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Saturday, July 4, 2020

नेपाल की राजनीति में तूफान



नेपाल की राजनीति में तूफान


नेपाल की राजनीति में तूफान आया हुआ है। गुरुवार को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने प्रधानमंत्री पद छोड़ने के पार्टी के दबाव को मानने से इंकार कर दिया और दोनों सदन की बैठक स्थगित कर दी। स्थगन के पहले उन्होंने दोनों सदन के अध्यक्षों से भी परामर्श नहीं किया। उनके इस कदम से माओवादी नेता अत्यंत गुस्से में है। पूर्व प्रधानमंत्री एवं माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड नए राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से भेंट की और प्रधानमंत्री के इस और संवैधानिक हरकत पर विरोध किया तथा उनसे कहा कि वे इस पर कार्रवाई करें। प्रचंड और ओली दोनों सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष हैं। पार्टी को टूटने से बचाने के लिए केंद्रीय समिति की बैठक शनिवार तक टाल दी गई है। ओली ने टिप्पणी की थी कि नेपाल के राजनीतिक भारत के साथ मिलकर उनकी सरकार को चाहता है। उनकी इस टिप्पणी पर सत्तारूढ़ दल में बवाल हो गया। पार्टी में ओली के कामकाज को लेकर भारी विवाद है खासकर भारत के साथ संबंध को लेकर। नेपाल के नए नक्शे पुष्कर संविधान संशोधन विधेयक को प्रस्तुत किए जाने कई दिन पहले ओली ने कहा था कि काठमांडू के कुछ नेता भारत के साथ मिलकर उन्हें पद से हटाना चाहते हैं। उनकी इस टिप्पणी से गुस्साए लोग साफ-साफ कहने लगे कि उन्होंने पार्टी को जटिल स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। उन्हें पद छोड़ देना चाहिए। यह मांग जैसे-जैसे बढ़ती गई और उन पर दबाव बढ़ता गया उन्होंने वहां की संसद के दोनों सदनों की बैठक स्थगित कर दीं। अनुमान है कि कुछ विद्रोही नेताओं को मंत्री पद से हटाकर प्रधानमंत्री खुद अपनी पसंद के नेताओं को लाएंगे और यह काम जल्दी होने वाला है। ओली का कहना है कि प्रचंड ने उनकी पीठ में छुरा मारा है। ओली ने हर पैंतरा आजमाया है और दोनों देशों में सत्ता के गलियारे में यह चर्चा है कि सरकार यह सब चीन के समर्थन से कर रही है। इन बातों में तो सच्चाई हो या ना हो लेकिन चीन की छाप काठमांडू की हर गली में दिखाई पड़ती है। चाहे वह धर्म हो, अध्यात्म या फिर रहन सहन और खान पान सब जगह चीन की मौजूदगी के संकेत मिलते हैं। चीन की नेपाल में रुचि लगभग डेढ़ दशक से दिखाई पड़ती है लेकिन जब मधेसी आंदोलन हुआ तो चीन की दिलचस्पी और बढ़ गयी। उसके अफवाह तंत्र ने यह हवा फैलाई कि सब भारत का किया धरा है। इससे नेपाल में नाराजगी की लहर फैल गई। नेपाल और भारत में रोटी बेटी का रिश्ता होने के बावजूद नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में और काठमांडू अभिजात्य वर्ग में भारत के प्रति शंका दिखाई पड़ने लगी। अचानक 2016 में नोटबंदी हुई उससे नेपाल और नाराज हो गया। भारत नेपाल से आए चलन से बाहर हुए नोटों को बदलने से लगातार टालता रहा। यह भारत के प्रति नेपाल की नाराजगी का मुख्य कारण बताया जाता है। अभी जो कुछ नेपाल में हो रहा है उससे साफ लगता है कहीं न कहीं चीन की भूमिका है। वह भारत से नेपाल के संबंध को कमजोर कर अपने हितों को साधना चाहता है। नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री का चीन से नजदीकी रिश्ता है यह सब जानते हैं लेकिन अभी जो हालात पैदा हुए हैं उससे साफ जाहिर हो रहा है कि ओली अलग-थलग पड़ गए। 2016 में प्रचंड ने ओली को सत्ता से हटाया था उस समय चीन का सरकार समर्थित पत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था कि काठमांडू वैसे बीजिंग के साथ का मौका गंवा सकता है। इससे साफ जाहिर होता है कि चीन नेपाल की राजनीति को कैसे देखता है।


इसके पहले भी भारत और नेपाल में दो एक बार जिच पैदा हुई थी। इसे बातचीत के जरिए और कूटनीतिक समझ बूझ के साथ सुलझा दिया गया। 1960 की घटना है जब राजा महेंद्र ने भारत को यह कह कर डाल दिया कि चीन द्वारा बनाई गई सड़क नेपाल और तिब्बत को जोड़ने के लिए है और इसका महत्व केवल विकास के लिए बाकी कुछ नहीं और इस सड़क का रणनीतिक उद्देश्य तो बिल्कुल नहीं है। 1980 में जब महाराजा विरेंद्र नेपाल में सत्तारूढ़ तो उन्होंने चीन द्वारा सड़क बनाने के एक ठेके को रद्द कर दिया था। 210 किलोमीटर लंबी सड़क कोहलपुर से बनबसा के बीच थी और भारतीय सीमा के करीब थी। बाद में महाराजा विरेंद्र में यह ठेका भारत को दे दिया। इससे पता चलता है नेपाल के पूर्व शासकों ने भारत से कैसे संबंध को साध रखा था और जब चीन और भारत के हित टकराते थे तो वह भारत के पक्ष में फैसला देते थे। लेकिन हालात तब बदले जब 2005 में राजशाही को समाप्त करने के लिए नेपाल के आठ राजनीतिक दलों के बीच 12 सूत्री समझौता हुआ। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में माओवादी भी शामिल थे। भारत नेपाल की अंदरूनी सियासत का एकमात्र कारक तत्व था। लेकिन जब भारत ने नेपाल को हिंदू राष्ट्र से एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाने में खुलकर सहायता की तो नेपाल में उसके चाहने वाले धीरे-धीरे कम होने लगे । नेपाल की आंतरिक राजनीति में भारत ,अमेरिका और यूरोपीय यूनियन की बढ़ती पकड़ से चिंतित हो गया और उसने नेपाल में निवेश बढ़ाना शुरू कर दिया तथा साथ ही उस पर दबाव बनाने लगा।





अब यहां दो महत्वपूर्ण प्रश्न उभरते हैं। जब नेपाल से राज शाही खत्म हुई थी तो भारत मानता था उसकी पकड़ बढ़ेगी। लेकिन हुआ इसका विपरीत चीन के पैर वहां जमने लगे और दूसरा प्रश्न कि क्या नेपाल में भारत के लिए वातावरण तैयार करने के उद्देश्य से कोई संगठन है या नहीं। दोनों प्रश्नों के उत्तर अभी तक नहीं मिल रहे हैं। उधर ओली की सांस भी फूल गई है और कोई पैंतरा काम नहीं कर रहा है यहां तक कि हर वक्त जब ओली ऐसी स्थिति से दो-चार होते थे तो राष्ट्रवाद का पत्ता फेंका करते थे इस बार वह भी नहीं काम आ रहा है और ना भारत ही उन्हें कोई मदद कर रहा है। ऐसा लगता है पार्टी विभाजन के कगार पर है और उन्हें सत्ता से हटाया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो भारत के पड़ोस में एक और चीन समर्थक देश खड़ा हो जाएगा और भारत की घेराबंदी बढ़ जाएगी। इसलिए भारत को अभी से सचेत हो जाना चाहिए।

Friday, July 3, 2020

चीनी सीमा पर गर्म हो रहा है मामला



चीनी सीमा पर गर्म हो रहा है मामला


भारत में चीन के लगभग 59 एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया। भारत के साथ ही अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से लेकर जापान तक कई देशों ने इस पाबंदी का समर्थन किया है। अमरीकी विदेश मंत्री माइकल पॉम्पियो ने बुधवार को कहा कि भारत ने जो किया वह सही किया है और इससे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के निगरानी का एक तंत्र खत्म हो गया। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरीसन ने अपनी सुरक्षा रणनीति का खुलासा किया और उसमें भारत चीन की मोर्चाबंदी का भी जिक्र किया। ऑस्ट्रेलिया से लेकर जापान तक, राष्ट्र संघ से लेकर आसमान तक और यूरोप में एक ढीला ढाला रणनीति संबंध है और सब के सब भारत के कदम का समर्थन कर रहे हैं। चीन ने खुलकर भारत के इस कदम पर कुछ नहीं कहा लेकिन चुपचाप 20000 और सैनिक पूर्वी लद्दाख में भेज दिए। चीन की इस गतिविधि से ऐसा लगता है मामला जल्दी सुलझेगा नहीं। क्योंकि भारत पर दबाव बनाने की चीन की चाह पर पाकिस्तान ने भी गिलगित बालटिस्तान में नियंत्रण रेखा के निकट 20000 सैनिकों को तैनात कर दिया है। चीन के इस कदम को देखते हुए दुनिया के कई देशों में भारी आशंका उत्पन्न हो गई है और सैन्य विशेषज्ञ यह कयास लगाने लगे हैं इस विवाद के कारण मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे देशों के लिए 17 उत्पन्न हो रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने इसे वर्तमान समय की चुनौती के रूप में बताया है और उन्होंने कहा कि वे सुनिश्चित करना चाहेंगे उनके साधन सही जगह पर मौजूद हैं या नहीं। अमेरिका का इशारा यूरोपियन एलाइज की तरफ है। यहां उल्लेखनीय है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने जर्मनी और जापान पर कब्जा किया था बाद में कब्जा तो रहा नहीं लेकिन दोनों देशों में अमेरिकी सेना की टुकड़ियां अभी मौजूद हैं। राष्ट्र संघ के आंकड़ों के अनुसार जर्मनी में लगभग 40000 अमेरिकी सैनिक और 15000 असैनिक मौजूद हैं। अमेरिका इन्हें हटाना चाह रहा है। पहले इन्हें पोलैंड भेजने की बात थी। यह चीन के लिए चेतावनी है। अमेरिका उसे यह बताना चाह रहा है कि वह एशिया प्रशांत की ओर मुड़ रहा है। ट्रंप लगातार चीन के खिलाफ बातें कर रहे हैं। हालांकि भारत इन बातों को गंभीरता से नहीं ले रहा है क्योंकि अमेरिकी सेना के पास समुद्र में लड़ने या बर्फीले पहाड़ों पर लड़ने की ट्रेनिंग नहीं है। हो सकता है अमेरिका अपने देशवासियों का ध्यान किसी एक मुद्दे से हटाकर दूसरी ओर करना चाह रहा है ।दूसरी तरफ चीन अपनी रणनीति क्षमता को बढ़ाना उसने अपनी अति महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव के तहत विश्व के किस्से में बंदरगाह बना रखा है बंदरगाहों को सड़कों से जोड़ रहा है ताकि वह अपनी सेना को जल्दी से मोब्लाइज कर सके। बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव चीन की अरबों डालर की परियोजना है जो 2013 में जिन पिंग सत्ता में आने के बाद शुरू हुई। इस परियोजना के तहत दक्षिण पूर्वी एशिया , मध्य एशिया, खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका और यूरोप के हिस्सों को जोड़ना है। इसके माध्यम से जमीन से लेकर समंदर तक सड़कों का जाल बिछाने वाला है।





भारत सरकार द्वारा पिछले वर्ष जम्मू और कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने और अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने के बाद लद्दाख सीधे केंद्र के अधीन आ गया। अब क्योंकि चीन ने अक्साई चीन पर कब्जा कर रखा है और यह भू भाग भैौगोलिक रूप से लद्दाख का हिस्सा है और चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना इसी रास्ते से गुजरती है तो इसे लेकर झगड़ा तो पड़ेगा ही क्योंकि चीन की विस्तार वादी नीति को तेज आघात लगा है। भारत सरकार के इस कदम से उसके मकसद के सामने एक बड़ी बाधा उत्पन्न हो गई है। नरेंद्र मोदी के शासनकाल का सबसे सूझबूझ भरा कदम है। चीन यह रणनीतिक तैयारी किसी युद्ध की मंशा से बल्कि सीमा पर तनाव बढ़ाकर दमखम दिखाने की चाल है। चीन एक तरह से भारत को सीमा विवाद के माध्यम से धमकाने की कोशिश कर रहा है तरह-तरह के पैंतरे रहा है उन पैतरों में सीमा पर फौज की तैनाती और फिर बातचीत के बाद उसे थोड़ा पीछे हटा लेने की आड़ में वह साजो सामान जमा करने तथा निर्माण संबंधी तैयारियां मजबूत करने में लगा है। उधर, भारत भी उसकी मंशा को समझ रहा है और मिरर इमेज की रणनीति अपना रहा है। भारत पूरी तरह तैयार है। पड़ोसी देशों से सीमा पर लगातार घुसपैठ की गतिविधियों के मध्य नजर भारत में एक तरफ नियंत्रण रेखा और दूसरी तरफ वास्तविक नियंत्रण रेखा मध्य पड़ने वाले क्षेत्र लद्दाख में बेहतर बुनियादी ढांचा और सड़क संपर्क के साथ-साथ अब संचार नेटवर्क के विस्तार के प्रयास में है। भारत ने इसी नजरिए के अंतर्गत चीनी एप्स पर रोक लगाने के बाद दो और निर्णय किए जिससे चीन को भारी आर्थिक आघात पहुंचेगा। इसमें पहला निर्णय है कि भारत के हाईवे प्रोजेक्ट में चीनी कंपनियों का प्रवेश निषेध यही नहीं संचार मंत्रालय ने चीन की कंपनी द्वारा बीएसएनल के 4G अपग्रेडेशन का टेंडर रद्द कर दिया। भारत सरकार चीन पर हथियारों से नहीं हमला करने की तैयारी में है और ना चीन की ऐसी मंशा दिखाई पड़ रही है फिर भी दोनों तरफ से तनाव कायम है और दंडात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। इसी को देखते हुए भारत सरकार ने चीन के आर्थिक तंत्र पर आघात किया है और चीन घबरा गया है। सीमा पर नई तैनाती इसी घबराहट को दिखाती है। यह सब संभवतः सितंबर अक्टूबर या नवंबर तक चलेगा। जब गलवान घाटी और अन्य क्षेत्रों में बर्फ जम जाएगा तो फिर सब कुछ शांत हो जाएगा। इस बीच इन चाहता है भारत को ताकत का प्रदर्शन कर कुछ हासिल कर ले। लेकिन भारत शायद ऐसा नहीं करने देगा। जब जम्मू कश्मीर को भारत में शामिल किया गया तो चीन ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की थी उसी दिन लगने लगा था कि हिमालय पर बर्फ पिघलने के बाद कुछ होने वाला है। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कहीं ना कहीं चीन भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करने के लिए छोटा-मोटा हमला कर दे। इसी उद्देश्य थे सीमा पर वह हालात को गर्म कर रहा है।

Thursday, July 2, 2020

अब छठ तक गरीबों को मुफ्त अनाज



अब छठ तक गरीबों को मुफ्त अनाज


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि गरीब कल्याण अन्न योजना का विस्तार दिवाली और छठ तक कर दिया गया है। इसका मतलब है अगले 4 महीने तक देश के करीब 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया जाएगा। इसके तहत प्रति व्यक्ति 5 किलो गेहूं या 5 किलो चावल और प्रति परिवार 1 किलो चना मुफ्त मिलेगा।कोरोनावायरस महामारी में भारत सरकार ने गरीब परिवारों को यह राहत देने की योजना बनाई जिसे अब नवंबर तक विस्तार दे दिया गया है और इस योजना पर लगभग 1. 50 लाख रुपए खर्च होंगे। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि भारत दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले बेहतर स्थिति में है लेकिन अनलॉक एक के पश्चात लोगों में लापरवाही बढ़ गई है तथा लोगों ने सावधानी बरतनी छोड़ दी है। जबकि अनलॉक के दौरान ज्यादा सावधानी जरूरी है और लापरवाही हानिकारक है। प्रधानमंत्री ने हिदायत दी कंटेनमेंट जोन में स्थानीय प्रशासन के नियमों को पालन करना आवश्यक है। प्रधानमंत्री ने कहा लॉकडाउन के दौरान सरकार के अलावा सिविल सोसायटी ने भी प्रयास किया कि कोई गरीब भूखा ना रहे। संकट के समय सही फैसले लेने से संकट का मुकाबला करने की ताकत कई गुना बढ़ जाती है प्रधानमंत्री ने कहा कि जब लॉकडाउन शुरू हुआ था तो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना लाई गई। इसमें पौने दो लाख का पैकेज घोषित हुआ और 9 करोड़ से ज्यादा किसानों के खाते में 18000 करो रुपए डाले गए 20 करोड़ से अधिक महिला जन धन अकाउंट में पैसे डाले गए। अप्रैल मई और जून राशन 80 करोड़ लोगों को मुफ्त दिया गया इसके अलावा प्रति परिवार हर महीने में 1 किलो दाल भी मुफ्त दी गई। अमरीका पूरी आबादी ढाई गुना अधिक एवं ब्रिटेन की जनसंख्या से12 गुना अधिक लोगों को मोदी सरकार ने मुफ्त अनाज दिया।





कई लोग इसे मोदी सरकार का राजनीतिक दृष्टिकोण मान रहे हैं। उनका कहना है कि अगले दो-तीन महीनों में बिहार समेत कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। खास तौर पर उनका फोकस बिहार पर है। कुछ राजनीतिक समीक्षकों का यह मानना है कि बार-बार छठ का नाम लेकर घोषणाओं को दोहराना स्पष्ट बताता है कि मोदी जी का ध्यान बिहार पर है। लेकिन इन आलोचकों ने यह नहीं सोचा कि बिहार में जिसके लिए हुए पानी पी पीकर मोदी जी को कोस रहे हैं वहां का मुख्य पेशा और आमदनी का जरिया मेहनत मजदूरी है या फिर कृषि। बिहार में बरसात के दिनों में अनाज की भारी किल्लत रहती है और सबसे ज्यादा काम कृषि क्षेत्र में ही होता है। उसी दौरान धीरे धीरे त्योहारों का मौसम भी आता है और त्योहार ना केवल जरूरतें से बढ़ाते हैं बल्कि खर्च भी। उधर लॉकडाउन के कारण रबी की फसल का आधा अधूरा लाभ मिला। उसी दौरान बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में तेज बारिश के कारण खेतों में खड़ी रबी की फसल का सत्यानाश हो गया। साथ ही, बाहर जाकर कमाने वाले लोग महामारी के चलते घर लौट आए जिससे आमदनी शुन्य हो गई। सरकार ने शुरू में ही कठिनाइयों को समझा और मुफ्त अनाज देने की घोषणा की। आज अगर अनलॉक डाउन के तहत यह राहत बंद कर दी जाती है तो भुखमरी की स्थिति आ जाएगी। त्योहारों आना जाना इसी दरमियान शुरू होता है और यह सिलसिला छठ तक चलता रहता है। उस समय किसानों के घर में नया आना-जाना शुरू हो जाता है जिससे थोड़ी राहत मिलती है। इसी कठिनाई को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री ने मुफ्त अनाज देने का फैसला किया। कुछ लोगों का कहना है प्रधानमंत्री ने 17 मिनट के अपने संबोधन में चीन का जिक्र नहीं किया। अब उन लोगों को या कैसे समझाया जाए कि भाषण का लक्ष्य देश के गरीब लोग थे जिन्हें केवल मेहनत करना और जान देना आता है। यह लोग ड्राइंग रूम में बैठकर सेब खाते हुए अंतरराष्ट्रीय मसलों पर चर्चा नहीं करते। यह अपने खेतों की और अपनी गरीबी की चर्चा में डूबे रहते हैं। ऐसे लोगों को चीन की बात सुनाना बड़ा अजीब लगता है। जिन 80 करोड़ लोगों के लिए प्रधानमंत्री घोषणा कर रहे थे उनमें 80 लाख लोग भी टिक टॉक नहीं जानते होंगे और अगर नाम भी सुना होगा तो उन्होंने उपयोग नहीं किया होगा । जो आलोचक इस किस्म की बातें करते हैं वह मुख्य मसले पर से फोकस भटकाना चाहते हैं। सामाजिक तौर पर हमारे देश में जो लोग ज्यादा गरीब हैं वह ज्यादा चिंतित हैं और जो ज्यादा चिंतित हैं उनमें ज्यादातर लोग बीमार हैं। ऐसे में चीन, गलवान घाटी इत्यादि की चर्चा व्यर्थ है। आज की जो जरूरत है वह है बीमार होने पर खर्च करने के लिए पैसे कहां से आएंगे, खाना कहां से खाएंगे और तब कहीं जाकर नंबर आता है बच्चों को पढ़ाएंगे कैसे? इस स्थिति में उनकी पीड़ा पर मरहम लगाने वाला अगर दूसरी बात करता है तो वह गलती करता है। मोदी जी ने इस अवसर पर चीन की चर्चा ना करके सही काम किया है। जो लोग गरीबों को मुफ्त अनाज दिए जाने की घोषणा को राजनीति से जोड़ते हैं वह खुद नहीं समझ पाते कि उनका यह इनकार भी राजनीति प्रेरित है। जिस देश में राम की पूजा करना भी राजनीतिक घटना बन जाती है उस देश में अनाज का मुफ्त वितरण अगर राजनीति से जुड़ता है तो क्या कहा जाए?

Tuesday, June 30, 2020

चीन के उम्मीदों पर एक और प्रहार



चीन के उम्मीदों पर एक और प्रहार


भारत सरकार ने 5जी की टेस्टिंग के लिए हुवाई कंपनी के प्रवेश पर रोक लगाकर जो उसकी उम्मीदों पर प्रहार किया था अभी उसका दर्द बाकी था कि भारत ने टिक टॉक समेत 59 एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया भारत के बारे में जो जानकारियां तथा भारत के संप्रभुता के विरुद्ध काम करने का जो सपना था चीन का वह चकनाचूर हो गया। सरकार ने निजता की सुरक्षा के लिए यह कदम उठाया। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 के अंतर्गत इसे लागू करते हुए मंत्रालय ने यह कदम उठाया।इस तरह से प्रतिबंध लगाए जाने के बाद अब भारत के करोड़ों स्माटफोन यूजर्स को यह सारे एप्स नहीं मिल पाएंगे क्योंकि एंड्रॉयड और आईओएस प्लेटफार्म से एप्स को हटा दिया जाएगा। जिनके मोबाइल में ऐप्स इंस्टॉल्ड हैं तब तक मौजूद रहेंगे जब तक वह उन्हें मैनुअली नहीं हटाते हैं। हालांकि, एप स्टोर से हट जाने के बाद उनके लिए अब अपडेट नहीं आएंगे। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एप्स को हटाए जाने के साथ ही कहा है कि विभिन्न स्रोतों से यह सूचना मिल रही थी कि मोबाइल एप्स का दुरुपयोग हो रहा है। चूंकि , इनका सर्वर देश से बाहर है इसलिए इसका दुरुपयोग बड़ा आसान हो जाएगा और इससे अंततोगत्वा हमारी संप्रभुता को और एकजुटता को खतरा पैदा होगा। पाबंदी की सूचना के बाद इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स को निर्देश जाएंगे कि वे इन एप्स को ब्लॉक कर दें। बहुत जल्दी इसे उपयोग करने वालों के पास सूचना आएगी कि इसका उपयोग सरकार आदेश के फलस्वरूप बंद कर दिया गया है। इसमें दिलचस्प बात यह है कि कुछ एप्स भारत में बेहद लोकप्रिय हैं खासकर टिक टॉक। आंकड़े बताते हैं कि भारत में इसके 10 करोड़ यूजर हैं। इसके अलावा भी कई बेहद लोकप्रिय एप्स हैं और बहुत संभव है कि लोग इसका विकल्प खोजने लगेंगे।


भारत की सदाशयता देखी थी अभी हाल में जनवरी 2020 में क्वालकम ने मोबाइल के लिए तीन नए चिपसेट स्नैप ड्रैगन 720जी, 662 और 460 बनाया था। इसमें नेविक ने भी सहयोग दिया था। नेविक एक क्षेत्रीय जिओ पोजिशनिंग सिस्टम है जो भारतीय भूमि के बारे में 1500 किलोमीटर के दायरे मैं मौजूद किसी भी वस्तु के बारे में सही सही जानकारी देगा। नेविक से 7 सेटेलाइट जुड़े हुए हैं और इनमें से3 हिंद महासागर में जियोस्टेशनरी आर्बिट में हैं और बाकी 4 जिओसाइनोक्रोनस आर्बिट में हैं। इसके माध्यम से चीन भारतीय सीमा की बिल्कुल सटीक जानकारी एकत्र कर लेता है।


कई चीनी प्लेटफॉर्म्स भारतीय निर्माता हैं। इसके बंद होने से उन लोगों की आमदनी बंद हो जाएगी जिनका यह एकमात्र स्रोत है। यही नहीं बड़ी संख्या में कार्यालय बंद हो जाएंगे और कुछ हजार नौकरियां चली जाएंगी। इन जाती हुई नौकरियों के साथ ही चीन के पक्ष में विचार बनाने के कुछ प्रोजेक्ट बंद हो जाएंगे। यह चीन के लिए बहुत बड़ा आघात होगा। क्योंकि, आधुनिक युद्ध के दौरान दुश्मन देश में एक बड़ा समूह वैचारिक समर्थन करता है तो उसके लिए सरलता होती है। सिकंदर ने जब भारत पर हमला किया तो निहत्थे चाणक्य ने उसके खिलाफ देश में वातावरण खड़ा कर दिया और नतीजा हुआ कि विश्वविजय का सपना देखने वाले सिकंदर को सिर झुकाए झेलम के तट से ही लौट जाना पड़ा। इस पाबंदी से लाभ तब होगा जब यह स्थाई हो। पिछले साल भी मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर इसे कुछ दिन के लिए बंद करना पड़ा था बाद में यह फिर से शुरू हो गया। लेकिन, इस बार सरकारी आदेश की भाषा और प्रतिबंध के समय को देखते हुए ऐसा लगता है कि यह स्थाई होगा। क्योंकि यह बड़े चीनी कारोबार के लिए एक चेतावनी के रूप में जारी किया गया है।





इस पाबंदी के लिए सरकार को कभी दोषी नहीं कहा जा सकता क्योंकि कई हफ्तों की बातचीत के बाद 26 जून को सिग्नल मिल गया कि बात बनने वाली और वार्ता अंधे मोड़ पर आकर खत्म हो गई है। पहली बार सार्वजनिक रूप से विदेश मंत्रालय ने कहा कि चीन ने लद्दाख में जो किया है उसके परिणाम दूर तक जाएंगे। अगर ऐसा है तो देश के हित में सोचना जरूरी है और सरकार ने जो किया वह बिल्कुल जायज है। क्योंकि आगे बातचीत से स्थिति और बिगड़ेगी। चीन नहीं चाहता शांति कायम हो।

Monday, June 29, 2020

ओली का आत्मविश्वास डगमगा रहा है



ओली का आत्मविश्वास डगमगा रहा है


विगत 2 महीनों से लग रहा है भारत सहित दक्षिणी एशिया के कई देश किसी ग्रह के चपेट में आ गए और उनके दिन खराब चल रहे हैं। भारत चीन को लेकर तथा भारत-पाकिस्तान को लेकर जो चल रहा था वह और सब जानते ही हैं अब नेपाल भी उसी संकट में पड़ गया है। नए नक्शे को लेकर भारत और नेपाल में जो तनाव शुरू हुआ वह बढ़ता हुआ चीन तक पहुंच गया। कहां नेपाल भारत से अतिरिक्त जगह पर दावा कर रहा था वहीं चीन ने नेपाल के 2 गांव पर कब्जा कर लिया। इस कब्जे का क्या जियो पोलिटिकल होगा यह तो पृथक विश्लेषण का विषय है लेकिन देश भक्ति का ज्वार लाने वाले नेपाल के प्रधानमंत्री के पी सिंह ओली को महसूस हो रहा है कि खिलाफ साजिशें चल रही है और उनका शासन खतरे में है। प्रधानमंत्री ने तो यह बात सार्वजनिक तौर पर कही है और यह भी कहा है भारत में उनके खिलाफ बैठकें में हो रही हैं। शुरू से आरंभ तक श्री ओली के मनोविज्ञान पर अगर ध्यान दें तो हर संकट के समय चाहे वह चुनाव हो या कोई और उन्होंने स्थिति से निपटने के लिए ऐसा ही कुछ कह कर कदम बढ़ाया है और इसे भी उनका इसी तरह का प्रयास माना जाना चाहिए। यह तो सर्वविदित है नेपाल के मामले से चीन द्वारा अपने लिए इस्तेमाल किया जाना साफ कहता है कि ओली इस कठिन परिस्थिति में देश को मजबूत नेतृत्व नहीं दे पाए। धीरे धीरे उनका विश्वास हो रहा है और जो बाहर दिख रहा है। इससे पहले भी उनकी सरकार के पतन का कारण बाहरी नहीं आंतरिक ही था। उनकी गतिविधियों को देखकर ऐसा लगता है कि वे मानसिक रूप से काफी घबराहट में हैं और शायद इससे उनकी ताकत कम हो जाए। प्रधानमंत्री की कार्यशैली को लेकर पार्टी के भीतर जो विरोध का स्वर उभरा है प्रधानमंत्री उसे अपने पक्ष में करना चाहते हैं।





ओली को उम्मीद कि भारत पहले की तरह उसके साथ खड़ा हो जाएगा लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पी सिंह ओली से विदेश नीति के ज्यादा समझदार है और उन्हें मालूम है ऐसे मौके पर नेपाल के साथ खड़ा होने का क्या है लेकिन ओली ने उम्मीद कर रखी थी। नरेंद्र मोदी ने भारत की ओर से कुछ नहीं किया। ना तो भारत की ओर से कोई दूत गया और ना ही भारत के विदेश मंत्री वहां गए । पार्टी के नेता उनसे पूछ रहे हैं और उनके पास कोई उत्तर नहीं है यह अपनी स्थिति को स्पष्ट करें। ओली अपनी राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को बढ़ा चढ़ा कर बताने के लिए विख्यात है वह बहुत चालाक आदमी हैंऔर पार्टी में अपने विरोधियों की बोलती बंद कर सकते हैं तथा कुर्सी पर बने रह सकते हैं। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थाई समिति की विगत 6 महीने से कोई बैठक नहीं हुई और ओली इसे लगातार टाल रहे हैं क्योंकि उन्हें डर है की बैठक में उनकी खिंचाई होगी और कुर्सी भी हाथ से जा सकती है। लेकिन, उनके पास कोई उपाय नहीं और गत 24 जून को बैठक में उन्होंने भाग लिया। इसके पहले उन्होंने 22 और 23 जून को पार्टी के सह चेयरमैन दहल से लगातार मुलाकात की ताकि संकट को टाला जा सके। वैसे भी 44 सदस्यीय सेक्रेटेरिएट में ओली को सिर्फ 14 सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। वे इसके पहले कई माओवादी नेताओं को भी पटाने की कोशिश में थे लेकिन कामयाबी नहीं मिली। हालांकि जैसे तैसे सेक्रेटेरिएट की बैठक में वे खुद को बचा ले गए लेकिन कब तक? नेपाल में जो सबसे बड़ी गलती की वह कि ओली ने भारत का विश्वास खो दिया। जबकि नेपाल की जनता पूजा विश्वास है कि भारत उनके साथ खड़ा रहेगा। चीन के साथ जो उसका संबंध है वह चीन के फायदे ना कि नेपाल की आम जनता के लिए। गढ़ी हुई विदेश नीति क्या आधार पर देश के स्थायित्व को शक नहीं करना चाहिए। भारत और नेपाल के संबंध ना केवल दो दोस्तों के हैं या 2 देशों के हैं बल्कि उनके बीच रोटी बेटी का संबंध है। हर भारतीय खासकर उत्तर बिहार के लोगों में से बहुत लोग नेपाल को दूसरा देश मानते ही नहीं हैं। दोनों देशों के बीच आना जाना लेन देन और खाना पीना लगातार होता है। इधर से उधर रिश्तेदारी भी हैं। दोनों देशों का साझा बाजार लगता है लेकिन अब सब खत्म हो रहा है। चीन से जो रिश्ता बना है वह हो सकता है नेपाल के उच्च वर्ग के लिए फायदेमंद हो लेकिन आम नेपाली जनता के लिए बेहद हानिकारक होगा। डर है वहां फिर आंदोलन ना आरंभ हो जाए। वर्तमान समय के सबसे बड़े चिंतक और विदेश नीति के जानकार नरेंद्र मोदी का इस संपूर्ण मामले पर चुप रहना नेपाल में किसी बड़े खतरे का संकेत है।

Sunday, June 28, 2020

चीन ने क्यों बनाया युद्ध का माहौल



चीन ने क्यों बनाया युद्ध का माहौल





लद्दाख में चीन ने बड़ी संख्या में फौजों को तैनात कर दिया है।उधर भारत ने भी 3 डिवीजन सेना को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तैनात कर दिया है। यही नहीं भारत में आकाश मिसाइलें भी तैनात की हैं। चीन के खिलाफ 10 देश खड़े हो गए आसियान ने तो यहां तक कहा है चीन 1982 के संधि के आधार पर समुद्री सीमा को तय करे।अब सवाल है कि भारत इस सब का किस तरह जवाब दे। यह एक बड़ी गुत्थी है और इसका उत्तर खोजना जरूरी है। हमारी तो सबसे बड़ी कमजोरी है वह है हम अभी भी नवाब वाजिद अली शाह के शतरंज की बिसात में उलझे हुए हैं। हमारे रणनीतिकार या कथित विशेषज्ञ या नहीं समझ पाते की अब वह जमाना चला गया जब इसी युद्ध में राजा को घेरा जाता था और अगर राजा तो फिर विजय हो जाती थी। आज जमाना है कि दुश्मन को कई तरह की बाधाओं से इस तरह घेर लिया जाता है कि वह घुटने टेक देता है। चीन ने यही रणनीति अपनाई है। आज सोशल मीडिया को दुनिया भर में ज्ञान की बहती हुई नदी मान लिया गया है और तब जबकि अभी तक वायरस विशेषज्ञ बने बैठे विद्वान कीट विशेषज्ञ हो गए और सुशांत सिंह खुदकुशी करते ही मनोविज्ञानी हो गए और अब जबकि चीन ने हमला किया सब के सब रणनीतिकार बन गए। आज भारत और चीन ऐसी व्यवस्थाओं में बदल गए जो नई पेचीदगियों में उलझे हुए हैं और इस उलझन को इतनी आसानी से नहीं समझा जा सकता है। यहां फिर सवाल उठता है कि चीन लद्दाख में चाहता क्या है? 20 साल अतीत में जाएं और और देखें भारत किस तरह बल प्रयोग की कूटनीति के माध्यम से पाकिस्तान से निपट रहा है। भारतीय संसद पर 2001 में हमले के बाद भारत में ऑपरेशन पराक्रम शुरू किया था और इसी के माध्यम से बल प्रयोग की रणनीति आरंभ हुई थी जो बाद में बल प्रयोग की कूटनीति बन गई। इसके तहत भारत ने पाकिस्तान की सीमा पर सैनिक साजो सामान और सेना का इतना बड़ा जमावड़ा कर लिया कि मानों अभी युद्ध होने वाला है। आज लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की ओर से ऐसा ही कुछ किया जा रहा है। यह दिखावा इतना बड़ा है कि अमेरिकी विदेश सचिव माइक पॉम्पियो के अनुसार “अमेरिका ने इस तनाव को देखते हुए यूरोप से अपनी फौज हटाकर भारत के किनारे तैनात करने की सोच रहा है।” आज ऐसा लग रहा है लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पूरब की ओर से भारत पर हमला होने वाला है। ऐसा लगता है कि चीनियों ने सुन जू या कन्फ्यूशियस ज्ञान के बदले यह हमीं से सीखा हो। अगर ऐसा होगा इसके जवाब में किस परिणाम की वे अपेक्षा कर रहे हैं? क्षण भर के लिए मान भी लें कि वह बल प्रयोग की कूटनीति कर रहा है यानी अगर भारत चाहता है कि वह उसके सिर पर से हट जाए भारत यह करें यह मत करें या फिर चुपचाप रहे या तीनों बातें करें। अब सवाल है कि चाहता क्या क्या है? और भारत इसका कैसे जवाब दे? इतिहास से पता चलता है कि सीमाएं कोई स्वार्थ तथ्य नहीं बल्कि गड़ी हुई वास्तविकता है सीमाओं को बेमानी बनाकर जमीन पर झाइयां बंद करने का जो हसीन सपना इन दिनों में मनमोहन सिंह देखते हैं उसे एक ऐसी दुनिया में साकार कर पाना मुश्किल होता जा रहा है जिसमें आक्रमणों पर संस्थागत संयम कमजोर पड़ता जा रहा है और सत्ता का बेबाक खेल नया चलन बन गया है। अगर संदर्भों को देखें इस बात का पता चल सकता है कि भारत में बल प्रयोग की अपनी खूबी से क्या हासिल किया था? तब उसके लक्ष्य क्या थे?... और पाकिस्तानियों ने इसका कैसे जवाब दिया था? लेकिन ऐसा लगता है उस प्रकरण को उदाहरण के तौर पर लेने में खतरे हैं, क्योंकि भारत पाकिस्तान नहीं है। नरेंद्र मोदी के साथ युद्ध का खेल खेलना खतरनाक हो सकता है। उस समय भी भारत में कभी भी युद्ध छेड़ने का इरादा नहीं किया था क्योंकि बल प्रयोग की कूटनीति तब तक कारगर नहीं हो सकती जब तक उससे युद्ध का खतरा न दिखने लगे। यह एक मजबूत देश हे जवाब की चाल थे आज जब हम वास्तविक नियंत्रण रेखा के पूरब की ओर देखते हैं ऐसा कुछ आभास नहीं होता। भारत को उस चाल से काफी कुछ हासिल हुआ और नहीं कई सालों तक अमन कायम रहा। लेकिन यहां यह बात नहीं है दोनों देश ताकतवर है और जंग की सूरत में कुछ भी हो सकता है अब ऐसे में अगर चीन बल प्रयोग का खेल खेल रहा है तो उसकी अपेक्षाएं अवास्तविक हैं। भारत ने भी कुछ ऐसी ही नीति अपनाई है। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पूरी तैयारी के साथ डटे रहो और सामने वाले को थका डालो। यहां यह याद रखना होगा दो घटनाएं एक समान नहीं होतीं। प्रेम हो या युद्ध इनमें कोई दो एक जैसे नहीं होते। इसलिए धमकी अगर हाथापाई में बदलती है तो हमें इसके लिए भी तैयार रहना पड़ेगा। क्योंकि प्रयोग की कूटनीति इतनी असली दिखनी चाहिए कभी-कभी हमें भी लगेगी जान का खतरा है। चीन की इस चाल का जवाब यही है दूसरे पक्ष की ओर से युद्ध की आशंका को इतना वास्तविक माना जाए कि वह इस पर यकीन करने लगे।

Saturday, June 27, 2020

चीन ने जमीन हथियाने के लिए हमला नहीं किया



चीन ने जमीन हथियाने के लिए हमला नहीं किया





वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गलवान घाटी के संघर्ष बिंदु से भारत और  अपनी फौजें पीछे हटने लगी हैं लेकिन जैसी की खबर मिल रही है कि चीन ने इस बार देपसांग में तंबू गाड़ दिया है और घुसपैठ की कोशिश में है। चीन इस इलाके में काराकोरम दर्रे के पास वाले इलाकों में कब्जा करना चाहता है भारत में चीन के राजदूत ने कहा इस समय और संघर्ष तनाव का रास्ता है और गलत है। राजदूत में भारत से कहा है कि वह ऐसी कार्रवाई ना करें जिससे हालात और जटिल हो जाएं। दरअसल, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित रणनीति का उद्देश्य सामरिक है जोकि स्वाभाविक है। किसी भी संघर्ष का अंतिम लक्ष्य अपनी शर्तों पर टिकाऊ शांति ही होता है। यद्यपि यह केवल कहने के लिए ही है। जहां कहीं भी दो राष्ट्रों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है और उसके चलते संघर्ष होता है तो स्थाई शांति केवल यूटोपिया है। उधर चीन काराकोरम दर्रा के आसपास के इलाकों पर कब्जा करना चाहता है इसमें उसका स्वार्थ है। जब से भारत ने अधिकृत कश्मीर के आतंकी अड्डों को खत्म कर दिया है तब से पाकिस्तान को खतरा पैदा हो गया है कि हो न हो एक दिन भारत इस क्षेत्र पर कब्जा कर लेगा। इस क्षेत्र में जहां पाकिस्तान का अंदरूनी राजनीतिक स्वार्थ है वहीं चीन का आर्थिक स्वार्थ भी है। यही कारण है कि लद्दाख से काराकोरम तक जहां चीन ने मोर्चा खोला हुआ है वही पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध कूटनीतिक और आतंकवादी मोर्चा खोल दिया है। इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हो जहां परेशानी होगी वही आज पूरे देश में एक सुलझे हुए आदमी के खिलाफ वातावरण बनेगा। जहां भारतीय राजनयिकों को पाकिस्तान से निकाला जा रहा है और उन के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है वही अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत के खिलाफ बयानबाजी करने से पाकिस्तान चूक नहीं रहा है। अभी हाल में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरेशी ने स्पष्ट कहा कि ” चीन ने भारत के खिलाफ कार्रवाई कर ठीक किया है क्योंकि भारत ने विवादित इलाके में निर्माण शुरू कर दिया था।” यह सब 2019 के फरवरी में पुलवामा पुलवामा हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच शुरू हुए तनाव को और बढ़ाता है और यह उम्मीद करना कि तनाव जल्दी दूर हो जाएगा ठीक उसी तरह है जिस तरह यह उम्मीद करना हमारी जिंदगी कोरोनावायरस से मुक्त हो गई है। पाकिस्तानी लोग खुश हैं कि भारत कूटनीतिक तौर पर अलग-थलग पड़ गया है और नरेंद्र मोदी परेशान हैं।


भारत की संप्रभुता और भौगोलिक अखंडता दांव पर है। सैन्य नजरिए से देखें लगता है कि भारत में चीन का हमला और अतिक्रमण रोक दिया है और किसी भी स्थिति के लिए सेना चौकस है। 15 और 16 जून के बीच की रात दोनों प्रतिद्वंद्वियों को स्थिति के नए सिरे से आकलन के लिए बाध्य कर दिया है। क्योंकि चीन को यह एहसास हो गया है कि जब घूसों और डडों की लड़ाईऔर बर्बर हो सकती है तो फिर आज के भारत की सेना के साथ हथियारबंद जंग कैसी होगी। चीन इसी कारण से गलवान घाटी से पीछे लौटने और कूटनीतिक वार्ता को आगे बढ़ाने पर तैयार हो गया। जो खबरें मिल रही हैं उससे तो ऐसा लगता है अब घाटी में चीनी सेना मौजूद नहीं है। वार्ताओं के पहले दौर में इन बातों पर सहमति हुई और 22 जून को दूसरे दौरे की बातचीत के बाद पूर्ववर्ती वार्ताओं में हुई सहमति में क्या बदलाव लाया गया किसी को मालूम नहीं है। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों सेना कहां रहेगी यह भी नहीं मालूम है। पहाड़ी इलाकों में संघर्ष ऊंचे ठिकानों पर नियंत्रण के लिए होते हैं और उस इलाके की घाटियां रसद के भंडारण और वाहनों के आने-जाने के काम आती है। इसलिए, अभी जो गलवान घाटी में हुआ वह केवल झलकियां हैं। भारत को चोटियों पर नियंत्रण करना चाहिए क्योंकि बिना उसके घाटियों पर नजर नहीं रखी जा सकती। उपग्रह चित्रों के मुताबिक फिंगर 4 और फिंगर आठ के बीच का इलाका अभी भी चीन के कब्जे में है। यह क्षेत्र काफी ऊंचाई वाला है और उन जगहों पर छीनने संजय सुविधाओं निर्माण किया है इस तरह करीब 40 वर्ग किलोमीटर का अपना इलाका अब चीन के कब्जे में है इस इलाके में अप्रैल तक भारतीय सेना मुस्तैदी से गश्त लगाती थी। पूरी लड़ाई समग्र रूप से देखें कार्रवाई सामरिक प्रभाव वाली है और उसे रणनीतिक रूप दिया गया है। इसका उद्देश्य है कि भारत के लिए एक अप्रिय स्थिति पैदा कर जवाबी कार्रवाई की ललकारना। जिससे पहले से परेशान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ज्यादा परेशान हो जाए तथा उनकी प्रतिक्रिया युद्धक हो जाए तथा सारी दुनिया में इसे इस्तेमाल करना आरंभ कर दे।





1959 में भारत द्वारा दलाई लामा को शरण देना और इसके बाद सीआईए के साथ मिलकर कथित तिब्बती विद्रोहियों को ट्रेनिंग दिया जाना 1962 के युद्ध के प्रमुख कार्यों में शामिल था। क्योंकि तिब्बत की निर्वासित सरकार और तिब्बती सैनिकों की उपस्थिति को चीन अपनी संप्रभुता पर खतरा मानता था और तिब्बत की आजादी के लिए भारत द्वारा मदद को वह प्रमुख मानता था अब भी चीन मानता है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ मिलकर भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर तथा हिंद प्रशांत क्षेत्र में उसके सामरिक हितों को कमजोर कर रहा है। कुल मिलाकर देखें तो चीन चाहता है कि भारत क्षेत्रीय और वैश्विक स्तरों पर उसे “बड़ा भाई” मान ले। जबकि भारत चाहता है एक सीमित संघर्ष में हिना को झटका लगने पर भारत को अपने राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करना संभव हो जाएगा। हमारे पास चीन के मुकाबले के लिए पर्याप्त सैनिक क्षमता है लेकिन अभी हम जिस आर्थिक मोड़ से गुजर रहे हैं उस मोड़ पर चीन से संघर्ष के फलस्वरूप हम पीछे चले जाएंगे। शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए अपने कूटनीतिक और सैन्य साधनों का कुशल प्रबंधन किया है ।