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Friday, December 13, 2019

सीएबी को लेकर पूर्वोत्तर में डर

सीएबी को लेकर पूर्वोत्तर में डर 

दिसंबर से पहले पखवाड़े का यह वक्त शुरू से भारत के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण रहा है। अब से कोई 72 वर्ष पूर्व जब भारत आजादी के पायदान पर धीरे-धीरे ऊपर की ओर पढ़ रहा था और आजादी की उम्मीद है बहुत तेजी से बढ़ रही थी उसी वक्त हिंदू और मुसलमान के दंगे हुए। विख्यात साहित्यकार मंटो ने भारत और पाकिस्तान के बंटवारे को खून की लकीर से बांटी गई जमीन की संज्ञा दी थी। लगभग 48 बरस पहले इसी महीने में बांग्लादेश युद्ध के कारण लाखों लोग  अपना घर बार छोड़कर भारत आ रहे थे। उस दौरान पाकिस्तानी फौज के जुल्म और बर्बरता की कहानी इतनी भयानक है कि इसे बयान करने में  इतिहास को भी शर्म आ जाए। ऐसे बैकड्राप में लगभग इन्हीं महीनों में भारत में इस साल नागरिकता संशोधन विधेयक ने एक बार फिर समाज की सहिष्णुता को उबलने के लिए मजबूर कर दिया है। पिछले कई दिनों से पूर्वोत्तर भारत उबल रहा है । यह उबाल अपने वजूद , अपनी जमीन की अनिश्चयता से जन्मी पीड़ा  की अभिव्यक्ति है। इसमें ऐसे लोग शामिल हैं जो हर 40- 50 वर्षों के बाद अपना घर बार बदलते रहे हैं। एक मुल्क से दूसरे मुल्क जाते रहे हैं और इसी तरह की बेचारगी का शिकार होते रहे हैं। चाहे वह पाकिस्तान हो या बांग्लादेश। हालांकि प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि नागरिकता संशोधन विधेयक से पूर्वोत्तर को कोई नुकसान नहीं होगा और उनकी संस्कृति ,विरासत, भाषा तथा परंपरा की रक्षा की जाएगी । यहां एक बड़ा अजीब मुहावरा है और वहीं से डर पैदा हो रहा है। वह मुहावरा है "रक्षा की जाएगी" यानी फिलहाल उसको खतरा है। चाहे वह बड़ा हो या छोटा प्रधानमंत्री ने उसी खतरे की ओर इशारा करते हुए यह आश्वासन दिया है और यह भी  बताने की कोशिश की है कि विरोधी दल खासकर कांग्रेस उस क्षेत्र में अफवाहें फैला रही है। लेकिन  सरकार ने क्या पूर्वोत्तर के लोगों के मानस का अध्ययन किया है? इस विधेयक से वहां के लोगों के मन की यह अभिव्यक्ति है। उन्हें लग रहा है कि  उनकी भाषा और संस्कृति धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। सरकार को इस डर का ध्यान रखना चाहिए था और उसके अनुरूप कदम उठाने चाहिए थे। लेकिन, उसने ऐसा नहीं किया और लोगों के मन में यह बात बैठ गई यह सरकार मनमाने ढंग से सब कुछ कर रही है। यही वजह है कि लोग सड़कों पर उतर गए। यहां के लोगों का यह कदम स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया है । 14 अगस्त 1947 की रात जब भारत आजाद हो रहा था तो जवाहरलाल नेहरू का एक मशहूर भाषण "ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी " हमारे इतिहास का एक अंग बन गया। आज नागरिकता संशोधन विधेयक के बारे में हम कह सकते हैं यह एक नई तरह की डेस्टिनी से हमारा मुकाबला है। शुरुआत में भारत ने लोकतांत्रिक संवैधानिकता  के पथ का अनुसरण करने का निश्चय किया था। इससे सबसे पहला अर्थ जो प्राप्त होता था वह था नागरिकता एक अधिकार है और यह अधिकार समानता के सिद्धांतों पर निर्भर है। भारत की राष्ट्रीयता दुनिया के लिए मिसाल बन गई। नागरिकता संशोधन विधेयक जिसे भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में बड़े गर्व के साथ शामिल किया था आज उसी नागरिकता संशोधन विधेयक में पाकिस्तान , बांग्लादेश  और अफगानिस्तान  से आए हिंदुओं, सिखों, बौद्धों , जैन, पारसियों एवं ईसाइयों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का आश्वासन यह साफ स्पष्ट करता है की अन्य किसी समुदाय के लिए इसमें जगह नहीं है। हमारे गृह मंत्री इसे लेकर अत्यंत उत्साहित हैं और वह इससे उत्पन्न होने वाले अलगाववाद के भाव को मानवतावाद चोले से ढकना चाहते हैं। नतीजा यह हुआ समस्त पूर्वोत्तर भारत उबल उठा । इसका कारण है कि भारत का यह क्षेत्र घुसपैठ का सबसे बड़ा शिकार हुआ है। यह जहर केवल भाजपा नहीं फैला रही है बल्कि कई अन्य राजनीतिक दल भी इसमें शामिल हैं। जिन्होंने इसके पक्ष में मतदान किया है। आज  नहीं कल यह ताजा हालात भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा जरूर बनेंगे।


Thursday, December 12, 2019

सी ए बी : मुश्किलें और हैं

 सी ए बी : मुश्किलें और हैं 

एक तरफ राज्यसभा में भी सीएबी यानी नागरिकता संशोधन विधेयक पारित हो गया दूसरी तरफ इस बिल को लेकर पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में भारी असंतोष दिखाई पड़ रहा है और कुछ लोग  इसे सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की बात कर रहे हैं ।  राजनीतिक गलियारों में यह बात फैलाई जा रही है कि अब देश में अल्पसंख्यक नहीं रहेंगे और अगर रहेंगे तो उनकी हैसियत वैसी नहीं रहेगी जैसी आज है । जबकि गृह मंत्री अमित शाह कह रहे हैं कि "हम नागरिकता छीनने नहीं देने की कोशिश में हैं।" लंबी बहस के बाद सीएबी बुधवार को राज्यसभा में भी पारित हो गया। इसके पक्ष में 125 और विपक्ष में 105 वोट पड़े। कुल 209 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया। भाजपा की  पुरानी सहयोगी  शिवसेना ने  मतदान में हिस्सा नहीं लिया।    वह वकआउट  कर गई। अब इस बिल के कानून बनने के रास्ते साफ हो गए।
      बुधवार को इस विधेयक पर चर्चा के दौरान जमकर विरोध हुआ। विरोध के उस माहौल में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि "अगर देश का बंटवारा नहीं हुआ होता तो यह विधेयक कभी नहीं आता। बंटवारे के बाद जो स्थिति उत्पन्न हुई उससे निपटने के लिए या कहें उस से मुकाबले के लिए इस विधेयक को लाना पड़ा। अब से पहले की सरकारें समस्याओं से दो-दो हाथ करने को तैयार नहीं थीं प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में हमने ऐसा करने का साहस किया।"
         अमित शाह ने जोर देकर कहा कि "हम  ईसाई ,हिंदू, सिख ,जैन और पारसी समुदाय को नागरिकता दे रहे हैं। हम किसी की नागरिकता छीन  नहीं रहे।" इसके पहले 2015 में भी इस बिल को पेश किया गया था लेकिन लोकसभा में पारित होने के बावजूद राज्यसभा में वह पारित नहीं हो सका। क्योंकि सरकार के पास सदन में बहुमत नहीं था। शाह ने कहा "70 वर्षों तक इस देश को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया था। नरेंद्र मोदी ने सबके साथ न्याय किया है। मोदी जी ने वोट बैंक के लिए कुछ नहीं किया। अमित शाह ने कहा इस बिल का उद्देश्य चुनावी लाभ नहीं है। उन्होंने कहा कि देश का बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ और इसी कारण इस विधेयक को पेश करना पड़ा। बकौल अमित शाह नेहरू लियाकत समझौते में अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने की बात है भारत में इस समझौते को लागू किए जाने के बाद उस पर अमल किया गया लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर बेहद जुल्म हुए उन्हें इतना सताया गया कि वह अपना घर बार छोड़कर भाग आए और यदि रहे तो अपना धर्म परिवर्तन करना पड़ा। जबकि भारत में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अल्पसंख्यक समुदाय से या स्पष्ट करें तो मुसलमान रहे हैं। अब से पहले भी नागरिकता बिल में संशोधन हुआ है। जब श्रीलंका और युगांडा की समस्याएं आईं तो तत्कालीन भारत सरकार ने उसी हिसाब से बिल में संशोधन किया। आज फिर कुछ ऐसी समस्या उत्पन्न हुई है इसलिए कानून में संशोधन करने की जरूरत महसूस की गई है। इसे राजनीतिक नजरिए से नहीं मानवीय नजरिए से देखने की जरूरत है। अमित शाह ने स्पष्ट कहा इस विधेयक को हमारी लोकप्रियता से कोई लेना देना नहीं है हम चुनावी राजनीति अपने दम पर करते हैं।
        उधर सोनिया गांधी ने इस विधेयक पर विरोध करते हुए कहा कि यह संविधान का काला दिन है और इसी तरह  की संज्ञा से संविधान की इतिहास में इसे याद किया जा सकता है। सोनिया गांधी का कहना है यह कट्टरपंथी सोच वालों की जीत को दिखाता है। यह कुछ ऐसा है जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने लड़ाई लड़ी  थी भारतीय संविधान के नींव के पत्थर  के रूप में जाने जाने वाले  डॉक्टर अंबेडकर ने भी कहा है कि अगर हमारे पड़ोसी देशों में लोगों को प्रताड़ित किया जाता है तो उन्हें नागरिकता देना हमारा कर्तव्य है। अमित शाह ने इसी बात को उठाते हुए कहा कि हमारे देश में लोकतांत्रिक पद्धति को कभी रोका नहीं गया, सिर्फ इमरजेंसी की अवधि में थोड़ा ऐसा हुआ। उन्होंने अफगानिस्तान , बांग्लादेश और पाकिस्तान के संविधान का हवाला देते हुए इन तीनों देशों का राज धर्म इस्लाम है और यह तीनों देश हमारी भौगोलिक सीमा से जुड़े हैं और इस्लामी हैं । इसलिए अल्पसंख्यक समुदाय वहां हिंदू है और उनपर सारे जुल्म होते होते हैं इसलिए वह भागकर हमारे देश में आते हैं । शाह ने आंकड़े पेश करते हुए कहा कि हमने विगत 5 वर्षों में उपरोक्त 3 देशों के 566 मुसलमानों को भारत की नागरिकता दी है उन तीनों देशों में उन लोगों को नागरिकता दे रहे हैं जो अल्पसंख्यक हैं और धर्म के आधार पर उनको उत्पीड़ित किया जा रहा है विपक्षी दलों में इसे संविधान के समानता के अधिकार के विपरीत बताया और कहा कि सुप्रीम कोर्ट में टिक नहीं पाएगा।
         पूर्वोत्तर भारत में इस विधेयक का जमकर विरोध हो रहा है। जगह जगह छात्रों ने मार्च निकाला है और कई जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। उनका कहना है कि यह संविधान के विपरीत है। छात्रों के प्रदर्शन को देखते हुए वहां अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया है। लोग कह रहे हैं यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और कोर्ट में इसे निरस्त किया जा सकता है। लेकिन अगर ऐसा होता भी है तो जो व्यक्ति या जिस दल ने इसे कोर्ट में पहुंचाया है  उसकी  जिम्मेदारी होगी कि  वो प्रमाणित करें कि यह संविधान के विपरीत है । इस विधेयक से संविधान के मूलभूत ढांचा नहीं बदला जा सकता है। यह मामूली कानून है जिसके जरिए संविधान का ढांचा बदलना मुश्किल है। इसलिए इस बात को कोर्ट में साबित करना कठिन हो जाएगा कि इससे संविधान का ढांचा बदला है और अब अगर कोर्ट से स्वीकार करता भी है तो हालात थोड़े से बदल सकते हैं । क्योंकि अब यह कोर्ट  पर निर्भर करता है कि संविधान के मूलभूत ढांचे को कैसे परिभाषित करता है। अगर इसे कोर्ट में चुनौती दी गई तो देश ही नहीं संपूर्ण विश्व की निगाहें इस पर होंगी । बहुसंख्यक वाद के कारण कई बार  संसद गलत कानून बना देती है तो ऐसी स्थिति में अदालत न्यायिक समीक्षा की अपनी ताकत को प्रयोग में लाते हुए इस पर अंकुश लगाती है और संविधान को बचाती है। अब अगर यह मामला कोर्ट में जाता है तो पूरी दुनिया की निगाहें इस पर होगी।


Wednesday, December 11, 2019

सीएबी पर सकारात्मक नजरिए की जरूरत

सीएबी पर सकारात्मक नजरिए की जरूरत 

नागरिकता संशोधन विधेयक सी ए बी  के आलोचकों में बहुत से ऐसे विद्वान भी शामिल हैं जो यह प्रमाणित करना चाह रहे हैं कि यह  आइडिया ऑफ इंडिया के खिलाफ है। यह उसके आधारभूत सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन करता है। लेकिन संभवत है ऐसा कुछ नहीं है। दरअसल, नागरिकता संशोधन विधेयक 1955 के नागरिकता कानून में बदलाव को मंजूरी देता है। 1955 का कानून हमारे देश के दुखद बंटवारे और बड़ी तादाद में अलग-अलग धर्मों के मानने वालों फिर पाकिस्तान से भारत आने और भारत से पाकिस्तान जाने के कानून में बदलाव के उद्देश्य से लाया गया था। क्योंकि भारत-पाक के बीच आवागमन से परिस्थितियां भयावह हो रही थीं। जिस समय दोनों देश नहीं बने थे और जनसंख्या की अदला-बदली नहीं हो सकी थी और उसके बाद  जब बंटवारा हुआ  तो तात्कालिक रूप में भारत को धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश बनाने का फैसला किया गया। लेकिन पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर दिया। किसी धर्म के नाम पर देश को बनाना शायद उस काल में ताजा उदाहरण था। पाकिस्तान के इस कदम से पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के सारे सिद्धांत धरे के धरे रह गए। 1948 में जिन्ना की मौत के बाद पाकिस्तान धीरे धीरे धार्मिक राष्ट्र बन गया। वहां रहने वाले गैर मुसलमानों ,खास करके हिंदुओं और ईसाइयों की मुसीबतें आकाश छूने लगीं। पाकिस्तान में गैर मुसलमानों पर जुल्म बढ़ने लगे और उनका वहां से पलायन शुरू हो गया। यह क्रम 1971 में बांग्लादेश बनने तक जारी रहा। पाकिस्तान के हिंदू और ईसाई समुदाय ने भाग कर भारत में शरण ली। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान में गैर मुस्लिम समुदायों की आबादी बुरी तरह कम हो गई । आंकड़े बताते हैं कि उनकी आबादी महज 2% रह गई थी। अपुष्ट आंकड़ों के मुताबिक कहा जाता है कि लगभग 45 लाख हिंदू और सिख पाकिस्तान से भागकर भारत आए थे। इस सूरत में 1955 में नागरिकता कानून में संशोधन की जरूरत महसूस होने लगी। जो पाकिस्तान से छोड़कर भारत को अपना घर बार मान कर आ गए थे वह बिना मुल्क के आदमी हो गए। उनकी अपनी कोई भी गलती नहीं होने के बाद भी वह गैर मुल्की थे । इसी पृष्ठभूमि में "आइडिया ऑफ इंडिया " तैयार हुआ। यह दरअसल एक ऐसे देश की कल्पना है जो धर्मनिरपेक्षता को व्यवहार तथा कर्म और शब्दों में शामिल करता है । यहां हर धर्म के लोग बिना भेदभाव रह सकते हैं ।आहिस्ता आहिस्ता राजनीतिक स्वार्थ ने इस धर्मनिरपेक्षता शब्द को एक गाली बना दी और इसी के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक को तैयार किया गया। इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए हिंदू ,बौद्ध ,जैन धर्मावलंबियों को नागरिकता हासिल करने का मौका देता है । मूल नागरिकता कानून में किसी को भी भारत का नागरिक बनने के लिए लगातार 11 वर्षों तक भारत में रहने की शर्त पूरी करनी होती है नए संशोधन में 11 साल की अवधि को घटाकर 6 साल कर दिया गया है। धार्मिक आधार पर लोगों पर होने वाले जुल्म एक कटु सत्य है। इससे जाहिर होता है कि सीएबी धार्मिक आधार पर होने वाले जुल्मों से बचने के लिए इधर उधर पलायन करने और राजनीतिक उठापटक की वजह से अपना देश छोड़ने को मजबूर हुए लोगों में फर्क करता है । कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं नागरिकता संशोधन विधेयक लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम के आतंक की वजह से भारत में आए तमिल शरणार्थी शिविरों में शरण लिए लोगों को कोई राहत नहीं देगा । लेकिन 2008 -9 से पहले के कई दशकों में तमिलों ने भारत में पनाह ली थी। लेकिन उचित तो यह होगा सरकार आगे चलकर इन बारीकियों को भी स्पष्ट करे। नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोधी खास करके राजनीति की रोटी सेंकने वाले लोग यह  प्रचार कर रहे हैं कि इस विधेयक के प्रावधान मुस्लिम विरोधी हैं। सरकार को इसके लिए व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान आरंभ करना चाहिए। क्योंकि इस विधेयक में उन करोड़ों मुसलमानों का कोई जिक्र नहीं है जो भारत के नागरिक के तौर पर देश के बाकी नागरिकों की तरह अपने अधिकारों का बराबरी से उपयोग कर रहे हैं। इसे मुस्लिम विरोधी कहने वाला जुमला केवल वोट बैंक की राजनीति है। ताकि देश का माहौल खराब हो। ऐसे में सरकार का यह कर्तव्य बनता है कि वह इस असत्य का फौरन जवाब दे। वरना हालात सांप्रदायिक तनाव में बदल जाएंगे और इसके बाद जो विद्वेष फैलेगा उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा। यही नहीं इस विधेयक के खिलाफ यह भी कहा जा रहा है कि यह संविधान की धारा 14 का उल्लंघन है। संविधान की धारा भारत के सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देती है। इस विधेयक से स्पष्ट है कि इसके प्रावधान अरुणाचल प्रदेश मिजोरम और नगालैंड पर लागू नहीं होंगे। सवाल उठता है कि इस विधायक का असम में क्यों विरोध हो रहा है, खास करके जो इलाके कृषि प्रधान या चाय बागान वाले हैं । इसकी मुख्य वजह है कि इन इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों पर काफी दबाव है । 1971 मैं बांग्लादेश के जन्म के बाद और बांग्लादेश के जन्म से पहले बड़ी तादाद में हिंदू समुदाय के लोग भारत में पनाह ले रहे थे। ऐसे में हिंदुओं को शरणार्थी और मुसलमानों को बाहर का घुसपैठिया माना गया था । हमारे भारतीय राजनेताओं को देश में तेजी से बदलते सामाजिक स्वरूप और उस समाज के भू राजनीतिक समीकरणों में आ रहे परिवर्तनों को ठीक से समझने की जरूरत है। तभी वह लोग नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को समझ पाएंगे और मानवाधिकार के नजरिए से देख सकेंगे। सबसे जरूरी है कि सभी राजनीतिक दल अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर उठकर भरोसे के माहौल में नागरिकता के व्यापक पहलुओं को देखें ताकि बंटवारे का घाव भर सके। समाज में नया विद्वेष पैदा होने से बचें। आइडिया ऑफ इंडिया का सबसे पहला सिद्धांत है इंडिया को कायम रखना ना कि इंडिया छिन्न-भिन्न कर देना।  इसके लिए सकारात्मक दृष्टिकोण की आवश्यकता है राजनीतिक स्वार्थ की नहीं।


Tuesday, December 10, 2019

सीएबी आगे क्या होगा कोई जाने ना

सीएबी आगे क्या होगा कोई जाने ना 

बहुप्रतीक्षित और बहुचर्चित नागरिकता संशोधन विधेयक सोमवार को लोकसभा में पास हो गया। लोकसभा में जब इसे विचारार्थ  प्रस्तुत किया गया तो भारी वाद विवाद हुआ। हालात यहां तक पहुंचे एक सदस्य ने तो विधायक की प्रति तक फाड़ डाली। फिर भी इसके पक्ष में 293 मत मिले और विपक्ष में 82 वोट पड़े।
जैसी कि  उम्मीद थी पाकिस्तान ने इस विधेयक की आलोचना करते हुए कहा है कि यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार तथा  धर्म या आस्था  के आधार पर  भेदभाव  रोकने वाले अंतरराष्ट्रीय नियमों का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन है। इस बीच पूर्वोत्तर भारत के छात्रों के एक संगठन मंगलवार की सुबह से 11 घंटे का बंद बुलाया है।
लोकसभा में इस विधेयक को पेश करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलेगी। विधेयक पर आपत्ति उठाते हुए कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि इसका निशाना देश के अल्पसंख्यक लोगों पर है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 5,10 ,14 ,15 की मूल भावना का उल्लंघन करता है। गृहमंत्री ने जवाब में कहा कि यह  .001 प्रतिशत भी अल्पसंख्यकों के लिए अभिप्रेत नहीं है। कई राजनीतिक और सामाजिक तबके इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि बांग्लादेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान के हिंदू ,बौद्ध, जैन ,पारसी, ईसाई और सिख धर्मावलंबी को भारतीय नागरिकता देने का इसमें प्रस्ताव है इसमें मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। संविधान विशेषज्ञों के अनुसार इसके पहले 1955 में नागरिकता अधिनियम में संशोधन किया गया था उसके अनुसार अवैध तरीके से बाहर से आए लोगों जो परिभाषा तय की गई थी, इसके अनुसार इसकी दो श्रेणियां थी,  एक वह लोग जो बगैर पासपोर्ट या वीजा के या बिना किसी कागजात के भारत में दाखिल हुए हैं और दूसरे हुए जो सही दस्तावेजों के साथ रहे हैं लेकिन एक तयशुदा अवधि के बाद भी यहां रुके रह गए हैं। इसी में संशोधन किया जा रहा है। बांग्लादेश ,पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाले 6 समुदाय के लोगों को अब अवैध या घुसपैठिया  नहीं माना जाएगा । लेकिन इसमें मुसलमान शब्द नहीं है। यानी इन तीनों देशों से जो आए हैं और अगर मुसलमान हैं तो उन्हें घुसपैठिया माना जाएगा।  ऐसे लोगों को भारत में नागरिकता अवसर नहीं मिलेगा। इसीलिए राजनीतिक नेता इसे मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव वाला बताकर समाज में असंतुलन पैदा करना चाहते हैं।
गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में कहा कि शरणार्थी और घुसपैठिए में फर्क होता है। वे लोग जो किसी जुल्मों सितम के कारण भारत में आए या अपने धर्म की रक्षा के लिए या अपने परिवारों की महिलाओं की रक्षा के लिए भारत में आए वह शरणार्थी हैं और जो लोग गैर कानूनी ढंग से यहां आए वे घुसपैठिया हैं। उन्होंने कहा कि रोहिंग्या को नहीं स्वीकार किया जाएगा मैं इसलिए पूरी तरह से साफ करना चाहता हूं  कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर हमारा है और वहां के लोग भी हमारे हैं। आज भी हम उनके लिए जम्मू कश्मीर विधानसभा में 24 सीटें आरक्षित रखे हुए हैं। गृह मंत्री ने कांग्रेस की बात का करारा जवाब दिया और कहा कि यह संविधान की धारा 14 का उल्लंघन नहीं है। 1991 में भारत में हिंदुओं की आबादी 84% थी और 2011 में यह घटकर 79% हो गई 1991 में भारत में मुस्लिमों की आबादी 9.8% थी आज  14.33% हो गई है। हमने कभी भी धर्म के नाम पर भेदभाव नहीं किया और ना ही करेंगे।

अब यह विधेयक राज्यसभा में पेश किया जाएगा इसके लिए भाजपा ने सदन में अपने सदस्यों को 10 और 11 दिसंबर के लिए व्हिप जारी किया है।
        यह भारतीय नागरिकों के पक्ष में है लेकिन भारत में कुछ लोगों का सुर बदल रहा है। इस विधेयक के समर्थकों को बंटवारे की बात फिर से उठाते सुन रहे हैं। वह बकाया मसलों जैसे जुमले का इस्तेमाल तो नहीं कर रहे हैं पर गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ न्याय आदि की बात से लगभग साफ साफ संकेत दे रहे हैं कि उनका कहना है कि यह अधिनियम पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों से किए गए वादे को निभाता है। वादा किया था इस पर बहस हो सकती है इसमें कोई संदेह नहीं है। इस देश में मुसलमानों के लिए अपने जिस एक मुल्क पाकिस्तान की कल्पना की गई थी उस के लिए संघर्ष करके हासिल किया था लेकिन इसका मतलब यह नहीं था इसके बाद भारत में उनका घर नहीं रहेगा। यह भी सच है कि मजहब के आधार पर आबादी का बहुत बड़ी संख्या में बदल बदल हुआ जिसमें भारी खून खराबा, कत्लेआम और बलात्कार इत्यादि हुए। पश्चिमी क्षेत्र में यह बदलाव करीब 2 साल में पूरा हो गया। भारत के पंजाब में काफी मुसलमान रह गए तो पाकिस्तान के पंजाब में काफी कम हिंदू बच गए थे। यह सिलसिला 1960 के दशक तक थोड़ा बहुत चला। 1965 के युद्ध के बाद फिर अदला बदली हुई और फिर उसके बाद यह सिलसिला बंद हो गया। लेकिन पूर्वी भारत में इसकी तस्वीर बहुत अलग थी। कई कारणों से पूर्वी पाकिस्तान और भारत के पश्चिम बंगाल, असम एवं त्रिपुरा के बीच ऐसा नहीं हो सकता। बंगाली मुसलमानों की बहुत बड़ी आबादी भारत में रह गयी और हिंदुओं की आबादी तत्कालीन  पूर्वी पाकिस्तान में रह गई। दंगे फसाद होते रहे और जवाबी अदला बदली भी होती रही। इसे रोकने के लिए नेहरू- लियाकत समझौता हुआ। जिसमें काफी स्पष्टता  और विस्तार से कई शर्ते जोड़ी गयी थीं। भाजपा का आज यह कहना है कि बंटवारे के एक बकाया मसले का यह नया विधायक जवाब है। इसका मुख्य कारण है कि पाकिस्तान ने नेहरू - लियाकत समझौते में  अपने वायदे को नहीं निभाया।  यहीं से हमारा सामना इतिहास की जटिलताओं से होने लगा। विख्यात इतिहासकार सी एच फिलिप्स ने अपनी किताब "पार्टीशन ऑफ इंडिया" में इस जटिलता की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार पहली जटिलता थी कि भारत के संस्थापकों ने जो धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र बनाना चाहा उसमें जिन्ना के दो राष्ट्रों के सिद्धांत के लिए कोई जगह नहीं थी और दूसरी कि पुराने इतिहास के अंत और नए इतिहास की शुरुआत की  रेखा कहां मानी जाए, तीसरे क्या राष्ट्रीय और स्थानीय पर्याय हैं ,क्या धर्म में और जातीयता तथा भाषा में फर्क नहीं है। लेकिन पूरब की हालत कुछ दूसरी थी। असम की आबादी घनी नहीं थी 20 वीं सदी की शुरुआत में पूर्वी बंगाल से बहुत बड़ी संख्या में लोग यहां आए वे मूलतः आजीविका की तलाश में आए थे ।  1931 में  असम में जनगणना करने वाले अंग्रेज अधिकारी सीएम मुल्लन ने पहली बार उनके लिए "घुसपैठ" शब्द का प्रयोग किया। मुल्लन ने लिखा यह बहुत महत्वपूर्ण घटना है जो असम के भविष्य और असमी संस्कृति सभ्यता को हमेशा के लिए बदल सकती है। 1947 के पहले मुसलमान तो रह गए लेकिन इसके बाद प्रताड़ित हिंदू यहां आने लग गए।  पूरे क्षेत्र में जातीय संतुलन बिगड़ गया और यही वजह है कि सीएबी असम की चिंताओं को दूर करने में नाकाम है। यहां प्रमुख चिंता धर्म को लेकर नहीं है बल्कि जातीयता, संस्कृति और राजनीतिक सत्ता को लेकर है। आर एस एस ने और भाजपा में विगत 3 दशकों में इसे बदलने की कोशिश की लेकिन कुछ हो नहीं पाया, क्योंकि ज्यादातर मुसलमान आजादी के पहले के लोग हैं। उन्हें नागरिकता से इनकार नहीं किया जा सकता। बंगाली हिंदू हाल के हैं यही वजह है कि एनआरसी के तहत जिन 19 लाख लोगों को खारिज किया गया है उनमें ज्यादातर या कह सकते हैं 60% के आसपास गैर मुस्लिम हैं। यहीं आकर भाजपा एक विरोधाभास में फंस जाती है। इंदिरा- मुजीब समझौते के अनुसार 23 मार्च 1971 को कटऑफ तारीख तय किया गया था लेकिन इस तारीख को अगर सामने रखें तो ज्यादा हिंदू फंसते हैं तो फिर कितना पीछे जाएं । भाजपा इसे ताजा सीएबी के जरिए हल करने की कोशिश कर रही है। असम वाले से मानेंगे नहीं। भाजपा को भी पता है कि सीएबी और इसके साथ एनआरसी के विचार शुरू से ही व्यर्थ हैं लेकिन कुछ तो करना होगा! इसका विरोध जरूर होगा। जो इसका विरोध करेंगे उन पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाकर राजनीतिक लाभ तो मिल ही जाएगा बस यही पर्याप्त है।


Monday, December 9, 2019

क्या हम सचमुच गुस्से में हैं?

क्या हम सचमुच गुस्से में हैं?

विगत कुछ दिनों से, फर्ज कर लीजिए, हफ्ते भर से ज्यादा वक्त होगा देश में महिलाओं के खिलाफ कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जो बेशक दहला देने वाली थी और हम उसे देख कर सबसे ज्यादा आक्रोशित भी हुए। लेकिन इसका नतीजा क्या हुआ, या आगे क्या होगा?
रविवार को सिवान जंक्शन पर सरेआम एक महिला को किसी ने गोली मार दी वहीं उसकी मृत्यु हो गई उसके साथ की महिला शायद उसकी मां थी चीखती चिल्लाती रही कोई उसकी मदद के लिए सामने नहीं आया सब वीडियो बनाने में मशगूल थे। 2 दिन पहले का हमारा आक्रोश इस तरह दिखाई पड़ रहा था कोई मददगार नहीं था एक बेबस महिला प्लेटफार्म पर चीख रही थी और सामने पड़ी थी एक लहूलुहान लाश। क्या यही हमारा आक्रोश है? आगे क्या होगा कोई नहीं जानता।
      2012 में निर्भया कांड हुआ था। कई दिनों तक मोमबत्तियां जलाई गई थीं, धरने हुए थे, नारे लगे थे । ऐसा लग रहा था सब कुछ बदल जाएगा लेकिन इन 7 वर्षों में कुछ नहीं बदला। अब इन घटनाओं को लेकर भी ऐसा ही महसूस हो रहा है। लेकिन क्या बदलेगा यह कोई ठीक से नहीं जानता।         
     अगर अपराध के रिकॉर्ड देखेंगे तो उत्तर प्रदेश महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक जगह है।देश में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य में महिलाओं के प्रति सबसे ज्यादा अपराध हुए हैं। 2011 की गणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में महिलाओं की संख्या 9 करोड़ 53 लाख है।  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि इस राज्य में 1 वर्ष में महिलाओं के साथ हिंसा के 56000 वाकये हुए। पुराना रिकॉर्ड अगर देखें तो 2015 में महिलाओं के साथ 35908 ,2016 में 49262 घटनाएं हुईं जो 2017 में बढ़कर 56000 हो गईं।  उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा नंबर है महाराष्ट्र का। वैसे अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2017 के आंकड़े बताते हैं कि देशभर में महिलाओं के साथ हिंसा और अपराध की घटनाएं बढ़ी हैं। उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश महाराष्ट्र पश्चिम बंगाल राजस्थान कुछ ऐसे राज्य हैं जहां महिलाओं के साथ सबसे ज्यादा अपराध हुए हैं। उन्नाव कांड की रोशनी में देखें तो ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं के प्रति अपराध की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। पूरे देश में उत्तर प्रदेश एक ऐसा प्रांत है जहां पूरी घटनाओं का 15.6 प्रतिशत महिलाओं के प्रति हैं इसके बाद महाराष्ट्र 8.9 प्रतिशत और मध्य प्रदेश 8.3 प्रतिशत है।
        हैदराबाद से लेकर उन्नाव तक की घटनाओं से पूरा देश का आक्रोश अखबारों की खबरें और टीवी चैनलों के समाचारों मैं दिख रहा है और वह समस्त दृश्य और श्रव्य वर्णन इस बात के गवाह हैं कि पूरा देश बहुत आक्रोश में है लेकिन यह क्लीव आक्रोश  क्या कर सकता है? क्या इसका कोई सकारात्मक नतीजा निकलेगा? यहां एक सवाल उठता है कि क्या सचमुच हम आक्रोशित हैं और अगर आक्रोशित हैं इसका असर क्या होगा? यह आक्रोश कितने दिनों तक टिकेगा? ऐसा इसलिए पूछा जा रहा है की आक्रोश के पीछे कई बार राजनीतिक एजेंडे का स्वरूप भी दिखाई पड़ता है। कुछ लोग इस गुस्से में मजहबी एंगल भी ढूंढ लेते हैं । थोड़े-थोड़े थोड़े दिनों के बाद देश ऐसे ही कुछ  कांडों पर जान समुदाय आक्रोशित होता है और उसके बाद सब कुछ शांत हो जाता है। ऐसा नहीं लगता है कि आक्रोश जाहिर करने के पहले हमें अपनी जागृत संवेदना के साथ कुछ ठोस करना होगा? यद्यपि, क्रोध प्रकट करना कोई गलत नहीं है क्योंकि एक आम आदमी इससे ज्यादा कर भी क्या सकता है। लेकिन हमें वास्तव में इसके समाधान के लिए इसके कारणों को समझना होगा।
          हैदराबाद के दर्दनाक कांड के बाद  राज्य कृषि मंत्री की एक बड़ी हास्यास्पद टिप्पणी आती है कि "बेहतर होता , पीड़िता अपने बहन को फोन करने की बजाय पुलिस को फोन करती। " जबकि हकीकत यह है कि थानों में भी महिलाओं के साथ यौन अपराध की घटनाएं सुनी गई हैं । राजस्थान के थाने के भीतर का कांड अभी बहुत ज्यादा पुराना नहीं है। रुकैया की चीखें अभी भी कानों में गूंज रही है। जो लोग कठोर कानून ,न्यायपालिका और सरकार को ही इनका समाधान मानते हैं। वह शायद  विषय की गंभीरता को समझे बिना फौरी तौर पर अपनी प्रतिक्रिया देते रहते हैं। कानून का भय निश्चित ही समाज में जरूरी है। ऐसी आपराधिक घटनाओं के बाद पुलिस को बहुत जल्दी अपनी जांच पूरी करनी चाहिए और समस्त रिपोर्ट जल्द से जल्द कोर्ट के सामने प्रस्तुत करना चाहिए। जल्द से जल्द इसकी सुनवाई होनी चाहिए और इस पर इंसाफ हो जाना चाहिए। अपराधी को दंड  आनन-फानन में मिलना चाहिए। यकीनन इससे अपराधियों में कानून का भय बनेगा और अपराध कम होंगे। लेकिन इन सब बातों में क्या हम अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हैं या हम उस उत्तरदायित्व को तय करते हैं कि कठोर कानून बेहतर पुलिसिंग और त्वरित न्याय व्यवस्था का निश्चित ही असर होगा। लेकिन जब तक इन पर कोई सामाजिक प्रक्रिया नहीं होगी इसके प्रभाव  नहीं पड़ेंगे। ऐसे में अपराध से निपटने के लिए केवल सरकार, राजनीति, पुलिस और न्यायपालिका पर ही सारी जिम्मेदारी छोड़कर केवल कोरा आक्रोश व्यक्त किया जाए। उससे ज्यादा अच्छा तो होगा कुछ सकारात्मक सुझाव राजनीतिक दलों ,सामाजिक संगठनों, अध्यात्मिक धार्मिक संगठनों ,शैक्षिक संस्थाओं और समाज के बुद्धिजीवी वर्गों को पहल करनी चाहिए। यही नहीं, ऐसे अपराधियों की मनोदशा का कुछ मनोवैज्ञानिकों द्वारा शोध किए जाने की आवश्यकता है। शहरों में तो पास पड़ोस के लोग आपस में परिचित तक नहीं होते। उसमें सुरक्षा की गारंटी कैसे संभव हो सकती है। कानून के भय से बड़ा  समाज का होता है । समाज ने खुद ही इस भय को दूर कर दिया। वस्तुतः बलात्कार की शिकार अधिकांश खरगोन के भीतर लोक लज्जा के परदे में दबी रह जाती है और दरिंदों का क्रूर है अट्टहास जारी रहता है इस पर लगाम लगाना जरूरी है।


Sunday, December 8, 2019

न्याय जरूरी है बदला नहीं

न्याय जरूरी है बदला नहीं 

हैदराबाद मुठभेड़ के बाद बलात्कार पीड़िता के परिजन और आम जनता में बहुत से लोग इस पर खुशी से तालियां बजाते नजर आए के कि बलात्कारियों को मार डाला गया। कुछ लोगों ने पुलिस के समर्थन में जुलूस भी निकाले। टीवी और सोशल मीडिया में पुलिस कार्रवाई के समर्थन में6 बयानात भरे थे। हालांकि इस तरह के जवाब कभी भी कार्रवाई की वैधानिकता को उचित नहीं बता सकते और ना प्रमाणित कर सकते हैं । यह कानून के प्रति हमारे अविश्वास का एक उदाहरण है। हमारी संसद में लिंचिंग पर बहस होती है उनके बारे में दलीलें  दी जाती हैं ऐसा लगता है की इनका इरादा कानून बनाने का नहीं कानून तोड़ने का है। बेशक बलात्कार एक गंभीर तथा  अत्यंत घृणित अपराध है और इस तरह के अपराधियों से तुरंत तथा कड़ाई से निपटने की जरूरत है। ऐसा होता नहीं है और यह नहीं होना हमारी पुलिस व्यवस्था तथा न्याय व्यवस्था का एक दुखद अध्याय हैं । ऐसे मामलों को जल्दी निपटाने के लिए पुलिस को प्रभावशाली ढंग से तथा तीव्रता से जांच करनी चाहिए। न्याय व्यवस्था में इसे फास्ट ट्रैक कोर्ट से  निपटाया जाना चाहिए और जल्दी से जल्दी सजा  मिलनी चाहिए।  जब तक लोगों के मन में घटना की तस्वीर रहेगी उसके पहले अगर सजा मिल जाती है तो यह हमेशा याद रहती है। सार्वजनिक सोच से घटना के बिंबो या प्रतीकों के धुंधला जाने से सजा का मोल कम हो जाता है। दुर्भाग्यजनक है कि निर्भया कमेटी की अनुशंसाओं को अभी तक लागू नहीं किया जा सका। जबकि घटना के 7 वर्ष हुए ।सरकार ने इस मामले में खर्च के लिए एक सौ करोड़ रुपयों का आवंटन किया है। इनमें से अधिकांश राशि निर्भया कोष में मिले धाम से एकत्र की गई है। अभियुक्तों को इस तरह के मुठभेड़ों में मार दिया जाना न्याय पूर्ण नहीं है। मुठभेड़ कभी भी सामान्य नहीं होते। इस तरह के न्याय आमतौर पर  सशक्तिकरण के विरुद्ध होते हैं। यह कानून से अलग मारा जाना और इसके लिए जनमत तैयार करके एक तंत्र को विकसित करना एक तरह से से पुलिस और उच्च वर्गीय मानसिकता है। इससे सबसे बड़ी गड़बड़ी यह  होती है की समाज में जिसकी लाठी उसकी भैंस की मानसिकता पनपने लगती है और लोग कानून को अपना काम करने से रोक देते हैं। उत्तर प्रदेश में एक विधायक पर इसी तरह बलात्कार का मुकदमा हुआ और वह केवल जन बल के आधार पर मुक्त घूम रहा है। यही हालत कठुआ बलात्कार कांड में भी हुई। जो बलात्कार का अपराधी था उसका वहां जनाधार व्यापक था और भारी जन बल था। पकड़ा नहीं जा सका जो लोग इस तरह के न्याय को उचित बताते हैं वह इस तरह के अपराधों को भी उचित बता सकते हैं। अगर इस मामले में कोई उदाहरण तैयार करना है तो एक ही रास्ता है कि तेजी से न्याय हो। संविधान दिवस के समाप्त हुए अभी एक पखवाड़ा भी नहीं गुजरा है।  संविधान दिवस के दिन बड़ी-बड़ी बातें हुई थी अगर इसी तरह का न्याय करना है तो हमें संविधान की क्या जरूरत है।
      सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बोबडे ने शनिवार की शाम को इस मुठभेड़ पर उंगली उठाते हुए कहा कि न्याय कभी मुठभेड़ नहीं सकता।  गैंगरेप के आरोपियों को एनकाउंटर में मारे जाने की घटना की आलोचना की। उन्होंने कहा कि न्याय कभी भी आनन-फानन में नहीं हो सकता। ऐसा होने पर वह अपना चरित्र खो देता है। विख्यात मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री लियोन एफ सोल्जर के मुताबिक न्याय और बदले की भावना में कई फर्क होते हैं। बदला प्रथम स्थान पर तो स्पष्ट रूप से भावनात्मक होता है जबकि न्याय निष्पक्ष होता है।


Friday, December 6, 2019

जरूरत है स्थाई व्यवस्था की


जरूरत है स्थाई व्यवस्था की 
हैदराबाद बलात्कार कांड के आरोपियों को पुलिस ने मार डाला। यह अपराधियों के भीतर डर पैदा करने का एक आदर्श तरीका है। न कानून ,न सुनवाई सीधा फैसला। बेशक इससे अपराधी खास करके बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में शामिल लोग डरेंगे। लेकिन इससे अपराध बंद नहीं होगा। क्योंकि, अपराध एक मानसिक प्रक्रिया है या कहें मानसिक विकृति है और यह विकृति किसी न किसी रूप में कायम रहेगी। अब से कोई 7 साल पहले दिल्ली में इसी तरह की एक और घटना हुई थी। निर्भया कांड नाम से मशहूर इस घटना के बाद कानून में थोड़े से बदलाव आए। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस घटना के अपराधी के लिए मौत की सजा मुकर्रर कर दी है। उसके बाद अपील की प्रक्रिया शुरू हुई और अभी तक कुछ नहीं हो सका। इस बीच महिलाएं आतंक में जी रही हैं और नारी द्वेष का शिकार हो रही हैं। इसमें जो सबसे ज्यादा अपमानजनक है वह है थोथा आदर्शवाद और मूर्खतापूर्ण दलीलें, जो हमेशा कुछ लोग इस तरह के अपराध के बाद पेश करते रहते हैं। हैदराबाद की घटना में पुलिस ने मुठभेड़ में चारों को मार गिराया। इसके बाद अब आने वाले दिनों में इसे लेकर नई जुमलेबाजी शुरू होगी और जांच की मांग होगी। तरह-तरह की दलीलें पेश की जाएंगी। यहां सतरंगे सियासी वर्ण पट के एक छोर पर नारी द्वेष और लैंगिक भेदभाव है जो हमारे मिथ्या सामाजिक आचार संहिता  से जुड़ा है। इस तरह की बर्बर तथा क्रूर घटनाओं के समय उस का हवाला दिया जाता है। लेकिन इससे क्या होता है कुछ भी तो नहीं । कोई समाधान नहीं निकल पाता ना ही किसी लक्ष्य की प्राप्ति होती है। यह सोचना कि इस किस्म के बर्बर कांड खत्म हो जाएंगे अगर सभी लोग महिलाओं को सम्मान से देखने लगें। यह एक लुभावना आदर्श है। हमें उस संभावना के लिए तैयार रहना पड़ेगा कि अत्यंत प्रगतिशील सामाजिक नियमों और आस्थाओं के बावजूद कुछ लोग वहशियों की तरह आचरण जरूर करेंगे और आदर्श सामाजिक मूल्य उनसे निपटने में सक्षम नहीं हो सकेंगे।इस के लिए एक प्रभावशाली आपराधिक न्याय प्रणाली आवश्यक है। वर्णपट के दूसरे छोर पर हमारे समाज में कुछ ऐसे लोगों का एक जत्था है जो महिलाओं के रहन-सहन  उनके पहनावे और उनके कामकाज को लेकर ऐसे अपराधों का औचित्य प्रमाणित करता है। कुछ लोग पुरुषों के खानपान, टेलीविजन, फिल्म ,मोबाइल फोन इत्यादि को भी इसके लिए जिम्मेदार बताते हैं। यह हमारे झूठे  गुस्से को प्रतिबिंबित करता है । एक क्लीव प्रक्रिया की तरह है। हमें इस पर कठिन प्रश्न उठाने होंगे। अगर कानून बन भी जाता है तो वह पहला कदम है या कहें कि इस दिशा में पहला सोपान है। हमें एक ऐसे आदर्श और जिम्मेदार प्रणाली को विकसित करना होगा जो कानून को लागू करे। सजा की कठोरता केवल एक चरण है ,बेशक वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन कानून को लागू करने वाली एजेंसी को भी जिम्मेदारी पूर्वक इसमें काम करना पड़ेगा।  गुस्से से कुछ नहीं होता। आज जो हैदराबाद में हुआ उससे कुछ समय के लिए बेशक हमारा असंतोष या कहें हमारा क्रोध शांत हो जाएगा ,लेकिन उपलब्धि क्या होगी? हर बार क्या बलात्कारियों को इसी तरह गोली मार दी जाएगी। उनकी सुनवाई जरूर होनी चाहिए, लेकिन जल्दी हो और कठोर से कठोर सजा मिले। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए।          महिलाओं के प्रति अपराध से मुकाबले के लिए हमारा जो तंत्र है उसकी क्षमता भी पर्याप्त नहीं है । इसके लिए सबसे पहले हमें पुलिस के सभी स्तरों पर महिलाओं की भर्ती करनी होगी साथ ही जजों और अन्य संबंधित अधिकारियों की भी भर्ती करनी होगी। महिलाओं के प्रति अपराध में दो चरण होते हैं। पहला तो संसाधन का और दूसरा हमारी संस्कृति का। जब तक संसाधन नहीं पूरे होंगे तब तक कुछ नहीं किया जा सकता । आज पुलिस कांस्टेबल में भर्ती के लिए भी कम से कम दसवीं पास का होना जरूरी है। पुलिस व्यवस्था में लगभग 95% लोग कॉन्स्टेबल हैं। अब ऐसे लोगों को जब तक कठोर ट्रेनिंग नहीं दी जाएगी और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों से निपटने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं किया जाएगा तब तक कुछ नहीं हो सकता। हमें कांस्टेबल की भर्ती और ट्रेनिंग दोनों में आमूलचूल सुधार लाना होगा। अपराध शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार सबसे आवश्यक होता है केस हिस्ट्री में मॉडस  ऑपरेंडी का अध्ययन। इससे अपराधी के मनोविज्ञान पर प्रकाश पड़ता है। इन दिनों जो बलात्कार की घटनाएं घट रही हैं उसमें बलात्कार की शिकार युवती को जला देने की शुरुआत हुई है। इसके कारणों का जब तक पता नहीं लगाया जा सकेगा तब तक ऐसे अपराधों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। हैदराबाद में जो कुछ हुआ वह एक तात्कालिक गुस्से का इजहार था।  इसकी स्थाई व्यवस्था जब तक नहीं होगी तब तक कुछ नहीं हो सकेगा।

Thursday, December 5, 2019

अब शुरू होगी नागरिकता पर नई बहस

अब शुरू होगी नागरिकता पर नई बहस

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को नागरिकता संशोधन विधेयक पारित कर दिया है। इस विधेयक के अनुसार गैर मुस्लिमों को जो बांग्लादेश पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान से आए हैं भारतीय नागरिकता प्रदान करने का भी प्रावधान है। अब यह विधेयक संसद में प्रस्तुत किया जाएगा। नए विधेयक में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि किसे घुसपैठिया माना जाएगा। विधेयक में कट ऑफ तारीख 31 दिसंबर 2014 तय की गयी है। यही नहीं, किसी भी भारतीय प्रवासी नागरिक को फरियाद का मौका दिया जाएगा। नए विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि इसकी धाराएं  अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड ,मिजोरम  और मणिपुर में लागू नहीं होंगी। कैबिनेट द्वारा मंजूरी दिए जाने के पूर्व मंगलवार को गृह मंत्री अमित शाह ने असम के छात्र संगठनों और नागरिक संस्थानों के प्रतिनिधियों के साथ भी नागरिकता संशोधन विधेयक पर बातचीत की। इस वार्ता में असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल भी शामिल थे। बातचीत के दौरान ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन समेत कई संगठनों ने गृह मंत्री के सामने इस विषय पर अपनी चिंता प्रगट की कि इस विधेयक पर पूर्वोत्तर के लोग काफी नाराज हैं। इसी नाराजगी की छाया में गृहमंत्री ने यह बैठक बुलाई थी । बड़ी संख्या में पूर्वोत्तर के लोगों और कुछ संगठनों ने इस विधेयक का विरोध किया है। उनके मुताबिक सन 1985 की असम संधि के प्रावधानों को इस बिल के बाद निसंदेह निरस्त मान लिया जाएगा ।जबकि उन प्रावधानों में 24 मार्च 1971 के बाद आए सभी लोगों को घुसपैठिया माना गया है। सभी लोग चाहे जिस जाति के हों , जिस धर्म के हों। पिछले हफ्ते पूर्वोत्तर के 12 गैर भाजपा सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर इससे होने वाली मुश्किलों पर भी ध्यान  रखने की अपील की थी।  यहां इस बात को समझना बहुत आवश्यक है कि इसका विरोध क्यों हो रहा है? विरोध का कारण है कि पड़ोस में बांग्लादेशी मुसलमान और हिंदू दोनों बड़ी संख्या में अवैध तरीके से भारत में आकर बस जा रहे हैं और इसके पीछे का राज यह है कि वर्तमान सरकार हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की फिराक में है और इसीलिए प्रवासी हिंदू समुदाय को सुविधाएं मुहैय्या कराने की बात चल रही है और इसी के विरोध में स्थानीय समुदायों ने प्रदर्शन आरंभ कर दिया है। हालांकि  अभी तक कोई हिंसक घटना सुनने को नहीं मिली है लेकिन यह तय है कि इस पर अगर सरकार आगे कदम बढ़ाती है तो स्थानीय जनता का गुस्सा फूट पड़ेगा और जब जनता का गुस्सा सरकार के खिलाफ होता है तो उस सरकार का हश्र क्या होता है यह सब जानते हैं। अब सवाल है कि विरोध की आशंका के बावजूद भाजपा क्यों इस पर कदम बढ़ा रही है? भाजपा के भरोसे का मुख्य कारण है उस क्षेत्र में भाजपा को मिला समर्थन। समूचे पूर्वोत्तर की 25 संसदीय सीटों में से भाजपा को और फिर सहयोगी पार्टियों को  अट्ठारह पर विजय मिली।असम भा ज पा  नेताओं का कहना है कि असम के लोगों ने उनकी पार्टी को नागरिकता के मुद्दे पर समर्थन दिया है इस विधेयक के पारित हो जाने से भाजपा को बहुसंख्यको की पार्टी होने की छवि और सुधरेगी।
         अब ऐसा दिख रहा है कि भाजपा इसे संसद   के शीतकालीन सत्र में पारित करवाने की योजना बना रही है। लेकिन इस विधेयक की व्यवहारिकता पर बहुत कम चर्चा हुई है। अमेरिका मैक्सिको सीमा पर दीवार बनाने की ट्रंप की योजना की तरह भी व्यावहारिक नहीं है। लेकिन इससे जो आर्थिक बोझ पड़ेगा उससे इनकार नहीं किया जा सकता। लड़खड़ाते जीडीपी के इस माहौल  में यह बहुत बड़ा बोझ होगा असम में एनआरसी को अपडेट करने की प्रक्रिया में 4 साल से ज्यादा समय लगा था  और खबरों की मानें तो 55 हजार लोगों को इस पर काम में लगाया गया था। जिसमें सरकार का सोलह सौ करोड़ रुपया खर्च हुआ था। याद होगा कि शुरुआत में इससे 40 लाख लोगों को बाहर रखा गया था और कारण सत्यापन की प्रक्रिया के दौरान धन और उपयोगिता का काफी नुकसान हुआ। डर है कि एनआरसी की यह पूरी कवायद लगभग नोटबंदी की तरह व्यर्थ ना हो जाए। क्योंकि इस पर अंतिम सूची के प्रकाशन भर से ही पूर्णविराम नहीं लग रहा है। दरअसल यह  संपूर्ण प्रक्रिया का पहला भाग है। सबसे  बड़ी समस्या तो तब उत्पन्न होगी जब एनआरसी से बाहर लोगों के बारे में सोचा जाएगा । उनका क्या होगा? वह कहां रखे जाएंगे ? एनआरसी समर्थक आनन-फानन में कहते हैं कि उन्हें बांग्लादेश भेज दिया जाएगा। लेकिन बांग्लादेश अवैध प्रवासियों को क्यों लेगा? मोदी सरकार को इस समस्या का अंदाजा है। इसीलिए वह हिरासत केंद्रों पर काम कर रही है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। असम का पहला हिरासत केंद्र बन रहा है। इस पर 46 करोड रुपए की लागत आ रही है। करीब ढाई एकड़ में फैले इस केंद्र में तीन हजार लोगों को रखा जाएगा। लेकिन एनआरसी की जो अंतिम सूची है उसमें 19 लाख लोग बाहर है अगर इनका हिसाब लगाया जाए तो इन लोगों के लिए जो हिरासत केंद्र बनाया जाएगा उस पर 27000 करोड रुपए लगेंगे और यह तो सिर्फ असम की बात हुई है । अगर पूरे देश में ऐसा करना पड़ा अनुमान लगाना मुश्किल है। यह तो सिर्फ निर्माण की बात है। उसके बाद उनका रखरखाव ,भोजन - पानी ,देखरेख का भी खर्च शामिल है । इन मुद्दों पर लाखों करोड़ों रुपए खर्च हो सकते हैं और यह सारा का सारा खर्च नकारात्मक होगा ,अनुत्पादक होगा।


Wednesday, December 4, 2019

आने वाले दिनों में पाक की हालत बिगड़ेगी

आने वाले दिनों में पाक की हालत बिगड़ेगी 

पाकिस्तान एक अजीब देश है उसे सब कुछ यूं ही मिल गया है या कहें सहज ही मिल गया है इसलिए उसे शासन का दर्द  नहीं है । उसने स्वतंत्र होने के लिए किसी देश से संघर्ष नहीं किया। बस, भारत से   फकत अलग होने के लिए खून खराबा किया। जिस मुल्क की शुरुआत ही अलगाव से है उसके संस्कार क्या होंगे? इसलिए वहां कई दिलचस्प हकीकतें   देखने को मिलती हैं। अब जैसे वहां अफवाहें उड़ती हैं लेकिन दरअसल वह अफवाह नहीं होती वह अपूर्ण सत्य होता है। एक ऐसा सच जो समय से पहले ही लोगों के बीच घूमने लगा और साथ ही उसे पूर्ण होने की प्रक्रिया भी चलती रहती है। अगर वह पूर्ण हो गया यानी उसकी प्रक्रिया पूर्णता को प्राप्त कर ली तो सबके सामने जाहिर हो जाता है और अगर अपूर्ण रहा तो दबा दिया जाता है।  अब तक इस प्रक्रिया के दौरान कहीं न कहीं बातें तैरती रहती हैं लोग इसे सरगोशियां मान लेते हैं। कहते कुछ भी नहीं हैं। अब जैसे पिछले हफ्ते हुआ। अचानक बात उड़ी कि  इस सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। कुछ टेलीविजन चैनलों ने अति उत्साह में इसे पाकिस्तान में तख्तापलट की पहली पहली सीढ़ी बता दिया। बातें हवा में तैरती रहीं और तरह-तरह के इम्कान लगते रहे। आखिर में बाजवा को 6 महीने का एक्सटेंशन मिल ही गया। विगत कई महीनों से पाकिस्तान की सत्ता के गलियारों में यह चर्चा थी कि कुछ होने वाला है। यह चर्चा प्रधानमंत्री इमरान खान की बात कि उन्हें( जनरल बाजवा)  तीन वर्ष का एक्सटेंशन मिलेगा से शुरू हुई । आनन-फानन में कई बातें हो गयी और सिफारिश की गई कि मुल्क की ताजा हालात को देखते हैं उनके कार्यकाल में विस्तार दिया जाना जरूरी है। लेकिन चर्चा तो चल पड़ी थी। आखिर में  फौज के दबाव के कारण सरकार को झुकना पड़ा और जनरल बाजवा को एक्सटेंशन देना पड़ा। इस एक्सटेंशन का भी एक कूटनीतिक कारण है । इमरान के साथ चलते हुए  सबसे ज्यादा शोर मचाने वाले संगठन तहरीक ए इंसाफ  को जनरल बाजवा ने ही सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाया था। इसलिए ,जरूरी था उसे रखा जाए और इसके लिए इमरान खान को रखा जाना मजबूरी है। यही कारण है की इमरान की कुर्सी बच गई।
        अब इमरान सरकार के फैसले की वजह चाहे जो भी हो लेकिन इसे अच्छी निगाह से नहीं देखा गया। सीधे तौर पर बेशक कोई आवाज नहीं उठाई लेकिन भीतर ही भीतर फौज में खिचड़ी जरूर पकने लगी। इसी बीच मौलाना फजलुर रहमान की हुकूमत के खिलाफ आजादी मार्च की मुहिम शुरू हुई।मार्च सेना प्रमुख की आपत्ति के बाद भी निकाला गया। जाहिर है कि किसी की मदद और इशारे के बगैर मौलाना इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकते थे। हवा फिर बहने लगी कि कुछ होने वाला है और इसे बल और मिल गया जब मौलाना ने आजादी मांग किए जाने के ऐलान के बीच यह भी ऐलान किया कि दिसंबर और जनवरी में हुकूमत बदल जाएगी। इस ऐलान के बाद मौलाना का मार्च खत्म हो गया। उस समय  यह माना गया  कि इमरान खान  बहाना हैं, निशाना तो बाजवा पर है। कुछ फौजी अफसरों ने  पूरा षड्यंत्र रचा है ताकि बाजवा को उनके पद से हटाया जा सके। दिसंबर शुरू हो चुका है और इस दौरान  पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने बाजवा को लेकर जो कुछ टिप्पणियां की। उसके मूल में भी यही सब चालबाजियां हैं। बाजवा के खिलाफ जिस शख्स ने याचिका दायर की थी उसका यह शगल है। वह आदतन ऐसा करता रहता है। इसके पहले भी बाजवा के अहमदी होने और उन्हें पद से बर्खास्त किए जाने दायर की गई थी। लेकिन जो ही दिनों में उसने वापस ले लिया  और यही कारण है की नई याचिका को भी ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई। लेकिन इस बार नई याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर कर लिया और सुनवाई भी शुरू कर दी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बुनियादी सवाल उठाया। "आजादी के बाद से मुल्क के हालात कमोबेश ऐसे ही रहे हैं तो क्या ऐसी स्थिति में सेनाध्यक्ष का सेवा विस्तार उचित है? हालात इतने खराब हैं इसकी क्या गारंटी है कि अगले कुछ सालों में ठीक हो जाएंगे और अगर पहले ठीक हो गए तो क्या जनरल बाजवा  पद छोड़ेंगे और यदि 3 वर्ष बाद भी बिगड़े रहे तो क्या बाजवा को पद पर ही रखा  जाएगा?" इसमें सबसे अहम बात यह है कि कोर्ट ने पूछा कि "क्या फौज नाम की  संस्था इतनी लचर है कि एक आदमी की हटने से टूट जाएगी।" लेकिन तब भी उनकी दुबारा नियुक्ति हुई या  सेवा विस्तार हुआ
       यहां यह साफ लग रहा है कि अदालत के कंधे पर बंदूक रखकर जनरल बाजवा का शिकार किया गया। सामने तो यह बताया जा रहा था कि वहां फौजी विद्रोह की आहट सुनाई पड़ रही है। वैसे पाकिस्तान में अदालत का उपयोग करने का तरीका बड़ा पुराना है। नवाज शरीफ और यूसुफ रजा गिलानी जैसे प्रधानमंत्रियों को भी इसी तरीके से सत्ता से बाहर किया गया, और कहा गया  किस्तानी फौज का डीप स्टेट इशारे पर यह सब हुआ। कहा तो यही जाता है कि पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट स्वायत्तशासी है लेकिन सच तो य होगा हूं कुछ पूछना पड़ेगा जो जो कुछ जनरल बाजवा के साथ हुआ वाह इमरान खान के साथ भी हो सकता है । लेकिन सबसे प्रबल आशंका है इस बार दो काम  हो सकता है। यानी बाजवा की स्थिति डांवाडोल होगी इमरान सरकार की हालत भी खराब होगी।


Tuesday, December 3, 2019

यह सूरत बदलनी चाहिये

यह सूरत बदलनी चाहिये 

हो गई है पीर पर्वत सी अब पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

हैदराबाद बलात्कार कांड को लेकर देशभर में भारी गुस्सा व्याप्त है जो बिल्कुल जायज है लेकिन इसका प्रतिफल क्या होगा मोमबत्तियां और हैशटैग्स के बीच गुस्से का यह तूफान  उमड़ कर खत्म हो जाएगा। थोड़े से सरकारी आश्वासन आएंगे थोड़े से नारे लगेंगे और फिर सब कुछ सामान्य हो जाएगा। निर्भया कांड की गति सबने देखी है।
        इन दिनों अखबार देखिए। सुर्ख़ियों में या तो महंगाई होगी या अपराध होगा या घृणित बलात्कार की इस तरह की घटनाएं होंगी। इसके अलावा शायद ही कोई सकारात्मक या प्रेरणादायक खबर मिले। इन दिनों खबरों की परिभाषा ही यही हो गई है। होगी भी क्यों नहीं? अखबार तो हमारे समाज का दर्पण है और समाज की जो तस्वीर है वही इसमें दिखती है।
लेकिन, ऐसा कब तक चलता रहेगा। इसे रोकना होगा। राज्यसभा में और सरकारी स्तर पर इस पर गंभीर बातें होंगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कहा कि सरकार कानून में संशोधन करने जा रही है। और भी कई तरह के आश्वासन आए, आ रहे हैं और आएंगे। लेकिन यहां जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है रेप की घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं? इसका मनोविज्ञान क्या है?
हमारे देश का पुरुष समाज आरंभ से ही वर्चस्वशाली  रहा है और इन दिनों चूंकि महिलाएं उनसे प्रतियोगिता करने लगी हैं तो पूरे समाज को एक खास किस्म की अव्यक्त ईर्ष्या मिश्रित क्रोध होने लगा है और  यही कारण है कि वह नारी जाति को दंडित करने की कोशिश करने लगता है।  ताकि, उसकी तनाव भरी उत्तेजना समाप्त हो सके।
हाल में "अमेरिकन सोसायटी आफ क्रिमिनोलॉजी " में पढ़े गए पेपर के अनुसार बलात्कार घटनाओं के दोषी अधिकांश  लोग खुद को इसके लिए दोषी नहीं मानते। उनके अंदर इसका कोई भय नहीं होता और वह सारा दोष उन लड़कियों पर मढ़ते हैं जो इनके कुकर्म का शिकार हुई हैं। बहुत कम ऐसे लोग हैं जो स्वीकार करते हैं कि गलत काम हो गया। वे इसका औचित्य बताते हैं कि शराब के नशे में या ड्रग्स के नशे में ऐसा हुआ ,इसे रोका नहीं जा सका। विख्यात समाजशास्त्री पार्थ चटर्जी ने अपनी पुस्तक " ए पॉसिबल इंडिया " में  इसे संयुक्त परिवार टूटने का फल बताया है। उनके मुताबिक जो परिवार टूटते हैं  उसके संयुक्त परिवार के घर में दादा दादी भाई बहन और पूरा कुनबा रहता था लेकिन जैसे ही परिवार टूटता है यह बिखर जाता है और बच्चा एक अलग परिवेश में रहने लगता है जिसमें परिवार नाम की कोई चीज नहीं होती और महिला के नाम पर मां तथा बहुत हुआ कामवाली बाई आती जाती है। बच्चे के मन में स्वाभाविक जिज्ञासा उत्पन्न होती है महिला शरीर के बारे में। हुआ जिज्ञासा धीरे धीरे बलवती होने लगती है  और फिर वही जिज्ञासा इस अपराध के मूल में सक्रिय रहती है। मनोवैज्ञानिक डेल पोल्स ने इसे मैकियावेलियानिस्म, साइकोपैथी और रोजाना की सैडिज्म ,खास करके क्रूरता का आनंद लेने का भाव बताया है। अब प्रश्न है कि हमारे समाज में उत्पन्न होने वाले ये  भाव कैसे खत्म होंगे? इसके लिए सबसे जरूरी है आरंभिक शिक्षा और धीरे-धीरे विकसित होने वाले बच्चों के भीतर परिवार और समाज के प्रति स्नेह के भाव का आरोपण।  समाज में ऐसा करने वालों को सरकार के स्तर पर ऐसी सजा मिली जिसके भय से लोगों के मन में इस तरह की भावना नहीं आये ।यह कथन बिल्कुल सही नहीं है। अभी हैदराबाद कांड में जो कुछ भी हुआ उसके प्रति गुस्सा इतना है कि अच्छे-अच्छे लोग यह कहते सुने जा रहे हैं कि दोषियों को जनता के हवाले किया जाना चाहिए । यहां प्रश्न यह नहीं है के जिसने इस कांड को अंजाम दिया है उसे समाप्त कर दिया जाए बल्कि कोशिश हो कि अपराध का भाव सुधर जाए । अपराधी सुधर जाए ताकि उससे लोगों को समाज में सबक मिले। लेकिन ऐसी स्थिति में कानून से बचने और दबंग मर्दाना समाज  चोर दरवाजा खोज सकता है।
    इसके लिए सबसे जरूरी है कि दोनों तरफ से सुधार की प्रक्रिया आरंभ की जाए और इसमें केवल सरकार नहीं समाज को भी अपनी भूमिका अदा करनी पड़ेगी जिससे महिलाओं में यह डर खत्म हो जाए कि अकेला निकलना खतरनाक है। जब तक मर्दाना वर्चस्व नहीं समाप्त होगा तब तक इन घटनाओं को रोकना मुश्किल है। और इस वर्चस्व को समाप्त करने के लिए कानून नहीं समाज में दो तरफा प्रयास करने की जरूरत है। एक तरफ से मर्दों में यह भाव भरा जाए कि महिलाएं या लड़कियां आपके बराबर की हैं। आपका कोई वर्चस्व नहीं है। दूसरी तरफ स्त्रियों को या लड़कियों को इतना सशक्त बनाना होगा की वे ऐसी किसी भी स्थिति से जमकर मुकाबला कर सकें और इसके लिए जरूरी है कि वह आत्म निर्भर हों तथा ताकतवर हों। धीरे धीरे इस ओर कदम बढ़ रहे हैं।
केवल हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है यह सूरत बदलनी चाहिए


Monday, December 2, 2019

देशभर में क्या हो रहा है यह कोई नहीं कह रहा

देशभर में क्या हो रहा है यह कोई नहीं कह रहा 

विगत कुछ दिनों से संपूर्ण देश में विभिन्न जघन्य अपराधों की घटनाओं से जुड़ी खबरें आ रही हैं और उन्हीं खबरों के साथ मिलजुल कर आ रहे हैं अर्थव्यवस्था की मंद होने का समाचार, देश में ताजे डर के माहौल का समाचार वगैरह। कुल मिलाकर देखें हालात बड़े खराब दिशा में जा रहे हैं। इनमें कहां तक सच्चाई है यह जानने के लिए आंकड़े भी सही उपलब्ध नहीं है। अभी हाल में सरकार पर सीधा आरोप लगाया गया कि  लोगों में इतना डर व्याप गया है कि कोई मुंह पर कुछ कहने का साहस नहीं कर रहा है। जिस कार्यक्रम में यह सब बातें हो रही थी उस कार्यक्रम में गृह मंत्री अमित शाह के अलावा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ,रेल मंत्री पीयूष गोयल भी शामिल थे । इस कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी  अपनी बात कही। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देश में डर का व्यापक  और प्रत्यक्ष माहौल है। उन्होंने कहा कि उद्योगपति सरकारी  प्राधिकरणों के उत्पीड़न के माहौल में जी रहे हैं ।
          अभी हाल में जो जीडीपी के आंकड़े आए हैं उसमें माना गया है कि देश की जीडीपी की दर साढे 4% पहुंच गई है। कुछ दिन पहले एक समाचार एजेंसी ने कुछ अर्थशास्त्रियों से बात कर यह दर 5% होने की आशंका व्यक्त की थी। अब यदि आंकड़ा ही गया है  तो पिछले आंकड़ों से अलग कुछ  नई बात हो। सबसे पहले तो यह साढे चार प्रतिशत की जो दर  है वह 2013 के बाद से सबसे कम है। चिंतनीय तथ्य है कि यह लगातार छठी बार है और जीडीपी का पतन जारी है। उद्योग धंधे बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। उद्योगों के विकास की दर भी गिर रही है। इसमें भी कारखानों की हालत और खराब है। कृषि क्षेत्र में विकास की दर 4.9  प्रतिशत से गिरकर 2.1 प्रतिशत पहुंच गई है। सर्विसेज की भी हालत खराब है यह अभी 7.3% से गिरकर 6.8% रह गई है।
      जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद का मतलब है कि देश भर में जहां कहीं भी जो कुछ भी बन रहा है जो भी कमाई हो रही है उस सब का कुल जोड़ है।  कमाई का हिसाब आसानी से नहीं लगता है इसलिए यह हिसाब लगाने का आसान तरीका है कि खर्च का हिसाब लगाया जाए। यानी कुछ भी खरीदने पर हुआ खर्च जीडीपी है। अगर खर्च  बढ़ रहा है जीडीपी बढ़ रही है अगर गिर रहा है तो जीडीपी घट रही है ।भारत में प्रति व्यक्ति जीडीपी इस साल मार्च में 2041 डालर यानी करीब एक लाख 46 हजार रुपए थी। इसका मतलब है कि इतनी सालाना कमाई पर बहुत से लोग मुंबई, दिल्ली और कोलकाता जैसे शहरों में आज भी परिवार पाल रहे हैं। लेकिन यह पूर्ण सच नहीं है। मुट्ठी भर लोग इससे  हजारों लाखों गुना अधिक कमा रहे हैं। जीडीपी का तिमाही आंकड़ा इसलिए भी चिंता का विषय है कि विगत दिनों में गिरते-गिरते कहां पहुंच गया। लोगों के खर्चे कम होते गए।  क्योंकि खर्च कम होने का मतलब है आय के साधनों का सिकुड़ना। सरकार का लक्ष्य है 5 खरब डॉलर व्यवस्था बनाने का । इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है जीडीपी विकास दर 12% के ऊपर होना। पिछले 10 वर्षों से तो भारत 10% का भी सपना नहीं देख पाया है। आमतौर पर 7 से 8% के बीच यह बढ़ता रहा है । लोगों के पास खर्च के लिए पैसे नहीं हैं। लोग बहुत सोच समझकर खर्च कर रहे हैं। उत्पादन बिक नहीं रहा है और व्यापारी तथा उत्पादक कंपनियां मुश्किल में है और उनकी मुश्किल है उस कंपनी में काम करने वाले कर्मचारियों पर भी।  उनकी तनख्वाह बढ़ नहीं रही है। छटनी का डर कायम है। लोगों को खुद की तरक्की पर भरोसा नहीं है। 3 दिन पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने खुद माना अर्थव्यवस्था में सुस्ती चल रही है। अभी सुस्ती का क्या उपचार है? उपभोक्ता के मन में विश्वास कैसे जगेगा? क्योंकि यह स्थिति बहुत खराब है। इन आंकड़ों को गंभीरता से लेने की जरूरत है। अर्थव्यवस्था में  निवेश बढ़ाने की जरूरत है। अगर निवेश नहीं बढ़ेगा रोजगार नहीं बनेंगे और रोजगार नहीं बनेंगे तो हालत तो ऐसे ही खराब रहेगी। इसलिए अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए ना कोई शॉर्टकट है ना कोई जादू की छड़ी। इसके लिए भारत सरकार को कठिनाई से काम करना होगा। वरना सारे सपने चूर चूर हो जाएंगे। देश विकास के रास्ते पर नहीं चल पाएगा और चारों तरफ अभाव की छाया दिखाई पड़ेगी। अभाव से ग्रस्त भूखा समाज किसी भी अपराध के लिए प्रस्तुत हो सकता है और अगर यह स्थिति आती है तो सरकार के लिए भारी मुश्किल पैदा हो जाएगी।


Sunday, December 1, 2019

विचारधारा का प्रसार जरूरी है

विचारधारा का प्रसार  जरूरी है 

अभी हाल में कुछ आंकड़े और कुछ ग्रैफिक्स आए थे जिससे यह पता चलता था कि भाजपा अब सिकुड़ रही है। वह 2014 में जितने राज्यों में सत्ता में थी उसके मुकाबले इस समय कम राज्यों में है। वह  71%   घटकर  40% पर  पहुंच गई है इन आंकड़ों से निष्कर्ष निकाला गया कि इन राज्यों से भाजपा के पैर उखड़ गए हैं । भाजपा का भास्कर अस्ताचलगामी हो रहा है। लेकिन यह निष्कर्ष पूर्णतः  सही नहीं है और खासकर तर्क की कसौटी पर तो बिल्कुल नहीं।
      एक तरफ समाज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वर्चस्व देखकर स्पष्ट महसूस होता है कि उनकी लोकप्रियता शिखर पर है जरा विचार करें की पिछली मई के लोकसभा चुनाव के परिणामों के बाद इस पार्टी का वर्चस्व दिखता है। संपूर्ण हिंदी पट्टी में ,तटवर्ती पश्चिम और पूर्व तथा उत्तर पूर्व के बड़े भाग में भाजपा ही भाजपा है। चुनौती विहीन सत्ता। तो फिर मोदी के आलोचक कौन सी बात को लेकर खुश हैं। अब अगर राजनीति के दृष्टिकोण से देखें, खासकर मनोवैज्ञानिक आचरण और उसके राजनीतिक प्रत्युत्तर की व्याख्या करें तो लगेगा कि राजनीतिक हकीकत कई परतों में है।  आप जैसे जैसे आगे बढ़ेंगे वे परत खुलते जाएंगे। यहां हमारे समाज में भगवा रंग के कई शेड्स दिख रहे हैं। उन शेड्स की अगर वर्ण विज्ञान के संदर्भ में राजनीतिक व्याख्या करें तो कुछ और ही नतीजे आते हैं। अब जैसे नरेंद्र मोदी एक विशाल व्यक्तित्व वाले इंसान हैं। लेकिन अभी इंदिरा जी के बराबर नहीं हो पाए हैं। इसका अर्थ है कि आज का मतदाता 80 के दशक के मतदाता से ज्यादा समझदार और विचारशील हो गया है।  यह विचारशीलता लोकसभा और विधानसभा चुनाव के नतीजों में साफ दिखता है। इंदिरा जी के जमाने में एक कहावत थी कि अगर वह बिजली के खंभे को टिकट दे दें तो वह भी जीत जाए। मोदी जी में भी बेशक यह चमत्कार है लेकिन केवल लोकसभा के संदर्भ में, विधानसभा चुनाव में नहीं। हरियाणा में लोकसभा चुनाव के केवल 5 महीनों के बाद जब विधानसभा चुनाव में हुए तो भाजपा का वोट प्रतिशत 58 से घटकर 36 हो गया ,यानी 22 अंकों की गिरावट आई और उम्मीद के विपरीत वहां भाजपा को बहुमत के लाले पड़ गए। यह भी एक ऐसे राज्य में हुआ जो सामाजिक तौर पर अपनी राष्ट्रवादी परंपरा और अल्पसंख्यकों के गैर महत्वपूर्ण वोट प्रतिशत के लिए मशहूर माना जाता है। साथ ही, धारा 370 हटाए जाने यह महज 11 हफ्तों के बाद यह चुनाव हुए थे। जरा सोचिए 2014 के बाद मोदी किसी राज्य में ऐसा जादू नहीं कर पाए जा हंसते खेलते विजयी हो जाएं। वही हाल गुजरात में भी हुआ। 2017 में उन्हें वहां कांटे की टक्कर का मुकाबला करना पड़ा। कांग्रेस को लेकर कर्नाटक में भारी असंतोष था लेकिन इसके बावजूद शर्मसार होना पड़ा। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ तो हाथ से निकल गए। गौर करने वाला तथ्य है कि जहां  लोकसभा चुनाव में उसने सबका सफाया कर दिया था दिल्ली राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ मैं क्या हुआ? इससे निष्कर्ष निकलता है कि इंदिरा युग से विपरीत भारतीय संघीय ढांचा अब ज्यादा विचारशील और प्रखर हो गया है अब जबकि वोटर लोकसभा में अलग और विधानसभा में अलग नेताओं का चुनाव करने लगे तो इससे ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, जगनमोहन रेड्डी जैसे नेताओं का साहस बढ़ा है। यह नेता अपना किला बचाना जानते हैं। अभी बंगाल में तीन उपचुनाव में क्या हुआ? टीएमसी को जीत मिली इससे मतदाताओं की मानसिकता प्रस्तुति होती है कि वे भाजपा का विरोध भी कर सकते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि एन आर सी का विरोध हो सकता है । कुछ विश्लेषक कहते हैं कि फिलहाल 17 राज्य भाजपा की झोली में लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। इनमें से कुछ  बिहार हरियाणा जैसे राज्य  हैं जहां भाजपा का साथ बिल्कुल विरोधी विचारधारा वाली पार्टियों से है। एक और सत्य यह भी है कि भाजपा के कब्जे में केवल 3 राज्य हैं यूपी, गुजरात और कर्नाटक इसमें कर्नाटक की हालत है।
          अब जरा महाराष्ट्र की सोचें। एनसीपी और कांग्रेस ने शिवसेना से हाथ क्यों मिलाया? सीधी बात है कि वे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे। लेकिन यह भी पूछा जा सकता है शिवसेना ने भाजपा का साथ क्यों छोड़ा? इसका बहुत सरल उत्तर है कि शिवसेना के इकलौते राज्य में भाजपा जिस तरह से फैल रही थी उसने शिवसेना के वैचारिक आधार को खतरा पैदा हो गया था। शिवसेना की बगावत एक दलीय वर्चस्व की थी। केंद्र और राज्य समीकरण अब फिर से वही स्वरूप ग्रहण कर सकते हैं जैसा 1089 से 2014 के बीच थे। भारत के नक्शे के सियासी रंग चाहे जो भी हों भाजपा के प्रमुख विचारों का जहां तक मामला है यह देश भर में फैल चुका है और किसी भी दल का ताकतवर होना   इस बात पर निर्भर करता है कि वह या उसके सहयोगी दलों की विचार कितने फैले हुए हैं। राजनीति में विचार ही शक्ति है और प्रभाव है।


Friday, November 29, 2019

बुजुर्गों के लिए सम्मान जरूरी

बुजुर्गों के लिए सम्मान जरूरी 

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को राज्यसभा में माना कि देश की अर्थव्यवस्था सुस्त हो गई है ,मंद नहीं है। लेकिन यह सुस्ती कैसी है? यह सुस्ती बेहद निराशाजनक है। बेरोजगारी बढ़ रही है यह किसी से नहीं छिपा है। कुछ दिनों में फैक्ट्रियां बंद होगी, काम धंधे बंद होंगे , बेरोजगारी और बढ़ेगी। सरकार ने आर्थिक सुस्ती खत्म करने के लिए और खपत बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन कुछ नहीं हो पा रहा है। उल्टे देश में खास करके  नौजवानों में एक विशेष प्रकार की खीझ बढ़ती जा रही है। विख्यात समाजशास्त्री मास्लोव ने लिखा है की समाज को स्वस्थ और शांतिपूर्ण रहने के लिए आवश्यक है मनुष्य पर किसी किस्म का हमला न हो और उसकी सुरक्षा तथा स्थायित्व का पूरा बंदोबस्त हो। आर्थिक मंदी के कारण इंसानी हिफाजत और स्थायित्व को आघात पहुंच रहा है। लोग खुद को भीतर से परेशान पा रहे हैं और उसका साफ असर हमारे समाज पर दिखाई पड़ रहा है। खास करके वह समाज जो आर्थिक सुस्ती से गुजर रहा है और अनिश्चितता तेजी से बढ़ती जा रही है। आज से लगभग एक दशक पहले यह कहा जाता था कि भारत नौजवानों का देश है। यहां नौजवानों की संख्या सबसे ज्यादा है और हमें इसका डेमोग्राफिक डिविडेंड मिलेगा। लेकिन यह देश इस डिविडेंड से अमीर बनने के पहले बूढ़ा होता जा रहा है। अगर अर्थव्यवस्था को सुस्ती से उबारने के जल्दी कोई प्रभावकारी प्रयास नहीं किए गए तो समाज पर इसका गहरा असर पड़ेगा और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सभी इसके शिकार होंगे । सबको इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इस बिगड़ती स्थिति का प्रभाव जो हमारे समाज पर पड़ रहा है उसका पहला उदाहरण हम अपने आसपास देख सकते हैं। हमारे देश में अरसे से या कहिए प्राचीन काल से नौकरी शुदा बच्चे अपने बुजुर्गों की मदद करते हैं और अगर नौकरी है ही नहीं कहां से मदद करेंगे लिहाजा परिवार और आश्रितों पर दबाव बढ़ेगा खासकर के परिवार के बुजुर्गों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी । अक्सर अखबारों में खबर आती है कि बुजुर्ग माता-पिता के साथ बच्चे बदसलूकी करते हैं। क्योंकि अपने बच्चों की शिक्षा के मुकाबले बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल उनकी प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे होती है। खासतौर पर ऐसा तब जब उनकी आमदनी कम हो जाती है। दूसरी तरफ हमें  यह भी अखबारों में पढ़ते हैं के बच्चे मुश्किल हालात से निकलने के लिए बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए अपनी नौकरी छोड़ देते हैं। दोनों ही मामलों में मुश्किलें  बुजुर्गों के सामने आती हैं और सरकार की कोई दखल इसमें नहीं होती।
         हमारे देश में 60 साल या उससे अधिक उम्र वाले लोगों की स्थिति तुलनात्मक तौर पर अधिक खराब है। क्योंकि ,वह कमा सकते नहीं और देखभाल के लिए परिवार के सदस्यों पर आश्रित रहते हैं। इन बुजुर्गों ने अपनी कामकाजी जिंदगी में बचत से जो घर खरीदा होता है बढ़ती उम्र के साथ वह बच्चों के नाम कर देते हैं और बाद में कुछ बुजुर्गों को उसी घर से बेदखल कर दिया जाता है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और एकल परिवारों का चलन बढ़ता जा रहा है । देश में 87.8% बुजुर्ग अपने बच्चों के साथ रहते हैं। परिवार हमारे देश में बुजुर्गों का मुखिया  होता है और जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती जाती है वह कमजोर होते जाते हैं।  परिवार पर उनकी निर्भरता बढ़ती जाती है सामाजिक सुरक्षा के मामले में भारत दूसरे देशों से पिछड़ा हुआ है । यहां बुजुर्गों की देखभाल की संस्थागत व्यवस्था का भाव है देश की 70% आबादी को ही किसी न किसी तरह से सामाजिक सुरक्षा हासिल है हमारे देश में 26.3% बुजुर्गों के लिए वित्तीय तौर पर आत्मनिर्भर हैं जबकि 20.3% बुजुर्ग आंशिक तौर पर दूसरों पर आश्रित हैं। देश की 53.4%   बुजुर्ग आबादी आंशिक सुरक्षा के लिए अपने बच्चों पर ही निर्भर हैं।  बच्चों के पास रोजगार का कोई साधन नहीं है। दूसरी तरफ भारत में रहने वाले की औसत उम्र 27.1 साल है इसलिए यह युवा देश लेकिन जन्म दर में गिरावट के कारण भारत में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है । अभी हाल में इकोनामिक एंड पॉलीटिकल वीकली में प्रकाशित 'इकोनामिक इंडिपेंडेंस एंड सोशल सिक्योरिटी इंडिया एल्डरली" रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में उम्र दराज लोगों की बढ़ती संख्या की पड़ताल करने  और उससे खड़ी होने वाली समस्याओं को हल करने की जरूरत है जन्म दर में गिरावट के कारण आबादी की बनावट में बहुत बुनियादी बदलाव हो रहे हैं। देश में साल 2011 में 10 .34 करोड़ बुजुर्ग थे 2040 तक 15% सकता है आर्थिक सुस्ती का जो हाल है उसके अनुसार धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था भी खस्ताहाल होती जाएगी और कामकाजी आबादी कम होती जाएगी
          इनकम टैक्स में छूट और बचत पर अधिक ब्याज भी बुजुर्गों के लिए बहुत जरूरी है इससे में वित्तीय सुरक्षा हासिल करने में सहायता मिलेगी। रेल और हवाई किराए में रियायत से उन्हें  घूमने फिरने के लिए प्रेरित किया जा सकता है । जिससे हुए खुद को प्रसन्न महसूस कर सकें। समाजशास्त्री डॉक्टर साहेब लाल के अनुसार बाजारवाद और उदारीकरण के बाद बदले हुए समाज में बुजुर्गों का सम्मान गिरा है। उपभोक्ता समाज में बुजुर्गों को खोटा सिक्का समझा जाने लगा है। अगर आपसी सामंजस्य हो तो आज भी बुजुर्ग परिवार और समाज के लिए काफी उपयोगी है। बुजुर्गों को सम्मान प्राप्त होगा तो समाज भी संगठित होगा ढेर सारी सामाजिक बुराइयां यहां तक कि आतंकवाद पर भी अंकुश लगेगा।


Thursday, November 28, 2019

आंकड़ों से गड़बड़ ना करें

आंकड़ों से गड़बड़ ना करें

आंकड़ों से गड़बड़ ना करें
पिछले हफ्ते 100 से ज्यादा शोधकर्ताओं और योजनाकारों ने सरकार से मांग की है कि वह राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय ( एनएसएसओ) एस ओ द्वारा किए गए घरेलू खपत के आंकड़ों को जारी करें। इन आंकड़ों को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एन एस ओ) द्वारा रोक दिया गया है। सांख्यिकी कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (एम ओ एस पी आई) द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के आंकड़े को लेकर शोधकर्ताओं ने सरकार पर दबाव डाला है कि वह सभी सर्वेक्षण आंकड़ों को जारी करें।  कुछ दिन  पहले एम ओ एस पी आई ने घोषणा की थी की वह एनएसओ द्वारा 2017 -18 के घरेलू खपत के बारे में किए गए सर्वेक्षणों के आंकड़ों को जारी नहीं करेगा। हाल में जो आंकड़े लीक हुए ,वह बताते हैं कि  भारतीय कि प्रति व्यक्ति खपत 3.7 प्रतिशत कम हो गई है। एनएसओ की रिपोर्ट के बारे में उम्मीद की जाती थी कि यह इस वर्ष जून में जारी हो जाएगी। लेकिन ,आंकड़ों की गुणवत्ता के मामले को लेकर इन आंकड़ों को रद्द कर दिया गया । सरकार के अनुसार एनएसओ इस सर्वे के आंकड़ों तथा राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (एन ए एस ) के आंकड़ों में अंतर है। भारत में आंकड़ों का इस्तेमाल करने वाले हर व्यक्ति को यह मालूम है कि हमारे देश में आंकड़ों की प्रणाली कैसे काम करती है। अब यहां सवाल उठता है कि आखिर कारण क्या है? सरकार आंकड़ों को छुपा रही है। कारण है कि लगातार तेजी से बदहाल होती अर्थव्यवस्था पिछले 1 महीने के आंकड़ों को अगर देखें तो पाएंगे कि हर चीज का उत्पादन गिर गया है। खास करके कोयला तेल प्राकृतिक गैस सीमेंट स्टील और बिजली सब का उत्पादन समग्र रूप से 5.2% गिरा है। अगर, सितंबर 2018 से इसकी तुलना की जाए तो यह 8 सालों में सबसे कम है और बाकी अर्थव्यवस्था यानी सकल घरेलू उत्पाद 6 वर्षों में सबसे कम है। फिर भी, हैरतअंगेज ढंग से शेयर बाजार नई ऊंचाइयों की ओर इशारा कर रहे थे। ऐसा क्यों? खपत के आंकड़ों में तेजी से गिरावट आई है । कोर सेक्टर में सुस्ती है । पिछले 5 वर्षों में सबसे कम कारपोरेट मुनाफा हुआ है। बैंक संघर्ष कर रहे हैं। बैंकों में 3.4 लाख करोड़ के कर्ज बट्टे खाते डाल दिए जाने के बावजूद बैंकों का सकल घाटा 10.3% हो गया था। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में बैंकों को पूंजी उपलब्ध कराने में थोड़ी उदासीनता दिखाई है। इसमें मदद की गयी लेकिन परेशानियां कम नहीं हुईं। पिछले 2 वर्षों में पब्लिक सेक्टर की हालत खराब हो गई। कृषि क्षेत्र में विकास दर 2.7% रह गई थी, जो विगत 11 तिमाहियों में सबसे कम थी और इससे अनाज तथा खाने-पीने के सामानों के भाव गिरते रहे। रोजगार  बुरी तरह घट गये। बेरोजगारी बढ़ गई।
         लोगों ने सोचा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिष्ठा पर इस गिरती अर्थव्यवस्था का असर पड़ेगा। चुनाव में बेशक किसी के हारने की उम्मीद नहीं थी लेकिन 2014 वाली बात होने की भी उम्मीद नहीं थी।  यह देखकर सब हैरान रह गए कि इस बार लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को पहले से बहुत ज्यादा सीटें मिलीं। जैसे ही मोदी को रिकॉर्ड तोड़ विजय मिली बाजार की उम्मीदें भी आसमान छूने लगी । लोगों को लगा की राजनीतिक शक्ति के बदौलत बड़े आर्थिक सुधार होंगे। जिससे अर्थिंग बेड़ियां कट जाएंगी। यदि, ऐसा नहीं हुआ मोदी सरकार का दूसरा पहले दौर से भी खराब स्थिति में पहुंच जाएगा। "द इकोनॉमिस्ट"  ने प्रधानमंत्री को छोटे छोटे कदम उठाने वाला कहा था।  उन्होंने बड़े फैसले लिए। जैसा कि अनुमान था दुनिया ने इस पर ध्यान दिया। प्रधानमंत्री ने सुपर टैक्स लगाने की अपनी योजना को गलत स्वीकार भी किया । अब वक्त आ गया है कि तमाम विसंगतियों दूर की जाए और बड़े आर्थिक सुधारों को दिशा दिखाई जाए ।  ऐसा कुछ नहीं हुआ सरकार की हर जगह बढ़ती दखलंदाजी दिखाई पड़ी। जिस दिन मोदी सरकार ने दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश किया था उस दिन यह दखलअंदाजी अपनी पराकाष्ठा पर थी। सरकार ने जो सबसे निष्ठुर कदम उठाया वह था सीएसआर के तहत स्वेच्छा से Mकिए गए योगदान को फौजदारी मामला बना देना। शुक्र है कि जल्दी उसे हटा दिया गया। लेकिन इससे सरकार की मूल प्रवृत्ति का उदाहरण प्राप्त हो गया। अब हालत यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां चारों तरफ बदहाली दिख रही है।  महंगाई बढ़ती जा रही है। बिजली की खपत घट रही है , कर राजस्व काफी धीमी गति से बढ़ रहा है और भी कारण हैं। इससे सरकार को अपना  लक्ष्य हासिल करने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। सेंटीमेंट को अर्थव्यवस्था की कुंजी माना जाता है लेकिन सेंटीमेंट पस्त हो रहा है। सवाल है कि ऐसे मैं  सरकार को क्या करना चाहिए। अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए कई प्रस्तावों पर विचार हो रहा है। इनमें बुनियादी ढांचे पर अतिरिक्त निवेश, नीतिगत सुधार और निजी करण इत्यादि शामिल हैं। इससे सरकार को मदद मिलेगी मगर इनके नतीजे तुरंत नहीं दिखेंगे। आर्थिक मंदी से केवल निवेश बढ़ाकर और नीतिगत सुधार करके नहीं निपटा जा सकता। आर्थिक मंदी के स्वरूप और उससे पैदा होने वाली चुनौतियों के बारे में  लोगों के साथ पारदर्शी  संवाद जरूरी है।  यह संवाद तभी हो सकता है जब सरकार सर्वे के निष्कर्षों को कबूल करे। इसके बगैर सुधार संभव नहीं है।  अगर अर्थव्यवस्था की हालत नहीं सुधरी तो हमारा विकास भी संभव नहीं है। विकास के सारे सपने धरे रह जाएंगे। इससे सरकार की प्रतिष्ठा गिरेगी।


Wednesday, November 27, 2019

इसे उम्मीद कहें या नाउम्मीदी

इसे उम्मीद कहें या नाउम्मीदी

इस शहर में वह कोई बारात हो या वारदात
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां

महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ उसके लिए कुछ भी कहना और समझना बड़ा कठिन है। अजित पवार के अपना पक्ष परिवर्तन कर लेने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा को बुरी तरह शर्मसार होना पड़ा और वह एक तरह से मैदान से बाहर हो गई। यह एक तरह से दुखद और सुखद नाटक का मिश्रण है।  यह नाटक सिर्फ सरकार बदलने तक सीमित नहीं है यह आने वाले समय में भाजपा के भविष्य पर भी असर डालेगा और इससे ज्यादा इसका प्रभाव भारतीय राजनीतिक संस्कृति और देश की राजनीतिक नैतिकता पर भी  पड़ेगा। राजनीति किस तरह से देश की जनता की सोच को बदल देती है इसका उदाहरण पिछले तीन दशकों में कई बार देखने को मिला। तीन दशक पहले हमारे मोहल्ले , हमारे शहर और देश  घटनाओं से हम विचलित हो जाते थे और अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करने लगते थे। 1976 की आपात स्थिति के दौरान जयप्रकाश नारायण को केंद्र करके लिखी गई कविता,
     खलक खुदा का
मुल्क बादशाह का
और हुकुम शहर कोतवाल का
सब लोग अपने अपने घरों की
खिड़कियां बंद कर लें

जनता को मौन रहने और उस पर दबाब डालकर चुप्पी साध लेने की सरकार की क्रिया पर इससे बड़ा व्यंग नहीं सकता । उधर इसी पर अपनी व्यथा जाहिर करते हुए लिखा गया
कहां तो तय था चरागां हर घर के लिए
यहां रोशनी मयस्सर नहीं है शहर भर के लिए

हालात बदलते गए और समाज भी बदलता गया। 30 वर्षों के अंतराल में हम मानवद्वेषी हो गए और राजनीतिक संगठन की दुरभिसंधियों के प्रति चुप रहने लगे। वह बात बेमानी हो गई कि जिंदा कौमें 5 वर्ष तक इंतजार नहीं कर सकतीं। पिछले पांच - सात वर्षों में क्या हम कभी कोई जन आंदोलन देख सके हैं, संभवत नहीं। पिछले 5-7 दिनों में  महाराष्ट्र में जो हुआ वह और विचित्र हुआ। भाजपा शिवसेना को अपने साथ नहीं रख सकी। भाजपा नेतृत्व का अहंकार खास करके इस वर्ष के संसदीय चुनाव के बाद  जो कुछ भी हुआ वह आंशिक रूप से इस स्थिति के लिए दोषी है।  भाजपा की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा तथा शिवसेना की क्षेत्रीय वर्चस्व बनाए रखने के प्रति   असाधारण आसक्ति के बीच का बेमेल संयोग इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह विचलन पिछले  में 25 वर्षों से कायम है लेकिन पिछले चुनाव के बाद जब भाजपा और शिवसेना को मिली सीटों में अनुपातिक गड़बड़ी हो गई तो यह बेमेल संयोग खुलकर सामने आ गया। शिवसेना के नेतृत्व को यह मुगालता हो गया था कि अब उसे अलग कुछ दिखाना पड़ेगा ताकि वह मराठा गौरव के रखवाले के रूप में खुद को प्रस्तुत कर सके। शरद पवार की पार्टी एनसीपी इस पद के लिए या कहिए मराठा गौरव के प्रतिनिधि के रूप में खुद को प्रस्तुत करने के लिए पहले से ही संघर्ष कर रही है। शिवसेना से अलग होने के बाद भाजपा नेतृत्व ने एनसीपी की तरफ हाथ बढ़ाया ताकि मुंबई में सरकार बना सकें। यह फैसला सीधा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की ओर इशारा कर रहा है और इसके नाकामयाब होने का मतलब है कि भाजपा के दो सबसे बड़े  नेताओं ने अपनी अपरिपक्वता जाहिर कर दी।
         इस मामले में जिस तरह से सभी पार्टियों का आचरण देखा गया तो  ऐसा नहीं लगता कि कोई भी इस कीचड़ से बाहर है। अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा के लिए पहला मौका है जब उसे इतनी ज्यादा सीटें मिलीं और सरकार नहीं बन सकी है।  गोवा और हरियाणा जैसे राज्यों में बहुमत से बहुत दूर रहने के बावजूद उनकी सरकार बन गई। यह जो कुछ भी हुआ वह भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली घटना है। क्योंकि, जब भी कोई पार्टी सरकार बनाने का दावा पेश करती हैं तो उसके पास संख्या बल होता है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। अजित पवार के हाथ से सत्ता फिसल जाने का अर्थ है उनके पास विधायकों की उचित संख्या नहीं थी। उधर शरद पवार ने 54 में से 53 विधायकों को पेश किया। लिहाजा अजीत पवार को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा और देवेंद्र फडणवीस को हुआ । अब चर्चा है कि फिर राजनीति की शतरंज में शरद पवार ने अमित शाह को पीट दिया। अब महाराष्ट्र में जो सरकार बनेगी वह भी बेमेल संयोग की सरकार होगी। इसलिए जरूरी है कि इनको अपने अंतर्विरोध खत्म करने पड़ेंगे और यह सुनिश्चित करना पड़ेगा की केवल वहां सरकार बनाने के लिए नहीं है शासन के लिए भी हैं। क्योंकि महाराष्ट्र में भाजपा अलग हो गई और वह सत्ता से अलग होकर रचनात्मक सवाल उठाएगी जिससे यकीनन महाराष्ट्र की जनता प्रभावित होगी।
      परिंदे अब भी पर तोले हुए हैं
     हवा में सनसनी खोले हुए हैं
    तुम ही कमजोर पड़ते जा रहे हो
     तुम्हारे ख्वाब तो शोले हुए हैं


Tuesday, November 26, 2019

ये जो कुछ हो रहा है इसपर चुप क्यों हैं आप ?

ये जो कुछ हो रहा है इसपर चुप क्यों हैं आप ?

बड़ा अजीब संयोग है 26 नवंबर को संविधान दिवस है । संविधान की रक्षा और उसकी शक्तियों पर लंबी-लंबी बहसें  रही हैं और ठीक इसके 1 दिन पहले महाराष्ट्र में जो सियासी नाटक हुआ वह संविधान द्वारा प्रदत्त संस्थानों को अपना अधिकार छोड़ने और राजनीतिक हेरा फेरी का परिणाम था। पहली संस्था जो अपने पद से या अधिकार से नीचे गिरी वह था राज्यपाल का कार्यालय। ऐसा अन्य राज्यों में भी होता देखा गया है।  इसके बाद संविधान के संरक्षक के तौर पर तैनात राष्ट्रपति का कार्यालय। 23 नवंबर की सुबह राष्ट्रपति के कार्यालय ने धारा 356 खत्म कर दिया। इस बात पर विचार करने की जरूरत नहीं है कि भाजपा के पास बहुमत था या नहीं लेकिन प्रश्न यह है कि सुबह-सुबह दावा क्यों स्वीकार कर लिया और उस पर कार्रवाई क्यों हुई ? लोकतांत्रिक  संस्था का अधिकार खत्म करने की संपूर्ण प्रक्रिया तब पूरी हुई जब कोर्ट ने सदन में बहुमत साबित करने की प्रक्रिया के आदेश देने के बदले सुनवाई की तारीख को टालना शुरू कर दिया। यहां रूसो का "थ्योरी ऑफ सोशल कॉन्ट्रैक्ट" का एक कथन याद आता है कि "एक राजनीतिक दल विभाजित  आस्था पर काम करता है। किसी भी राजनीतिक दल के सदस्यों द्वारा अपने  दल के घोषित सिद्धांतों के विपरीत अपनी मर्जी से वोट लेने की आजादी ना केवल दल को शर्मसार करेगी बल्कि इसकी प्रसिद्धि एवं जनता के बीच इसकी छवि को भी आघात पहुंचाएगी।  जबकि जनता का भरोसा ही इसके कायम रहने का जरिया है।" लेकिन, रूसो का आदर्शवाद का सिद्धांत बहुत पुराना हो चुका है।  बट्रेंड रसैल  की  पुस्तक  "पॉलिटिकल पावर"  के मुताबिक  इन दिनों राजनीति में आदर्शवाद की उम्मीद रखने वाले लोगों को बेवकूफ माना जाता है। नेता सत्ता हड़पने के लिए हर बार ज्यादा से ज्यादा दुस्साहस दिखाते हैं और नागरिक मौन रहकर उस नेता का मनोबल बढ़ाते हैं। सत्ता के लिए ध्रुवीकरण के दौर में ऐसा लगता है कि सही अथवा गलत की परिभाषा बदल चुकी है। हम जो करें और सब सही है दूसरा करे वह गलत। हम संविधान दिवस का जश्न मनाते हैं उस पर बहस होती है लेकिन संविधान जिस पर आधारित है वह है लोकतंत्र।  लोकतंत्र के अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों पर सार्थक चर्चा की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है। राजनीतिक खिलाड़ियों के किसी भी काम पर हम चुप रहते हैं जबकि जिंदा कौमें या विचारशील कौम 5 साल तक इंतजार नहीं करती। अब जनादेश का अपमान देखकर लोग बौखलाते नहीं है। विगत कुछ वर्षों में कई राज्यों में जनादेश की अनदेखी हुई है लेकिन जनता में इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं देखी गई। मजबूत और सत्ताधारी दल हमेशा से मनमानी करते हैं । अपने दौर में कांग्रेस ने तो आपातकाल लगा कर उदाहरण ही स्थापित कर दिया था। लेकिन  अभी जो हो रहा है वह सब कुछ जाएज है और पर सवाल नहीं उठने चाहिए । पिछले कुछ वर्षों के अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लोकतांत्रिक मूल्यों में किसी का भी विश्वास नहीं रहा । महाराष्ट्र के मामले में ही देखें जनादेश शिवसेना और भाजपा के गठबंधन को मिला था, लेकिन हो क्या रहा है । जनता तो ठगी सी महसूस कर रही है । भले वह कुछ ना बोले । लेकिन यहां यह मानना जरूरी है कि हर खेल के कुछ तो नियम होते हैं, चाहे वह कितना भी छोटा खेल क्यों ना हो। जो कुछ भी हो रहा है वाह संविधान और लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा मसला है। इसलिए इस पर गंभीरता से बात होनी चाहिए। कुछ सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब राज्यपाल महोदय महामहिम कोशियारी से मांगे जाने चाहिए । उनकी गतिविधि को देखकर ऐसा महसूस होता है कि उन्हें अपने पद का खतरा था और नियम मानने की बजाय उन्होंने हुक्म मानना बेहतर समझा। हालांकि वे पहले राज्यपाल नहीं हैं जिन्होंने ऐसा किया । उनके पहले कई आ चुके हैं जो नियम और कानून को ताक पर रखकर काम करते रहे हैं।
          महाराष्ट्र में राजनीतिक दलों ने जो कुछ किया ऐसा लगता है कि उन्होंने मतदाताओं और वहां के लोगों की उम्मीदों को पैरों तले रौंद दिया। ऐसे दल जिनके सिद्धांत राजनीतिक तौर पर एक दूसरे से विपरीत थे वे साथ आ गए । उन्होंने सत्ता की भागीदारी कर ली। यहां एक बात उठाई जा सकती है कि अगर किसी राजनीतिक पार्टी के उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि तथा उसकी दौलत की घोषणा हो सकती है और उसे कानूनन मान्य किया जा सकता है तो फिर क्यों नहीं चुनाव आयोग किसी भी राजनीतिक दल के उम्मीदवार अथवा इंडिपेंडेंट उम्मीदवार से यह घोषणा पत्र मांगे कि उसके सिद्धांत क्या हैं और वह किन सिद्धांतों के आधार पर किसी दल से गठबंधन करेगा । इससे मतदाताओं को यह तय करने का अवसर मिलेगा कि किसी विशिष्ट दल पर कितना भरोसा किया जा सकता है। उसकी क्या प्रतिबद्धता हो सकती है। संविधान सभा में बीआर अंबेडकर ने कहा था कि "किसी भी संविधान का कार्य पूरी तरह से संविधान की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता। संविधान की आवाज राज्य जैसे तंत्र मुहैया करा सकता है।" इसमें प्रमुख कारक हैं वहां की जनता और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल, जो जनता तथा राजनीति की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए अपने तंत्र तैयार करेंगे। लोकतंत्र केवल वोट देना नहीं है या सरकार बनाना नहीं है। यह मतदाताओं तथा चुनाव के बाद बनी सरकार के बीच एक भरोसा भी है। महाराष्ट्र में क्या हुआ? यह भरोसा कहां तक खत्म हुआ है यह हमारे देश की जनता खुद तय करे।


Monday, November 25, 2019

न जाने आगे क्या है!

न जाने आगे क्या है!

महाराष्ट्र का राजनीतिक नाटक कई मोड़ से गुजरता हुआ आगे बढ़ रहा है। जो कभी समाज के अगुआ समझे जाते थे आज समाज में जाल लिए घूमते हैं किसको कहां से उठाएं और कहां डालें। आधुनिक राजनीति में होटल और रिसोर्ट राजनीति की प्रतिनिधियों के शरण स्थल बन गए हैं। महाराष्ट्र में पिछले दो-तीन दिनों से जो कुछ हो रहा है उसमें कहीं भी नैतिकता के प्रतिमान नहीं दिखाई पड़ रहे हैं। शुक्रवार को हालात कुछ ऐसे थे मानो एनसीपी की कांग्रेस के साथ मिलकर मिलकर सरकार बन जाएगी लेकिन अचानक भाजपा के देवेंद्र फडणवीस और एनसीपी के अजित पवार ने शपथ ले ली। दोनों ने विधायकों की जरूरी संख्या दावा भी किया। दिन बीतने के साथ-साथ स्थितियां बदलने लगीं। भाजपा ने जिस बहुमत का अपनी मुट्ठी में होने का दावा किया था वह रेत की तरह उसकी मुट्ठी में से फिसलता हुआ नजर आने लगा। उधर एनसीपी के प्रमुख शरद पवार ने नारे लगाए अजित पवार के पास दो तिहाई बहुमत के लायक समर्थन नहीं है। ऐसे में भाजपा अपना बहुमत साबित नहीं कर पाएगी । उधर जब बीजेपी को लगा शिवसेना और एनसीपी मिलकर राज्य में सरकार बना सकती है तब बीजेपी ने पवार की कमजोर कड़ी को तोड़ने की कोशिश की। अजीत पवार को अपने ही परिवार से कुछ समस्याएं थीं। अजित पवार अपने भतीजे रोहित पवार के करजत सीट से विधानसभा चुनाव  से नाराज थे और इन मामलों को लेकर  परिवार में मनमुटाव चल रहा था । भाजपा ने शरद पवार की इसी कमजोर स्थिति यानी अजीत पवार का फायदा उठाया। शरद पवार यह कह तो रहे हैं कि उनके पास विधायक हैं और सरकार बनाएंगे लेकिन उनकी समस्या यह है कि वह सरकार बनाने में ध्यान लगाएं या फिर परिवार बचाने में। उधर एनसीपी को बचाना पवार के लिए चुनौती है। इधर अजित पवार की घटना के बाद लोग कहने लगे शरद पवार को उनके भतीजे ने पटकनी देदी और राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा करने वाले शरद पवार से उनकी पार्टी को छीनने का काम अजीत पवार ने कर डाला। वैसे भी अजित पवार और शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के बीच  पार्टी की विरासत को लेकर  रस्साकशी चल रही थी। लेकिन , जैसा कि  लोग जानते हैं  सुप्रिया सुले को  केंद्रीय राजनीति में दिलचस्पी है  और  वह  सांसद के रूप में  दिल्ली में राजनीति कर रहे हैं।  दूसरी तरफ  अजीत पवार को  महाराष्ट्र की राजनीति में  सक्रिय पाया जाता है। अभी जो स्थिति है  उससे तो लग रहा है कि अजित पवार  एनसीपी की  लीडरशिप की दौड़ से  बाहर निकल आए हैं और  शरद पवार की  राजनीतिक विरासत अजित पवार के हाथों से फिसल गई है। लेकिन बदले हालात ने यह प्रमाणित कर दिया है कि अजित पवार बुरे फंसे । जब अजित पवार ने भाजपा का समर्थन कर सरकार बनाई तो यह दावा किया गया है कि उनकी पार्टी के कुल 54 विधायकों में से 35 उनके साथ हैं । कानूनन अगर दो तिहाई या उससे ज्यादा विधायक अथवा सांसद किसी दल से अलग होते हैं तो उन पर दल बदल कानून नहीं लागू होता है उनकी सदस्यता कायम रह जाती है। एनसीपी के विधायकों के मामलों में यह संख्या 36 बनती है । अगर 35 विधायक अजित पवार के साथ होते तो एक विधायक का और जुगाड़ कर वे आसानी से एनसीपी को तोड़ सकते थे। लेकिन यही गणित गड़बड़ हो गया। अधिकांश विधायक अभी शरद पवार के साथ हैं। एनसीपी की बैठक में 54 में से 49 विधायक शामिल थे अब अजित पवार फंस गए हैं । जो कुछ भी हुआ हो रहा है उसमें शरद पवार शिकार नहीं की बल्कि उसके केंद्र में है और ऐसा लगता है कि पवार ने अपने भतीजे के माध्यम से भाजपा को फजीहत करने की योजना बनाई थी। लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है इस समय जो ताजा स्थिति है उसमें महाराष्ट्र की राजनीति में पवार सबसे मजबूत खिलाड़ी के रूप में दिखाई पड़ रहे हैं और एक साथ कई निशानों को भेदते नजर आ रहे हैं । अब जो नई राजनीतिक परिस्थितियां बन रही है उससे लगता है कि एनसीपी के विधायक अजित पवार के साथ नहीं है और इस आधार पर कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के लिए विधानसभा में बहुमत साबित करना कठिन हो जाएगा।  अगर ऐसा होता है तो फडणवीस के लिए आगे का राजनीतिक सफर बहुत मुश्किल नजर आ रहा है।
          शरद पवार की चाल का सबसे बड़ा प्रभाव भाजपा अध्यक्ष एवं गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर होता हुआ दिख रहा है। सूत्रों के मुताबिक अजित पवार के कहने पर भाजपा के महाराष्ट्र प्रभारी भूपेंद्र यादव ने अमित शाह को बहुमत का भरोसा दिलाया था लेकिन अब ताजा परिस्थिति में ऐसा नहीं लग रहा है और अगर पार्टी बहुमत साबित नहीं कर सकी तो सबसे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति पार्टी के शीर्ष नेताओं की हो जाएगी। कहा जाने लगेगा कि कैबिनेट बैठक बुलाए बिना महाराष्ट्र से राष्ट्रपति शासन हटाया जाना और राज्यपाल के माध्यम से भाजपा सरकार को शपथ दिलाने का काम किए जाने की क्या जल्दी थी? अमित शाह ने पिछले कुछ वर्षों से ऐसी छवि बनाई थी जिससे लोग उनको भारतीय राजनीति का चाणक्य समझने लगे थे। लेकिन इस ताजा स्थिति से उनकी इस छवि को आघात लग सकता है। शरद पवार की नीति अमित शाह पर भारी पड़ती दिख रही है।
पॉलिटिक्स की बिसात पर विपक्षी को मात देने का हुनर भाजपा अच्छी तरह से जानती है और उसने यहां भी वही किया है। आगे देखना है कि यह सब लोकतंत्र के लिए कितना शुभ और कितना अशुभ है।


Sunday, November 24, 2019

महाड्रामा: क्लाइमेक्स तो अभी बाकी है

महाड्रामा: क्लाइमेक्स तो अभी बाकी है

देश के सियासी इतिहास में शनिवार को एक महा ड्रामा हुआ। शह और मात का रोमांचक खेल। ऐसा लग रहा था जैसे 80 के दशक की फिल्में देख रहे हैं या फिर उन्हीं फिल्मी कहानियों को 22 वीं शताब्दी के दूसरे दशक में चस्पा कर दिया गया है। शुक्रवार की शाम को शिवसेना के उद्धव ठाकरे को अंधेरे में रख राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अजित पवार ने अचानक बाजी उलट दी और भाजपा के देवेंद्र फडणवीस के साथ उप मुख्यमंत्री की शपथ ले ली। शरद पवार जब नींद से जागे तो उन्हें यह खबर मिली और अजीत पवार की चाल ने उन्हें चौंका दिया।
कहा तो यह जा रहा है अजित पवार के ऐसा करने के पीछे मुख्य कारण है उनके ऊपर चल रही जांच। वे फिलहाल 2 आपराधिक मामलों में फंसे हुए हैं। पहला मामला  मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने दायर किया है। यह महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक में 25000 करोड़ रुपयों के घोटाले का मामला है और मुंबई हाई कोर्ट के निर्देश पर यह मामला दायर किया गया। सिंचाई घोटाले में भी उन पर जांच चल रही है।
अजित पवार की यह चाल उनके चाचा शरद पवार की 41 साल पहले की चाल को याद कराती है, जब शरद पवार ने कांग्रेस के दो धड़ो की  सरकार गिरा कर राज्य के सबसे नौजवान प्रधानमंत्री का तमगा हासिल कर लिया । शरद पवार ने 1978 में जनता पार्टी  की गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया था जो 2 साल से भी कम समय तक चली।संजोग से इस बार भी वह राज्य में कांग्रेस और शिवसेना से हाथ मिला कर इसी तरह का गठबंधन करने की कोशिश में थे। लेकिन  उनके भतीजे अजित पवार ने उन्हें मात देदी। उन्होंने 23 नवंबर की सुबह उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। इस पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए शरद पवार ने कहा कि भाजपा को समर्थन देने का फैसला उन्होंने नहीं किया है। यह उनके भतीजे अजीत पवार का व्यक्तिगत फैसला है। शरद पवार ने अपनी किताब "ऑन माय टर्म्स" लिखा है कि "1977 में इमरजेंसी के बाद देशभर में इंदिरा विरोधी लहर चल रही थी और कई लोग स्तब्ध थे। पवार के गृह क्षेत्र बारामती से वीएन गाडगिल कांग्रेस की टिकट से हार गए थे। इंदिरा जी ने 1970 की जनवरी में कांग्रेस को विघटित कर दिया और पवार स्वर्ण सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस (एस ) में चले गए। क्योंकि उनके गाइड यशवंतराव चौहान भी इसी गुट में थे । 1 महीने के बाद महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हुए और कांग्रेस ( एस) को 69 सीटें तथा कांग्रेस (आई) को 65 सीटें मिलीं। जनता पार्टी को 99 सीटें हासिल हुईं और इस तरह से किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला ।  कांग्रेस के दोनों धड़ों को मिलाकर सरकार बनाई गई। लेकिन दोनों में तनातनी कायम रही और सरकार का चलना मुहाल था। पवार ने कांग्रेस के 38 विधायकों के साथ मिलकर नई सरकार बनायी और वह सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने ।  1980 में दोबारा इंदिरा जी की सरकार बनी और पवार की सरकार को होने बर्खास्त कर दिया कुंवार बड़ी चालाकी से राजीव गांधी के नेतृत्व के तहत अपनी मूल पार्टी में चले आए। आज जो अजित पवार ने किया है यह संभवत शरद पवार के सियासी  स्टाइल का दोहराव है। इस बार भी किसी को बहुमत नहीं मिला है। महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 21 अक्टूबर को चुनाव हुए थे और 24 अक्टूबर को उसके नतीजे आए थे। चुनाव में भाजपा को 105 शिवसेना को 56 एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिली थीं। किसी भी पार्टी का  गठबंधन के सरकार बनाने का दावा नहीं पेश कर सका। इस के बाद 12 नवंबर को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था । इसके बाद जो ताजा समीकरण बने हैं उनको देखते हुए ऐसा लग रहा है कि देवेंद्र फडणवीस सबसे बड़े घाटे में रहेंगे। क्योंकि शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी ने अपने विधायकों को अपने पास रखा है और इनके लिए बहुमत साबित करना मुश्किल हो जाएगा। इनके बाद घाटे में रहेंगे अजित पवार क्योंकि उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के साथ बगावत कर एनसीपी की विश्वास को आघात पहुंचाया है । इससे उनकी साख को भारी नुकसान हुआ है। उन्हें शरद पवार के वारिस के रूप में देखा जाता था और यह जो कुछ हुआ वह शरद पवार के साथ गद्दारी मानी जाएगी। उन्होंने यद्यपि परीक्षा पास की लेकिन अभी कई परीक्षाएं बाकी हैं और इसमें भाजपा के फेल होने के आसार बहुत ज्यादा हैं। उधर अजीत पवार को एनसीपी के विधायक दल के नेता के पद से हटा दिया गया है और उनकी जगह राज्य एनसीपी अध्यक्ष जयंत पाटील को दी गई है। पाटिल की नियुक्ति का स्पष्ट अर्थ है की जब देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार की सरकार सदन में अगले हफ्ते बहुमत साबित करने के लिए खड़ी होगी तो पाटिल व्हिप जारी कर सकते हैं।  व्हिप के उल्लंघन का स्पष्ट अर्थ है पार्टी से निष्कासन और निष्कासन का मतलब विधायक पद समाप्त उधर अटकलें लगाई जा रही हैं 25 से ज्यादा विधायक अजित पवार से संपर्क में है लेकिन एनसीपी के विधायक दल बैठक में 45 विधायकों की उपस्थिति यह स्पष्ट करती है कि पार्टी के अधिकांश विधायक अजीत पवार के साथ नहीं हैं। विधायक दल की बैठक में कहा गया कि अजीत पवार ने जो कुछ किया है वह पार्टी के विरुद्ध है इसलिए उन्हें विधायक दल के पार्टी से निष्कासित किया जाता है और विधायकों को व्हिप देने का अधिकार भी उनसे वापस दिया जाता है इसके पूर्व शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में शरद पवार ने कहा कि उन्हें नहीं लगता राज्य सरकार बहुमत साबित कर पाएगी।
           अब मामला किस करवट बैठता है यह आने वाला समय बताएगा । क्योंकि पूरी की पूरी बात सुप्रीम कोर्ट के सामने है और सुप्रीम कोर्ट रविवार को ही इस पर सुनवाई करने जा रहा है।
आंकड़े बाज लोग आंकड़े इकट्ठे करते रहे ।कुछ लोगों का मानना है इस पूरे गेम में देवेंद्र फडणवीस सबसे ज्यादा घाटे में रहेंगे। इस पूरे मामले का क्लाइमेक्स अभी बाकी है देखिए क्या होता है आगे आगे।


Friday, November 22, 2019

अब चुनावी बांड का मामला गरमाया

अब चुनावी बांड का मामला गरमाया 

कांग्रेस और विपक्षी दलों ने गुरुवार को लोक सभा में चुनावी बांड का मामला उठाया और सरकार पर भ्रष्टाचार को अमलीजामा पहनाने का आरोप लगाते हुए काफी शोर-शराबा मचाया तथा सदन से बहिर्गमन  कर गया।
दरअसल कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहां हालात सामान्य करने को लेकर कांग्रेस ने संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत को मुद्दा बनाया। गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के बाद अब चुनावी बांड का मुद्दा उठने लगा ।  बुधवार को सोनिया गांधी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक की। उसमें चुनावी बांड के बारे में प्रदर्शन करने का फैसला किया गया।
कांग्रेस का कहना है कि रिजर्व बैंक के मना करने के बावजूद भाजपा ने चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था की ताकि ना चंदा देने वाले का और ना चंदे की राशि के स्रोत तथा ना चंदा पाने वाले का पता चले। जहां तक पता चला है कि 2017 के बजट के ठीक पहले रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने चुनावी बांड का विरोध किया था । लेकिन मोदी सरकार ने रिजर्व बैंक की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए चुनावी बांड की घोषणा कर दी ।  रिजर्व बैंक ने चुनावी बांड का खुलकर विरोध किया था। लेकिन कुछ नहीं हुआ और तत्कालीन राजस्व सचिव हंसमुख अढिया ने रिजर्व बैंक की आपत्तियों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि बैंक इस सिस्टम को सही ढंग से समझ नहीं पाया। उन्होंने  रिजर्व बैंक के पत्र के जवाब में लिखा कि बैंक की सलाह देर से आई है और वित्त विधेयक छप चुका है। इसलिए सरकार इस प्रस्ताव पर आगे कदम बढ़ा सकती है। कुल मिलाकर बैंक की आपत्तियों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया गया। बांड जारी करते हुए सरकार का दावा था कि इसके माध्यम से राजनीतिक दलों के खातों में चंदा जमा करने की गुमनाम व्यवस्था पर रोक लगेगी और चुनाव में काले धन पर अंकुश लगेगा। लेकिन, बांड खरीदने वाले की पहचान को गुप्त रखने का जो प्रावधान इस योजना में रखा गया उससे सरकार क्या चाहती है यह स्पष्ट हो गया। एक तरफ चुनावों में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों का खर्च बेतहाशा बढ़ रहा है और चुनाव आयोग इस खर्च पर अंकुश लगाने में खुद को असमर्थ पा रहा है। कारपोरेट क्षेत्र से प्राप्त चंदे की अब चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका है। सात- सात चरणों तक चुनाव को खींच ले जाना सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में जा सकता है । क्योंकि , चुनावी बांड के माध्यम से प्राप्त धन को वह चुनाव प्रचार में झोंक सकती है ।
अपने देश में चुनाव में सबसे अधिक काला धन खर्च होता है 2017 के बजट से पहले 20000 रुपए से ऊपर चंदा देने वालों को चेक से देने की व्यवस्था थी और उसके बाद उससे कम के लिए रसीद लेनी होती थी ।राजनीतिक पार्टियां इस प्रावधान का गलत इस्तेमाल करने लगी थीं। इससे देश में काला धन बढ़ रहा था। इस धन का इस्तेमाल चुनाव में भी होता था। कुछ दलों ने तो ऐसा दिखाया 80- 90% चंदा 20,000 से कम रुपय के रूप में हासिल हुआ। चुनाव आयोग की सिफारिश पर 2017 18 के बजट सत्र में केंद्र सरकार ने गुमनाम नगद की सीमा घटाकर ₹2000 कर दी थी। इसका मतलब यह हुआ कि ₹2000 से अधिक चंदा लेने के लिए राजनीतिक दलों को बताना होगा कि यह चंदा किस स्रोत से आया है। सरकार ने घोषित तौर पर इसे रोकने के लिए बड़े जोर जोर से चुनावी बांड की व्यवस्था की। लेकिन शायद उससे घोषित उद्देश्य पूरा नहीं हो सका।
विधि आयोग ने अपनी 255 वीं रिपोर्ट में 20000 के नीचे  राजनीतिक चंदों को भी राजनीतिक दलों द्वारा सार्वजनिक किए जाने की जाने की अनुशंसा की थी जबकि सब मिलकर 20 करोड़ से ज्यादा धन हो जाते हैं।
राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पार्टियों की ओर से चुनाव आयोग को दाखिल की गई वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट में जो जिक्र है उसके अनुसार 2018  - 19 में  जो चुनावी बांड बिके और उसके आधार पर जो आंकड़े सामने आए हैं उनसे ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी के लिए 45 सौ करोड़ रुपये के बांड खरीदे गए हैं। हालांकि भाजपा ने अभी तक अपनी रिपोर्ट पेश नहीं की है जबकि वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट जमा करने की अंतिम तारीख 31 अक्टूबर थी।
      रिपोर्ट जमा  नहीं करने की सूरत में यह समझ में नहीं आ रहा है कि भाजपा को कितना मिला और पार्टी की ओर से इस पर चुप्पी साध ली गई है । जनप्रतिनिधि कानून की विभिन्न धाराओं के मुताबिक राजनीतिक पार्टियों को चुनावी बांड के बारे में जानकारी देने की जरूरत नहीं है लेकिन इनकम टैक्स के मुताबिक राजनीतिक पार्टियों के लिए अपनी आय की जानकारी चुनाव आयोग को देनी जरूरी है। चुनाव आयोग के पास इस मामले में बहुत ज्यादा अधिकार नहीं हैं। वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट ना जमा करने की सूरत में आयोग पार्टियों को केवल कारण बताओ नोटिस दे सकता है। यहां सवाल उठता है कि आखिर   क्यों मोदी सरकार में जनवरी 2018 में इस बांड योजना अधिसूचित की गई थी और उसके साथ कहा गया था कि इससे चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता आएगी लेकिन शायद ऐसा नहीं हो सका। क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि राजनीतिक पार्टियां चुनावी बांड खरीदने वालों के बारे में चुनाव आयोग को बताए। अब इससे कभी पता नहीं चल पाएगा कि 6000 करोड़ के चुनावी बांड  खरीदने वाले कौन लोग थे। कुल मिलाकर इससे राजनीतिक भ्रष्टाचार को एक तरह से बढ़ावा ही मिलता है और काला धन भी प्रोत्साहित होता है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस दूध की धुली है लेकिन लोकसभा में कांग्रेस द्वारा इस बात को उठाया जाने का स्पष्ट अर्थ मोदी सरकार को घेरने का एक अवसर पैदा कर रही है । राजनीति में यह चलता ही है लेकिन इसमें जो रणनीति है वह बिल्कुल इमानदारी भरी नहीं है, क्योंकि कमोबेश बांड की राशि उसे भी तो मिली है।
         


Thursday, November 21, 2019

एनआरसी पर गरमा रही है राजनीति

एनआरसी पर गरमा रही है राजनीति 

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा की  केंद्र सरकार का नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर तीव्र आलोचना की है और कहां है कि वह इस राज्य में एनआरसी नहीं लागू कर देंगी। गृहमंत्री अमित शाह ने बुधवार को संसद में बयान दिया था कि जब भी देशभर में एनआरसी लागू किया जाएगा असम में भी उसे दोहराया जाएगा। विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों ने  देश भर में एन आर सी के  खिलाफ बयान दिए हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एनआरसी बिल पर केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है । उन्होंने कहा है कि कोई भी किसी से नागरिकता का अधिकार नहीं छीन सकता और उसे शरणार्थी नहीं बना सकता है।
राज्य सरकार का दावा है कि बंगाल में एनआरसी को लेकर आतंक बढ़ता जा रहा है और कई लोगों ने पिछले 1 महीने में आत्महत्या कर ली है। उधर, अमित शाह ने कहा है, पश्चिम बंगाल में एनआरसी का लागू होना तय है और उससे पहले सरकार नागरिकता संशोधन अधिनियम के जरिए हिंदू सिख जैन ईसाई और बौद्ध शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दे देगी। अमित शाह ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह एनआरसी को लेकर लोगों को गुमराह कर रही है। उधर राजनीतिक हलकों में यह बात उठ रही है कि सरकार एनआरसी के जरिए बांग्लादेशी नागरिकों को देश से बाहर निकालने की बात तो कर रही है लेकिन यह कैसे होगा यानी कैसे निकाला जाएगा लोगों को इस मुद्दे पर सरकार चुप है।
उन्होंने कहा कि असम में एनआरसी असम समझौते का हिस्सा था और यह समझौता राजीव गांधी के जमाने में हुआ था। उन्होंने कहा कि यह देशभर में कभी लागू नहीं हो सकता। ममता जी ने किसी के नाम तो नहीं लिया लेकिन कहा, कुछ लोग राज्य में उपद्रव करना चाहते हैं यह कह कर कि बंगाल में एनआरसी लागू किया जाएगा। मै  स्पष्ट करना इसे कभी लागू नहीं करने दिया T। मैं लोगों को धर्म के नाम पर बांटने नहीं दूंगी।" उन्होंने दावा किया कि राज्य को धर्म के नाम पर बांटने की साजिश चल रही है लेकिन अगर कोई बंगाल को ऐसा करने के बारे में सोचता है तो गलतफहमी में है । असम में लगभग 19 लाख लोग एनआरसी की सूची से बाहर   जिन्हें एनआरसी की सूची से बाहर रखा गया है। उनमें बंगाली हिंदू, मुसलमान ,गोरखा और बौद्ध है इन्हें डिटेंशन सेंटर में भेजा जाएगा। बंगाल में ऐसा कभी नहीं करने दिया जाएगा और ना ही कोई डिटेंशन सेंटर बनने दिया जाएगा। यहां एक बुनियादी प्रश्न है कि यदि एनआरसी एक कानूनी प्रक्रिया है तो असम एनआरसी के तहत गैर नागरिक घोषित लोगों के साथ कानूनी प्रक्रिया कैसे अपनाई जाएगी? एक तरफ सरकार बांग्लादेश की आश्वासन देती है कि एनआरसी की प्रक्रिया उसे प्रभावित नहीं करेगी तो फिर असम के इन 19 लाख लोगों का क्या किया जाएगा? कब तक की 19 लाख लोग मानवाधिकारों के बिना रहेंगे?
        उधर असम में भी एनआरसी के खिलाफ आवाज उठ रही है बुधवार को ही असम के मंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने कहा है इसे रद्द किया जाना चाहिए और  एक ही  कट ऑफ  तारीख से  देशभर में लागू किया जाना चाहिए। असम में यह कटऑफ तारीख 24 मार्च 1971 है। जो आवेदक यह प्रमाणित कर देगा कि उस तारीख से या उसके पहले से वह  या उनके पूर्वज असम में रह रहे थे उनके नाम नागरिकता सूची में  कर लिए जाएंगे। असम में पहली एनआरसी 1951 में बनी थी और वर्तमान एनआरसी उस संदर्भ में अद्यतन है। जिन लोगों के नाम 1951 की सूची में हैं उनके परिवार के  नाम एनआरसी में लिखे जा सकते हैं और अब जो नए नाम लिखे जाएंगे वह 25 मार्च 1971 के आधार पर होंगे। यानी ,उस दिन की रात के 12:00 बजे तक यदि किसी के नाम मतदाता सूची में अथवा वैसे ही किसी वैधानिक दस्तावेज में है तो वह नाम एनआरसी में लिखा जा सकता है। एनआरसी की पहली सूची 31 अगस्त को प्रकाशित हुई थी जिसमें  19 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं थे। ऐसे लोगों को राज्य के विदेशी ट्रिब्यूनल के समक्ष अपनी बात कहने का मौका दिया जा सकता है।
           इसके पहले अमित शाह ने कहा था कि नागरिकता संशोधन विधेयक संसद के इसी सत्र में रखा जाना है और यह अखिल भारतीय स्तर पर एनआरसी के पहले पारित हो जाएगा। यहां एक ध्यान देने की बात है कि एनआरसी यानी  नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन कट ऑफ तारीख के आधार पर नागरिकता तय करेगा जबकि नागरिकता संशोधन विधेयक धर्म के आधार पर बाहर से आए लोगों के बारे में तय करेगा। लेकिन अभी  राज्यसभा में जाने से पहले ही प्रस्तुतीकरण की तारीख पार होने के कारण निरस्त हो गया। इस विधेयक में नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन का प्रस्ताव है। इसमें भारत के गैर मुस्लिम 6 अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय के लोगों के लिए थोड़ी रियायत मिली है । इनमें शामिल हैं अफगानिस्तान ,बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख ,बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई । प्रभावशाली सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का कहना है कि नागरिकता संशोधन विधेयक एनआरसी के विपरीत है । अगर असम में यह विधेयक पारित हो जाता है तो जो हिंदू एनआरसी से वंचित रह गए हैं वे भी नागरिक हो जाएंगे जबकि मुसलमान इस सुविधा से वंचित रहेंगे। ऐसी स्थिति में वर्तमान एनआरसी बेकार है। अगर देशभर में एनआरसी लागू होता है तो एक बार फिर राजनीतिक तौर पर बवाल होगा और तनाव बढ़ेगा। वैसे तनाव संभवत कोई असर नहीं डाल पाएगा क्योंकि क्योंकि ग्रास रूट स्तर तक सरकार की राजनीतिक दलबंदी  है और इसका स्पष्ट उदाहरण बाबरी मस्जिद फैसले के बाद देखने को मिला।
    


Wednesday, November 20, 2019

जरा कल के बारे में भी सोचें

जरा कल के बारे में भी सोचें

भारत में  दूषित हवा  और दूषित पानी  की खबरों ने  चारों तरफ तहलका मचा दिया है। हर आदमी  परेशान है कि सांस कैसे ले पिए क्या ? दिल्ली जैसे शहर में तो ऑक्सीजन काउंटर खुल गया है। धीरे धीरे धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है, समुद्र उथला होता जा रहा है। यानी हमारी पृथ्वी को और हमारे देश को मौसम का खतरा झेलने के लिए बाध्य होना पड़ेगा एक तरह से हम  अपनी ही  करनी का अभिशाप भोगने को मजबूर किए जा रहे हैं।
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति 
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु ॥1॥

विख्यात पत्रिका लांसेट की काउंटडाउन  रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस तेजी से कार्बन का उत्सर्जन हो रहा है उसका असर आज पैदा होने वाले हर बच्चे को जिंदगी भर भुगतना पड़ेगा। आज पैदा हुआ बच्चा जब 71 वर्ष का होगा तब तक धरती का तापमान 17 वीं शताब्दी के मध्य से 4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहेगा। यानी गर्मी बहुत बढ़ेगी। हमारे देश के ऐसे बच्चे जो इस समय दूषित हवा में सांस ले रहे हैं , दूषित जल पी रहे हैं और कुपोषण तथा संक्रामक रोगों की चपेट में आसानी से आ सकते हैं उन पर इस जलवायु परिवर्तन का  व्यापक असर पड़ेगा। कृषि उत्पादन घटेगा। अब सवाल है कि हमारी आने वाली पीढ़ी की जिंदगी में कृषि कितना असर डालेगी? सरकारी रिपोर्ट बता रही है कि चावल और मक्का की औसत पैदावार कम हो रही है।  अब ऐसा होने से इनकी कीमत बढ़ेगी जिससे कुपोषण का बोझ बढ़ेगा। हमारे देश के बच्चे वैसे ही पहले से कुपोषण के शिकार हैं।  मौसम बदलने से संक्रामक रोग बढ़ेंगे और बच्चे इस का सबसे पहला शिकार होंगे। वायु प्रदूषण बढ़ने से जलकण में व्याप्त धूल के कण से मरने वालों की संख्या बढ़ेगी। विनाशकारी बाढ़ ,सूखे जंगलों में आग इत्यादि परिणाम होंगे बढ़ते तापमान के। यह आम बात है कि बच्चे बदलते जलवायु के कारण होने वाले स्वास्थ्य जोखिम के शिकार जल्दी जाते हैं। क्योंकि, उनके शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली  पूरी तरह विकसित नहीं हुई रहती है। एक और रिपोर्ट में कहा गया है कि इस दुनिया में औसत तापमान में वृद्धि से भारत की आधी आबादी को खतरा है। भविष्य को बचाने के लिए हमें ऊर्जा परिदृश्य में तेजी से परिवर्तन लाना होगा और ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस पर सीमित करने की कोशिश करनी होगी। जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले संकट आज मनुष्यता के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक हैं। लेकिन हम आज भी अपनी सरकार की ओर देख रहे हैं , खुद कुछ नहीं करते। यानी हम आने वाली पीढ़ी को तड़प तड़प कर मरने के लिए सरकार के भरोसे छोड़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए पेरिस समझौता हुआ यह 2020 से कार्यान्वित होगा । लेकिन अगर इसे ईमानदारी से और पूरी ताकत से लागू नहीं किया गया तो जो विनाश होगा उसे  बर्दाश्त नहीं किया जा सकेगा।
          जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा कृषि पैदावार घटने लगेगी और खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ने लगेगी। यह वृद्धि गरीबों की पहुंच से बाहर होगी। जैसा कि सब जानते हैं नवजात और छोटे बच्चे कुपोषण के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं । नतीजा यह होता है कि उनका विकास रुक जाता है और उनके भीतर की  प्रतिरक्षा प्रणाली सुस्त हो जाती है ।  भविष्य की समस्याएं बढ़ जाती हैं। जैसी की खबर है, बढ़ते तापमान के कारण में पिछले 30 वर्षों में दुनिया भर में अनाज की उपज की क्षमता घट गई है। रिपोर्ट  के अनुसार मक्के की उपज में 4% गेहूं की उपज में 6% सोयाबीन की उपज में 3% और चावल की उपज में 4% गिरावट आई है। 1960 को आधार मानकर किए गए आकलन के अनुसार भारत में मक्का और चावल की उपज में औसत 2% की गिरावट आई है और पिछले 5 साल में 5 साल से कम उम्र के दो तिहाई बच्चों की मृत्यु का कारण कुपोषण रहा है । इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक भारत में जलवायु परिवर्तन से कृषि उत्पादन लगातार गिर रहा है 2010 अगर आधार मान लिया जाए तो 2030 में भारत में कृषि उत्पादन बहुत ज्यादा गिर जाएगा।  2030 में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण भूख से पीड़ित लोगों की अनुमानित संख्या 22.5 प्रतिशत से ज्यादा हो सकती है । या कह सकते कि एक सौ 20 करोड़ की आबादी में करीब 24 करोड़ लोग भूख से पीड़ित होंगे।  यह भूख क्या रंग लाएगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
       और तो और बीमारियां बढ़ेंगी। बदलते मौसम के साथ एक खास किस्म की बैक्टीरिया विब्रियो के फैलने का खतरा बढ़ जाता है और इससे पेचिश की बीमारी दुगनी हो जाती है। अस्पतालों में डायरिया से ग्रस्त बच्चों की लंबी सूची को देखकर स्पष्ट अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम किधर बढ़ रहे हैं । जलवायु परिवर्तन के साथ मच्छर बढ़ते हैं और इस समय डेंगू दुनिया में सबसे ज्यादा तेजी से फैलने वाला रोग बन गया है । एक शोध के मुताबिक भारत की आधी आबादी को इससे खतरा है । आज के बाद जो परिदृश्य रहेगा और हवा की प्रदूषण तथा वातावरण  के तापमान की जो स्थिति रहेगी उससे बच्चों के फेफड़े ज्यादा प्रभावित होंगे और सांस की बीमारियां बढ़ती जाएगी। अभी खनिज तेल का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है और इससे वातावरण में कार्बन मोनोऑक्साइड के पार्टिकुलेट मैटर भी बढ़ रहे हैं अत्यंत बारीक इसके कण सांस के साथ हमारे रक्त प्रवाह में फैलते जा रहे हैं। इससे अकाल मृत्यु का खतरा बढ़ता जा रहा है । आज बच्चा जन्म ले रहा है, उसके सामने जीवन में आगे चलकर गंभीर बीमारियां, लंबे समय तक सूखे और जंगली आग का खतरा बढ़ जाएगा । रिपोर्ट के मुताबिक 196 देशों में से लगभग 152 देशों में 2001 से 4 के बाद जंगल की आग के शिकार लोगों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ी है ।भारत में इस संख्या में लगभग 2 दशमलव 10 करोड़ और चीन में 1 दशमलव 70 करोड़ से ज्यादा वृद्धि हुई है इस वजह से लोग मर रहे हैं। सांस की बीमारियां फैल रहीं हैं और उन्हें अपने घरों से भी हाथ धोना पड़ रहा है। 2018 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है इस साल दुनिया भर में 22 करोड़ लोग लू से मरे भारत में जनसंख्या 4.30 करोड़ थी। भारत में साल 2000 बाद अत्यधिक गर्मी के कारण है    काम के घंटे बर्बाद हुए।अकेले कृषि क्षेत्र में 12 अरब काम के घंटों का नुकसान हुआ। इस खतरनाक  स्थिति से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाला दिन कैसा होगा और हमारे बच्चों को क्या झेलना पड़ेगा।