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Saturday, October 31, 2015

उदारता की बुलंद आवाज की जरूरत



31 अक्टूबर 2015

आम तौर पर खाना- पीना या पहनना किसी के जीवन- मौत का सवाल बन जाय तो बड़ा अजीब लगेगा। लोग वैसे आदमी पर हंसेंगे। लेकिन ऐसा हो रहा है, कई समूह इन बातों पर, खासकर खाने-पीने के मामलों पर नजर रखने के लिए कमर कसे हुए हैं। जब सत्ता और ऐसे समूह इस तरह की निगरानियों में एक में मिल जाएं तो हालात बड़े खतरनाक हो जाते हैं। ऐसी ही​ एक घटना दिल्ली में हुई। बुधवार को एक संगठन की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने दिल्ली के केरल भवन पर छापा मारा। वह तो खुश किस्मती थी कि मामला दादरी वाली घटना की तरह खतरनाक नहीं हुआ पर इस तरह के काम में दिल्ली पुलिस का जुड़ना अपने आप में एक चिंतित कर देने वाला कार्य है। मामला जब गरमाया तो दिल्ली पुलिस ने चेहरा बचाने के लिहाज से कहा कि वहां की कैंटीन में क्या पक रहा था वह छापे का उद्देश्य नहीं था। वह तो साम्प्रदायिक तनाव को रोकने की गरज से पुलिस गयी थी। पुलिस का यह स्पष्टीकरण उतना ही संदेहास्पद है जितना उन स्वयंभू गोरक्षकों का कार्य। ये स्वयंभू गो रक्षक हठात देश की धार्मिक और राजनीतिक अस्मिता के बिम्ब बन बैठे।

यूं तो हमारे देश में सैकड़ों दल ,सेनाएं और सोसाइटिया हैं जो जनहित में काम करने के लिए बना तो ली जाती हैं पर धीरे -धीरे विलुप्त हो जाती हैं। कारण कोई भी रहा हो , लेकिन अधिकतर मामलों में इनका एजेंडा साफ नहीं रहता जिसके कारण संगठन अपनी राय स्पष्ट नहीं कर पाते हैं और दूसरा इनके प्रमुखों की व्यक्तिगत महत्वकांक्षा ,जो एजेंडे को परिवर्तनशील बनाये रखते हैं और वे अपने संगठन का विस्तार नहीं कर पाते । साथ ही साथ देश में कई ऐसे संगठन हैं जिनका प्रभाव पिछले कुछ दिनों में बड़े पैमाने पर देखा जा सकता है। लेकिन क्या उनका एजेंडा सही है? ये सोचने का एक बड़ा प्रसंग हो सकता है। जैसे हाल ही में कुछ संगठनों ने खाने-पीने की चीजों पर ध्यान तो दिया जिसका असर भी दिखा लेकिन उनके विषय विरोधाभासी थे जिसका जनमानस पर नकारात्मक असर दिखा लेकिन क्या इसे हम सकारात्मक बना सकते हैं ? ऐसा भी हो सकता है , हम इसी एजेंडे को जन चेतना का एजेंडा बना सकते हैं । जैसे कोई व्यक्ति विशेष क्या खा रहा है इसको छोड़ कर ये देखने की जरूरत है कि कितने व्यक्ति ऐसे हैं जिनके पास खाने के लिए आटा ,दाल चावल नहीं हैं ? कितने व्यक्ति ऐसे हैं जिनके पास रहने के लिए मकान नहीं हैं ? कितने व्यक्ति ऐसे हैं जिनके पास इलाज़ के लिए पैसे नहीं हैं?कितने व्यक्ति ऐसे हैं जिनकी फसलें बर्बाद हुई हैं ?

सारे हालात देख कर ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो नावों पर सवार हैं। एक नाव है विकास की और दूसरी है हिंदुत्व की। उनका मानना था कि वे दोनों को अलग- अलग रखेंगे। एक से उन्हें बहुलवादी समाज का समर्थन मिलेगा और दूसरे पर सवार होकर विदेशी निवेश आयेगा।

2014 के चुनाव के विजेता को यह बखूबी मालूम है कि इस ​िस्थति से उन आश्वासनों या वायदों को पूरा नहीं किया जा सकता है। पर उन हिंदूवादी संगठनों को रोके कौन?यह संयोग ही हो सकता है, केरल भवन की यह घटना लगभग उसी समय हुई जब देश के तीन प्रमुख वैज्ञानिकों ने देश में बढ़ती असहिष्णुता पर क्षोभ जाहिर किया था। बेशक भारत में क्या हो रहा है और भारत की क्या परम्परा है , इस बात पर बाल की खाल निकालना बड़ा आसान है। लेकिन उन वैज्ञानिकों की उस बात को आसानी से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा है कि देश में जो हो रहा वह रूढ़िवाद है और वैज्ञानिक सोच के प्रतिकूल है। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया। परंतु , धर्म के नाम पर इन दिनों जो हो रहा है उसमें कई हिंदूवादी संगठन शामिल हैं , यहां तक कि सत्तारूढ़ दल भाजपा के लोग भी कई मामलों में जुड़े हुए हैं। जो कुछ भी हो रहा है उसमें केवल एक दूसरे पर तोहमत लगाने से कुछ नहीं होने वाला। उदार विचार एवं उदारता आज की बुलंदी ही हालात पर काबू पा सकती है।

Friday, October 30, 2015

राजन की गिरफ्तारी से उठते सवाल


30 अक्टूबर
छोटा राजन को गिरफ्तार कर लिया गया है। मीडिया में सुर्खियां ही सुर्खियां इस खबर को लेकर। रॉ और कई एजेसियों को अपना करीबी सूत्र बताते हुये मीडिया में लिखा- कहा जा रहा है कि दाऊद को गिरफ्तार करने के लिये उसे इस्तेमाल किया जायेगा। एक धड़ा कह रहा है कि चूंकि वह अपनी सरकार को मदद करता था और दाऊद के लोग उसके पीछ थे इस लिये दऊद से जान बचाने के लिये अंदर करवा दिया। ये डान लोग अदृश्य ताकत-से होते हैं, जिन पर जितना लिखा-सुना जाता है, उतना सच होता है या नहीं. यह आम आदमी को शायद ही कभी पता चले, लेकिन वे होते जरूर हैं। 80 के दशक में जे एफ रिबेरो की एक किताब आयी थी ‘मुम्बई अंडरवर्ल्ड - फ्राम रामपुरी टू ए के 47।’ उसमें कहा गया है कि, तब अंडरवर्ल्ड जैसा कुछ नहीं था, बस चाकू-छुरे चला करते थे। वही चाकू-छुरे और कट्टे चलाने वाले संगठित होते चले गए तो अंडरवर्ल्ड जैसा कुछ बन गया। जो बना, उसमें बड़ा-सा रोल पुलिस का था और छोटा-मोटा रोल मीडिया का भी। मालूम नहीं क्यों, मीडिया ने 'भाई' को भाई ही लिखा, और पूरी दुनिया का 'भाई' बना डाला। फिर उसके खौफ को अपने कवरेज से कई गुना बढ़ा दिया। शायद तभी डॉन टाइप के लोगों को समझ आ गया था कि कुछ करो या न करो, मीडिया वालों को फोन ज़रूर घुमाओ। इस तरह मीडिया का इस्तेमाल शुरू हुआ।यह वह दूसरा चरण था दंतकथाओं, मीडिया और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों का। इसके बाद एक नया दौर आया। जिसमें मीडिया का कुछ हिस्सा भी वैसे ही बंट गया, जैसे अंडरवर्ल्ड बंटा। कुछ लोगों को सिर्फ दाऊद एंड कंपनी के फोन आते और कुछ को छोटा राजन के। इस खेमेबाज़ी से पहले दाऊद और छोटा राजन दोनों अखबारों को प्रेस रिलीज़ भेजने जैसे प्रोफेशनल पीआर के काम में माहिर हो चुके थे। एक वह दौर भी आया, जब दाऊद और छोटा राजन जैसे लोग प्रेस के खास हिस्से को यह भी बताने लगे कि कैसे खबर छापनी है। इसके बाद टी वी का जमाना आया और दंतकथाओं वाले अपराधी ग्लोबल हो गए।जो अपराधी चंद लोगों का 'भाई' था, उसके पैर पूरे समाज में जम गये। राजन की गिरफ्तारी में ही कितना दिलचस्प वाकया हुआ। करीब दो महीने से दंत कथाओं की तरह दाऊद की कथाएं चारों तरफ घूम रहीं थीं , कोई उसका ताजा फोटो छाप रहा था तो कोई पाकिस्तान में उसके पड़ोसी रह चुके आदमी का बयान यछाप रहा था, खबरों का एक टेंपो था और इसी टेंपो में इंडोनेशिया के बाली में छोटा राजन उर्फ राजेंद्र सदाशिव निखलजे नाम का एक भगोड़ा पकड़ा गया है जिसका पासपोर्ट नंबर जी-9273860 है। इसके बारे में उन्हें कैनबरा पुलिस ने जानकारी दी थी। बताया जाता है कि राजन के पास से इसके अलावा दो और पासपोर्ट मिले हैं। इनमें से एक पासपोर्ट सिडनी में बना जिस पर उसका नाम मोहन कुमार लिखा है। एक टी वी चैनल का दावा है कि गिरफ्तार राजन ने बताया है कि वह किसी से नहीं डरता जबकि बाली पुलिस कह रही है कि वह बहुत डरा हुआ है। बाली के पुलिस कमिश्नर रीनहार्ड नैंगोलन का कहना है कि , 'राजन को मीडिया से दूर एक थाने में रखा गया है और वह काफी घबराया हुआ है। वह डरा हुआ लग रहा है। लगातार सिगरेट पिये जा रहा है। वह कह रहा है कि उसकी पत्नी और पिता मर चुके हैं और इसलिए वह भारत नहीं जाना चाहता। हालांकि , सी बी आई का कहना है कि राजन की पत्नी सुजाता निकलजे अभी जिंदा है। बताया जाता है कि कुछ साल पहले तक छोटा राजन की भारत के मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से काफी निकटता रही है। सन 2005 में मुंबई पुलिस ने राजन के दो साथियों विकी मलहोत्रा ओर फरीद तानाशाह को जब गिरफ्तार किया था तब डोभाल उनके साथ थे। राजन पर कई अपराधिक मामले दर्ज हैं। हालांकि, अब डोभाल खुफिया अधिकारी नहीं हैं, जो गोपनीय ढंग से काम कर सकें। वे अब देश के सुरक्षा तंत्र का चेहरा हैं। हालांकि डोभाल साहब के बारे में कहा जाता है कि वे दाऊद के बारे में रणनीत बना रहे हैं। मीडिया में दाऊद संबंधी दस्तावेज जारी करके पाकिस्तान पर दबाव डालने की कूटनीति की अपनी सीमा है, जैसा कि भारत-पाक के बीच एनएसए स्तर की वार्ता रद्द होने से जाहिर होता है। शासन कला में शोर कम, ठोस कार्रवाई की ज्यादा जरूरत होती है। यह प्रचार की ऐसी लड़ाई नहीं हो सकती, जो कड़ी बातें करके केवल अपनी जनता को संतुष्ट करने के लिए हो। भारतीय एजेंसियों से भी राजन की नजदीकियां रही हैं। ऐसे में इंडोनेशिया में उसकी अचानक गिरफ्तारी स्वाभाविक रूप से प्रश्न पैदा करने वाली है।भारत के फरार मुजरिम छोटा राजन की जो ताजा तस्वीरें सामने आई हैं उनमें वह बाली पुलिस की गिरफ्त में होने के बावजूद मुस्कराता हुआ दिखाई दे रहा है। यह तस्वीरें खुद ही कुछ कहने की कोशिश कर रही हैं। जिसकी कई सालों से तलाश थी उसकी इतनी आसानी से गिरफ्तारी हैरत में डालने वाली है। यहां राजन से जुड़ा एक सवाल भी है कि कैसे मुम्बई गोदी में तस्करी करने वाला अपराधी अंतरराष्ट्रीय अंडरवर्ल्ड डॉन हो गया। अपराधशा​​िस्त्र​यों के लिये यह शोध का विषय है।

आज की विपदा की जड़



29 अक्टूबर

एक आदमी

रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है

वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूँ--

'यह तीसरा आदमी कौन है ?'

मेरे देश की संसद मौन है।

मेरे पास आयुष नाम के एक स्कूली बच्चे का फोन अक्सर आता है। वह कौन है, कैसा है और उसके माता पिता क्या करते हैं यह मालूम नहीं पर वह जब भी फोन करता है ताे किसी वाद विवाद प्रतियोगिता के बारे में प्वाईंटस जानना चाहता है। उसकी जिज्ञासा की कशिश को महसूस करके मैं उसे इंकार नहीं कर सकता। हम भी जब बच्चे थे तो इस तरह की बहसों में भाग लेते थे। यह जरूरी है कि आप तर्क दें, बहस करें, अपनी बात कहें। वाद विवाद की खासियत यही भावना है। 70 से 80 के दशक में स्कूल में वाद-विवाद प्रतियोगिताएं बहुत लोकप्रिय होती थीं। हमें एक-दूसरे के खिलाफ तर्क रखना और दलीलें देना सिखाया जाता था। अगर हम अच्छा प्रदर्शन करते तो हमें दूसरे स्कूलों में वहां वाद-विवाद की श्रेष्ठ प्रतिभाओं से मुकाबला करने भेजा जाता था। जब हम कॉलेज में पहुंचे तो वाद-विवाद की लोकप्रियता कई गुना बढ़ चुकी थी। मुद्दे भी बहुत जटिल और ज्यादा उत्तेजक हो गए थे। दरअसल, उस समय दुनिया कई अद्भुत तरीकों से बदल रही थी और हम सबको लगता था कि हम उस बदलाव के हिस्से हैं और इस बदलाव में हमारी भी भूमिका है। उस दौर में राजनीति चुनाव जीतने का मामला नहीं था। और उन दिनों लोगों की राय आमतौर पर प्रतिरोधी होती थी। युवा शक्ति के सामने बहुत ही ताकतवर सरकार को डगमगाते और गिरते देखा। हवा में बदलाव को महसूस किया जा सकता था। हर किसी के पास भिन्न दृष्टिकोण होता।समाज में जो भी बहस होती उसमें नए विचार सामने आते। उन दिनों मुद्दों को लेकर कोई लड़ने या हाथापाई करने पर उतर नहीं पड़ता था। लोग एक-दूसरे के खिलाफ जितने भी हथियारों का इस्तेमाल करते, उनमें सबसे तीखा होता था हाजिरजवाबी और सॉलिड तर्क।

राजनीतिक भाषण भी विचारों के उसी स्रोत से निकलते। उन दिनों सभाओं में उतनी भीड़ शायद ही कभी होती थी, जितनी आज होती है, क्योंकि किसी को भी खरीदे हुए श्रोताओं को ट्रकों में भर-भरकर लाने की जरूरत नहीं महसूस होती थी। उम्मीदों से भरे नौजवान वे भाषण सुनने जाते, क्योंकि वे उस नए भारत से संबंधित होते, जिसका हम सपना देख रहे थे। एक नए राष्ट्र का निर्माण हो रहा था और हम सबको लगता कि इसमें हमारी भी भूमिका है। इस नए राष्ट्र में जाति व समुदाय समान अवसरों के लिए रास्ता खुला करेंगे। उस दशक में दुनिया विचारों पर झगड़ रही थी, जब युवा छात्र शक्तिशाली सरकारों को भी अपने अन्यायी युद्धों पर फिर गौर करने के लिए मजबूर कर देते थे। एलन जिन्सबर्ग ने ‘हाउल!’ कविता लिखी थी, जो अमरीकी नौजवानों का गीत बन गया, जिसमें अमरीका की परमाणु ताकत को ओछा बताया गया था। किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई।पूरी राजनीति के केंद्र में असहमति और बहस होती थी। युवा छात्र हर राष्ट्र की आवाज हुआ करते थे।

अपनी ही सोच पर

ढेर सारे शक और

मुंह से निकलते नहीं लफ्ज़

जैसे कि हम बेजुबान हो गये।

आज असली बहस प्राय: उन लोगों द्वारा पटरी से उतार दी जाती है, जो अपने विरोधियों की देशभक्ति पर सवाल उठाने लगते हैं। किसी बहस व दलील को खत्म करने के लिए आक्रोश भड़काया जाता है, क्योंकि उसका बचाव या विरोध करने लायक बौद्धिक चतुराई तो किसी में है नहीं। इसलिए विचारक और तर्कवादी सॉफ्ट टार्गेट हैं।

आसमान से फरिश्ते जो उतर आएं

वो भी इस दौर में बोलें तो मारे जाएं

जो लोग दूसरा दृष्टिकोण अपनाने की दलील देते हैं उन्हें चिल्लाकर चुप कर दिया जाता है, क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल के पास खुद का बचाव कर सकने लायक बौद्धिक क्षमता नहीं है। इसलिए विद्वान भी अब अछूत हो गए हैं। अब हमारे सामने सिर्फ सामाजिक दर्जे से वंचित अचानक धनी बने लोगों का समूह और ऐसा राष्ट्र है, जो किसी भी कीमत पर आगे बढ़ना चाहता है।

जिनको पहनाया ताज

वही दौलत के गुलाम हो गये,

जिन ठिकानों पर यकीन रखा

वही बेवफाई की दुकान हो गये।

अब न तो रामराज्य का सपना है और ना अन्य कोई यूटोपिया। अब दौलत हमारा सपना है। ये दौलत चाहे जैसे आये और इसी के कारण विचार का स्पेस, आदर्श की जगह खत्म होती जा रही है। आज की समस्या यही है और आज की सारी विपदाओं की जड़ भी यही है।

दृष्टियों की धार में बहती नैतिकता का

कितना भद्दा मजाक है

कि हमारे चेहरों पर

आंख के ठीक नीचे ही नाक है।

Wednesday, October 28, 2015

मेक इन इंडिया का नारा और आज की ​स्थिति



28 अक्टूबर 2015

कहते हैं कि भारत ने ‘जीरो’ का आविष्कार किया था। कब- कैसे और किन परिस्थितियों में इसके ऐतिहासिक या वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं हैं। पर इसकी यहां जरूरत भी नहीं है। यहां फकत यही कहना है कि जिस भारत ने शून्य काे खोजा आज वही भारत शून्य होने की और बढ़ रहा है। 2020 तक भारत को दुनिया के शीर्ष पर देखने का सपना संजोए डॉ. अब्दुल कलाम क्या गए, प्रतीत होता है पूरे देश का गणित ही बिगड़ गया। खाद्य- अखाद्य पर बैन, दादरी, दलित हत्या, बलात्कार, स्याही से ललकार, मंत्रियों के गैरजिम्मेदाराना बयान, साहित्यकारों के इस्तीफों के बीच हर पार्टी और उसके नेता जिस स्तर पर उतर आये हैं, मात्र अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। विपक्षी ऐसे भोंपू बजा रहे हैं मानों मोदी अवैध रूप से जबरन कुर्सी पर बैठे हों। किसी को देशहित, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि धूमिल होने और उसके विदेशी निवेश पर पड़नेवाले प्रभाव की नहीं पड़ी है। आर्थिक सहयोग और मदद के साथ सबसे अहम मसला छा गया है निवेश का। आज किसी और देश को उतनी चिंता नहीं, जितनी दरकार भारत को है। भारत एक ऐसा देश है, जिसके सामाजिक जीवन और कानून-कायदे में उदारता और हर बदलाव को स्वीकार करने की सदिच्छा झलकती है। आज के आधुनिक भारत के लिए कोई भी अजनबी नहीं है। हम किसी के रहन-सहन, लिबास या भाषा से चौंक नहीं उठते, उसके प्रति संदेह से नहीं भर जाते। उसके ऊपर अपना कुछ थोपने की कोशिश नहीं करते। इसलिए किसी भी इलाके का कोई भी नागरिक यहां आकर खुश होता है। कुछ दिनों पहले एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में भारत निवेश के लिए सर्वश्रेष्ठ जगह बतायी गयी थी, चीन से भी बेहतर, तो इसके पीछे और बातों के अलावा यहां के सामाजिक परिवेश की भी कुछ भूमिका थी। अब दुनिया भारत और चीन की ओर देख रही है कि कौन एक दूसरे को मात देकर आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर कदम बढ़ाता है। अब दुनिया में आर्थिक हथियार सबसे धारदार बन गया है। पिछले 15 वर्षों में भारत में सबसे ज्यादा निवेश बीपीओ सेक्टर में हुआ है, जिसकी वजह थी भाषा को लेकर हमारा उदार रुख। थोड़े-बहुत तकनीकी ज्ञान और अंग्रेजी के बल पर इस सेक्टर में बड़ी संख्या में लोग रोजगार पा सके। पर इतना पर्याप्त नहीं है। हमें स्थायी किस्म का निवेश चाहिए, वह भी काफी बड़े पैमाने पर। भारत में ऐसे कल-कारखाने खुलने चाहिए, जो वर्षों चलें और जिनमें लाखों लोगों को काम मिले। यह तभी हो सकेगा, जब दूसरे देशों के लोग हमारे यहां सहज महसूस करें। विदेशी निवेशकों को लगना चाहिए कि उनके रहन-सहन, आचार-विचार को लेकर भारत में कोई आपत्ति नहीं करेगा। दशकों तक हेकड़ी दिखानेवाले ईरान और मद में चूर सद्दाम के इराक को भी राष्ट्र संघ की आर्थिक नाकेबंदी के चलते घुटने के बल चलकर शर्तें मानने को मजबूर होना पड़ा था। आज भारत में जो कुछ हो रहा है वह दुनिया के सभी देशों को क्या संदेश दे रहा है? भले ही कोई ‘शान’ का ढिंढोरा पीटे और विज्ञापन से विश्वास दिलाने की कोशिश करे लेकिन सच्चाई यह है कि ढोल के पोल से सारी दुनिया वाकिफ हो चुकी है। अब तो आया हुआ निवेशक भी गठरी उठाकर दबे पांव देश से बाहर होने को सोच रहा है। यह सचमुच दुर्भाग्य की बात है कि आज भारत में एक तबका ऐसा व्यवहार कर रहा है, जिससे देश की उदारवादी और सर्वसमावेशी परंपरा की जड़ों पर चोट पहुंच रही है। उन्हें शायद पता नहीं है कि ऐसा करके वे अनजाने में या जान-बूझकर हमारी समृद्धि और विकास का रास्ता रोक रहे हैं। धर्म, जाति, उपजाति, आरक्षण, क्षेत्रीय संकीर्णता, हर क्षेत्र में शीर्ष तक पहुंच चुका भ्रष्टाचार, राजनीतिक अवसरवादिता और हिचकोले लेती अर्थ व्यवस्था को भले ही सबसे बड़े बाजार और सबसे सस्ती श्रमिक फौज की आड़ में कुछ समय के लिए छिपा लिया जाए लेकिन निवेश बिना वह कैसे पनपेगा? भारत की स्थितियों से विपरीत दूसरी ओर चीन में थ्यानमान चौक जैसे अनगिनत वाकिए, मानवाधिकार हनन की करोड़ों शिकायतें, जनता की दबाई गई आवाज और कम्युनिस्ट शासन होने के बावजूद दुनियाभर के निवेशक वहां लाइन लगाकर इसलिए खड़े हैं क्योंकि वहां सामाजिक शांति है। डेढ़ दशक पहले चीन द्वारा अपने दरवाजे दुनिया भर के लिए खोलते ही यूरोप के लगभग सभी देश, अमरीका, जर्मनी, जापान सहित सभी राष्ट्र इंडस्ट्रियल लॉ, श्रम कानून, न्यूनतम वेतन, श्रमिक भलाई से विमुख और कान में तेल एवं आंखों पर चश्मा लगाकर वहां पहुंच गए। उन्होंने इन समस्याओं पर इस तरह रिएक्ट किया मानों ये शब्द उन सबने पहली बार सुने हों। हमेशा जागरूक रहकर चीन के इन्हीं मामलों को विश्व मंच पर बुलंद करनेवाले ये देश सामाजिक शांति के तले सब कुछ भूलने को मजबूर हो गए। मेक इन इंडिया का नारा लगाना एक बात है और उसके लिए निवेश आये वैसा माहौल बनाये रखना बिलकुल दूसरी बात है तो यह देश के लिए अच्छा ही है कि मोदी- शाह की जोड़ी ने इस दिशा में सोचना शुरू कर दिया है।

स्थायी समाधान खोजने की जरूरत



27 अक्टूबर2015

देश में हाल की तीन घटनाओं को अगर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इनका यूनिवर्सल असर दिखायी पड़ेगा। पहली घटना दादरी कांड की है, दूसरी लेखक- समाज सुधारक की हत्या के विरोध में देश के लेखकों द्वारा अकादमी अवार्ड का लौटाया जाना और फिर पंजाब में पवित्र ग्रंथ के अपमान को लेकर फसाद। विख्यात पत्रिका टाइम्स की मानें तो लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाये जाने का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरा प्रभाव पड़ा है और भारतीय लोकतंत्र की साख को आघात का खतरा दिखायी पड़ने लगा है। पीएमओ के स्तर से यदि साहित्य अकादमी पुरूस्कार धनराशि समेत लौटने वाले उर्दू के मशहूर शायर मुनव्वर राणा को बातचीत के लिए बुलाया जाता है तो इसके यही संकेत हैं कि पीएम खुद अंतरराष्ट्रीय दबाव महसूस कर रहे हैं। पीएम के इस कदम से जहां पूरी दुनिया में भारत के खुले लोकतंत्र होने की पुष्टि होगी वहीं संघ से जुड़े संगठनों को भी अपनी इस तरह की विघटनकारी नीति पर चलने से बचने को बाध्य होना पड़ सकता है। दादरी कांड और दक्षिण भारत में लगातार संघ की मानसिकता का विरोध करने वाले भाजपा नेता और अन्य संगठनों के लोगों द्वारा जिस तरह से लगातार लेखकों, साहित्यकारों को अपने निशाने पर ले लिया गया है उसके बाद से मोदी सरकार के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीएम के चुप रहने का मुद्दा भी उठने लगा है। सरकार में आने के बाद से ही जिस तरह से मोदी ने खुद केवल एकतरफ़ा संपर्क करने के मार्ग पर चलना शुरू किया है उससे भी उनकी लोकतंत्र में आस्था और देश के सामने लगातार समस्याएं खड़ी करने वाले विवादों पर अपने निर्देश देने की प्रतिबद्धता भी कठघरे में दिखाई देने लगती है। इस परिस्थिति में मोदी सरकार की लगातार कट्टरपंथी तत्वों के कारनामों पर चुप रहने या उन्हें राज्यों का मामला बताने से भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस बात का भरोसा नहीं होता है कि सरकार वास्तव में इन मुद्दों पर गंभीर भी है? मोदी सरकार को अब यह दबाव कुछ इतना महसूस होने लगा है कि वह मीडिया के ज़रिये यह सन्देश देना चाहती है कि उसे भी इन कट्टरपंथियों की बातें रास नहीं आ रही हैं। बिहार चुनावों के मद्देनजर जिस तरह से गोहत्या मामले को सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाने और उसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश शुरू की गयी थी वह पूरी तरफ से फ्लॉप होने के बाद सरकार को यह समझ में आया कि इस तरह के मुद्दे के अंतरराष्ट्रीय दुष्परिणाम अधिक होते हैं। आज जब अंतरराष्ट्रीय मंचों से भारत सरकार से ये सवाल पूछे जाने लगे हैं तो भाजपा को समझ में आने लगा है कि इस तरह इन तत्वों को खुलेआम छोड़ना मोदी का हर कथित सफल विदेश दौरे के परिणामों को शून्य की तरफ ही ले जाने का काम करेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि स्थानीय कारणों के चलते किसी भी सामान्य सी घटना के भारत की संभावनाओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को समझते हुए अब मोदी सरकार भी उस डैमेज कंट्रोल में लग चुकी है जिससे उसके देशवासियों को दिखाए जाने वाले बड़े- बड़े सपनों के टूटने के संभावित खतरों पर चर्चा करना भी शामिल है। केंद्र सरकार और भाजपा जिस तरह से अभी तक इस तरह की किसी भी साम्प्रदायिक उन्माद की घटनाओं के चलते उस पर चुप रह जाने की नीति अपनाया करती थीं अब सरकार में होने के कारण उनके लिए इस रास्ते पर चलना मुश्किल हो गया है और उनकी कथनी व करनी का अंतर भी महसूस होने पर ही विदेशों से ही मोदी सरकार ने एक नीति के तहत ही बयानबाज़ी शुरू कर दी है। इसी क्रम में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के एक व्याख्यान के बाद पत्रकारों के सम्मेलन में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दादरी जैसी घटनाओं को देश की छवि बिगाड़ने वाला बताया है। जिस तरह से भाजपा और खुद मोदी बेहद दबाव महसूस कर रहे हैं अब उन्हें देश चलाने के लिए देश के ताने बाने के बने रहने की आवश्यकता का अहसास भी हो रहा होगा क्योंकि अभी तक इस तरह के मामलों पर केवल केंद्र सरकार को ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाब देना पड़ता है और शायद पहली बार यह स्थिति सामने आई है जिसमें भाजपा और मोदी को अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो रहा है। यह देश के लिए बहुत अच्छा है कि कम से कम इस घटना के बाद खुद देश चला रहे नेताओं और पीएम को इस बात की आंच महसूस होने लगी है। भाजपा का जन्म ही संघ की राजनीतिक शाखा के रूप में ही हुआ है तो वह और उसके नेता हिंदुत्व और हिन्दू राष्ट्र के उस सपने के लिए कुछ न कुछ करते ही रहते हैं जिसके लिए संघ ने काम करना शुरू किया था और जो आज भी संघ का प्रमुख एजेंडा हुआ करता है। देश के सामाजिक ताने- बाने के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ करने के साथ ही देश की प्रगति के सपने को उतनी तेजी से पूरा नहीं किया जा सकता है जिसकी आज देश में क्षमता है और जिस स्तर तक पीएम मोदी उसे पहुंचाना चाहते हैं। भाजपा की तरफ से जिस तरह की कुछ सुगबुगाहट शुरू हुई है तो उसे क्या स्थायी माना जाये या फिर उसे भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के द्वारा पड़ने वाले संभावित दबाव में मोदी सरकार की एक कोशिश ही मानी जाये? भारत के बहुलतावादी समाज में राजनेताओं के अनावश्यक दखल के चलते जिस तरह से रोज नयी समस्याएं उत्पन्न होती हैं आज उनका स्थायी समाधान खोजने की जरूरत है, वर्ना आने वाला कल बड़ा दुखदायी हो सकता है।


‘मन की बात’ में जन नहीं है




26 अक्टूबर 2015

रविवार को प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ की 13 वीं किस्त खत्म हुई। दो दिन पहले दशहरा गुजरा था और शनिवार को मुहर्रम। देश की जनता को पूरी उम्मीद थी कि मोदी जी देश के समक्ष जो मौजूदा समस्याएं हैं उनपर इस बार जरूर बोलेंगे , लेकिन वे वन डे क्रिकेट मैच से चल कर अंगदान और धनतेरस पर सोने के सिक्के से होते हुए गुजरे और बता गये कि दिवाली के दूसरे दिन लंदन यात्रा पर जा रहे हैं। उन्होंने कुछ सुझावों का भी उल्लेख किया, कुछ लोगों के खतों की कुछ पंक्तियां भी उद्धृत कीं। अगर समाजशास्त्र की भाषा में कहें तो यह सारा प्रयास एक मेस्मेरिक कोशिश थी , देश को जला रहीं समस्याओं के प्रति लोगों की नजरों को बांध देने की। मन की बात के लिए पीएम ने लोगों से सुझाव मांगे थे। उल्‍लेखनीय है कि बिहार के राजनीतिक महागठबंधन ने चुनाव आयोग से बिहार चुनाव तक पीएम के मन की बात कार्यक्रम पर रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन चुनाव आयोग ने कुछ शर्तों के साथ मन की बात कार्यक्रम को मंज़ूरी दे दी है। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने रविवार सुबह ट्वीट करके आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री सामाजिक सौहार्द बिगड़ने, हरियाणा में दलित बच्चों की मौत, दादरी कांड और महंगाई जैसे मुद्दों पर एक भी शब्द नहीं कहे। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री यह कहते रहे हैं कि 'मन की बात' कार्यक्रम उनके लिए लोगों से जुड़ने का मौका है। ‘मन की बात’ अब तक एकतरफा संवाद रहा है। सवाल यह है कि अब वह दोतरफा संवाद वाकई बन पाएगा कि नहीं? अब तक की ‘मन की बातें’ एक ओर से आतीं दूसरी ओर सुनी जाती रही हैं। वे एक ऐसी निर्मित बन चली हैं, जो प्रधानमंत्री से जनता तक पहुंचती हैं। जनता से प्रधानमंत्री तक सीधी पहुंचती नहीं दिखतीं। एक ‘टेलर्ड’ बातचीत लगती हैं। प्रधानमंत्री ने खुद कहा है, पहले भी और रविवार को भी , कि उनके पास सुझाव की हजारों चिट़ियां आती हैं, मेल आते हैं , टेलीफोन आते हैं। क्या पीएम सीना ठोंक कर कह सकते हैं कि उनमें शिकायतें नहीं होतीं। जिस तरह का अपना समाज है, वह ऐसा ‘‘प्रार्थना समाज’ नहीं है, जो सिर्फ सुझाव देता रहेगा और अपनी शिकायत न करेगा, न लिखेगा। अपना समाज तो पहले से ही शिकायती समाज रहा है। यकीन न हो तो सारे संदेशों को प्रकट कर दीजिए, हम सबको मालूम हो जाएगा कि हमारा समाज कितना सुझाववादी है और कितना शिकायतवादी। प्रधानमंत्री जी अपने ‘मन की बात ’ में उन शिकायतों की बात क्यों नहीं करते। वे घृणा फैलाने वालों, असहिष्णु वातावरण बनाने वाले तत्वों की निंदा क्यों नहीं करते ? यह सच है कि हर बात पर मोदी नहीं बोल सकते, लेकिन ऐसा भी नहीं कि उनको इन बातों का पता न हो और उनका मन इनसे विचलित न होता हो। अगर किसी के पास मन है तो ऐसी घटनाओं से विचलित अवश्य होगा। दर्द, करुणा, संवेदना और हमदर्दी ही तो वे भाव हैं, जो ऐसी घटनाएं देखकर पैदा होते हैं। उम्मीद थी कि इस बार की ‘मन की बात’ में माेदी जी की समझ और संवेदना अब तक की उनकी बातों का अतिक्रमण करेगी और रेडियो दोतरफा संवाद का जरिया बन जायेगा। क्योंकि इसमें जनता की बात सत्ता तक पहुंची और सत्ता ने उसपर ‘रिएक्ट’ किया है। यह परिकल्पना विख्यात विशेषज्ञ मार्शल मैक्लूहाम के सिद्धांत से उलट है, जिसमें सोचा जाता है कि जब वक्ता बोला करता है तो श्रोता सिर्फ सुना करता है यानी वक्ता का काम बोलना है, श्रोता का काम सुनना। कभी-कभी जब श्रोता बोलता है तो माध्यम के दूसरी ओर से बोलने वाले को भी सुनना पड़ता है। बढ़ती असहिष्णुता की खबरें समाज की ओर से सत्ता की ओर पहुंचने वाले वे संदेश हैं, जो निजी तौर नहीं लिखे गए, न लिखवाए गए हैं। वे अब समाज में व्याप्त हैं और सत्ता तक सीधे पहुंच रहे हैं। मीडिया में दादरी कांड और फरीदाबाद कांड की खबरों और उठी बहसों ने मोदी के लिए यह सवाल पैदा कर दिया है कि वे समाज की इस व्याकुलता और व्यथा को कितना समझते हैं? पीड़ित समाज के आंसू कितना पोंछते हैं। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। इस बाबत सीधे कुछ न कह कर प्रकारांतर से इन बातों के बारे में कुछ कह सकते थे। वे व्यंजना में कुछ कह सकते थे एक प्रकार के ‘शाश्वत सत्य’ कह कर काम चला सकते थे। एक प्रकार के ‘लीगलिस्टिक वचन’ कह सकते थे। उनसे जनता की ऐसी अपेक्षा नाजायज नहीं थी और नहीं रहेगी। वे देश के प्रधानमंत्री हैं। इसीलिए समाज के एक बड़े हिस्से में उनसे अपेक्षा बढ़ी है कि पीएम कम से कम इस बार दोटूक तरीके से अपनी बात कहेंगे। प्रधानमंत्री ने महंगाई और असहिष्णुता से आक्रांत जनता की आर्त पुकार सुनकर इन घटनाओं से कनेक्ट कर अपनी बात नहीं कही और यह ‘मन की बात’ फकत एकालाप बन कर रह गयी है।


Saturday, October 24, 2015

रावण का प्रश्न


24 अक्टूबर 2015
गुरुवार को यहां साल्ट लेक में रावण दहन का आयोजन हुआ था। जलता हुआ रावण बड़ा अजीब लग रहा था। आतिशबाजियां मानो उसकी चीख हों और उसका मानव ध्वनि रूपांतरण किया जाय तो ऐसा सुनने को मिलेगा जैसे , जलता हुआ रावण सामने खड़े लोगों से पूछ रहा हो कि , भाई तुम लोगों में राम कितने हैं? सचमुच यह एक विकट सवाल है। रावण ज्ञानी था, पंडित था, महादेव सिद्ध था, समृद्ध इतना कि पूरी लंका सोने की बनवा डाली थी , फिर भी मारा गया राम के हाथों। गौर करें ​कि राम ने लक्ष्मण से कहा था कि वे रावण के पैर छूकर आशिष लें और ज्ञान की याचना करें। आखिर क्यों? दरअसल , रावण की जो 10 बुराइयां थीं उनका अंत हो चुका था, वे बुराइयां आज भी हम सभी में हैं और राम में भी थीं पर वे उस पर विजय पाकर राम बने और रावण उनका गुलाम होकर रावण बना तो ये आप तय करें कि आप रावण हैं या राम। दशहरा का बहुत गहरा अर्थ है जो उसके नाम में छुपा हुआ है दश और हरा यानी दशहरा मतलब दशों अवगुणों को हरने वाला। वे दस अवगुण कौन से हैं जिनके हारने या जीतने की बात यहां हो रही है। हर इंसान में 10 प्रकार की बुराइयां होती हैं जो मुख्यत: हैं काम, लोभ, मोह, माया, अहंकार, क्रोध, पर स्त्री चिंतन, वासना, घमंड और अधर्म। रावण में ये सब बुराइयां थीं जिनके वशीभूत होकर वह परमात्मा से दूर हो गया था। अपने आप को भगवान समझने लगा था और लोगों पर अत्याचार करने लगा था। देश- काल और परिस्थित के अनुसार बुराइयां और रावण के रूप भी बदलते गए हैं, आज के समय में रावण जात पात ,आतंकवाद,देशों की आपसी लड़ाइयां, दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या, भ्रष्टाचार, नशाखोरी, बलात्कार, ईर्ष्या, लालच इन रूपों में पैर पसार रहा है, यदि सही में रावण का अंत इस दुनिया से करना है तो रावण रूपी इन बुराइयों का अंत करना जरूरी है तभी असली रावण का अंत संभव है। रावण का एक ही दोष था और वह बहुत बड़ा था कि उसमें अहंकार बहुत था, इसलिए वह सत्य-असत्य और विवेक-अविवेक में फर्क नहीं कर पाता था। इस योग्यता के लिए व्यक्ति को उदार होना चाहिए। जब तक हम दूसरे का पक्ष देखेंगे नहीं तब तक यह कैसे पता चलेगा कि दूसरा भी सही हो सकता है। यह योग्यता अहंकार होने पर पैदा नहीं हो पाती। रावण भौतिक शक्ति व संपदा का प्रतीक है और संदेश यही है कि भौतिक शक्ति हमेशा आध्यात्मिक शक्ति से पराजित होती है। श्रीराम के इतने सद्गुणों के बाद भी उन्हें लेकर कुछ विवाद हैं। जैसे सीताजी को लेकर उनका व्यवहार या बालि वध का प्रसंग , लेकिन इनमें सत्य का अंश ही होता है। समय के साथ किंवदंतियां जुड़ती जाती हैं। हमारे पास तो प्रमाण हैं कि श्रीराम ने सीताजी का कभी त्याग नहीं किया था। उस काल के अादर्श व मर्यादाओं को आज के संदर्भ में देखेंगे तो वे वैसे ही नहीं दिखाई देंगे। श्रीराम, सीताजी के लिए जितना रोए हैं, वह नारीवादी विचारकों के लिए विचारणीय है कि उनका प्रायश्चित उनकी गलती से बहुत ज्यादा बड़ा है। सबसे समग्र चरित्र तो हनुमान का है। भारत में जितने संप्रदाय हैं शैव हों, शाक्त हों, सभी में उन्हें स्थान है। इतनी स्वीकार्यता और किसी देवता को नहीं मिली है। वर्तमान के वे सबसे प्रासंगिक देवता हैं। काम में समर्पण ही विजय दिलाती है। यह वही संदेश देते हैं। निष्ठा भी उनका गुण है। जिसे स्वीकार किया है उसके प्रति निष्ठा। श्रीराम के अयोध्या से निर्वासन से लेकर रावण पर विजय तक की यात्रा देखें तो हमें आचरण के कुछ नियम और व्यक्तित्व के कुछ गुण नजर आते हैं, जो बताते हैं कि इन पर चलकर हम बुराई पर जीत हासिल कर सकते हैं। ये ऐसी बातें हैं, जिन्हें बार-बार रेखांकित करने की जरूरत है, क्योंकि यह बाहर के बजाय भीतर की लड़ाई ज्यादा है। जैसे अयोध्या छोड़कर वनवास पर जाने में श्रीराम का जो गुण नजर आता है वह है साहसपूर्वक दु:ख सहन करने का निश्चय। समाज से बुराई की शक्तियां खत्म करनी हैं तो श्रीराम की तरह हमें कष्ट झेलने के लिए तैयार होना पड़ेगा। यह संघर्ष लंबा है। मौजूदा वक्त में हम हर काम में शॉर्टकट खोजने लगते हैं। इस प्रवृत्ति से गलतियां हो जाती हैं। देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति में हमें इसका उदाहरण मिलता है। पर्याप्त संघर्ष के बाद एक तीसरा विकल्प सामने था, लेकिन शॉर्टकट में उलझकर वह आंदोलन भटक गया। शॉर्टकट जो अपनाएगा, समय उसे कट करके शॉर्ट कर देगा।

Friday, October 23, 2015

राष्ट्रपति के भाषण से मिलते संकेत


22अक्टूबर 2015
दशहरे के अवसर पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का भाषण बहुतों ने सुना होगा। उन्होंने देश की जनता से सहिष्णुता की अपील की। भाषण सुन कर कुछ ऐसा लगा कि राष्ट्रपति देश की ताजा हालात से बहुत क्षुब्ध हैं। पीड़ादायक तो यह है कि राष्ट्रपति को एक पखवाड़े की भीतर दूसरी बार ऐसी बात कहनी पड़ी है। तो क्या सचमुच देश के वर्तमान हालात हमें किसी अंधेरे में ले जा रहे हैं। खबरों की मानें तो रामलीलाओं और गरबा में भाग लेने के लिये दूसरे सम्प्रदाय के लोगों का प्रवेश वर्जित हो गया है। एक अजीब किस्म की असहिष्णुता की काली छाया चारो ओर फैल रही है। सोचने की बात है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। मंगलवार को जब राष्ट्रपति का भाषण चल रहा था और कोलकाता में दुर्गापूजा की धूम थी उसी बीच सन्मार्ग ने कुछ पढ़े लिखे नौजवानों से दादरी की घटना, कश्मीर की घटना , और कई इस तरह की घटनाओं के बारे में बातें की। दुखद यह है कि नौजवानों में इसके लिये कोई व्यथा नहीं थी। नौजवानों ने साथ में सेल्फी लेने की पेशकश तो की पर किसी ने यह नहीं कहा कि इस तरह के हिंसक विचार गलत हैं और इन्हें त्यागना चाहिये। जब 2014 में लोकसभा चुनाव का प्रचार चल रहा था तो एक सवाल उठा था कि नरेंद्र मोदी, उनकी पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ फासिस्ट हैं या नहीं। ‘थर्ड रीक’ यानी हिटलर की शासन व्यवस्था में देश के बदल जाने भय के बीच यदि हम उसी संदर्भ में आज के शासन की सियासी सक्रियता को विश्लेषित करें तो हैरत में पड़ जायेंगे। हमारे देश के आस पास दो अमीर और विकसित मुल्क हैं - चीन और जापान। राष्ट्रीयता और सामाजिक आंदोलनों के संदर्भ में दोनों हमारे समकक्ष हैं पर वहां राष्ट्रीयता, स्थानिकता और असहिष्णुता सुनने में नहीं आती। दरअसल , सामाजिक विपर्यय के दो आधार स्तम्भ होते हैं पहला, पोलिटिकल ईलीट वर्ग जो सत्ता में बने रहने के लिये इतिहास और उसके बिम्बों की अपने मनोनुकूल व्याख्या करता है। समाज शास्त्र की भाषा में इसे ‘राजनीतिक मिथकनिर्माण’ कहते हैं। इस क्रम में इतिहास की अलग व्याख्या होती है, बच्चों की किताबें दुबारा लिखीं जाती हैं। इससे एक मत का निर्माण होने लगता है जो दूसरे लोगों के पब्लिक स्पेस को तय करने लगता है। इस मत के अलावा कुछ और भी मत हो सकता है, इसकी जगह नहीं छोड़ी जाती है। ऐसे अनगढ़ कार्य अंतत: पब्लिक स्पेस को बहुमत का स्पेस बना देते हैं। इसमें असली मकसद जनक्षेत्र को नए तरीके से परिभाषित करना और लंबे समय तक उसे उत्तेजित क्षेत्र बनाए रखकर कंट्रोल करने का अभ्यास करना है। इसके बाद जो बहुमत तैयार होता है वह नये किस्म के राष्ट्रवाद को बनाता है। इस राष्ट्रवाद में विरोध को ताकत से दबाया जाता है और विरोधियों के अस्तित्व एवं साख पर सवाल खड़े कर दिये जाते हैं। इससे एक खतरनाक दौर का सृजन हो है।इस दौर में सियासतदां नफरत के औजार का इस्तेमाल कर, खौफ की जमीन पर अपना सियासी क़ारोबार चलाते हैं। ऐसे राष्ट्रपति का भाषण देश को संभालने की अपील की तरह है। और अब तो ये आलम है कि हथियारों की, षडयंत्रों की छोड़िये, यहां स्थापित राजनीति में ऐसे बहुतेरे हैं जो अपनी जुबान की तलवार से ही इंसान और इंसानियत दोनों का कत्ल कर रहे हैं। जिन कंधों पर देश को सुरक्षित महसूस करवाने की जिम्मेदारी दी जाती है वो नफरत के कारोबारी बन जाते हैं। भले लोगों की मुश्किल ये भी है कि अब चुप रहना ठीक है या जिम्मेदार आवाजों को और मुखर होना होगा? डर ये कि आप उन्हें उनके नापाक इरादों में कामयाब न कर दें।ये सब वाकई शर्मनाक है। इस असहिष्णुता की राजनीति की भेंट चढ़ता हमारा अमन और चैन एक बार अगर खो गया तो उसे वापस पाना फिर नामुमकिन होगा। इस देश की जनता इस नफरत की राजनीति के मुंह पर अपनी एकता और प्यार-विश्वास से करारा तमाचा मार सकती है। बहुसंख्यक वर्ग, अल्पसंख्यक के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझे। अगर कहीं इस राजनीति ने उनके दिल में कोई शंका पैदा की है, तो ये पूरे देश का फर्ज है कि अपनेपन और भरोसे से शंका को दूर करे।

Wednesday, October 21, 2015

भारत में आदमी उम्मीद खाकर जी लेता है


21 अक्टूबर 2015
आज अष्टमी है। महाअष्टमी। बाजार में उत्सव के माहौल पर महंगाई की काली छाया साफ दिख रही है। दालें महंगी हो गयी हैं, इतनी महंगी कि आम आदमी उनकी कीमत पूछने से डरने लगा है। हम सोच भी नहीं सकते थे कि गरीबों के लिए प्रोटीन का सबसे बड़ा जरिया दाल एक दिन 200 रुपये किलो बिकेगी, प्याज का इतिहास हम देख ही चुके हैं। प्याज ने सरकारों की छवियों को बिगाड़ने में अपनी भूमिका निभाई है, इसलिए उसकी लगातार 'वक्री चाल' को हमने अब अपनी नियति मान लिया, लेकिन अब दाल...। दाल की महंगाई के संदर्भ में तमाम विश्लेषण आ चुके हैं। उसके उत्पादन से लेकर भंडारण तक की कहानियां और चुनावी राज्यों में आयातित दाल को चुनावी दंगल बचाने के लिए भेज दिए जाने की ख़बरें भी हम हर वाजिब एंगल से छाप चुके हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर आम लोगों की जरूरत की चीजों पर ही सबसे बड़ा सुनियोजित हमला क्यों हो रहा है...?
अभी दो दिन पहले एक आंकड़े में कहा गया है कि देश की 40 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, 9.3 करोड़ लोग झुग्गी झोपड़ी में रहते हैं, 12.8 करोड़ को साफ पानी नहीं मिलता, 70 लाख बच्चे शिक्षा से कोसों दूर हैं। यही नहीं, जो रिक्शा चलाता है, ऑटो चलाता है, ड्राइवरी करता है, दुकान में काम करता है या घरेलू काम करता है, वो बहुत कमाता है तो पांच-सात हजार रुपया महीना कमाता है। चार लोगों का आदर्श परिवार भी हो तो घर का किराया देने के बाद उसके पास खाने की चीजें खरीदने के लिए कितना पैसा बचता होगा मोदीजी? और फिर उसे बच्चों की पढ़ाई के लिए, कपड़ों के लिए और गाहे-बगाहे होने वाली बीमारी के लिए भी तो पैसा चाहिए? ऐसे में कबीर दास याद आते हैं - ‘कबिरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर।’ लेकिन आज कबीर किसकी खैर मनाएंगे। ऐसे में हमें डिजिटल, स्मार्ट और वैश्विक परिदृश्य में तरक्की करते भारत का चेहरा लाचार नजर आता है, जिसकी प्राथमिकता में सब कुछ है, सिवाय दाल- रोटी और प्याज के। क्या यह हर साल की कहानी नहीं बन रही कि एक वक्त के बाद प्याज की कीमतें हमारे बस के बाहर की हो जाएंगी, क्या हमारे नीतिनियंता आम लोगों की जरूरत की चीजों का सही लेखा-जोखा, उत्पाद, मांग और आपूर्ति के आंकड़े नहीं रख सकते, या ऐसी परिस्थितियों में एक त्वरित योजना बनाकर राहत नहीं दे सकते। क्या हमें देश पर संकट केवल इसी रूप में दिखाई देता है कि पड़ोसी राज्य हमारी सीमाओं पर हमला कर देते हैं, लेकिन बाजार की निर्मम ताकतें जब इस रूप में लोगों का खून कर देती हैं कि वह बहते हुए दिखाई भी नहीं देता, तब क्या हमें उसका दर्द महसूस होता है। शायद नहीं, इसलिए हर साल हम कुछ खास खाद्य पदार्थों, सब्जियों, अनाजों के महंगा होते जाने को चुपचाप देखते हैं और निर्लज्ज भाव से बयान जारी कर देते हैं कि अब तो नई फसल आने पर ही कीमतें नियंत्रण में आएंगी। यही मोदी जी थे जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान हर भाषण में लोगों से पूछा था - ‘क्या महंगाई घटी, क्यों नहीं घटी।’ आज मोदी जी के सामने यही सवाल है कि महंगाई क्यों नहीं घटी? भयंकर परिस्थतियां हैं हमारे समाज की। एक ओर अनाज पैदा करने में लिये कर्ज से लदे लोग साल-दर-साल मरते जाते हैं, दूसरी ओर कुछ लोग अनाज नहीं मिल पाने के कारण हुए भयंकर अभाव में मर जाते हैं। क्या आपको यह सूचना चौंकाती नहीं कि जिस दौर में प्याज 60 रुपये किलो बिक रहा है, ठीक उसी समय में मंडी से प्याज बेचकर घर लौटा किसान इसलिए जहर पीकर जान दे देता है, क्योंकि उसे मंडी में सही दाम नहीं मिले, और उतने पैसों से वह कर्ज चुकाने के काबिल नहीं है। बार-बार की घटनाओं और परिस्थितियों से यह लगता है कि कालाबाजारी जैसे शब्द शब्दकोश से गायब नहीं हुए हैं, बल्कि वे नए-नए पर्यायों के साथ हमारे सामने हाजिर हो रहे हैं, बाजार को अपने मनमुताबिक चलाने वाले उनके नए अर्थ और रचनाएं गढ़ रहे हैं। यह शक अब भरोसे में तब्दील होता जा रहा है। जैसे-जैसे दाल और उस जैसी चीजें और महंगी होंगी, यह वैसे-वैसे और बढ़ता जाएगा। क्या इस समय की यह एक त्रासदी नहीं है कि किसान और किसानी के सवाल हमारे विमर्श से गायब हैं, जो सीधे तौर पर ऐसी वस्तुओं के उत्पादन से जुड़े हैं। क्यों इस बाजार में किसान खुद अपने उत्पाद की कीमत तय नहीं करता, उसकी क्या मजबूरियां हैं या बनाई गई हैं। सरकार ने दाल के आयात की योजना बनायी है और कीमतों को काबू में करने का आश्वासन दिया है। उम्मीद कर सकते हैं, 'अच्छे दिनों' में कुछ अच्छा जरूर होगा, क्योंकि यह तो अब साबित हो ही गया है कि भारत में आदमी दाल- रोटी से ज्यादा उम्मीद खाकर जी लेता है।

Tuesday, October 20, 2015

जीते चाहे कोई, यकीनन बिहार हारेगा



20 अक्टूबर
बिहार के चुनाव के परिणामों काे लेकर अटकलें तेज हो गयी हैं और वातावरण नकारात्मक रूप में गरमा रहा है। इस ‘लोकतांत्रिक’ जश्न के दौरान खूब धूम-धड़ाका हो रहा है। एक से एक निराले पटाखे फोड़े जा रहे हैं। सबसे शानदार है – गाय पटाखा। इसके बाद बारी आयी और ‘ऊटपटांग बयान’ पटाख़ा की। सोशल मीडिया पर झूठ, बकवास और सिरफिरे बयान कुलांचे भर रहे हैं। इनकी सुनामी आयी हुई है। ‘चामत्कारिक’ पटाखों की आवाज और रोशनी, दोनों ही बेजोड़ हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में मतदान के दो चरणों के बाद स्वाभाविक ही है कि सत्ता के दोनों प्रमुख दावेदार गठबंधन अपनी-अपनी जीत के दावे करें, लेकिन सच यही है कि जीत लोकतंत्र की हो रही है और हार बिहार रहा है। अक्सर विवादित और संदेहास्पद रहे चुनाव सर्वेक्षणों के अलावा तटस्थ राजनीतिक प्रेक्षक कोई स्पष्ट भविष्यवाणी करने से परहेज ही कर रहे हैं। इसका एक कारण यह भी है कि अभी तक जातीय आधार पर विभाजित रही बिहार की राजनीति के मद्देनजर कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधनों में समीकरण के लिहाज से कड़ी टक्कर नजर आ रही है। जाहिर है, चुनाव हो रहे हैं तो हार-जीत भी होगी ही, लेकिन उसका फैसला मतगणना वाले दिन ही हो पायेगा। मोदी जी, साक्षी महाराज और उनके साथी बिहार में विकास को चाहे जितना कोसें और कम करके आंकें लेकिन वहां विकास हुआ है। एक गंभीर सामाजिक विकास। भले ही बिहार के शहरों की सूरत ना बदली हो पर समाज में बदलाव आया है। आप कहेंगे पटना एक ठहराव का एहसास कराता है, मायूस करता है। यहां के लोगों में गांव कस्बों का बोध और संस्कार ही ज्यादा दिखता है। जो पटना में रहता है वो सिर्फ पटना में नहीं रहता, उसका एक पांव और एक मन गांव में रहता है। इसलिए आपको दिल्लीवाला या कलकत्तावाला की तरह कोई पूरी तरह से पटनावाला नहीं मिलेगा। एक शहरी होने के लिए जरूरी है कि उसका अतीत से संबंध कमज़ोर हो, वो भविष्यवादी हो। बिहार एक ग्रामीण राज्य है इसलिए उसके शहरों का कस्बाई चरित्र होगा ही लेकिन बदलते बिहार की आकांक्षाएं अब बेहतर और किसी बड़े शहर की तलाश में बेचैन हैं। राजनीतिज्ञों का एक तबका जातिवाद के खिलाफ लेक्चर देता है लेकिन सवर्णों के जातिवाद को विकास का सहारा लेकर प्रगतिशील घोषित करते चलता है। आप इस तबके को विकास पर खूब बातें करते देखेंगे और यही तबका गरीब मरीजों के साथ क्या कर रहा है बताने की जरूरत नहीं है। अकारण नहीं है कि बिहार चुनाव में अस्पतालों को लेकर कोई बात नहीं कर रहा है। बिहार के छात्रों के राजनीतिक प्रशिक्षण में एक घोर कमी है। वे विकास के सवाल को अपनी निष्ठा वाले दल के हिसाब से देखते हैं। शिक्षा चिकित्सा या कुपोषण जैसे मसलों पर कौन बहस के लिए तैयार था? हर चुनाव को कौन बनेगा मुख्यमंत्री, किस्सा कुर्सी का या सत्ता का राजतिलक टाइप के कार्यक्रमों तक सीमित कर दिया जा रहा है। बुनियादी मुद्दों की बात कोई नहीं कर रहा। चुनाव आते ही एनजीओ या तटस्थ नागरिक संगठन सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन सुनता कौन है। बिहार का चुनाव उसकी पहचान पर हमले का मौका बन जाता है। यहां के संसाधनों पर नियंत्रण रखने वाला तबक़ा भी भीतर से हमलावर हो जाता है जबकि शिक्षा और चिकित्सा की हालत उसी ने बुरी की है। दो सौ रुपया किलो दाल है और मंचों पर दाल मुद्दा नहीं है। जनता का बड़ा हिस्सा भी इसी तरह से प्रशिक्षित कर दिया गया है कि कौन जीतेगा। कौन प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनेगा? लेकिन विकास की बात कोई नहीं कर रहा है। और अगर बात हो रही है तो केवल जंगल राज की, कुशासन की। जबकि बिहार में भारी विकास हुआ है। गली-गली में साइकिल-सवार लड़कियों को देख लगता है कि काफी कुछ बदला है। हमारी राजनीति शायद लड़कियों के बदलाव को बदलाव नहीं मानती, मगर आप किसी भी सड़क पर झुंड में या अकेले साइकिल चलाती लड़कियों को देख गदगद हो सकते हैं। साइकिल ने लड़कियों की जिन्दगी बदल दी है और लड़कियों ने साइकिल से समाज बदल दिया है। साइकिल चलाती ये लड़कियां बिहार के विकास की ब्रांड अम्बेसडर हैं। लड़कियों के दिलो-दिमाग से लड़कों का भय निकल गया है। सड़क पर छेड़खानी नहीं दिखती है। साइकिल छिनने की घटना सुनने को नहीं मिलती। बिहार की सड़कों पर यह जो नया समन्वय बना है, वह किसी क्रांति से कम नहीं। यकीनन यह क्रांति पिछले शासन में ही आयी है। ऐसे में, अब सोचिए नेता को मुद्दा कौन दे रहा है? मुद्दा, केवल मुद्दा नहीं एक आइडिया भर हो कर रह गया है। इस आइडिया से लोगों के दिलोदिमाग को प्रभावित कर चुनाव में वोट की शक्ल में बदलने की कोशिश हो रही है। चुनाव का नतीजा क्या होगा यह तो बाद में पता चलेगा , लेकिन जो कोशिशें चल रहीं हैं उससे यकीनन बिहार हारेगा।




पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं



19 अक्टूबर

सुप्रीम कोर्ट ने एन जे ए सी को अवैधानिक करार देकर एक नयी बहस छेड़ दी है। कहा जा रहा है कि ऐसा करने से अदालतों में जजों का अभाव कायम रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के पक्ष और विपक्ष में ढेर सारी दलीलें सामने आ रही हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि आई ए एस , आई पी एस इत्यादि के तर्ज पर जजों का भी एक कैडर बनाने पर सोचना जरूरी है। जबकि कुछ लोगों का मानना है कि इससे राजनीतिक हस्तक्षेप को बल मिलेगा। इस बहसों क़े अलग आम भारतीय केवल यह जानता है कि जज कौन बने, यह जज ही सबसे अच्छा समझते हैं। सरकार को न्यायपालिका से दूर ही रहना चाहिए। पर, देश के साधारण नागरिकों को इससे कोई मतलब नहीं है कि जजों को कौन बनायेगा। वह तो न्यायपालिका में गहरी आस्था रखता है। लोकतंत्र के तीनों संवैधानिक स्तंभों में से उसे आज भी सर्वोच्च भरोसा न्यायालय पर ही है कि न्यायालय उसे सही, वाजिब अधिकार दिलाएंगे। वह अदालत की ओर आशा से देखता है। वह सरकारों से त्रस्त है। विधायिका की उपयोगिता से अनजान है। केंद्र सरकार ने जजों के कोलेजियम सिस्टम के स्थान पर नयी व्यवस्था को अपनाने के लिए जिस तरह से यह मामला कोर्ट के हाथों से निकाल कर उसमें राजनेताओं के दखल की पृष्ठभूमि तैयार की थी उसके चलते ही न्यायिक सक्रियता के कारण समस्याएं झेल रहे लगभग सभी राजनीतिक दलों ने उसका भरपूर समर्थन किया था और वह कानून भी बन गया था पर अब वह पूरी प्रक्रिया ही निरस्त हो चुकी है और उससे बचने के लिए अब सरकार के पास सीमित विकल्प ही बचे हुए हैं। इस पूरी व्यवस्था को सुधारने के सरकार के प्रयास को सुप्रीम कोर्ट ने बहुत बड़ा झटका दे दिया है। यह सही है कि देश में पिछले दशकों में हर क्षेत्र में राजनेताओं का अनावश्यक दखल बढ़ता ही जा रहा है उससे निपटने के लिए ही कोर्ट ने संभवतः सरकारों की अपने पसंद के जजों की नियुक्ति से रोकने के लिए इस तरह का निर्णय भी सुनाया है। क्या देश को लम्बे समय तक काम करने वाले किसी ऐसे तंत्र की आवश्यकता नहीं है जो निरापद रूप से काम भी कर सके और सुप्रीम कोर्ट ,हाई कोर्ट के साथ ही जिला स्तर की अदालतों के लिए भी जजों की उपलब्धता सुनिश्चित कर सके ? किन्तु दुर्भाग्य है।
सिर्फ शायर देखता है कहकहों की अस्लियत
हर किसी के पास तो ऐसी नजर होगी नहीं
यही न्यायपालिका उस साधारण नागरिक के साथ दृढ़तापूर्वक तो दूर, सहानुभूतिपूर्वक भी कहां खड़ी है? बड़ा दुर्भाग्य तो यह भी है कि साधारण नागरिक के लिए सहानुभूति की बात ही क्यों आए? क्योंकि जजों के चयन में भूमिका निभाने को तत्पर सरकार व संसद-विधानसभाओं में बैठे जनप्रतिनिधि आम आदमी को न्याय नहीं दिला पाते। मेरठ से मुजफ्फरनगर तक शिकार हुए निर्दोष लोग आज अदालतों में केस नंबर बनकर रह गए हैं। जरा सोचिये, कितने छात्रों ने अपनी युवावस्था के बेहतरीन पल, पढ़ाई में लगा दिये। दो वर्ष में ही देश की चार शीर्ष परीक्षाओं में या तो भारी घोटाले हुए हैं, या पर्चे लीक या फर्जी प्रवेश या घूस लेकर अवैध काम। दुनिया की सबसे बड़ी गैस त्रासदी - जिसमें 20 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गयी थी और इस घटना के 25 वर्ष बाद इसके अपराधियों को दो साल की सजा सुनाई, हमारी अदालत ने!
बूंद टपकी थी मगर वो बूँदो—बारिश और है
ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं
वर्तमान में किसी भी व्यवस्था को एकदम से सुधारने के स्थान पर उसके लिए सही मंच बनाकर प्रयास करने की आवश्यकता भी है। नया सिस्टम किस तरह से काम करने वाला है यह देखना भी आवश्यक है क्योंकि जब तक नए सिस्टम की कमियों को भी खुले तौर पर सुधारने के लिए न्यायपालिका और सरकार सामंजस्य नहीं कर पाएंगी तब तक इस तरह की रस्साकशी चलती रहेगी। नया तंत्र जब तक पूरी तरह से काम करना शुरू नहीं करता है तब तक कम से कम इसी व्यवस्था को चलाते हुए जजों की संख्या को बढ़ाने के बारे में सोचा जाना चाहिए। व्यवस्था में इस तरह का बड़ा परिवर्तन लोगों पर भारी न पड़े इस बात का भी ध्यान रखने की आवश्यकता भी है क्योंकि आज जितनी संख्या में मुकदमें अदालतों के सामने हैं उन्हें जजों की कमी के साथ नहीं निपटाया जा सकता है। जो आधा करोड़ केस अदालतों में लंबित हैं - उस बारे में क्यों हंगामा खड़ा नहीं किया जाता? फिर लगा, हमारी न्यायपालिका कहीं न कहीं बंधी हुई है। पीड़ितों के लिए समूचे सिस्टम को झकझोरना आवश्यक है। न्यायपालिका स्वयं इसे सर्वाधिक प्रभावशाली तरह से कर सकती है। यदि जज ठान लेंगे - तो न्यायिक क्रांति होकर रहेगी। पर सवाल है कि ऐसा होगा क्या?
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुजर होगी नहीं

Saturday, October 17, 2015

लाल और हरे में मत बांटो


17 अक्टूबर
जिस दिन नवरात्र का आरंभ हुआ था एक मित्र उपवास पर थे। दूसरे ने उपवास की आध्यात्मिकता और तार्किकता पर सवाल उठाया और बात धर्म के कर्मकांड पर आ गयी। धर्म का मखौल उड़ाया जाने लगा। यह उद्धरण इसलिये यहां दिया जा रहा है कि हाल में मांस भक्षण और धर्म को लेकर प्रचंड बहस शुरू हो गयी है। बेशक इसे लेकर हिंदू दो दलों में विभक्त हो गये हैं। पर किसी को यह कहते नहीं सुना गया है कि और भी मजहब हैं जिनमें खानपान की पाबंदियां हैं। मसलन , मुस्लिमों में , यहूदियों व अन्य जातियों में इत्यादि। फिर एक बार ‘यह तो सिर्फ उन बातों में से एक है।’ नियमों और रीतियों वाला हिंदू एकमात्र धर्म नहीं है। इसलिए ऐसे व्यवहार में कोई तार्किक खामी ढूंढ़ने का कोई अर्थ नहीं है। वे मौजूद हैं और चूंकि करोड़ों लोग उनका पालन करते हैं, तो ऐसा लगता है कि इनसे उनकी जिंदगी में कुछ सकारात्मक मूल्य जुड़ते हैं। कुछ देश धर्म आधारित व्यवस्था वाले होते हैं। इन देशों में धर्म कानून का आधार होता है। सही या गलत, तार्किक या अतार्किक उस व्यवस्था के तहत लोगों को उन नियमों का पालन करना पड़ता है। अगर आपने पालन नहीं किया तो सजा मिल सकती है। इसमें व्यक्तिगत आजादी का कोई मूल्य नहीं है। यह सुनकर भारत के लोगों को , खासकर जो लोग 1947 के बाद पैदा हुए हैं थोड़ा झटका लग सकता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने बहुत आगे की सोची और उन्होंने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की व्यवस्था दी। जबकि इसके पहले देश में मुस्लिम आइडेंटिटी को लेकर खूनी बंटवारा हो चुका था। हमारे संविधान में कई प्रावधान हैं, जो सारे धर्म को संरक्षण देते हैं और समानता के आधार पर उनसे व्यवहार करते हैं। आप देखेंगे तो इसके पीछे एक जायज कारण भी था और वह आज भी है। यह ठीक है कि गोवंश की रक्षा और संवर्द्धन की बात संविधान में कही गई है और अनेक राज्यों में गोहत्या पर प्रतिबंध लगा हुआ है। यदि गोहत्या अपराध है तो जिस पर भी उसका शक हो, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। यह अक्षम्य है कि गोप्रेमी कानून अपने हाथ में ले लें और किसी भी मनुष्य की हत्या कर दें? क्या पशु और मनुष्य में कोई अंतर नहीं है? गाय को माता का दर्जा इसीलिए दिया गया है कि वह एक अत्यंत उपयोगी पशु है, गोहत्या अपराध है, लेकिन मांस-भक्षण (अखाद्य) नहीं। आखाद्य मांस खाने की अफवाह के आधार पर किसी मनुष्य की हत्या कर देना कौन-सा धर्म है? यह धर्म नहीं, अधर्म है। यह न्याय नहीं, अन्याय है। क्या कानून के डंडे से आप (अखाद्य) मांस-भक्षण छुड़ा सकते हैं?

नफरतों का असर देखो,

जानवरों का बंटवारा हो गया,

गाय हिन्दू हो गयी ;

और बकरा मुसलमान हो गया।

गांधीजी ने भी कभी यही सवाल किया था? कोई आदमी क्या खाए और क्या पिए, इन सवालों पर खुली बहस होनी चाहिए न कि अपनी धार्मिक और सांप्रदायिक मान्यताएं एक-दूसरे पर थोपने की कोशिश होनी चाहिए। किसी भी तरह के मांस खाने को ही आजकल विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र हानिकारक मानने लगा है। पर्यावरण और आर्थिक दृष्टि से भी वह उपादेय नहीं है।

ये पेड़ ये पत्ते ये शाखें भी परेशान हो जाएं..

अगर परिंदे भी हिन्दू और मुस्लमान हो जाएं

इस दृष्टि से किसी भी जानवर के मांस में क्या फर्क है? सब ही अखाद्य हैं। ये प्रश्न ऐसे हैं, जिन पर तंग नजरिये और धार्मिक उन्माद का चश्मा चढ़ाकर देखने से किसी भी देश या समाज का भला नहीं हो सकता। अफसोस है कि पहले से बिगड़े हुए इस मुद्दे को हमारे नेताओं और साहित्यकारों ने और भी अधिक पेचीदा बना दिया है।

सूखे मेवे भी ये देख कर हैरान हो गए..

न जाने कब नारियल हिन्दू और

खजूर मुसलमान हो गए..

इखलाक की हत्या के मुद्दे को हमारे नेताओं-साहित्यकारों ने ऐसा रूप दे दिया है, जिससे विदेशों में भारत की छवि विकृत हो रही है। विदेशी टीवी चैनल-अखबार जिस तरह से प्रश्न उठा रहे हैं उनसे लगता है कि वर्तमान सरकार ने सारे देश को सांप्रदायिकता की भट्ठी में झोंक दिया है। देश में तानाशाही का माहौल बन गया है। उन्हें समझाना पड़ रहा है कि कुछ सिरफिरों के कुकर्म के कारण आप भारत के बारे में गलत राय मत बनाइए।

भारत पूरी तरह से सहिष्णु है, बहुलतावादी है और अपनी उदारवादी सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ है। किसी नेता या सरकार की आज ऐसी हैसियत नहीं है कि वो भारत के लोकतंत्र और सांप्रदायिक सद्भाव के माहौल को पामाल कर सके।

अंदाज जमाने को खलता है

कि मेरा चिराग हवा के खिलाफ

क्यों जलता है..

मैं अमन पसंद हूं ,

मेरे शहर में दंगा रहने दो...

लाल और हरे में मत बांटो ,

मेरी छत पर तिरंगा रहने दो..

Friday, October 16, 2015

क्या रहस्य पर से परदा हटेगा?


16 अक्टूबर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिजनों को भरोसा दिया है कि अगले साल 23 जनवरी से नेताजी से जुड़ी फाइलें सामने लाई जाएंगी। पीएम ने ट्वीट कर इस बारे में खुद जानकारी दी है। 23 जनवरी को ही नेताजी का जन्मदिन होता है। करीब 130 फाइलें केंद्र सरकार और पीएमओ के पास पिछले 70 साल से मौजूद हैं। इन फाइलों को सीक्रेट बताकर केंद्र की अब तक किसी भी सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया। मोदी जी ने इस संदर्भ में ट्वीट किया कि ‘इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने की जरूरत नहीं है। जो देश अपना इतिहास भूल जाते हैं, उनमें इतिहास बनाने की ताकत भी खत्म हो जाती है। नेताजी से जुड़ी फाइलें डिक्लासिफाइड करने का प्रॉसेस 23 जनवरी, 2016 से शुरू होगा। उस दिन सुभाष बाबू का जन्मदिन है। हम दूसरे देशों से भी नेताजी से जुड़ी फाइलें डिक्लासिफाई करने को कहेंगे। इसकी शुरुआत रूस से दिसंबर में होगी(पीएम दिसंबर में रूस के दौरे पर जाने वाले हैं)।’ अब भी 130 फाइलें केंद्र सरकार के पास हैं जो क्लासिफाइड हैं , और 37 सीक्रेट फाइलें पीएमओ में हैं। नेताजी के परिजन और विशेषज्ञों का एक समूह बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने पहुंचा था। 51 लोगों के इस समूह में नेताजी के परिवार से जुड़े 36 लोग, बाकी विशेषज्ञ थे। नेताजी पर शोध करने वाले लेखक अनुज धर और सुरक्षा विशेषज्ञ अवकाश प्राप्त जनरल जी.डी. बख्शी भी इस ग्रुप में शामिल हैं।
इस ग्रुप ने पीएम से नेताजी से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक की जाने की मांग की थी। पिछले 70 साल में किसी भी सरकार ने नेताजी से जुड़ीं फाइलें पब्लिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी। सरकारें यही कहती रही हैं कि इन फाइलों में बेहद सेंसेटिव इन्फॉर्मेशन हैं। अगर इन फाइलों को सार्वजनिक किया जाता है तो भारत के कुछ देशों से रिश्ते खराब हो सकते हैं। लेकिन किसी भी सरकार ने यह नहीं बताया कि रिश्ते आखिर क्यों खराब होंगे। उन फइलों में क्या है? विशेषज्ञों का मानना है कि 1945 के बाद नेताजी चीन में थे पर किसी भी सरकार ने इस लिंक की जांच कराने का प्रयास नहीं किया। जब तक सारी जानकारी एक साथ रखकर इसकी जांच नहीं की जाएगी तब तक नेताजी से जुड़ा सच सामने नहीं आएगा। फाइलों को गोपनीयता के दायरे से हटा कर सार्वजनिक करने के साथ ही मोदी जी ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को भी निशाने पर ले लिया है। कांग्रेस के लिए यह लज्जाजनक स्थिति है कि पार्टी के प्रतिद्वंद्वी उस व्यक्ति के जीवन और मृत्यु के तथ्यों को उजागर कर रहे हैं जो कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष थे। जो फाइलें केंद्र सरकार के पास थीं उन्हें अबतक सार्वजनिक न करने और उस नेता के जीवन के राज को गोपनीय रखने की कोई विश्वसनीय वजह भाजपा के पास भी नहीं है। इसके पूर्व जब बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फाइलों को सार्वजनिक किया था तब संसदीय मामलों के मंत्री वेंकैया नायडू ने कहा था , 'पश्चिम बंगाल सरकार ने नेताजी से जुड़ी कुछ गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक किया है। यह अच्छा है। केंद्र सरकार इस तरह का कोई भी फैसला करने से पहले इसका अध्ययन करने की जरूरत को समझती है क्योंकि इसका असर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, दूसरे देशों, पड़ोसी देशों के साथ हमारे संबंधों पर पड़ता है।' उन्होंने आगे कहा, 'मैं निजी तौर पर यह महसूस करता हूं कि देश के लोगों का यह अधिकार है कि वे नेताजी के मसले की हकीकत को जानें। सरकार भी इसके बारे में सोचेगी और यह फैसला करेगी कि कब और कैसे इसे किया जा सकता है।' गोपनीय पत्रों को सार्वजनिक करना हमेशा से मौजूदा राजनीति के ऐतिहासिक प्रमाणीकरण का एक स्त्रोत रहा है। अब अगर विकिलीक्स विवाद को ही लें तो इससे संप्रभु राष्ट्रों के रिश्तों में जटिलताएं बढ़ीं। इसी तरह 1990 के दशक की शुरुआत में मित्रोखिन पेपर्स जारी होने से भारत के कुछ प्रमुख वाम नेताओं और नौकरशाहों की विश्वसनीयता पर अविश्वास बढ़ा। इन खुलासे से सरकार भी सकते में आ गई। उस वक्त लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में विपक्ष ने जांच की मांग की। इस तरह के खुलासे ने उन दिनों की राजनीति को एक आकार देने में अपना योगदान किया। नेताजी की रहस्यमयी गुमशुदगी से जुड़े तमाम किस्से और कहानियां हैं, कई दावे हैं। 70 साल बाद ही सही पश्चिम बंगाल सरकार ने ये बात सार्वजनिक कर दी कि 1945 में नेताजी की मौत नहीं हुई लेकिन 1945 के बाद नेताजी कहां गए, कहां रहे, ये राज आज भी कायम है। क्या यह उन फाइलों में दफन है जो लुटियन जोन में कड़ी सुरक्षा के बीच धूल फांक रही हैं और अब मोदी जी उन्हें सार्वजनिक करने जा रहे हैं।

Thursday, October 15, 2015

स्याही को तेजाब ना बनने दें



15अक्टूबर 2015

शिव सेना ने मुम्बई में सुधीन्द्र कुलकर्णी के मुंह पर स्याही और रंग फेंक कर दुनिया को यह बता रंग और स्याही का और उपयोग हो सकता है साथ ही वह स्याही तथा रंग खुद ब खुद तेजाब की शक्ल अख्तियार कर सकती है और समाज चेहरे को बदरंग भी कर सकती है। आगे बढ़ने से पहले यहां यह बता देना जरूरी है कि आज के संचार प्रमुख जमाने में समाज में जब कोई घटना प्रभाव डालती है तो वह एक तरह से साइकी के पैराडाइम शिफ्ट की तरह हाेता है।एकदम वही साहेच होती है जो उस घटना का कारण बनी थी। आप में से बहुतों को याद होगा कि सन 2011 में पाकिस्तान के पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर को फकत इसलिये मौत के घट उतार दिया गया था कि वे पाकिस्तान के ईशनिंदा (पैगंबर मोहमम्द आलोचना) के तत्कालीन कानून से इत्तफाक नहीं रखते थे। सलमान तासीर अपने ही मजहब में मौजूद कमजोरियों के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में मार दिए गए। वे मुसलमान थे, पाकिस्तानी थी, ऊंचे ओहदे पर विराजमान थे, लेकिन धर्म के उन्माद ने उनकी जान ले ली।इस घटना ने पाकिस्तानियों के साथ बाकी दुनिया को भी सकते में डाल दिया था।तब शायद ही किसी को गुमान हुआ कि ये ऐसे घटनाएं भारत में भी घटने लग जाएंगी। अब भारत में देखें , सुधींद्र कुलकर्णी पर शिवसेना वालों ने इसलिए स्याही फेंक दी क्योंकि वे पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शिद महमूद कसूरी की किताब के लॉन्च के प्रमुख आयोजक थे। कुलकर्णी बीजेपी के लौहपुरुष अडवाणी के मीडिया सलाहकार रहे हैं। जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा तब अडवाणी का नाम भारत के विराट हिंदुओं में लिखा जाएगा। उनका नाम शायद बाला साहब ठाकरे जैसे विराट हिंदू से तो ऊपर ही होगा। कुलकर्णी हिंदू हैं, भारतीय भी हैं। अडवाणी जैसे विराट हिंदू के सलाहकार भी रहे हैं, लेकिन इन सबके बावजूद उन्हें बख्शा नहीं गया। कुलकर्णी के मुंह पर स्याही फेंककर शिवसेना ने खुद को ज्यादा हिंदू और ज़्यादा भारतीय साबित कर दिया। ठीक वैसे ही जैसे सलमान तासीर के हत्यारों ने उनकी हत्या करके खुद को बड़ा मुसलमान साबित किया था। महाराष्ट्र तक को ही अपनी ‘कर्मभूमि’ बनाए रखने वाली पार्टी शिवसेना का विरोध हो सकता है जायज हो लेकिन, उनका यह काम घोर निंदनीय है। विरोध का अपना तरीका होता है। वह शांतिपूर्ण भी हो सकता था, लेकिन किसी का मानमर्दन, अस्वीकार है। शिवसेना ने कुछ ही दिन पहले पाकिस्तानी गज़ल गायक गुलाम अली का कार्यक्रम रद्द करने पर मजबूर कर दिया था। महाराष्ट्र की सरकार तब भी नाकाम साबित हुई थी और आज भी नाकाम रही। सरकार में शिवसेना की भी भागीदारी है और कार्यक्रम को मंजूरी मिलने के बाद पार्टी का ऐसा रुख सिर्फ यही दिखा रहा है कि पार्टी बीजेपी से अपना स्वार्थ साधने में लगी है। विधानसभा चुनाव में बीजेपी से मिली हार के बाद शिवसेना इस प्रकार की हरकत कर रही है जिससे बीजेपी की सरकार को असमंजस की स्थिति का सामना करना पड़े। यही नहीं, केंद्र में पीएम नरेंद्र मोदी पर आजकल शिवसेना खूब हमले कर रही है। यह वही पीएम मोदी हैं जिन्हें पार्टी सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे काफी पसंद किया करते थे और पार्टी ने हमेशा जिनका साथ दिया। ऐसे तमाम मौके आए हैं जब शिवसेना, राज्य और खास तौर पर मुंबई में अपने को सरकार से ऊपर की हस्ती साबित करने का प्रयास करती रही है।आज वह वाकया बताना भी प्रासंगिक हो जाता है जब भारत और पाकिस्तान के बीच मैच के लिए बीसीसीआई के अधिकारियों को शिवसेना सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे से मुलाकात कर मैच कराने की अनुमति मांगनी पड़ी थी। कहा जाता है कि उनसे अनुमति मिलने के बाद यह मैच हो पाया था। तब भी यह देश और राज्य सरकार के लिए शर्मिंदगी का विषय था और आज भी है। सवाल तो तब यही मेरे ज़हन में उठा कि यदि मैच गलत था तो क्यों इजाजत दी। फिर बीसीसीआई वाले क्यों इजाजत लेने गए थे। क्या ठाकरे साहब सरकार थे। कुलकर्णी ने भी यही गलती की कि वे 'इजाजत' लेने गए थे और इजाजत नहीं मिली। वे बता रहे हैं कि कार्यक्रम के एक दिन पहले वह उनसे मिलने गए थे और चर्चा की थी। कुलकर्णी जी तो पहले ही जानते हैं कि शिवसेना का विरोध का तरीका क्या रहता है। हम पहले से ही कलबुर्गी, पनसारे और दाभोलकर को खो चुके हैं, अगर ऐसी ही गतिविधि जारी रही तो कल ये लोग हमारे बच्चों के स्कूलों पर भी हमला करने लगेंगे। ऐसी स्थिति में यह कहा जा सकता है कि यदि सरकार की इच्छाशक्ति होती तो यह देश को शर्मसार करने वाली वारदात नहीं हो पाती। लेकिन राज्य की देवेंद्र फड़णवीस सरकार भले ही घटना के बाद लम्बी बातें करे लेकिन जमीन पर वह नाकाम ही साबित हुई है। दूसरी बात कि ऐसी बातों को समाज कभी बर्दाश्त ना करे। अगर आप इसी तरह बर्दाश्त करते रहे तो आपको पता भी नहीं चलगा कि स्याही कब तेजाब बन गई।

Tuesday, October 13, 2015

आरक्षण : बेशक चीजें बदली हैं


13 अक्टूबर
राजनीति में इन दिनों पब्लिक स्पेस कंट्रोल करने की कोशिश चल रही है। इसका एक और उदाहरण है आरक्षण पर संघ के प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण के सम्बन्ध में बयान। मोहन भागवत ने कुछ दिन पहले देश की आरक्षण व्यवस्था पर बहस करने की जरूरत के बारे में बयान दिया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की आरक्षण पर टिप्पणी को अलबत्ता इससे नहीं जोड़ना चाहिए, क्योंकि संघ ने बार-बार दोहराया है कि वह राजनीतिक नहीं, एक सांस्कृतिक संगठन है। हालांकि कम ही लोग मानते हैं कि संघ एक सांस्कृतिक संगठन है। ऐसे कितने सांस्कृतिक संगठन हैं, जो सरकार के साथ तीन दिवसीय विचार मंथन सत्र आयोजित करें, जिसमें लगभग सभी मंत्रियों और खुद प्रधानमंत्री की मौजूदगी हो, और ये तमाम लोग बताएं कि उन्होंने क्या किया है और आगे क्या करने वाले हैं?हमारे देश में कई ऐसे मामले हैं, जिन पर कोई व्यक्ति तीखा बयान देने से बचता है, जैसे विभिन्न सांस्कृतिक प्रथाओं पर कोई सवाल नहीं उठाता। उसी तरह मंडल के दौर के बाद आरक्षण की नीति पर कोई सवाल नहीं खड़े करता।आरक्षण नीति को लेकर संघ परिवार को शुरुआत से ही आपत्ति रही है, लेकिन भाजपा के लिए आधिकारिक रूप से ऐसा कह पाना उतना ही मुश्किल है। मोहन भागवत ने पब्लिक स्पेस ने जो भी कहा वह ‘‘पालिटीकली करेक्ट’ था क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनका बोला क्योंकि वह जानता था कि उसका एक-एक शब्द एक बड़े समुदाय के लिये बोला जा रहा है।उन्हें मालूम है कि भारत में जाति आधारित आरक्षण एक ऐसा विवादित मुद्दा है, जिसपर ध्यान देने की जरूरत है । आमतौर पर यह मुद्दा लोगों के मन में सुषुप्तावस्था में रहता है, लेकिन इसे फिर भड़काने में ज्यादा देर नहीं लगती। गुजरात में पटेल समुदाय का हाल का प्रदर्शन इसका उदाहरण है। इस मुद्दे ने इतने लोगों को प्रदर्शन के लिए आकर्षित किया और राज्य सरकार को भयातुर हो कर इंटरनेट सेवाओं और एसएमएस पर रोक लगानी पड़ी। यह मुद्दा लोगों के दिल में बना हुआ है। आरएसएस के साथ भाजपा का रिश्ता और बिहार के आगामी चुनाव का मतलब यह था कि मोहन भागवत के बयान से भाजपा के खिलाफ दलित वोट लामबंद हो सकते हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि भाजपा या किसी अन्य दल से कोई भी संघ प्रमुख के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हुआ। हालांकि, हमें देशहित को दीर्घावधि में देखना चाहिए। आरक्षण नीति का उद्देश्य होना चाहिये निष्पक्ष व अधिक समानता आधारित समाज का निर्माण। आरक्षण एक शॉर्ट कट है। यह समानता आधारित समाज के निर्माण का कामचलाऊ, कृत्रिम, लेकिन थोड़ा तेज तरीका है। यह अवसर निर्मित नहीं करती। यह सिर्फ किसी योग्य व्यक्ति से अवसर लेकर किसी और को सौंप देती है, विशुद्ध रूप से जन्म के आधार पर। ऐसा करके यह समाज को विभाजित करती है, यह साधारणता निर्मित करती है और प्रतिभा को हतोत्साहित करती है। निश्चित ही ऐतिहासिक रूप से और भारत के कुछ हिस्सों में अब भी पिछड़े वर्ग के लोगों को अवसरों से वंचित किया गया। उनके साथ भेदभाव हुआ। जातिगत आरक्षण के विरोध में बीजेपी और संघ हमेशा से रहा है । बीजेपी तो आर्थिक आधार पर आरक्षण के वकालत करते हुए इसे अपने घोषणापत्र तक में शामिल कर चुकी है । जब 1990 में मंडल कमीशन लागू हुआ था तब उसका विरोध करने में बीजेपी और संघ सबसे आगे रहे थे । कहीं ऐसा तो नहीं कि देश भर में आरक्षण के विरोध में माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है? दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनामिक्स के प्रोफेरस अश्विनी देशपांडे और यूनीवर्सिटी ऑफ मिशिगन के प्रोफेसर थोमस विस्कोप्फ के वर्ल्ड डेवलपमेंट जर्नल में हाल ही में प्रकाशित शोध में ये साबित हुआ है कि सकारात्मक प्रयास यानि आरक्षण से योग्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ता । दरअसल आरक्षण ये साबित करता है कि हजारों सालों से मुख्यधारा से अलग रखे गए समुदाय को यदि मौका मिले तो वो भी आगे बढ़ते सकते हैं। अवसरों की उपलब्धता से काबिलियत में बढ़ोतरी होती है ना कि कमी । 1980 से 2002 के बीच भारतीय रेलवे पर किए गए शोध में सामने आया कि आरक्षण के वजह से नौकरी करने वाले कई लोग सामान्य वर्ग के लोगों से अधिक कुशलता से काम करते हैं। लेकिन इन दिनों आरक्षण के खिलाफ दूसरी जातियों में बढ़ रहे विरोध को भुनाने की कोशिश की जा रही है? अनुसूचित जाति-जनजाति संबंधी एक आयोग के अध्ययन में उजागर हुआ कि अनुसूचित जाति के प्रत्याशी (जिसमें एससी व ओबीसी शामिल नहीं है) प्रथम श्रेणी की सरकारी नौकरियों (कुलीन वर्ग की नौकरियाें) में 1965 में एक फीसदी होते थे। 1995 के आते-आते प्रथम श्रेणी की सरकारी नौकरियों में उनका हिस्सा बढ़कर 10 फीसदी हो गया। 2015 में यह और भी बढ़ गया होगा। निष्पक्ष समाज निर्मित करने के उद्देश्य से बनाई इस आरक्षण नीति ने कुछ हद तक अपने लक्ष्य तो हासिल किया ही होगा । बेशक, चीजें बदली हैं।


हिंसा या उत्तेजना तो ऊपरी चेहरा है


12 अक्टूबर
आपने गौर किया होगा कि बिहार जैसे प्रदेश में जहां विकास और कई अन्य मसले सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं वहां खाने- पीने के मसले को राजनीतिक दलों ने इतना खास बना दिया है कि अन्य सब गौण हो गये हैं। देखने में तो यह चुनावों के समय अक्सर बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण के लिए ही घिनौने खेल की तरह लग रहा है पर इसके पीछे एक बड़ी साजिश का गुमान होता है। मुंबई में भी खान- पान के मसले के सबसे वीभत्स रूप दिखे। पहले उसे बंद किया गया, फिर उस पर ‘बैन’ के बावजूद सबके आगे पकाकर खाकर दिखाया गया। यह सब भीड़ भरी सड़कों जैसे पब्लिक स्पेस में किया गया। लेकिन वहां हिंसा नहीं हुई। इसका कारण यह था कि बंद के दोनों तरफ हिंदुत्ववादी थे। बैन लगाने वाले अगर हिंदुत्ववादी थे तो बैन को तोड़ने वाले भी। जिस कंपटीटिव पालिटिक्स ने पर्यूषण पर्व पर अचानक बैन का ऐलान किया उसको जान-बूझकर तोड़ने के लिए एक रिहाइशी सोसाइटी के ऐन सामने शिवसेना ने खाने-खिलाने का आयोजन किया, दिन भर किया। यहां न दंगा हुआ, न आग भड़की, न हिंसा हुई। हां, खानपान की निजता की हानि हुई !पब्लिक स्पेस में पहले भी होटल रहे होंगे और दुकानें रही होंगी। बैन में वे बंद रहीं लेकिन शिवसेना ने उनकी कमी न महसूस होने दी। आप कुछ भी कहें, खाना जब तक निजी टेबिल पर है या होटल में है या ठेले पर है तब तक वह वीभत्स नहीं है, लेकिन अगर कोई खाते हुए खाने पर भाषण दे तो वह कुछ अजीब-सा लगता है। जिस देश में, उसके शहरों की गलियों में भूखे लोग सड़कों पर रहते हों, वहां चिकेन पका कर दिखा-दिखाकर खाना-खिलाना वीभत्स ही लगता है। वह चिकेन होने के कारण वीभत्स नहीं होता बल्कि अति प्रदर्शन के कारण वीभत्स नजर आता है, क्योंकि वह खाए-अघाए लोगों का राजनीतिक नर्तन भर होता है और वह जरूरतमंद के पेट के लिए नहीं होता। यह वीभत्स का नंगा नाच था जो राजनीति कर रही थी जिसे चैनल दिखा रहे थे और राजनीति अपने वीभत्स संस्करणों को डिफेंड कर रही थी। ऐसे में क्या अब यह तय करना कठिन है कि सभ्यता के द्रुत विकास वाली इस 21 वीं सदी में मनुष्य के तौर पर हम सभ्य ज्यादा हुए हैं या असभ्य, संवेदनशील बने हैं या संवेदनाहीन हुए हैं, उदार और दयालु बने हैं या हिंसक और बर्बर? हमारे अंदर मानवीय रिश्तों के प्रति आस्था गहरी हुई है या इन रिश्तों को कदम-कदम पर क्षत-विक्षत करते चलने की आक्रामकता? हम सामाजिक शांति और सद्भाव की कामनाओं से संचालित हो रहे हैं या फिर पारस्परिक घृणा, विद्वेष और शत्रुता की भावना से? आखिर एक मनुष्य के तौर पर हम कहां पहुंचे हैं?अगर भारतीय समाज की बात करें तो कौन-सा समूह ऐसा है जो सुरक्षित भविष्य के प्रति हमारे अंदर थोड़ी-सी भी उम्मीद जगाता हो? बिहार के चुनाव का दृश्य देखें नमूने के तौर पर , वहां सभ्य तार्किक संवाद नहीं, डरावने कुतर्क और गालियां हैं। एक-दूसरे को समझने की समझदारी नहीं, सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप हैं, आक्षेप और प्रत्याक्षेप हैं, बेहूदे अनर्गल प्रलाप हैं और भड़काऊ भाषाई व्यवहार हैं। पुलिस और प्रशासन जैसी व्यवस्थाओं को जैसे सांप ने सूंघ लिया है। कानून और व्यवस्था की दीवारों में गहरी दरारें नजर आ रही हैं और भविष्य की संभावनाओं की छाती में बड़े-बड़े छेद। हमें जैसे दौरा पड़ गया है कि न हम स्वयं शांति से रहेंगे और न अपने पड़ोसी को शांति से रहने देंगे। जो भी विचार, भावनाएं या संकल्प नफरत जगाते हों उन्हें हम सीने में सहेज लेते हैं और जो दूसरों से प्यार करना, शांति से रहना और परस्पर सहयोग करना सिखाते हैं उनके लिए हम अपने दिल-दिमाग के दरवाजे बंद कर लेते हैं। आज भारतीय समाज गाय के लिए ठीक उसी तरह से लड़ रहा है जैसे 90 के दशक में राम के लिए लड़ा रहा था। ना हम राम के काम आए और ना अब राम (अयोध्या वाले) हमारे किसी काम के रह गए हैं। और इसलिए हुआ क्योंकि ये सत्ता की दौड़ है। दरअसल , गाय तो एक बहाना है। असल मकसद है पब्लिक स्पेस को कंट्रोल करना। यानी जनक्षेत्र को नए तरीके से परिभाषित करना और लंबे समय तक उसे उत्तेजित क्षेत्र बनाए रखकर कंट्रोल करने का अभ्यास किया जा रहा है। हिंसा या दंगा तो ऊपरी चेहरा है। असल बात जनक्षेत्र को नए सिरे से बनाने, बताने और कंट्रोल करने की है।

Saturday, October 10, 2015

विकास के लिये ‘बाबूगीरी’ में सुधार जरूरी





















10अक्टूबर
विख्यात इतिहासकार एवं समाजशास्त्री प्रो. बी बी मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘ब्यूरोक्रेसी इन इंडिया’ में कहा है कि ‘भारतीय ब्यूरोक्रेसी की सबसे बड़ी विपदा है कि उसका प्रमुख राजनीतिज्ञ (पॉलिटिकल एग्जेक्यूटिव) होता है और इसलिये वह अपने तौर पर कुछ नहीं करता इसलिये सारे काम- काज रुके रहते हैं। कोई भी सत्ता , चूंकि वोट आधारित होती है इसलिये वह ब्यूरोक्रेसी से ज्यादा छेड़ छाड़ नहीं करती। क्योंकि कानून के शासन (रूल ऑफ लॉ) से वोट बैंक पर प्रभाव पड़ता है।’ देश में अबतक यही होता आया है। कोई भी सरकार हो ब्यूरोक्रेसी अपनी चाल चलती है। लेकिन इसबार जब नरेंद्र मोद नयी सरकार के मुखिया हुए तो उन्होंने ब्यूरोक्रेसी का ढर्रा बदलने का वादा किया था लेकिन कुछ नहीं हो सका। थोड़े- बहुत दिखावटी सुधार जरूर हुए पर वे कामकाजी नहीं बन सके। भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता के मजबूत तंतुओं से बने अफसरशाही के पोशिदा फंदों में उदारीकरण का पहिया फंस गया। अतएव नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रियों को न केवल सरकार चलानी है बल्कि सुशासन के लिए अफसरशाही की बुनियाद में सुधार करना होगा। चाणक्य के अनुसार ‘सुशासन का सीधा अर्थ आम जनता को अपने काम- काज में सहूलियत और सुरक्षा है।’ तजुर्बात बताते हैं कि अफसरशाही में सुधार कोई अफसर नहीं ला सकता क्योंकि यह अपने पॉलिटिकल बॉस को जवाबदेह है इसलिये इसमें सुधार और इसका पुनर्गठन केवल राजनीतिक डंडे से ही हो सकता है। परंतु मोदी सरकार ने भी अपनी योजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए अफसरशाही का ही सहारा लिया और यही कारण है कि सरकार तेजी से व्यर्थ साबित होती जा रही है। अब भी हमारे देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव जैसी समस्याएं समाधान की स्थिति से बहुत दूर दिखाई देती हैं। न तो नौकरशाही ने इस पर कभी ईमानदारी से सोचने की जहमत उठाई और न राजनेताओं ने ही। आखिर क्या वजह है कि एक तरफ तो महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग अपनी सम्पत्ति की घोषणा करने से ही डर रहे हैं और दूसरी तरफ आम जनता दिन-प्रतिदिन गरीब होती जा रही है? इन सभी मसलों पर गंभीरतापूर्वक सोचने की जरूरत है। चुनाव के बाद अधिकतर राजनेता भी इसी मूड में आ जाते हैं। असंतुलित विकास भी इसका ही नतीजा है। सरकारी कर्मचारी अहंकारी, भ्रष्ट तथा अनुत्तरदायी हैं। वे काम करें या न करें, उनकी पदोन्नति होती रहती है तो समस्या का हल कैसे निकलेगा ? अफसरशाही को समाप्त करना तो संभव ही नहीं है। आज भी ब्यूरोक्रेसी औपनिवेशिक शासन काल की तरह ही सोचती और व्यवहार करती है। वह अब भी अपने को शासक मानती है। न तो उसके पास काम करने की इच्छाशक्ति है न ही कोई दृष्टि। ऊपर से राजनीतिक अवमूल्यन ने उसे भ्रष्ट और निकम्मा बना दिया है तो विकास में बाधा आएगी ही। आज इसी का नतीजा है कि प्रशासन और आम जनता में दूरी बनी हुई है। राजनीतिक नेतृत्व अपने हित के लिए ब्यूरोक्रेसी का इस्तेमाल करता है या नेता अपने मातहत अफसरों को अपने भ्रष्टाचार में शामिल करते हैं।
सच्चाई यह है कि जिस तरह राजनीतिक नेतृत्व ऊंचे पदों पर बैठे ब्यूरोक्रेसी का अपने लिए इस्तेमाल करता है, उसी तरह ब्यूरोक्रेसी भी अपने लाभ के लिए राजनीतिक संरक्षण हासिल करती है। इस दावे में संदेह की ज्यादा गुंजाइश इसलिए नहीं है, क्योंकि अगर ब्यूरोक्रेसी पूरी तरह ईमानदार होती तो वह नेताओं के स्वार्थ में खुद भी संलिप्त न होती और उसके तटस्थ विरोध के रहते देश में भ्रष्टाचार का वह माहौल नहीं बनता, जो आज दिखाई देता है।
इस बात की सत्यता कई बार साबित हुई है और इससे संबंधित तथ्य समय-समय पर हुए कई सर्वेक्षणों में उजागर भी हुए हैं। हांगकांग की पॉलिटिकल ऐंड इकॉनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी ने एशिया की बारह बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की अफसरशाही को लेकर जो सर्वेक्षण किया था, उसके नतीजे में भारतीय ब्यूरोक्रेसी को सबसे अधिक निकम्मा बताया गया है। उसमें यहां तक कहा गया था कि भारतीय अफसर विकास में सबसे बड़े बाधक हैं। ऐसा कहने वाला यह एकमात्र सर्वे नहीं था। कुछ ही वर्ष पहले वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम ने उनचास देशों के अफसरों के कामकाज का जो सर्वेक्षण किया था उसमें भारतीय ब्यूरोक्रेसी को सबसे निचला यानी चौवालीसवां स्थान मिला था। देश और जनता की दुर्दशा की एक बड़ी वजह अफसरशाही है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। भारत के लोगों में खुशहाली तब तक नहीं आएगी, जब तक राजनीतिक बॉस प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान नहीं देते।

Friday, October 9, 2015

झूठा है ये आश्वासन



9 अक्टूबर

सरकार विदेशों में जमा कालेधन की घोषणा करने वालों को लोभ दे रही है और धमका भी रही है। लेकिन अबतक क्या मिला। फकत 4147 करोड़ रुपये वह भी 638 घोषणाओं में। यानी मोटे तौर पर 6 करोड़ रुपये प्रति घोषणा। इससे सरकार को 30 प्रतिशत टैक्स मिलेगा। यह बहुत छोटी रकम है, चुनाव के दौरान किये गये दावों के मुकाबले। चुनाव के दौरान तो कहा गया था कि विदेशों में इतना काला धन जमा है कि हर आदमी के खाते में 15 लाख रुपये आ जाएंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बहुत कम रकम हाथ आयी। यह सब देख कर लगता है कि मोदी एंड कम्पनी ने जनता को केवल सब्जबाग दिखाया था। वैसे , कहीं जेटली का कोरा वादा तो नहीं, आयकर छूट की सीमा बढ़ाने की बात?

राजनीति में जनता को तरह-तरह के सब्जबाग दिखाने का काम तो हरेक पार्टी करती है। बीजेपी भले ही नयी तरह की राजनीति करने का दावा करे लेकिन उससे भी ये अपेक्षा करना नादानी ही होगी कि वो जनता को नहीं बरगलाएगी। अब वित्त मंत्री अरुण जेटली का ये बयान भी बरगलाने वाला ही लग रहा है कि सरकार आयकर छूट की सीमा को बढ़ाने पर गम्भीरता से विचार कर रही है। अपने फेसबुक पोस्ट में जेटली ने जिस रास्ते जाने का इशारा किया है, वो ख़बर झूठी, खुशी लायक ही लग रही है, ठीक वैसी ही जैसे चुनाव के पहले हर खाते में 15 लाख लाने का वादा किया गया था। वित्त मंत्रालय के अफ़सरों का कहना है कि सरकार की टैक्स से होने वाली आमदनी का हाल अच्छा नहीं है। जेटली की ओर से उनके अफसरों ने देश को बताया कि चालू वित्त वर्ष में कर-संग्रह करीब 7 प्र​तिशत कम रहने वाला है। व्यवहार में ये ज्यादा ही होगा। क्योंकि अफसरों की ये जानी-पहचानी अदा है कि वो उपलब्धि को थोड़ा बढ़ाकर और कमजोरियों को थोड़ा घटाकर बताते हैं। सरकार का कहना है कि बजट अनुमान के लिहाज से सरकार 14.5 लाख करोड़ रुपये का टैक्स जमा नहीं कर पाएगी। ये सात प्रतिशत घटा तो 13.5 लाख करोड़ रुपये के आसपास थम जाएगा। यहां एक सवाल उठता है कि बेवजह ऐसे कानून बनाये ही क्यों जा रहे हैं? सरकार का अनुमान है कि वित्तीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद का 3.9 प्रतिशत तक रहेगा। राजस्व और खर्च के बीच के फर्क को वित्तीय घाटा कहते हैं। इसे तीन प्रतिशत तक लाने का इरादा था। वित्तीय घाटे की भरपायी सरकार कर्ज से करती है। रिजर्व बैंक ने जीडीपी की विकास दर 7.4 प्रतिशत रहने की उम्मीद जतायी है। जबकि वित्त मंत्री का लक्ष्य 8.5 प्रतिशत का था। यानी अर्थव्यवस्था उतने अच्छे संकेत नहीं दे रही है, जिसका भरोसा फरवरी में वित्त मंत्री ने बजट पेश करते वक्त जताया था। एक ओर अर्थव्यवस्था की ये दशा है और दूसरी ओर बिहार चुनाव में माहौल को खुशगवार बनाने के लिए वित्तमंत्री ने ये बयान दिया है कि सरकार आयकर छूट की सीमा को बढ़ाने पर गम्भीरता से विचार कर रही है। वित्तीय ढांचे पर गौर करें तो लगेगा कि आयकर छूट की सीमा बढ़ाने की बात झूठ है। बीजेपी के दो चहेते - बाबा रामदेव और सुब्रह्मण्यम स्वामी तो ये नुस्ख़ा भी देश को बेच चुके हैं कि आयकर को पूरी तरह से ही खत्म कर देना चाहिए। लेकिन न जाने क्यों, इतने बड़े ‘वित्तीय सुधार’ पर सरकार ने अपना मुंह सिल रखा है? मोदी जी, वैसे तो बहुत वाचाल हैं, लेकिन गूढ़ विषयों पर ‘मन की बात’ मन में ही रखते हैं। वो भला क्यों देश को ये बताने के लफ़ड़े में पड़ें कि योजना आयोग के बाद अब आयकर की अन्त्येष्टि की बारी आ गयी। उन्हें बोलना भी होगा तो लाल क़िले के प्राचीर से बोलेंगे, संसद में बोलेंगे, बिहार में चुनाव सभाओं में बोलेंगे या विदेश में भारतवंशियों के बीच बोलेंगे। वहां पर बोलना भी तो भारत में सीधा प्रसारित होता है। पता नहीं क्यों, मोदी जी ऐसे विषयों पर बोलने की अपेक्षा रखते हैं, जो उन्हें पसन्द नहीं हैं। उन्हें ये बताने में गर्व होता है कि कितने करोड़ लोगों के बैंक खाते खुल गये, 95 लाख शौचालय बन गये (कहां-कहां, ये सिर्फ सरकार जानती है या उसका सांख्यिकी मंत्रालय), हजारों करोड़ रुपये की एलपीजी सब्सिडी का पैसा सरकारी खजाने में बचने लगा, क्योंकि उन्होंने ‘परित्याग’ का जो उपदेश दिया था उसे आज्ञाकारी देश ने अंगीकार कर लिया। मोदी जी से यदि सवाल कर लिया तो मोदी भक्त भड़क जाएंगे। कहेंगे - कांग्रेस का दलाल है, भ्रष्ट है, बेईमान है, एजेंट है, राष्ट्रद्रोही है, नकारात्मक सोच फ़ैलाने वाला ग़द्दार प्रेस्टीच्यूट है। उस पर साम्प्रदायिक और तुष्टिवादी होने का ठप्पा भी पलक झपकते लगा दिया जाएगा। ख़ैर… लोकतंत्र में ये सहज है। समाज ने तो सीता को भी कब बख्शा था, जो किसी और के साथ मुरव्वत करेगा!

Thursday, October 8, 2015

विकास का ये बहाना क्यों


8 अक्टूबर
महाभारत में यक्ष और युधिष्ठिर के बीच हुए संवाद में यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया कि दुनिया में सबसे मूल्यवान क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- समय। वस्तुतः समय ही किसी भी स्थिति घटना या विचार की सकारात्मकता और नकारात्मकता को तय करता है। कहा जा सकता है कि सकारात्मकता एक सापेक्ष अवधारणा है। वह दिक और काल के संदर्भ में ही व्याख्यायित होगा। यानी समय, परिस्थिति और स्थान के सदर्भ से काटकर अगर उसे देखेंगे तो वह एक लुजलुजा-सा पद बनकर रहा जाएगा। अब दादरी कांड को ही लें। यह एक साम्प्रदायिक उन्माद का उन्मेष था, ऐसा ही कुछ वाराणसी में भी हुआ। बेशक दोनो के कारण अलग- अलग थे , लेकिन चरित्र एक ही था। इन घटनाओं को भाजपा नेताओं ने यह कह कर नजर की ओट कर दिया कि यह सब सरकार के विकासात्मक कार्यो को छोटा बनाने की साजिश है। मोदी जी ने भी कहा कि ये सब से अलग मेरा लक्ष्य केवल विकास है। लेकिन यहां सवाल उठता है कि विकास और साम्प्रदायिकता की तुलना कितनी वाजिब है। क्या डिजीटल इंडिया के कारण आयी आधुनिकता देश की पारम्परिक संवेदनाओं और भावुक संवेगो की प्रतिगामी है। इस अवसर पर एक वाकया याद आता है। चरखे या स्वदेशी आंदोलन में विदेशी कपड़ों और सामान की होली जलाने को लेकर महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच हुई असहमति और वाद-विवाद को याद किया जा सकता है। (टैगोर इसे पश्चिम से दिल और दिमाग के स्तर पर अलगाव तथा आध्यात्मिक आत्मघात मानते थे। चरखे से बुनाई पर उन्होंने कहा कि जो लोग दूसरे काम के योग्य हैं, उनके द्वारा चरखे पर सूत कातने से क्या भला होगा।) इसमें रवींद्रनाथ का पक्ष सकारात्मक लग सकता है और गांधीजी की कार्रवाई नकारात्मक। तर्क के स्तर पर चाहे रवींद्रनाथ गलत नहीं थे, लेकिन बाद के इतिहास ने गांधीजी के आंदोलन को ज्यादा सही सिद्ध किया। सही से ज्यादा देश के लिए सार्थक भी। भारत वह नहीं है, जो हम सोचते हैं। यह हमारी सर्वाधिक विचित्र कल्पनाओं से भी परे है। एक शक्तिशाली और हिंदू राष्ट्र भाजपा का भारत है, जिस पर केंद्र से ताकतवर व ईमानदार नेता आसानी से शासन कर सकता है। जिस भारत में हम रहते हैं वह ठीक इसके उलट है। केंद्र जितना ही ताकतवर होता है, राज्य उतने ही बेकाबू होते जाते हैं। यदि आप इतिहास पर नजर डालें तो आपको हमेशा ऐसा ही होता दिखाई देगा। राष्ट्र के जटिल संघीय ढांचे और अत्यंत स्वतंत्र क्षेत्रीय दलों को ठीक से संभाल लेना ही भारत पर शासन करने की कुंजी है। केंद्र की ज्यादातर सरकारें अपने शुरुआती उत्साह में यह तथ्य भूल जाती हैं। जब तक उन्हें इस तथ्य का अहसास होता है, काफी देर हो चुकी होती है।मोदी सरकार के साथ दिक्कत यह है कि यह एक साथ कई चीजें करने की कोशिश कर रही है और यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें सफल हो रही है। यह राजनीतिक अनुभवहीनता का चिह्न है, नाकामी का नहीं। भारत पर शासन चलाना आसान नहीं है। हमारी समस्याओं को मात देना ऐसा ही है जैसे रक्त बीज राक्षस का नाश। उत्तर आधुनिकता के एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण चिंतक जाॅक देरिदा के कथन को समझें तो शायद नकारात्मकता तथा सकारात्मकता और समय के संबंध को समझने में ज्यादा सही दृष्टि मिल सकती है। जाॅक देरिदा का मानना है कि ‘चरम निराशा की अवस्था में भी किसी उम्मीद की आकांक्षा समय के साथ हमारे रिश्ते का एक अभिन्न अंग है। नाउम्मीदी, इसलिए है, क्योंकि हमें उम्मीद है कि कुछ अच्छा और सुंदर घटित होगा। मुझे लगता है कि सकारात्मकता से ज्यादा सार्थकता पर बल दिया जाना चाहिए। ’ इतिहास में इसका एक बड़ा दिलचस्प उदाहरणहै। स्वाधीनता संग्राम में भगत सिंह द्वारा संसद में बम फेका जाना ही नहीं महात्मा गांधी का करो या मरो जैसा आंदोलन भी अपने ध्वन्यार्थ में नकारात्मक है, लेकिन इतिहास इन दोनों ही घटनाओं की व्याख्या सकारात्मक रूप से ही करेगा। इसलिए कई बार लगता है कि सकारात्मकता और नकारात्मकता वस्तुतः ताकत के खेल के रूप में अपना अर्थ ग्रहण करते हैं। यह पद एक ऐसा औजार है, जिससे सत्ता हर घटना की व्याख्या को अपने पक्ष में मोड़ लेने की कोशिश करती है। यहां जो सबसे बड़ी गड़बड़ी है वह है कि नागरिकों को सत्ता यह मानने पर मजबूर करती​ है कि ‘साम्पदायिकता या फासीवाद या कम्युनिज्म विकास का प्रतिगामी है।’ 1930 के बाद के काल में तीन नेता फ्रैंकलिन रूजवेल्ट, हिटलर और स्टालिन ने अपने अपने देश में विकास के कीर्तिमान स्थापित किये। इसलिये यह कहना सही नहीं होगा कि ​विकास केवल लोकतंत्र में ही संभव है। किसी दलदल भरे तालाब के किनारे कंगन लेकर बैठने वाले शेर की कथा नहीं है लोकतंत्र, यह शेर और बकरे के एक साथ रहने और फलने फूलने की व्यवस्था है। सबसे बड़ी जरूरत है कि हमारे समय में, जो कुछ भी हाशिये पर धकेल दिए गए मनुष्य के पक्ष में है, वही सार्थक है और वही सही अर्थ में सकारात्मक है तथा विकास के लिये आदर्श स्थिति है।

Wednesday, October 7, 2015

आखिर हम चुप क्यों रह जाते हैं



 7 अक्टूबर
इन दिनों देश में एक अजीब किस्म का सामाजिक परिवर्तन हो रहा है। समाजशास्त्र में अभी तक इस परिवर्तन को परिभाषित नहीं किया जा सका है। वह परिवर्तन है, प्रतिक्रियावादी और रूढ़िवादी ताकतों का संयुक्त उभार, साथ ही सम्प्रदायवाद और जातिवाद का पृथक्करण। इसके लिये हम दो स्थितियों पर चर्चा करेंगे, पहला गुजरात में हार्दिक पटेल का आंदोलन और दूसरा दादरी कांड। 90 के दशक में देश में मंडल और बाबरी कांड हुए थे, इन्हें भी जातिवादी और धर्मवादी सियासत के चौखटों में फिट कर दिया गया था। लेकिन उस वक्त दोनों दो काल खंड में हुये थे तब भी दोनों को स्पष्ट कारणों और दलीलों के आधार पर अलग- अलग बांट दिया गया था और दोनों से अलग अलग तरीके से निपटने की कोशिशें हुई थीं। आज घटना बेशक एक ही कालखंड में हुई है पर इन्हें भौगोलिक आधार पर पृथक मानने की सियासत हो रही है , जबकि दोनों एक ही​ स्थिति की उपज हैं, वह है समाज को रूढ़िवादी सांचे में ढालने के एजेंडे को कामयाब करने का प्रयास। दोनों घटनाओं का प्रतिफल देखें तो आसानी से कह सकते हैं कि हिंसा, भीड़ का हिंसक कृत्य है। राजनीतिज्ञों को छोड़ दें, आप खुद से पूछें कि आप हैं कौन? आपकी अलग पहचान क्या है? क्या आप वो भीड़ हैं जो किसी अकेले को निशाना बना कर मारती है। या सामाजिक सुविधाओं के लिए निर्मित ढांचों को जला डालती है। क्योंकि , भीड़ में आप खुद को ताकतवर महसूस करते हैं, जो अकेले में नहीं महसूस करते। आपके अंदर के जानवर को छूट मिल जाती है नफरत व क्रूरता का नंगा नाच नाचने के लिए। मन के किसी कोने में कोई छोटी सी आवाज आपको बताती है कि जो आप कर रहे हैं गलत है लेकिन भीड़ कुछ और कह रही है और इस भीड़ से अलग आप में हिम्मत नहीं है। आप शायद उन लोगों में से हैं जो आते- जाते सड़क पर किसी आवारा कुत्ते को लात मार कर संतुष्टि से मुस्करा लेते होंगे। आप सिर्फ और सिर्फ डर से बमुश्किल इंसान होने का ढोंग रचा रहे हैं। ध्यान दें कि , इस बार के आंदोलन में पटेल समुदाय की युवा पीढ़ी के लोग ज्यादा शामिल हैं। वे कहते हैं, "इन्हें शिक्षा तो मिलती है नौकरियां नहीं। सरकारी नौकरियां तो हैं ही नहीं। ये गुस्सा इनके मन में चला आ रहा था।" ये हालात तो आज से पहले भी थे पर इस तरह के गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं दिखी। गुजरात में जाति प्रथा पहले से मौजूद है। "गुजरात में जाति प्रथा का हाल ये है कि अब भी 116 जगहों पर दलितों को प्रोटेक्शन मिला हुआ है।" ये आंदोलन वही चला रहे हैं जो सांप्रदायिक भी हैं। "आदिवासी विरोधी, महिला विरोधी, दलित विरोधी और अल्पसंख्यक विरोधी होना गुजरात के मध्यम वर्ग के बहुसंख्यकों का सोच है। जब 1985 का आंदोलन शुरू हुआ तो ये आरक्षण विरोधी था लेकिन बाद में अल्पसंख्यक विरोधी हो गया।"गुजरात में आम धारणा ये है कि राज्य सरकार ने हार्दिक पटेल की रैली का पर्दे के पीछे से पूरा साथ दिया। रैली की इजाजत दी गई जबकि यह जाहिर है गया था कि हिंसा भड़क सकती है। रैली के लिए दिए गए सरकारी मैदान का किराया नहीं लिया गया। ऐसा ही कुछ दादरी में हुआ। मंत्री ने प्रतिक्रिया जाहिर की , भीड़ का बचाव किया। यही नहीं एक तरफ सरकार बूचड़खाने खोलने के लिए लाइसेंस देती है और दूसरी तरफ इसी नाम पर लोग काट दिये जाते हैं। लेकिन क्यों, आम आदमी क्यों चुप रह जाता है? पता नहीं भीड़ के कारनामे को आप सही मानते हैं या गलत क्योंकि आप कुछ कहते नहीं तो किसी को पता नहीं। आप भी निश्चिंत हैं क्योंकि हर चीज का जवाब होगा आपके पास कि हमने तो कुछ कहा तक नहीं। यही तो बात है, कहा तक नहीं। सही मान रहे हैं तो भी डर, गलत मान रहे हैं तो भी डर। एक कदम आगे तो भी डर, एक कदम पीछे तो भी डर। ध्यान रखिएगा कहीं डर से ही किसी दिन जान ना चली जाए, वो जान जिसे इतना सहेज रहे हैं।

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध

Tuesday, October 6, 2015

बिहार: अब जंग लड़नी है तुझे



6 सितम्बर

बिहार में चुनाव के पहले जब चर्चे चल रहे थे यही समझा गया था कि बिहार अब बदल चुका है और वहां अब वह सब नहीं होगा जो होता आया है और जिसके लिए बिहार अबतक बदनाम होता रहा है। लेकिन अभी जो देखने- सुनने को मिल रहा है उससे तो लग रहा है कि बिहार की राजनीति एक अजीब किस्म की हो गयी है। राजनीति शास्त्र में या समाजशास्त्र में ऐसा उदाहरण अभी तक देखने को नहीं मिला है। जैसा कि महसूस हो रहा उससे लगता है कि बिहार में चुनाव चाहे मोदी जीतें या नीतीश लेकिन हारेगी बिहार की जनता ही। इतना जरूर है की नेताओं के साथ साथ जनता का जातीय , धार्मिक तथा क्षेत्रीय अहम भी जीत जाता है और यही जीता हुआ अहम पूरे 5 साल तक अपने सेवक(नेता पढ़ें) के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता रहता है । 70 साल बीत जाने के बाद भी लोग नही समझ पाये की सत्ता पाने के बाद न कोई दलित रहता है और न ही हिन्दू या मुसलमान। सब उस गिरोह मे शामिल हो जाते हैं जहां दिन रात उस उपाय पर चिंतन होता रहता है की इस कुर्सी को अगली बार के लिये बरकरार कैसे रखा जाय।

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख

घर अंधेरा देख, तू आकाश के तारे न देख।

गौर करें बिहार इस समय सार्थक सवालों के गलियारों से गुजर रहा है। ये प्रश्न उठ रहे हैं कि संघ- भाजपा वाले लालू राज को जंगल राज और लालू अपने राज को मंडल राज बता रहे हैं। सच्चाई क्या है? क्या सच वह है, जो लालू बोल रहे हैं या सच वह है, जो संघ-भाजपा वाले बोल रहे हैं। संघ-भाजपा वाले दावा कर रहे हैं कि वे जंगल राज खत्म करेंगे। लालू गुजरात दंगे का हवाला दे रहे हैं। संघ को ब्राह्मण की संस्था बता रहे हैं। इसी बीच दादरी की घटना देश के सामने आई। देश के सामने यह सच्चाई आई कि मंदिर से पुजारी ने अफवाह उड़ाई। इसके बाद मारपीट हुई। जान गयी। केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा उनके बचाव में उतरे और इस संपूर्ण सुनियोजित सांप्रदायिक हिंसा को महज एक हादसा बता दिया। लालू के समर्थक इस पूरे घटना-क्रम को ‘नफरत-राज’ के रूप में देख रहे हैं और लोगों को दिखा रहे हैं। बिहार के मतदाता सोच रहे हैं कि सच कौन बोल रहा है। सच्चाई क्या है ? क्या बिहार के चुनाव की लड़ाई हो गई है - ‘जंगल राज’ बनाम ‘नफरत राज।’ भाजपा के नेता ढोल पीट रहे हैं कि वे ही जंगल राज खत्म करेंगे। क्या नफरत के रास्ते जंगल राज खत्म होगा ?

मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है

सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है

अब यह सवाल उठता है कि एक तरफ नफरत जात के नाम पर है, तो दूसरी तरफ धर्म के नाम पर। जो भी जीते वह यही सोचने में मशगूल रहेगा कि अगली बार कैसे कायम रहेंगे। लिहाजा , सब चाहते हैं की जनता को 2 रुपया किलो खाद्यान्न , कंबल ,साड़ी ,सायकिल देकर अकर्मण्य बनाये रखा जाय।

हुकूमत मुंह-भराई के हुनर से खूब वाकिफ है

ये हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है

आप सोचिये ना कि एक नेता विधायक का चुनाव लड़ने के लिए करोड़ रुपये से ज्यादा क्यों खर्च कर रहा है। जबकि सब जानते हैं कि रुपये ना पेड़ पर फलते हैं और ना मुफ्त में मिलते हैं। कुछ तो कारण होगा , कुछ तो मिलता होगा इस खर्चे के बाद जो उस करोड़ रुपये से ज्यादा होगा। एक बार मंदिर निर्माण के नाम पर यहां हिंसा भड़की थी। महागठबंधन के लोग कहते हैं कि इस बार एक नेता अपने पुत्र के भविष्य निर्माण के लिए ऐसा करवा रहे हैं। बिहार के लोग सहमे हैं। अफवाहें जोर-शोर से उड़ रही हैं। सद्भाव बिगाड़ने की साजिश चल रही है।

तवायफ की तरह अपने गलत कामों के चेहरे पर

हुकूमत मंदिरों-मस्जिद का पर्दा डाल देती है

कुछ सिद्धांत ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत दूर तक खींचना उनकी भावना के प्रतिकूल चला जाता है। भाजपा नेतृत्व की यह घोषणा कि बिहार में उसकी सरकार बनी तो मुख्यमंत्री अगड़ी जाति का नहीं, बल्कि पिछड़ी जाति का होगा, कुछ ऐसी ही है। यह दुश्मन के हथियार से ही दुश्मन को मात देने की कोशिश है। इससे साबित होता है कि अवसरवाद के रास्ते पर हमारी पार्टियां कितनी दूर तक जा सकती हैं। जाति एक ऐतिहासिक सच्चाई है। लेकिन यह मान लेना कि किसी खास राज्य का विकास कोई पिछड़ा नेता ही कर सकता है, एक ऐसा अंधविश्वास है जिसने भारतीय राजनीति को बहुत नुकसान पहुंचाया है। बिहार की जनता लगातार 70 साल से हार रही है , अतएव बिहार के लोगों को बिना किसी के हार-जीत का ध्यान दिये मतदान करना चाहिये । हो सकता है इस बार जीत जाय !

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,

कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।

इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं



5 सितम्बर

देश में दादरी कांड इन दिनों छाये हुआ है। सभी सियासी रंग और जमात के लाेग अपनी गोटियां बिछा रहे हैं। कोई कह रहा है कि खानपान को लेकर बंदिशें हो रहीं हैं और कोई खनपान की पवित्रता के नाम पर खून खराबे को हवा दे रहा है और कोई सेकुलर भारत का रोना रो रहा है। पूरी कवायद को दखें तो ये नेता दादरी कांड में मरे हुए लोगों की लाशों पर वोटों की फसल उगाने में लगे हैं। यह भी एक विडंबना है कि उधर वे फेसबुक के अमरीका स्थित ऑफिस में लिखते हैं -‘अहिंसा परमो धर्मः’ और इधर उनके भक्त एक बूढ़े को बेवकूफाना अफवाह के चलते पीट-पीट कर मार देते हैं! वाह क्या गजब का तालमेल है भगवान और भक्तों के बीच!! परसाई जी का एक लेख था ‘’ आवारा भीड़ के खतरे’उसमें उन्होंने लिखा था कि ‘दिशाहीन और हताश युवकों की भीड़ दिग्भ्रमित होती है, जिसका प्रयोग खतरनाक विचारधारावाले महत्वाकांक्षी लोग कर सकते हैं।’ आज यही भीड़ लगातार बढ़ रही है। राष्ट्रवाद के नाम पर इन्हें दिग्भ्रमित किया जा रहा है। परसाई ने सही कहा था कि भारत सिर्फ ढाई विचारधाराओं वाला देश है, कांग्रेस की गांधीवादी विचारधारा, कम्युनिस्ट विचारधारा और आधी सोशलिस्ट विचारधारा। आज इसी ढाई विचारों के सोच पर ‘औना-पौना’ छद्म राष्ट्रवाद हावी हो गया है। यह कांग्रेस की बहुत बड़ी हार है कि जिसने इतने साल शासन में होने के बावजूद गांधी और नेहरू के विचारों को पोषित नहीं किया। यह तो भला हो अन्य पश्चिमी विचारकों का जिन्होंने गांधीवाद को जिंदा रखा। हमारे देश की विडम्बना है कि दादरी कांड हो या कोई और, मीडिया में कुल मिलाकर हत्या की कहानी कुछ इस तरह से पेश होती है कि अपराधी का ‘‘निश्चय’ होने की जगह ‘अपराध’ का ‘मैनेजमेंट’ होने लगता है। यह अपराध शास्त्र की​ एक नयी व्याख्या सामने आ रही है। हम आजकल इसी का अभ्यास देख रहे हैं। दादरी की कहानी इसी तरह बन रही है। कलबुर्गी की हत्या हो, पंसारे की या दाभोलकर की हत्या या कि ऐसी और हत्याएं, वे सब मीडिया पर देर-सबेर खबर बनी हैं और पहले उन्होंने अपराधी की ओर उंगली उठाई है। लेकिन ऐसी हर हत्या एक-दो दिन खबर बनी रही है। हर हत्या की आलोचना हुई है और आलोचकों ने हत्यारों को पकड़ने, सजा देने की गुहार की है । उन्होंने कहा कि जनतंत्र का वध करने वाली शक्तियां बढ़ रही हैं, अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा बढ़ रहा है इत्यादि । लेकिन जितना समय इस आलोचनात्मकता को मिला है उतना ही समय हत्या के पक्षकारों को दिया गया है। वे भी उन हत्यारों को डिफेंड करने सामने आते रहे हैं। ऐसे पक्षकार गजब के प्रतिभाशाली और कुतर्की होते हैं: अपराधी पकड़े तक नहीं गए होते लेकिन उन कथितों का बचाव पहले किया जाने लगता है। वे ऐसे अंतर्यामी हो जाते हैं कि जिन ‘‘अनामों’ पर शक किया जा रहा है, उन्हीं ‘‘अनामों’ को वे डिफेंड करने लगते हैं कि वे बेकसूर हैं और उनके खिलाफ राजनीति हो रही है। ऐसी बातों से ऐसा लगने लगता है कि जिसकी हत्या की गई है शायद वही अपराधी है! तर्क के आगे कुतर्क भारी होने लगता है। अपराधी को संदेह का लाभ मिलने लगता है। मसलन ,राजद अध्यक्ष और पूर्व मुख्यंमत्री लालू प्रसाद यादव ने भाजपा पर साम्प्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि आरक्षण और सामाजिक न्याय की धारा की गोलबंदी से डरी भाजपा और मीडिया का एक वर्ग खानपान जैसे मुद्दों के पीछे मुंह छिपा रहा है। यादव ने अपने ट्वीट के जरिए शनिवार को एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा पर करारा प्रहार किया और कहा, ‘‘मोदीजी, रहन सहन, खान पान और आस्था के बिन्दुओं पर फसाद करने की राजनीति बंद करो। इसके तुरंत बाद अपने दूसरे ट्वीट में राजद सुप्रीमो ने लिखा,‘‘मीडिया का एक वर्ग भाजपा से मिलकर दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के मुद्दों से ध्यान भटकाने की चेष्टा कर रहा है। जब तक ऐसे मामलों में आम जनता धर्म से ऊपर उठकर नहीं सोचेगी, तब तक ये रुकने वाला नहीं है । यह घटना बता रही है कि हमारे समाज में धार्मिक कट्टरता बढ़ती जा रही है और आप अन्य घटनाओं को भी देखेंगे तो जातीय कट्टरता भी बढ़ रही है । ऐसी हरकतों से पूरे देश की पूरे विश्व में बदनामी हो रही है । ऐसी बदनामी की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती है, शायद इसका अन्दाजा इन घटनाओं में शामिल लोगो को नहीं होता । हैरानी की बात है कि कुछ शक्तिशाली देश आसमान से बम गिराकर शांति लाना चाहते हैं और आतंकवादियों के नाम पर निर्दोष नागरिकों को अपना शिकार बना रहे हैं । धार्मिक कट्टरता की कितनी भारी कीमत ये देश चुका रहे हैं इसका अन्दाजा भी नहीं लगाया जा सकता ।

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में,

हम नहीं हैं आदमी, हम झुनझुने हैं ।

हमारा देश एक धर्मनिरपेक्ष देश है और रहना भी चाहिये, क्योंकि वर्तमान में सिर्फ धर्मनिरपेक्ष देश ही कायम रह सकते हैं और धर्म के आधार पर बनने वाले देशों का हाल तो पाकिस्तान,सीरिया,इराक और अफगानिस्तान जैसा ही होता है । हमें हर प्रकार से किसी भी धर्म की धार्मिक कट्टरता को रोकना है, क्योंकि इसी में देश का हित है। हम फिक्रमंद हैं कि तिरंगे पर दस्तखत किए गए, लेकिन किसी का राष्ट्रवाद दादरी में गलत शुबहे के चलते एक निरीह वृद्ध की हत्या और बेटे की पिटाई पर जागता नहीं ? वाह फिर भी हम देशभक्त हैं। संविधान कहता है हम धर्म निरपेक्ष राष्ट्र हैं। पर, हमारी राजनीति स्वयं ही संविधान की विरोधी है। धर्म निरपेक्षता की सरकारी और राजनैतिक व्याख्या क्या है आम आदमी को नहीं पता किन्तु आम आदमी जो समझता है वह है कि भारत में जन्मे प्रत्येक व्यक्ति का एक ही धर्म है और वह यह है कि वह भारतीय है। एक बात समझ लें कि -‘मैं श्रेष्ठ हूं’ यह आत्मविश्वास होता है लेकिन ‘मैं ही श्रेष्ठ हूं, यह अहंकार होता है।’ आज के हालात देख कर तो यही लगता है ,

चीड़-वन में आंधियों की बात मत कर,

इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं ।

Saturday, October 3, 2015

बिहार में भाजपा का विजन ?


 3 अक्टूबर
बिहार में चुनाव की गहमा गहमी शुरू हो चुकी है। प्रचार में माहिर भाजपा ने एक अक्टूबर को विजन डॉक्यूमेंट जारी किया। इसमें लम्बे- चौड़े वायदे किये गये हैं। यह कुछ ऐसा लग रहा है कि कहा जा रहा हो कि ‘रोटी नहीं मिलती है तो यार केक खाओ ना।’इसमें मुफ्त में स्कूटी, लैपटॉप, टीवी और कपड़े देने का वादा किया गया है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे विकास पत्र बताया। इसमें 'मेक इन बिहार' और 'डिजिटल बिहार’ का नारा भी दिया गया है। इसमें हिंदुत्व पर भी काफी जोर दिया गया है। विजन डॉक्यूमेंट में ‘गो-पालन निदेशालय’ की स्थापना से लेकर धर्मांतरण रोकने के लिए प्रभावी कानून बनाने का वादा किया गया है। चूंकि हमारे देश में घोषणापत्र का ब्रांड पिट चुका है। लिहाजा पिछले कुछ चुनावों से घोषणापत्र को विजन डाक्यूमेंट जैसे भारी भरकम नाम से दोबारा लॉन्‍च किया जा रहा है। विजन डाक्यूमेंट में घोषणापत्र जैसी वचनबद्धता नहीं होती है। रूपरेखा के नाम पर चमकदार वादे को ही सजाया जाता है जो पहले घोषणापत्र में होता था। बीजेपी के विजन डाक्यूमेंट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर है। विजन डाक्यूमेंट में बीजेपी ने एक लाख पैंसठ हजार करोड़ के पैकेज को दो चार लाइन में ही निपटा दिया है। पैकेज का विस्तार से कोई ब्यौरा नहीं है। भाजपा ने अपने पैकेज को विश्वसनीयता प्रदान करने का एक बड़ा मौक़ा गंवा दिया है। विजन डाक्यूमेंट पढ़ कर पता नहीं चलता कि एक लाख पैंसठ हजार करोड़ में से सब खर्च होगा या उसमें किए गए वादों के लिए अलग से बजट बनेगा।दृष्टि पत्र के नाम से हर दल यही प्रयास रहता है कि मीडिया में कुछ ऐसे बिन्दु ज्यादा लोकप्रिय हो जाएं जिनसे वोट खींचा जा सके। जैसे स्कूटी, लैपटॉप और साड़ी-धोती देना। विजन डाक्यूमेंट में लिखा हुआ है कि हर दलित महादलित टोले में एक रंगीन टीवी दिया जाएगा लेकिन मीडिया ने चलाया कि हर दलित और महादलित को रंगीन टीवी मिलेगा। बीजेपी को बताना चाहिए कि बिहार में ऐसे टोलों की संख्या कितनी है और कितने टीवी सेट लगेंगे। छोटा टीवी मिलेगा कि बड़ा। लगता है टेलीविजन देने के लिए विजन डाक्यूमेंट बनाया गया है। बीजेपी ने विज़न डाक्यूमेंट में कहा है कि पहली बार बिहार में किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हुए हैं। गैर सरकारी दावों के अनुसार गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में लाखों की संख्या में किसानों ने आत्महत्या की है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े देखिये तो 2014 में बिहार में एक भी किसान आत्महत्या का जिक्र नहीं है। बीजेपी ने अपने विज़न डाक्यूमेंट में कहा है कि खेती के लिए अलग से बजट पेश होगा। समय पर ऋण वापस करने वालों को शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर खेती के लिए कर्ज दिया जाएगा। हर किसान को हेल्थ कार्ड दिया जाएगा। केंद्र में सोलह महीने के बाद भी लोकपाल का पता नहीं लेकिन बिहार के विजन डाक्यूमेंट में बीजेपी ने लोकपाल जैसी किसी संस्था की बात तो की है मगर हैरानी हुई कि लोकपाल शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है। विजन डाक्यूमेंट में कहा गया है कि- भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी की स्थापना करेंगे। इसकी एक यूनिट का गठन हर जिले में होगा। नए सतर्कता कोर्ट की स्थापना करेंगे ताकि भ्रष्टाचार के मामलों का निपटारा हो सके। रंगे हाथ रिश्वत पकड़े जाने पर समय सीमा के तहत दंडित किया जाएगा। बिहार विशेष न्यायालय एक्ट जिसके तहत भ्रष्टाचारियों की संपत्ति ज़ब्त की जाती है उसे प्रभावी बनाया जाएगा। भ्रष्टाचार के नियंत्रण के लिए टोल फ्री नंबर की शुरुआत होगी। क्या भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी लोकपाल है या कोई अन्य संस्था है। बिहार में लोकायुक्त है। बीजेपी और नीतीश दोनों ने अपने विजन डाक्यूमेंट में नए उद्यमियों के लिए 500 करोड़ के वेंचर फंड की बात कही है। दोनों के एजुकेशन लोन में कुछ तीन परसेंट का चक्कर है। विजन डाक्यूमेंट में हिन्दी का जिक्र नहीं है लेकिन बीजेपी अंग्रेजी और संस्कृत के अलावा फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश और अरबी सिखाने का वादा कर रही है। जिन मदरसों में अरबी सिखाई जाती है उन्हीं को लेकर कितना राजनीतिक बवाल खड़ा किया जाता है लेकिन यह अच्छा है बीजेपी ने अरबी को महत्व दिया। इन सब भाषाओं के लिए बिहार में शिक्षक कहां से आएंगे? अंग्रेजी का मुद्दा इस चुनाव में बिहार की आकांक्षा की जीत है। शायद सबको पता है कि एक आम बिहारी अंग्रजी की कितनी अहमियत समझता है। वो हिन्दी समर्थन के नाम पर राजनीतिक ढोंग की असलियत जानता है। आप विजन डाक्यूमेंट जरूर पढ़ें और इसी आधार पर अपना मत बनाएं। जरूरी है अपना मत बनाना ताकि विजन डाक्यूमेंट पर गंभीरता से बहस हो सके और राजनीतिक दलों पर सीरियस होने का दबाव बढ़ें।

Friday, October 2, 2015

प्रसंगहीन नहीं हैं गांधी


गांधी पर किसी कवि ने लिखा है कि,

बिजली बन के थी शमशीर चली

पर आप आप ही मुकर गयी

कहते हैं, गांधी के सीने में जाकर

तलवार स्वंय ही टूट गयी

हां, इतिहास गवाह है कि बुद्ध के बाद इस दुनिया में दो ऐसे लोग पैदा हुये थे जिन्हें कोई आदमी खारिज नहीं कर सकता। बेशक उनके विचारों को मानें या ना मानें। वे दो इंसान थे- गांधी और मार्क्स। यहां बहात केवल गांधी की है। वर्तमान समय में गांधी के संदर्भ में दो तरह के मत हैं, एक गांधी को व्यर्थ कहने वाले और दूसरे गांधी का व्यवसाय करने वाले। गांधी को आदर्श मानने वालों का अभाव हो चुका है अपने देश में। जबकि , अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गांधी की स्वीकार्यता और प्रासंगिता तेजी से बढ़ रही है। पिछले वर्ष विख्यात टाइम पत्रिका ने गांधी के नमक सत्याग्रह को दुनिया का अबतक का सबसे प्रभावशाली आंदोलन कहा था। गत वर्ष अमरीका में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफ्रीकी महाद्वीप के 50 देशों के युवा नेताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि आज के बदलते परिवेश में युवाओं को गांधी जी से प्रेरणा लेने की जरूरत है। एक ताकतवर देश के राष्ट्रपति द्वारा हिंसा भरे माहौल में महात्मा गांधी की प्रासंगिकता का उल्लेख किया जाना निश्चय ही गांधी की विश्वव्यापी स्वीकार्यता को ध्वनित करता है। पिछले वर्ष विज्ञान भवन में राष्ट्रमंडल देशों के लोकसभा अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के एक सम्मेलन में जांबिया की नेशनल असेंबली के अध्यक्ष असुमा के. म्वानामवाम्बवा ने न केवल गांधी के सिद्धांतों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी, बल्कि यहां तक कहा था कि भारत के साथ हम भी महात्मा गांधी की विरासत में साझीदार हैं। यह उन भारतीयों के लिए एक सबक है, जो गांधी के आदर्शो और मूल्यों पर प्रहार करने से बाज नहीं आते। वैश्विक स्तर पर गांधीवादी मूल्यों की बढ़ रही प्रासंगिकता और उनकी अहिंसा की अवधारणा की विश्वव्यापी स्वीकार्यता उन लोगों के लिए एक सबक है, जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि में जाकर गांधी को अनर्गल आक्षेपों व तर्कहीन तथ्यों के सहारे दोषी ठहराते देखे जाते हैं। उन लोगों को भी विचार करने की आवश्यकता है, जो भारतीय समाज के निमार्ण में गांधी की भूमिका को शंका की दृष्टि से देखते हैं। हां, उन लोगों को संबल जरूर मिला होगा, जो इस बात को लेकर आशंकित हो उठे थे कि वर्तमान भारत में गांधी की प्रासंगिकता और उनकी आदर्शवादिता कमजोर पड़ती जा रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता से सिद्ध हो गया है कि अभी गांधी और उनके विचारों से देश के लोग दूर नहीं हुए हैं। संतोष की बात यह है कि गांधी विरोध से कई गुना अधिक वेग से गांधी के दर्शन और विचार महाद्वीपों को लाघंते जा रहे हैं। क्या अमरीका और क्या अफ्रीका, शायद ही कोई ऐसा देश हो, जो आज गांधी के अहिंसा संबंधी विचारों को अपना हथियार न बनाना चाह रहा हो। हिंसा भरे वैश्विक माहौल में गांधी के विचारों की ग्राह्यता बढ़ती ही जा रही है। जिन अंग्रेजों ने विश्व के हर कोने में यूनियन जैक लहराया था और भारत में गांधी की अहिंसा को चुनौती दी थी, आज वे भी गांधी के अहिंसा संबंधी विचार व आचरण अपनाने की बात कर रहे हैं। इस तथ्य पर ध्यान दें कि गांधी मानते थे कि ‘मनुष्य इसलिए मनुष्य है कि उसमें विवेक है पर उसका विवेक कोरा तर्क वाला नहीं है। मनुष्य की अपनी अंतर्ध्वनि भी है, अंतरात्मा भी है जो सबमें है। जो साझी भी है और सबकी अलग-अलग भी। इसलिए बिना अंधानुकरण किए खुद अपने ढंग से सोचना जरूरी हो जाता है।मनुष्य की स्वायत्ताता और स्वतंत्रता एकांगी नहीं होती।’ आज हमें चुनने की स्वतंत्रता है। एक समय था जब परंपरागत समाज हमें पूर्वनिश्चित दायित्व में बांधता था और दूसरे की आशाओं-अपेक्षाओं के अनुरूप बनने के लिए कहता था, पर आज का आधुनिक मन इन सबमें नियंत्रण की बू देखता है और इसलिए उसे छोड़ने लगा, नकारने लगा। पर स्वतंत्रता मिली क्या? आज एक नया और भयानक दबाव है। वह दबाव है बाजार के बढ़ते वर्चस्व का जो हमारे काम-धाम, ज्ञान-विज्ञान, नाते-रिश्ते और जीवनशैली यानी सब कुछ तय करने लगा है। वह झूठी दिलासा जरूर दिलाता है कि तुरत-फुरत सब मिल जाएगा और अबाध सुख की गारंटी ऊपर से है। नियंत्रण के उपाय, औजार आज और तेज और नुकीले हो गए हैं। इस सबके बावजूद दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जब-तब गांधी के सामाजिक-राजनीतिक योगदान पर बेवजह वितंडा खड़ा किया जाता है। उनकी सहृदयता और मानवतावादी दृष्टिकोण को अपनाने के बजाय उनपर सियासत की जाती है। हालिया वर्षो में गांधी के राजनीतिक-सामाजिक योगदान को लेकर जिस गति से क्रिया-प्रतिक्रिया तेज हुई है, उससे तो यही लगता है कि हम गांधी की विरासत के सच्चे वारिस हैं भी या नहीं। राजनीतिक जमात और छद्म समाजसेवियों के लिए गांधी एक बेजोड़ ब्रांड बन चुके हैं और उनके नाम पर जमकर राजनीतिक लाभ लिया जा रहा है। देखा जा रहा है कि सत्ता प्राप्ति की छटपटाहट में कुछ राजनीतिक दलों ने तो उनके विचारों का मानो कॉपीराइट करा रखा है। वे यह सिद्ध करने की कोशिश करते रहते हैं कि गांधी और उनकी विचारधारा पर सिर्फ उन्हीं का एकाधिकार है। लेकिन सुखद बात यह है कि गांधी के स्वार्थी समर्थक और विरोधी दोनों ही अपने-अपने मतलब के लिहाज के बावजूद किसी न किसी रूप में उन्हें प्रासंगिक बनाए ही हुए हैं। गांधी की विचारधारा और उनके मूल्यों में आस्था न जताने वाले लोगों की बातें तो समझ में आती हैं, लेकिन गांधीवादी मूल्यों को सर्वाधिक क्षति उन लोगों द्वारा पहुंचाई जा रही है, जो उनके कथित अनुयायी बने हुए हैं। इन स्वार्थी किस्म के राजनीतिक अनुयायिओं ने अपने को गांधी का असली वारिस मान लिया है। लेकिन उन्हें गांधी के अंतिम पांत के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा नहीं दिखाई दे रही है ,ऐसे में गांधी सोचने को मजबूर करते हैं कि हम अपने स्वभाव को फिर से पहचानें, शायद कोई रास्ता निकल आए। यही बात गांधी को आज भी प्रसंगहीन नहीं होने दे रही है।