CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Monday, July 13, 2020

अब हॉट स्प्रिंग से भी वापसी



अब हॉट स्प्रिंग से भी वापसी


गलवान घाटी से पीछे हटने के एक दिन बाद अब चीनी और भारतीय सेना हॉट स्प्रिंग के गोगरा क्षेत्र से लौट रही है। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति के लिए दोनों पक्षों में समझौते हुए और इसके बाद वहां से वापसी शुरू हो गई। लेकिन चीन पर भरोसा मुश्किल है 1962 में पंचशील के परदे के पीछे से चीन ने भारत के पीठ में छुरा भोंक दिया और इस धोखेबाजी से नेहरू इतने टूटे कि अवसाद के कारण 2 वर्ष के बाद इस दुनिया को छोड़ कर चले गए। चीन जब भी गले मिलता है तो बघनखे छिपाकर मिलता है। चीन भारत से संबंधित जितने पड़ोसी हैं सबको भारत के खिलाफ मानसिक रूप से तैयार कर रहा है। पाकिस्तान तो खैर भारत का जन्मजात दुश्मन है ही नेपाल भूटान पर भी वह जवाब दे रहा है। वैसे तो वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देश अपने निर्माण कार्य को रोक देगा। आश्चर्यजनक रूप से चीन तैयार हो गया है लेकिन उस पर भरोसा नहीं है। भारतीय सेना भी वहां से पीछे जा रही है ताकि दोनों के बीच थोड़ी दूरी बढ़ जाए और झड़प की गुंजाइश कम रहे।


हालांकि, भारत और चीन के बीच मोर्चाबंदी उपक्रम करने की प्रक्रिया का असर हमारी सेना या दुश्मन की सेना की सतर्कता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भारत को विवादास्पद सीमा पर नई हकीकत से निपटने के लिए तैयार रहना होगा। यहां पिछले पांच दशक के बाद बर्फ पर खून फैल गया था। इसका सबसे बड़ा कारण था दोनों से देशों की सेना में भरोसे की भारी कमी। दोनों देशों की सेना के कोर कमांडरों में बातचीत के पहले दौर के बाद दोनों देशों की सेना गलवान में पीछे हटने लगी थी लेकिन चीन की एक निगरानी चौकी के स्थल को लेकर बात बढ़ गई और इतनी बड़ी कि 15 जून को हिंसक संघर्ष हो गया जिसने भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हो गए और चीन के कितने जवान मारे गए इसकी कोई खबर नहीं है। अब फिर दोनों देश अपने-अपने मोड़ के हटा रहे हैं लेकिन भारतीय सेना चीन की सेना के हर कदम की निगरानी कर रही है और आश्वस्त होने के बाद ही पीछे की ओर कदम उठा रही है। इसका मतलब है कि मोर्चाबंदी खत्म करने के लिए जो प्रक्रिया आरंभ हुई है उसमें काफी वक्त लगेगा। क्योंकि का जो मनोविज्ञान है उसे देखते हुए फौज का पीछे हटना और वहां टिके रहना एक दिवास्वप्न भी हो सकता है।





दोनों देशों में जो शांति की प्रक्रिया आरंभ हुई है दोनों ने अलग-अलग बयान जारी किए हैं। भारत की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच शांति बनाए रखने के लिए और सीमा पर शांति जरूरी है। बयान में कहा गया है कि दोनों देशों की सीमा पर शांति बनी रहे और दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करना चाहिए। आने वाले दिनों में ऐसा ना हो इसलिए आपसी सहमति तैयार की गई। चीन द्वारा दिए गए बयान भाषा भारत से अलग है। उधर चीन के बयान कहा गया है कि वह अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए शांति बहाल करना चाहता है।





उधर चीन को लेकर भारत में विचित्र स्थिति है। पहली बार भारत मनोविज्ञान के बारे में कुछ समझ में नहीं आ रहा है। यह पता लगाना मुश्किल है कि भारतीय नेतृत्व चाहता क्या है क्या चीन के साथ संघर्ष चाहता है यह सामा कानून खत्म करना चाहिए और भावी रणनीति है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन का नाम लेकर अभी तक कुछ कहा नहीं है। उन्होंने जो कुछ भी कहा है उसे दोहराने की हिम्मत किसी भारतीय नेता में नहीं है। भारतीय सैनिकों की हौसला अफजाई के लिए और भारतीय सेना के बलिदान और पराक्रम की प्रशंसा में कह दिया कि भारतीय सीमा में प्रवेश नहीं किया है और ना भारत की जमीन पर कब्जा किया है। इसके अंधेरे पक्ष को लेकर काफी टीका टिप्पणी हुई और कई नेताओं ने तो इसे सूचना छिपाना कहा। लेकिन इसका एक प्रत्यक्ष असर दिखाई पड़ रहा है चीन के राष्ट्रपति ने अब तक भारत के खिलाफ कुछ नहीं कहा। इसे देखते हुए मोदी जी की कूटनीति की प्रशंसा करनी होगी। मोदी जी ने जिस तरह से मामले को हैंडल किया उसे अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो की प्रशंसा मिली और दबी जुबान से ही सही फ्रांस ने भी भारत की प्रशंसा की। डोभाल के साथ श्री प्रतिनिधि की बातचीत के बाद जो तनाव कम हुआ इसका मुख्य कारण था कि चीन यह समझ गया भारत के साथ दुनिया के कई बड़े दोस्त की तरह खड़े हैं। गौर करें चीन के साथ तब कौन खड़ा हुआ जिसने एलएसी पारकर हमले की बात की ,शायद कोई नहीं। यहां तक कि चीनी कर्ज के बोझ से दबा लाओस और पाकिस्तान ने भी सामने आकर कोई बात नहीं की। इसके विपरीत भारत ने दुनिया के कुछ सबसे शांत और सबसे अशांत खिलाड़ियों को अपने साथ खड़ा कर लिया। चीन के हाथ पांव फूल गए और उसने लौटने में ही कुशलता समझी। यह नरेंद्र मोदी की कूटनीति का कमाल है।

0 comments: