CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Tuesday, December 12, 2017

वक्त के आइने में मृत्युसंदेश

वक्त के आइने में मृत्युसंदेश

भारत में मृत्यु  संदेश का इतिहास का अललेख महाभारत काल से मिलता है जब युधिष्ठिर ने संदेश दिया था - " अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा। " इसके बाद विभिनन संसकृतियों में यह विभिनन तरीके से दिया जाता रहा है। आधुनिक काल में इसकी कड़ी अंग्रेजों से जुड़ी हे। अंग्रेजी में इसके लिये प्रचलित शब्द है ओबिच्यूअरी और इसकी शुरुआत 18 सदी से बतायी जाती है। हालांकि अमरीका में मृत्यु संदेश के चलन की शुरूआत 16 वीं सदी से मानी जाती है। यानी ब्रिटिशों के दावे से 300 साल पहले से यह चलन में है। 

आरंभ में यह सैनिकों, अफसरों ओर समेंतों की मृत्यु पर लिखा जाता था और उसका प्रकाशन समाचार पत्रें में होता था। इतिहासकार मिशेल स्टीवेंस के अनुसार जो लोग समाज में मशहूर थे उनकी मौत के बारे में जानने को लोग इच्छुक रहा करते थे। बाद में मृत्युसंदेश लेखन में लिखने वाले के दिमाग की बनावट की पहचान होने लगी। किसी सैनिक या अफसर या गृहयुद्ध के शिकार लोग की मृत्यु के समाचार लेखन में उसके सकारात्मक पक्ष , जीवन के मूल्य का विवरण और भावुकता ज्यादा होती है। यही नहीं मृत्यु संदेश के माध्यम से जमाने के ​िस्थति की भी झलक मिलती थी जैसे युद्ध के जमाने में सैनिकों की मौत की खबरों में भावुकता ओर धार्मिकता ज्यादा होती है। औद्योगिक क्रांति के बाद मृत्युसंदेश में दौलत की चमक दिखने लगी या अफसरों के कार्यकाल इत्यादि का वर्णन मिलने लगा।मृत्यु संदेशों के चलन का प्रसार अखबारों की छपाई ओर वितरण में व्यापक तकनीकी सुधार आने कारण बढ़ने लगा। प्रोफेसर जेनिस ह्यूम ने अपनी  मशहूर पुस्तक "ओबिच्यूअरी इन अमरीकन कल्चर " मे  कहा है कि अमरीकी अखबारों ने मृत्यु संदेश का स्तर तय किया और इसलिये मृत्युसंदेशों के प्रणालीबद्ध विश्लेषण से उस काल के बदलते मूल्यों को समझा जा सकता है। यही नहीं , मृत्युसंदेश पत्रकारिता के इतिहास में व्यापक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। 

    19 शताब्दी के शुरू होते - होते  मृत्यु संदेश कविताओं में या छंदों में लिखने का चलन आरंभ हुआ। ओहियों के अखबार डेलावेयर गजट में छंदों में लिखा जाने वाला पहला संदेश् जो उपतलब्ध है वह 17 मार्च 1917 को स्वेन के एक सज्जन के बार में लिखा गया था।  

1880 आते - आते इंगलैंड ओर अमरीका में मृत्युसंदेश या ओबिच्यूअरी का लेखन पत्रकारिता की एक विधा हो गयी और अक्सर संदेश में मृत्यु के कारणों का कारु​णिक विवरण होता था। 20वीं सदी के अंत में आम आदमी के जीवन मूल्यों को महत्व दिये जाने के फैशन की शुरूआत के साथ - साथ मृत्यु संदेश में भी बड़े लोगों के साथ - साथ आम आदमी के मौत के बारे. में लिखा जाने लगा। 

2001 के बाद आम आदमी के मृत्युसंदेश लेखन को एक नया मोड़ तब मिला जब अमरीका के न्यूयॉर्क टाइम्स आखबार  ने "शोक का चित्र " के नाम से एक नया कॉलम आरंभ किया। इसमें न्यूयार्क के ट्वीन टावर पर आतंकी हमले में मृत लोगों के पृत्यु संदेश प्रकाशित होने लगे। 200 शब्दों तक सीमित ये संदेश बाद में एक पुस्तक की आकार में प्रकाशित हुये जो पुस्तक बेहद लोकप्रिय हुई थी। जैसे - जैसे विकास होता गया मृत्युसंदेश लाखन की शैली और उसे लागों तक पहुंचाने की विधा भी बदलती गयी। अमरीका में आम आदमी के जीवन में इंटरनेट की मौजूदगी ने मृत्यु संदेश के लिये भी इंटरनेट के प्लेटफार्म का उपयोग आरंभ हो गया। समाचार एजेंसियां पैसे लेकर  ऑन लाइन साइट्स पर औबिच्यूअरी देने लगीं। यही नहीं , वेब साइट्स पर ओबिच्यूअरी पर श्रद्धांजलि देने की व्यवस्था हो गयी। यही नहीं ओबिच्यूअरी ब्लॉग्स भी बन गये। 

यह तो शुरूआत थी। 2007 में न्यूयार्क टाइम्स ने " द लास्ट वर्ड " के नाम से ओबिच्यूअरी का वीडियो सिरीज आरंभ किया। इसमे सबसे पहले मृतक आता था और कुछ कहता था। इसमें अत्यंत मशहूर हैं हास्य अभिनेता आर्ट बुकवाल्ड की ओबिच्यूअरी। इसमें वह खुद सामने आता हे और घेषणा करता है- " हाय ! आई ऐम आर्ट बुकवाल्ड, आइ एम जस्ट डेड " यानी , " नमस्कार मैं आर्ट बुकवाल्ड हूं , मेरा देहांत हो चुका है।  "      

कलकत्ते का जो जिक्र किया तूने हमनशीं"

"कलकत्ते का जो जिक्र किया तूने हमनशीं"

सात दशक पुराना शहर 

हरिराम पाण्डेय

वैसे तो इतिहास के पन्ने  बताते हैं कि कोलकाता शहर कोई सवा तीन सौ वर्ष पुराना है ओर इस शहर के इतिहास को पढ़ कर एक ही बात सहसा मन में आती हे कि " पत्थर जैसी छाती में फूल जैसा दिल। " सारा शहर स्लेटी और भूरे पत्थरों  की इमारातों, कंक्रीट और लोहे छड़ों से बनी बिलिडंग्स या सीमेंट की पनालीदार प्लेटों और फूस की झोपड़ियों से बना है। यह शहर बेशक  तीन सौ सत्ताइस बरस पुराना है  पर जन्म से ही इतिहास ने इसमें बार बार उथल पुथल किया है। यह शहर बन बन कर बिगड़ा हे। कम्पनी बहादुर के राज के दोरान काम के घंटे तय करने के लिये मजदूरों का भयंकर तांडव उसके 1857 का गदर झेल कर यह शहर अभी सुस्ता ही रहा था कि आजादी की लड़ाई शुरू हो गयी। नमक का आंदोलन और चुटकी भर नमक की जरूरतों ने सारे देश को घुटनो के बल खड़ा कर दिया। जैसे तैसे 1946 तक की यात्रा पूरी हुई और शहर भयानक दंगों की गिरफ्त में फंस गया। हर गली और हर सड़क लाशों से पट गयी। 1947 में बंगाल के सीने पर खून की लकीर खींच कर मुल्क को तकसीम कर दिया गया। कलकत्ता शहर पूर्वी पाकिस्तान से आये शरणार्थियों की पनाहगाह बन गया। इसी समय कहा जा सकता है कि कलकत्ता शहर एक बार फिर बिगड़ कर बना। देश आजाद हो चुका ओर "जन गण मन अधिनायक" ने इसे अपने हाथों  संवारा और पूरा शहर मुक्त कंठ से बोल उठा "बंदे मातरम।" हमारी जरूरतें चाहे जो हों पर कहा जा सकता है कि कोलकाता का आधुनिक इतिहास इसी कालखंड में शुरू होता है। फकत 70 वषों में गुजरे कुछ हजार दिन और रातें। 

लेकिन ये 70 वर्ष बहुत शुभ नहीं हुये इस शहर के लिये। पहला बड़ा बदलाव आया 1952 में जब नेशनल लाइब्रेरी इस्प्लेनेड से उठ कर अलीपुर चली गयी और शहर के ज्ञानपिपासुओं के लिये ज्ञान का सुगम स्रोत थोड़ा दूर हो गया। यही नहीं , शहर आर्थिक कठिनाइयों में फंसता गया। 2010 में मामूली आर्थिक विकास हुआ पर शहर गरीबी, प्रदूषण और ट्रैफिक जाम जैसी शहरीकरण की समस्या में फंस गया। परंतु इस शहर का क्रांतिकारी तेवर कम नहीं हुआ। आजादी की लड़ाई के बाद वामपंथी आंदोलन, ट्रेड यूनियनों की हड़ताले और अन्य राजनीतिक क्रांतियां शहर में होती रहीं। दरअसल , कलकत्ता क्रांतियों, राष्ट्रवाद , राजनीति और कई अन्य तरह की गड़बड़ियों का पर्याय रहा है ओर यही कारण है कि ब्रिटिश शासन काल में भी यह दंडित होता रहा है ओर आजादी के बाद भी। 1967 के बाद शहर वामपंथ की ओर झुक गया। 1967 में यहां भयानक नक्सली आंदोलन हुये। नक्सली व्यवस्था में बदलाव चाहते थे पर लोकतांत्रिक तरीके से नहीं बोल्शेविक शैली में। इस बीच बंगलादेश की आजादी की जंग शुरू हो गयी और 1971 में लगभग 20 लाख  शरणार्थी यहां आ गये। शहर एक बार फिर आर्थिक समस्या में उलझ गया। नतीजा  यह हुआ कि वामपंथी नारों के प्रति लोगों में मोह पैदा होने लगा। जनता में मनोवैज्ञानिक परिवर्तन हुआ ओर सी पी एम की सरकार सत्ता में आयी। यह व्यवस्था 34 वर्षों तक कायम रही। ऐसा इसलिये नहीं कि उन्होने बहुत अच्छा काम किया, बल्कि इसलिये कि विपक्ष बिखरा हुआ था ओर नेतृत्वविहीन था। ममता बनर्जी ने इसी का लाभ उठाया और 2011 में वामपंथी सत्ता को पलट कर वह शासन में आ गयीं।  लेकिन समसया हल नहीं हो सकी। इसका मुख्य कारण है कि यह शहर पूर्वोत्तर भारत के 8 प्रांतों , पूर्वी अत्तर प्रदेश , बिहार , ओडिशा ओर खुद  प​िश्चम बंगाल कुल मिलाकर  दो लाख 75 हजार वर्गमील की लगभग 20 करोड़ आाबादी के लिये इकलौता महानगर है। यहां रोजगार की उममीद में आने वाले हजारों लोगों की शरणस्थली बन गया। नतीजा यह हुआ कि कोलकाता महानगरीय क्षेत्र की आबादी तेजी से बढ़ने लगी। यहां की उपजाऊ जमीन और नमी भरा वायुमंडल अत्यधिक उद्योगीकरण या स्वउद्यम के लिये मुफीद नहीं है लिहाजा यहां के लोग स्वभावत: आलसी होते गये। वे शरिीरिक श्रम से कतराने लगे। लेकिन कुदरत  ने यहां के लोगों को कलात्मक प्रतिभा से नवाजा है इसलिये गृहउद्योग यहां पनपने लगे। बड़ी संख्या में मूर्तिकार, चित्रकार , गायक, नर्तक, लेखक और कवि यहां दिखायी पड़ने लगे। अब चूंकि कलाकार बेहद मूडी होते हैं और परम्परागत अनुशासन से आबद्ध नहीं होते अतएव शहर की अधिकांश आबादी आजाद ख्याल हो गयी। 

 हुगली के किनारे उत्तर से दक्षिण फैला  यह शहर लगभग 7 किलोमीटर चौड़ाई और 10 किलोमीटर लम्बाई में आयताकार स्वरूप में बसा हुआ है। जहां की ज्यादातर इमारतें चार मंजिली​ हैं। शहर का उत्तरी भाग , जो कई बार बना ओर कई बार मिटा, विगत 70 वर्षों से यहां की बहुत बड़ी आबादी की रिहाइश बन गया। गंदी गलियों और संकरी सड़कों के दोनों तरफ बनी इमारतों की मंजिलें  कुछ ऐसी लगतीं हैं जैसे लोहे के बक्से एक दूसरे पर सजे हों। कलकत्ते की एक तिहाई आबादी इसी इलाके में रहती है। उत्तर से दक्षिण की तरफ फैले इस शहर की उत्तरी-दक्षिणी सीमा का निर्धारण पार्क स्ट्रीट करता है। पार्क स्ट्रीट से दक्षिण चौड़ी सड़कें, सुदर इमारतें-बंगले- चमकदार शॉपिंग कॉम्प्लेक्स इत्यादि हैं।  

नीम अंधेर में डूबा यह शहर विगत सात दशकों में चमकदार महानगर बनगया। बिजली के खंबो से झूलती रोशनी के उदास कतरों  के कंधे पर 2011 के बाद तीन बत्तियों वाले लाइट पोस्ट ने हाथ रखा और शहर दूधिया रोशनी से नहा उठा। गमगीन सी लगतीं सड़कें रोशनी के ​लिबास पहन कर इठलाती सुंदरियों  की तरह "खूब भालो " लगने लगीं। अलग अलरग हिस्सों में बने फ्लाई ओवर शहर की सांस और रफ्तार को तेज करने लगे। यातायात के लिये फोन र्कब्स की मामूली सुविधा के अलावा डकुछ नहीं बदला। वही 60 के दशक की भीड़ से घिघियाती बसें और सड़कों पर विकलांग की तरह जहां तहां खड़ी होकर सड़के बंद करने वाली ट्रामें और घोड़े की तरह जुते आदमी द्वारा खिंचे जा रहे रिक्शे अब भी कायम हैं। जानकर हैरत होगी कि इस शहर में लगभग 40 हजार निबंधित - अनिबंधित हाथ रिक्शे हैं जिन्हें रात- दिन मिलाकर 90 हजार लोग खींचते हैं। यह दुनिया में अकेला ऐसा उदाहरण है जो विगत 70 साल में नहीं बदला। शहर के बीच  में लगभग दो मील लम्बा और एक मील चौड़ा मैदान ,जो यहां की एकलौती खुली जगह है ,  के चारों ओर यहां की मशहूर इमारतें हैं जो पुराने दिनों में बनीं ओर अब तक अपनी भव्यता का राग वलाप रहीं है। इनमें बने हैं लगभग 100 छोटे छोटे क्लब्स और खेल के मैदान। राजनीतिक रैलियों के लिये भी आदर्श जगह है यह। उत्तर पूर्वी सीमा पर है विख्यात इडेन गार्डन्स। विगत सात दशकों में फुटबॉल की दीवानगी क्रिकेट के पागलपन में बदल गयी। कभी फुटबॅल मैच के लिये जान देने पर उतारू दर्शक इन दिनों किकेट मैच में दीवाने हो उठते हैं। इडेन गार्डन्स से उत्तर है गॉथिक वास्तुकला से बना कलकत्ता हाई कोर्ट। 

कोलकाता की सुंदरियों और मिष्टी ( मिठाइयों) की बात ना हो तो बात अधूरी रह जायेगी। विगत सात दशकों में इस क्षेत्र में कोई खास बदलाव नहीं हुआ। मुस्कुराते होठ और आंखों की अल्केमी जैसे गालिब के काल में थी आज भी है। शिमला बाजार की न जाने किस नाजनीन को देखकर गालिब कह उठे थे ,

सब्रआज्मा जो उनकी निगाहों के हफनजर  

ताकतरुबा वो उनका इशारा कि हाय हाय  

और बंगाली मिठाइयों की तो बात ही निराली है " वो मेवा हाये ताजा ए शीरीं के वाह वाह "। संभवत: कोलकाता दुनिया पहला शहर है जहां शुगरफ्री मिठाइयां मिलतीं हैं। जहां की मिठाई कवियों से प्रेरित होती है या क्रांति का वाहक बनती हैं। मसलन रसगुलला कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर की प्रेरणा से बना था और कहते हैं कि संदेश गदर के जमाने में समाचार का माध्यम था।   

सिनेमा : थोड़ी हकीकत ,  थोड़ा फसाना

सिनेमा : थोड़ी हकीकत ,  थोड़ा फसाना

 भारतीय  सिनेमा का यह 105 वां साल है। कुछ लोगों को इन फिल्मों का गीत-संगीत, लार्जर देन लाइफ़ कैनवस, हकीकत से दूर काल्पनिक दुनिया और इसकी रंगीनीयत पसंद आती है और कुछ को इस सबसे अलग वास्तविकता के इर्द गिर्द घूमती, जीवन के कड़वे सच दिखाती फ़िल्में। साल दर साल अमिताभ बच्चन, शाहरुख़, आमिर और सलमान खान जैसे सितारे सपने बेचते हैं और लोग हाथों हाथ इन सपनों को ख़रीद भी लेते हैं। कभी डॉन, कभी बाजीगर तो कभी दबंग बनकर। इसी फंतासी के बीच दो बीघा जमीन , कभी अर्धसत्य, अंकुर या अर्थ भी निकल आती है। इसका कारण भारतीय सिनेकला पर विभिनन परम्पराओं का असर। भारतीय फिल्मों  पर 6 परम्पराऔं का स्पष्ट प्रभाव है। पहला; कथानक पर प्राचीन भारतीय महाकाव्यों के विचार और कल्पना का प्रभाव, दूसरा संस्कृत नाटक का शैलीबद्ध स्वरुप और संगीत, नृत्य के साथ उसकी भंगिमा , तीसरा अभिनय की रास विधि जिसकी उत्पत्ति प्राचीन संस्कृत नाटक के काल में ही हुई थी चौथा ,10वीं सदी में संस्कृत नाटक के पराभव के बाद उभरा लोक नाटक जैसे बंगाल की जात्रा, उत्तर प्रदेश की राम लीला इत्यादि, पांचवा  यथार्थ और फतांसी के मेल जोल से बना पारसी थियेटर , छठा, बीस के दशक की हॉलीवुड की फिल्मों की संगीतमयता। इन 6 परम्पराओं से प्रभावित भारतीय सिनेमा समय के साथ खुद को बदलने लगा। जिस तरह पुराने समय में हल तरह की दृश्य विधा का अलग- अलग दर्शक वर्ग होता था उससे बिल्कुल अलग आज के हिंदी सिनेमा ने समय की नब्ज को पहचान कर उन रूढ़ियों को भंग किया और  नया दर्शक वर्ग तैयार किया है। इसने विषय, भाषा, पात्र, प्रस्तुति सभी स्तरों पर अपने को बदला। ध्वनि , विचार प्रकाश , संगीत और अभिनय के मेलजोल से सिनेता हकीकत का प्रतिरूप लगने लगा और उसमें समानुभूतिकता ने सिनेआ को समाज से जोड़ दिया। फिल्मों ने बिल्कुल नए तरह के सिनेमाई-सौंदर्यशास्त्र का विकास किया है।  मसलन ‘हाईवे’ की वीरा एक उच्चवर्गीय और इज्जतदार  परिवार की लड़की है। बचपन से ही वह अपने ताऊ से शारीरिक शोषण का शिकार होती आई है। जब वह इसके बारे में अपनी मां को बताती है, तो उसकी मां उसे चुप रहने और इस बाबत किसी से न कहने की सलाह देती है। यही वह तथाकथित सभ्य वर्ग है, जहां बात-बात पर लड़कियों को तहजीब और सलीके की दुहाई दी जाती और दीवारों के पीछे स्त्री को सजी-संवरी वस्तु की तरह इस्तेमाल किया जाता है। वीरा की मां का उसे चुप रहने की सलाह सिर्फ वीरा को नहीं, पूरे स्त्री समूह को दोषी बनाती है। आज सिनेमा ने मनोरंजन के अर्थ और पैमाने बदले हैं। सिनेमा ने समझ लिया है कि बदला हुआ यह दर्शक केवल लटकों-झटकों से तुष्ट नहीं होने वाला, उसे कुछ ठोस देना होगा। यही कुछ वजहें हैं कि करण जौहर सरीखे सिनेमा के असली व्यवसायी फिल्मकार को भी अपने रूमानी किले से बाहर निकलना और ‘माइ नेम इज खान’ और ‘बॉम्बे टाकिज’ जैसी स्तरीय फिल्में बनाने को मजबूर होना पड़ा। यहां एक सवाल उठता है कि सिनेमा के बदलने के सााथ सााथ क्या समाज बदला है। 

मुझे याद है कई साल पहले कलकत्ता फिल्म फेस्टीवल में हास्य अभिनेता महमूद का इंटरव्यू। मैने उनसे पूच कि आप ये चरित्र कहां से लाते है? महमूद ने कहा- हमसब तो लोगां के ही रूपां हैं। समाज से चरित्रों का चुनाव कर उनके पात्र को समानुभूति के आधार पर प्ले करना यह सचमुच भारतीय सिनेमा की ही विधा है। हालीवुड और भारतीय सिनेमा में यही एक बहुत बड़ा फर्क है। हॉलिवुड की फिल्मों में नायक स्टानिसलावस्की पद्धति के अनुरूप जहां अपने चरित्र का "जीता जागता अवतार" होता है वहीं भारतीय सिनेमा में अभिनेता दर्शक से समानभिूति अपनाते हुये उसके मानस में प्रवेश कर जाता है। यहां एक सवाल उठता है कि क्या सिनेमा समाज में कोई बदलाव लाया है?

भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी खूबी है कि वह इस बात को दिखाने की कोशिश करता है कि हम क्या हैं और जीवन में क्या होना चाहते हैं। फिर एक प्रश्न आता है कि क्या एक समाज के रूप में हम बदले हैं। मनोविज्ञान में बदलाव विरोधाभासी होता है। यह किसी संदर्भ से जुड़ा होता है। संदर्भहीन बदलाव नहीं हो सकता है। फिल्मों में बदलाव का संदर्भ एनिमेशन या तकनीक के इस्तेमाल, स्क्रिप्ट के प्रकार और नग्नता का स्तर नहीं है। हमारा समाज इतनी फिल्मों को पचा चुका है कि हम कितनी भी अजीब फिल्म या गाने को झेल सकते हैं। यहां बदलाव का विश्लेषण उपभोक्ता के गहरे अर्थ के संदर्भ में करना होगा।सिनेमा या मनोरंजन का कोई भी माध्यम, समाज में बदलाव के आधार पर ही बदलता है। हम कई तरह के मजेदार बदलावों को देख रहे हैं और सामाजिक अर्थों में बदलाव के कई नए संदर्भ भी उभर रहे हैं। हम भारतीय सिनेमा को इससे अलग-थलग करके नहीं रख सकते।पिछले कुछ दशकों में सांस्कृतिक मायनों में कई बदलाव आए हैं और उनका भारतीय सिनेमा पर भी  प्रभाव पड़ा है। दो फिल्मों, 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' और 'रब ने बना दी जोड़ी' को हम उदाहरण के रूप में लेते हैं। पहली फिल्म में लड़की की मां तक चाहती हैं कि वह लड़के के साथ भाग जाए। वह अपने गहनों की भी तिलांजलि देने को तैयार है (बमुश्किल ही कोई भारतीय महिला ऐसा करेगी)।लेकिन हीरो लड़की के पिता की मर्जी से ही शादी करने पर अड़ जाता है। भारतीय समाज में इसे बहुत सम्मानित माना जाता है। घर से भागना उस समय बहुत खराब बात मानी जाती थी।

दूसरी फिल्म ' रब ने बना दी जोड़ी ' में पूरी तरह अलग विचार है। हीरो शादीशुदा हीरोइन को कहता है कि अगर वह अपने दब्बू पति के साथ ख़ुश नहीं है तो उसके साथ भाग चले। शादीशुदा के साथ प्रेम संबंध और भाग जाने का विचार हमें स्वीकार्य हो गया है। इन्हीं बदलावों को हम बाद की अन्य फिल्मों में भी देख सकते हैं।

शिक्षा के अर्थ ,उधार के अर्थ को लेकर हमारे समाज में कई बदलाव आए हैं। थोड़े से अतिक्रमण से हमारा समाज बैंकरों का समाज या कारोबारी समाज बन गया है।

नए हिंदी सिनेमा में औरत की शख्सियत की वापसी हुई है। औरत की इस वापसी, उसके जुझारूपन को दर्शकों ने हाथोंहाथ लिया है। दर्शक अब अस्सी-नब्बे के दशक की शिफॉन साड़ियों की फंतासी से बाहर निकल कर यथार्थ की खरोंचों को महसूस करना चाहता है। वह आईने में अपने को देखना और खुद को जानना चाहता है। फिल्मों ने जेंडर की बहसों को नया मोड़ दिया है। यहां पुरुष स्त्री का शत्रु या उसका प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि उसका साथी है। वह अपने पुरुष अहंकार और वर्चस्ववाद से मुक्त होकर, स्त्री के मर्म और उसके अधिकारों को समझते हुए नए तरीके से अपना विकास कर रहा है। स्त्री छवियों के साथ-साथ पुरुषों की सामंती छवियां भी खंडित हुई हैं और अब ये पूरी तरह स्वीकार्य हैं।

आज सिनेमा ने मनोरंजन के अर्थ और पैमाने बदले हैं। सिनेमा ने समझ लिया है कि बदला हुआ यह दर्शक केवल लटकों-झटकों से तुष्ट नहीं होने वाला, उसे कुछ ठोस देना होगा।अब हिंदी सिनेमा ने दर्शकों की बेचैनी को समझा है, उसे आवाज दी है। अनुराग कश्यप, दिवाकर बनर्जी, इम्तियाज अली जैसे युवा निर्देशकों और जोया अख्तर, रीमा कागती, किरण राव जैसी सशक्त महिला फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा को तीखे तेवर दिए हैं। उसके रंग-ढंग बदले हैं। इनकी स्त्रियां जीने के नए रास्ते और उड़ने को नया आसमान ढूंढ़ रही हैं। दर्शक भी रोते-बिसूरते, हर वक्त अपने दुखड़े सुनाते चरित्रों पर कुछ खास मुग्ध नहीं हो रहा। उसे भी पात्रों के सशक्त व्यक्तित्व की खोज है।

अब हिंदी सिनेमा अपने पुरसुकून रोमानी माहौल से उबर रहा है। उसने दर्शकों की बेचैनी को भांप लिया है और अब उसे आवाज देनी भी शुरू कर दी है। अपने नये मिजाज से दर्शकों को नये सिरे से न सिर्फ अपनी तरफ खींचा है बल्कि उन्हें नये तरीके से सोचने पर मजबूर भी किया है। अनुराग कश्यप, दिबाकर बैनर्जी, इम्तियाज़ अली जैसे युवा निर्देशकों तथा जोया अख्तर, रीमा कागती और किरण राव जैसी सशक्त महिला फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा को तीखे तेवर दिए हैं। उसके रंग-ढंग बदले हैं। इनके स्त्री पात्र अब विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी डिप्रेशन के शिकार नहीं होते। ना ही ये किसी ‘मीना कुमारी सिंड्रोम’ से ग्रस्त हैं। ये लड़कियां तो इन झमेलों से आगे निकल, जीने के नये रास्ते और उड़ने को नया आसमान ढूंढ़ रही हैं। दर्शक भी रोते-बिसूरते, हर वक़्त अपने दुखड़े सुनाते चरित्रों पर कुछ खास मुग्ध नहीं हो रहे। वे भी दिलीप कुमार सिंड्रोम से दूर हो अमिताभ बच्चन की तरह ' हम जहां से खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है ' की तरह जीना चाहते हैं। उन्हें भी पात्रों में समय को परिभाषित करने वाले सशक्त व्यक्तित्व और चरित्र की खोज है। यह खोज  न सिर्फ सिनेमा की है बल्कि भारतीय समाज की  भी है।

समाज में अपराध की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है

समाज में अपराध की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है

समाज में बढ़ती  गतिविधियों का सम्बंध समाज की सोच तथा उससे जुड़ी व्यवस्था से भी होती है। अभी कुछ दिनों से हमारे समाज में नया परिवतमंन देखने को मिल रहा है। वह है घृणित अपराधों के विडीयो क्लिप्स का वायरल होना। सोशल मीडिया पर अच्चनक घृणित अपराधों के विडीयो क्लिप्स दिखायी पड़ने लगते हैं और लोग उन्हें खुल्लम खुल्ला देखते भी हैं। अभी हाल में राजस्थान में एक  मजदूर की हत्या और उसके विडीयो का सोशल मीडिया पर जारी होना और इसी के तरह अन्य अपराधों का भी वीडियो वायरल होना , जिसमें रेप का भी वीडियो शामिल है बतता है कि हमार देश में व्यवसथा का पतन हो चुका है ओर दूसरे सामाजिक मानस में हिंसा की स्वीकार्यता बढ़ रही है। इससे यह जाहिर हो रहा है कि हमारे समाज में अपराध का सामान्यीकरण हो रहा है। हम इसे मध्ययुग के भीड़ के न्याय को समर्थन देती मानसिकता की ओर समाज का बढ़ना भी कह सकते हैं। गौ रक्षा के नाम पर पीट-पीट कर हत्या कर दिये जाने का वीडियो अभी चल ही रहा था कि इक रेप का वीडियो आ गया इसके बाद ताबड़तोड़ लव जिहाद के नाम पर वीभत्स ढंग से मारे का वीडियो आ गया।  ये वीडियो जहां एक तरफ समाज में अपराध के सामान्यीकरण की कथा कहते हैं वही  इन मामलों के समर्थकों की जमात में गौरव का भाव पैदा करता है। बेरोजगार नौजवानों से भरे इस देश में इसके गिरोह बन जाने का भी खतरा है। यहां एक खास किसम का मानसिक परिवर्तत होता दिख रहा है और यह परिवर्तन सामूहिक है।  इसमें अपराध की प्रवृति को और इसे सार्वजनिक करने की सियासत को नजरअंदाज भी कर दें तों नफरत फैलाने वालों के हाथ में ये वीडियो एक तरह से समाज को आतंकित कर अपने सिद्धांतो को मानने पर मजबूर करने का एक उपाय भी है। हम एक ऐसे वक्त में रह रहे हैं जहां तकनीक हमारे उपर नियंत्रण करने लगी है , हमारी गतिविधियों को नियंत्रित करने लगी है। इस आतंक का चुटकी बजाते समाधान नहीं हो सकता है। हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि आखिर हम अपराधी द्वारा ही प्रस्तुत  अपराध के इस घृणित विवरण को क्यों देखते हैं और इस के दौरान कानून की कोई परवाह नहीं करते र्है। मनोविज्ञाान के अनुसार वीडियो का वायरल होना इस तथ्य को दर्शाता है कि वीडियो भेजने और देखने वालों में मानसिक सम्बंध बढ़ता जा रहा है और यह बढ़ना जारी रहेगा। संचार के अंतर्समूह प्रसार की तरह यह एक समूह से दूसरे समूह को जोड़ता हुआ व्यापक समाज का निर्माण कर देता है। यह समाज अपने आचार विचार और सिद्धांतों में वैसा ही होता है जैसे सिद्धातों पर एक हुआ है। जरा सोचिये, नारी द्वेष और सामाजिक नफरत के कुकर्मों के वीडियो के माध्यम से जुड़े और नियंत्रित समाज की गतिविधियां क्या होंगी। अबसे दो साल पहले राजनीतिक लाभ के लिये समाज की सोच को प्रबावित ण्करने के इरादे सोश मीडया का उपयोग अब धीरे धीरे समाज में नफरत फैदा करने और अपराध की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिये उपयोग में लाया जाने लगा है। यह एक तरह से भावुक संक्रमण है और यह संक्रमण भी उसी तरह फैलता है जिसतरह बीमारियां फैलती हैं। यह मनोवैज्ञानिक संक्रमण है और सामाजिक प्रभाव की प्रकिया पर भी असर डालता है। इन दिनों हालत यह होती जा रही है कि सोशल मीडिया के प्लेटफार्म से भेजी गयी सामग्री समाज पर सबग्से असर डाल रहीं है फेक न्यूज इत्यादि  तो उसके आगे कुछ नहीं है। खबरों को अगर मानें तो देश में राष्ट्रभक्त समूह के नाम पर आपसी नफरत फैलाने वालों के समूह बढते जा रहे हैं ओर वे सोशल मीडिया के उपयोग से समाज में नफरत फैलाने के काम में लगे हैं। हालांकि यह संख्या अभी बहुत कम है तब भी सरकार तथा कानून लागू करने वाली एजेंसियों को सतर्क रहना होगा। देश और समाज की रक्षा करनी है तो आम जन को भी इसका शिकार होने से बचना होगा।