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Wednesday, August 16, 2017

मोदी जी का लाल किले से चौथा भाषण

मोदी जी का लाल किले से चौथा भाष

लाल किले की प्राचीर से प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को राष्ट्र को संबोधित किया. 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व का यह अंतिम से पहले वाला  भाषण था. मोदी जी राजनितिक कला में भाषण कला में माहिर हैं.इस बार का भाषण उनके पिछले भाषणों से टोन और अन्तर्वस्तु से भिन्न था. अगर 2014 का उनका पहला भाषण  प्रेरणादायी और अच्छे इरादों से लबालब था तो बीच के दो भाषण योजनाओं की घोषणा और परिवर्तन के अजेंडा को आगे बढाने वाला था तो यह भाषण अपेक्षाओं – उम्मीदों को दुबारा जगाने तथा मतदाताओं को यह बताने वाला था कि क्या किया गया और अगले दो वर्षों में क्या किया जाना है. 2014 में अपने कार्यकाल के शुरूआती वर्ष में मोदी जी ने खुद को  “ अच्छे दिन ”   के वायदे को पूरा करने जैसी बातों पर केन्द्रित रखा तो इसबार उन्होंने उन उस बिम्ब योजना को समझाने कि कोशिश की  कि इसका सही अर्थ क्या होता है और उन्होंने वह पैमाना पेश करने का प्रयास किया जिससे अच्छे दिन कि पैमाइश कि जा सके. उन्होंने बहुत ही चालाकी से इस लक्ष्य को पूरा करने कि समय सीमा 2022 भी तय कर दी ,  यानी स्वतन्त्रता कि 75 वीं वर्षगाँठ तक की प्रतीक्षा अच्छे दिन की.  मतलब यह कहें कि यदि अच्छे दिन देखने हैं तो  अगले चुनाव में भी उन्हें विजयी बनाएं. अब बिजली , सड़क , पानी नारा नहीं रहा. अब नया सपना दिखाया जा रहा है पक्का घर , बिजली , पानी क्योंकि  सड़क का सपना तो अधिकाँश राज्यों में  तेजी से साकार हो रहा है.इस बार के भाषण में एक महत्वपूर्ण बात यह दिखी कि मोदी जी ने “ सबका साथ , सबका विकास ”  वाला जुमला त्याग दिया. इसके समर्थन में बस उन्होंने केवल तीन तलक वाली बात यह कह कर उठायी कि महिलायें इससे संघर्ष कर रहीं हैं. किसी भी विवादास्पद मामले पर उन्होंने जोर से कुछ नहीं कहा  , चाहे वह देशी नीति से जुडा हो  या विदेशी नीति से जुड़ा हो. उन्होंने उन मामलों को भी उठाया जिसमें  उनकी सरकार का सर नीचा होता है , लेकिन उन्होंने बड़ी सफाई से उन मामलों का ज़िक्र भर कर के छोड़ दिया. उन्होंने गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में लापरवाही के कारण  हुई घटना को दबी आवाज़ में स्वीकार किया , देश के विभिन्न भागों बाढ़ के विनाश का भी ज़िक्र किया और उन्होंने हल्के से यह भी माना कि नोटबंदी  से जितने फायदे की उम्मीद थी उतना फायदा नहीं हुआ. उन्होंने कालेधन जमा करने वालों को पकड़ने वाली अपनी बात को बड़ी चालाकी से मोड़ कर यह कहना शुरू कर दिया कि कालाधन बैंकों में आ गया है और वे टैक्स दे रहे हैं.

   देशवासिओं- भाइयों और बहनों  , यह स्मार्ट पोलिटिक्स है. कोई भी राजनीतिज्ञ जो वादा करता है या लक्ष्य को पूरे करने कि कोशिश करता है वह पूरा हो ही जाय, खासकर भारत जैसे देश में जहां भ्रष्टाचार का बोलबाला हो और पिछले दरवाज़े से काम कराने कि आदत हो , वैसे देश में  यह ज़रूरी नहीं है . इस लिए चालाक राजनीतिज्ञ के लिए अच्छा यह होता है कि जो हासिल किया जा चुका है उसपर आधारित कर कुछ नया करे और बदलाव के मुद्दे पर फोकस डाले ना कि मूल वायदे को मथता रहे. पूरे भाषण में जो बात बिलकुल स्पष्ट थी वह थी कि प्रधानमन्त्री जी प्रधान सेवक से राजनेता हो गए और यह बताने कि कोशिश करते रहे कि प्रधानमंत्री पर दोष नहीं लगाए जाने से अलग है यानी उस पर आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने बड़ी सफाई से मतदाताओं को यह भी बता दिया कि 2019 में जब वे वोट डालने  जा रहे हों तो उनके कार्यकाल के बारे में कैसे तय करें.

   जिन्होंने भाषण सूना वे मोदी जी के मुहावरे को सुन कर दांतों टेल ऊँगली दबा रहे होंगे. उन्होंने दिव्य,भव्य भारत का जो आकर्षक चित्र खींचा और स्वराज से ध्यान सुराज , भारत छोड़ो से भारत जोड़ो तक ले गए , चलता है के बदले देश बदल रहा है  यह सुन कर उनके भाषण कला की दाद देनी होगी.  उन्होंने जातिवाद और सम्प्रदायवाद को ख़त्म करने का आह्वान किया. जितनी बातें उन्होंने कहीं वह सब उनके पहले के  भाषणों  में एक तरह से पीछे जाकर संशोधन की  तरह था.  अगर मोदी जी के भाषण का राजनितिक – मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाय तो  साफ़ दिखेगा कि वे 2019 के चुनाव की योजना शुरू हो चुकी है. इसबार के भाषण में रोजगार और अर्थव्यवस्था के विकास की  चकाचौंध नहीं था बल्कि इस बार नोटबंदी और कालाधन था. वे नोटबंदी पर बोले, 3 लाख करोड़ रूपए के काले धन के बैंकों में जमा होने कि बात कह गए , बेनामी सम्पति के बारे में बोलते रहे. इससे साफ़ ज़ाहिर है कि नोटबंदी से तुरत लाभ नहीं हुआ तो क्या है लेकिन मोदी काले धन के शत्रु बने रहेंगे. पूरे भाषण में मोदी यह बताने कि कोशिश करते रहे कि बदलाव आ रहा है बेशक तेज नहीं है. हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं अतेव 2019 में साथ मत छोडिये. नौकरियों के बारे में उन्होंने यह कहते हुए गोल पोस्ट बदल दिए कि कौशल सिखा कर स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जा रहा है और गरीब भी रोजगार देनेवाले बनते जा रहे हैं. कश्मीर के मामले में उनकी जुबान से शहद टपक रही थी. उन्होंने कहा कि जंग दिलों को जीतने कि चल रही है यहाँ गोली और गाली से काम नहीं चलेगा. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आतंकियों और पत्थरबाजों के आगे घुटने टेकेंगे. पकिस्तान के सम्बन्ध में प्रधानमन्त्री जी की  बात 2016 के भाषण से बिलकुल उलटी थी. पिछली बार उन्होंने गिलगित – बल्तिस्तान , बलोचिस्तान इत्यादि के बारे में जमकर कहा था. इसबार वे पकिस्तान को नज़रंदाज़ करते से दिख रहे थे.   चीन से तानातानी पर वे बहुत कम बोले और जो बोले वह सैन्य शास्त्र में महत्वहीन था. एक व्याक्य में कहा जाय तो यह कि मोदी जी भाषण कला में अति प्रवीण हैं और इस बार वे मतदाताओं को संबोधित कर रहे थे.    

Monday, August 14, 2017

आज भी जारी है वह आन्दोलन

आज भी जारी है वह आन्दोलन

 

अरुण यह मधुमय देश हमारा

जहां पहुँच अनजान क्षितिज को

मिलता एक सहारा .

हेम कुम्भ उषा सवेरे

भारती ढुलकाती सुख मेरे

जग कर रजनी भर तारा.

आज 15 अगस्त है. आज  से सत्तर साल पहले  हमारा भारत आजाद हुआ था. आधी रात को मिली उस आज़ादी के क्या सपने थे और उन सपनों को पूरा करने में हम कहाँ तक सफल हो सके यह तो राजनितिक विश्लेषण का विषय है पर एक देश के रूप में हमने खुद को कितना जाना है और एक देश या राष्ट्र से हम क्या समझते हैं. आज़ादी के बाद विकास , सफलताएं, असफलताएं इत्यादि शासकीय कर्म हैं और यह सरकारें करती आयी हैं. इसका लेखा जोखा लक्ष्य से भटकाव है. आज सरकार के विरुद्ध कुछ भी बोलने वाले को इस समय सोशल मीडिया में सीधे राष्ट्र द्रोही कह दिया जा रहा है , हालांकि उन्हें मालूम नहीं कि राष्ट्र क्या है , देश क्या है? विश्व विद्यालय के छात्रों और मीडिया कर्मियों से भी यह प्रश्न पूछा जाता है कि देश है क्या? जब देश कि अवधारणा ही नहीं मालूम तो यह कैसे महसूस किया जय कि आज़ादी क्या है. क्या कुछ कानूनों के गुच्छे और बदली हुई सरकार ही स्वतन्त्रता है? या इससे कुछ अलग है? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर हम भारतियों को जानना चाहिए तभी हम जान पायेंगे कि आज़ादी है क्या. आज हमें जिस राष्ट्र के बारे में अकादमिक बताते हैं वह प्रथम विश्वयुद्ध के काल में यूरोप के एक भाग में “ एक राज्य, एक राष्ट” के रूप में पनपा और धीरे  धीरे वह एक वट वृक्ष बन गया और उसकी छाया ने समस्त मानवीय चेतना को ढँक लिया. वहाँ राष्ट्र कि पहचान व्यक्ति के आत्मनिष्ठ अहम् के रूप में थी जिसकी एनी सत्ताओं के सन्दर्भ में होती थी. कभी किसी के साथ कभी किसी से अलग. लेकिन भारतीय मनीषा में एक राष्ट्र कि बनावट के पीछे एक संस्कृति कि बुनावट छिपी रही  है और इसकी  संस्कृति का स्वरुप उन बिम्बों द्वारा निर्धारित होता है जो एक भारतीय  अपने बारे में संजोता है. हिन्दू धर्म में ईश्वर की  कल्पना मनुष्य के रूप में की गयी है और इसी कारण  राष्ट्र  की परिकल्पना में भी एक भौतिक बिम्ब है. जिन संस्कृतियों के बुनावट में ईश्वर निराकार है  वे इसे समझ नहीं पाते और इसी मनोवैज्ञानिक कमजोरी का लाभ उठाकर कुछ लोगों ने देश को विभाजित कर  दिया गया. चाहे जो भी ऐतिहासिक दबाव हों राष्ट्र की  यूरोपीय अहंकेन्द्रित अवधारणा एशियाई और अफ़्रीकी क्षेत्रों में भी फ़ैल गयी.जबकि यूरोप से बाहर ऐसी संस्कृतियाँ हज़ारों साल से जीवित रहीं है जिन्हें अपनी जीवन पद्धतियाँ , अस्मिता और आत्म गौरव कि रक्षा के लिए किसी राज सत्ता का मुंह नहीं जोहना पडा है. यदि नये संस्कृतियाँ हज़ारों साल से जीवित रहीं हैं तो किसी आतंक या किसी सत्ता के बलप्रयोग पर नहीं बल्कि उन सहज और जीवनदाई विश्वासों के कारण  जो उन्हें भूमि के एक खंड पर रहने कि अर्थवत्ता और सुरक्षा प्रदान करते हैं. भूमि का यही कांड राष्ट्र है, देश है. वह पवित्र और महत्वपूर्ण इसलिए  है कि वह उसे बाकी विश्व से जोड़ता है इसलिए नहीं कि वह उसे अलग कर  राष्ट्रीय भूगोल कि सीमाओं में आबद्ध  करता है. इसीलिए उन विश्वासों के घेरे में जिस चेतना का विकास होता है वह न  शुद्ध रूप से राष्ट्रिय हैं ना भौगोलिक. वह सीधे अपनी प्राणवत्ता उन लगावों  से प्राप्त करती है जो व्यक्ति के अहं का विस्तार ना हो कर  अपने और दूसरों के बीच एक साम्य की  मर्यादा निर्धारित करती है.  विश्वासों कि इस मर्यादा के परिवेश में ही एक मानव समूह की  जीवन धारा , लय और लौ रूपायित होती है. यही उसकी सांस्कृतिक चेतना का मुख्य प्रेरणा श्रोत भी है और राष्ट्र भी है. यही तथ्य भारत को आधुनिक दुनिया के राष्टों से अलग कर देता है. आधुनिक युग में भारतीय सभ्यता पश्चिम के लिए एक पहेली है, एक विरोधाभास है. यदि वह यूनान और मिस्र कि तरह एक मृत सभ्यता होता तो कोई बात नहीं थी. उनके लिए कठिनाई इस बात कि है कि इतिहास के असंख्य प्रहारों के बावजूद भारत जीवित रहा . इसके जीवित रहने का कारन केवल यह था कि भारत में आदि जीवन के दर्शन सूत्र केवल पोथियों में नहीं समकालीन स्मृतियों  में प्रवहमान हैं. सपने कि तरह हर स्मृति कि अपनी बिम्ब भाषा होती है जो कहीं से भी उभर सकती है, उत्प्रेरित हो सकती है - वैदिक ऋचाओं  से ,  पौराणिक कथाओं से या महाकाव्यों  से. भारत ऐतिहासिक स्मृति नहीं है वह आज भी हर भारतवासी के जीवनप्रणाली  के कार्यों – अनुष्ठानों में मेहँदी कि तरह रची बसी है. इसीलिए एक भारतीय का सभ्यता बोध उसे एक ऐसी समग्रता देता है जो धर्म , राजनीति और आधुनिक राष्ट्रीयता के फ्रेम में फिट नहीं हो पाता. अंग्रेजों कि गुलामी के दो सौ वर्षों में हमने अपनी आत्मा पर कई घाव झेले हैं केवल इसी उम्मीद पर कि कभी न कभी वे जख्म भरेंगे और इसी उम्मीद पर स्वतन्त्रता आन्दोलन आरम्भ हुआ था . वह केवल सत्ता बदलने का नहीं बल्कि अपने समस्त सभ्यता बोध को अपने जीवन प्रतिष्ठित करने का आन्दोलन था जो आज 70 वर्षों के बाद भी जारी है.

जहां शिवा ,राणा , लक्ष्मी ने देशभक्ति का मार्ग बताया

जहाँ राम , मनु, हरिश्चंद्र ने प्रजा भक्ति का सबक सिखाया .

वहीँ पुनः उनके पथगामी , बनकर हमें दिखाना है.

भारत को खुशहाल बनाने , आज क्रांति फिर लाना है.        

Sunday, August 13, 2017

पूजा – दक्षिणा में  सिक्कों का उपयोग हो ना कि नोटों का

पूजा – दक्षिणा में  सिक्कों का उपयोग हो ना कि नोटों का

इसमें खराब हो जाते हैं नोट , छापने में होती है देश को आर्थिक क्षति

 

हरिराम पाण्डेय

 

कोलकाता : मंदिरों में चढ़ावे , पूजा पाठ, दान या दक्षिणा के रूप में करेंसी नोटों या कहें कागज़ी नोटों के उपयोग से कई समस्याएं उत्पन्न हो रहीं हैं खासकर नए नोटों के खराब होने की समस्या अक्सर देखी जा रही है. इससे ना केवल सरकार को आर्थिक क्षति  पहुँचती है बल्कि उनके बदले नए नोट जारी करने में लगने वाले समय के दौरान बाज़ार में अचानक नोटों का आभाव हो जाता है. सरकार के अनुसार 2000 रूपए के एक नोट को छापने में 3.77 रूपए खर्च आते हैं. गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार यह खर्च लगभग 5.80 रूपए आते हैं. अब पूजन और चढ़ावे के दौरान पानी लगने या सिन्दूर , कपूर जैसे सिन्थेटिक रसायन लगने से नोट ख़राब हो जाते हैं या उनकी आयु घट जाती है.   

   इ पी डब्लू  के एक विश्लेषण के अनुसार देश में लगभग 11 सौ करोड़ रूपए एक साल में देश 19  बड़े मंदिरों में चढ़ावे के रूप में चढ़ते हैं. अगर इतनी ही रकम देश भर के पंडितों को दक्षिणा और अन्य पूजा विधियों में मिलते हों तो कुल 22 सौ करोड़ रूपए इस कार्य में लगे होते हैं.हालांकि यह विश्लेषण 2014 का है. वर्तमान में यह रकम और बढ़ी होगी.   मार्च 2017 की रिजर्व बैंक की रपट के अनुसार देश में चलने वाली सकल करेंसी 11 .73 लाख करोड़ का यह रकम लगभग 0.19% होती  है. रिजर्व बैंक के सूत्रों के अनुसार प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों के समीप के बैंकों में रंग लगे या गले या खराब नोट कई बार समस्या बन जाते हैं  यही हाल किसी धार्मिक त्यौहार के दौरान जैसे गंगा सागर मेला यानी  मेलों के बाद वहाँ के बैंकों में खराब नोट आने लगते हैं. अगर मान लें कि एक वर्ष में 1 करोड़ रूपए के नोट खराब हो जाते हैं तो उन्हें छापने में देश के 3 करोड़ 77 लाख रूपए व्यय होंगे. साथ ही , इन नोटों के छपने में लगे समय के दौरान बाज़ार में नोटों कि कमी भी दिखेगी. इसका असर मुद्रास्फीति पर भी पड़ सकता है.

सिक्कों का उपयोग करें

इस मसले पर रिजर्व के अधिकारियों ने सन्मार्ग से बातचीत के दौरान बताया कि यदि लोग इस तरह के धार्मिक आयोजनों में सिक्कों का उपयोग करें इससे नोटों के मामले होने वाली परेशानी से बचा जा सकता है . सूत्रों का कहना है कि यदि लोगों में इस तरह का चलन शुरू हो तो रिजर्व बैंक विभिन्न बैंकों के काउंटर से 50 , 100 , 200 रुपयों के सिक्कों के पैकेट मुहैय्या करा सकता है. रिजर्व बैंक  के सूत्रों का कहना है कि अगर ऐसी पहल होती है और बात उन तक पहुंचती है वे इसे प्रोत्साहन देंगे .

   प्राप्त जानकारी के अनुसार देश में वर्तमान में 9,950 मिलियन सिक्के चल रहे हैं जिनमें 2200 मिलियन सिक्के मुंबई , 2050 मिलियन सिक्के कोलकाता 1500 मिलियन सिक्के हैदराबाद और बाकी सिक्के नोयडा में ढाले गए. अगर सभी प्रकार के धार्मिक कृत्यों में सिक्कों का उपयोग बढ़ता है तो इससे एक तरह से राष्ट्रीय क्षति भी कम होगी. क्योकि यह मान कर चलें कि इस तरह का कोई भी बोझ घूम फिर कर जनता के सर पर ही पड़ता है. पूजा का उद्देश्य सर्वजन सुखाय – सर्वजन हिताय भी है. पूजा करने वाले पंडित और पूजा कराने वाले लोग केवल पूजा ही नहीं करते - कराते बल्कि समाज को शांति और परोपकार कि राह भी दिखाते हैं . अगर दोनों पक्षों ने यह एक छोटी सी पहल की  तो वे समाज में प्रशंसा  के पात्र भी होंगे और पूरे विश्व के लिए मिसाल भी .

आज कृष्ण को समझना सबसे ज्यादा ज़रूरी है

आज कृष्ण को समझना सबसे ज्यादा ज़रूरी है

आज जन्माष्टमी है . गीता के उद्गाता कृष्ण का जन्मदिन.आज विश्व में जो सामाजिक जो सामाजिक , राजनितिक और आर्थिक स्थिति है उसमे कृष्णा को समझना और उनके उद्देश्यों को अंगीकार कर लेना सबसे ज्यादा ज़रूरी है. सम्पूर्ण भारतीय जीवन को एक बिम्ब में प्रक्षेपित करने वाला यदि कोई प्रतिक है तो कृष्ण है. यह चुनाव सरल नहीं है क्योकि यह भारत भूमि मर्यादा पुरुषोत्तम राम , बुद्ध , शंकर और एनी संतों कि भूमि रही है. इसी तरह गीता ही दुनिया में एकमात्र ऐसी पुस्तक है जो योग से लेकर अध्यात्म तक की शिक्षा देती है. गीता के उद्गाता कृष्ण ने मानव जीवन और क्रिया को अध्यात्म से जोड़ कर जो प्रगल्भ है, जो तात्विक सौन्दर्य है जो अचरजभरा है सबको एक साथ व्याख्यायित किया है. कृष्ण यह बताते हैं कि मनुष्य एक साथ देह जीवी और बुद्धिजीवी दोनों है और देहमूलक अपेक्षाओं  के आधार पर मनुष्य राजनितिक संस्थाओं में  मूल्यों की  तलाश करता है. राज्य यानी शासन मानवीय संबंधों का परम व्यस्थापक है . उसकी सत्ता केवल उसका एक पक्ष है और उस शक्ति से समर्थित व्यवस्था और नीति दूसरा पक्ष है. कृष्ण बताते हैं कि दंड समर्थित राजनितिक आदेश किसी प्रकार धर्म को प्रतिष्ठित करने का औज़ार बन सकते हैं पर धर्म का साक्षात् उपकार नहीं कर सकते. राज्य केवल एक नियामक सत्ता है जो मनुष्य के सामाजिक मूल्यों को अनुशासन प्रदान करती है. जनता कि शक्ति तंत्र में बांध कर उसकी स्वतन्त्रता की  रक्षा ही नहीं  करती है बल्कि सत्ता को स्वछन्द होने  से बचाती भी है. जब जब यह स्वछंदता बढ़ी है तब तब लोक चेतना जागृत हो उठी है- यदा यदा हि धर्मस्य....., इसी जागृति  का आश्वाशन है. हमारे देश की मनीषा और जनता ने महाभारत काल से लेकर स्वतन्त्रता संघर्ष के काल तक में इस आश्वाशन का अनुभव किया है. अब देखिये राजा( जो आज हमारे मंत्री गन हैं)  का कर्म भोग और शासन ही नहीं जनता के सुखों, सुविधायों का ख्याल रखना भी है. कृष्णा राजा हैं पर जन के बीच निमाज्जित हैं, उनके बीच काम करते हैं , सहज भाव से जनता कि सेवा करते हैं, - भोजन करत नंदलाल, संग लिए ग्वालबाल...... . कितनी सहजता है इस राजा में , फिर मूल्यों कि स्थापना के लिए कष्ट क्यों होगा?  यही कारन है कि केशव ने जो कुछ भी कहा या जो कुछ भी किया वह आज तक प्रशंसनीय है , लोगों का इसके प्रति समर्पण भाव है. यह समर्पण सत्ता के आगे घुटने टेकना नहीं है बल्कि सहज सहयोग की उस  सीमा तक जाकर उसकी शक्ति को क्रियात्मकता देने कि गारंटी है जहाँ लोभ नहीं है , संकोच नहीं है एकात्मकता है. जीवन के यथार्थ का सच्चा भोग ना भोगने वाला राजा जन का सच्चा प्रतिनिधित्व नहीं करता. कृष्ण तो आरम्भ से ही जन के बिच रहे हैं. जन के बिच ही खेले , पढ़े तो उन्हें जनता के सुख दुःख का अहसास क्यों न हो. सुदामा जब मथुरा पहुँचते हैं तो उनका सहपाठी राजा उन्हें गले लगा लेता है- दुर्बल विप्र कुचाल सुदामा ताको कंठ लगायो....., यही नहीं सुदामा कि गति देख कर रो पड़ता है – नैनन के जल से पग धोये..... .  बात यहीं नहीं ख़त्म होती है, कृष्णा ने सुदामा कि दरिद्रता को जड़ से मिटाया तभी उन्हें छोड़ा. यह शासन है. मानव जीवन कि सुरक्षा के लिए , कर्म परायणता के लिए अर्थ आवश्यक है. अर्थ के अंतर्गत सभी उपयोगी तथा उपभोग्य वस्तुओं कि आवश्यकता होती है इसलिए अर्थ का उत्पादन से और उत्पादन से मनुष्य का सीधा सम्बन्ध होता है. मनुष्य का जेवेवान कर्म और भोग कि व्यवस्था है. सामाजिक , राजनितिक और आर्थिक मूल्य संस्थानों का विकास मनुष्य के व्यवहारिक जीवन के कारन हुआ . लोक जीवन में आर्थिक आग्रह के साथ जीवन प्रक्रिया में बदलाव आया. जब यह आरती आग्रह सीमा हीन होने लगा और कर्म उसकी प्राप्ति के उद्देश्य से होने लगे तो कृष्ण ने निष्काम कर्म कि व्यवस्था दी – कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः .... . गौर करेंगे कि अर्थ के प्रति उदासीनता जहां सुदामा को गरीबी कि रेखा से नीचे रहने के लिए बाध्य करती है वहीँ युग कि अपेक्षा बनकर उनकी पत्नी इस गरीबी को दूर करने के लिए बाध्य करती है.यही नहीं कृष्णा का जीवन एक सबक है कि छोटे बड़े सबको अर्थ उपार्जन के लिए श्रम करना होगा क्योंकि आर्थिक कारन ही जन शक्ति निर्बल बना देता है और शासन निरंकुश हो जाता है . कृष्ण राजा हैं और गाय चराते हैं. अलौकिक सौन्दर्य कि स्वामिनी गोपियाँ गाँव गाँव दही बेचने जाती हैं- नव सैट साजि सिंगार जुवती सब , दधि  मटुकी लिए आवत.... .  यही नहीं राधिका भी दूध बेचने जाती है- गोरस राधिका ली निकरी.... . कृष्ण खुद गाय चराने जाते हैं.  कृष्ण क्रांति के उद्घोषक हैं. उनकी क्रांति केवल धर्म कि चेतना में बदल जाने वाली क्रांति नहीं है वह आर्थिक राजनितिक पहलू को स्वीकार कर चलने वाली क्रांति है. इसी क्रांति कि आज भी जरूरत है. आज विश्व आर्थिक मोह, ज्ञान के दंभ, राजनितिक विस्तारवाद, प्रकृति का दोहन और धर्म के नाम पर हिंसा का बोलबाला है . हमें आज कृष्ण के उपदेशों कि ज़रुरत इसलिए है कि हम उनकी सृजनात्मक प्रेरणा , कूटनीतिक गरिमा और क्रीडा तथा हर्ष में आध्यत्मिक भाव  से परिपूर्ण उनके जीवन से कुछ सीख सकें. हमें कृष्ण कि बांसुरी एक बार फिर सुनानी होगी और उसके अध्यात्मिक अर्थ समझने होंगे.  जय श्रीकृष्ण

अहो बकी यं स्तनकालकूटम

जिघांसया पाययदप्यसाध्वी

लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोअन्यं

कं वा दयालुं शरणं व्रजेम  

Friday, August 11, 2017

विकास के लिए नफरत को छोड़ना ज़रूरी 

विकास के लिए नफरत को छोड़ना ज़रूरी 
इन दिनों चारों तरफ भीड़ के हमलों की चर्चा है. भभरत में गौ व्यापार की तिजारत में लगे असामाजिक तत्व हिन्दू धर्म की आड़ में मुस्लिमों और दलितों पर हमले कर रहे हैं. बंगला देश में हिंदुओं पर हमले हो रहे है, म्यांमार में रोहिंगाओं पर हमले हो रहे हैं, पाकिस्तान में एक ईसाई को केवल इस लिए गिरफ्तार कर लिया गया कि उसने ईशनिंदा की है, श्री लंका में तमिलों को मारा जा रहा है , नेपाल में मधेसियों का हक संविधान की आड़ में छीन लिया गया. अगफगानिस्तान में मूल निवासियों और बाद में आकर बसे लोगों में संघर्ष चल रहा है. दुनिया में दक्षिण एशिया के अलावा शायद ही कोई ऐसा देश है जहां इस तरह होता हो.  इसका मुख्य कारण पहचान की सियासत ( आइडेंटिटी पॉलिटिक्स ) है जो धर्म से प्राप्त फिरकापरस्ती पर आधारित आचरण को जन्म देता है. इसमें दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण एशिया के सभी देश लोकतान्तरिक व्यवस्था वाले देश हैं और ऐसी घटनाएं वक्त की हुकूमत की जानकारी में होती हैं.के बार तो ऐसे मामलों में वक्त के हाकिम की शाह भी होती है. संक्षेप में कहें तो पूरे क्षेत्र में कमजोर के विरूद्ध भीड़ को सरकारें शक्ति प्रदान करतीं हैं. दो दिनों के बाद 15 अगस्त है. भारत की स्वतंत्रता के 70 साल पूरे हो गए है. इस तारीख को 70 साल पहले दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी आबादी का भविष्य बदल गया था. अतएव इस दिन औपचारिक तौर पर ही सही सभी लोग आकलन करते हैं कि इन 70 वर्षों में हमने क्या खजोया और कितना पाया. यह तो साफ है कि पहचान की सियासत इस क्षेत्र के देशों के समाज के दिलों  दरार पैदा कर रही हो. समाजिक आर्थिक दिशा में कितनी उपलब्धियां हो  रहीं हैं  इस पर कोई ध्यान ही नही देता है, नतीजतन इस क्षेत्र में मानव विकास का ग्राफ सबसे नीचे है. जब सरकार भीड़ को यह हक देती है कि उसके लक्ष्यों को वह तय करे तभी आर्थिक और सामाजिक प्रगति पिछड़ जाती है. मानव विकास की धीमी गति को बताने के लिए वर्ग महत्वपूर्ण है पर पहचान की राजनीति इसकी असफलताओं पर पर्दा डाल देती है. 
  भारत में विविधता को देखते हुए स्थिति और भी खराब है. पहले की सरकारें  सफलतापूर्वक पहचान की सियासत को अवैध बना दिया था. बेशक भाषा के आधार पर राज्यों के गठन के आंदोलन हुए पर वे आंदोलन सामाजिक एकतावादी थे अलगाववादी नहीं थे. पर 1980 से यह बदलने लगा. उत्तरप्रदेश जो आकार में फ्रांस और जर्मनी दोनों के मिलाने के बाद बने भूक्षेत्र के बराबर है विगत तीन दशकों में तीन अलग अलग पार्टियों के शासनाधीन रहे  और किसी ना किसी रूपमें पहचान की सियासत को हवा देते रहे. लिहाज़ा यह राज्य मानव विकास के मामले में देश में सबसे पिछड़ा रहा. अब यह पहचान की सियासत राज्य की सीमा लांघ कर केंद्र में पहुंच गई. अब सत्ता हासिल करने के लिए सम्प्रदाय की मदद लेने लगे. दक्षिण एशिया में जातीय वैविध्य है और ऐसी स्थिति में पहचान की राजनीति सामाजिक एकता को खतम कर देती है और  सामाजिक विकास की राह में अवरोध पैदा करती है. जिस देश में विशाल अल्पसंख्यक समुदाय है उस देश में भी कमोबेश यही होता है. इससे यह तय है कि भारत जैसे देश में भी अगर सामाजिक एकता नहीं बनती तबतक विकास का सपना पूरा नही होगा. प्लेटो का कहना था कि अगर शासक दार्शनिक होंगे तभी शान्ति कायम हो सकती हैं. राधाकृष्णन का मानना था कि विपदा के समय कवि ही राह दिखाते हैं. वुरोप में 1930 में युद्ध के बादल मंडराने लगे थे तब  डब्लू एच ईडन ने लिखा कि , 
अंधेरे के दुःस्वप्न में , 
यूरोप के कुत्ते भोंकते हैं
और अन्य राष्ट्र शांति से रहते हैं
लेकिन सब नफरत में डूबे हैं.
इन पंक्तियों और हमारी सामूहिक दशा में कुछ समानता है बस फर्क यह है कि उस काल के यूरोप में नफरत के निशाने पर अन्य मुल्क थे यहां नफरत के निशाने पर हमारा समाज है.  हम नफरत के नतीजों से बच नहीं सकते जबकि उसके निशाने पर हम नहीं हैं. जबतक नफरत नहीं मिटेगी तबतक विकास नहीं हो सकता.