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Friday, April 3, 2020

उत्साहो बलवानार्य

उत्साहो बलवानार्य 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार की सुबह राष्ट्र को एक बार फिर संबोधित किया। संबोधन   से पहले लोगों के मन में तरह-तरह की आशंकाएं पैदा हो रही थीं, क्या होगा, क्या नहीं होगा? क्या नई घोषणा होगी? लेकिन प्रधानमंत्री ने जो कहा उससे  प्रत्येक देशवासी के भीतर ना केवल उम्मीद बढ़ी बल्कि उनमें साहस और संकल्प की क्षमता भी बढ़ गई।  जहां आशंका थी लॉकडाउन की अवधि और बढ़ेगी या फिर आंतरिक आपात स्थिति की घोषणा होगी या कोई और नई पाबंदी लागू होगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और प्रधानमंत्री हैं जो कुछ  कहा उससे देश के 130 करोड़ लोगों में सामूहिक शक्ति और सामूहिकता का संकल्प पैदा हुआ। रामनवमी के दूसरे दिन और शक्ति पूजा के आखिरी दिन प्रधानमंत्री ने जो शक्ति की परिभाषा बताई वह अतुलनीय थी। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह लॉक डाउन की अवधि जरूर है, हम सब अपने अपने घरों में बंद हैं ,लेकिन हम में से कोई भी अकेला नहीं है। "130 करोड़ देशवासियों की सामूहिक शक्ति सबके साथ है और समय-समय पर इसकी भव्यता और इसकी दिव्यता का अनुभव करना आवश्यक है।" सचमुच जब देश इतनी बड़ी लड़ाई लड़ रहा है ,इतने बड़े युद्ध मैं शामिल है तो ऐसे में जनता जनार्दन के विराट स्वरूप का दर्शन करते रहना चाहिए। इससे आत्मशक्ति पैदा होती है। इससे लगता है कि हमारे साथ पूरा देश है पूरा राष्ट्र है। हम पराजित नहीं हो सकते। इस कोरोना नामक जंजीर से हमें, हमारे उत्साह ,हमारे संकल्प को बांधा नहीं जा सकता। ऐसे में महाकवि दिनकर की एक पंक्ति याद आती है- जब जनार्दन को बांधने दुर्योधन चला था तो उन्होंने अपना विराट रूप दिखाया था और जनार्दन ने कहा था:
  यह देख जगत मुझ में लय है
  यह देख पवन मुझमें लय है
    बांधने मुझे तो  आया है
   जंजीर बड़ी क्या लाया है
सचमुच जिसे अहिर की छोहरियां छछिया भर छाछ पर नाच नचाती थीं  उसने बता दिया कि राजसी शक्ति नगण्य है, आत्मबल और संकल्प ही सर्वोपरि है सर्वशक्तिमान है । मोदी जी ने इसी संदर्भ का सूत्र पकड़ते हुए देश के 130 करोड़ लोगों को शक्ति संपन्न बनने का एक सूत्र बताया कि सब एकजुट होकर जनता से जनार्दन बन जाएं। कोरोनावायरस को हमारी शक्ति  इंकार कर देगी। उसका महत्व हमारी एकजुटता के आगे कुछ नहीं है। उन्होंने देशवासियों का साहस बढ़ाते हुए कहा कि "करोना से त्रस्त जो हमारे गरीब भाई बहन हैं उन्हें निराशा के अंधियारे से निरंतर प्रकाश की ओर जाना है।" कोरोना से जो निराशा का अंधकार उत्पन्न हुआ है उससे निकलने की राह यह है कि उनके भीतर की निराशा को समाप्त कर दिया जाय और इसका एक मात्र उपाय है कि उन्हें यह महसूस हो कि इस दुख में हम अकेले नहीं हैं। हमारे साथ हमारे देश के करोड़ों भाई बहन हैं। प्रधानमंत्री ने देश की जनता से अपील की -" पांच अप्रैल रविवार को रात 9:00 बजे सब लोग अपने घरों की बत्तियां बुझा दें और अपने घरों के दरवाजे पर, बालकनी में या टेरेस पर खड़े होकर एक मोमबत्ती या दीपक या टॉर्च और कुछ ना हो तो मोबाइल की बत्ती 9 मिनट तक जलाए रखें। आलोचक यह पूछ सकते हैं कि फिर इससे क्या होगा? यह उपचार है क्या? किसी भी भयंकर स्थिति से मुकाबले के लिए चाहे वह बीमारी हो, चाहे वह युद्ध सबके मन में एक संकल्प होना चाहिए और एकजुटता का आत्मबल होना चाहिए । संकल्प से उम्मीद जागती है और आत्मबल से उत्साह में वृद्धि होती है  और मुकाबले की शक्ति बढ़ती है:

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्। सोत्साहस्य च लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥

इससे यह भी स्पष्ट होता है हम सब एक ही लक्ष्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं और वह लक्ष्य कोरोना के अंधकार को मिटाकर स्वास्थ्य का प्रकाश फैलाना है। प्रधानमंत्री ने इस अपील से पैदा होने वाले एक प्रश्न का पहले ही जवाब दे दिया कि "चिराग जलाते समय सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें । सबको कहीं भी एकत्र नहीं होना है। इसके बाद कुछ देर बैठ कर देश के पीड़ित भाई बहनों के चेहरे को याद करें और फिर कोरोना के अंधकार को दूर करने के लिए प्रकाश की ओर चल पड़ें । महाभारत के युद्ध में अर्जुन निराश हो गए थे तो कृष्ण उन्हें उत्साहित किया था।

तस्मादुतिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः 

आज फिर कोरोना से   भयभीत  जनता को अपने भीतर संकल्प की शक्ति भरकर इससे मुकाबले के लिए तैयार हो जाना चाहिए।


Thursday, April 2, 2020

लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग

लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में 21 दिन के लॉक डाउन का प्रस्ताव रखा। उसका अंदाज कुछ ऐसा था जैसे आदेश दिया गया हो और संपूर्ण देश ने उस आदेश को स्वीकार किया। सबको अपने जान की चिंता रहती है और उसी चिंता के तहत लोगों ने संपूर्ण लॉक डाउन को स्वीकार कर लिया। यद्यपि सरकार ने इस अवधि में जरूरी सामानों को मुहैया कराने व्यवस्था की थी। एक सीमा के तहत लगभग सभी जरूरी सामान उपलब्ध हो रहे हैं। बस आवागमन और परिवहन सुविधाएं मुल्तवी कर दी गयीं हैं।
     कुछ लोग इसे सरकार का अदूरदर्शिता पूर्ण कदम मान रहे हैं। क्योंकि, 21 दिन की बंदी से देश का मेडिकल ढांचा नहीं सुधर सकता है और जब मेडिकल ढांचा नहीं सुधरेगा तो फिर कैसे इस महामारी का मुकाबला किया जा सकेगा। ऊपर ऊपर सुनने में यह बात तार्किक लग रही है लेकिन एक तरह से इसमें प्रश्न ज्यादा हैं। ऐसे लोगों को संवाद की मर्यादाओं का ख्याल रखना चाहिए। यह ठीक वैसे ही है जैसे तबलीगी जमात के कुछ लोग पकड़े गए और उनके पक्ष में भी कुछ लोग तर्क दिए जा रहे हैं।
    बेशक हमारे देश का मेडिकल ढांचा आबादी की तुलना में अपर्याप्त है और ऐसे में देश की जनता के जीवन की रक्षा के लिए जो संभावित और सरलतम उपाय है वह सरकार ने किया। क्योंकि ऐसे समय में स्वास्थ्य के लिए मेडिकल उपाय करने के बदले अस्वस्थता रोकने के गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए।  उपचार से रोकथाम ज्यादा मुफीद है।  भारत के स्वास्थ्य ढांचे को देखते हुए अगर 130 करोड़ की आबादी तक पहुंचने के प्रयास किए जाएं तो पूरा का पूरा ढांचा और सिस्टम चरमरा कर टूट जाएगा। कुछ विशेषज्ञों का कहना है की 21 दिन में ठीक हो जाने की क्या गारंटी है? टीके की अनुपलब्धता के बरअक्स इस तरह लॉक डाउन सचमुच चुनौतीपूर्ण होगा। लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है यह उम्मीद से कहीं ज्यादा सफल हो। क्योंकि जो लोग इसे गलत बोल रहे हैं उन्हें भी इस बात का कोई इल्म नहीं है कि आगे क्या होगा? सारी चीजें अनुमानों और आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर हो रही हैं।
     भारत में स्वास्थ्य पर व्यय जीडीपी के 3.7% है जिसमें लगभग एक चौथाई भाग ही सरकारी व्यय का है। यह निम्न आय वर्ग वाले देशों के औसत 5.4% से काफी कम है। आंकड़े बताते हैं भारत में मरने वालों  में बड़ी संख्या नौजवानों की है। यही कारण है कि विकास के बावजूद हमारे देश में जीवन की प्रत्याशा कम है । कुछ लोगों का कहना है अपने देश में वायु प्रदूषण ,डायरिया, टीबी, सड़क दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या में लोग मारे जाते हैं। यह सोच नकारात्मक है। विभिन्न स्थितियों में मारे जाने वाले लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण महामारी के आंकड़ों के साथ देखें इससे ज्यादा गलत कुछ नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री ने 21 दिन की बंदी घोषित कर कम से कम महामारी के प्रसार को अवरुद्ध तो कर दिया है। इस तरह की किसी भी महामारी के प्रसार में कई तरह के कारक तत्व होते हैं। जिनमें सबसे ज्यादा खतरनाक आपस में मिलना जुलना ही होता है। भारत जैसे आबादी के घनत्व वाले देश में जहां वर्जनाओं की अवहेलना करना आदत के साथ-साथ मजबूरी भी है वहां आपस में मिलना जुलना रोकने का लॉक डाउन ही सबसे सरल तरीका है। लॉक डाउन के माध्यम से निवारण और इलाज के  प्रयासों से जुड़े नीतिगत बदलाव के जरिए मौत की संख्या कम की जा सकती है।  मौत के आंकड़े अक्सर जाति ,वर्ग ,क्षेत्र और लिंग के अनुसार बदलते हैं और कोरोना वायरस के साथ भी कुछ ऐसा ही है। सार्वजनिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के उद्देश्य और उसके कार्यान्वयन के बीच एक बड़ा  फासला होता है। इनमें बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी होता है। कुछ लोगों का कहना है कि अचानक बंदी के कारण काम धंधे बंद हो गए और लोग अपने अपने घरों से भागने लगे। इसलिए इसलिए जरूरी है कि पलायन करने वाले उन मजदूरों को खाना, कपड़ा और विश्राम की जगह मुहैया कराई जाय। यहां यह गौर करने वाली बात है कि महामारी पर उठ रहे सवाल केवल सवाल नहीं है खुद में जवाब भी हैं । वह सवाल है कि अगर इलाज का ढांचा पर्याप्त नहीं है तो क्या हो? महामारी एक दुर्लभ घटना है और इसमें सरकार से बहुत उम्मीद की जाती है ,लेकिन उन उम्मीदों को पूरे किए जाने के उपाय भी बताना जरूरी है और लोकतंत्र में तो सबसे ज्यादा जरूरी है। इसलिए ऐसे कठिन समय में सरकार की आलोचना कर उसे हतोत्साहित करने के बजाय उपाय बता कर उत्साहित करना चाहिए। मोदी जी का यह कदम सीमित साधनों वाले देश भारत में कारगर साबित  हो रहा है।


Wednesday, April 1, 2020

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः 

आज रामनवमी है। भगवान श्री राम का जन्मदिन और आज ही कोलकाता के सर्वप्रिय समाचार पत्र सन्मार्ग का स्थापना दिवस भी है। बड़ा अजीब संयोग है कि सन्मार्ग की स्थापना उसी दिन हुई थी जिस दिन पुरुषोत्तम राम का आविर्भाव इस धरा पर हुआ था। जिनके बारे में सदियों बाद द्वापर में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।। 

इसी दिन हमारे मनीषियों ने सन्मार्ग की स्थापना भी की थी। आपने सोचा है कि सन्मार्ग क्या है? एक भौतिक अस्तित्व से अलग एक सूक्ष्म और अध्यात्मिक अस्तित्व भी इसमें लिपटा हुआ है। वह अस्तित्व भी ब्रह्मांड की तरह  3 डायमेंशन वाला है। पहला डायमेंशन  खुद में इसका नाम है। यह जानना भी बड़ा दिलचस्प होगा के राम और सन्मार्ग की व्याख्या लगभग समान है। डॉक्टर मंगल त्रिपाठी अपने विष्णु सहस्त्रनाम में लिखा है कि राम विष्णु के 394 वें अवतार हैं और मार्ग स्वयं 397वां अवतार है। जो कि सत्य के संधान की ओर मनुष्य को प्रवृत्त करता है।हमारे मनीषियों ने पुरुषोत्तम को मार्ग से आबद्ध किया और उस मार्ग को सत से आवेशित कर दिया और इसीलिए सन्मार्ग का शिरो वाक्य बना "नमोस्तु रामाय सलक्ष्मणाय .... ।"यहां यह भी गौर करने की बात है की यह सत वह सत्य नहीं है। क्योंकि सत्य एक अवस्था है जो देशकाल और स्थिति के अनुसार परिवर्तित होता है। मसलन पानी बर्फ और भाप तीनों सत्य हैं।तीनों का अपना अस्तित्व है। तीनों के अपने गुणधर्म हैं। जबकि उसका मूलभूत तत्व हर स्थिति में एक ही होता है ,वही सत है । सन्मार्ग शब्द का अर्थ उसी सत के साथ विष्णु का संयोग है। जो खुद में सत है। इसका दूसरा डायमेंशन है कर्म। यह भी गौर करने वाली बात है कि सन्मार्ग की स्थापना करने वाले हमारे मनीषियों ने कर्म तत्व को नहीं अपनाया, क्योंकि  गीता में जिस कर्म की व्याख्या की गई है वह अभिव्यक्ति में अनासक्ति है। सिर्फ प्रयास है, उपलब्धि नहीं है। इसीलिए हमारे पूर्वजों ने "हनुमत प्रयास" के मंत्र को अपनाया। इस मंत्र में जिजीविषा है लक्ष्य है और भगवती सीता का संधान  है। इस का तीसरा डायमेंशन है "सन्मार्ग एव सर्वत्र पूज्यते.....।" मर्यादा के भी यही तीन डायमेंशन हैं और इसी 3 डाइमेंशंस के बीच में पुरुषोत्तम की उत्पत्ति हुई।

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपिचोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः

राम भारतीय अस्मिता और संस्कृति के प्रतीक पुरुष हैं। इसलिए सन्मार्ग की स्थापना के लिए राम जन्म के पवित्र दिवस का चयन किया गया। आज भी सन्मार्ग अपने उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयासरत रहता है। कुछ लोग हमसे पूछते हैं कि कलकत्ता ही क्यों और संस्कृति को बचाना ही क्या जरूरी है। आजादी के बाद हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं शिक्षा प्रणाली और व्यवस्था दूषित हो गई।  यह स्वयं में भयावह दुर्घटना है। इसके साथ एक और प्रश्न है कि कलकत्ता ही क्यों? गंगोत्री से चलकर कल्लोलिनी गंगा कोलकाता से कुछ दूर सागर में समा जाती है और यही उसका उद्देश्य भी खत्म हो जाता है या नहीं भगीरथ ने जिस उद्देश्य के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए तपस्या की थी वह उद्देश्य पूरा हो गया सगर पुत्रों को मुक्ति मिल गई इसीलिए हमारी व्यथित संस्कृति और सभ्यता को एक दिशा देने के लिए कोलकाता में सन्मार्ग की स्थापना की गई।
     ऊपर कहा गया है की स्वतंत्रता के बाद जो हमारी स्थिति हुई वह स्वयं में एक दुर्घटना है संस्कृति को धर्म संस्थानों से जोड़ दिया गया और हमें आत्म रिक्त होने पर मजबूर कर दिया गया। यह आत्मरिक्तता कुछ ऐसी थी कि हम अपने आदर्शों से गिरने लगे। सन्मार्ग ने सदा यह बताने की कोशिश की है कि अर्थों के भ्रम में नहीं रहना है देवी देवताओं के विभिन्न स्वरूपों के बावजूद सत एक ही है, जो एक भारतीय के "आत्मन" में रहता है ना कि संस्थानों में । इसका बड़ा ही रोचक उदाहरण हमारे पुराणों में मिलता है। ब्रज की  गलियां छोड़कर जब कृष्ण द्वारका चले गए और लौट कर आए तो गोपियों ने उन्हें द्वारकाधीश कह कर पुकारा । यह संबोधन भगवान कृष्ण को उचित नहीं लगा उन्होंने इस पर आपत्ति की तो गोपियों ने कहा कि अब तुम वह नहीं रहे जिन्होंने महज एक गेंद के लिए गोवर्धन उठा लिया था। तुम तो वह कृष्ण हो गए जिसने अपनी आंख के सामने अपनी सेना को मरवा दिया। यह स्पष्ट करता है कि आज भी एक भारतीय का धर्म उसके भीतर होता है, संस्थानों में नहीं। जब तक एक भारतीय की संस्कृति और धर्म संप्रदाय एक दूसरे से प्रेरणा पाते रहे तब तक सब ठीक था जैसे ही प्रेरणा का स्रोत अवरुद्ध हुआ और भारतीयता पर आघात लगा तो विभाजन हो गया। इसका यह एक भौतिक सबूत है । भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जिसकी राष्ट्रीय अस्मिता विनाश से नहीं अपनी सभ्यता के विभिन्न चरित्रों से गढ़ी गई है। पिछले 75 वर्षों से सन्मार्ग इसी परंपरा को कायम रखकर सत की ओर जाने वाले मार्ग पर चल रहा है। हमारे मनीषियों ने 75 वर्ष पहले जिस दीपशिखा को प्रज्वलित किया था उसमें हमारे पाठकों विज्ञापन दाताओं और हितैषी  जनों का "नेह" मिलता रहा है और यह दीपशिखा प्रज्वलित है। इस दीपक को प्रकाश मांग करने में उनकी भूमिका के लिए अत्यंत आभारी हैं।

Tuesday, March 31, 2020

अब सियासत नहीं विज्ञान की बातें हों

अब सियासत नहीं विज्ञान की बातें हों 

वर्तमान में जो महामारी विश्व के सामने है उससे कठिनाइयां बढ़ रही हैं और यकीनन इसके बाद दुनिया वह नहीं रह जाएगी जो आज तक रही है। बड़ी संख्या में लोग मारे जा रहे हैं और संक्रमित हो रहे हैं। इसे रोकने के लिए दुनिया भर की सरकारों से जो कुछ बन पड़ा है वह किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में लॉक डाउन करवा दिया। बेशक ऊपर से देखने में तो यह कुछ ज्यादा ही लग रहा है। खासकर ऐसे मौके पर जब देश की बहुत बड़ी आबादी रोज खाने कमाने वाली है । अर्थव्यवस्था की स्थिति सुस्ती में है तथा लॉक डाउन के बाद जब काम बंद हो जाएगा तो लोगों का बड़ी संख्या में पलायन होगा। पलायन के दबाव के लिए सरकार ने कोई तैयारी नहीं की है। फिर भी जो कुछ किया जा रहा है और सरकारों से जो कुछ बन पड़ा है वह हो रहा है। कोरोना वायरस के इस प्रसार में अगर कोई कहे कि इसमें कुछ सकारात्मक भी है तो हैरत होगी। लेकिन अगर उन सकारात्मक पहलुओं पर गौर करें तो इससे हमें अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं पर सोचने मदद मिल सकती है। जिन रिवाजों को हमने अब तक पिछड़ापन कह कर किनारा कर दिया है कोरोना ने इस बात को स्पष्ट कर दिया है सामाजिक स्वास्थ्य और कल्याण के मामलों में हमारा खास करके एशियाई मॉडल पश्चिमी तौर-तरीकों से कहें बेहतर है। हमारे सामुदायिक स्वास्थ्य और सेवा प्रेरित नौकरशाही की अधिकतम ताकत का इस्तेमाल इस बीमारी के नियंत्रण में किया जा रहा है। जबकि दुनिया के अन्य देशों में ऐसा नहीं हो रहा है। इन दिनों एक कहावत निकल गई है, "कोरोनावायरस का जितना इलाज डॉक्टर नहीं कर पा रहे हैं उससे कहीं ज्यादा इलाज पुलिस कर रही है। कम से कम आपके दरवाजे पर खड़ा एक वर्दीधारी सिपाही यह आपको याद दिलाता है कि बाहर निकलना वर्जित है।  बाहर नहीं निकलने से जिन समस्याओं से हम बचे रहेंगे उसके बारे में सब जानते हैं।" कहते हैं कि शासन की त्वरित कार्रवाई में लोकतंत्र बाधक होता है, लेकिन हमारे देश भारत ने इसकी मिसाल कायम की है कि अगर उद्देश्य सही हो तो कहीं कोई बाधा नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से आह्वान किया कि जनता कर्फ्यू लगेगा और लोगों ने  इसे मान लिया। कर्फ्यू लग गया । लोग एहतियात बरतने लगे। शायद यूरोप और अमेरिका में ऐसा देखने को नहीं मिलेगा। अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रीय आपातकाल कानून और स्टेफर्ड कानून के प्रावधानों को ससमय लागू कर दिया होता तो अमेरिका आज के जैसे आर्थिक संकट से नहीं गुजर रहा होता। डोनाल्ड ट्रंप मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने के लिए आपातकाल की घोषणा करने के लिए तैयार थे लेकिन महामारी से लड़ने के वक्त वह ऐसा नहीं कर सके। पश्चिमी समाजशास्त्री और समाज वैज्ञानिक अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि छोटी आबादी वाले देशों में सामाजिक नीतियां प्रभावी ढंग से लागू की जा सकती हैं लेकिन भारत छोटी आबादी का देश नहीं है। यहां के एक राज्य या आबादी से दुनिया के कई देशों की आबादी कम है। अब समय आ गया है कि दावोस या इसकी तरह के अन्य शिखर सम्मेलनों पर ध्यान देना छोड़ें और इसके बजाय स्वास्थ्य और सामाजिक नीति विशेषज्ञों के शीर्ष स्तरीय सम्मेलन को प्रोत्साहित करें। सार्वजनिक स्थलों पर थूकना भारत में लंबे अरसे से चली आ रही एक सामाजिक बुराई है और इसके बारे में कई बार कहा सुना जा चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यापक पैमाने पर स्वच्छता अभियान की शुरुआत की लेकिन कोरोना वायरस के डर से अब यह  सफलता का क्षण हो सकता है। यह तो प्रमाणित है कि थूक से कैसे टीबी फैलती है। अब यह भी लोग जानने लगे हैं कि खासने और थूकने से कोरोना वायरस का संक्रमण हो सकता है और लोग अपनी इन आदतों को नियंत्रित करेंगे ।  उनके बाद आदतें संभवत सुधर जाएंगे इसलिए पल्ले व्यवहार का लाभ उठाते हुए भारत सरकार को थूकने के खिलाफ एक व्यापक अभियान चलाना चाहिए जैसा खुले में शौच के खिलाफ चलाया गया। यदि ऐसा किया जाता है तो हमें नाटकीय परिणाम मिलेंगे ।  इस समय तो लोग सहयोग के लिए तैयार हो जाएंगे। लोगों ने मास्क पहनना शुरू कर दिया है । वह थूक अवरोधक भी है। थूकने वाले को मास्क पहनकर मुंह से पिचकारी चलाने का आनंद नहीं मिल सकता है।
      कुल मिलाकर सब ने देखा होगा इस समय राजनीति समाचार का विषय नहीं है। सब जगह समाचार बनाने वालों और समाचारों का संकलन करने वालों के साथ-साथ संपूर्ण समाज के सोच में हो रहे एक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का संकेत मिल रहा है। इन दिनों आतंकवाद और राजनीतिक उथल-पुथल के बारे में नहीं सुनना या कम सुनना कितना राहत दिलाने वाला है यहां तक कि कश्मीर के रिपोर्टर आतंकवाद के बजाय घाटी के वीरान पार्कों और बागो पर ध्यान दे रहे हैं ।वे पर्यटकों की कमी की बात कर रहे हैं और शायद ही कभी हिंसा की बात करते हैं । नतीजतन जहां कभी नेता हावी रहते थे वहां अब वैज्ञानिकों और ज्ञानियों की बातों को महत्व दिया जा रहा है इस कारण वास्तविक विशेषज्ञों को अपनी बात सामने रखने के लिए एक मंच प्राप्त हो रहा है हम जिस पक्षपातपूर्ण राजनीतिक बयानबाजी को झेल रहे थे उससे अब शायद लंबे समय तक सामना नहीं हो पाएगा या हो सकता है ऐसी स्थिति में परिवर्तन दिया है हो सकता है कोरोनावायरस के बारे में ज्यादा जानने के लिए सभी को थोड़ा गंभीर अध्ययन करना पड़े किताबों पर ज्यादा ध्यान जाएगा ग्रामर पॉलिटिक्स की बजाए अर्थशास्त्र या रामचरितमानस ज्यादा ध्यान आकर्षित करेंगे एक और बड़ा सुधार आएगा और इसका श्रेय  कोरोनावायरस हो जाता है जिन फिरंगी ओं के साथ खड़े होकर हम अपने को गौरवान्वित महसूस करते थे उस से दूरी बनाने लगेंगे क्योंकि विदेशों से  आए यह लोग ही वायरस के वाहक हैं विदेश यात्रा से लौटने वाले लोग अब फॉरेन रिटर्न की ठसक नहीं दिखा पाएंगे हालात इतने बदल गए हैं की पानी जा पनीर भी संदेह के घेरे में है इससे हमारे डेयरी उद्योग को मजबूती मिल सकती है अगर हल्के-फुल्के अंदाज़ में करें तो इस वायरस नहीं हैंड शेक जैसे चलन को बंद करना शुरू कर दिया है अब लोग नमस्ते तथा प्रणाम करने लगे हैं अभिवादन का यह स्वरूप लैंगिक रूप से निष्पक्ष और सार्वजनिक स्थानों पर स्त्री पुरुष संपर्क की हमारी संस्कृति के अनुरूप भी है। अर्थशास्त्र में चाणक्य ने कहा है कि मानवता की "अधिकांश समस्याएं अकेले में चुपचाप बैठ कर सोच पाने की हमारी अक्षमता के कारण पैदा हो रही हैं। " इसलिए स्वयं घर में बंद रहें और दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करें।


Monday, March 30, 2020

डब्ल्यूएचओ अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नया अखाड़ा

डब्ल्यूएचओ  अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नया अखाड़ा 

21वीं सदी के शुरुआती दशक में एक महामारी आई थी सार्स। उससे बहुत लोग मारे गए थे। उससे पैदा हुए खौफ और दहशत की कल्पना से ही अंदाजा लगाया जा सकता है की कोरोनावायरस ने कैसे दुनिया को उथल-पुथल कर दिया। वर्तमान की तरह उस समय भी चीन ने सार्स महामारी के प्रसार को विश्व समुदाय को बताने में देरी की थी। लेकिन उस वक्त और आज के दिन में एक बड़ा फर्क है। सार्स की खबर मिलते ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने तुरंत सूचना जारी कर दी और यात्राओं पर अविलंब रोक लगा देने की सलाह दी। उसने सार्स की महत्वपूर्ण सूचना देने में देर के लिए चीन को आड़े हाथों लिया था। क्योंकि उसका कहना था कि अगर यह खबर पहले मिल गई होती तो बहुतों को बचाया जा सकता था। सार्स को काबू कर लेने का जश्न डब्ल्यूएचओ ने मनाया और चेतावनी दी कि कोरोना वायरस एकदम नए अवतार में लौट सकता है और इससे दुनिया को खतरा बना रहेगा। डब्ल्यूएचओ के तत्कालीन महानिदेशक डॉक्टर ग्रो हरलेम ब्रंड्टलैंड ने पूरी दुनिया से अपील की थी की पशुओं के रेहड़ की जांच करें क्योंकि उनसे भविष्य में महामारी फैल सकती है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि वायरस के विस्तार पर और शोध करने की आवश्यकता है। चीन के उन बाजारों को खासतौर पर चिन्हित किया गया था जहां तमाम तरह के पशुओं को लोगों को खाने वाली वस्तु के तौर पर बेचा जाता है। यहां वायरस सकते हैं और मनुष्यों  में प्रवेश कर सकते हैं। 2007 में एक शोध पत्र में कहा गया था वायरस की अस्थिर प्रकृति और चीन का तीव्र शहरीकरण  मिलकर "टाइम बम" का निर्माण कर सकते हैं ।  2015 में निर्णय किया गया कि कोरोनावायरस के रोग अनुसंधान और विकास को सबसे ज्यादा प्राथमिकता वाली सूची में रखा जाए, क्योंकि यह एक उभरती हुई बीमारी है और बड़ी महामारी का कारण बन सकती है। इस आकलन को डब्ल्यूएचओ की वार्षिक समीक्षा 2018 में दोहराया गया। इन सारे हालात को देखते हुए हैरत होती है कि जब दिसंबर में वुहान में निमोनिया वाले वायरस का पता चला  था और डब्ल्यूएचओ के पास इससे संबद्ध आंकड़े भी थे जो सार्स पर वर्षों के अध्ययन से हासिल हुए थे तब आखिर इतनी सुस्ती क्यों बरती गई? डब्ल्यूएचओ के वर्तमान महानिदेशक डॉक्टर ट्रेडोस ए गब्रेसेस ने जनवरी में महामारी के शुरुआती दौर में पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्धता के लिए चीन को शाबाशी दी थी। जबकि इसका खंडन करने वाले अनेक सबूत हैं।
     जब चीन में संक्रमण का पहला मामला सामने आया तो उसके अगले ही दिन डब्ल्यूएचओ ने दावा किया कि कोरोना वायरस के इंसान से इंसान को संक्रमण का सबूत नहीं है। इस संगठन को इस बारे में दिसंबर में ही सावधान कर दिया गया था। चीन ने 31 दिसंबर डब्ल्यू एच ओ को सूचित किया कि इस वायरस से अक्टूबर में ही मनुष्य का संक्रमण हो गया है। इसके बावजूद डब्ल्यूएचओ ने चीन की सरकार को नाराज न करने की पूरी सावधानी बरतते हुए वहां कोई जांच दल भेजने की गंभीरता नहीं दिखाई। डब्ल्यूएचओ और चीन की संयुक्त टीम फरवरी के मध्य में वहां गई।  इसमें  डब्ल्यूएचओ के   12  विशेषज्ञ थे  और चीन के  13 अधिकारी थे।  इस  टीम ने  जो रिपोर्ट दी उसमें चीनी तर्क भरे पड़े थे।
         इस बीच कोरोना से फैलने वाली महामारी के लक्षण दिखाई पड़ने लगे। डॉक्टर ट्रेडोस और उनकी टीम ना केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य इमरजेंसी की घोषणा करने में नाकामयाब रही बल्कि उल्टे उसने पूरी दुनिया को यात्राओं पर रोक लगाकर दहशत और डर फैलाने से परहेज करने की अपील कर दी। इस अंतरराष्ट्रीय संगठन ने यात्राओं पर रोक लगाने के लिए अमेरिका की आलोचना की और इसे अतिवादी कदम बताया। डब्ल्यू एच ओ की सलाह पर यूरोपियन सेंटर फॉर डिजीज प्रीवेंशन एंड कंट्रोल ने सुझाव दिया कि इस वायरस से यूरोपीय संघ को खतरा कम है, इसलिए इसके देश में यात्रा पर रोक में देरी हुई। डब्ल्यूएचओ के शुरुआती गलत कदम के कारण पूरी दुनिया में हजारों लोग इस वायरस के शिकार हो गए उनके जीवन पर इसका लंबा असर पड़ सकता है। यही नहीं इससे आर्थिक मंदी भी आ सकती है।
     यही नहीं इस  महामारी का एक रणनीतिक पहलू भी सामने आ रहा है। यह बदलते अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन का एक और मोर्चा बन गया है। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। 50 और 60 वाले दशकों में डब्ल्यूएचओ खुद को सोवियत संघ के कम्युनिस्ट ब्लॉक और अमेरिका के बीच कसरत करता हुआ पाता था। 90 और दो हजार वाले दशकों में वह दवाओं बौद्धिक संपदा के अधिकार और दवाओं तक पहुंच के सवालों पर बहस में उलझा हुआ था। अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में चीन के बढ़ते दबदबे के कारण अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई खाईयां बन रही हैं और डब्ल्यूएचओ इसका पहला शिकार हुआ है। यहां यह ज्ञातव्य है की मार्गेट चान के नेतृत्व में डब्ल्यूएचओ उन पहले अंतरराष्ट्रीय संगठनों में था जिसने चीन की विवादास्पद "बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव" के तहत आधुनिक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए एमओयू पर दस्तखत किया था। चीनी और और कनाडाई मूल के चान का चीन के मेन लैंड से काफी प्रगाढ़ संबंध हैं। डॉक्टर ट्रेडोस को भी चीन समर्थित उम्मीदवार माना गया था और हाल के सप्ताहों में वह धारणा मजबूत हुई थी। दुनिया ने अब जवाब देना शुरू कर दिया है। हाल ही में विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के नए महानिदेशक के चुनाव में सिंगापुर के उम्मीदवार की जीत हुई और इस विजय ने एक महत्वपूर्ण नियामक की मानक संस्था पर कब्जा करने की चीन की कोशिश को नाकाम कर दिया है। सवाल है कि क्या डब्ल्यूएचओ अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नया अखाड़ा बनेगा ?


Sunday, March 29, 2020

वायरस को कहर ढाने की छूट नहीं दे सकते

वायरस को कहर ढाने की छूट नहीं दे सकते 

अभी हाल में बंगाल में शीतला पूजा गुजरी है। शीतला मां इसी तरह के संक्रमण की बीमारियों को समाप्त करने वाली देवी मानी जाती हैं। इसी हफ्ते रामनवमी भी आएगी यह उस राम के जन्म का समय है जिस राम ने 14 वर्षों के वनवास के बाद मानवता के दुश्मन रावण का वध किया था। आज कमोबेश वही हालात पैदा हुए हैं। लॉक डाउन में पूरा देश है और प्रवासी मजदूरों में भगदड़ मची हुई है। कुछ पूछते हैं क्या ऐसा ही चलेगा लेकिन शायद नहीं। कोरोना वायरस नाम के इस दैत्य से मुकाबले के लिए लोगों में मनोबल भरने का काम हमारे रिपोर्टर कर रहे हैं। उनका काम बंद नहीं है। यह देख कर बड़ा सुकून मिलता है कोई लड़की एयरपोर्ट से खबरें देती है तो कोई पुलिस वालों की मदद की खबरें पहुंचा रही है। कोई रिपोर्टर बीमारियों का सही हाल जानने के लिए अस्पतालों में घूम रहा है। यह गतिविधि एक उम्मीद है। यकीनन इस दौर में पत्रकारिता शायद हमारे जीवन की सबसे खतरनाक स्टोरी होगी। बड़ी बड़ी लड़ाई हो की खबरें जुटाने वाले उन संवाददाताओं से भी ज्यादा भयानक इन बच्चों के काम हैं। इस साहस को सलाम!
      कोरोना वायरस के संक्रमण के दौर में दो मान्य सच्चाइयों का जिक्र जरूरी है। पहली हकीकत है कि "जो कल करे सो आज कर" और दूसरी हकीकत है विख्यात अर्थशास्त्री केंस का वह  कथन कि " सबको एक दिन मरना है।" आज हताशा का मौसम चारों तरफ फैला हुआ है और ऐसे में एक खास किस्म की नाउम्मीदी लोगों के मन में कायम है और जो इस तरह की नाउम्मीदी  की बात नहीं करते उन्हें असंवेदनशील कहा जा सकता है। लेकिन पिछली पीढ़ियों से पहले आज तक की इतिहास का सबसे खतरनाक वायरस दुनिया में घूम रहा है। इसकी तुलना चाहे जिस से कर ली जाए या मिसालें चाहे जो गढ़ ली जाएं लेकिन सच तो यह कि इस वायरस से दुनिया के आम आदमी से बादशाह तक डरे हुए हैं। यह सबको अपनी चपेट में ले रहा है। महामारी विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक इस वायरस के लिए कोई वैक्सीन नहीं बनी है या सामूहिक रोग प्रतिरक्षा या दोनों सफल नहीं होते दिख रहे हैं और शायद 50 से 80% लोग इससे संक्रमित हो सकते हैं। लेकिन यह आंकड़े बेमानी हैं। इंसानी फितरत है कि वह हर मुश्किलों से लड़ना सीख जाता है।  कभी मलेरिया से ग्रस्त होकर विश्वविजय का मंसूबा रखने वाला सिकंदर एड़िया रगड़ कर मर गया लेकिन आहिस्ता - आहिस्ता इंसान ने उस मलेरिया की दवा खोज लिए और आज वह कुछ नहीं है। बेशक कोरोनावायरस से भी कुछ लोग मर सकते हैं लेकिन कम से कम 98% लोग हमारे देश के इससे निपट लेंगे। अगर आप आलसी हैं ,भाग्यवादी हैं और हताशा वादी को तो आपके लिए बात दूसरी है केंस की बात कि आखिर हमें एक दिन मरना है। लेकिन यहां दो सवाल उभरते हैं । पहला क्या हम मौत का इंतजार करें । अधिकतर लोग इंतजार नहीं करते ज्यादा से ज्यादा लंबा जीवन जीने के लिए जी जान एक कर देते हैं। जहां तक वायरस का प्रश्न है वह तो संपूर्ण जैविक प्राणी ही नहीं है महामारी विज्ञान की विशेषज्ञता इस समय फैशन में है इसलिए जितने महामारी विशेषज्ञ या अर्थशास्त्री हैं या रामबाण दवा बताने वाले हैं वे बिल्कुल सही नहीं है कुछ विशेषज्ञ यह कह पाए जाते हैं कि जुलाई तक लाखों भारतीय मारे जाएंगे और 50 करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हो जाएंगे। दूसरी छोर पर हमें यह बताया जा रहा है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है वायरस हमें छोड़ कर आगे बढ़ जाएंगे हमारे यहां का गर्म मौसम उनके जीवन के लिए मुफीद नहीं है । लेकिन शायद वह इस बात को नजरअंदाज कर दे रहे हैं की दक्षिण एशियाई लोगों में रोग से लड़ने की क्षमता कितनी जबरदस्त है ऐसे विशेषज्ञ यह मानकर चल रहे हैं कि हमारे देश के 136 करोड़ लोग अपने सामूहिक और व्यक्तिगत भविष्य को बचाने के लिए कुछ नहीं करेंगे? कोई भी देश आंकड़े बाजो के उन मनमाने अनुमानों के आगे हथियार नहीं डाल सकता। जिनमें सरकारों के और लोगों की कोशिशों को शून्य मान लिया जाता है। ग्लोबल मीडिया में बड़े अविश्वास के साथ सवाल पूछे जाते हैं कि भारत में इतनी कम मौतें कैसे? इस तरह की बात करने वाले लोग गलत है। क्योंकि वे इस बात की अनदेखी कर देते हैं कि सामने वाला क्या कर रहा है? दूसरा पक्ष क्या कर रहा है? वह दूसरा पक्ष हम हैं । यानी आम भारतीय। हम वे लोग हैं जिनका अपना लोकतंत्र है, स्वतंत्र मीडिया है ,सिविल सोसायटी और शोर-शराबा है । इस भारत में आप मजदूरों को सैकड़ों मील दूर अपने घर की ओर पैदल जाते देखते होंगे यह दृश्य आपको बेचैन कर देता होगा और सरकारों को भी कुछ न कुछ करने के लिए मजबूर कर देता होगा।  इसका छोटा जवाब केंस उस बात का जवाब  है एक दिन सबको मरना है। इस सब को अंत में मरना तो है लेकिन मरने का इंतजार क्यों करें ? जीवन को लंबा खींचने के लिए कुछ न कुछ करते रहेंगे । हमें अपने कल को बेहतर बनाने के लिए आज का पूरा उपयोग करने की जरूरत है। कल तो आएगा ही
        तब आप पूछ सकते हैं कि यह लॉक डाउन क्यों ? बेशक इस लॉक डाउन से हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था को सांस लेने का समय मिल जाएगा। जो गंभीर आपदा आने वाली है उसका सामना करने में हमारे अस्पताल कारगर हो जाएंगे। हर दिन नई समस्या उभर रही है और हर दिन उसके समाधान के उपाय किए जा रहे हैं । आगामी दिनों में यही सबसे अहम चुनौती साबित होगी और उसके बाद "सर्वे भवंतु सुखिन सर्वे संतु निरामया । "


Friday, March 27, 2020

उम्मीद तो दिखाई पड़ने लगी है

उम्मीद तो दिखाई पड़ने लगी है 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल डिस्टेंसिंग का जो उपाय सुझाया है उससे कोरोना वायरस का प्रभाव घटता नजर आ रहा है और उम्मीद है कि जब 21 दिन पूरे होंगे तो हालात काबू में रहेंगे। हालांकि सोशल मीडिया और टेलीविजन के समाचारों में कई ऐसी चीजें दिखाई पड़ रही है जिससे लगता है सब कुछ बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है और कुछ नहीं तो लोग खरीदारी में जुटे हुए हैं। जरूरत के सामान इकट्ठे कर रहे हैं सैनिटाइजर और मास्क बाजार से गायब हैं।  इन दृश्यों का विश्लेषण किया जाय और यह जानने की कोशिश की जाए कि समाज में क्या बदल रहा है और लोग कैसा आचरण कर रहे हैं तो  कई चीजें  हासिल हो सकती  हैं।
      बुधवार को प्रधानमंत्री ने वाराणसी के लोगों को संबोधित करते हुए मदद का हाथ बढ़ाने की अपील की थी। लेकिन जो खबरें आ रही हैं उनसे तो ऐसा लगता है आम आदमी इस बदलाव को काबू में करना चाह रहा है और यह देख कर हैरत हो रही है चिंता भी और डर भी हो रहा है कि लोग सामान इकट्ठा कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि वह जल्दी ही बहुत ज्यादा जमा कर लेना चाह रहे हैं। जो लोग बीमार हैं बुजुर्ग हैं और जिन्हें उपचार की जरूरत है उन पर कोई भी नहीं सोच रहा है। कुछ ज्ञान गुमानी लोग हैं जो यह कहते नहीं थक रहे हैं कि हालात जल्दी ही काबू में आ जाएंगे। सुनकर हैरत होती है। हालात के काबू  में आने का अर्थ हमारे भारतीय समाज में क्या है। भूख से तड़पते सामान से लदे घर को लौट रहे मजदूर या सरकार से तुरंत व्यापक पैमाने पर राहत पैकेज की मांग करने वाले नेता जो यह बताना चाह रहे हैं कि बिगड़ती स्थिति में वे किस तरह सचेत हैं। कोई भी राष्ट्रीय संसाधनों के बारे में और उन संसाधनों की सीमाओं के बारे में सोचने को नहीं तैयार है। कोरोना वायरस की महामारी ने भयानक चिकित्सकीय, भावपूर्ण मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संकट खड़ा कर दिया है। जिसके लिए ना हम तैयार हैं ना प्रशिक्षित। विख्यात अमेरिकी समाज वैज्ञानिक एरिक क्लाइनबर्ग ने "सोशियोलॉजी टुडे" में हाल में एक बहुत ही महत्वपूर्ण लेख लिखा था जिसमें उन्होंने यह बताने की कोशिश की थी कि "यह समय समाजिक एकजुटता का  है जिसके तहत अंतर निर्भरता, कमजोर लोगों की हिफाजत, समान हितों की चिंता और जनता के कल्याण की बात सोचना जरूरी है।" लगभग यही बात प्रधानमंत्री ने भी अपने  संबोधन में कही थी। सचमुच उम्मीद तो है कि हम इस चुनौती पर विजय प्राप्त कर लेंगे लेकिन अब से 21 दिन के बाद हम कहां होंगे, हमारे चिंतन कहां होंगे समझ पाना बड़ा कठिन है । इसीलिए प्रधानमंत्री ने कहा कि आप कम से कम 9 लोगों की मदद करें। अगर यह 9 लोग दूसरे 9-9 लोगों की मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं तो आनन-फानन में 81 लोगों को मदद मिल सकती है। यही कारण है कि राज्य सरकारें स्थानीय प्रशासन अपने स्तर पर मुस्तैदी से काम करने में जुटे हुए हैं। सरकार के इन प्रयासों को कई धर्मार्थ संस्थाएं और गैर सरकारी संगठन सफल बनाने में जुटे हैं ताकि देश में ज्यादा से ज्यादा लोगों की जिंदगी को बचाया जा सके।
    अगर सामाजिक कार्यों का दावा करने वाले रजिस्टर्ड एनजीओ भी इस काम में जुट जाएं तो जरूरतमंदों को ज्यादा मदद मिल सकती है। जितने एनजीओ हैं उनके आधे भी प्रधानमंत्री की बात का अनुसरण करते हुए अपनी कमर कस लें तो इस चुनौती का सामना करना आसान हो सकता है। यह गैर सरकारी संगठन आगे आकर पलायन कर रहे असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों को कम से कम भोजन और अस्थाई आवास की व्यवस्था करने के कामों में जुड़ जाए तो बहुत बड़ा जनकल्याण हो सकता है। जिसका एनजीओ उद्देश्य बताकर अपना अस्तित्व कायम किया है हमारे देश में वर्तमान में लगभग 35 लाख पंजीकृत एनजीओ है और इन एनजीओ को केंद्र तथा राज्य सरकारों से अरबों रुपए की आर्थिक सहायता मिल चुकी है । कई संगठनों को तो विदेशों से भी आर्थिक मदद मिलती है। आंकड़े बताते हैं कि इन संगठनों को केंद्र और राज्य सरकारों से हर साल 1000 करोड़ रुपए की मदद मिलती है। अगर यह संगठन संकट की घड़ी में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करें और असहाय लोगों की ओर मदद का हाथ बढ़ाएं तो कोई कारण नहीं है की हम इस चुनौती पर विजय न हासिल कर सकें।  लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है क्योंकि यह सब संगठन कागजी है।
       कुछ लोग सोशल डिस्टेंसिंग के सुझाव को अमान्य करने में लगे हैं और इस दौरान पुलिस की भूमिका पर उंगलियां उठ रही हैं। लेकिन भारत में फिलहाल जो स्वास्थ्य सेवाएं हैं वह इतनी सक्षम नहीं है के इस महामारी कर सीधे-सीधे मुकाबला कर सकें। ऐसे में इस महामारी के बारे में जानकारी का होना सबसे ज्यादा जरूरी है। गौर करने की बात है कि इसका प्रभाव वहीं हो रहा है जहां लोगों को इसके बारे में स्पष्ट और संपूर्ण जानकारी नहीं है। इस वायरस की उम्र कम है और इसे एक दूसरे के बीच फैलने से यदि रोक दिया जाए तो इससे छुटकारा मिल सकता है। अभी इस वायरस के उपचार के लिए कोई टीका अथवा दवा नहीं निकली है इसलिए जरूरी है इसके संक्रमण को फैलने से रोका जाए और इस काम में देश के सभी लोग व्यक्तिगत रूप से मदद कर सकते हैं।  जैसा कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा था की यह आपके लिए है ,आपके परिवार के लिए है आपके राष्ट्र के लिए है । भारत ने टोटल लॉक डाउन कर इस बीमारी को रोकने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा दिया है। भारत के पास इसके अलावा कोई उपाय भी नहीं है। सरकार ने उपचार व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए लंबी रकम का प्रावधान किया है, साथ ही लोगों के मनोभाव और मनोबल को कायम रखने के लिए तरह तरह के उपाय भी किए जा रहे हैं। उम्मीद है कि इस वायरस पर हम जरूर विजय प्राप्त कर लेंगे । क्योंकि तीन-चार दिनों में ही संक्रमित लोगों संख्या घटने लगी है।  यह  बहुत ज्यादा उल्लेखनीय नहीं है लेकिन तब भी शुरुआत तो हुई। उम्मीद तो दिख रही है कि कल को कुछ ज्यादा ही हासिल हो जाएगा। उम्मीदों पर ही यह दुनिया कायम है।