CLICK HERE FOR BLOGGER TEMPLATES AND MYSPACE LAYOUTS »

Saturday, October 16, 2010

कितने मुनासिब हैं ये लोग इस सफर के लिये...


औसत वजन से कम वजन वाले 47 प्रतिशत बच्चों के इस देश में कामनवेल्थ के 101 मेडल, चमकती रोशनी, तालियों की गडग़ड़ाहट और चमत्कृत दर्शकों के इस देश की तस्वीरें जहां विदेश गयीं, वहीं खेलगांव और कनाट प्लेस के आस-पास के मैले कुचैले तथा भूखे बच्चों और अधनंगी , भूखी महिलाओं - लड़कियों की तस्वीरें भी विदेश गयी। उसके साथ गयी पिछले दिनों प्रकाशित इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की वह रिपोर्ट भी जिसके अनुसार गरीबी, भुखमरी और कुपोषण से प्रभावित 84 देशों की सूची में भारत चीन और पाकिस्तान से ही नहीं, सूडान तक से पिछड़ा हुआ 67वें स्थान पर है। पाकिस्तान 52वें स्थान पर तथा नेपाल 56वें नंबर पर है, लेकिन असली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगी चीन तो मात्र 7वें स्थान पर है। मतलब सारी राजनीतिक बुराइयों के बावजूद अपनी जनता की देखभाल में चीन की स्थिति हमसे बहुत है। संस्थान ने बच्चों में कुपोषण, बाल मृत्यु दर और न्यूनतम कैलोरी पा सकने वाले लोगों के अनुपात को आधार बनाया है। मनमोहन सिंह सरकार मंदी के दौर में भी प्रगति और उच्च विकास दर के दावे कर रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने तथ्यों के आधार पर साबित किया है कि यहां पड़ोसी देशों की तुलना में अधिक लोग भुखमरी के शिकार हैं तथा ऊंची विकास दर का लाभ अत्यंत गरीब लोगों को नहीं मिल पा रहा है। गरीबों के नाम पर योजनाएं ढेर सारी हैं लेकिन वितरण व्यवस्था में गड़बडिय़ों और भ्रष्टाचार के कारण आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है। मोटे अनुमान के अनुसार भारत में हर साल लगभग 25 लाख शिशुओं की अकाल मृत्यु होती है। इसी तरह 42 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं।

अपने बच्चे को पेटभर भोजन नहीं खिला सकने से अधिक शर्मनाक बात किसी माता-पिता के लिए दूसरी नहीं हो सकती। एक तरफ जहां हमारे नवधनाढ्यों की दौलत की चमक-दमक है, वहीं दूसरी तरफ लाखों लोग तकलीफों और शर्मिदगियों का बोझा ढोने को मजबूर हैं। वे अपना पेट काटकर भी बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं करा पाते। भोजन के लिए बेचैन बच्चों के आंसू मां-बाप खासकर माएं नहीं देख सकतीं हैं। कई जगह तो यह भी सुनने में आता है कि जब भूखे बच्चों की तकलीफ बर्दाश्त के बाहर हो जाती है, तब मांएं तंबाकू मसलकर उन्हें अपनी अंगुलियां चूसने को दे देती हैं। इससे वे बिना कुछ खाए-पिए भी सो जाया करते हैं।
यदि बच्चे छोटे हों तो उन्हें तब तक पीटा जाता है, जब तक वे रोते-रोते न सो जाएं। लेकिन बच्चों के बड़े होने पर उन्हें भूख के साथ जीना सिखाने की कोशिश की जाती है। यह एक ऐसा सबक है, जो जिंदगी भर उनके काम आता है। क्योंकि मां-बाप को पता है कि भूख जीवन भर उन्हें सताने वाली है।

जिन लोगों के लिए भूख जिंदगी की एक क्रूर सच्चाई है, उनसे बातचीत करके बारे थोड़ा जानकर हम जैसे लोग उनकी स्थिति को थोड़ा समझ सकते हैं। उन्हें अपना जीवन बचाए रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी होती है। वे बहुत जल्द बूढ़े और जर्जर या बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि इस तरह की रिपोर्ट पहली बार आई है। भारतीय सामाजिक-आर्थिक शोध संस्थानों के सर्वेक्षणों में भी इस तरह के निष्कर्ष सामने आ चुके हैं। असली समस्या तो बच्चों के जन्म के पहले से शुरू हो जाती है। भारत सरकार के बाल महिला कल्याण मंत्रालयों और विभागों के बावजूद गर्भवती महिलाओं को न्यूनतम भोजन देने की कोई समन्वित योजना नहीं है। माएं भूखीं हैं और उनके पेट में पल रहे बच्चे भी कुपोषित और भूखे। देश का बचपन अगर ऐसा है तो जवानी कैसी होगी इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

0 comments: