस्य बुनियादी तौर पर खुद को जाति और समुदाय का सदस्य समझता है और जब संसाधन का बंटवारा होता है तो उसे उसी समुदाय या जाति की व्यापकता के आधार पर वे संसाधन मुहैया कराए जाते हैं। एक विधायक के रूप में निर्वाचित होने का मतलब समझा जाता है कि अन्य लाभ उसे प्राप्त होंगे और साथ ही मंत्री भी बनाया जाएगा ।  इसके कारण हर विधायक के भीतर एक विशेष प्रकार का लोभ समाया रहता है । केरल की राजनीति खोज का विषय है कि उसमें कैसे एक नया राजनीतिक ढांचा तैयार किया जा सके। एक सार्वजनिक संस्कृति का सूत्रपात किया जा सके जो इस तरह की सारी खामियों को दूर कर दे। लेकिन अभी जो हो रहा है उसके मद्देनजर यह सब मृगतृष्णा की तरह महसूस हो रहा है।

Tuesday, July 16, 2019

कांग्रेस को नेता नहीं विचारधारा की जरूरत है

कांग्रेस को नेता नहीं विचारधारा की जरूरत है

कांग्रेस पार्टी के भीतर टूट-फूट की घटनाएं हो रही हैं। कर्नाटक और गोवा के उदाहरण अभी ताजा है। कर्नाटक में शक्ति परीक्षण तय हो चुका है और यदि कोई चमत्कार नहीं होता है तो परिणाम का अनुमान लगभग सब को है यहां गौर से देखें तो निशाने पर कांग्रेस पार्टी और उसके इक्का-दुक्का समर्थक दल हैं। इस बिखराव को बल दिया है भारतीय जनता पार्टी ने। फिलहाल देश में राजनीति के दो ही ध्रुव हैं  एक अत्यंत ताकतवर और तेजी से विस्तारित होती भारतीय जनता पार्टी और दूसरी धीरे धीरे विखंडित होती कांग्रेस पार्टी। कांग्रेस पार्टी के विरोधी तथा शुभचिंतक दोनों एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि क्या कांग्रेस की विचारधारा अब पुरानी हो चुकी है , इसकी क्षमता समाप्त हो चुकी है, इसमें अब नई प्रतिभाएं क्यों नहीं आ रही हैं , इसका आधार क्यों डगमगा रहा है और क्या पार्टी समाप्त हो जाएगी? 
     अगर इतिहास को देखें तो कांग्रेस की मूल विचारधारा अभी भी पुरानी नहीं पड़ी है बल्कि पिछले कुछ दशकों से पार्टी उस विचारधारा से थोड़ी अलग हो गई है। उसी तरह इसके समर्थकों का आधार भी सिकुड़ गया है। जिन लोगों ने कांग्रेस का राजनीतिक इतिहास पढ़ा है उन्हें यह मालूम है कि इसकी विचारधारा उदार  और नैतिक दृष्टिकोण के चतुर्दिक घूमती है। इसकी उदारता का उद्देश्य ही कांग्रेस की पहचान है। महात्मा गांधी का नैतिक अभियान और जवाहरलाल नेहरू का आधुनिकतावाद  ने कांग्रेस को आधार प्रदान किया है और कांग्रेस के चरित्र का सृजन किया है। अब इसका नैतिक ताना-बाना खत्म हो चुका है और इसकी विचारधारा में गिरावट आ गई है। जिसके फलस्वरूप कांग्रेस का मूल चरित्र समाप्त हो गया है।  कांग्रेस के पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह प्रतिबद्ध सदस्य नहीं हैं और ना ही वामपंथी दलों की तरह कार्ड धारक हैं। अब यदि यह पार्टी दोबारा खड़ी होनी  चाहती है तो इसे अपनी विचारधारा को  वापस लाना होगा। कांग्रेस का गठन 1885 में हुआ था इसके गठन के 4 वर्षों के बाद जवाहरलाल नेहरू का जन्म हुआ। इसके बाद लगभग कई दशकों के बाद भी नेहरू की छाया कांग्रेस पर कायम रही। कह सकते हैं कि लगभग एक सदी तक और भाजपा को अभी भी उस साए से खतरा महसूस  होता है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी अभी भी कांग्रेस मुक्त भारत के नारे लगाती है।
           यहां सवाल है कि आखिर क्या हुआ कि पार्टी इस तरह से खत्म हो गई और समाप्ति की गति बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है । दरअसल , कांग्रेस का गठन एक संस्कृति उन्मुख भारत में हुआ था और जब वह संस्कृति आहिस्ता आहिस्ता अन्य संस्कृतियों से प्रभावित होने लगी  तो उनके दुर्गुण भी इसमें  प्रवेश करने लगे और अंततः सामाजिक चिंता की जगह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं स्थापित हो गईं। चुनाव जीतना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया।  चुनाव जीतने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है। इसलिए राजनीति में धन प्रमुख हो गया। ऐसे वातावरण में व्यक्तिवाद और कुटिलता ने राजनीतिक चेतना की जगह दखल कर ली। आज स्थिति यह हो गई कि कांग्रेस पार्टी का , यहां तक कि युवा कांग्रेस का भी, समाज से संपर्क भंग हो गया और इस शून्य में एक नए मध्य वर्ग का विकास हुआ। राजीव गांधी की आधुनिकतावादी और मनमोहन सिंह की उदारतावादी राजनीति ने इस नए मध्यवर्ग को अवसरवादी बना दिया। नतीजा यह हो गया कि पार्टी की सैद्धांतिक विरासत अब अप्रासंगिक लगने लगी।
        यहीं आकर भारतीय जनता पार्टी द्वारा राष्ट्रवाद और धर्म को एक साथ जोड़ने के सामाजिक प्रयासों की व्याख्या मिलती है । उसने कांग्रेस की इस चूक से सबक सीखा है और बड़ी होशियारी से समाज के नए मध्यवर्ग के भीतर से अवसर वाद को धीरे धीरे खत्म करने का प्रयास कर रही है। यह ध्यान देने की बात है कि कांग्रेस ही आरंभ में एक राष्ट्रवादी और समाजसेवी राजनीतिक संगठन थी आज कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व को  मालूम नहीं है कि उसे कैसे आघात लगा। हालात पर अगर निगाह रखें तो पता चलता है कि भाजपा को कांग्रेस पार्टी से कोई दुराव नहीं है। वह कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर रही है। वह केवल गांधी परिवार से दूरी बना रही है और उसका निशाना भी गांधी परिवार ही है पार्टी नहीं। उसे मालूम है कि अगर परिवार की राजनीतिक मृत्यु हो जाती है तो कांग्रेस भी समाप्त हो जाएगी। इसीलिए नरेंद्र मोदी और उनके साथी लगातार सोनिया और राहुल पर आघात कर रहे हैं। भाजपा की रणनीति है कि कांग्रेस को  विचारधारा के स्तर पर समाप्त कर दिया जाए और बहुत दूर तक उसे सफलता मिल चुकी है। आज देश के 18 से 35 वर्ष की आयु वर्ग के नौजवान नहीं जानते की स्वतंत्रता के बाद शासन करने वाले जवाहरलाल नेहरू के सिद्धांत क्या थे? इसलिए कांग्रेस को  यदि अपना वजूद कायम रखना है तो उसे अपनी विचारधारा को फिर से स्थापित करना पड़ेगा। क्योंकि कांग्रेस पार्टी को नेताओं की जरूरत नहीं है विचारधारा की जरूरत है।
         

Monday, July 15, 2019

खेल केवल खेल नहीं रहा गया

खेल केवल खेल नहीं रहा गया

इस बार क्रिकेट में इंग्लैंड विश्व चैंपियन बन गया। खबर है कि ऐसा पहली बार हुआ है। अखबारों में इस खेल के कई रोमांचक तथा भावुक पलों की चर्चा है और उस पर ढेर सारी समीक्षाएं भी हैं। लेकिन एक खेल को और वह भी जहां सारा कुछ धन पर निर्भर करता है वैसे खेल को इतना ज्यादा तरजीह देने की जरूरत क्या है? इसके कई समाज वैज्ञानिक कारण हैं। इन दिनों खेल केवल खेल ही नहीं जाते बल्कि इन्हें बड़ी सफाई से खेल पसंद करने वालों को बेचा जाता है। भारत में यह तो खास बात है। इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल द्वारा किए गए अभी तक के सबसे बड़े मार्केट रिसर्च सर्वे के अनुसार पूरी दुनिया में क्रिकेट के एक अरब चाहने वाले हैं उनमें 90% केवल भारत में है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2016 में 43 अरब क्रिकेट के चहेते थे जो केवल 2 वर्षों में यानी 2018 में बढ़कर 51 अरब हो गए। यह वृद्धि 9% की दर से हुई है। अन्य खेलों, जैसे कबड्डी और क्रिकेट के चाहने वालों की संख्या भी बढ़ी है, लेकिन वे क्रिकेट के समान नहीं हैं। भारत में क्रिकेट को चाहने वालों की संख्या अन्य खेलों के मुकाबले 65% ज्यादा है जो हर साल बढ़ता ही जा रहा है। क्रिकेट लीग भी अपने लिए दर्शकों और चाहने वालों की जमात तैयार कर रही है। इसकी मिसाल इस बात से मिल सकती है कि इंडियन प्रीमियर लीग की शुरुआत 2008 में हुई यानी लीग बिल्कुल नई है और एक आंकड़े के मुताबिक केवल प्रायोजकों के माध्यम से इसने एक अरब डॉलर की आय की। यह राशि मेजर लीग बेसबॉल से बहुत ज्यादा है जो 1969 में शुरू हुई थी और उस वर्ष 892 मिलियन डॉलर आमदनी हुई थी। यही नहीं क्रिकेट मार्केटिंग का एक बहुत बड़ा मंच बन गया है। ब्रॉडकास्टिंग ऑडियंस रिसर्च काउंसिल के एक अध्ययन के मुताबिक 2016 से 2018 के बीच क्रिकेट के विज्ञापनों में 14% की वृद्धि हुई है। बीसीसीआई दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड है।  स्टार इंडिया जैसे नेटवर्क जिसने 38.5 बिलियन का भुगतान केवल इसलिए किया था  कि भारत में होने वाले मैच का उसके पास प्रसारण अधिकार हो। उसे इसके मार्केटिंग की क्षमता का एहसास अच्छी तरह है।
        क्रिकेट और राजनीति में भी एक संबंध भी है। कई पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी जैसे गौतम गंभीर ,मोहम्मद अजहरुद्दीन ,नवजोत सिंह सिद्धू और इमरान खान ने खिलाड़ी के रूप में अपनी लोकप्रियता को भुनाया  है और राजनीतिक सत्ता हासिल की है। भारत और पाकिस्तान में जब मैच होते हैं तो राष्ट्रवाद का बुखार देखने के लायक होता है। 2019 का भारत-पाकिस्तान विश्व कप मैच सबसे ज्यादा देखे जाने वाला प्रसारण था। आंकड़ों के मुताबिक इसे 229 मिलीयन दर्शकों ने देखा। मैच खेले जाने  कुछ हफ्तों पहले भारतीय वायु सेना का पायलट अभिनंदन वर्थमान को पाकिस्तान में पकड़ लिया गया था और शांति के बिंब के रूप में उसे बाद में रिहा कर दिया गया। जब मैच में भारत के हाथों पाकिस्तान पराजित हुआ तो कई लोगों ने कहा कि यह भारत की विजय है, उसके कप्तान की विजय है। यहां तक कि गृहमंत्री अमित शाह ने भी ट्वीट किया कि " यह पाकिस्तान पर दूसरा हमला है।" भारत-पाकिस्तान मैचों में राष्ट्रवादी बोल इतने ज्यादा निकलते हैं कि मैच का परिणाम गुम हो जाता है। आज क्रिकेट खेल नहीं रह गया है। यह खेल दो टीमों के बीच में खेले जाने वाला महज एक आयोजन नहीं है बल्कि यह खेल की आर्थिक शक्ति भी है। उदाहरण के लिए जब आईपीएल के प्रसारण अधिकार की नीलामी हुई तो स्टार इंडिया ने 16,347.5 करोड़ की बोली लगाकर इसे हासिल किया। इसके बाद यह खेल कंपनियों और क्रिकेट के चहेतों के बीच का एक सेतु बन गया। आधुनिक क्रिकेट से होने वाला विशाल लाभ एक बहुत बड़ा व्यापारिक मंच है और क्रिकेट केवल खेल नहीं रह गया है बल्कि यह एक ऐसा मंच हो गया है जहां से ज्यादा से ज्यादा दर्शक किसी चीज को देखते हैं। क्रिकेट संभवत पहला और सबसे बड़ा ऐसा मंच बना है जिससे कई और हित जुड़े हुए हैं और कई और दावेदार हैं। इस परिवर्तन के चलते यह खेल केवल  मैच तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह खेल के अलावा मनोरंजन, विज्ञापन प्लेटफॉर्म, जनसंपर्क का तंत्र और तकनीकी जादूगरी में बदल गया है।
            क्रिकेट मैच के माध्यम से बाजार पैदा करने का यह काम सबसे पहले कैरी पैकर ने किया था। इसका इतना ज्यादा वाणिज्यीकरण हो गया है कि क्रिकेट का मतलब ही खत्म हो गया है और यह नए -नए बाजार तैयार करने की एक तकनीक बन गया है। इसीलिए खेलों की अवधि लगातार छोटी होती जा रही है, ताकि दर्शक इसे ज्यादा से ज्यादा बंधे रहें। इसके नियम भी बदल रहे हैं।
       क्रिकेट में जो खेल का उत्साह है उस पर राजनीतिक और व्यापारिक हितों को साधने वालों का कब्जा हो गया है। खेल के साथ-साथ  राष्ट्रीय गौरव भी इससे जुड़ गया है। मैच जीतना अब राजनीतिक विषय बन गया है, जिससे ज्यादा से ज्यादा व्यापारिक हित जन्म ले रहे हैं। भारत पाकिस्तान के मैच का ही उदाहरण लें। मैच के दौरान उत्पन्न होने वाले सांप्रदायिक और राजनीतिक ज्वार को क्या रोका जा सकता है? अब, यानी अति राष्ट्रवाद के इस युग में खेल और राजनीति में एक अंतर्संबंध पैदा होता जा रहा है। क्रिकेट के मैच का आर्थिक पक्ष केवल इस बात से पता चलता है कि मैच फिक्सिंग की घटनाएं इसमें आम होती जा रही है। हालांकि इससे खेल की साख और उसके प्रति सम्मान घटता जा रहा है और खेल तथा मनोरंजन के अंतर को समझ पाना बड़ा कठिन हो गया है।  जहां यह अति उत्तेजक होता जा रहा है वहीं इसे नियंत्रित करने वाले और इसके नतीजों को तय करने वाले भी बढ़ते जा रहे हैं। मैच फिक्सिंग एक नए तरह का अवैध कारोबार बनता जा रहा है। इसके खतरों से सावधान रहना जरूरी है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है किक्रेट अब सिर्फ खेल नहीं एक बाजार बन गया है जहां तरह-तरह के हित केंद्रित रहते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं।

Sunday, July 14, 2019

बिखरती कांग्रेस: कारण क्या है

बिखरती कांग्रेस: कारण क्या है

देश भर के कई राज्यों से खबर आ रही है के कांग्रेस से विधायक टूट कर दूसरी पार्टियों में जा रहे हैं। कई दिनों से यह अखबारों की सुर्खियां हैं। लेकिन, भारत की राजनीति के लिए यह नया नहीं है। लगभग हर  राजनीतिक पार्टी के साथ कभी न कभी ऐसा होता है कि कुछ लोग किसी मौके पर एक से टूट कर दूसरे में चले जाते हैं। शुरू में इन खबरों को पढ़ने सुनने वाले थोड़ी हैरत में आते हैं। थोड़ी चर्चा करते हैं। बाद में अभ्यस्त हो जाते हैं और बस यही कहते हैं छोड़ो यार यह सब चलता है। निर्वाचकीय राजनीति का एक और पक्ष है वह है  समाज का नैतिक पतन । हालांकि,  यह स्थिति  विश्वव्यापी है लेकिन इन दिनों इसे भारत में नया विचार माना जा रहा है और चालाकी भरी राजनीतिक रणनीति का दर्जा दिया जा रहा है। अब ऐसे में सारी स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि किसी की सहानुभूति किस तरफ है और साथ ही एक कारण और है कि जिस पक्ष से लोग टूट कर जा रहे हैं उसमें वैचारिक एवं आदर्श के खिंचाव का कम होना। यही नहीं, इसके साथ ही अवसरवादियों को चुनाव का टिकट देना भी एक कारण है। लेकिन यह सारे तर्क इस बात का जवाब नहीं देते कि झंडा बदलने वालों को किसी होटल या पर्यटन स्थल पर क्यों छुपाया जाता है ? ऊपरी तौर पर तो ऐसा लगता है कि झंडे बदलने वाले विधायक अपना निर्णय न बदल दें इसलिए ऐसा किया जाता है। लेकिन यह तो बाद की बात है । यहां सबसे महत्वपूर्ण है इस बात पर विचार करना कि एक नाव से दूसरे नाव पर सवार होने की प्रवृत्ति क्या है या उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों के बीच बदलते रिश्ते क्या हैं। परंपरागत तौर पर तो उम्मीदवार रणनीति तथा चुनाव लड़ने के लिए धन पर निर्भर करते हैं ,साथ ही पार्टी के कार्यकर्ता और बाहुबली की मतों को जुटाने की प्रक्रिया में पार्टी की साख पर निर्भर करते हैं। साधारणतः पार्टियां उम्मीदवारों के लिए इन सब चीजों का ध्यान रखती हैं। यकीनन उम्मीदवार भी अपने व्यक्तिगत कार्यकर्ताओं- समर्थकों को लेकर मैदान में उतरते हैं लेकिन इसके बावजूद बात पार्टी की ही चलती है और संबंधों में उसी का वर्चस्व रहता है। यह बात उस जमाने की है जब कहा जाता था की अगर सही पार्टी साथ में हो तो कोई भी चुनाव जीत सकता है।
           लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं। उन हालात के बदलाव की लहर दो तरह की होती है। पहली राजनीतिक तौर पर सत्तारूढ़ दल में जाने से ज्यादा लाभ का लोभ। इस स्थिति में राजनीतिक दल भी टिकट मांगने वालों को तौलते हैं कि उनकी माली हालत क्या है, उनके पास कितने लोग हैं और वह अपनी जाति तथा धर्म के कितने मतदाताओं को अपने साथ ला सकते हैं। उम्मीदवार की यह खूबी प्रतिद्वंदी दलों में स्थानीय स्तर पर प्रतियोगिता का सृजन करती है और आगे चलकर यह व्यक्तिवादी अपील में बदल जाती है। इसमें दूसरे प्रकार की लहर है कि जब बाहुबली, धनदाता और प्रभावशाली ग्रुप अपनी ताकत को पहचानने लगते हैं और यह समझने लगते हैं कि वह चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं तो क्यों नहीं खुद पार्टी में चले जाएं। दूसरे को यह सारी सुविधाएं देने से तो ज्यादा यही अच्छा है। अब इससे संगठन में दरार आने लगती है और उम्मीदवार के चुनाव में उसके विजयी होने का पैमाना बदलने लगता है। एक तरह से टिकटों की नीलामी आरंभ हो जाती है। ऐसा होने पर उम्मीदवार की चुनाव में निर्भरता कम हो जाती है वह खुद चुनाव के अपने खर्चे निकाल लेता है। पार्टी के भीतर गुटों का बनना यह बताता है यह लोग पार्टी के तंत्र पर कम भरोसा करते हैं। इससे पार्टी हाईकमान और निर्वाचकों के बीच दूरी बढ़ने लगती है तथा एक नई स्थिति उत्पन्न होने लगती है । विचार पैदा लेता है कि पार्टी बहुत ज्यादा वोट नहीं प्राप्त कर सकती है अगर उस खास उम्मीदवार से पल्ला झाड़ ले तो ।इससे जो संदेश मतदाताओं के पास जाता है वह उम्मीदवार के पक्ष में ज्यादा होता है।
        यदि राजनीतिक दल उम्मीदवारों या उनकी उम्मीदों से बहुत ज्यादा किनारा नहीं करते हैं तो सारी स्थितियों के बाद भी पार्टियों के पास बहुत कुछ देने के लिए होता है। यह स्थिति निर्दलीय उम्मीदवारों के साथ   लागू नहीं होती । लेकिन जो पार्टी के साथ हैं उनके साथ पूरी तरह लागू होती है। सबसे बड़ी बात है कि पार्टी उम्मीदवारों को साख के लिए एक मंच देती है और यही नहीं, धन की कमी के मौके पर चुनाव लड़ने के लिए धन मुहैया कराती है। बड़े स्टार प्रचारकों को  चुनाव प्रचार के लिए उपलब्ध कराती है तथा मंत्री पद की संभावनाएं पैदा करती है । अब एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने की यात्रा का पथ थोड़ा छोटा हो जाता है। ऐसे में एक महत्वाकांक्षी उम्मीदवार के लिए अपना परिश्रम, धन और ताकत लगाने के विकल्प खुल जाते हैं और वह जिस विकल्प को बेहतर समझता है उस ओर का रुख करता है, स्थानीय मतभेद को रोकता है। फिलहाल इस विकल्प के रूप में भारतीय जनता पार्टी का उदाहरण दिया जा सकता है। तो वह यानी भारतीय जनता पार्टी ऐसे उम्मीदवारों को बेशक अपने यहां स्वागत करेगी।
        अब एक ऐसी पार्टी जिसका चुनाव तंत्र बेहतरीन हो और एक ऐसा स्थानीय उम्मीदवार जो अपनी संपूर्ण क्षमता को प्रस्तुत करता हो ऐसे संबंधों को पराजित करना कठिन हो जाता है। चुनाव पूर्व जिन्होंने ऐसा नहीं किया तो चुनाव के बाद ऐसी स्थिति उत्पन्न होने की संभावना बनी रहती है। क्योंकि उसे महसूस होता है की हालात तेजी से बदल रहे हैं और निकट भविष्य में बदल जाएंगे। लेकिन इस दलील के विपरीत भी तर्क हैं । उदाहरण के लिए  देखा जा सकता है कि इन दिनों भाजपा में वह लोग भी जाने को तैयार हैं जिन्होंने कभी उसे चुनौती दी थी इसका मतलब है की हमारी राजनीतिक व्यवस्था का बहुत बड़ा भाग हमेशा एकदम से दूसरे दल के बीच झूलता रहता है और उसे रोका नहीं जा सकता। आज जो एक पार्टी से दूसरे पार्टी के बीच भगदड़ मची है उसके पीछे मुख्यतः यही कारण है और इन कारणों को खत्म नहीं किया जा सकता।