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Thursday, April 27, 2017

आदिवासियों की रोटी से जुड़ा है हमले का कारण

छत्तीसगढ़ में सी आर पी एफ पर हमला

आदिवासियों की रोटी से जुड़ा है हमले का कारण

हरिराम पाण्डेय

 आदिवासी विद्रोह की जड़ें ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध और आदिवासियों की रोजी से जुड़ी हैं। आज भी जब वैसे हालात होते दिखते हैं तो आदिवासियों में गुस्सा उफनने लगता है तथा निहित स्वार्थी तत्व इसी गुस्से का लाभ उठाते हैं। सोमवार को छत्तीसगढ़ में सी आर पी एफ की टुकड़ी पर जो आक्रमण हुआ उसकी जड़ें इतिहास में पेवस्त हैं। सरकार के खिलाफ या फौजी टुकड़ी के खिलाफ आदिवासियों के गुस्से की पहली घटना फरवरी 1910 में बस्तर रियासत में हुई थी। जब आदिवासियों ने वहां तैनात अंग्रेजी फौज पर औचक हमला कर दिया था। उस हमले को भूमकल यानी भूकम्प कहा गया था। उस घ्टना ने बस्तर को अंग्रेजही हुकूमत के खिलाफ रणक्षेत्र में बदल दिया। इसके लगबग 100 साल के बाद 2010 में दक्षिण बस्तर के छत्तीसगड़ के सुकमा जंगल में नक्सलियों ने सी आर पी एफ की टुकड़ी पर हमला कर 25 जवानों को मौत के घाट उतार दिया और उनके असलहे लेकर फरार हो गये।

हालांकि गृहमंत्री ने आश्वासन दिया है कि हमले के कारणों की पड़ताल कर उन्हें खत्म करने की कोशिश की जायेगी पर ऐसे आश्वासन केवल देने के लिये होते हैं और अक्सर देते सुने जाते हैं।  

बस्तर के बारे में जो सबसे उलझनभरी हकीकत है वह कि बस्तर कभी भी प्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण में नहीं आया। पूर्ववर्ती बस्तर रियासत छत्तीसकगड़ राज्य के अंतर्गत था। लगभग 13000 हजार वर्गमुल की इस रियासत की आबादी 3 लाख 6 हजार 501 थी। यहां गोंड आदिवासियों की आबादी सबसे ज्यादा थी और राजा आदिवासी नहीं थे , वे राजपूत हुआ करते थे। दंतकथाओं के अनुसार बस्तर रियासत की स्थापना करनेवाले राजपूत राजा 14 वीं सदी में  वारांगल से मुसलमानों द्वारा खदेड़े गये थे। वे बस्तर आये आये ओर आदिवासियों की देवी दंतेश्वरी के मुख्य पुजारी हो गये। यहां दशहरा अजीब ढंग से मनाया जाता है। रिवाज है कि दशमी के दसरे दिन आदिवासी राजा को कैद कर लेते हैं ओर दूसरी सुबह उनहें आजाद कर देते हैं। यह आदिवासियों और राजा में एक खास सम्बंध भी दर्शाता है।

 बिटिश हुकूमत के पहले यहां मुगलों ओर मराठों का आधिपतय था पर जंगल होने की वजह से हमेशा अलग थलग रहा। सेटृल प्रॉविंस के डेपुटी कमिश्नर विल्फ्रेड ग्रिगसन ने बस्तर को ‘भारतीय इतिहास का अवरुद्दा जलाशय कहा है।’ 1818 में जब अंग्रेजों पूरे मध्य बारत को मरालठों से मुक्त कराया तो वे बस्तर से राजनीतिक समझौते करने लगे ओर 1853 में बस्तर परोक्ष रूप से अंग्रेजी शासन के तहत आ गया। अंग्रेजों ने बस्तर में तितयफा दखलंदाजी शुरू कर दी​। पहला कि, उनहोंने नयी वनसम्पदा नी​िति लागू कर दी। दूसरा कि, आदिवासियों को उनकी बूमि से हटाने लगे ओर तीसरा कि, राजा को हटाह कर अंग्रेज अफसरों या देसी अफसरों को राज्य का जिम्मा देने लगे। इसके लिये बहाना बनाया गया कि बस्तर में नरबलि रोकने के लिये यह सब किया जा रहा है। लेकिन कभी इसकी जांच नहीं हुई। महत्वपूर्ण वजह यह थी कि बस्तर में लौह अयस्क तथा अन्य अयस्क प्रचुर मात्रा में थे साथ ही बेशकीमती लकड़ियां थीं जिनपर कब्जा कर उनहें लूटना था। 1876 में अंग्रेजों ने बस्तर पर पूरी तरह कब्जा कर लिया और राजा नाम मात्र के लिये रह गये। इसके बाद आदिवासियांें का विद्रोह आरंभ हुआ। 1876 और 1910 में दो महत्वपूर्ण विद्रोह हुये। 1876 के विद्रोह का कारण था कि उस साल प्रिंस ऑफ वेल्स बारत आये थे आंेर उनकी बस्तर के राजा से मुलाकात होनी थी। आदिवहसियों को लगा कि यह राजा को कैद करने की साजिश है और उन्होंने विरोध में हथियार उठा लिये। राजा मिलने नहीं जा सके। लेकिन इसमें बहुत कम खून खराबा हुआ। इसके बाद 1910 में विद्रोह हुआ पर उसे कुचल दिया गया। इसके बाद जंगलों पर कब्जा शुरू हुआ ओर आदिवासियों की रोजी छिनी जाने लगी। लौह अयस्क के भंडारों की खुदायी होने लगी ओर उन्हें पट्टे पर उठाया जाने लगा। राजा को हटाया जाने लगा। राजा जो आदिवासियों के पूज्य थे उनहें हटाकर अफसरों को गद्दी सौंपी जाने लगी।

विद्रोह बढ़ता गया पर जंगलों को लेकर ब्रिटिश नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया। जंगलों और खानों पर समझौते होते रहे उन्हें पट्टे पर दिया जाना जारी रहा। 1923,1924, 1929 और 1932 मे पुराने पट्टों का नवीकरण हुआ। उदाहरण के तोर पर बस्तर में लौह अयस्क निकालने के लिये टाटा को लाइसेंस दिये गये। जंगल की जमीन को भी आरक्षित किया जाने लगा। बस्तर के पॉलिटिकल एजेंट के प्रशासक ने 1940 में इस जंगल आरक्षण के खिलाफ रिपोर्ट भेजी थी जिसमें कहा गया था कि आदिवासी इसे पसंद नहीं करते हैं, पर कोई बदलाव नहीं आया। अंग्रेजों ने आदिवासियों की सबसे बड़ा रोजी रोटी का साधन बीड़ी पत्ता तोड़ने पर भी रोक लगा दी। वह रोक आज भी कायम है। यहां तक कि उन्होंने आदिवासियों से मवेशियों को चराने का भी शुल्क लेना शुरू कर दिया।

 जिन्होंने ब्रिटिश भारत का इतिहास पढ़ा है उन्हें ज्ञात है कि ब्रिटिश शासन के दौरान कई भारतीय समूहों ने विद्रोह किया था। कई आदिवासी समूहों ने हथियार अठाये थे ओर इतिहासकारों ने उनके कारणों की समीक्षा भी लिखी है। आजादी के बाद ब्रिटिश शासन की कई नीतियां थीं ​जिन्हें ना संशोधित न रद्द किया गया ओर वे यथावत लागू रहीं। लिहाजा आदिवासियों का गुस्सा कायम रहा या भड़कता रहा। नक्सलपंथी या माओवादी उसी गुस्से का शोषण करते रहे। यहां दो सवाल सामने हैं, पहला कि , क्यों बस्तर रियासत आदिवासी संघर्ष का बारत में सबसे बड़ा केंद्र बना रहा और दूसरा कि क्यों इस छोटी सी रियासत में इतना खून खराबा हुआ? 

इसके दो कारण हैं। पहला कि, बस्तर में अंग्रेजों ने सबसे ज्यादा हस्तक्षेप किया ओर असकी समपदा का शोषण किया तथा दूसरा कि आजादी के बाद सरकार ने नीतियों में कोई संशोधन नहीं किया ओर इससे वह आंदोलन तथा विद्रोह चेहरे बदल बदल कर उभरते रहे। आदिवासियों का विद्रोह इस समय माओवाद के नाम से दिख रहा है। इतिहास मे. इेसे कई अदाहरण देखने को मिलते हैं कि कैसे अंग्रजों ने ग्रामीण भारत में बेचौनी पैदा कर आतंकवाद की ​िच्ंगरी को हवा दी। 18वीं और 19 वीं शताब्दी में देश में सबसे ज्यादा आदिवासी आंदोलन हुये। इतिहासकार कैथलीन गोख का कहना है कि ‘ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीय ग्रामीण जीवनशैली में सबसे ज्यादा अवरोध पैदा किया, यहां तक कि मुगलों से भी ज्यादा।’ इतिहासकारों ने तो यह भी बताने की कोशिश की है कि भारत सरकार ने औपनिवेशिक काल की नीतियों, खासकर , जंगल से सम्बंधित नीतियों, में संशोधन नहीं किया ओर आदिवासी संघर्ष कायम रहा खासकर के बंगाल, ब्गिहार , झारखंड ओर मध्यप्रदेश के वे इलाके जहां प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन था। बस्तर या छत्तीसगड़ में जो वर्तमान नक्सल आंदोलन या विद्रोह है वह भी इसी का कारण है। यह आदिवासी विद्रोह का ताजा अवतार है। इससे जाहिर होता है कि वर्तमान सरकार भी उन कारणों की पड़ताल कर उन्हें खत्म करने में सक्षम नहीं हो पा रही है। आज हमारीण् सबसे बड़ी मजबूरी है कि केंद्र सरकार या छत्तीसगड़ सरकार के पास कोई ऐसा नहीं है जो आदिवासियों को विश्वास में लेकर बात कर सके। जो उनके नेता बने बषैठे हैं वे बाहरी लोग हैं और वे लोग युन्नान, कम्बोडिया और नक्सलबाड़ी से दीक्षित लोग हैं जिनमें आदर्श कम और स्वार्थ ज्यादा है। जो लोग अमन की काहेशिश करते हैं उन्हे ‘चुप’ कर दिया जाता है। आज सरकार या तो ताकत दिखा रही है या राजनीतिक जोड़ तोड़ में लगी है।

यहां सबसे जरूरी है कि सरकार दूरदर्शिता दिखाये ओर पुराने राजप्रमुखों के वारिसों को सामने लाकर आदिवासियोंसे वार्ता शुरू करे। इससे माओवादी ततव अलग थलग पड़ने लगेंगेनितियों में सुधार हो और रोजी रोटी का मुकममल आश्वासन दिखायी पड़ने लगे। आंदोलन खुद खत्म हो जायेगे।   

रक्षकों से मुकाबला?

रक्षकों से मुकाबला ? 
अगर सियासती बड़बोले नारों को दरकिनार  कर दें तो हमारा देश इन दिनों गंभीर सामाजिक- आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है। यहां रिजगार का अभाव है, कृषि दिनोंदिन पिछड़ती जा रही है और हम गो रक्षा , मूर्तियों और प्रेमी जोड़ों के विहार पर बहस कर रहे हैं, उसे रोकने में लगे हैं। गायों के आधार कार्ड बनाये जायँ या नहीं इन्हीं सब बातों में उलझे हुए हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ लगातार सेवा भावी लोगों से अपील कर रहे हैं कि गैरकानूनी कसाई घरों के विरुद्ध लड़ाई को जारी रखें। इसी में से कुछ लोग छेड़खानी करनेवाले मजनुओं के खिलाफ गोलबंद हो गए हैं और सहमति के   प्रेम संबंधों से जुड़े युगलों को भी परेशान करने का अधिकार ले बैठे हैं। अयोध्या के विवादित ढांचे के अभियुक्तों में से कुछ ने तो यह घोषणा कर दी है कि उनका यह कार्य उतना ही गौरवशाली है जितना देश स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले नौजवानों का था। भारत अपनी " आन- बान और शान की रक्षा करने वाले , भ्रष्टाचार से दो- दो हाथ करने वाले और राष्ट्र की प्रतिष्ठा बचाने वाले " रक्षकों की तलाश में था जो उसे मिल गए। दिल्ली में पशु व्यापारियों की पिटाई होने लगी और पुलिस ने पीड़ितों को " पशुओं से क्रूरता" के आरोप में जेल भेज दिया। जैसा कि ऐसी हर घटना में होता है इन रक्षकों ने औरों के उत्प्रेरित - प्रेरित कर रक्षकों की जमात बना ली। इन रक्षकों के कारनामो से कई जगह आतांक व्याप गया , मुस्लिमों को धमकियां दी जाने लगीं, यू पी में तो कश्मीरियों के खिलाफ पोस्टर- बैनर लग गए। उन्हें चेतावनी दी जाने लगी कि यहां से तत्काल भागो वरना परिणाम झेलना होगा। बॉलीवुड का एक गवैया तो मुस्लिमों के खिलाफ गाने गाता घूमने लगा। इस हालात से प्रोत्साहित कश्मीर में तैनात हमारे जवान भी कुछ लोगों को वहां मारने पीटने लगे और पाकिस्तान मुर्दाबाद कहने के लिए बाध्य करने लगे। यही नही पिछले साल हमारे प्रधान मंत्री जी हठात नोटबंदी की घोषणा कर दी जिससे अर्थ व्यवस्था में शामिल 86%  करेंसी बेकार हो गई। ... और इस साल वित्त मंत्री अरुण जेटली ने  वित्त विधेयक 2017 में संसद में बगैर बहस के 33 संशोधन घुसा दिए। यह रक्षक भाव का ही रूप है क्योंकि इसे कानून की मंजूरी नहीं मिली थी। ये रक्षा कर्म वास्तव में विधि सम्मत नही होते और ये संभावित चोर दरवाजों का लाभ उठाते हैं। अब आधार कार्ड के ही मसले को देखें, इसमें कई कमियां हैं लेकिन संसद से मंजूरी दिला कर इस दोषपूर्ण प्रणाली को मानने के लिए बाध्य किया जा रहा है। राजनीतिक दलों द्वारा धन उगाही के क़ानून में संशोधन कर उसे कम पारदर्शी बना दिया गया।  
इन रक्षा कर्मों को उचित ठहराने के लिए तरह  तरह की कहानियां प्रचारित की जा रहीं हैं। उत्तरप्रदेश चुनाव ने तो अवांतर सत्य का नया प्रतिमान गढ़ दिया। लोगों को यह बताया जा रहा है तथा मानने पर बाध्य किया जा रहा है कि इस बहुमत का अर्थ नोटबंदी का समर्थन है। जन साधारण को यह समझाया जा रहा है कि धर्म और जाति आधारित मतदान अब पुराने दिनों की बात हो गई। भा ज पा को बहुमत का अर्थ देश भर में मुस्लिम और दलित विरोध है। ये रक्षक धीरे धीरे फैलते जा रहे हैं और संविधान उनकी ओट होता जा रहा है।प्रतिक्रियावादी खबरों के ताबड़तोड़ प्रचार से सही बात समझ पाना कठिन हो गया है । ऐसे में सांप्रदायिकता के विरूद्ध खड़ा होना मुश्किल होता जा रहा है। इसासे साफ पता चलता है कि राजनीतिक विरोध समाप्त हो चुका है और समाज के रूप में हम निर्बल होते जा रहे हैं। कुछ लोग तो यह भी कहने लगे हैं कि लोकतंत्र के योग्य हमारा समाज है ही नहीं। कोई कुछ नहीं बोल रहा है। अगर कोई कुछ कहता है तो उसकी बोलती बंद कर दी जाती है । यह बहुत दुखद स्थिति है। हालात ऐसे होते जा रहे हैं कि    कुछ दिनों के बाद देश भर में मुनादी होती सुनी जाएगी कि, ( भारती जी से क्षमा याचना सहित) 
खलक खुदा का , मुलुक बाश्शा का
हुकुशाहर कोतवाल का 
हर खासोआम को आगाह किया जाता है कि 
खबरदार रहें 
बच्चों को सड़क पर ना जाने दें
क्योकि रक्षकों का गिरोह देश गौरव रक्षा के लिए 
सड़कों पर निकल पड़ा है 
शहर का हर बशर वाकिफ है 
कि मार खाते भले आदमी को 
और अस्मत लुटती औरत को 
और गाय लेकर जाते लोगों को 
बचाने की बेअदबी ना कि जाय ।

Wednesday, April 26, 2017

चुप्पी जवाब नहीं है

चुप्पी जवाब नहीं है

आपको याद है कि हम हिंदुओं ने पिछली बार कब पूछा था कि

हम कौन थे क्या हो गये हैं, और

क्या होंगे अभी

आओ विचारें मिलकर ,

यह समस्याएं सभी

 

शायद नहीं। पिछली बार यह बात डा. बी आर अम्बेडकर ने पूछा था। हिंदू समाज की अनेक कुरीतियों, रस्मों -रिवाजों, मान्यताओं  से उत्पीड़ीत समाज के कुछ अंगों की वेदना से उन्होंने देश के चैतन्य और बुद्धिजीवी समाज को अवगत कराया और इस पर विचार करने के लिये उनहें बाध्य कर दिया कि वे परम्पराओं की गहन जांच करें। उनके बाद किसी ने भी सामूहिक स्वार्थ की ओर नहीं देखा। यह निहायत दुखद विषय है क्योंकि जब एक समाज खुद अपने बारे में बुनियादी सवाल नहीं उठायेगा तो उसका विकाग्स रुक जायेगा। सामूहिक अहं की बौद्धिक समीक्षा निरुत्साहित कर हमने अपनी कमियों को छुपाने की को​शिश शुरू की ओर बाद में यह एक मानसिक रोग बन गया। गर्व से कहो कि हम हिंदू हैं या नवीन भारत या डिजीटल भारत जैसे निर्रथक नारों से आवेशित हमारे समाज यह पूछने की हिम्मत खत्म जा रही है कि ‘हम क्यों जाति पांति में उलझे हैं? या, एक समुदाय किसी अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति क्रोधित क्यों रहता है?’ 
पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार को कूच बिहार में एक जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म के नाम पर लोगों को बांटना बंगाल में नहीं चलेगा। गनीमत है कि बंगाल में कोई तो बोल रहा है पर देश भर में चुप्पी है।
एक लोकतांत्रिक समाज में जनता को अपने साथ रहनेवाले लोगों की हिफाजत की जिम्मेदारी भी होती है। अगर साथ रहने वाले लोगों के हकूक को लगातार मारा जाता रहेगा, उनसे दुराव रहेगा और उनसे बुनियादी मुखालफत पैदा करने कोशिश दिखती रहेगी तो तय है कि उनमें भी विरोध भाव बढ़ेगा और नतीजा आपसी दुश्मनी के रूप में सामने आने लगेगा। अगर गौर करें तो आज हमारा समाज अपनी एकजुटता खोता जा रहा है। यह एक अीति दुखद तथ्य है क्योंकि हम एक अति गौरवशाली इतिहास तथा दर्शन के वारिस हैं।

संतान उनकी आज यद्यपि

हम अधोगति में पड़े

पर चिन्ह उनकी उच्चता के

आज भी कुछ हैं खड़े

हम यह नहीं देख रहे। हमारे नेता 19 शताब्दी से पीछे की ओर नहीं जा पा रहे हैं। यह सदी भारतीय नवजागरण की शुरूआत की सदी थी। हमारे नेता यहीं से सवाल उठा रयहे हैं जो 20वीं सदी के मध्य तक आकर खत्म हो जाते हैं। इसके बाद एक मौन है। आज का हिंदू समाज दलितों, महिलाओं ओर अल्पसंख्यकों के विरूद्ध कई संगीन मामलों में सह अपराधी है। सहअपराधी इसलिये कि पूरा समाज उन स्वघोषित ‘रक्षकों’ के उन्मादपूर्ण कार्यों पर चुप है। ये ‘रक्षक’ ही तय कर रहे हैं कि हिंदू धर्म का कानून क्या है , नैतिकता और इसके तहत किसे दंड दिया जाय। इन्हें शक्तिशाली राजनीतिक संरक्षक मिल जाते हैं ओर उनसे मिली या उनकी भगत पुलिस की मदद मिल जाती है। ये  ‘रक्षक’ खुद ही कानून बनाते हैं , खुद ही उसके आधार पर फैसला करते हैं और उसी के आधार पर दंड भी दे देते हैं।

बहते हुये खून की व्याख्या

कानून से परे कहा जायेगा

देखते देखते

वह हमारी निगाहों और सपनों में

खौफ बन कर समा जायेगा

देश के नाम पर

जनता को गिरफ्तार करेगा

जनता के नाम पर

देश बेच देगा

 

इन रक्षकों के क्रिया कलापों की खबरें रोज अखबारों में देखने को मिल जातीं हैं। हमारे राजनीतिक जीवन में जो असमान्यता थी वह सियासत की राह बन गयी है। लोकतंत्र अपने उद्देश्यों से भटकता दिख रहा है। कानून का भय खत्म होता जा रहा है ओर इसके लिये बहुत हद तक हमारे राजनीतिज्ञ दोषी हैं तथा जनता चुप है। चालू महीने में अलवर में कथित गौ रक्षकों ने 15 अल्प संख्यकों पर हमले किये। ये हमले केवल इसलिये किये गये कि वे गायों को बाहर भेजते थे। जिनलोगों पर हमले किये गये उनमें एक मारा गया और इक अस्पताल में है। राजस्थान के गृहमंत्री इन हमलों की निंदा करने की बजाय यह कहते सुने गये कि चूंकि राजस्थान में गायों की तस्करी पर रोक है इसलिये कनफ्यूजन में ये हमले हुये। जब कि हकीकत यह थी कि जिनपर हमले किये गये उनके पास गायों को राज्य से बाहर भेजने के कागजात थे। अब मंत्री महोदय की बात से अदालत की भी हेठी हो रही है क्योंकि कानून सम्मत काम नहीं करने दिया गया। क्योंकि अगर कोई आदमी कानून तोड़ता है तो उसे अदालत के सामने पेश किया जाना चाहिये ताकि अदालत कानून की राह अख्तियार कर सके। लेकिन कानून को ताक पर रख दिया गया। इन दिनों समाज के दो अतिसंवेदनशील वर्गों पर हमले हो रहे हैं … और हम चुपचाप देख रहे हैं। ये रक्षक हमारी सभ्यता, संस्कृति ओर कला पर हमले कर रहे हैं ओर चुप हैं। विख्यात जर्मन दार्शनिक एवं मार्टिन निमोलर ने पहले नाजियों का समर्थन किया ओर जब उनहें लगा कि वे गलत हैं तब विरोध करने लगे तथा जीवन के अंतिम दिन उन्हें यातना गृहों में गुजारने पड़े। सामाजिक पीड़ा पर उन्होंने लिखा,

पहले वे कम्युनिस्टों के लिये आये

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था।

फिर वे ट्रेड यूनियनों के लिये आये

मैं कुछ नहीं बोला

क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था।

फिर वे आये यहूदियों के लिये

और मैं कुछ नहीं बोला

क्योकि मैं यहूदी नहीं था।

फिर वे मेरे लिये आये

तबतक कोई नहीं बचा था

जो मेरे लिये बोलता।

बोलना जरूरी है इसलिये कि ये स्वयंभू रक्षक आम आदमी की जिंदगी की जद में घुसने लगे हैं। हमें अपने समाज के बारे में सवाल करने होंगे हमें अपने साथी के बारे में बात करनी होगी।

 

 

Monday, April 24, 2017

जो चुका रहे हैं जंग की कीमत

जो चुका रहे हैं जंग की कीमत

यहां तक कि जो कट्टर भारत समर्थक हैं वे भी मानने लगे हैं कि इस बार कश्मीर में बहुत कम मतदान इस बात का गणितीय प्रमाण है कि वहां वर्तमान राजनीतिक शैली प्रभावहीन हो चुकी है। अब यहां सवाल उठता है कि वह क्या है जिसने इन कुछ वर्षों में इतना बदल कर रख दिया या क्यों मुख्यधारा की राजनीति में जन- गण का भरोसा खत्म हो गया?या, फिर कश्मीर में रोज इसके मौके घटते जा रहे हैं, आखिर क्यों? जो भारत ओर बारतीयता के कट्टर समथर्थक हैं उनका मानना है कि कुछ दिन पहले बडगाम जिले में एक खूनी उपचहुनाव हुआ और असर श्रीनगर में दिखा। वहां की सड़कें सूनीं थीं और अस पर बम टपक रहे थे। जो लोग अब तक देश के नाम से लम्बी लम्बी बातें कर रहे थे पर उनमें इमानदारयी तथा संवेदनशीलता कायम थी वे खुद को कुंठित महसूस कर रहे थे क्योंकि जन्होंने वहां के लोगों से बातें की है ओर जो नस्वीरें मीडिया के जरिये देखने को मिली हैं उन में कश्मीरी आवाम की आंखों निराशा स्पष्ट दिख रही थी। ये सब क्या हो रहा है? उपचुनाव के कुछ पहले का दृश्य याद करें। उपचुनाव से पहले , फकत तीन दिन पहले , सुरक्षा बलों ने बडगहाम में फायरिंग की थी और इसमें तीन लोग मरे थे। इसे लो कर लोग शोकमग्न थे ओर क्रोधित भी। 9 अप्रैल को वहां मतदान हुआ और महज 7.4 प्रतिशत मतदान हुआ और जिस दिन पुनर्मतदान हुआ उस दिन यह अनुपात केवल 2 प्रतिशत पर आ गया।  इन दिनों कश्मीर में राजनीति से दुराव को जानने के लिये वहां जानने की जरूरत नहीं है। टी वी पर कश्मीरी नेताओं को देखें, उनकी शक्ल देखें , आंखों को देखें और उनकी बॉडी लैंग्वेज देखें तथा सब कुछ समझ में आा जायेगा। लोग इसे दिल्ली की दबंगई का नतीजा बता रहे हैं। साफ दिख रहा है कि दक्षिणपंथी मुख्यधारा की राजनी​ति भारत पर असर डाल रही है, देश के विबिनन बागों में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों पर हमले हो रहे हैं खास कर राजषस्थान ओर अत्तरप्रदेश में और कश्मीर में नफरत पैदा हो रही है। बात यहां तक बड़ गयी है कि नयी दिल्ली में सांेमवार को आयोजित नीति आयोग की बैठक में उपस्थित कश्मीर की मुख्यमंत्री मुफ्ती महबूबा ने अन्य मुख्य मंत्रियों से अपील की है कि वे इस मामले को देख्घें तथा अपने राज्यों में छात्रों पर हमले रोकें। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बी उपस्थित थे। महबूबा ने बैठक में यह कहा कि ये बच्चे पढ़ने के लिये घर बार छोड़ कर आये हैं उनहें शांतिपूर्ण माहौल उपलब्ध करायें ताकि वे पढ़ाई में ध्यान लगा सकेंनिति आयोग की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक प्रधानमं1ा नरेंद्र मोदी ने बी महबूबा की बातों का समथर्थन करते हुये मुख्यमंत्रियों को निर्देण दिया है। कि वे कश्मीरियों की सुरक्षा पर ध्यान दें। यहां यह बता देना प्रासंगिक हसोगा कि हाल में राजस्थान के मेवाड़ में दो कश्मीरी छात्रों की पिटाई हुई, पिलानी में एक शोधार्थी को धमकियां दी गयीं और मेरठ में तो कश्मीरियों उत्तर प्रदेश छोड़ देने के पोसटर लगाये गये। हाल में पुणे में एक कश्मीरी छात्रा ते मामले में तो कश्मीर सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा था। इन ाटनाओं से कश्मीर में देश के प्रति दुराव बड़ रहा है और निहित स्वार्थी कट्टर पंथी जिहादियों कश्मीरी नौजवानों की बावनाओं को भड़काने का बेहतर मौका हासिल हो रहा है। नतीजतन कश्मीर कट्टरपंथी इस्लाम के कारण एक युद्ध क्षेत्र में बदलता जा रहा है। इसके मनोविज्ञान को देखें तो समझ में आयेगा कि यह इस्लाम का वही स्वरूप है जो पेरिस में के लिये जिममेदार है या फिर जितने बी जिहादी आतंकवाद है उनकी जड़ में जो मनोभाव होते हैं वही यहं बी दिखने लगे हैं। जब तक हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे तबतक शांति वार्ता के लिये पहल नहीं हो सकती है। जिसतरह पूरी दुनिया में इस्लाम के कट्टरपंथी, उग्रवादी स्वरूप को तबतक खत्म नहीं किया जा सकता जब तक मध्यमार्गी मुसलमान इसे सहयोग देते रहेंग। यह सहयोग कई कारणो से मिलता है मसलन जाति, आस्था या फिर बिरादरी के प्रति खास प्रकार की करुणा इत्यादि। जो किशोर या नौजवान कश्मीर में फौज पर पत्थर फेंक रहे हैं वे इतने कमउम्र हैं कि शायद ही राजनीति समझें लेकिन उन्हें धर्म और समुदाय के नाम पर बरगलाकर हथियार बनाया जा रहा है। जिन हाथों में कलम या किताबें होनी चाहिये थीं उन्होंने पत्थर उठा लिये हैं। यहां यह बता देना जरूरी हे कि सरकार कश्मीर की इस ताजा समस्या को देश, भारत राष्ट्र, से अलगाव के रूप में चित्रित कर रही है और राजनीति की संज्ञा दे रही है यह भी भ्रामक है। खबर है कि वहां हर जगह समुदायों में एक वीडियो दिखाया जा रहा है जिसमें हिजबुल मुजाहिदीन का नया नेता जाकिर रशीद बट नौजवानों से अपील करता है कि ‘वे कश्मीर के लिये नहीं इस्लाम की श्रेष्ठता के लिये लड़ रहे हैं। जब भी हम पत्थर या बंदूक उठायें तो हमारा इरादा कश्मीर के लिये लड़ाई का ना हो बल्कि हम इस्लाम के लिये मौत से जूझ रहे हैं क्योंकि इस्लाम में राष्ट्र या लोकतंत्र कुछ नहीं है जो है वह इस्लाम है।’ कश्मीर के किशोरों को बेहद चालाकी से एक ऐसी राह पर डाला जा रहा है जहां से वापसी का सफर नामुमकिन है। जरा सोचें, केवल मामूली इस्लाम ने 1947 में भारत विभाजन के दौरान क्या किया था तो यह कट्टरपंथी इस्लाम क्या करेगा इसकी कल्पना कर सकते हैं। अब वहां शांति केवल बातचीत से नहींी हो सकती है बल्कि हमें नयी रणनीति अपनानी होगी। अब यह ऐतिहासिक समस्या नहीं रह गयी है।