CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Friday, October 8, 2010

फिर गरमाने लगी है सियासत


राममंदिर की जमीन पर फैसला शायद किसी भी पक्ष को स्वीकार नहीं है। मंगलवार (चार अक्टूबर ) को विनय कटियार ने कहा कि वे मंदिर वहीं बनायेंगे यानी उस जमीन की जद में कोई मस्जिद नहीं बनने दी जायेगी। सुन्नी वक्फ बोर्ड भी सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिये कमर कस रहा है। ऐसा लगता है कि गत 30 सितम्बर को साम्प्रदायिक सद्भाव और सामाजिक सौहार्द की खुशफहमी आहिस्ता-आहिस्ता छीजने लगी है। अयोध्या के फैसले के पहले और उसके दौरान सुरक्षा व्यवस्था और उसके बाद समाज का सहमा-सहमा सा रुख, इन सारी बातों का अगर सामाजिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तब पता चलेगा कि हमारे नेता हकीकत से कितनी दूर हैं। यहां जिस हकीकत से मकसद है, वह यह है कि सांप्रदायिक उन्माद यूं ही नहीं भड़क जाता। बहुतेरे दंगे हमारे राजनेताओं द्वारा उकसाये गये और प्रायोजित होते हैं। इस बार हर राजनेता, चाहे वह कितना ही आत्मपोषक क्यों न हो और हर राजनीतिक दल, चाहे वह कितना ही उग्र क्यों न हो, पहले से ही इस बात पर एकमत था कि मुल्क में अमन-चैन बनाये रखना बहुत जरूरी है। फिर ऐसे में कोई समस्या कैसे हो सकती थी ?
उस दिन हर किसी का ध्यान इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले पर इतना केंद्रित था कि हमारे इतिहास के इस महत्वपूर्ण क्षण पर किसी ने गौर ही नहीं किया। हिंदू राजनीतिक दल और मुस्लिम राजनीतिक संगठन, हिंदू रूढि़वादी और कट्टरपंथी मुस्लिम धर्मगुरु, धर्मनिरपेक्ष और छद्म धर्मनिरपेक्ष, आंखों पर पट्टी बांधे मार्क्सवादी और उग्र ईश्वर विरोधी, सभी का एक ही लक्ष्य था कि देश की फिजा नहीं बिगडऩे दी जाएगी और अमन-चैन कायम रखा जाएगा। क्या वजह थी कि हिंदुओं और मुस्लिमों के नेता, जो पूरे छह दशक से अदालत में यह केस लड़ रहे थे, का अचानक हृदय परिवर्तन हो गया ?
भारत में यह बदलाव क्यों और कैसे आया, यह कोई नहीं जानता। क्या ऐसा कोई सुनिश्चित समय और स्थान था, जब नये भारत का उदय हुआ हो ? क्या कोई ऐसी घटना थी, जो इस बदलाव का कारण बनी ? संभव है 26/11 के बाद हमें यह अहसास हुआ हो कि अगर हम एक नहीं हुए, तो हमें कोई नहीं बचा पाएगा।

बाबरी-अयोध्या विवाद के चार केंद्रीय पड़ाव माने जा सकते हैं। ये हैं - 1949 में ब्रितानी हुकूमत के तालों को खोलना और मूर्तियों की स्थापना, 1989 में मंदिर के लिए शिलान्यास, 1992 में बाबरी ध्वंस और अब 2010 में यह फैसला। इन चारों महत्वपूर्ण पड़ावों के समय कांग्रेस सत्ता में रही है। अगर अयोध्या इस किस्म का आखिरी मुकदमा है, तो शायद हमें इसकी कानूनी प्रक्रिया को भी अंतिम परिणति तक पहुंचने देना चाहिए। हमने छह दशकों तक इंतजार किया है। फिर भला और दो या तीन साल इंतजार क्यों नहीं ? अव्वल तो कोई भी...सौहादर्पूर्ण... समाधान हरेक व्यक्ति व पक्ष के लिए पर्याप्त सौहार्दपूर्ण हो सकेगा, इसकी संभावना नहीं है। इससे बढ़कर यह एक ऐसा..राजनीतिक... समझौता हो सकता है, जिससे समुदायों के बीच रिश्ते बेहतर होने के बजाय तनावपूर्ण हो सकते हैं। अगर हम अपनी संस्थाओं पर भरोसा करते हैं, तो हमें उन पर पूरी तरह भरोसा करना ही चाहिए।

0 comments: