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Friday, July 17, 2020

राजस्थान का सियासी तापमान



राजस्थान का सियासी तापमान


राजस्थान के कांग्रेसी सियासत में अब पायलट सीट नहीं रही। बगावती सचिन पायलट को 72 घंटे तक मनुहार किया जाता रहा लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ उसके बाद उन पर कार्रवाई की गई। उन्हें उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया। हालांकि अभी उन्हें पार्टी से निकाला नहीं गया है। झगड़ा तब शुरू हुआ जब सचिन पायलट मुख्यमंत्री पद से नीचे के लिए तैयार नहीं थे और कांग्रेस हाईकमान गहलोत से पल्ला झाड़ने के पक्ष में नहीं है। 72 घंटे तक बात चली पायलट ने राहुल गांधी से भी मुलाकात की और उनकी बात से भी इंकार कर दिया। पायलट ने सिर्फ कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष 4 शर्तें रखी थी लेकिन बात नहीं बनी और अंततः पायलट को हटा दिया गया। अब बात उठती है कि आगे क्या होगा? राजस्थान में 2018 में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को पराजित कर कांग्रेस ने गद्दी अपनायी थी। इसके पहले कांग्रेस की करारी हार हो गई थी। सचिन पायलट वाले मामले से पहले मध्यप्रदेश में ऐसा हो चुका है और वहां कांग्रेस को सत्ता खोनी पड़ी है। इसके बाद आया है मामला राजस्थान और इस मामले ने कांग्रेस के भीतर की समस्त व्यवस्था को झकझोर दिया है। मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान में ऐसा हुआ है और इससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता हुआ है, पार्टी के भीतर खलबली मच गई है। वैसे सियासी गलियारों में यह चर्चा है बगावत की शुरुआत तो मार्च में ही हो गई थी लेकिन हाईकमान को इसका पता नहीं चला और जब पता चला तो परंपरागत इलाज के अलावा कुछ नहीं था, कोई रास्ता ही नहीं बचा। कांग्रेस पार्टी 2014 के पराजय के बाद से भीतरी चुनौतियों का सामना कर रही है। आंतरिक विद्रोह के कारण यह चारों खाने चित नजर आ रही है। आखिर देश की सबसे पुरानी पार्टी का इतना बुरा हाल क्यों हुआ? लोग पार्टी छोड़ कर क्यों जा रहे हैं? कांग्रेस के चरित्र और उसके आचरण को देखते हुए यह कहा जा सकता है की जो कुछ हो रहा है उसकी वजह गांधी परिवार है खास कर वर्तमान में सोनिया गांधी। अगर कांग्रेस का इतिहास देखें तो हर पार्टी के भीतर टूटन के लिए पार्टी हाईकमान का जिद्दी रवैया ही जिम्मेदार रहा है। सुभाष चंद्र बोस की घटना हो या फिर पटेल की या भारत के विभाजन की सब जगह पार्टी नेतृत्व का जिद्दी रवैया दोषी रहा है। इस बार भी चाहे वह सचिन पायलट का मामला हो या सिंधिया का सोनिया गांधी का मनोविज्ञान साफ दिख रहा है कि वह नहीं चाहतीं कोई भी ऐसा नेता उभरे जो राहुल गांधी की चुनौती बन सके। यहां तक कि उन्होंने प्रियंका गांधी के भी आगे नहीं बढ़ने दिया। पार्टी के कार्यकर्ताओं का कहना है कि बेटे के करियर को आगे बढ़ाने के लिए सोनिया गांधी ने सिद्धांतों और मेरिट को भी कुर्बान कर दिया। आम धारणा है कि भारतीय जनता पार्टी इन नेताओं को कांग्रेस से निकलने के लिए ना केवल उकसा रही है बल्कि बाध्य भी कर रही है। परंतु भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि उन्होंने कभी इनको बुलाया नहीं आए। इनका मानना है पार्टी में मेरिट को नजरअंदाज कर दिया जा रहा है और राहुल गांधी में राजनीति की समझ शून्य है । भाजपा का दावा है उसकी पार्टी में आने वाले कांग्रेसियों की लाइन लगी हुई है लेकिन जिनमें कुछ मेरिट है उन्हें ही पार्टी में लिया जा रहा है।


दूसरी तरफ कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी से किसी को कोई समस्या नहीं है। कुछ कार्यकर्ताओं का यह भी कहना है कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार को सोशल मीडिया पर लगातार बदनाम किया जा रहा है। एक साथ गिरोह बन गया है जिसमें सोशल मीडिया के लोग, बिकी हुई मीडिया और कुछ फिल्म स्टार शामिल हैं। उन्हें देशद्रोही की तरह पेश किया जाता है। यह हिटलर का जमाना याद दिलाता है। यह एक बड़ा संघर्ष है जिससे हम मुकाबले की कोशिश में लगे हुए हैं। लेकिन पार्टी के चरित्र को निश्चित किए जाने के बाद निष्कर्ष निकलता है के कांग्रेस पार्टी समय के अनुसार खुद को नहीं बदल पा रही है और उसने अब तक भीतर से आत्म निरीक्षण नहीं किया। कांग्रेस में राजनीतिक और वैचारिक कायाकल्प का कभी गंभीर प्रयास नहीं किया गया। बेशक, कांग्रेस पार्टी आंदोलन के आधार पर खड़ी हुई और वहीं से उसका सियासी सफर शुरू हुआ जिसके कारण पार्टी में काडर नहीं बल्कि कार्यकर्ता हैं। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी काडर आधारित पार्टी है। यहां गौर करने की चीज है कि काडर विचारधारा से बनता है जबकि पार्टी वर्कर से बनती है। वैसे बाजार में एक चर्चा है इन दिनों राजनीति मनी, मसल और मीडिया से न केवल संचालित रहती है बल्कि इसी से प्रभावित भी होती है। कांग्रेस के साथ सबसे बड़ी मजबूरी है इससे निपटने का तरीका उसको मालूम नहीं है।





इन सब मजबूरियों के बावजूद सचिन पायलट ने कांग्रेस नहीं छोड़ने का फैसला किया है और आगे के कदमों पर विचार कर रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी के भीतर उनकी छवि खराब करने के लिए यह लगातार बात फैलाई जा रही है वह भाजपा के साथ खड़े हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे भाजपा में शामिल नहीं हो रहे हैं।उनका कहना है कि वह अभी भी कांग्रेस पार्टी में है और आगे क्या करना है इस पर फैसला कर रहे हैं। वह राजस्थान के लोगों की सेवा करते रहेंगे। राजनीति में अटकलबाजियां बहुत होती हैं और इनके आधार पर कोई भी निर्णय बड़ा कठिन होता है। इसलिए यहां यह कहना ही पर्याप्त है कि सब कुछ आने वाला समय बताएगा। कांग्रेस पार्टी ने भी पायलट के लिए एक खिड़की खुली रखी है और वह है अभी उन्हें पार्टी से निकाला नहीं गया है केवल पद से हटाया गया है। इसका मतलब है पायलट अभी भी कांग्रेस में हैं और कुछ भी हो सकता है। कोविड-19 के इस दौर में दो चीजों का आकलन बड़ा कठिन है पहला शारीरिक तापमान और सांस लेने की प्रक्रिया। राजस्थान की सियासत में कुछ ऐसा ही दिख रहा है, वहां के सियासी तापमान को मापना बड़ा कठिन है।

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