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Monday, March 14, 2016

कन्हैया को खुद से खतरा

जे एन यू के छात्र संघ के नेता कन्हैया को इन दिनों मीडिया में इतनी जगह मिल रही है कि उन्हें एक बिम्ब होने का मुगालता हो गया। वे यह सोचने लगे हैं कि आज के समय के महानतम इंसान हैं। वे यह नहीं समझ पा रहे हैं उन्हें जिस मीडिया ने यहां तक पहुंचाया है वही मीडिया किसी दिन फटे पोस्टर की मानिंद कूड़ेदान में फेंक देगा। इस ‘महान’ बिम्ब की एक समस्या यही है कि उसे मीडिया के उस अपराध बोध ने बनाया है, जिसमें किसी क्रांतिकारी को छू-छू कर धन्य होने की आदत है। एक खतरा कन्हैया की ऊंचाई को कन्हैया से ही है। दूसरा खतरा उसे अपनी अज्ञानता से है। उसे नहीं मालूम कि गोलवलकर मुसोलिनी से कभी मिले ही नहीं। मुसोलिनी से बाल कृष्ण शिवराम मुंजे ने भेंट की थी, गुरु गोलवलकर ने नहीं। इतालवी लेखिका मार्जिया कोसालेरी ने अपने आलेख ‘हिंदुत्व फॉरेन टाइ अप इन 1930’ में लिखा है कि 1930-31 में लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलन से लौटते हुए मुंजे ने इटली के तानाशाह मुसोलिनी से मुलाकात की थी। पर कन्हैया अपने भाषण में गोलवलकर ही कहता रहता है। सामान्यतया ऐसे लोग अपने आपको नहीं देखा करते, दूसरे देखा करते हैं। लेकिन यहां कन्हैया अपनी कीर्ति पर ही फिदा हैं ! ... और जो आत्म मुग्ध हुआ गया ! यहां कन्हैया को खतरा अपने ही दो दोस्तों खालिद और अनिर्बान से है। उन्हें जेल से छूटने दें और तब देखें कि मीडिया कन्हैया को कहां ले जाता है। यही नहीं, कन्हैया की क्रांति का सबसे बड़ा दुश्मन यह सामंतीय भाव वात्सल्य ही है, जो जे एन यू कैंपस में पुराने कामरेडों की आखों में छलक रहा था ! यह तो क्रांति विरोधी पोजीशन थी। मार्क्‍स अगर भावुक होते तो फायर बाख के चेले हो गए होते और लेनिन ने अपने गुरु से भिड़कर बोलशेविक पार्टी न बनाई होती ! खैर, सामाजिक मनोविज्ञान से अलग अगर शुद्ध समाजशा​स्त्रीय दृष्टिकोण से देखें तो कन्हैया जो कुछ कर रहा है वह सहनशीलता की सीमा को लांघने लगा है। उसके घटिया आरोपों का वैसा ही उत्तर देने की आजादी का इस्तेमाल अभी नहीं हुआ है। वे और उनकी मंडली भी तमाम अश्लील-असभ्य वचन कह चुके हैं। संविधान और हमारी सभ्यता में विचार व्यक्त करने की आजादी है। प्रश्न है कि क्या हम भी उन पर चरित्रहीनता का आरोप लगा सकते हैं? नहीं , हम जवाबी नारे नहीं लगा सकते। हम सांस्कृतिक और सांविधानिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर सकते। लेकिन व्यथा बड़ी है।अब , प्रश्न है कि इसका प्रतिकार हो कैसे? अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा है , सहने की भी सीमा होती है
सागर के उर में भी ज्वाला सोती है।
राष्ट्र अपनी संस्थाओं संविधान, न्यायपालिका, संसद और सेना रक्षित होता है और एक व्यक्ति की भांति उसे भी आत्मरक्षा का अधिकार है। यहां सवाल है कि राष्ट्र अपने इन अंगों को अपमानित करने वाले तत्वों को कब तक सहे? किस सीमा तक सहे? क्या- क्या सहे? और क्यों सहे? संप्रभुता पर भी हमला हो तो किया क्या जाए? कड़वी वास्तविकता यह है कि मौजूदा सामाजिक व्यवहार में लंपटता और आपराधिकता गुथे हुए तत्व हैं। इनका अपना एक लाभदायी मूल्य है। वर्तमान राजनीतिक और आर्थिक व्यवहार में इस मूल्य का औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। इस देश के राजनेता और राजनीतिक कार्यकर्ता अपनी नम्रता-विनम्रता, शिष्टता-सभ्यता, ईमानदारी या सदाशयता के आधार पर अपनी जगह नहीं बनाते, वे जगह बनाते हैं अपनी आक्रामकता, अशिष्टता, अभद्रता और मर्यादाविहीनता के आधार पर। कुछेक अपवाद हो सकते हैं लेकिन ज्यादातर की प्रत्यक्ष स्थिति यही है कि चुनावी प्रक्रिया में राजनीति लोगों की, विशेषकर युवाओं की, आपराधिकता का इस्तेमाल करती है, उनकी नैतिकता या आदर्शवादिता का नहीं। यही स्थिति आर्थिक व्यवहार में भी है। अर्थतंत्र में भी ऊपर से नीचे तक लंपटता और आपराधिकता सफलता के सूत्र की तरह इस्तेमाल होती हैं। जहां तक मीडिया की बात है तो वहां नैतिकता के मामले में अलग-अलग पत्रकार समूह अपनी-अपनी तरह से नैतिकता समझने और समझाने में लगे हैं। विचारधाराओं के झगड़े जैसी हालत पत्रकारिता में भी बन गई दिखती है। ऐसा क्यों है, इसकी जांच-पड़ताल अभी हो नहीं पा रही है। अब तक डाकिये और जज जैसी भूमिका में दिखती आई पत्रकारिता खुल्लमखुल्ला खुद ही वकील और राजनीतिक दलों के सहायकों के वर्गों में बंटती नजर आ रही है। यहां यह समझना जरूरी है कि कन्हैया को किसके विरोध में खड़ा किया जा रहा है। राष्ट्र के या राज व्यवस्था के। निशाना राजव्यवस्था है और निशाने पर राष्ट्र है। राष्ट्र केवल राजव्यवस्था नहीं होता। इसका एक भूगोल होता है-सुनिश्चित भूक्षेत्र। एक इतिहास होता है। इतिहास का अनुकरणीय मानवीय भाग संस्कृति कहा जाता है। एक संस्कृति, एक भूमि और उस पर रहने वाले सभी लोगों की एकता से बने जन मिलकर राष्ट्र होते हैं। राष्ट्र संविधान गढ़ते हैं। भारत ऐसा ही है और इससे भी ज्यादा सचेतन राष्ट्र है। भारत के लोगों ने अपना संविधान गढ़ा। संविधान के प्रति स्वयं को आत्मार्पित भी किया। न्यायपालिका गढ़ी, उसका अनुशासन और न्याय निर्णय स्वीकारा। अनेक संस्थाएं रची गईं। भारत एक संपूर्ण सिद्ध राष्ट्र है। उसे तहस-नहस करने का काम कन्हैया और उसके साथी कर रहे हैं। लेकिन यह उनका भ्रम है। भारत है और रहेगा। व्यवस्था बदलने से राष्ट्र नहीं बदलता कन्हैया जी।
यूनान ओ मिस्र रोमां सब मिट गये जहां से
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

Saturday, March 12, 2016

महानगरों को बचाइये

एक तरफ भारत में स्मार्ट शहर बन रहे हैं तो दूसरी तरफ महानगर दुर्दशा के शिकार होते जा रहे हैं। पिछले दिनों, दिल्ली सरकार ने प्रदूषण और ट्रैफिक जाम के समाधान के लिए सम-विषम नंबर का एक फॉर्मूला लागू किया जिसने दिल्ली ही नहीं पूरे देश में सुर्खियां बटोरीं। इसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले। लेकिन दिल्ली या कोलकाता जैसे महानगरों में बढ़ता प्रदूषण और आनुपातिक रूप से सार्वजनिक परिवहन साधनों की कमी तो समस्या का प्रत्यक्ष रूप है। दरअसल, कोलकाता जैसे शहरों में क्षमता से कई गुना ज्यादा लोग रह रहे हैं। इससे ना तो कोलकाता खुश है ना अपना घर-परिवार छोड़कर यहां आने वाले लोग खुश हैं। इससे प्रदूषण बढ़ रहा है, जीवनयापन महंगा और गुणवत्ताविहीन हो रहा है, अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है, भीड़भाड़ के चलते बदलती जीवनशैली कई बीमारियों का कारण बन रही है, ना पीने को साफ पानी उपलब्ध है ना खाने को शुद्ध-स्वच्छ खाना। करोड़ों लोग खुले में बिकने वाला धूल से सना खाना खाने को मजबूर हैं। सुरक्षित समझे जाने वाले फल जो सड़कों पर काट कर बेचे जाते हैं वे बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं। तमाम समस्याओं का मूल कारण यह है कि हम समस्या के मूल तक जाना ही नहीं चाहते। यदि महानगरों का बोझ कम करना है और छोटे शहरों का भी समान रूप से विकास करना है तो कुछ बेहद जरूरी कदम उठाने पर ध्यान देना चाहिये। कोलकाता या अन्य बड़े शहरों में रोजगार एक ऐसी उम्मीद है जिसके चलते लोग आते हैं। अगर छोटे शहरों में भी कल कारखाने लगाये जाते हैं तो कुछ लोग वहां भी जाएंगे, इससे शहरों पर बोझ कम होगा। सबसे पहला कदम औद्योगिक विकास का विकेंद्रीकरण हो सकता है। फिलहाल बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी की जरूरत के चलते छोटे शहर इसके लिए ज्यादा अनुकूल नहीं माने जाते हैं। ऐसे में डीआईडी की शुरुआत उन उद्योगों से की जा सकती है जिनमें प्रोडक्ट को लाने-ले जाने के लिए ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी की जरूरत नहीं होती। फिलहाल बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी की जरूरत के चलते छोटे शहर इसके लिए ज्यादा अनुकूल नहीं माने जाते हैं। ऐसे में डीआईडी की शुरुआत उन उद्योगों से की जा सकती है जिनमें प्रोडक्ट को लाने-ले जाने के लिए ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी की जरूरत नहीं होती। ऐसे उद्योगों को अपेक्षाकृत कम विकसित इन्फ्रास्ट्रक्चर वाले स्थानों पर शिफ्ट किया जा सकता है। इनमें टेलिकॉम, बीपीओ आदि जैसे सर्विस सेक्टर को महानगरों से दूर करने में प्राथमिकता दी जानी चाहिये, क्योंकि इनका संचालन छोटे शहरों में भी किया जा सकता है। साथ ही ये उद्योग उन शहरों के राजस्व में भी वृद्धि करेंगे, जिससे वहां भी वे तमाम सुविधाएं और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में मदद मिलेंगी जो आज नहीं हैं।
इसके बाद लगातार बढ़ रही जनसंख्या भी तमाम समस्याओं की जननी है। इस महासमस्या से निपटने के लिये क्या अब ये जरूरी नहीं कि भारत में भी ‘हम दो, हमारे दो’ के नारे को कानूनी रूप दे देना चाहिये, ताकि संभवतः करीब 20 साल बाद हमारे पास देश की जनसंख्या के अनुपात में संसाधन भी उपलब्ध होंगे। बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या कई समस्याओं की जड़ है; चाहे वो सड़कों पर दौड़ती भीड़ हो या भयानक जाम हो या एक नौकरी के लिए हजारों आवेदन जैसी गंभीर समस्या हो। जनसंख्या नियंत्रण के नुस्खे में हम चीन से काफी कुछ सीख सकते हैं। चीन ने अपने यहां ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ लागू की थी, जिसे 30 साल बाद हाल ही में ‘टू चिल्ड्रन पॉलिसी’ में तब्दील किया गया है। व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो दो लोग मिलकर बच्चे को जन्म देते हैं, इसलिये एक के बजाय दो बच्चों की नीति ज्यादा कारगर साबित हो सकती है इससे जन्म-मृत्यु दर का अंतर संतुलित होगा, अचानक आबादी में युवाओं का अनुपात कम होने की समस्या का सामना भी नहीं करना पड़ेगा। भले ही हम सीना तानकर आज यह बात कह रहे हैं कि हम विश्व के सबसे युवा देश के निवासी हैं और युवा हमारी ताकत हैं। लेकिन देश की स्थिति देखकर हम यह बात बेहद अच्छे से जानते हैं कि यही युवा जब बेकार बैठता है तो देश की सबसे बड़ी समस्या को जन्म देता है और कई असामाजिक गतिविधियों को अंजाम देता है। दूसरी तरफ हम भले ही श्रम शक्ति की उपलब्धता का दावा करते हैं, लेकिन ज्यादातर विकसित देश भारतीयों को मजदूरों की तरह ही देखते हैं। भले ही हम सीना तानकर आज यह बात कह रहे हैं कि हम विश्व के सबसे युवा देश के निवासी हैं और युवा हमारी ताकत हैं। लेकिन देश की स्थिति देखकर हम यह बात बेहद अच्छे से जानते हैं कि यही युवा जब बेकार बैठता है तो देश की सबसे बड़ी समस्या को जन्म देता है और कई असामाजिक गतिविधियों को अंजाम देता है। यही समस्याएं ही सारी मुश्किलों की जड़ हैं।

Friday, March 11, 2016

देश है तभी हम हैं

इन दिनों एक अजीब हवा सी बह रही है। देश का सारा विमर्श कन्हैया के भाषणों की प्रशंसा और आलोचना से चलकर बरास्ते मोदी की कामयाबी- विफलताओं से विजय माल्या के फरार होने पर खत्म हो जा रहा है। सारे देश में इसके अलावा ना खबर है ना चर्चा। बहस इस पर नहीं है कि जे एन यू में देश विरोधी नारे लगे, वे नारे हमारे सैनिकों की शहादत या शहीदों की कुर्बानी को अपमानित करते थे। ऐसे लोग कौन थे? बहस है कि कन्हैया ने क्या कहा? बहस है कि देश की अवधारणा क्या है? बहस है कि अभिव्यक्ति की आजादी क्या है? कोई ये नहीं पूछ रहा है कि जिस कश्मीर की बात को लेकर वे अफजल गुरू की फांसी पर बहस कर रहे हैं उस कश्मीर की हिफाजत के लिए जाने वाला सैनिक क्या सोचता होगा?
इश्क है हासिले जिन्दगानी
खून से तर है उसकी कहानी
आए मासूम बचपन की यादें
आए दो रोज की नौजवानी
जाने वाले सिपाही से पूछो, वो कहां जा रहा है
जे एन यू कैम्पस में आरोप लगा कि कश्मीर में फौज बलात्कार करती है। यह एक इल्जाम है सबूत कोई नहीं है। इस इल्जाम पर, कोई बहस नहीं है, इल्जाम लगाने वाले का कोई विरोध नहीं है। मोदी जी और भाजपा पर आरोप लगाये जा रहे हैं। मोदी को देश ने चुना है। आरोप लगाने वालें से अनुरोध है कि एक विकल्प लाएं और तब बात करें। अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब ये नहीं की गाली देने की आजादी हो, कुछ भी बोलने की आजादी हो,अभिव्यक्ति की भी सीमाएं हैं, यह ध्यान रखना जरूरी है। कन्हैया और उसके समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी हो तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी खासियत समानता है और उस खासियत की पहचान अब तक नहीं हो पाई है। एक पहचान समानता के रूप में हुई थी, लेकिन आग्रही और जिद्दी वर्ग ने हमेशा ऐसा माहौल बनाए रखा कि हम कभी भी इस बात का आम राय से ऐलान कर नहीं पाए। जरूरत पड़ने पर कभी-कभी सैद्धांतिक रूप से इसे मान लेते हैं, लेकिन व्यवहार में समानता का प्रभुत्व दिखाई नहीं देता। 'हम' की भावना वाले समाज के रूप में भी लोकतंत्र को परिभाषित नहीं होने दिया जाता। कुछ लोग धर्म, कुछ लोग जाति और कुछ भौगोलिक क्षेत्र की अपनी-अपनी अस्मिता का रोड़ा अटका देते हैं। उस रोड़े में कन्हैया का मनुवाद और जाति वाद का विरोध भी शामिल है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता दो शब्द हैं और इनमें फर्क भी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही कमाल था कि आपात काल के पीड़ित वर्ग को सत्ता मिल गई थी। वह अलग बात है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का ही कमाल था कि कार्यकाल खत्म होने से पहले ही जनता ने उन्हें नकार भी दिया था। अभिव्यक्ति की आजादी का उससे भी बड़ा कमाल देखिए कि उसी जनता ने आपातकाल लगाने वाली सत्ता को फिर सत्ता में ला दिया। यानी अब तक कुख्यात बताया जाने वाला आपातकाल तक हमारे लोकतांत्रिक न्यायतंत्र की मर्यादाओं से होकर गुजरा था। अगर इस पूरे मसले को सूक्ष्मता से देखें तो यह पूरा मसला विचारधाराओं का है। ठीक रोमन ग्लैडियेटर्स की तरह। वामपंथियों के ग्लेडियेटर्स कन्हैया कुमार और उमर खालिद हैं जो दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के ग्लेडियेटर्स से भिड़े हुए हैं। फ़र्क़ इतना है कि रोमन साम्राज्य के दौर में ये मुक़ाबले आम लोगों के मनोरंजन के लिए कराए जाते थे। जेएनयू का अखाड़ा गंभीर है। ये दो विचार धाराओं के बीच की लड़ाई है। ये नई लड़ाई नहीं है। यह संभव है कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद जेएनयू कैंपस में दक्षिणपंथी ग्लेडियेटर्स का मनोबल बढ़ा हो। कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा चाहिए. जेएनयू मुद्दे ने वामपंथी पार्टियों को अपना असर वापस लाने के लिए एक अवसर दिया है। वहीं कैंपस के अंदरूनी मामले को मोदी सरकार ने भी हवा देने की कोशिश की। वामपंथी विचारधारा वालों की सबसे बड़ी समस्या उनके अपने विचार हैं, जी हां व्यक्तिगत विचार। वो खुद को उच्च नैतिक स्तर वाला समझते हैं और दूसरों को खुद से नीचे। विचारधारा में कट्टर तो होते हैं लेकिन मौका पड़ने पर कभी-कभी सत्ता के करीब जाने के लिए अपनी विचारधारा बदल भी देते हैं। शायद ढुलमुल विचार के कारण ही उनका देश भर में पतन हुआ है। अगर गरीबी से आजादी चाहिए थी तो पश्चिम बंगाल में 34 साल सत्ता में रहने के बावजूद इस राज्य को गरीबी से आजादी क्यों नहीं दिलाई ? केरल में भी हुकूमत की लेकिन सत्ता में आने के बाद वो दूसरी पार्टियों से कितना अलग थे? अभी वो केवल त्रिपुरा में सत्ता में हैं जिसे एक अमीर राज्य तो नहीं कहा जा सकता? कन्हैया के भाषण को सोशल मीडिया पर खूब उछाला जा रहा है। इसमें शक नहीं कि भाषण जबर्दस्त था लेकिन ऐसे भाषण कैंपस में पहले भी दिए जा चुके हैं। ये दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई है जो अब कैंपस से बाहर आ चुकी है। मुश्किल ये है कि इस लड़ाई में इन्होंने देश को मोहरा बना दिया है। उन्हें याद रखना चाहिये कि देश है, तभी वे हैं।
कौन दुखिया है, जो गा रही है
भूखे बच्चों को बहला रही है
लाश जलने की बू आ रही है
जिन्दगी है कि चिल्ला रही है

Thursday, March 10, 2016

सरकार झुकी : ई पी एफ पर नहीं लगेगा टैक्स

10 मार्च 2016

अरुण जेटली ने मंगलवार को कर्मचारी भविष्य निधि से पैसे निकालने पर कर लगाने का प्रस्ताव वापस लेने की घोषणा की। उन्होंने यह प्रस्ताव बजट पेश करते हुए किया था। जेटली ने कहा कि वह इस नीति की समीक्षा करेंगे। सरकार ने बजट के दौरान ईपीएफ़ से पैसा निकालते समय उसके 60 प्रतिशत हिस्से पर कर लगाने की घोषणा की थी। इसका व्यापक विरोध हुआ था। राजस्व सचिव ने कहा था 1 अप्रैल, 2016 के बाद ये कर कर्मचारियों की तरफ से जमा कराए गए पैसे के 60 प्रतिशत हिस्से पर मिलने वाले ब्याज पर लागू होगा। सरकार के इस प्रस्ताव से 6 करोड़ लोग प्रभावित हो रहे थे। ईपीएफ पर टैक्स वापसी की घोषणा निश्चित तौर पर राजनीतिक दवाब में की गई है, लेकिन क्या यह सरकार की कानूनी मजबूरी भी थी? कांग्रेस के उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने एलान के थोड़ी देर बाद ही इसका श्रेय लेते हुए कहा कि सरकार ने उनके दबाव में फैसला वापस लिया। बीजेपी की तरफ से इसका श्रेय परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी दिया जा सकता है, क्‍योंकि ईपीएफ पर टैक्‍स के प्रपोजल पर विवाद के बाद पीएम ने वित्‍त मंत्री को इस मसले को होल्‍ड करने की सलाह दी थी। इस रोलबैक की बड़ी वजहों की बात की जाए तो उसमें पांच राज्यों में चुनाव का होना है। ईपीएफ के निवेश तथा नियमन के लिए कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) का गठन किया गया है, जिसके बोर्ड में सरकार, मजदूर संघ तथा कर्मचारियों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। सरकार द्वारा ईपीएफ पर टैक्स लगाने से पहले ईपीएफओ से कोई मशवरा नहीं किया गया था, जिस पर अगली मीटिंग में बड़ा विरोध होने की संभावना थी। भविष्य में ईपीएफ पर टैक्स लगाने की कोई भी योजना ईपीएफओ से परामर्श के बाद ही लानी होगी और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पुराने खातों और बचत पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़े। जीएसटी के माध्यम से टैक्स सरलीकरण की बात करने वाली सरकार ने ईपीएफ पर दोहरे कराधान का प्रावधान कर एक गलत नजीर पेश की थी। ईपीएफ वेतनभोगियों के लिए सामाजिक सुरक्षा तथा पेंशन की महत्वपूर्ण योजना है, जिस पर जमा पैसे पर सरकार पहले ही टैक्स वसूल लेती है। इस बजट में ईपीएफ से निकासी पर टैक्स भुगतान का प्रावधान अगर लागू हो जाता तो आम जनता को दो बार टैक्स देना पड़ सकता था। ईपीएफ की बचत योजना 1952 से चल रही है, जिस पर 2016 के बजट से पुरानी जमाराशि पर टैक्स लगाने का प्रावधान आम जनता के साथ कानूनी विश्वासघात था। अगर यह रोलबैक नहीं होता तो भारत सरकार की आम जनता में साख प्रभावित होती, जिस पर पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था और मौद्रिक प्रणाली टिकी हुई है। कई उद्योगपतियों ने सरकारी बैंकों से लिए लाखों करोड़ के कर्ज नहीं चुकाए, और अपनी व्यक्तिगत संपत्तियां बना लीं, जिसकी क्षतिपूर्ति के लिए बजट में सरकारी बैंकों को 25,000 करोड़ की पूंजी दी जा रही है। निजी कम्पनियों को और भी पैसे की आवश्यकता है और उनकी निगाह जनता के पैसे पर है। ईपीएफओ द्वारा 8.5 लाख करोड़ से अधिक के पैसे का निवेश और नियमन किया जाता है, जिसे सरकार एनपीएस के माध्यम से शेयर मार्केट में लगाने की योजना बना रही है। शेयर मार्केट और आईपीओ में आम जनता अपने हाथ पहले ही जलाए बैठी है और सेबी इन कंपनियों के नियमन में विफल रही है। सरकार द्वारा संचालित यूटीआई में जनता पहले ही अपने पैसे खो चुकी है और अब ईपीएफ की बचत को शेयर मार्केट में लगाने से संकट होने पर आम वेतनभोगी की हालत भी किसानों की तरह हो जाती। भविष्य में इन मुद्दों पर विचार किए बगैर ईपीएफ तथा बचत योजनाओं पर टैक्स यदि लगाया गया तो वह न सिर्फ गैरकानूनी होगा, वरन् जनता के संकट को भी बढ़ाएगा, जिसके दबाव में वित्तमंत्री को इस बार के बजट में रोलबैक की शुरुआत करनी पड़ी। यही नहीं यह विडम्बना है कि भाजपा ने पूर्ववर्ती सरकार या साफ कहें मनमोहन सरकार को जिन मुद्दों पर घेरा था वह आज उन्हीं मसलों का समर्थन कर रही है। मसलन, जी एस टी​ , आधार कार्ड , विभिन्न मदों में सब्सिडी वापसी इत्यादि।

 

हमारे सपनों का दंड बच्चों को


9 मार्च 2016

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट में दर्ज यह आंकड़ा कितना खतरनाक है, कितना डरावना है। आंकड़े में बताया गया है कि एक साल के दौरान देश में 18 साल से कम उम्र के 10,900 किशोरों ने आत्महत्या की। आत्महत्याओं की दर परीक्षाओं के मौसम में सबसे ज्यादा होती है। जब परीक्षाएं एकदम सिर पर होती हैं, और उम्मीदों का पूरा का पूरा बोझ अपनी संतानों, अपने विद्यार्थियों पर डाल दिया जाता हो, तब हर दिन अखबार में बच्चों से संबंधित एक खबर ऐसी जरूर पढ़ने को मिल जाती है। यानी वे बच्चे हैं, जिनमें जिन्दगी को लेकर सबसे ज्यादा उमंग होती है, जिस अवस्था को हर कोई अपना गोल्डन पीरियड बताता है, उस उम्र में किसी फंदे पर लटक जाना! बता दें कि आत्महत्या जैसे कदम उठाने वाले लोगों में तकरीबन छह प्रतिशत स्टूडेंट की श्रेणी में दर्ज हैं। सोचिए, 2014 में तकरीबन 1,121 बच्चे ऐसे थे, जो परीक्षा में असफल होने के कारण आत्महत्या कर बैठे! कौन है दोषी? किन पर लगना चाहिए उनकी 'हत्या' का आरोप? क्या इतना कमजोर हो चला है हमारा समाज, जो असफल बच्चों तक को दोबारा मौका नहीं दे सकता? यही नहीं हमारे समाज में बच्चों का यौन शोषण भी एक ऐसा मसला है जो उन्हें भीतर से कमजोर बना देता है। आपको हैरत होगी कि हमारे देश में हर तीन घंटे में एक बच्चे का यौन शोषण होता है और आत्महत्या करने वाले बच्चों में यौनशोषित बच्चों की संख्या दस प्रतिशत से कुछ ही कम है। अभी हाल में आयी एक खबर को पढ़कर तो हर आदमी हिल गया होगा। उस खबर में बताया गया था कि एक बच्चा था जो म्यूजिक का मास्टर था। 10 साल की उम्र में उसने अपना बैंड बना लिया, लेकिन पता नहीं क्या हुआ। रातों-रात अपनी जिन्दगी खत्म कर ली। ऐसे एक-एक बच्चे की अपनी कहानी है, अपना टैलेंट है, अपनी दक्षता है, लेकिन यह तो हमारी ही नालायकी है, जो हम बच्चों को पहचान नहीं पाते। उनके हुनर को बाहर नहीं ला पाते। घर भी, बाहर भी, स्कूल भी। बच्चे जाएं तो जाएं कहां? जब परीक्षाएं चल रही होती हैं, तो अखबारों में यह खबर मिल ही जाती है कि बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं, उन पर भारी दबाव है। दबाव के कारण आत्महत्या जैसे कदम तक उठा रहे हैं। तो इसके बीज तो हमने खुद ही बोए हैं, हम खुद ही अपराधी हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि कॉम्पीटिशन बच्चों का नहीं, पालकों का अधिक हो रहा है। इज्जत दांव पर उनकी ज्यादा लगी है। बच्चों को मोहरा बना दिया गया है। कितना खतरनाक है यह! कॉम्पीटिशन की बात आने पर एक वाकया याद आता है कि एक स्कूल में पहली पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग थी। प्रिंसिपल सभी अभिभावकों से मुखातिब थीं। उन्होंने अभिभावकों के सामने एक प्रस्ताव रखा - 'नए सत्र से हम कॉम्पीटिशन तो सारे करवाएंगे, लेकिन क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जीते कोई नहीं, हारे कोई नहीं। सभी को प्राइज़ मिले। सभी को बराबर की शाबाशी मिले।' इस विचार के समर्थन में कोई दो-चार ही हाथ खड़े हुए। अधिकतर पेरेंट्स का मानना था कि कॉम्पीटिशन होना ही चाहिए, किसी न किसी को पहले-दूसरे और तीसरे नंबर पर आना ही चाहिए। प्रिंसिपल महोदय का यह प्रस्ताव भरभराकर गिर गया। हमने 'तारे जमीन पर' या ‘थ्री इडियट्स ’ फिल्म में नवाचारी, बोझरहित और अपने मन की शिक्षा को कुछ रुपहले परदे पर जाना था। इससे बहुत साल पहले गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर ने विश्व भारती में इस तरह की शिक्षा शुरू की​ थी। गुरुदेव ने स्थानीय परिवेश के मुताबिक पाठ्यक्रम तैयार किया था। बहुत रोमांचक होता था, मक्खी, तितली और मेंढक का जीवनचक्र पूरे होता देखना, फूलों को खिलता देखना, उनका जीवन चक्र देखना और उसके माध्यम से 'संयोग और संभाविता' को समझना। ऐसा भी नहीं कि वहां के बच्चे पिछड़ जाया करते थे। पर अब , अब दिखावा तो वही है पर असलियत समाप्त हो गयी। प्रोफेसर यशपाल का यह कथन सही है कि 'वर्तमान शिक्षा प्रणाली बच्चों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति पर ताले लगाती है।' किसी कवि ने कहा है ,

बच्चो,याद रखना,हम नहीं बदलेंगे

शिक्षा की ऐसी व्यवस्था को,

जो तुम्हें आत्महत्या की तरफ ले जाती है।

यदि आप बच्चों से ईमानदारी से पूछें तो वे बताएंगे कि 'उन्हें ज्यादा मजा प्लेग्राउंड में आता है,' इसीलिए क्योंकि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें बोझिल बना दिया है। शिक्षकों का भी एक पक्ष हो सकता है, उनकी ट्रेनिंग में कमी हो सकती है, एक-एक शिक्षक के माथे पूरा-पूरा स्कूल संभालने की चुनौती भी हो सकती है। परंतु अपने घर को तो ऐसा मत बनाइए कि बच्चे अपनी जिन्दगी ही खत्म कर बैठें। हम क्यों अपने सपनों का दंड अपने बच्चों को दे रहे हैं। हम अभिभावक अंत में यही कहेंगे कि ,

बच्चो, हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है,

शिक्षा से हो रहे इस युद्ध में

तुम जीत सको...!