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Friday, August 14, 2020

शिक्षा के तौर-तरीकों में बदलाव

 शिक्षा के तौर-तरीकों में बदलाव

केंद्रीय सूचना मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बुधवार को बताया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल में नई शिक्षा नीति को अनुमति दी है। केंद्र सरकार द्वारा अनुमति मिलने के बाद अब फिर से मानव संसाधन मंत्रालय का नाम बदल दिया गया। अब यह शिक्षा मंत्रालय के नाम से जाना जाएगा।  अब स्कूली शिक्षा में 1 से लेकर पांचवी क्लास तक की पढ़ाई में क्षेत्र विशेष की मातृभाषा को माध्यम बनाया जाएगा। यानी,  हिंदी भाषी प्रदेशों में जो बच्चे पांचवी क्लास तक पढ़ते हैं उन्हें अब हिंदी में शिक्षा लेनी पड़ेगी, बंगाल के बच्चे बांग्ला में और अन्य प्रांतों के बच्चे  वहां की स्थानीय भाषा में शिक्षा ग्रहण करेंगे। इसके दो लाभ होंगे । पहला कि जो बच्चे रट्टा मार कर सब  याद कर लेते थे उन्हें अब स्किल आधारित शिक्षा की ओर ले जाएगा। यह सुझाव इसरो के पूर्व प्रमुख कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में गठित पैनल ने दिया था।  “ ब्रिटिश जमाने में  मेकाॅले ने  ब्रिटिश पार्लियामेंट में कहा था कि जब तक भारतीय शिक्षा को कमतर नहीं किया जाएगा तब तक भारत पर शासन नहीं किया जा सकता।”  उसी रिपोर्ट के आधार पर अंग्रेजी को बढ़ावा देने  और उससे शिक्षा प्राप्त किए लोगों को रोजगार दिए जाने के फलस्वरूप धीरे-धीरे भारतीय भाषाएं और भारतीय शिक्षा खत्म होने लगी तथा अंग्रेजी और अंग्रेजियत को बढ़ावा  मिलने लगा।  एक जमाने में  भारत में शिक्षा पर नहीं सीखने पर जोर था अब धीरे-धीरे वह सीखना खत्म हो गया और  डिग्रियां उनकी जगह  आ गई।  अब से हजारों साल पहले भारत के एक कवि कालिदास ने बादलों को  दूत बनाया और उन के माध्यम से संदेश प्रेषित किया।  अब क्लाउड में संदेश रखे जा रहे हैं।  भौतिक शास्त्री स्टीफन हॉकिंग ने  भारत में एक वार्ता के दौरान जब यह सुना तो हैरत में पड़ गये।  उनका कहना था कि भारत देश में इतनी चीजें हैं तो लोग सीखने विदेश  क्यों जाते हैं।  ऐसा लगता है कि कस्तूरीरंगन  को वह वाक्य भीतर से  उद्वेलित कर रहा था।  यही कारण हो सकता है जिसके चलते उन्होंने शिक्षा में यह बुनियादी परिवर्तन की सिफारिश की। 34 वर्षों के बाद10+2 के शिक्षा के ढांचे को परिवर्तित कर दिया गया और अब उसकी जगह शुरू किया गया है 5+3+3+4।यानी,  स्नातक कक्षा तक  पहुंचने में पहले 12 वर्ष लगते थे अप 15  वर्ष लगेंगे।  अब ज्यादा परिपक्व तथा जिज्ञासु  ग्रेजुएशन तक पहुंचेंगे। उनमें सीखने की क्षमता ज्यादा होगी।  दूसरी लाभ है कि पांचवी क्लास तक के बच्चे अपनी संस्कृति और अपनी सभ्यता को ना केवल समझेंगे बल्कि उसे महसूस भी करेंगे।  बचपन से राम को रामा बोलने वाले बच्चे अब नहीं मिलेंगे।  वह राम को राम ही  कहेंगे।

          शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’  ने कहा कि यह नीति 2020 का मील पत्थर साबित होगी। अब जो नई नीति बनी है उसके मुताबिक 6 से 8 साल का बच्चा पहली और दूसरी क्लास में  पढ़ेगा।  इसके बाद 11 से 14 क्लास की पढ़ाई होगी आप सब 14 से 18 साल की उम्र तक में छात्र 12वीं क्लास तक की पढ़ाई लेगा।  इस नई नीति में आर्ट्स और साइंस के बीच कोई गंभीर अलगाव नहीं होगा। यही नहीं  कैरीकुलर और एक्स्ट्रा कैरीकुलर  गतिविधियों  को भी अलग नहीं समझा जाएगा यही बात वोकेशनल और एकेडमिक शिक्षा के साथ भी लागू होगी।शिक्षा सचिव अनिता करवाल के अनुसार अब इस नई नीति में बोर्ड की परीक्षा का महत्व कम होता जाएगा।  इसके लिए इसे दो भागों में बांटने जैसे कई प्रस्ताव हैं इसके अंतर्गत अब बोर्ड की परीक्षाएं दो बार होंगी। अब बोर्ड की परीक्षाओं में रट्टा मारना काम नहीं आएगा इसमें रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी बातें ही पूछी जाएंगी। यही नहीं अपने रिपोर्ट कार्ड  का मूल्यांकन खुद कर  लेगा। मातृभाषा को सिखाने का माध्यम बनाए जाने के मामले में पांचवी क्लास तक को प्राथमिकता एवं आठवीं क्लास के छात्र इस पर जोर बनाए रखने  की प्राथमिकता है।  प्री स्कूल से  माध्यमिक स्तर तक ग्रॉस इनरोलमेंट रेश्यो को 2030 तक 100% करने का लक्ष्य रखा गया है।  भारत में लगभग 2 करोड़ बच्चे स्कूलों में नहीं पढ़ते हैं , उन्हें भी स्कूल जाने का बंदोबस्त किया जाएगा। इस नई शिक्षा नीति का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जो बच्चा स्कूल की पढ़ाई खत्म कर लेगा वह कम से कम  पढ़ाई के साथ साथ एक कौशल भी सीख  जाएगा। कौशल से आगे काम में सहूलियत मिलेगी। शिक्षा नाति का सबसे बड़ा फायदा है कि अगर किसी पारिवारिक समस्या या किसी और समस्या के कारण पढ़ाई रुक जाती है और  सेमेस्टर छोड़ने पड़ते हैं तो मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम के तहत अगर किसी बच्चे ने 1 साल की पढ़ाई की है तो उसे सर्टिफिकेट ,2 साल की पढ़ाई की है तो उसे डिप्लोमा मिलेगा और 3 या 4 वर्ष के बाद डिग्री दी जाएगी।  यानी,  कोई छात्र अधूरी पढ़ाई  का भी  उपयोग कर सकता है। यही नहीं अगर किसी ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और कुछ साल के बाद उसे पूरी करना चाहता है  तो उसके लिए भी इस नीति में उपाय हैं। अगर कोई बच्चा तीसरे साल में पढ़ाई छोड़ता है  और तय समय सीमा में लौटना चाहता है तो उसे सीधे उसी साल एडमिशन मिल जाएगा।  आज स्थिति यह है कि अगर कोई बच्चा 4 सेमेस्टर या 6 सेमेस्टर  पढ़ने के बाद पढ़ नहीं पाता तो आगे नहीं पढ़ पाएगा।  लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं रह  गई।  सबसे बड़ी सुविधा रिसर्च में जाने के लिए  मिली है।उसके लिए 4 वर्षों का डिग्री प्रोग्राम का विकल्प दिया जाएगा यानी 3 वर्ष डिग्री के साथ 1 वर्ष  मास्टर डिग्री हासिल करने और फिर फैलोशिप की जरूरत नहीं है। अब सीधा रिसर्च में जाया जा सकता है।  यही नहीं,   अब  मल्टीडिसीप्लिनरी सब्जेक्ट भी लिया जा सकता है।  जैसे कोई छात्र इंजीनियरिंग पढ़ता है और उसे संगीत में  रुचि है  तो वह पढ़ाई के साथ साथ उसे भी जारी रख सकता है।  इसमें जो सबसे बड़ी बात है वह है कॉलेज में प्रवेश के पूर्व बोर्ड की परीक्षा का मूल्य  घटा दिया  गया है।  अब यह दो बार होगा।  बोर्ड की परीक्षाओं में ज्ञान की परीक्षा होगी ना कि किसी विषय को रटकर उसकी परीक्षा दी जा सकती है।  इस सारी प्रणाली में जो सबसे बड़ी बात है वह है कि  किसी छात्र को सीखने का मौका मिलेगा केवल किताबी ज्ञान से काम नहीं चलेगा।


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