Saturday, April 13, 2013
100 political clashes every month in Bengal: RTI
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West Bengal: A State in political violance
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Friday, April 12, 2013
कल्पतरु एक्सप्रेस में दिनांक 12 अप्रैल 2013 को छपा एक आलेख
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Friday, January 25, 2013
कोलकाता कल्लोलिनी है, तिलोत्तमा है
हरिराम पाण्डेय किसी शहर को सुंदरी के रूप में देखा जाना सचमुच बड़ी अजीब कल्पना है। लापियरे ने बेशक कोलकाता को जीवंत तौर पर परखा है लेकिन तिलोत्तमा के रूप में इस शहर की कल्पना के साथ ही कोलकाता के बारे में गालिब का वह शेर याद आता है कि, जिक्र कलकत्ते का तूने किया जो जालिम इक तीर मेरे दिल में वो मारा के हाय हाय। गालिबन मिर्जा गालिब दुनिया के पहले शायर थे जिन्होंने कोलकाता या कलकत्ता में दुविधाओं के बीच भी जीवन की राह तलाशनी शुरू की थी। कोलकाता ऐसा शहर है जहां सवाल ईमान और कुफ्र का नहीं, सवाल धर्मी और विधर्मी का नहीं, सवाल एक नयी रोशनी का है एक नये नजरिये का है। पता नहीं आपको मालूम होगा या नहीं कि जब हम किसी शहर को देखते हैं तो वह शहर भी हमें देखता है। हुगली नदी के किनारे तीस मील की लम्बाई में बसा हुआ महानगर, एक करोड़ के आसपास आबादी जिसके जवाब में सिर्फ टोकियो, लन्दन और न्यूयॉर्क के नाम लिए जा सकते हैं लेकिन इसमें उनसे कहीं ज्यादा वहशतें आबाद हैं। आसमान की बुलंदियों से नीचे देखें तो दूर-दूर तक हरियाली दिखाई देती है, कहीं गहरी सियाही, कहीं पीलाहट लिए हुए। लेकिन ये सारे रंग प्रदर्शन , अभिव्यक्ति के लिए बेचैन एक अनदेखी ऊर्जा का रूपक हैं। ठीक वैसे ही जैसे सोलहों सिंगार के बाद कोई सुंदरी दर्पण देखने को बेचैन होती है। आसमान से दिखने वाली इन्हीं हरियालियों में यहां-वहां चमकता, चौंकता, कौंधता हुआ पानी। झीलें, नहरें और नदी। एक तरफ हद्दे नजर तक फैली हुई चांदनी की चादर। एक नन्हा सा बिंदु इस लैंडस्केप में धीरे-धीरे फैलता जाता है और एक शहर की तस्वीर उभरती है। कुत्ते के पैर जैसी आकृति रखने वाली चौड़ी भूरी नदी के गिर्द बसा हुआ यह शहर, किनारों पर लंगर डाले कश्ितयां और जहाज, बड़ी बड़ी क्रेनेंं, मिलों की चिमनियां और कारखानों की जंग लगी लोहे की चादरों की छतें। फिर जरा और नीचे आने पर ताड़ के झुण्ड दिखते हैं। एक तरफ से झुण्ड से उभरता हुआ ब्रिटिश राज की यादों में बसे हुए पुराने गिरजे की सफेद खामोश मीनार जैसे स्कूली जमाने की किताबों में प्रेमी द्वारा दिये गये सूखे फूल। यह शहर अजीब द्वन्द्व का है और अनोखे टकराव भरे तजुर्बों का। गालिब ने लिखा है कि जब वे यहां से लौटे तो 'जेहन में आधुनिकता लेकर लौटे थे।Ó मैने कहा न कि टकराव भरे तजुर्बे का यह शहर है। ठीक एक शायर की तरह , चौदहवीं की रात में शब भर रहा चर्चा तेरा किसी ने कहा चांद है, मैंने कहा चेहरा तेरा लॉर्ड क्लाइव के खयाल में कलकत्ता दुनिया की सबसे बुरी बस्ती थी, लेकिन एक अंग्रेज अफसर विलियम हंटर ने एक रात अपनी प्रेमिका को लिखे पत्र में कहा 'कल्पना करो उन तमाम चीजों की जो फितरत में सबसे शानदार हैं और उसके साथ-साथ उन तमाम कलाकृत्तियों का जो कला के मामले में सबसे ज्यादा हसीन हैं, फिर तुम अपने आप कलकत्ता की एक धुंधली सी तस्वीर देख लोगी। Ó उन्नीसवीं सदी के अंत में चर्चिल ने अपनी मां से कहा था 'कलकत्ते को देखकर मुझे हमेशा ख़ुशी होगी क्योंकि इसे एक बार देखने के बाद दोबारा देखने की जरूरत नहीं रह जाती। ये एक शानदार शहर है। रात की ठण्डी हवा और सुरमई धुन्ध में ये लन्दन जैसा दिखाई देता है।Ó कोलकाता एक बहुवचनी नगर है। एक में अनेक - मोराज(फिल्म संग्रथन) की तरह। कोलकाता अर्धनारीश्वर महानगर है। एक अंग से राजनीति का तांडव है तो दूसरे से दुर्गा उत्सव, रवींद्र संगीत का लास्य-टू-इन-वन। 'भीषण सुंदरÓ या 'दारुण सुंदरÓ जैसे बंगला के विरोधाभासी शब्द युग्म विरोधों के सामंजस्य के प्रतीक हैं या विपरीतों के मिलनोत्कर्ष के? तभी तो 'वर्ग संघर्षÓ के 'भीषणÓ के साथ अमीरी का 'सुंदरÓ मजे में मिल कर रहता है। मुझे नहीं लगता कि सुरुचि, सौंदर्य, कोमलता, दर्शन, भक्ति, कल्पना, प्रेम, करुणा, उदासी जैसी भाव-राशि को कोलकाता ने वैज्ञानिक यथार्थवाद के दुद्र्धर्ष काल में भी कभी त्यागा होगा। शरद और रवींद्र कभी उसके जीवन से परे धकेले न जा सके। रवींद्र और नजरूल या सुभाष और राम कृष्ण की पूजा कोलकाता एक ही झांकी में बराबर से कर सकता है। तभी तो कोलकाता पूरे भारत का कोलाज बना हुआ है। कोलकाता का स्वभाव सुंदरियों की तरह लिरिकल है - गेय है। कोई भी शुभारंभ यहां बिना रीति के नहीं होता। आंदोलन या उग्र रैली (मिछिल) में भी जो नारे लगाए जाते हैं वे बोल कर नहीं गाकर लगाए जाते हैं। अन्याय अत्याचार के नारे भी गेय हैं और उसे 'चलने न देंगेÓ का उद्घोष भी गेय है - 'चोलबे ना, चोलबे नाÓ नारा भी वे ऐसा झुलाते हुए लगाते हैं कि उसे कहीं न गद्य का झटका लगे, न ठहराव आए। कभी आपने सोचा है कि कोलकाता पर लिखी प्राय: सभी कविताएं उसकी प्रशंसा और सामथ्र्य में क्यों लिखी गई हैं, जबकि दिल्ली पर लिखी कविताओं में दिल्ली के प्रति तल्खी, आशंका, भय और निंदा से भरी है? कोलकाता भी एक 'गोपनÓ का नाम है,और बंगाल भी। वह भी अपने मूल्यवान को दबाए-ढांपे हैं, यहां जो कुछ भी मूल्यवान और अप्रतिम है उसे आप सतह पर नहीं पा सकते - फिर चाहे वस्तु हो या व्यक्ति। कोलकाता का पारंपरिक और किसी हद तक वर्तमान वास्तु इसका प्रमाण है कि बाहर से देखने पर भीतर खुलने वाले भव्य और विराट का अनुमान नहीं लगा सकते।
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Wednesday, January 23, 2013
हिंदू आतंकवाद या कांग्रेस का छद्म सेक्युलरवाद
हरिराम पाण्डेय
24 जनवरी 2013
गृहमंत्री महोदय ने कांग्रेस चिंतन शिविर के मंच से एक 'नायाबÓ रहस्योद्घाटन किया कि संघ की शाखाओं में हिंदू आतंकवादी तैयार किये जा रहे हैं। बाद में कुछ नेताओं ने उसे राजनीतिक रंग देने के लिये कहा कि उनका (गृहमंत्री का) मंतव्य था भगवा आतंकवाद से। भगवा आतंकवाद की बात तो हमारे चिदम्बरम साहब अरसे से उठा रहे हैं। अब कांग्रेसी भगवा से दूर जा कर हिंदू आतंकवाद की बात कर रहे हैं। वे तो बात यह भी कर रहे हैं कि महात्मा गांधी हिंदू आतंकवाद की भेंट चढ़ गये। शायद वे यह भी कहें कि इंदिरा जी सिख आतंकवाद की शिकार हुई और राजीव गांधी तमिल आतंकवाद के शिकार बन गये। भारत में आतंकवाद के बढऩे का कारण ही है उसे खांचों में बांट कर परिभाषित किया जाना और तदनुरूप उससे निपटने की कोशिश करना। जहां तक हिंदू आतंकवाद का सवाल है तो माननीय गृहमंत्री महोदय को यह तो मालूम होगा कि इस धरा पर कुल आबादी जितनी है उसमें हर छठा आदमी हिन्दू है। साथ ही हिंदुओं में आतंकवाद की भावना ना के बराबर होती है वरना यह कौम अपनी समस्त वीरता और दौलत के बावजूद सैकड़ों साल तक गुलाम नहीं रहती। इस बात के तमाम ऐतिहासिक, शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध हैं कि भारत की असली खूबी दरअसल इसकी सनातनी विचार धारा में है। इसी खूबी के कारण आज भी उसका अस्तित्व कायम है।
यूनान मिस्र ओ रोमां सब मिट गये जहां से,
अब तक मगर है बाकी नामोनिशां हमारा।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों से रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।
यह हिंदुत्व ही है, जो भारतीय ईसाइयों या मुसलमानों को ब्रिटिश ईसाई और अरबी मुसलमान से अलग करता है और उसे उतनी इज्जत देता है, जितनी वह अपने साथी को देता है। दुनिया में हिन्दू ही एक ऐसी कौम है जो न केवल अवतारों पर भरोसा करती है बल्कि वह इस बात पर भी विश्वास करती है कि समय - समय पर विभिन्न स्वरूपों में भगवान का अवतरण हो सकता है - 'तदात्मानं सृजाम्यहम्।Ó अब तक का इतिहास गवाह है कि हिंदुओं ने कभी किसी पर हमला नहीं किया है और ना अपना धर्म जबरदस्ती मनवाने की कोशिश की है। तैमूरलंग द्वारा हिंदुओं के कत्ल-ए - आम से लेकर गोवा में ब्राह्मïणों का कत्ल और कश्मीरी पंडितों पर जुल्म इनके प्रतिकार के लिये क्या कभी किसी हिंदू संगठन ने कुछ किया? अगर गृहमंत्री जी को मालूम हो तो देश को बताएं।
लोग अगर आतंकवाद को सांप्रदायिक नजरिए से देखने की आदत रखेंगे, तो भगवा आतंकवाद, लाल आतंकवाद, हरा आतंकवाद, हिंदू आतंकवाद, मुस्लिम आतंकवाद, सिख आतंकवाद, तमिल या लिट्टे आतंकवाद आदि मुहावरे बनेंगे और चलाए जाएंगे। यह नजरिया कहां तक उचित है, इस पर बहस होनी चाहिए और सही नजरिए से जो नजारे हमारी नजरों के सामने हैं, उसे देखने की कोशिश होनी चाहिए। इस प्रकार के बयान और विश्लेषण कांग्रेस खुद को सेक्युलर साबित करने के लिए करती है। बाबरी मस्जिद का गिरना कांग्रेसी छद्म सेक्युलरवाद के आस्मानी महल का गिरना था। यह उसके छद्म सेक्युलरवाद का प्रमाण है। अब रही बात संघ और बीजेपी की, तो उसके हाथ में भगवा झंडा है। मुंह में नारा है 'गर्व से कहो हम हिंदू हैंÓ, मगर कांग्रेसियों की तरह उसकी भी हिंदूवाद में निष्ठा नहीं है। इसका प्रमाण है- राम मंदिर का निर्माण नहीं होना। संघ-बीजेपी ने राम मंदिर के नाम पर देश के साधु-संतों से पैसे की उगाही करवाई और मंदिर बनाने के बदले उस पैसे से चुनाव लड़ा। सत्ता हासिल की और राम मंदिर नहीं बनाया। सत्ता में आने के बाद उसने भी कांग्रेसी तुष्टिकरण की राह पकड़ ली। यह संघ-बीजेपी के छद्म हिंदूवाद का प्रमाण है। भाजपा के छद्म हिंदूवाद को बदनाम कर सियासी लाभ लेने का छद्म सेक्युलरवादियों की कोशिश में बदनाम किया जा रहा समस्त हिंदू जाति को। क्या यह उचित है?
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चिंतन नहीं चुनाव शिविर
हरिराम पाण्डेय
22 जनवरी 2013
कांग्रेस का तीन दिवसीय चिंतन शिविर समाप्त हो गया। शिविर में विचार- विमर्श के बाद जो घोषणाएं हुईं वे चारित्रिक तौर पर आत्ममंथन कम और 'युद्ध की हुंकारÓ ज्यादा महसूस हुई। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। क्योंकि चुनाव सिर पर आ गये हैं और 2009 के बाद पार्टी की झोली में ऐसा कुछ नहीं है जिससे वह किसी तरह की खुशफहमी पाल सके। इसके अलावा इधर कुछ दिनों से पार्टी और सरकार दोनों आरोपों , भ्रष्टïाचार और नीतिगत शैथिल्य के महापंक में फंसी हुई है। इसलिये अपने कार्यकर्ताओं में नैतिक बल का संचार करने के लिए इस तरह की सियासी लंतरानियां जरूरी होती हैं। इस आत्ममंथन के क्रम में जो भी हुआ उसकी वैचारिक आपाधापी में पार्टी खुद से एक सवाल करना भूल गयी कि उसमें इतना ज्यादा वैचारिक रीतापन कैसे आ गया है। एक विचारशून्यता उसमें घर कर गयी है। पूरा अधिवेशन वैचारिक तौर पर निराश करता हुआ सा दिखा है लेकिन उसमें एक सुनहरी किरण भी दिखायी पड़ती है कि पार्टी ने हाल के कठोर सरकारी निर्णयों को मंजूरी दे दी, यही नहीं आगे भी सरकार का समर्थन करने का आश्वासन दिया। यही नही, पार्टी ने सरकार को ताकीद की कि वह जनता से बेहतर संवाद बनाये और महिलाओं तथा नौजवानों को अपने सिद्धांतों से प्रभावित कर उन्हें अपने साथ चलने के लिये प्रेरित करे। इनके अलावा चिंतन शिविर में जो भी हुआ वह तो बस राहुल के पद की औपचारिकता पूरी करनी थी। जैसे राहुल पहले भी पार्टी में नम्बर दो थे और उसी हैसियत से सारा काम देखते - करते थे बस उस पर पार्टी ने औपचारिकता की मुहर लगा दी। लेकिन इससे एक बात तो हो गयी कि राहुल को पद के साथ अब जिम्मेवारी भी सौंप दी गयी। अब सफलताओं का श्रेय उन्हें मिलेगा साथ ही असफलताओं की जिम्मेदारी भी उन्हें अपने सर लेनी होगी। अब उन्हें यह सहूलियत हासिल नहीं है कि वे किसी स्थिति में जब चाहें कूद नहीं सकते और वहां से इच्छानुसार बाहर नहीं निकल सकते हैं। अब उनकी नियुक्ति जिस कार्य के लिए हुई है उस काम को यदि वे सही ढंग से अंजाम देते हैं तो यह सब सार्थक होगा, वरना सब व्यर्थ है। शिविर के दौरान आतिशबाजियां एक मजाक और बचकानापन बन कर रह जाएंगी। फिलहाल कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह स्वीकार नहीं कर पा रही कि 'अब के दौर में खेल के नियम बदल चुके हैं।Ó पहले की तरह तुष्टीïकरण और नफरत प्रदर्शन के दिन नयी सियासत में लद गये और अब जो नयी पीढ़ी है उनकी आशाएं - आकांक्षाए भिन्न हैं। आने वाले दिनों में वक्त के हाकिमों के इन नये मतदाताओं का ख्याल करना पड़ेगा ही। राहुल को पद दिया जाना संभवत: इसी नयी पीढ़ी से संवाद का प्रयास है।
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सामाजिक असंतुलन की ओर बढ़ती दुनिया
हरिराम पाण्डेय
23 जनवरी 2013
आज से स्विट्जरलैंड के दावोस शहर में वल्र्ड इकॉनोमिक फोरम की चार दिवसीय बैठक हो रही है। इसमें दुनिया भर के राजनीतिक नेता और आर्थिक विशेषज्ञ भाग ले रहे हंै। इसमें भारत की ओर से कमलनाथ शामिल हुए हैं। दुनिया भर से गरीबी उन्मूलन के लिए काम करने वाली संस्था ऑक्सफेम ने इस इस बैठक के पूर्व जारी अपनी रिपोर्ट 'असमानता की कीमतÓ में कहा है कि धन के संकेंद्रण की वजह से ही गरीबी उन्मूलन के लिए की जाने वाली कोशिशें सफल नहीं हो पा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर की कुल आबादी के महज एक प्रतिशत अमीर लोगों की आमदनी में पिछले बीस सालों में साठ फीसदी की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट का कहना है कि एक ओर जहां दुनिया के सौ सबसे अमीर लोगों ने पिछले साल 240 अरब डॉलर की कमाई की वहीं दुनिया भर के बेहद गरीब तबके के लोगों को महज सवा डॉलर में एक दिन गुजारना पड़ा। रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ एक प्रतिशत लोगों के हाथों में धन का संकेंद्रण आर्थिक गतिविधियों को भी कमजोर करता है और इसका खामियाजा हर व्यक्ति को भुगतना पड़ता है। यह तथ्य हैरत में डाल देता है कि पिछले एक साल में दुनिया भर के 100 सबसे अमीर लोगों ने जितनी दौलत कमाई है उसका एक चौथाई हिस्सा भी दुनिया भर की गरीबी मिटाने के लिए पर्याप्त है। हमारे देश की स्थिति और भी खराब है। हालांकि प्रधान मंत्री ने रविवार को चिंतन शिविर में कहा कि महंगाई घटाने के सरकार के प्रयासों में कमी रही है। पिछले डेढ़-दो दशकों में देश में जिस तरह से अमीरों और गरीबों के बीच की खाई तेजी से बढ़ी और चौड़ी हुई है, उसके कारण गरीबी का दंश और गहरा और तीखा हुआ है। यह किसी से छुपा नहीं है कि देश में एक ओर अरबपतियों की संख्या और उनकी दौलत में दिन दूनी, रात चौगुनी वृद्धि हो रही है, वहीं दूसरी ओर, गरीबों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। असल में, पिछले कुछ दशकों, खासकर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के डेढ़ दशक में देश में जिस तरह से आर्थिक गैर बराबरी और विषमता बढ़ी है, उसके कारण गरीबी अधिक चुभने लगी है। 70 और कुछ हद तक 80 के दशक शुरुआती वर्षों तक देश में गरीबी और अमीरी के बीच इतना गहरा और तीखा फर्क नहीं दिखाई देता था, जितना आज दिखने लगा है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि पिछले डेढ़ -दो दशकों में पारंपरिक अमीरों के अलावा नई आर्थिक नीतियों का फायदा उठाकर एक नवधनिक वर्ग पैदा हुआ है जिसकी अमीरी और उसके खुले प्रदर्शन ने गरीबों और निम्न मध्यम वर्गों में गहरी वंचना का अहसास भर दिया है। इसमें कोई शक नहीं है कि नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में तेजी आई है। इस तेज वृद्धि दर के साथ देश में बड़े पैमाने पर सम्पदा और समृद्धि भी पैदा हुई है। लेकिन इसके साथ ही, यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि यह समृद्धि कुछ ही हाथों में सिमटकर रह गई है। इसका समान और न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हुआ है। इसका नतीजा यह हुआ है कि इस दौर में जहां अमीरों और उच्च मध्यवर्ग की संपत्ति और समृद्धि में तेजी से इजाफा हुआ है, वहीं गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों की स्थिति और खराब हुई है। सच तो यह है कि पिछले एक दशक में अमीरी अश्लीलता की हद तक और गरीबी अमानवीयता की हद तक पहुंच गई है। इसे देखने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं है। आप देश के बड़े महानगरों और शहरों के शापिंग मॉल्स में चले जाइए। वहां देश-दुनिया के बड़े-बड़े ब्रांडों के उपभोक्ता सामानों की मौजूदगी और उनकी चमक-दमक आंखें चौंधियाने के लिए काफी हैं। यही नहीं, आज देश में दुनिया के सबसे बड़े लक्जरी ब्रांड्स और उनके उत्पाद मौजूद हैं और अच्छा कारोबार कर रहे हैं। नतीजा, देश में अमीरों और उच्च मध्यवर्ग के उपभोग स्तर और दुनिया के अन्य मुल्कों के अमीरों के उपभोग स्तर में कोई खास फर्क नहीं रह गया है। आज देश में बड़े अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों की लाखों-करोड़ों की घडिय़ां, कारें, ज्वेलरी, सूट, फोन सहित भांति-भांति के इलेक्ट्रानिक साजों-सामान और यहां तक कि खाने-पीने की चीजें भी उपलब्ध हैं। जाहिर है कि इनके उपभोगकर्ताओं की संख्या और उनके उपभोग की भूख दोनों बढ़ी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यह सब अब दबे-छिपे नहीं बल्कि खुलकर और सबको दिखाकर हो रहा है। यह बढ़ती असमानता दुनिया में सामाजिक असंतुलन पैदा करने का काम कर रही है। असंतुलन से अशांति और आंदोलन का जन्म होगा जो सरकारों तथा समाज के लिए कठिन स्थिति होगी।
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